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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

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२५८ (रीडिंग्स २५) जबाब दादन चाँदा बर मैना रा (मैनाको चाँइका उत्तर) देखहु बाँगर करै ढिठाई। अइसो पूछत बात सगाई ॥१ मैं तिहँको का अजफर कहा। अइस कहत को ऊतर सहा ॥२ जस आपन तस औरहिं जानै। जस छिनार तस मो क बखानै ॥३ पुरुख छिनार गर को लेयी। यात कहत अस ऊत्तर देयी ॥४ तें का देख हीं पियावारी। चित सखाय मैं हि दीन्हे गारी ॥५ तूँ बितार कुछ छुटन, देस घर लै लै जासि । ६ घर घर खाठ चिखोपसि, खोर खोर चिल्लासि ॥७

२५९ (रीडिंग्स २६, बम्बई ९) जबाब दादने मैना बर चाँदा रा (चाँइको मैनाका जबाब) आन हाइ डर कहें मर जाइ। चाँद [न*] मच्छी¹ मनहि लजाइ॥१ हायहिं मोर वियाहा लीजइ। औ महँ सें त उत्तर² कीजइ ॥२ यह सो कई नाँवें मसवासी³। थो परपुरुख न छाईं पासी ॥३ आप करावइ महि डर लावइ। औ किसेर्सं राबों धावइ ॥४ यह अपग्यान कहूँ आछइ गोबा। झूठ पास बैस फिर रोवा ॥५ बात बरं हँस चाँदा, चहूँ भुवन उजियार । ६ दउ लाग भष आने, गिरह दबाइ फार' ॥७

पाठान्तर--बम्बई प्रति- शीर्षक-मुकातिबा गुफ्तने मैना दर चाँदा रा व बहगा गुफ्तने इश्क बा लारक रा (मैनाका चाँदाके प्रति अपने इसकत् भाव प्रकट करना ओर लोरकक साथ प्रेम करनेकी मन्त्रना करना)।

इस प्रतिमें पंक्ति १, ४, का क्रम ४ १ है। १—चाँद न अछर। २—हरभर। ३—जह पुनि कहे गोपों मरुवाही। ४—और किसेगैं राठर घावर। ५—कै। ६—जरे। ७—दैत लोग अस जानस रिठहि दिवावसि कार। २६० (रिग्ण्डम् २० : बम्बई २१) गुफ्तने भौंरा मर मैना रा व गुफ्नाम दादन (भौंरका मैनाको सुवा कर गाली देना) बात बड़हीं काहे नाहीं। पंडित मुनिवर सठ कराहीं ॥१ पार बूड़ सब पायन' लागैंहिं। पाप केल भरिसा कर मागैंहिं' ॥२ तूँ अमरेल' बोलसि मैंडहाई। औ मँह सें सँ करसि घड़ाई ॥३ साठ छिनार खाल तूँ कढ़ी। काइ कराँ को लीहैं मढ़ी ॥४ देवर जेठ माइ सब लेसी' । ईस' मीत तुरँगवा परदेसी ॥५ तेलि भूँज औ कोरीं', धोबी नाट चेरं ॥६ राँड बाँध सब गाँजसि, फाड़ खोर बहेर ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—रस्म व शुमार खुद नमूने भौंरा व पास गुफ्तन मर मैना रा (भौंरका अपने गुण और सौन्दर्यकी प्रशंसा करना और मैनाको गाली देना)। १—जह पाँवहि। २—कौसन पाप केलि कर मागैंहि। ३—अमरी। ४—लेती। ५—देवर जेठ और सग लेसी। ६—इय। ७—कोहरी। ८—धोबी भाऊ शारी चेर। ९—राँड पात सब गाँजल कापे। टिप्पणी—(४) कढ़ी मढ़ी—'करही, मरही' पाठ भी सम्भव है पर कुछ स्पष्ट अर्थ नहीं बैठता।

