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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पचास प्रति कड़वक २५७

सीरीज़का नाम दिया है।१ फलतः कला भवनवाले चित्र भी लौर चन्दा सीरीज़के दूसरे नमूनेके रूपमें स्वीकार किये गये। रामपुर, काशी और पंजाबकी इन तीन प्रतियोंके अतिरिक्त एक चौथी प्रति की जानकारी १९५३-५४ ई. में हुई। पटना कालेजके इतिहासके प्राध्यापक सैयद् हसन असकरी इतिहासके विद्वान होनेके अतिरिक्त उर्दू-हिन्दी साहित्यके प्रति भी रुचि रखते हैं और प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थोंकी खोज उनका व्यसन है। अपने इस व्यसनके परिणाम स्वरूप उन्हें अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थोंको प्रकाशमें लानेका श्रेय प्राप्त है। उस वर्ष मनेरशरीफके खानकाहके सज्जादनशीन और उनके भाई मौलवी मुरादुल्लम्के पुराने बस्तोंके बस्तोंको टटोलते हुए उन्हें चन्दायनके ६४ पृष्ठोंकी एक खण्डित प्रति मिली। वे उस समय केवल इतना ही जान सके कि वह हिन्दीका कोई अज्ञात ग्रन्थ है। संयोगसे वासुदेवशरण अग्रवाल उन्हीं दिनों पटना गये। असकरीने उन्हें वह ग्रन्थ दिखाया। तब सूक्ष्मरीक्षण करनेपर ज्ञात हुआ कि वे चन्दायके ही पृष्ठ हैं। तदनन्तर असकरीने इस प्रतिके सम्बन्धमें अंग्रेजी और उर्दूके पत्रोंमें कई लेख प्रकाशित किये।२ इस प्रतिके ज्ञात होनेके कारण ही चन्दायनकी एक अन्य प्रतिका पता चला। यह प्रति भी खण्डित है। इसमें भी ६४ पृष्ठ हैं; किन्तु इस प्रतिकी विशेषता यह है कि उसके पृष्ठ चित्रित हैं। काशी और पंजाबवाली प्रतियोंकी तरह ही इनके एक ओर चित्र और दूसरी ओर फारसी लिपिमें आलेख हैं। यह प्रति भोपालके एक मुस्लिम परिवारमें थी। उसके स्वामी चित्रोंके कारण उसे मूल्यवान तो समझते थे पर वे चित्र वस्तुतः क्या हैं, इसका उन्हें कुछ पता न था। १९५४ ई. में जब भारतीय पुरातत्त्व विभागके अरबी फारसी अभिलेखोंके विशेषज्ञ जियाउद्दीन अहमद देसाई भोपाल गये तो उन्हें यह चित्राधार दिखाया गया। देसाई उन्हीं दिनों पटना होकर आये थे और असकरीने उन्हें अपनी चन्दायनकी प्रति दिखायी थी। अतः उन्हें भोपालवाली प्रतिको उलटते-पुलटते हुए यह समझनेमें देर न लगी कि वह भी चन्दायनकी ही प्रति है। तब चन्दायनकी सचित्र प्रतिके रूपमें उसका महत्त्व बढ़ गया और उसे १९५५ ई. में बम्बईके प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियमने क्रय कर लिया। काशीवाले पृष्ठ मेरे शोधसे प्रकाशमें आये यह ऊपर कहा जा चुका है। भोपालवाली प्रति उस संग्रहालयमें है, जहाँ मैं काम करता हूँ। अतः इन दोनों ही प्रतियोंपर काम करनेका अधिकार मेरा था ही। मनेरशरीफ वाली प्रतिका विवरण असकरी पहले ही प्रकाशित कर चुके थे। उनकी प्रतिके उपयोग करनेमें कोई बाधा थी ही नहीं। फलतः इन प्रतियोंके आधारपर चन्दायनको प्रस्तुत करनेका कार्य मैंने आरम्भ किया। १. मार्ग बम्बई, भाग ४ अंक १ पृ. २४। २. करेंट स्टडीज पटना कालेज १९५५ ई. पृ. ९-१६ पटना युनवर्सिटी जर्नल १९५ ई. पृ. १६०। प्रवाहित पटना अप्रैल १९५ ई. अंक ११ पृ. ५४-५४।

१ बम्बई (भोपाल) वाले चन्दायण के पृष्ठों के पाठोद्धार (फारसी लिपि से नागरी लिपि में रूपान्तरित करने) का काम समाप्त कर उसके पाठ के स्वरूप का अन्तिम निश्चय कर ही रहा था कि माताप्रसाद गुप्त ने प्रयाग विश्वविद्यालय के माध्यम से और विश्वनाथ प्रसाद ने आगरा विश्वविद्यालय के हिन्दी विद्यापीठ के माध्यम से बम्बई वाली प्रति के फोटो-प्रिंट की माँग की। तब ज्ञात हुआ कि वे दोनों विद्वान भी संयुक्त रूप से अन्य दो प्रतियों के सहारे चन्दायण पर काम कर रहे हैं। चूँकि मैं बम्बई वाली प्रति पर काम कर रहा था नियमान्तः संग्रहालय से उन्हें उसके फोटो प्रिंट आदि नहीं दिये जा सकते थे। किन्तु यह मानकर कि वे लोग हिन्दी साहित्य के जाने माने विद्वान हैं मेरी अपेक्षा वे इस ग्रन्थ के साथ अधिक न्याय कर सकेंगे मैंने आगे कार्य करना स्थगित कर दिया और उनकी माँगों के अनुसार प्रयाग विश्वविद्यालय को चन्दायण के पृष्ठों के फोटो नेगेटिव और आगरा हिन्दी विद्यापीठ को फोटो प्रिंट भिजवा दिये गये। कुछ काल पश्चात् माताप्रसाद गुप्त ने संग्रहालय के डायरेक्टर मोतीचन्द्र को लिखा कि बम्बई वाली प्रति का मेरा तैयार किया हुआ पाठ भी उन्हें भेज दिया जाय। मैंने उसका कार्य स्थगित कर दिया था इस कारण उसके प्रति मेरा कोई मोह न था। मैंने अपने पाठ की एक टाइप की हुई प्रति उन्हें भेज दी। कुछ दिन पश्चात् असकरी का एक लेख देखने में आया जिसमें उन्होंने बम्बई वाली प्रति (जिसकी चर्चा उन्होंने भोपाल प्रति के रूप में किया है) की एक टाइप की हुई कापी उदयशंकर शास्त्री (आगरा हिन्दी विद्यापीठ के एक अधिकारी) द्वारा प्राप्त होने की बात कही थी और उसके कुछ उद्धरण भी दिये थे। १ असकरी ने जिस टाइप की हुई प्रति से देखा वह प्रति मेरी वाली प्रति थी अथवा विश्वनाथ प्रसाद और माताप्रसाद गुप्त की अपनी तैयार की हुई कोई स्वतन्त्र प्रति इसके निर्णय और विचार में जाने की आवश्यकता नहीं। कहना केवल इतना ही है कि संग्रहालय से किसी को जब किसी वस्तु की प्रतिलिपि या फोटो आदि दी जाती है तो उस व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसपर स्वयं काम करेगा और उस सामग्री को अपने तक ही सीमित रखेगा और प्रकाशन से पूर्व संग्रहालय के अधिकारियों से समुचित अनुमति ले लेगा। पर यह सौजन्य वे लोग निभा न सके। इसी बीच ग्वालियर के हरिहर निवास द्विवेदी बम्बई आये। वे उन दिनों चन्दायण की कथा से सम्बन्ध रखने वाले एक अन्य काव्य ग्रन्थ मैंगासत पर काम कर रहे थे। दुराग्रह करके वे भी मेरे वाचन की एक प्रति ले गये। ले जाते समय उन्होंने बार-बार आश्वासन दिया था कि वे मेरे वाचन को अपने तक ही सीमित रखेंगे और उसे प्रकाशित न करेंगे और मेरी प्रति मुझे शीघ्र ही लौटा देंगे; किन्तु ग्वालियर जाते ही वे अपना वचन भूल गये! अपनी पुस्तक में उन्होंने मेरे वाचन को अनुचित ढंग से उद्धृत तो किया ही बार-बार तकाजा करने पर भी मेरी प्रति लौटाना तो दूर पत्रोत्तर देने का सौजन्य भी उनसे न हो सका। १. पटना यूनिवर्सिटी जर्नल, १९६१ पृ. ६१।

