भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

२४० हौं ठँइकै उहँ चिंतँ मोरें । काइ कुँवरू होई रोयें तोरे ॥३ इँह बिधि देखि देसन्तर लीन्हों । काह कहौं'अनउत्तर दीन्हों" ॥४ तुम तज हम जाइहँ परदेसू" । मैं देखुकीन्हि" पुरुख कर भेसू ॥५ हौं सो महर धिय चाँदा", चहूँ भुवन उजियार ।६ कौन अजोग संघ कियउ", कुँवरू भाइ तुम्हार ॥७ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रतियाँ— शीर्षक—(बं) जबान दादने चाँद बज कुँवर [य]। (चाँदका कुँवरूको उत्तर) (म) गुफ्तने चाँद कुँवरू रा जवाब (चाँदका कुँवरूको जवाब)। दोनों ही प्रतियों में पंक्ति ४ और ५ क्रमशः ५ और ४ है। १—(ब म) सुनु कँवरू। २—(ब) कह; (म) कहि। ३— (ब) धिय। ४—(ब, म) छाडतँ। ५—(ब) वोइ दस गवे यह लोग पठाऊ (म) वोइ दस होन्के बाट पठाऊ। ६—(ब) हीं ठैंहकैं तह चित्त कसाह (म) ही ठइकैं तह बिय बसि। ७—(ब) रोये (म) हो कुँवरू रोये। ८—(ब) इह बिध देस देअन्तर लेऊँ; (म) लेऊँ। ९—(ब) करौं। १०—(ब म) कछ ऊत्तर देउँ। ११—(ब) हम नज (?) जाब परदेसू (म) तुम तज जायब परदेसू। १२—(ब) कीन्ह। १३—(ब) हौं महरे के धिय सो चाँदा (म) हौं महरे के धिय चोंदा। १४—(ब) कौन अजोग संग मिक : (म) तोर साग चित्त बाँध भयउँ। टिप्पणी—(१) मोर—मेरा। राता—अनुरक्त। (३) ठँइकै—ठहाका दी। उँह—वह। (५) जाइहँ—जाऊंगी हूँ। (७) अजोग—अयोग्य। सघ—सग साथ। २९७ (रीर्यण्ड्स २३३ । मनेर १४१ख) जबान दादने कँवरू या पदानत चांदा रा (कुँवरूका चाँदाकी भर्त्सना करना) अस चाँदा तुम लाज गँवाई । मरग हथौ सुइँ उतरी' आइ ॥१ (मुख कारी मसि) फिरसि कुँपागीं। पाग पास हाई अँधियारी ॥२ रहु न चाँदे मनहि म्जाइ । अग का न हाइगवन कें जाई ॥३

१४८ बारह मंदिर रैन अँधावसिं¹। सुरुज सेज उजियारी राखसि ॥४ तज सोफ आ रहु तुमाइ । फड़इँ मात तूं खिन न [स*]बाई ॥५ दान सुरुग कर निरमल, लोरक भाइ हमार ।६ तारै नीलञ्ज अमावस, फरि जो लिन्हि अँधियारं॥७ मूलपाठ—(१) मुग कारी मुग निसि । पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—मलामत कर्दने कँवर चाँदा रा (कँवरका चाँदको मलाना करना) । १—घर उतारि । २—मुगकारी पतराहि तिह बुझारी । ३—पास पास दिन होइ । ४—रहनि नहिं चाँदा । ५—अस निह होइ गांयर वै बाई । ६—रैन मूँ बाजसि । ७—अँधियारै राखसि । /—तब जो सोक मईह रजाइ । —मन होइ तो मरे रजाइं । १ —मूँ ता मनै अस निरुञ्ज, अमावस वै अँधियार । टिप्पणी—(१) इसीं—थी । (१) रूप—ऐसा । २९८ (रैकीयूस ३३३) विदान कर्दने लोरक बा कुँवर व पेश्तर रफ्तन ( लोरकका कुँवरको विदा कर आगे बढ़ना ) धरि कँवरू लोरक कँठलावा । नैन नीर भरि गाँग बहावा ॥१ केस छोर कँवरू पाँयन परा । बिरह दगध पाथर धनु ररा ॥२ देखतहिं चाँदा चितहिं सैंखानी । मङ्गु न लोर छोड़ै लोरकानी ॥३ कातिक मास रोतु रितु गाइ । हम पुनि कँवरू खेलत आइ ॥४ ठाढ़े कँवरू सिर दइ हाथा । जान देइ चाँद संघाता ॥५ गाउ खोलिन आ मैनाँ, कहु सँदेस अस जाइ ।६ बहर जान न पावइ माँजरि, रहे खोलिन के पाइ ॥७ टिप्पणी—(१) कँठलावा—गले लगाया । (२) पाथर—पाथर । ररा—चिरकाया ।