२११ २६१ (रौलैण्ड्स २८ अ) गुफ्तन मैना चाँदा रा आँचे हिकायत वूद (मैनाका चाँदाकी वास्तविकता प्रकट करना) तूँ जोगिन यह भेस भरावसि । गुनितगार लेखैं चोरावसि ॥१ अस तिरिया फुन सती (कहायइ)। घरौँ घरौँ जग फिर फिरि आवइ॥२ न चलन आइँ एकी घरी । परत दसौँवन ऊपर परी ॥३ दूभइँ तरहुँत चाँदा आयहु । फारक्कीत मुख सरग लुकायहु ॥४ ठेके मार मसार छिपाइ । देखेठँ गयउँ दुआर दिवाइ ॥५ विह दिन फर तूँ बहुर फरी, पाछैं हेरत आइ ।६ दस मंदिर अग जानी रहैंस, नहिं तिह लजाइ ॥७ मूलपाठ—(०) कहावा । टिप्पणी—(३) दसौँवन—बिछौना बिस्तरा । २६२ (रौलैण्ड्स २८ ब : बम्बई २३) जवाब दादने चाँदा मर मैना रा (चाँदाका मैनाको उत्तर) हियैं बितार हाँ तिह पिय जोगू । ऐसो कहा किइ संमो' लोगू ॥१ बिह रुपवन्त हियह धनि मोहे । तिह कैं नारि' न बाँधा सोहै ॥२ सुनतैं देह मोर' अँगराई । देखत मरौं आइ बिगराई ॥३ गाय चरावइ करै दुहावा । तिह सेतैं यहँ अगरग छावा' ॥४ बिह पौराहर मार बसेरा । सीस टूटि चे ऊपर' हेरा ॥५ राइ कुँवर नर नरवई, मन मोहँ एक सिंगार ।६ तोग मसार बेर मरकारूँ, ऊचहि पौर दुआर ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—गुफ्तगौ व बख्शी खुद नमूदन चाँदा व इहानतो हिमाकते लोरक

२२ बाज नमून (चाँदाका अपना बड़प्पन बताना और लोरककी निन्दा करना)। १—सँगोइ। २—पाठ। ३—मोर देह। ४—आठ। ५—तिस्सा पद पहले और पहला पद पीछे है। ६—ऊपर को। ७—सँहति। २६३ (रीउँण्ड्स २ १५) जबाब दादने मैना मर चाँदा रा (चाँदाका मैनाका उत्तर) मोर पुरुख खाँड जग आनै। गन गन्धरप सब रूप बखानै ॥१ पंडित पढ़ा खरा सहदेवू। चार बेद बित आप न कोऊ ॥२ भीम बली मोख कै जोरा। राघो बंसफ हुंकुं सोरा ॥३ खिनै पंच से लेत उधारी। अस बनोळ सन साचर डारी ॥४ मोर पीठ सरग कै अछरहिं राखइ। तिहि अइसै पइँ पावैं मोवावइ ॥५ तुरी चड़े रन बाग न मोरे, तू कस भडसि वाहि। ६ भाइ मतार तोर (डरपकना), बानों सेवक आइ ॥७ मूलपाठ—(७) डरपम्ना। टिप्पणी—(२) सहदेव—पाँचों पाण्डवोंमें सहदेव अपने पाण्डित्यके लिए विख्यात थे। (३) भीम—इनकी ख्याति अपने बल के लिए है। राघो—राघव रघुबंशी। किन्तु अहीर होनेके कारण लोरकको रघुबंशी नहीं कहा जा सकता। सम्भवतः मूलपाठ बाधौ (बाधव, यदुबंशी) होगा। (७) डरपकना—डरपोक कायर। २६४ (रीउँण्ड्स २ १५) जबाब दादने चाँदा मर मैना रा (मैनाको चाँदाका उत्तर) जो त सार लीन्ह मइँ साखमि। फिरि कै मैना देखैं न पावसि ॥१ आइ बैसि अस करिहौं मारे। सपनहु संज न आवइ तारे ॥२

२११ ढांकी मूंदि हुती अँधियारी । अब यह पात फरउँ उजियारी ॥३ काह फरै तू मारसि मोरा । दई दीन्हि मैं पावउँ लोरा ॥४ अब गरुवइ होइ आछहु मैनाँ । जीभ सँकोर राखु मुख बैनाँ ॥५ भाइ लोग हुत राठैं, तासो भयउ मेराउ ।६ मोतिन्ह हार मँह घुँघची, मैना सोइ न पाउ ॥७ २६५ (रीडिंग्स २१ ख, बम्बई १४) जवाब दादने मैना बर चाँदा रा (मैनाका चाँदाको उत्तर) पुरुख मग सौं सरभर¹ पावइ । मार पिधाँस खाइ घर आवइ ॥१ मँछु नीरा² चारा कहँ धावइ । लै कै भगत मैंढारन³ आवइ ॥२ मोरा⁴ मे नर मेवा जामी । कहौँ पगाठ होई⁵ गयउ अदाई ॥३ छोडि कैस करिहौ पछितावा । सँमर नेर अँबरॉयहिँ आवा ॥४ देवस घार तुम्ह देंह सुखाइह । साइ मोर कर का घट जाइह ॥५ मैंवर जो पठवै बैने, सील मानय जो भुलाई ।६ बिन एफ [लै*] बास रस, उदरैं कँवल मर जाइ ⁷ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—मदानगी व दिलावरीए लोरक शुफ्तने मैना व कशदन नमूदने चाँदा रा (मैनाका लोरककी वीरताकी बड़ाई करना और चाँदाको नीचा दिखाना) । १—सरपर । २—नीर । ३—भेंटारहि । ४—मोबर । ५—कहा बारि हर । ६—केइ वर बहुत होइ पछतावा । नेअर चोरल अँवगरहिं आवा ॥ ७—था । ८—मँवर कह फिर बैंसिए दुइ मानत भुलाइ । —बिन एक १ बास रस भँवर कँवल मर जाइ ॥