चन्दायतकी इन प्रतियोंके मिलनेकी बात ज्ञात होनेपर राघव सारस्वतका ध्यान अपनी उस प्रतिकी ओर गया जो उनके पास बीसो बरससे पड़ी थी और जिसे धीरेन्द्र वर्माने अप्रमाणित घोषित कर दिया था। उन्होंने तत्काल अपने उस ग्रन्थका परिचय सरसम प्रकाशित कराया और उसका एक प्रति-मुद्रण मुझे भेजा। चन्दायतके सम्पादनकी इच्छा प्रकट करते हुए उन्होंने यह भी सूचित किया कि बम्बईवाली प्रतिका मेरा पाठ उन्हें कहींसे प्राप्त हो गया है और वे मुझसे तत्सम्बन्धी अन्य आव- श्यक जानकारी चाहते हैं। शालीनताकी इस प्रकार उपेक्षा देखकर मेरा चौंक उठना स्वाभाविक था। मैं क्षुब्ध हो गया। मोतीचंदजीको भी ये बातें अच्छी न लगीं। उन्होंने भी सलाह दी कि मैं अपना पाठ शीघ्रतिशीघ्र प्रकाशित कर दूँ। फलतः मैंने पुनः चन्दायतके सम्पादनमे हाथ लगाया। उसके लिए सामग्री जुटाते समय जब कमल कुलश्रेष्ठके शोध निबंध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्यको उलट रहा था, उस समय मेरा ध्यान उनके इस कथनकी ओर गया कि गार्सा द तासीने अपनी पुस्तक हिस्तोरे द ला लितरेत्योर हिन्दुई पत हिन्दुस्तानीमें लौरक चन्दाकी कुछ अप्राप्य प्रतियोंका उल्लेख किया है। यह कथन मुझे कुछ आश्चर्यजनक साथ ही महत्वपूर्ण जान पड़ा। मैंने तत्काल उक्त ग्रन्थका लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय द्वारा प्रस्तुत अनुवाद हिन्दुई साहित्यका इतिहास देखा पर उसमें ऐसी कोई बात मुझे न मिल सकी जिससे कमल कुलश्रेष्ठके कथनका समर्थन हो सके। यह बात नहीं कि कुलश्रेष्ठने गलत सूचना प्रस्तुत की है वरन् वार्ष्णेयने अनुवाद करनेमे स्वेच्छा-नीति बरती है। जो अंश उन्हें अनावश्यक जान पड़े उन्हें उन्होंने छोड़ दिया है। ऐसे आकर ग्रन्थोंके अनुवादमें, जो मूलमें दुष्प्राप्य हों स्वेच्छाका प्रयोग किस प्रकार घातक सिद्ध हो सकता है, यह स्पष्ट सामने आया। मेरे लिए आवश्यक हो गया कि मूल ग्रन्थ देखूँ। तासीके उक्त ग्रन्थके दो संस्करण प्रकाशित हुए थे। एक तो १८४० और १८४७ के बीच और दूसरा १८७०-७१ ई० में। दूसरे संस्करणमे लेखकने काफी परिवर्तन किया है। पहले संस्करणको उलटनेपर जो कुछ मिला उसका अंग्रेजी रूप इस प्रकार है:-- रोमान्स-(दि) आव लौरक एण्ड चुरक आर द फेरी टेल्स आव द सेक- ल कार्डो-चारल्ड मैनुस्क्रिप्ट बिच मेनी कलर्ड डेकोरेझन्स। दिस मैनुस्क्रिप्ट इस रिटेन इन पिक्युलियर पर्शीयन कैरेक्टर्स। इट बिलाग्ज टु द रिच कलेक्शन आव द क्युक आव सस्पेक्ट अफिस आफ हर मजेस्टी द क्वीन आव ग्रेट ब्रिटेन।१ अर्थात्—लौरक और चुरककी प्रेम कथा अथवा फेरिन स्पिरिट परीमहल—एक चीथड़ा हस्तलिखित ग्रन्थ, जिसमें अनेक रंगीन अलंकरण हैं। यह हस्तलिखित ग्रन्थ विचित्र ढंगके पारसी लिपिमें लिखा हुआ है। यह ब्रिटेनकी महारानीके चचा क्युक आव ससेक्सके मूल्यवान संग्रहमें है। १ ग्रन्थ १ पृ ५२६

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क्रय किया था। पश्चात् उक्त पुस्तक विक्रेताने उस संग्रहके हस्तलिखित ग्रन्थोंको फारसीके सुप्रसिद्ध विद्वान् नथेनियल ब्लान्दके हाथ बेचा। आगे खोज करनेपर ज्ञात हुआ कि नथेनियल ब्लान्दने जो हस्तलिखित ग्रन्थ संग्रह किये थे, उन्हें १८६६ ई. में लार्ड आग क्राफर्डने क्रय किया था और वे उनके बिब्लियोथेका लिण्डेसियाना नामक निजी पुस्तकालयमें रखे गये थे। आगे खोज करनेपर पता चला कि १९०१ ई. में क्राफर्ड संग्रहको मैनचेस्टरके जान रीलेण्ड्स पुस्तकालयने क्रय किया था। जब मैंने रीलेण्ड्स पुस्तकालयसे पूछताछ की तो उन्होंने क्राफर्ड संग्रह क्रय करनेकी बात स्वीकार करते हुए सूचना दी कि उपयुक्त ग्रन्थ उनके संग्रहमें मौजूद है। तत्काल मैंने उनसे उक्त ग्रन्थका माइक्रोफिल्म देनेका अनुरोध किया। माइक्रोफिल्म आनेपर ज्ञात हुआ कि मेरा अनुमान सर्वथा सत्य था। उक्त ग्रन्थ वस्तुतः चन्दायना ही है। इस प्रकार मेरे हाथ चन्दायना की एक बहुत बड़ी प्रति आयी और मैं उस प्रतिके पाठोद्धारमें जुट गया। इस नयी प्रतिकार पाठोद्धार चल ही रहा था कि डब्लू० वी० आर्चर द्वारा सम्पादित इण्डियन मिनियेचर नामक भारतीय चित्रोंका विद्याभार प्रकाशमें आया। उसमें उन्होंने मैसाचुसेट्स (अमेरिका) निवासी फ्रैंसिस होफरके संग्रहसे एक चित्र प्रकाशित किया है।१ उसे उन्होंने बम्बई प्रतिके चित्रोंकी शैलीका बताया था। इस सूत्रसे चन्दायनाके कुछ और पृष्ठ प्राप्त होनेकी सम्भावना सामने आयी और मैं उन्हें भी प्राप्त करनेकी ओर प्रयत्नशील हुआ फलतः उक्त संग्रहसे इस काव्यके दो पृष्ठ हाथ आये। इस प्रकार कुछ बरसों पूर्वतक जो चन्दायना हिन्दी साहित्यके इतिहासमें केवल नाम रूपमें जीवित था, उसके सम्बन्धकी पर्याप्त सामग्री एकत्र हो गयी। मैंने उसके सम्पादनका कार्य नये सिरेसे आरम्भ किया और परिणाम-स्वरूप यह ग्रन्थ अब आपके सामने है। उपलब्ध सामग्रीके आधारपर चन्दायनाको अपने पूर्णरूपमें प्रस्तुत करना तो सम्भव नहीं हो सका फिर भी उसका एक बहुत बड़ा अंश सामने आ गया। अभी उसके आदि और अन्तके कुछ अंश अनुपलब्ध हैं और बीचमें यत्रतत्र कुछ पृष्ठोंका अभाव है। यदि रावत सारस्वतवाली प्रतिकतक मेरी पहुँच हो सकती तो सम्भवतः आदि और मध्यके अंशोंकी पूर्ति कर पाता यद्यपि उसका पाठ अत्यन्त विकृत है। सुनता हूँ वे उस प्रकाशित कर रहे हैं। यदि वह प्रति कभी प्रकाशमें आ सकी तो यह कमी पूरी हो जायगी; पर अन्तिम अंशकी पूर्ति तभी सम्भव है जब कोई नयी प्रति उपलब्ध हो। प्रस्तुत प्रबन्ध ग्रन्थकी उपलब्ध सामग्रीको फारसी लिपिसे नागरीअक्षरोंमें प्रस्तुत कर उन्हें क्रमबद्ध कर देने तक ही सीमित है। किन्तु अकेला यह काम भी कितना कठिन है इसका अनुभव वही कर सकते हैं जिन्हें इस कार्यका व्यावहारिक अनुभव है। १ इंडियन मिनियेचर्स ऑन्थोलोजी ...