२४९ (३) संभाषी—शंकित हूँ । (५) ढाहे—नष्ट । २९९ (रीडिंग्स १३७) रवान शुदने लोरक व चाँदा बशिताम (तेज़ी से लोरक और चाँदा जाना) चले दोउ सुइँ पाडैं न धरहीं। पेग बेग उताबर मरहीं ॥१ चला लोर मिलि चाँदा आई। खोलिन मैना बिसरी माई ॥२ चाँदहि देखि लोरकहि कहा। कैंसैं सो मिलत जो चित अहा ॥३ औ अस कहा मइँ तूँ लोरा। नीके मन चित करिहूँ मोरा ॥४ तोर सनेह छाड़ेउँ घर बारू। कै बोरहु कै लावहु पारू ॥५ साँझ परी दिन अँथवइ, लोरक चाँदा दोइ ।६ औघट घाट गाँग कै, रहे निरिउ तर सोइ ॥७ टिप्पणी—(५) बोरहु—डुबा दो। (७) तर—नीचे। ३००-३०३ (अनुपलब्ध) ३०४ (रीडिंग्स १३५; मनेर १५३अ) रसीदने लोरक व चाँदा बरे गंगा व इशारत कर्दने चाँदा मल्लाह रा (लोरुक और चाँदा का गंगा के किनारे पहुँचना और चाँदा का मल्लाह को संकेत करना) गाँग सरिम भभासम करनों¹। सारफ जाइ लेव² एक छरनों ॥१ चाँदा फिर फिर³ आपु दरशारा। मदु गवट मोहि दरसत आपा ॥२ मँरगा टाँउ जो गवट आवा। फर फगन भाँदि झनकाया³ ॥३ गरर दरउ अगम्भे रहा। तिरिया एक अस्तरै⁴ अहा ॥४

२५ कहै नाउ बैठु' देखउँ आइ । फटन तिरी यह ईंहवाँ आई ॥५ सँरगा बेग पलावसि, खिन खिन फिरैहि सँकाइ'' ।६ काइ कहें कस पूँछँ', कइसे ईंहाँ आइ ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान नमूने चाँदा दस्ताने मल्लाह रा (मल्लाहको चाँदाका हाय दिगराना) १—गग खरित औरय करना । २—सोरफ गैन्द आइ । ३—फिर फिर चाँदा । ४—सोइ बेगी महु केवट आवर । ५—सँरगा तौर ओ केवट आवा । ६—चमैकावा । ७—केवट बैठ अचम्मो पा । ८—अकेली । ९—से । १०—कौन नार कहँवा हुत आइ । ११— सकार । १२—काइ कहीं केउँ पूँछउँ । ३०५ ( रीकेन्हम २३४ : मनेर १५२८ ) आशिक शुदने मल्लाह बज दीदने जमाले सूरते चाँदा ( चाँदाका सौन्दर्य देखकर मल्लाहका मुग्ध होना ) खेवट' देख बिमोहा रूप । अमरन बहुत' सुनारि सरूप ॥१ दई विधाता' पूजई आसा । जस सिरिया ओ आवइ पासा ॥२ खेवट कहा उतर दिस जाइ । बैसि सरगा नाउ रुधाइ ॥३ चाँदा नारि उतावर चली । खेवट कहा रात है भली ॥४ गई फोंद यहँ सोरफ रहा। खेवट सँरगा बैस एक अहा ॥५ गुन बाँधी यह खेवट, सँरगा फेरी आइ ।६ लेके पार उतारों सो धनि, नौलहि लोगहिं आइ ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रतिमें इस कड़वककी केवल आरम्भिक तीन पंक्तियाँ हैं। शेष पंक्तियाँ कड़वक ३०७ की हैं। शीर्षक—दास्तान मुफ़तार शुदने केवट बज दीदने ऊ (उसे देख कर मल्लाहका प्रेमासक्त होना) १—केवट । २—बहुत । ३—तुम्हार । ४—कहा नाउ परबैतैं ब्यहु । ५—लेंबर ।