११२ २६६ (रीडिङ्ग्स २१ क) दस्तदराजी कदने चाँदा बा मैना (चाँदका मैनासे हाथापायी करना) अरग ठाइ हुत मैनाँ नारी। दौरि चाँद बरु बाँह पसारी ॥१ ऊपर भाग कै अभरन तानी। हार टूटि गा मोति छरियानी ॥२ एक बेर निकसा दोइ टूटी। माँग सलोनी मानिक फूटी ॥३ टूटि हार घूँघस भये। चोली चीर फाटि कै गये ॥४ रखरी खूँट दोउ धर परी। मानिक हीर पदारथ जरी ॥५ अभरन टूटि बिचर गा, मैनाँ गइ हुँबलाइ ।६ चाँद मेल देउ धर, मिली तराइन आइ ॥७ टिप्पणी—(१) अरग—अलग । (२) छरियानी—छितरा गयी बिखर गया। (५) रखरी—हाथका कडा। खूँट—कानका आभूषण। (६) बिचर—बितर। २६७ (रीडीङ्ग्स २११) मुहकम गिरफ्तने चाँदा सर मैना बा व मैना नीज (मैनाका चाँदको और चाँदका मैना को पकडना) बात चाँद मैना फिरिबिरी। बानु सँबरी सारस धरी ॥१ तानसि चीर चाँद भइ नाँगी। परा हाय गइ फाट इटौंगी ॥२ दस नरख लाग दुहुँ धनहारा। चाँद राव भइ रक्तवहिं धारा॥३ केस छूटि दुहुँ दिसि छिरमाये। जनु निसित अमर्षा अन्ह आये ॥४ सोरह कराँ चाँद के गयी। कराँ उतार घरी एक भयी ॥५ खाल रूप कै बाँगर करी, मैनाँ कढ़ि सिरान ।६ बाँध चाँद गर कापर, केसस चीर परान ॥७

टिप्पणी-(१) फिरिहिरी—चक्कर खाय। सेंबरी—सफ़री, मछली। (३) थनहारा—स्तन। (७) केतस-कितने ही। परान—पखान, पलायन किया, भाग खड़े हुए। २६८ (रौकण्डूस २१२) दर खून शुरु शुदन चाँदा व मैना व हजीमत नमी शुदन (रक्तरंजित होजाने पर भी चाँद-मैनाका पराजित न होना) मिलन काम दोऊ थर अरें। जनु गीर मैमत ऊमरें ॥१ दोऊ नारि ऊमरैं सथूला। नख अंग जनु टेसू फूला ॥२ उमै फरहिं हाथापाई। थन उघार तन ढाँकहि नाहीं ॥३ मरन सींह सो तरुनिहि रीसा। चीर न सँमारहिं भूगर केसा ॥४ मुँह न बोल उतर न देहीं। सीस नाँग जनु भू दह लीहैं ॥५ आइ बहुरि भू लागीं, दुहु महँ हार न कोइ ।६ लोसँचार बिसरिगा, मैंदिर बितारैह होइ ॥७ टिप्पणी—(३) थन—स्तन। उघार—नंगा वस्त्रहीन। (७) लोसँचार—लोक आचार। बितारैह—बितण्डा झगड़ा मारपीट। २६९ (रौकण्डूस २१३) गुरीख्तन बुत अज बुतखाना अज भय भश्रियान (मन्दिरके भीतर युद्ध देख देवताकी परेशानी) पौंदर अम्बर परनि मिळ गयउ। देखहि जीवर साँसत भयउँ ॥१ दउपर रकत भयउ सप लोही। हियें लागि डर मरउँहि न मोही ॥२ देउ कई बिध में न भुलाई। इँदरसभा कै अच्छरहिं आयीं ॥३ मन वो दुहूँ मँह एको मरी। इँदर राय महँ बिठफइँ परी ॥४ चला देउ हरुवा मन्ति-लागी। छाड़ि मैंदिर निसरा डर भागी ॥५