१४ पद्मावत मधुमालती आदि ग्रन्थोंके सम्पादकोंको यह सुविधा रही है कि उनके सम्मुख फारसी लिपिमें अंकित प्रतियोंके साथ-साथ नागरीक्षर अथवा कैथी लिपिमें अंकित प्रतियाँ भी रही हैं और इस प्रकार उनके सम्मुख ग्रन्थका एक ढाँचा खड़ा था। उन्हें केवल शब्दोंके पाठ रूपका निर्धारण करना था। मेरे सम्मुख न तो कोई नागरी क्षर प्रति थी और न कथाका रूप ही ज्ञात था। कविकी वर्णन शैलीकी भी कोई जानकारी न थी। ऐसी स्थितिमे फारसी लिपिमें अंकित हिन्दी भाषाके इस ग्रन्थके पाठोद्धारका कार्य पत्थरसे सर टकराने जैसा था। कोई ग्रन्थ यदि नस्तालीक लिपि (आधुनिक फारसी लिपि) में हो और उसमें जेर, जबर, पेश और नुक्ते भी अपने स्थान पर लगे हों तो भी सरलतासे किसी हिन्दी शब्दके वास्तविक रूपका अनुमान नहीं किया जा सकता। यहाँ तो जो प्रतियाँ मेरे सामने हैं वे रस्मी नस्ख (अरबी लिपि शैली) में हैं और उनमें जेर, जबर, पेश तो हैं ही नहीं नुक्त्तोंका भी अभाव है; और यदि कहीं नुक्ते हैं भी तो यह निर्णय करना कठिन है कि वे अपने ठीक स्थान पर ही लगे हुए हैं। इस लिपिमें नुक्ते कहीं भी रखे जा सकते हैं। ऐसी स्थितिमे यह कहना कि मैंने पूर्णतः शुद्ध पाठोद्धार किया है प्रवंचना मात्र होगी। यही कह सकता हूँ कि मूल शब्द तक पहुचनेकी यथासाध्य चेष्टा मैंने की है। फिर भी अनेक शब्द ऐसे हैं जहाँ पाठके शुद्ध होनेमें मुझे स्वयं सन्देह है। उपलब्ध सामग्रीको क्रम बद्ध रूप देनेका पूर्ण प्रयत्न किया गया है, फिर भी कुछ ऐसे अंश हैं जिनका पर्याप्त स्रोतके अभावमे उचित स्थान निश्चित करना सम्भव नहीं हो सका है। ऐसे स्थलोंपर अनुमानका सहारा लिया गया है। प्रस्तुत ग्रन्थका कार्य आरम्भ करते हुए मैंने शुद्ध पाठ (क्रिटिकल टेक्स्ट) वासुदेवशरण अग्रवालकृत पद्मावतकी सञ्जीवनी व्याख्याके अनुकरण पर व्याख्या और आवश्यक शब्दोंके अर्थ और उनके स्पष्टीकरण के लिए टिप्पणी देनेकी कल्पना की थी। पर पाठोद्धारका काम समाप्त होनेके पश्चात् जब इस ओर अग्रसर हुआ तो ज्ञात हुआ कि उपलब्ध सामग्रीके आधारपर परिशुद्ध सम्पादन (क्रिटिकल एडिटिंग) सम्भव नहीं है। उपलब्ध प्रतियाँ अधिकांशतः काव्यके विभिन्न अंगोंके रूपमें प्राप्त हैं। ऐसे खण्ड थोड़े ही हैं जो एकसे अधिक प्रतिमें प्राप्त हैं। परिशुद्ध सम्पादनका कार्य तभी सम्भव है जब दो से अधिक प्रतियाँ यदि पूर्णतः नहीं तो अधिकांश अंशोंमें उपलब्ध हों। अशुद्ध पाठके आधारपर ग्रन्थकी व्याख्याका कार्य भी कुछ महत्त्व नहीं रखता। जब तक पाठके शुद्ध और स्पष्ट होनेका विश्वास न हो समुचित व्याख्या उपस्थित नहीं की जा सकती। अतः यह कार्य भी हाथमें न लिया जा सका। ग्रन्थमें आये महत्त्वपूर्ण शब्दोंका अर्थ और उनके स्पष्टीकरणका कार्य किया जा सकता था; पर यह काम मेरी अपनी दृष्टिमें उतना सरल नहीं है जितना कि इस दिशामें काम करनेवाले अनेक विद्वान समझते हैं। खींचतान पर शब्दोंका मनमाना प्रस्तुत करनेमें मेरा विश्वास नहीं। किसी शब्दके भावको समझनेके लिए उसके

१५ मूलतक जाना आवश्यक है। इस ग्रन्थमें आये हुए शब्दोंके मूलमें एक ओर संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश है तो दूसरी ओर अरबी और फारसी। अतः यह कार्य इन भाषाओंके कोशोंके बीच बैठकर ही किया जा सकता है। इस प्रकारके कार्यकी प्रगति सदैव मन्द ही होगी। दुर्भाग्यसे इन दिनों इस कार्यको हाथमें लेनेके निमित्त मेरे पास समयका अभाव है और मेरे मित्रों और हितैषियोंको इतना धैर्य नहीं है कि वे कुछ समय तक इसके लिए रुक सकें। उनका निरन्तर तकावा है कि मूल ग्रन्थ शीघ्रसे शीघ्र प्रकाशमें आना ही चाहिये। अतः इस कामको भी अगले संस्करण तकके लिए स्थगित कर देना पड़ रहा है। जिन शब्दोंके टीप मैंने ले लिये हैं, उन्हें ही देकर सन्तोष मानता हूँ। अन्तमें यह भी निसंकोच कह देना चाहता हूँ कि हिन्दी साहित्य मेरा अपना विषय नहीं है। मध्यकालीन हिन्दी कवियों और उनके काव्योंसे मेरा परिचय नहींके बराबर है। साहित्यके क्षेत्र में प्रवेश करनेका दुस्साहस सदैव मैंने अपने पुरातत्व और इतिहास प्रेम के माध्यमसे ही किया है। पुरातत्त्वकी शोध-बुद्धि ही मुझे चन्दायानके निकट खींच लायी है और यह ग्रन्थ आपके सम्मुख उपस्थित करनेकी धृष्टता कर रहा हूँ। यदि इसमें कहीं कोई कमी और त्रुटि जान पड़ तो उसे मेरी असमर्थता समझकर पाठकवृन्द क्षमा करें। इस दुर्बलताके बावजूद, ग्रन्थको प्रस्तुत करते हुए मैं गौरवका अनुभव करता हूँ। हिन्दी साहित्यके इतिहासकी दृष्टिसे चन्दायानका अपना मूल्य और महत्व है; उसका प्रकाशमें आना हिन्दी साहित्यके इतिहासमें एक बहुत बड़ी घटना है। प्रिंस आव वेल्स म्यूजियम बम्बई। गणतन्त्र दिवस १९५२। परमेश्वरी लाल गुप्त