९५१ टिप्पणी—(१) सँरगा—नाव । (७) ओऊहि—जब तक । ३०६ ( रीडेण्ड्स २१७प ) सबारी खुदने लोरक व चाँदा बर कश्ती ( लोरक व चाँदा नावमें बैठना ) माँझ गाँग हुत खेवट कहा । कउन नारि घर कइवाँ अहा ॥१ रैन कहाँ तुम्ह कीन्हि बसेरा । नदि नियर न देखेउँ गाँउ न खेरा ॥२ परहुँस मया चलेउँ रिसाई । भर एक रात गाँग हँ आई ॥३ मूँ महरी के जाति अकेली । साथ न कोऊ सखी सहेली ॥४ काह न कोउ मनावन आवा । जिंह घर आइ सो आठ न पावा ॥५ सास ननद मोर माखउँ, दीख न कुँबइँ पतार । ६ पिया सन मोर साइ बिरोधा, यहिं छाड़ेउँ घर पार ॥७ ३०७ ( रीडेन्ट्स २३४; मनेर १५२व ) गुजार खुदने लोरक व चाँदा अज आबे गाँग ( लोरक-चाँदाका गंगा पार करना ) चाँदहि खवट सों अस कहा । अभरन मोर बहि पारहिं अहा ॥१ मवर मँरगा साँध लै आवा । घालंतहिं लोरक माथ उचाया ॥२ दीन्हि तराइ खेवट बहे । दाइ जन चले न तीमर अहा ॥३ सार चाँद दाइ मँरगा चढ़े । एक फाठ के दोउ गढ़े' ॥४ गवर ठाइ अरवारहिं रहा' । फरिया लार आपु कइ गहा ॥५ अगों चाँद मयानी, पाछ लोरक पीर । ६ दपी मंयाग गाँग हर आयि, पूइत पारा तीर ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रतिमें केवल अन्तिम चार पंक्तियाँ हैं । इनके साथ आरम्भकी तीन पंक्तियाँ कड़कक ३०७ की हैं।