२१४

परायें देखि, सके न कोउ छुड़ाइ ॥६ सँबर आत बिसरिगा, बरैमा सीस डुलाइ ॥७ २७० ( रीडॅन्ड्स २१४ : पंजाब [प] ) आमदने लोरक नजदीके कुस्तराना व मालूम कर्दने रस्क कैफियत उम्ग ( लोरकका मन्दिरके निकट आकर लोगोंसे युद्धकी जानकारी प्राप्त करना ) कँवर तरायी खरज आवा । देस लोग मिल आगें धावा¹ ॥१ बिन पैठे सो² बेगि पुलावहि । करम हमार इहैं फल जावहि ॥२ चाँदा मैनाँ के अस कही³ । अबलहि अस न काहू⁴ सो मई॥३ सुनहिन बोल काँ करहिं मनावौ⁵ । तम न कोउ सो आइ छुड़ावौ⁶ ॥४ जो रे दुहुँ मँह एक मर जाई । हत्या लागी देस बुराई ॥५ कँवर तरायी खरख, दुहूँ पैसि छुड़ावहु ।६ लाग जान¹⁰ कै हत्या, उजरत देस बसावहु ॥७ पाठान्तर—पंजाब प्रति— शीर्षक नष्ट हो गया है । १—धावा । २—दूत । ३—चाँदहि मैनाहि होइ के कही । ४—काहूँ । ५—सुनहि न बोल न केहुँ मनावा । ६—तम न कोउ ओ यत छुडावा । ७—बल दूँह गेंद ऐको मर जाइ । ८—हत्या लागी देस बुझाइ । ९—दुहुँ मँह पैस छुडा[बहु] । १०—जाइ । २७१ ( रीडॅन्ड्स २१५ : बम्बई १५ ) आश्ती कर्दने लोरक मियाने चाँदा व मैना ( लोरकका चाँद-मैनामें सुलह कराना ) परे साँध के दोऊ नारी । भीतर मोरी सोबन बारी ॥१ दै संडवान दोउ पियाईं । कोहबर जरतैं छिड़क बुझाईं ॥२ बास बिरौरी पान खियाईं । एक खंडछाप आन पहिराईं ॥३

२१५ यह गियान तुम्ह चाँद न बूझउँ । मैनाँ सइँ को झूरहि झूझठँ ॥४ ओछ बात सुन चाँद न फीजइँ । उत्तर देइ[जनि*]९उत्तर लीजै ॥५ सिराजदीन सुनउ फष-छन्द, दाउद कही सँवार ।६ मरे सौध के१० दोउ नारी, लाइ घरी अँकवार ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—रिहा करने अमीर मसूद व रूप व सामान दादन मैना व मना करदन चाँदा (अमीर मसूदको रिहा करना और मैनाको शृंगारका सामान देना और चाँदाको बरजना) । इस शीर्षकका विषयसे कोई सम्बन्ध नहीं है । १—मीर मसूद क । २—खंडवानी । ३—अरैँ । ४—कपूरैँ । ५— सूझी । ६—मैना स्योको युझ न जूझी । ७—कीजा । ८—कन । ९—न कीजा । १०—मीर मसूद क । टिप्पणी—(१) सोध—ईंग्या । (३) चिरौरै—(क —राखिर कटक>राउर बटक>राउर इरर>चिरौरा) —फब्या । बण्डछाप—छापा हुआ रेशमी वस्त्र । २७२ ( शीर्षकहस्त २१६ ) बाज़ गुजश्तने चाँदा बुतखाना सूये रानये खुद ( चाँदका मन्दिरसे घर लौटना ) चाँद सिघासन मंदिर चलाबा । देख मनाथीं लाँछन पाषा ॥१ जो बैठ मारिंहु लाँछन लागा । आनतँ चँदर मेघ सर मागा ॥२ सोरहकरो करत उनियारा । पूनेतैं रात भइ अँधियारा ॥३ चाँद फलंकी चितहि सुखानी । एक खंड नाही नौ खंड बानी ॥४ ईंट पर जाइ मंदिर उतरी । कँवर देखि तो पाछँ परी ॥५ चढ़ी चाँद घोंराइर, सिर धर पैठ तराइ ।६ एका निकरे बाद्यै, मुख मसि धोई न जाइ ॥७ टिप्पणी—(१) सिघासन—देखिये टिप्पणी १५२।३ ।

२११

२७३

(रीकैण्ड्स २१०)

बाज गुजाइतने मैना अज कुतरयाना सूये खानये खुद

(मैनाका मन्दिरस अपने घर जाना)

चढ़ी पालकी मैना नारी। बिहँसि कुँवरि सब जोभनभरी ॥१ कोऊ आनि पूछि कैस सखि आई। से सब गोहन देउघर गई ॥२ पहँहिं चाँद कर पानि उतारा। इम सँह नारिह छिनार बितारा ॥३ हँसि हँसि भानि अवाकर कहाईं। मिलइँ सहेलिन फूट कराई ॥४ पानि उतारि मसि मुख लाइ। सो मसि मुख मैं घोइन आइ ॥५ झमकत आइ पालकी, सुख सों मन्दिर पइठ। ६ गयी सहेलीं घर घर, मैना सेज बइठ ॥७

२७४

(रीकैण्ड्स २१४)