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कृतज्ञता ज्ञापन सर्वप्रथम मैं प्रिन्स आव वेल्स म्यूजियम, मुम्बई के डायरेक्टर डाक्टर मोतीचन्द्र, जान रीलैण्ड्स पुस्तकालय, मैनचेस्टर (इङ्गलैण्ड) के डायरेक्टर डाक्टर इ. राबर्टसन तथा उसके हस्तलिखित ग्रन्थ विभागके अध्यक्ष डाक्टर एफ. टेलर, भारत कला भवन, काशी के उपहाध्यक्ष राय कृष्णदास, पंजाब राजकीय संग्रहालय के अध्यक्ष श्री विद्यासागर सूरि, पटना के सैयद हसन असकरी, मैसाचुसेट्स (अमेरिका) के श्री फ़्रैन्सिस हॉफ़र, रज़ा पुस्तकालय रामपुर के पुस्तकाध्यक्ष श्री अर्शी का आभार मानता हूँ, जिन्होंने अपने संग्रह की चन्दायन सम्बन्धी सामग्री प्रसन्नतापूर्वक मुझे सुलभ कर दी और उन्हें प्रकाशित करनेकी अनुमति प्रदान की। जान रीलैण्ड्स पुस्तकालय के अधिकारियों का इसलिए भी अत्यन्त अनुगृहीत हूँ कि उन्होंने न केवल मुझे अपनी प्रतिके उपयोग और प्रकाशित करने की अनुमति दी वरन् उसे ढूंढ निकालने के कारण उन्होंने उसपर मेरा अधिकार स्वीकार किया और स्वेच्छया अपना यह कर्तव्य भी माना कि जबतक मेरा ग्रन्थ तैयार न हो जाय तबतक वे उस प्रतिके सम्बन्ध में किसी प्रकार की सूचना किसी अन्य व्यक्तिको न देंगे और तत्सम्बन्धी जानकारी अपने तक ही सीमित रखेंगे। और इसका निर्वाह उन्होंने पूर्णतः किया। रीलेण्ड्स वाली प्रति ढूँढ़ निकालने में ब्रिटिश म्यूजियमके प्राच्य पुस्तक विभागके श्री बी. एम. मैरेडिथ ओवेन्स और इण्डिया आफिस पुस्तकालयकी सहायक कीपर मिस ई. एम. डाइमने मेरी बहुत बड़ी सहायता की। भारतीय कलाके अमेरिकी कला मर्मज्ञ श्री कैरी वेल्चने होपर संग्रहके पृष्ठोंके ट्रान्सपेरेन्सी तैयार कर भेजनेकी कृपा की। लाहौर संग्रहालय की प्रतिके फोटोकी प्राप्ति सुविख्यात चित्रकार श्री अब्दुर्रहमान चुग़ताई और ढाका संग्रहालयके अध्यक्ष डाक्टर अहमद हसन दानीकी सहायताके बिना सम्भव न था। इन सबके प्रति भी मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। डाक्टर मोतीचन्द्र के प्रति किन शब्दों में अपनी कृतज्ञता प्रकट करूँ। उनका तो चिरऋणी रहूँगा। उन्होंने मेरे इस कार्य में आरम्भ से रुचि ली और मुझे सतत प्रोत्साहित करते रहे। यही नहीं कोषाकार कार्य में भी मेरा निरन्तर निर्देशन करते रहे, कठिन स्थलोंके पाठोद्धार में स्वयं माथापच्ची की और उपयुक्त पाठ सुझाये। उनके सहयोग के बिना कदाचित मैं इस कार्य को ठीक और सुगमतासे न कर पाता। उर्दू रिसर्च इन्स्टीच्यूट बम्बई के डायरेक्टर श्री नईम अहमद नदवी और उनके सहायक

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श्री अब्दुर्रज्जाक कुरैशीने काव्यके फारसी शीर्षकोंके पाठ और उनके अनुवाद प्रस्तुत करनेमें मेरी पूरी सहायता तो की ही साथ ही उर्दू-फारसी ग्रन्थोंके आवश्यक सन्दर्भों को प्राप्त करनेमें भी योग दिया। सैयद् हसन अस्करी भी, अपनी प्रति देनेके अतिरिक्त मेरे इस काममें निरन्तर रुचि लेते रहे और जब कभी उन्हें मेरे कामकी कोई चीज नजर आयी उन्होंने तत्काल उससे अवगत किया। उनकी इस कृपाके कारण मुझे बहुत-सी महत्त्वपूर्ण सामग्रीकी जानकारी हो सकी। इन सबका ऋण मेरे ऊपर कम नहीं है। इन सम्बन्धोंके अतिरिक्त सर्व श्री भगवान दास (शास्त्री) किशोरी लाल गुप्त (आजमगढ़) शान्ति स्वरूप (आजमगढ़) गणेश चौबे (मोतिहारी) नर्मदेश्वर चतुर्वेदी (प्रयाग), त्रिलोकी नाथ दीक्षित (लखनऊ) कयुमुद्दीन अहमद (पटना) वेद प्रकाश गुप्त (सहारनपुर), प्रभाकर डांडे (बम्बई) शिवसहाय पाठक (बम्बई) जगदीश चन्द्र जैन (बम्बई) हरिवल्लभ भयाणी (बम्बई) नरेन्द्र शर्मा (बम्बई) व्रजकिशोर (दरभंगा) छगन मेहता (बम्बई) आदि महानुभावोंने इस ग्रन्थकी सामग्री जुटानेमें तरह-तरहकी सहायता दी है। इन सबके प्रति भी मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार हो जाने पर भाई श्रीकृष्णदत्त भट्ट ने उसे आद्योपान्त देखने की कृपा की और महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये। इसके लिए मैं उनका अत्यन्त आभारी हूँ। प्रकाशकके रूपमें श्री यशोधर जी मोदीने इसके प्रकाशित करनेमें जो रुचि प्रकट की और उसको शीघ्रातिशीघ्र प्रकाशित करनेकी जो व्यवस्थाकी, उसे मैं भूल नहीं सकता। उसी तत्परतासे ज्ञानमण्डल मुद्रणालयके व्यवस्थापक श्री ओमप्रकाश कपूर ने भी इसके मुद्रणमें योग दिया। इन दोनोंके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए प्रसन्नताका अनुभव करता हूँ। परमेश्वरी लाल गुप्त