१५९ १—बाँद जर आइ सैरगहि भवे। २—अति सरूप सर में गये। ३—केवट उतर बकर पावहि गहा। ४—करथा (यह केवल गुप्तोंकी भूल है। ५—आपुन। ६—आगे। ७—पाऊँ। ८—साँग तब ऊपर, बूहल पावो। ३०८ (रीसेंग्स १३९ : मनेर १५३ख) आमदने बामन बर किनारे गंगा व पुरसीदन मस्काह रा (गंगाके किनारे आकर बामनका मस्काह से पूछना) साँलहि पावन आइ तुलानों। पूछा केवट पिरम मुलानों ॥१ फेरी फेर मोर दुइ आये¹। इँह मारग तिहिँ देखी पाये² ॥२ सुन केषट मुख देखत हँसा³। कुँवर कुँवरी इक इँहवाँ बसा ॥३ पुरुख तुफ्रान तिरी दिखरावा। हाँ रंगराता तिहिकेँ⁴ आवा ॥४ नहिँ राजा नहिँ रानी जानी। कहुँ साथ तिहि जानु न पछानी ॥५ उहूँ नाव ले डाड़े लाये, ऊ फिर फेर न होइ ।६ बामन देख दौर धस लीन्हे, इहँ फिरैँ रोइ⁷ ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान आमदने बामन धीरे बाँद मे रसीदन (बाँदके पीछे बामनका आ पहुँचना)। १—फेरा फेरि मोरे दोइ। २—इहँ मारग हैं देती कोई। ३—सुनके पवट मुख देख हँसा। ४—कुँवरि कुँवरा। ५—तिरिया। ६—रंगराची तिहफै। ७—भल रसन्त बिचक्रसन सांड। उन गतरी पुरुप औ जाइ॥ ८—उह देगु भैरगा ल्वाय तीपई उई न ओगी फेर। — बामन दौरि ऊभ पल कीन्हें, बहुत गै तिह नेर॥ ३०९ (रीसेंग्स २४ : मनेर १५३ख) दर रग उफ़ादन बामन व कुम्हाते तरफ करन (बामनका गंगामें कूदकर लोरकका पीछा करना) धनुरु बान पावन मर पग। तारफ़ दरि गाँग महँ परा ॥१ जउतहि पारन पार न भयऊ। हालहि लार काम छ गयऊ¹ ॥२

२६३ साँस मार पायन तस धावा । मार बिपारतैं बान न पावा ॥३ बात' गोषार धरावइ गायी । अपने करी सो धाइ परायी ॥४ खेदै जेठैं पावइ पावइ खोजू' । इहँ परिहँस तो रही न रोजू ॥५ भै रे चलहिं यह धावइ, मिला कोस दस जाइ ।६ ऊँचा धिरिख सुहाबन एक हुत, लोरह लीन्हों आइ' ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान हुम्बाक्य पौदा व लोरक दवीदने बावन (बावनका पाँव और लोरकका पीछा करना) १—कर । २—करक । ३—तोग्हि लोरक कोस दोइ गयऊ । ४— गाइ । ५—आसन (?) । ६—बाठ बठ पाउ न पावइ गाजू । ७— रहें परिहँस रहे न रोजू । ८—यह र चले। ९—ऊँचा धेय सुहावन, लोरक लीन्हों आइ । ३१० (अनुपलब्ध) ३११ (रीड्स २४१ : मनेर १५४अ ) खबर कर्दने पौदा बावन भी आमद व आमदने बावन (पौदका बावनके आनेकी सूचना देना और बावनका आ पहुँचना ) चाँदइ देखा पावन आवा । बचन न आवइ धाफे पावा' ॥१ बावन आइ बाघ जस घेरा । फिरि जो चाँदहूँ पाछों हेरा' ॥२ मुख फिराइ लोर सों कहा । अब देखहु पायन आवत अहा' । ३ धनुक चढ़ाइ बान कर गहा । तस मारौं जस देह न रहा ॥४ भाषत हुतं' बावन सर मेला । सो सर लोरक' ओडन टला ॥५ आठन फुटि लिहावट फुटा, अउ लोरक ग पाँह ।६ पग पिरिख भम्प कर, लोरक भाऊ भा तिह छाँह ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान सभीदने पौद अज आमदने बावन (बावनका आना देख पौदका भयभीत होना) ।