पुरसीदने ग्वेलिन मैना रा कैरियते कुलहाना

(मैनापर ग्वालिनका मन्दिरकी बात पूछना)

ग्वालिन पूंछइ कहहु धनि मनौँ। देउ बारि कस पायहु रैनौँ ॥१ हाँ तुम घूमइ देउ पठाइ। और पाठ तिंह चाँदा आइ ॥२ इम आना यह नगरी तुम्हारी। ऊपर कदारन छतव धमारी ॥३ थार बहुत प्रेम कुछ बस्तेउँ। आज मा चाँदा कें फरतेउँ ॥४ इ सब लाग क अप्सरा। पाञ्जी सामोँ देउ दुआरा ॥५ मन भयउँ गजिपाउ, चाँद महमर आइ। ६ नाँक तनक क उदलउँ, छतउँ चीर छिनाइ ॥७

२३७ २७५ ( रॉकिण्डम २१९ ) तल्बीहने मैना मालिन रा व पय्यामान दर महर ( मैनाका मालिनको बुलाकर महरके घर भेजना ) मैनहिं मालिन तोहि बुलाइ । ओरहन देइ महराँ पठाई ॥१ चाँद सुरुज राइ कँ धिया । अइस न कीझ जस तैं किया ॥२ पूनिउँ सूर दखत उजियारा । आप कलंकी भा अँधियारा ॥३ महरि महर कँ भयी महि कानीं । लबतेउँ आग उतरतेउँ पानी ॥४ अमरूँ धिय दीन्हि मुकराइ । [ ] कर अन्त न जाइ ॥५ चार मुखन जग देखत, मोमेउँ पाँगर लागि ।६ जिह अगरग अस लागै, जाइ तम तज भागि ॥७ टिप्पणी—(१) ओरहन—उलाहना शिकायत । २७६ ( रॉफेण्डम १२ ) रफ्तन गुलफरोश दर खानए राय महर व दीद ए... ( राय महरके घर मालिनका जाना ) माल्नि पुहुप करंड भर लइ । राजमंदिर खल भीतर गइ ॥१ महरहिं सीस नाइ भइ ठाढ़ी । कुसुम करी ल दसन फाढ़ी ॥२ हारपूर फूला पहराइ । आग पूज भर मन पिजाइ ॥३ फुनि माल्नि का औचारी । यह निशि दिनरइ दाम तुम्हारी ॥४ आज सूरव मंदिर पगपयउ । चाँद पद आगहन दइ पगपयउ ॥५ जस आगहन प कदा, तम हा कदी न पागे ॥६ मन बात हां दासी, फिरें नग बदन मेंमारी ॥७

२१८ २७७ ( रौड्स २२१ ) - पुरसीदने महरि बर गुलफ़रोश राज व बाज नमूदने गुलफ़रोश हवाले चाँद ( महरिका मालिनसे पूछना और मालिनका चाँदकी शिकायत करना ) महरि कहा सुन मालिन माइ । अइस तैं सुना तइस कहु आई ॥१ फाल्हि सो चाँद देउ घर गई । देउ दुआर बितारन मई ॥२ चार सुघन जग जातहिं जापा । कुछ आपन औ बहुत परापा ॥३ चाँद न आछी अपनैं बानी । बिन पानी अति सीम सुखानी ॥४ घर घर भात दस मदिराई । फारिकदयी मुँह निकर न जाई ॥५ सों राजा के धिय सो, चाँदा कैसें लोक हँसावसि ॥६ औ जो पुरखा सात गये सरग, तैं तिहँ लुआवसि ॥७ टिप्पणी—(२) फाल्हि—कल । बितारन—वितण्डा । (३) जातहिं—यात्राके निमित्त । आपन—अपने स्वरूप । (५) फारिक—फारिग़ फ़ारिग्मा । २७८ ( रौड्स २२२ ) शर्मिन्दा शुदने महरि पूरा अज इंतामे चाँदा ( चाँदकी बदनामी पर फूल महरिका लज्जित होना ) सुनतहि फूला महरि लजानी । पर सहब जनु मेला पानी ॥१ जम तुमार पुरउँ दह दही । सम होइ महरि भात सुन रही ॥२ काँन भाँत पर गयइ भुलाई । इहँ कुरपारन लागि गँवाई ॥३ काहे करैं विष तँ भातारी । बहु आँगरस मरतेउँ पारी ॥४ अस आरदन दुनि कहुँ भइँ । जहाँ पियाही तिहि कय फइँ ॥५ दाइ कुरपारन, अगरण लाग हँसाजनहार ।६ भातैं लाग कह मालिन, डगरी आइ छिनार ॥७