परिचय कवि दाऊदके जीवन-वृत्तपर प्रकाश डालने वाले तथ्योंकी जानकारीके साधन अभी उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने चन्दायणके आरम्भमें जो आत्म-परिचय दिया है, वह हमें उपलब्ध किसी प्रतिमें प्राप्त नहीं है। बीकानेरवाली प्रतिमें सम्भवतः यह अंश अक्षुण्ण है; किन्तु उस प्रतिकी जानकारी अभी तक रावतसारस्वत तक ही सीमित है। उन्होंने उसका जो संक्षिप्त विवरण वरदा में प्रकाशित किया है उससे दाऊद के सम्बन्धमें कुछ ही बातोंकी जानकारी हो सकी है। बीकानेरवाली प्रतिके आदि-शीर्षकमें दाऊदको डलमई कहा गया है। इससे ज्ञात होता है कि वे या तो डलमऊके निवासी थे अथवा डलमऊ उनका निवास- स्थान था। दाऊदने डलमऊका वर्णन अपने ग्रन्थमें किया है और उसे गंगा-तटपर बसा बताया है। गंगा-तटपर बसा हुआ डलमऊ आज भी उत्तर प्रदेशके रायबरेली जिलेका एक प्रसिद्ध कस्बा है जो रायबरेलीसे ४४ मील और कानपुरसे ६१ मीलपर स्थित रेलवे जंकशन है। अवधके प्रादेशिक तथा रायबरेलीके जिला गजेटियरमें कहा गया है कि दिल्लीके सुल्तान इल्तुतमिश (अल्तमश) के शासन कालमें इस नगरने समृद्धि प्राप्त की थी। उस समयमें वहाँ मखदूम बद्रुद्दीन रहा करते थे। फीरोजशाह तुगलकके शासनकालमें वहाँ इस्लाम धर्म और विद्याके अध्ययनके लिए एक विद्यालयकी स्थापना हुई थी। इधर उपलब्ध एक पृष्ठसे अनुमान होता है कि दाऊदके पिताका नाम मलिक मुबारिक और पितामहका नाम मलिक बर्पा था। मलिक मुबारिक डलमऊके मीर (न्यायाधीश) थे और उनपर दिल्ली सुल्तान फीरोजशाह तुगलकके मन्त्री खान-ए जहाँकी कृपा थी।१ मुगलकालीन सुप्रसिद्ध इतिहासकार अब्दुलकादिर बदायूनीके कथनानुसार दाऊदको खान-ए-जहाँके पुत्र मौना शाहका आश्रय प्राप्त था। जान पड़ता है अपने पिताके सम्पर्कसे दाऊद भी खान-ए-जहाँके और उसकी मृत्युके पश्चात् उसके पुत्र मौना शाहके कृपापात्र बन गये थे। दाऊदने अपने ग्रन्थमें खान ए-जहाँकी भूरि भूरि प्रशंसा की है। यदि दाऊदके पिता और पितामहकी उपाधि मलिक थी तो यह अनुमान कर लेना सहज है कि वे स्वयं भी मलिक दाऊद कहे जाते रहे होंगे। मिश्रबन्धुने उन्हें १ ये मलिक मुबारिक शेख हुसेनके१ सर्वथा भिन्न थे जिन्हें तारीख ए हुसैनीके रचयिताने मसनद- महालीकी निजी खोजोंका मूल स्रोत (मौलानाजादा) करार दिया है।

२ मात्र दाऊद लिखा है¹ और गजेटियरोंमें भी उनका उल्लेख इसी रूपमें हुआ है।² पर मुन्तखब-उत्-तवारीख में अब्दुलकादिर बदायूनीने उन्हें मौलाना दाऊद कहा है।³ बीकानेर प्रतिके आरम्भमें जो शीर्षक है उसमें भी वे मौलाना दाऊद दलमई कहे गये हैं। रीजेण्ट्स प्रतिमें भी उनका उल्लेख एक ज्ञानपर मौलाना दाऊदके रूपमें हुआ है। इन प्राचीन उल्लेखोंसे जान पड़ता है कि दाऊद मौलाना कहे जाते थे। आधुनिक कथनका कि वे मुल्ला थे किसी प्राचीन सूत्रसे समर्थन नहीं होता। हो सकता है आधुनिक लेखकोंने फारसी लिपिमें लिखे मौलाना शब्दको किसी लेखन-प्रमादके कारण मुल्ला पढ़ लिया हो। साथ ही इस सम्बन्धमें यह बात भी ध्यान देने की है चन्द्रायानकी परम्परामें लिखे गये प्रेमाख्यानक काव्योंके रचनाकारों यथा—कुतुबन, मंझन, जायसी आदि किसीके नामके आगे मुल्ला या मौलाना जैसी उपाधि नहीं पायी जाती। अतः यह सम्भावना भी कम नहीं है कि दाऊद भी मुल्ला और मौलाना दोनोंमेंसे एक भी न न होकर, कोरे मलिक दाऊद ही रहे हों। मुल्ला और मौलाना दोनों ही मलिकके रूपपाठ हो सकते हैं। ऐसा होना फारसी लिपिमें सहज है। पर जबतक इस बातके स्पष्ट प्रमाण न मिल जाँय, दाऊदको मौलाना दाऊद कहना ही उचित होगा। वे धर्मा- ध्यक्ष (मुल्ला) की अपेक्षा विद्वान (मौलाना) ही अधिक ध्यान पड़ते हैं। स्वकथनानुसार दाऊद शेख जैनदी (जैनुद्दीन)के शिष्य थे। अकबर कालीन शेख अब्दुलहक कृत अखबार-उल-अखयारके अनुसार दाऊदके गुरु शेख जैनुद्दीन 'चिराग-ए-दिल्ली'के नामसे प्रसिद्ध चिश्ती सन्त हजरत नसीरुद्दीन अवधीकी बड़ी बहन के बेटे थे। बहनके बेटे होनेके साथ ही साथ वे हजरत नसीरुद्दीनके शिष्य भी थे और खैर-उल-मजालिसके अनुसार उनके 'खादिमे खास' थे। हजरत नसीरुद्दीन अवधीके सम्बन्धमें तो कहनेकी आवश्यकता नहीं कि वे दिल्लीके सुप्रसिद्ध सन्त हजरत निजामुद्दीन औलियाके प्रमुख शिष्य और उत्तराधिकारी थे। इस प्रकार दाऊद चिश्ती सन्त परम्परा की विशेषाली प्रधान शाखाके सम्बन्ध रखते थे। काव्य दाऊद रचित प्रेमाख्यानक काव्यके नामके सम्बन्धमें अभी हालतक काफी भ्रम रहा है। मिश्रबन्धुने ग्रन्थका नामोल्लेख न करके केवल इतना ही कहा था कि उन्होंने नूरक-चन्दाकी कथा लिखी। हरिऔधने उन्हें नूरक और चन्दा नामक दो ग्रन्थोंका रचयिता बताया। गजेटियरों में दाऊदकी रचनाका नाम चन्दैनी और चन्द्रांनी दिया गया है। रामकुमार वर्मा ने इसका नाम चन्द्रायान या चन्दायत दिया है। मुन्तखब-उत्-तवारीख की जो मुद्रित प्रति और अंग्रेजी अनुवाद प्राप्त हैं उन दोनों १. पीछे देखिये अनुशीलन, पृ. २। २. वही पृ. ५। ३. वही पृ. ४। ४. पृष्ठ ६४ व ६५।

में ही उसे चन्दायन कहा गया है । किन्तु एशियाटिक सोसाइटी आव बंगाल (कलकत्ता)में संग्रहीत उक्त ग्रन्थकी एक हस्तलिखित प्रति (ग्रन्थ संख्या ११९९) में उसका नाम स्पष्ट रूपसे चंदासन या चन्दायिन दिया हुआ है । चन्दायिन नामसे ही रामपुरवाली पद्मावतकी प्रतिमें इस ग्रन्थका एक कड़वक उद्धृत हुआ है । सर्वोपरि बीकानेर प्रतिमें इसे 'मुसद्दस चन्दायिन' (चन्दायिनकी हस्तलिखित प्रति) कहा गया है । इन सबसे स्पष्ट है कि दाऊदके काव्यका नाम चन्दायिन है और उसे इसी नामसे पुकारा जाना चाहिये ।