२६४ इस प्रतिमें पंक्तियों ५ और ३ क्रमशः ३ ओर २ हैं और पंक्ति २ के पद पीछे-आगे हैं। १-आबइ डाँत कपाय। । २-पाछेँ फिरि ब्वो लोरक हेरा। बावन मार वाफ (वाप) कस फेरा। ३-मुँह फिराइ लोर सँत कहा। बह देखु बावन आवत बाहा। ४--बाकन। ५-आअत आवत। ६-ब्वोह लोरक। ७-ओ लोरक बाँह। ८-ऊँचा बिरिल मुहाजन लोरक रीनाहि छाँह। टिप्पणी-(१) पाछा-देर। (२) बाछें-पीछे। हेरा-देखा। (५) आपठ हुतें-भात ही आते आते। ओहन-डाक। देखा-पीठ हटाया। (६) बाँह-बाप। (७) अम्ब-आम। आउ-आवर। भा-(भूतकालिक क्रिया) हुआ। ३१२ (रीडिंग्स २७९। मनेर १५७ब ) गुफ्तने चाँदा बर बावन रा (बावनसे चाँदा कहना) पावन कहि गौं चाँद कुंवारी। काइ लागि तुम्ह कीन्हि गुहारी ॥१ माइ बाप जो दीन्हि बियाही। बरस देबस हौं तुम्ह पहिं आही' ॥२ पिरम कहा न कीन्हि न बाता। तुहँ न देखउँ फार कि राता ॥३ सुपन गुनौँ हुत तुम्हारा नाऊँ। तरसि सुपउँ पै सेज न पायऊँ ॥४ जस आपठँ तस मके गयउँ। दयी क लिखा सो मैं पयेउँ' ॥५ बहुरि जाहु घर अपने, बावन मंग सभ मोर ।६ राउ रूपचन्द बाँठा मारा, आइ मो कइँ लार' ॥७ पाठान्तर-मनेर प्रति- शीर्षक-दास्तान हुम्बार्य चाँद ब लोरक दरीदने बावन ब गुफ्तने चाँदा बावन रा बेहुजुरी लोरक (चाँदाका चाँद और लोरकका पौम करना और चांदका बावनसे लोरककी प्रशंसा करना)। इस प्रति में पंक्ति ३ और ४ क्रमश ४ और ३ हैं। १- बावन सन कहि । २-मुँ कहसि। ३-बरस दवस तुम्हरी आही। ४-पिरम कहा नह कही ना बाता। दिह न देख कार कि राता। -

तुम्हारे । ६—उपत । ७—अस देखिउँ अस मैंक आपतँ । दपीका ढिला हुत सो पायतं ॥ ८—बावन कहाँ सुनहु तूं मोर । ९—मने सो कुंकुद मोर ॥ टिप्पणी—(१) काइ लागि—किस लिए । कीन्हि—किया । (२) पहिं—पास । आही—थी । (३) पिरम—प्रेम । कार—काल । राता—रक्त यहाँ तात्पर्य गारेसे है । ३१३ ( रोलैण्ड्स २७३ ; मनेर १५५अ ) जवाब दादने बावन चौंदा व अन्दाख्तन तीरे दुअममुरु ( बावनका चाँदेको उत्तर देना और दूसरा तीर छोड़ना ) अहि¹ पापिन तिहिका मारों । नाक काटि कै² देस निसारौं ॥१ तिहि अस तिरि गोवरौं³ घसि लेई । पात फइस अस ऊतर देई ॥२ कस लोरक⁴ सेतें मोहि डरावई⁵ । तू बड़बोल जान जो पावइ ॥३ तिहि लग लोरक जी गँवाइह । भेंट मई अब जान न पाइह ॥४ पुरुष मार ओडन मदिं¹¹ फोरउँ । काटउँ मूँड़ भुजादण्ड तोरउँ ॥५ अस सुन लोरक (सिंघ) कोपा, ओडन ढाँढ सँभार¹² ॥६ बावन एक फॉक सर छोड़ा, गयउ भिरिख सो फार ¹³ ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान जवाब गुफ्तने बावन बा चाँदा (चाँदको बावनका उत्तर) । १—अरी । २—तिहि । ३—गावा ('र' लिखनेसे छूट गया प्रतीत होता है) । ४—अन । —शेर । ५—डरपावति । ७—तू पै बाल आइ जन पावति । ८—गँवावा । ९—भइ भट । १०—पावा । ११— सँठ । १२—अस सुनि लोरक सिंघ अस गावा कर ओन्न सँभार । १३—बावन एन चाहि सर छोड़ा अगराई तीर सभार ॥ मूलपाठ—(१) सिग । टिप्पणी—(१) तिहि—तुझको । निसारौं—निकालूँ । (३) बड़बोल—लम्बी लम्बी बातें करनेवाली; बातूनी ।