२११ टिप्पणी—(१) बरे—घट। (२) अगरम—अगणित। (७) छिनार—छिन्नाख; पुंश्चली; व्यभिचारिणी। लोक-भाषामें नारीके प्रति एक अति प्रचलित गाली। २७९ (फील्ड्स २९३) तंबीह्नन चाँदा बिरस्पत रा व फरिस्तादने बर लोरक (चाँदका बिरस्पतको बुझाकर लोरकके पास भेजना) चाँद बिरस्पत सों अस कहा। भासउँ कुछ जो चित महँ अहा ॥१ सरग हुतँ घरि परा उठारू। उठा सबद जग मीत न ककरू ॥२ अब यह बात देस पहिराई। औधी ढाँकी रहहिं लुकाई ॥३ हांबौं सुनतेउँ मोल परावा। जिह डरेउँ सो आग भावा ॥४ अब हा मरिहौं पेट कटारी। कै दुख सहब देस कै गारी ॥५ लोर कहसि बिरस्पत, महिँ लै नगर पराइ।६ आज राति लै निकरो, नतुर मरी मोर बिस खाइ ॥७ टिप्पणी—(५) सहब—सहूँगी। (७) नतुर—नहीं तो; अन्यथा। २८० (फील्ड्स २९४) गुफ्तन बिरस्पत लोरक रा सुखन चाँदा (बिरस्पतका लोरकसे चाँदका सन्देश कहना) आइ बिरस्पत कहा सँदेसू। लोर चाँद लइ [आ°] परदसू ॥१ मागन लाग दइउ घिर आये। पाउम पन्थ न हाँढी आय ॥२ नार गार नद पानि भरि रहे। यह सर्वसार जहाँ लइ अई ॥३ दुहँ लाग घर बादर रनै। दादुर रगहिं घीज लँवरून ॥४ पाउम पन्थ कउन नर पाइ। जीउ डराइ हिय फाण्ड धाई ॥५

२४ सरद सिसिर रितु हँवन्त, जात न लागे बार ।६ चलब चाँद कहु बिहफइ, होइ बसन्त उजियार ॥७ टिप्पणी—(२) रहउ—देख॰ बादल । (६) बार—नाला ओर—गोइ । (७) चळब—चलूँगा । बिहफइ—'बँसिरइ' पाठ भी सम्भव है। दोनो ही विरस्पत (बृहस्पति) के देशज रूप हैं। २८१ ( रीछण्डस ३३५ ) तहफ़ीम कर्दने विरहसत बर गोरक रा ( बिरहसत का गोरक को समझाना ) बिहफइ आइ लोर समुझावा । बेर चाँद बिउ रूप उषावा ॥१ छाइ गोबर अस पहराउप । अरु जिउ आइ फुनि गोइ [न*] आउष॥२ मैं आपुन जिउ अस परसेना । रात दवस कहुँ बरमी दबा ॥३ पित्वैं फेर देखि पासाऊ । हाथ ऊभि सुइँ पर न पाऊ ॥४ परु गहि पानि अगका कहिय । अइस परे सर तइमै महिये ॥५ कहा बार सुनु बिहफइ, हौं ता रागि गुनाउँ ।६ काल घरी हौं जानब, धौं हा चाँद पुलाउँ ॥७ टिप्पणी—(१) बेर—डिम्ब । (२) अइस—इस प्रकार । पहराउब—बाहर निकलूँगा । गोइ—गोंदकी गाँथा । आउष—आउँगा । ( ) पानि—पाना, हाथ । अहूय—रेता । परइ—पड़ । तइम—तवा । (७) बाल—बर । धौं—सम्पूर्ण । २८२-२८६ ( अनुपलब्ध )

३८१ २८७ (सदा १४४८)

    • न दिलन का पौटा (विरहका और के रूप क्रम) पिरख नारि भा समुझाइ । गोद जीउ पेन पँहुचि सिरिआइ ॥१ चन्दन अमिर पिम मन मारा । परसि गपा भरि भीम गुँभारा ॥२ सिन्धु माँग नग साउर टीको। पग पान मुख पीग दीको ॥३ अछन पहिरि भउ गिय हार । हाथहि मेहँदी हिंया सिंगारु ॥४ अपर रूपे मदन भइ । भए लागि मानिन पर गइ ॥ उमगह नहगह निसि पायी, गरुह जा भाउ निहग ॥६ पउज मय पान फूलउ, भयी दुरँग दुरग ॥७ [टि०-] (१) म०नि० पृ० ६५१ । २८८ (संवत् १४४९)
    • न लउतन्ह दिलन को प०८ ख (दिल्हन के भँवर के रूप क्रम के ० ख०) दिन का विरह भा तुयानी । भा उधारा पँचौ गनी ॥१ भए तेवँइ सिखा परा। गए सोइ मानिन घर आए ॥ सेंधुरा भा कंचु सुधार । विरख करै। गुयन निहार ॥३ विरहन दून भए पर भार । आग भइ पनि साही मार ॥४ आग्य बरइ न बुझावइ । तँह अगन भए अंगल जरइ॥ भए घरा सउर पुनि मँदा । सब जन पाइ रह खंदा ॥६ भए दिलन विरह उन सुखभन्ह कइ ।७