रचना-काल

मुन्तख़ाब-उत्तवारीख़में चन्दायिनके सम्बन्धमें जो कुछ कहा गया है उससे केवल इतना ही पता लगता है कि उसकी रचना ७७२ हिजरी (१३७० ई ) के पश्चात् किसी समय हुई थी । अवधके गजेटियरमें बहराइचके प्रसंग में कहा गया है कि फीरोजशाह तुगलकने वहाँ इस्लाम धर्म और विद्याके अध्ययनके लिए एक विद्यालयकी स्थापना की थी । उस विद्यालयकी उपयोगिता इस बातसे प्रकट है कि मुल्ला दाऊद नामक कविने ७१९ हिजरीमें भाषामें 'चन्देनी' नामक ग्रन्थका सम्पादन किया । यह तिथि स्पष्टतः किसीके प्रमादका परिणाम है क्योंकि फीरोजशाहका शासन काल ७५२ और ७९० हिजरीके बीच था । लगता है, प्रेसके भूतने ७७९ का ७१९ कर दिया है । परशुराम चतुर्वेदीने भारतीय हिन्दी परिषद (प्रयाग) से प्रकाशित हिन्दी साहित्य (द्वितीय खण्ड)में लखनऊ विश्वविद्यालयके प्राध्यापक त्रिलोकीनाथ दीक्षित से प्राप्त चन्दायिनके चार यमक उद्धृत किये हैं । उनमेंसे एक यमकमें उसकी रचनाकी तिथि इस प्रकार कही गयी है:— बरस सात सौ हुवै अघ्यासी । कहिया यह कबि सरस अभासी ॥१ हमारे पूछताछ करनेपर त्रिलोकीनाथ दीक्षितने सूचित किया कि उपर्युक्त यमक किसी उपलब्ध प्रतिका अंश नहीं है वरन् चन्दायिनके कुछ अंश किसी सज्जनको कण्ठस्थ थे, उन्होंने उन्होंने इसे नोट कर लिया था । इस प्रकार यह पाठ मौखिक परम्परासे प्राप्त है । इसके अनुसार चन्दायिनकी रचना ७७९ हिजरी (१ मई १३७७- ३ अप्रैल १३७८ ई ) में हुई थी । सम्भवतः इसी प्रकारकी किसी मौखिक परम्पराके आधारपर गजेटियरकारोंने अपनी तिथि दी होगी । किन्तु इस तिथिसे भिन्न तिथि बीकानेर प्रतिमें पायी जाती है । उसमें उपर्युक्त यमक इस प्रकार है :— बरस सात सै होय एकासी । तिहिं आह कबि मरमड भासी ॥ इसके अनुसार चन्दायिन की रचना ७७९ हिजरीमें नहीं वरन् दो वर्ष पश्चात् ७८१ हिजरी (१९ अप्रैल १३७९-७ अप्रैल १३८० ई ) में हुई थी ।

१. १ ३५ परिशिष्ट १ ।

२१ ७७९ और ७८१में से कौनसी चन्दायनकी रचनाकी वास्तविक तिथि है, अभी कहना कठिन है। फारसी लिपिमें छ्यासीका एकासी अथवा एकासीका उन्यासी पढ़ा जाना सामान्य-सी बात है। उपलब्ध प्रतियाँ चन्दायनकी अब तक निम्नलिखित प्रतियाँ प्रकाशमें आयी हैं और वे सभी खण्डित हैं :— रीलेण्ड्स प्रति—यह प्रति मैनचेस्टर (इंग्लैंड) के जान रीलेण्ड्स पुस्त- कालयमें सुरक्षित है। इस प्रतिमें आदि और अन्तके कुछ अंश नहीं हैं। बीच-बीचसे भी कुछ पृष्ठ गायब हैं। ग्रन्थके खण्डित होनेके पश्चात् किसीने पृष्ठोंको एकत्र कर पृष्ठांकन किया है जिससे ग्रन्थके पूर्ण होनेका भ्रम होता है। नये पृष्ठांकनके अनुसार इस ग्रन्थके अन्तिम पत्रकी संख्या १२६ है पर बीचसे ८ पत्र—१७, १२१, २६ और २१९ २१६ गायब हैं। इस प्रकार इसमें केवल ११८ पत्र अर्थात् २३६ पृष्ठ हैं; इनमेंसे केवल १४९ पृष्ठोंपर ग्रन्थका आलेखन हुआ है। शेष पृष्ठोंपर पूरे आकारके रंगीन चित्र हैं जो भारतीय चित्रकलाके इतिहासकी दृष्टिसे अत्यन्त महत्त्वके हैं। यह प्रति फारसी लिपिमें लिखी गयी है और प्रत्येक पृष्ठमें सात पंक्तियोंमें एक कड़वक और उसके ऊपर दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें उसका शीर्षक अथवा सार है। बम्बई प्रति—इस प्रतिके केवल ६४ पृष्ठ उपलब्ध हैं जो बम्बईके प्रिंस आफ़ वेल्स संग्रहालयमें हैं। ये पृष्ठ भोपालसे प्राप्त हुए हैं इसलिए कुछ लोग इसे भोपाल प्रतिके नामसे भी अभिहित करते हैं। इस प्रतिके सभी पृष्ठोंके एक ओर चित्र और दूसरी ओर फारसी लिपिमें काव्यका आलेखन है। ये पृष्ठ बिना किसी क्रमके उपलब्ध हुए हैं और उनमें किसी प्रकारका पृष्ठांकन भी नहीं है। अतः इन पृष्ठोंमें कोई ऐसी सामग्री नहीं है जिसके सहारे इन पृष्ठोंको स्वतः क्रमबद्ध किया जा सके। प्रत्येक पृष्ठमें आठ पंक्तियोंमें एक कड़वक और सबसे ऊपर दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें उसका शीर्षक अथवा सार है। इस प्रतिमें कड़वकके तीसरे यमकको दो पंक्तियोंमें बाँटकर लिखा गया है। होफर पृष्ठ—मेसाचुसेट्स (संयुक्तराष्ट्र अमेरिका) निवासी भारतीय कलाके संग्राहक मारिस होफरके संग्रहमें इस ग्रन्थके दो पृष्ठ हैं। उन्हें देखनेसे जान पड़ता है कि वे मूलतः बम्बई प्रतिके पृष्ठ रहे होंगे जो किसी प्रकार बिखर गये। मनेरशरीफ प्रति—यह प्रति मनेरशरीफ (बिहार) के एक खानकाहसे पटना विश्वविद्यालयके इतिहासके प्राध्यापक सैयद हसन असकरीको प्राप्त हुई है और उन्हींके पास है। इस प्रतिमें १४ पृष्ठ हैं। यह प्रति भी फारसी लिपिमें लिखी गयी है। प्रत्येक पृष्ठमें ९ पंक्तियाँ हैं, जिनमेंसे ऊपरकी पंक्तिमें फारसी भाषामें शीर्षक है और शेष ८ पंक्तियोंमें एक कड़वक है। तीसरा यमक दो पंक्तियोंमें बाँटकर लिखा गया है। इस प्रतिको लिपिकार अत्यन्त असावधान जान पड़ता है।