२५६ (५) चोरेउँ—पोहेँ। काढेउँ—काढ़ेँ। मूँड—सिर मुष्ठरण— मुण्डण्ड । तोरेउँ—तोड़ेँ । (७) फाँक—मुकीला (देखिये टिप्पणी ११९।५) । ३१४ ( रीकॅण्ड्स २४४ : मनेर १५७ब ) फह्मादने पाबा लोरक रा व अन्दाख्तने बाबन तीरे सुवम (चाँदका लोरकको सचेत करना और बाबनका तीसरा तीर छोड़ना ) चाँद कहा अब देउर लीजइ । गाड़े आँखद ढील न दीजइ ॥१¹ दू सर गये रहा अब एकउ । लोर² पीर कँसौ के टेकउ ॥२ सर मेठसि कस निभर नँ आवइ । जो आवइ तो जीव गँवावइ ॥३ आइ देउल महँ सोर सँभारा । नाँघसि बान उठा झनकारा ॥४ बाबन बान छूटा आइ⁸ । मारसि देउर गयउ उड़ाइ ॥५ पर बाबन कर भागा, चाँद कहा विचार ।६ बँधवा सुरुज बहुरि परगासा, आनइ सम ससार⁹ ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान चाँद गुफ्तने पनाह देवर पैकर आए लोरक (चाँदका लोरकको देवरका सहारा लेनेको कहना) १—दी० अधीजइ । २—दोइ । ३—मीरक । ४—बह हर दे० पुनि निपर न भावइ । ५—नाचे अधउर जो बान रुषारु । गरया देउर उड़ा झनकारू ॥ ६—बाबन तबही धनुष बजार । ७—कर महा चार । ८—विधार बिचार । —अधवा मुत्र सुरुज परगासा । ९ —सतार । टिप्पणी—(१) देउर —देवर, मन्दिर । गाड़ —कठिन । आँखइ—समय । ( ) कँसौ—किसी प्रकार । (३) निबर—निकट । नैं—नही । (४) देउल—देवल, मन्दिर ।

२७७ ३१५ ( मनेर १५६प । रीकैण्ड्स २७५ ) दास्तान गुफ़्तने बामन बेगेरुक खुद रा ( बामनका स्वागत-कथन ) बावन कहा बाच हौं मोरी । तोर पुरुप यह तिरिया तोरी ॥१ लोग कुटुम्ब महँ कहियतौँ जाई । मैं तिहि दीन्हों गाँग बहाई ॥२ लोरक चाँद बहुर घर जाइ । धोबी पाछैँ लिखीं पुराइ ॥३ देवर माँझ लोर सर कादा । श्रौ दुनु मौन हुत ठाढा ॥४ तइ चाँदहि आगै ह्वै चला । लोरक वीर पाछ मा भला ॥५ चाँद कहा सो मूरख, जो अइसहिँ पतियाइ ।६ जाकर लीजइ यार मियाही, सो काहे कर पहुनाइ ॥७ पाठान्तर—रीलैण्ड्स प्रति— शीर्षक—गुफ़्तने बामन लोरक रा पाव उपतादन दर राह तीर राखी (तीनों तीर राखी जानेक बाद बामनरा लोरकस कहना) इस प्रतिम पङ्क्तियोंका क्रम ४ ७ १ २ ३ है । १- यह । २- लोर बीर यह तिरिया तोरी । ३- लोग कुटुम्प हीं आँगी जाउ । ४-लोरफ बहुरि घर अपने चा० । ५- नौनी । ६-लिखी । ७-ओडन फूट (?) बैठ हुत टाढा । ८-लोर । ९-चाँद कहा सुनु बारी लोरक अहत बहुरि को जाइ । १०-जिहर यार बियाही लीजै, तिह बरूसे पतियाइ । टिप्पणी—( ) बाच—वचन । (२) दीन्ह—दिया । गाँग—गङ्गा । (३) धोबी—सम्भवतः यह अपपाठ है । रीलेण्ड्सका पाठ 'नौनी ठीक जान पडता है । नौनी (नवनी)—नवेली युवती । पाछै—पीछा के कारण । (४) इस पक्तिके उत्तर पदका पाठ दोनों ही प्रतियोंमें समुचित रूपमें पढ़ा नहीं गया । (६) अइसहिँ—इसी प्रकार, बिना सोच समझे । पतियाइ—विश्वास कर । १०