१४२ २८९ ( रोहीन्गुस १२३ : मनेर ३४५क ) रफ्तने लोरक दर खानये झुन्नारदार व पुरसीदने बख्ती खांद ( बाह्मणके घर जाकर लोरकका यात्राकी साइत पूछना ) रैन खेलानों भा भिनसारा । पंडितकें १ घर लोर सिधारा ॥१ पैंभरी साइके आपु बनावा २ । पाटा पान बीर कइँ ३ आवा ॥२ पाट पँसारै ४ दीन्हि असीसा । चँदर पातं ५ सूरुज मुख द[ीसा*] ६ ॥ फिरूँ चेत परमां ७ परफासू । पैंपरि पूजे कीन्हि ८ इम पासू ॥४ काइ मया हमफहिं चित घरी । मई अजोर अइस हमरी भरी ॥५ कहु जजमान सो कारन, किंह इहवाँ तुम आयहु १० ।६ चँदर जोत मुख अदबल, किंह लग चित उचायहु ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दस्तान रफ्तने लोरक बरे नक्शूथे पुरसीदन ख श (लोरकका ज्योतिषीके पास जाकर पूछना) । १—रैन गोलि के । २—ते । ३—सांथों पडित जाइ अगवावा । ४—पे । ५—पैसार पुनि । ६—चँदर भाव सुरज पैंह दीक्षा । ७—काइ फेरु चित म्वा । ८—सुरप ओ (?) कोन्हा । ९—भाई उजियार फीर के मन्वी । १०—किह सग ईहवाँ आयहु । २९० ( रोहीन्गुस ५३ मनेर ३४५व ) गुफ्तने झुम्नारदार बख्‍ती नीक व साभती नूह ( ब्राह्मणका शुभ घड़ी बताना ) सुरुज कड़ा में चाँद पुराउप । सगुन पाँच दै पुरुष चलाउप ॥१ परी माँड के राहि गुनाये । सबही निभिर्य पण्डित पाये ॥२ गोर गुनित तुम तोरफ आनहु । कहउँ बोल सो सच कर मानहु १ ॥३ दिन दस तुम्ह कहँ पाट चलावहुँ । पुन इहँ पन्थ भला निधि पावहुँ ॥४ एक दोइ गाइ मैं कुछ देखेउँ । आग होइ पै नाहीं सेखेउँ ॥५

२४१ आधी रात जो आइँ, तब उठ चालहु बीर ।६ घर उपत तुम्ह उतरहु, पौरि गाँग फर तीर' ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—मुकाम कर्दने लोरक सरे नजूमी व कैफियते बग (लोरकका जोतिषीके पास रुकना और ज्योतिषीका संकटकी बात कहना) १—चाँदा । २—माँग । ३—लोक सबै तुम्ह मानहु । ४—फन्द फड़ावइ । ५—पुरुष फन्द भल सिधि पावइ । ६—एक दोइ काक जैत मैं बेलउँ । ७—औगुन । ८—देखउँ । ९—जब आवहि । १—बूड़ि गाँगके तीर । टिप्पणी—(६) पाड़—संकट । (७) पौरि—तैर कर । २९१ ( टीकेण्ड्स २१४ : मनेर १४६ अ ) फुस्म आवर्दने लोरक चाँदा रा व बाखुद बुर्दन ( लोरकका चाँदाको नीचे लाकर अपने साथ ले जाना) रात परी' तो लोरक आवा । मेलि धरह कै आपु जनावा ॥१ बाट जुहत फुनि' चाँदा होती । लेतसि अभरन मानिक मोती ॥२ अँगुरी लाइ लोर तस ताँनसि' । आवत घर चाँद न जानसि' ॥३ प्रथम मेलि अरघ सब देतसि । औ पाछे चाँदा धनि लेतसि' ॥४ चाँद सुरुज कै पाँयन' परीं । सुरुज चाँद लै माथे धरी ॥५ निसि अँधियार मेघ' धन परसे, चाँद सर" लुकाइ । ६ बेगि बेगि कै चाले दोउ, जानउँ जाइ उड़ाइ' ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान आमदने लोरक दर जायगे चाँदा बर लोरक (लोरक का चाँदके घर आर (चाँदका) लोरकक पास आना) इस प्रतिमें पंक्ति ३ और ४ क्रमशः ४ और ३ हैं । १—भयी । २—बाट गहत तो । ३—तानों । ४—आवत बाद पुरुख नै जाना । ५—पाछे पुरुख चाँदा घर लेठसि । ६—के पाँवदि । ७— सुरुज । ८—माँच । —नीर । ९ —सुरुज । ११—बेगि बेगि चलु चाँद कुमारी गँहि गहा दूर उड़ाइ ।