एक ही कड़बकको दो पृष्ठोंपर दो शीषोंसे दिया है और कहीं दो कड़बकोंकी पंक्तियोंको मिलाकर एक कड़बकके रूपमें लिखा है । इस प्रतिकी विशेषता यह है कि प्रत्येक पृष्ठके हाशियेपर कुतबनकृत मिरगावती के कड़बक अंकित हैं । दूसरी बात यह है कि कुछ पत्रोंके बायें पृष्ठके बायें हाशियेमें ऊपर पृष्ठ संख्या अंकित है । ये पृष्ठ संख्या १४८ १४९ १५२ १५७; १५९ १६१ १६३, १७ हैं । शेष पृष्ठोंपर कोई पृष्ठ संख्या नहीं है । ऐसे पृष्ठोंपर असफ़रीने अपने अनुमानके आधारपर कहीं अँगरेजी और कहीं फारसी अंकोंमें पृष्ठ संख्या डाल दी है । यद्यपि उनकी दी हुई पृष्ठ संख्याएँ त्रुटिपूर्ण हैं तथापि पृष्ठ निर्देशनके निमित्त उन्हें इस ग्रन्थमें स्वीकार कर लिया गया है । पंजाब प्रति—भारत-पाकिस्तानके विभाजनसे पूर्व यह प्रति लाहौरके सेन्ट्रल संग्रहालयमें थी और उक्त संग्रहालयकी चित्र-सूचीके अनुसार वहाँ कुल २४ पृष्ठ थे । देशके विभाजनके साथ-साथ जब उक्त संग्रहालयकी वस्तुओंका भी बँटवारा हुआ तो ये पृष्ठ भी बँट गये । कहा जाता है कि भारतको १० और पाकिस्तानको १४ पृष्ठ मिले । भारतको प्राप्त दस पृष्ठ तो पंजाब राजकीय संग्रहालय, पटियालामें सुरक्षित हैं किन्तु पाकिस्तानको मिले चौदह पृष्ठोंमेंसे केवल दसके ही फोटो हमें लाहोर संग्रहालयसे उपलब्ध हो सके । शेष चार पृष्ठोंके सम्बन्धमें कोई जानकारी प्राप्त न हो सकी । इस प्रतिके प्रत्येक पत्रपर एक ओर चित्र और दूसरी ओर काव्यका फारसी लिपिमें आलेखन है । ये सभी पृष्ठ अति जीर्ण अवस्थामें हैं । वे कटे-फटे तो हैं ही साथ ही लाल स्याहीसे घिरे अक्षर भी फीके पड़ गये हैं । इस कारण इन पृष्ठोंका पाठोद्धार सुगम्य नहीं है । उनसे केवल लुप्त पृष्ठोंका अनुमानमात्र हो सकता है । इस प्रतिमें प्रत्येक पृष्ठमें ९ पंक्तियाँ हैं । आरम्भकी दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें शीर्षक और शेषमें एक कड़बक है । तीसरा यमक दो पंक्तियोंमें विभाजित करके लिखा गया है । इस प्रतिके पटियाला और लाहोर संग्रहालय स्थित पृष्ठोंका यहाँ क्रमशः ‘प’ और ‘ल’ द्वारा निर्देशन किया गया है । काशी प्रति—इस प्रतिके केवल ६ पृष्ठ उपलब्ध हैं जो काशी विश्वविद्यालयके कला संग्रहालय भारत कला भवन में हैं । ये पृष्ठ भी सचित्र हैं अर्थात् इनके एक ओर चित्र और दूसरी ओर काव्यका आलेखन है । प्रत्येक पृष्ठ पर फारसी लिपिमें दस पंक्तियाँ हैं जिनमें ऊपर दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें शीर्षक है । इन प्रतियोंमेंसे किसीमें भी लिपिकाल सम्बन्धी उल्लेख प्राप्त न होनेसे उनके काल निर्णयकी समस्या जटिल बन पडती है । किन्तु कतिपय बाह्य प्रमाणोंसे उनके लिपि कालके सम्बन्धमें बहुत कुछ अनुमान किया जा सकता है । ये सभी प्रतियाँ फारसी लिपिकी नस्त शैलीमें लिखी गयी हैं । इस शैलीके लेखनका प्रचलन भारतमें मुगल सम्राट अकबरके शासनकालके आरम्भ होते-होते अर्थात् सोलहवीं शताब्दीके मध्यतक समाप्त हो गया था । इस कारण लिपिके आधारपर निःसंकोच कहा जा सकता है कि ये सभी प्रतियाँ किसी भी अवस्थामें सोलहवीं शताब्दीके तृतीय चरणके

७७९ और ७८१ में से कौन-सी चन्दायनकी रचनाकी वास्तविक तिथि है अभी कहना कठिन है। फारसी लिपिमें उन्नासीका एकासी अथवा एकासीका उन्नासी पढ़ा जाना सामान्य-सी बात है। उपलब्ध प्रतियाँ चन्दायनकी अब तक निम्नलिखित प्रतियाँ प्रकाशमें आयी हैं और वे सभी खण्डित हैं :— रीलेण्ड्स प्रति—यह प्रति मैनचेस्टर (इंगलैंड) के जान रीलेण्ड्स पुस्त- कालयमें सुरक्षित है। इस प्रतिमें आदि और अन्तके कुछ अंश नहीं हैं। बीच-बीचसे भी कुछ पृष्ठ गायब हैं। ग्रन्थके व्यतिव्यस्त होनेके पश्चात् किसीने पृष्ठोंको एकत्र कर पृष्ठांकन किया है, जिससे ग्रन्थके पूर्ण होनेका भ्रम होता है। नये पृष्ठांकनके अनुसार इस ग्रन्थके अन्तिम पत्रकी संख्या १२६ है पर बीचसे ८ पत्र—६७, १११, २६ और १११, ११५ गायब हैं। इस प्रकार इसमें केवल ११८ पत्र अर्थात् २३६ पृष्ठ हैं जिनमें केवल १४९ पृष्ठोंपर ग्रन्थका आलेखन हुआ है। शेष पृष्ठोंपर पूरे आकारके रंगीन चित्र हैं जो भारतीय चित्रकलाके इतिहासकी दृष्टिसे अत्यन्त महत्त्वके हैं। यह प्रति फारसी लिपिमें लिखी गयी है और प्रत्येक पृष्ठमें सात पंक्तियोंमें एक कड़बक और उसके ऊपर दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें उसका शीर्षक अथवा सार है। बम्बई प्रति—इस प्रतिके केवल ६४ पृष्ठ उपलब्ध हैं जो बम्बईके प्रिंस आव वेल्स संग्रहालयमें हैं। ये पृष्ठ भोपालसे प्राप्त हुए हैं इसलिए कुछ लोग इसे भोपाल- प्रतिके नामसे भी अभिहित करते हैं। इस प्रतिके सभी पृष्ठोंके एक ओर चित्र और दूसरी ओर फारसी लिपिमें काव्यका आलेखन है। ये पृष्ठ बिना किसी क्रमके उपलब्ध हुए हैं और उनमें किसी प्रकारका पृष्ठांकन भी नहीं है। अतः इन पृष्ठोंमें कोई ऐसी सामग्री नहीं है जिसके सहारे इन पृष्ठोंको स्वतः क्रमबद्ध किया जा सके। प्रत्येक पृष्ठमें आठ पंक्तियोंमें एक कड़बक और उसके ऊपर दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें उसका शीर्षक अथवा सार है। इस प्रतिमें कड़बकके तीसरे यमकको दो पंक्तियोंमें बाँटकर लिखा गया है। हापर पृष्ठ—मैसाचुसेट्स (संयुक्तराष्ट्र अमेरिका) निवासी भारतीय कलाके संग्राहक शान्तिन होपरके संग्रहमें इस ग्रन्थके दो पृष्ठ हैं। उन्हें देखनेसे जान पड़ता है कि वे मूलतः बम्बई प्रतिके पृष्ठ रहे होंगे जो किसी प्रकार बिखर गये। मनेरशरीफ प्रति—यह प्रति मनेरशरीफ (बिहार) के एक खानकाहसे पटना विश्वविद्यालयके इतिहासके प्राध्यापक सैयद हसन असकरीको प्राप्त हुई है और उन्हींके पास है। इस प्रतिमें २४ पृष्ठ हैं। यह प्रति भी फारसी लिपिमें लिखी गयी है। प्रत्येक पृष्ठमें पंक्तियाँ हैं जिनमें ऊपरकी पंक्तिमें फारसी भाषामें शीर्षक है और शेष ८ पंक्तियोंमें एक कड़बक है। तीसरा यमक दो पंक्तियोंमें बाँटकर लिखा गया है। इस प्रतिका लिपिकार अत्यन्त असावधान जान पड़ता है। उसने कहीं तो

२५ प्रति जोधपुर राज्यके पुस्तकालयसे वासुदेवशरण अग्रवालको प्राप्त हुई है।¹ किन्तु यह सूचना निराधार और नितान्त भ्रामक है। इस प्रकारकी कोई प्रति न तो जोधपुर पुस्तकालयमें है और न कहीं अन्यत्रसे वासुदेवशरण अग्रवालको कोई पूरी प्रति प्राप्त हुई है। इसी प्रकार रावत सारस्वतने पूनाके डेकन कालेज पोस्ट ग्रेज्युएट रिसर्च इन्स्टीट्यूटमें चन्दायणके कुछ पृष्ठ होनेकी बात कही है। उसमें भी कोई तथ्य नहीं है। राय कृष्णदासने लिखा है कि लाहौरके प्रोफेसर शीरानीने चन्दायणकी एक प्रति प्राप्त की थी जिसके २४ सचित्र पृष्ठ तो लाहौर संग्रहालयने ले लिये और शेष पंजाब विश्वविद्यालयमें चले गये।² इस सूचनाका आधार क्या है, कहा नहीं जा सकता; किन्तु पंजाब विश्वविद्यालय (लाहौर) से पूछताछ करनेपर ज्ञात हुआ है कि उनके पुस्तकालयमें इस प्रकारका कोई ग्रन्थ नहीं है। परशुराम चतुर्वेदीने कस्तूरीके एक अंक³के आधारपर यह सूचना दी है कि एक पूर्ण प्रतिका पता हिन्दी विद्यापीठ आगराके उदयशंकर शास्त्रीको लगा है जो नागरी अक्षरोंमें लिखी गयी किन्तु अधिक मूल्य माँगे जानेके कारण क्रय नहीं की जा सकी। उदयशंकर शास्त्रीको जिस प्रतिके अस्तित्वकी जानकारी रही है वह वस्तुतः बीकानेरवाली ही प्रति है जिसका उल्लेख अलग करके चतुर्वेदीने एक अन्य प्रति होनेका भ्रम प्रस्तुत कर दिया है। ग्रन्थका आकार मूल प्रति उपलब्ध न होनेके कारण चन्दायणके आकारके सम्बन्धमें निश्चित रूपसे कुछ भी कहना कठिन है। हाँ बीकानेर प्रतिके आधारपर यह अनुमान किया जा सकता है कि इस काव्यमें कमसे कम ४०३ कड़वक होंगे। इस प्रतिमें आरम्भके ३८८ कड़वक हैं और उसके बाद १३ पृष्ठ छोड़कर पुष्पिका दी गयी है। यह बात इस ओर संकेत करती है कि ग्रन्थका कुछ अंश लिखनेसे रह गया है। उसे लिखनेके लिए ही लिपिकारने पृष्ठ खाली छोड़ दिये थे। अन्तका अंश खण्डित है इसका समर्थन रीठेण्ड्स प्रतिसे भी होता है। रीठेण्ड्स प्रतिमें बीकानेर प्रतिके अन्तिम कड़वकके आगेके पर्याप्त अंश उपलब्ध हैं। अस्तु बीकानेर प्रतिकी पंक्तियोंकी गणनाके आधार पर कहा जा सकता है कि उसके १३ खाली पृष्ठोंपर १५ कड़वक लिखे जाते। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें ४०३ कड़वक होनेका अनुमान होता है। इन उपलब्ध प्रतियोंमें रीठेण्ड्स प्रति सबसे बड़ी है। उसमें ३४९ कड़वक हैं। अन्य प्रतियोंमें अधिकांश कड़वक ऐसे हैं जो रीठेण्ड्स प्रतिमें उपलब्ध हैं। इस कारण १. भारतीय साहित्य आगरा वर्ष १ अंक पृ १८९। २. कविताकौमुदी दिल्ली अंक १२ पृ ७१। ३. परम्परा यूनिवर्सिटी सम्वत् १९६ पृ ६९। ४. हिन्दीके सूफी प्रेमाख्यान पृ २९।

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प्रति जोधपुर राज्यके पुस्तकालयसे वासुदेवशरण अग्रवालको प्राप्त हुई है।¹ किन्तु यह सूचना निराधार और नितान्त भ्रामक है। इस प्रकारकी को प्रति न तो जोधपुर पुस्तकालयमें है और न कहीं अन्यत्रसे वासुदेवशरण अग्रवालको कोई पूरी प्रति प्राप्त हुई है। इसी प्रकार रावत सारस्वतने पूनाके डेकन कालेज पोस्ट-ग्रेजुएट रिसर्च इन्स्टीच्यूटमें चन्दायनके कुछ पृष्ठ होनेकी बात कही है। उसमें भी कोई तथ्य नहीं है। राय कृष्णदासने लिखा है कि लाहोरके प्रोफेसर शीरानीने चन्दायनकी एक प्रति प्राप्त की थी, जिसके २४ सचित्र पृष्ठ तो लाहोर संग्रहालयने ले लिये और शेष पंजाब विश्वविद्यालयमें चले गये।² इस सूचनाका आधार क्या है कहा नहीं जा सकता किन्तु पंजाब विश्वविद्यालय (लाहोर) से पूछताछ करनेपर ज्ञात हुआ है कि उनके पुस्तकालयमें इस प्रकारका कोई ग्रन्थ नहीं है। परशुराम चतुर्वेदीने असकरीके एक लेख³के आधारपर यह सूचना दी है कि एक पूर्ण प्रतिका पता हिन्दी विद्यापीठ आगराके उदयशंकर शास्त्रीको लगा है जो नागरी अक्षरोंमें लिखी गयी किन्तु अधिक मूल्य माँगे जानेके कारण क्रय नहीं की जा सकी। उदयशंकर शास्त्रीको जिस प्रतिके अस्तित्वकी जानकारी रही है वह वस्तुतः बीकानेरवाली ही प्रति है जिसका उल्लेख अलग करके चतुर्वेदीने एक अन्य प्रति होनेका भ्रम प्रस्तुत कर दिया है। ग्रन्थका आकार पूर्ण प्रति उपलब्ध न होनेके कारण चन्दायनके आकारके सम्बन्धमें निश्चित रूपसे कुछ भी कहना कठिन है। हाँ बीकानेर प्रतिके आधारपर यह अनुमान किया जा सकता है कि इस काव्यमें कमसे कम ४७१ कड़वक होंगे। इस प्रतिमें आरम्भके ४१८ कड़वक हैं और उसके बाद १३ पृष्ठ छोड़कर पुष्पिका दी गयी है। यह बात इस ओर संकेत करती है कि ग्रन्थका कुछ अंश लिखनेसे रह गया है। उसे लिखनेके लिए ही लिपिकारने पृष्ठ खाली छोड़ दिये थे। अन्तका अंश खण्डित है इसका समर्थन रीट्सबर्ग प्रतिसे भी होता है। रीट्सबर्ग प्रतिमें बीकानेर प्रतिके अन्तिम कड़वकके आगेके पचास अंश उपलब्ध हैं। अस्तु बीकानेर प्रतिकी पंक्तियोंकी गणनाके आधार पर कहा जा सकता है कि उसके १३ खाली पृष्ठोंपर ५५ कड़वक लिखे जाते। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें ४७३ कड़वक होनेका अनुमान होता है। इन उपलब्ध प्रतियोंमें रीट्सबर्ग प्रति सबसे बड़ी है। उसमें ३४९ कड़वक हैं। अन्य प्रतियोंमें अधिकांश कड़वक ऐसे हैं जो रीट्सबर्ग प्रतिमें उपलब्ध हैं। इस कारण १ भारतीय साहित्य आगरा वर्ष १ अङ्क १ पृ १८९। २ मरुभारती, पिलानी अङ्क १३ पृ ७१। ३ पटना यूनिर्वसिटी जर्नल १९ पृ ९२। ४ हिन्दीके सूफी प्रेमाख्यान पृ २९।