१०४ २९२ ( मनेर १४०अ ) दास्तान आमदने चाँदा अज सर कस ब रस्तन (चाँदका महलसे निकलकर रवाना होना) लै लोरक पर पाँवर दिखाबा । देखि चाँद कुछ चितहिं न लावा ॥१ चलहु लोर पुनि हो भिनसारा । लागि गुहार सब लोग हमारा ॥२ यस सुन पावइ बावन पीरू । बिरह दगध पुनि मोर सरीरू ॥३ ओहि देखत कोई बाइ न पारइ । पोलत बोल माँछ (सँइ) मारइ ॥४ अरजुन सँस धनुष कर गइइ । ओहिर्क हाक न मनुसं सहरी ॥५ कहहि लोर सुनहु तुम्ह चाँदा, अहिसै महिं न हराउ ।६ राठ रूपचंद बाँठा मारेउँ, अब बावन पर जाउ ॥७ मूलपाठ-मह । टिप्पणी-(२) भिनसारा-प्रात काल सुबह । (३) गुहार-पुकार । (५) ओहिर्क-उसका । (६) अहिसै-इस प्रकार । २९३ ( मनेर १४०ब : १४१अ ) दास्तान शमशीरे व गिरे लोरक गिरफ्तने मैना (मैनाका लोरककी तलवार और डाक के लेना) ओडन छोड़ मैना लै छूटी । सँह निसि बागि बिरह कै यूठी ॥१ दुन्दु मरुखम्महि रोइ संचारा । करहिं मइत धनु उठइ झनकारा ॥२ मैना माँजरि रूप मरारी । इहँ गुन कितहु न देखेउँ नारी ॥३ ओडन छोड़ फन्दु अस धरा । नैन नीर परु काजर सरा ॥४ कठ ऊँच न बोलसि बोलू । औगुन करब राख मोर तोलू ॥५ अति सरूप सयानी, औ कुलबन्ती नारि संजोग ।६ तुम्ह चाँदा मन राता, महिं परा बिजोग ॥७

प्रस्तुत चित्र पूर्णतः रिक्त (खाली/श्वेत) है, इसमें कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है।

२४४ टिप्पणी—(१) झगा—लम्बा ढीला कुरता अँगबरगा । (५) उहूँमाँ—वहाँ उस जगह । २९५ ( रीडेन्ड्स २३ : मनेर १४८ब ) शिनाख्तने कूँवरू लोरक रा दरमियाने राह अज पस्ते च चाँदा ( मार्गमें कुँवरूका लोरक और चाँदाको पहचानना ) कुँवरू आवध¹ चीन्हौं लोरू । धावा संखि चलायहु गोरू² ॥१ पाछें हेरत³ चाँदा भाई । जिउ कुँवरू कर गयउ उड़ाई ॥२ कइसि लोर सों भला न किया । कित ले चलों महर कै धिया ॥३ तिरियहि सरम नाँग भुखि होई । तिन्ह कँ⁴ सप न लागइ कोई ॥४ धूड़ी खोलिन तुम्हरी माई । तिहँकै मया न तुम्हे चित आई ॥५ बारि बियाही मैना माँझरि , लोरक आइ तुम्हार ॥६ पारि बूड़ ररि मरियेंहि, माइ बचन हमार ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—शिनाख्तने कुँवरू लोरक रा (कुँवरूका लोरकको पहचानना) १—अगुवत । २—रहा सखि परा सब गोरु । ३—हेरन्त । ४— गुन्द । ५—रूख चढ़े । ६—तेउरे । ७—तिहके मयाँ न चित मूँह आई । ८—बारि बिदाही मैना । ९—म—करहि जिन्त तुम्हार । टिप्पणी—(१) आवध—आता हुआ । चीन्हौं—पहचाना । संखि—उद्यत होकर ! गोरू—ढोर, गाय भैंस आदि । (२) पाछे—पीछे । हेरत—देखते ही । (४) तिरियहि—स्त्रियों की । सरम—शर्म । नाँग—अरथ, बोदा । (७) ररि—रट रट कर । २९६ ( रीडेन्ड्स २३१ बम्बई २६ मनेर १४९क ) गुफ्तने बादा कुँवरू रा हिकायते इश्क ( चाँदका कुँवरूसे अपने प्रेमकी बात कहना ) चाँद कहा कुँवरू सुनु बाता । लोर मोर धिउ एकै¹ राता ॥१ जियतेँ जीठ² न छाड़ेउँ³ काछू । दिन अस मये सो सोग पठाऊँ ॥२