२५८ ३१६ (रीडिंग्स २४६। मनेर १५६अ) अनदास्तने बाबन कमान व अफसोस कदन (बावनका धनुष फेंककर खेद प्रकट करना) बावन धनुफ सो दीन्ह उडारी¹। बारह बरीख बसी में नारी ॥१ इम³ माना धनुकाहि⁴ सिधि पाई। बान भरोसे जोइ गँवाई ॥२ धस लैं हौं गाँग परउँ⁵। बूडि मरउँ कै फूँकर म परउँ ॥३ अब हूँ धनुफ हाथ कस करउँ⁷। परु कंठसाय कुतारा परउँ ॥४ पर यहँ आँखि न देखत आई। लहगा सुरुझ चाँद भुलाई' ॥५ जो यह मोरी बार दियाही, माइ दीन्ह अउ बाप'' ।६ राज करो जप लोरक, चाँदहि खाइइ साँप'' ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान अन्दाख्तने बाबन तीरो कमाने खुदरा बर ज़मीं जद (बावनका धनुष-बाण भूमिपर फेंक देना)। इस प्रतिमे पंक्तियाँ ३, ४, ५ क्रमशः ५, ३, ४ हैं। १—जो दीन्ह उठारी। २—मै। ३—धनुष। ४—बान भरोसे तियै। ५—के धँस कें गंग महँ परउँ। ६—बूड़त मरउँ निकरि मन् मरउँ। ७—बरु कंठ मार कुठारी मरउँ। ८—पर यह रोख न देखउँ काई। ९—लेइगा लोरक चाँद पराही। १०—मोर। ११—लेगा करियो जरिया साँप। १२—लोर फिर एक सुरझा दिया भौरउ परा रून्धाथ। टिप्पणी—(१) बरीख—वर्ष। (२) जोइ—स्त्री पत्नी। ३१७ (रीडिंग्स २४७) बाज गुफ्तन बावन व गुजारात कर्दने लोरक व चाँदा बा विदा (१) (बावनका लौटना लोरक और चाँदासे विदा (?) की भेंट) बावन फिरि गोबर दिसि गये। लोर चाँद दोइ आगेँ भये ॥१ गइ करंका विदा दानी। माँग दान अहस अग न जानी ॥२

२५९ पान दिखावहि लीन्ह न सोई। पुरुख माँग के माँगी जोई ॥३ अस दान जग काऊ न लिया। कहि तइस जो काठ न दिया ॥४ देस देसन्तर मानुस जाइ। महरी अस बाप औ माई ॥५ ठौर ठौर जो मनुसें इहँ महँ, एक एक लेहिं ।६ घर महँ लोग सूखें मरहिं, बाहर पाठ न देंहि ॥७ ३१८ ( मनेर १५०ख ) दास्तान रवान शुदने बावन तरफ़े खानये खुद ( बावनका अपने घर लौटना ) भपर आइ राइ गुहरावा। कउतुक एक घोर दिखरावा ॥१ तिरिया एक ओ दधी उछारी। सरग हुतें जनु आछरि आई ॥२ इसी तिरिया कितहूँ नहि देखेउँ। चाँद तरायीं एक न लेखेउँ ॥३ पुरुख एक अहें जहि पासा। देखत दुहु कहूँ गयी भुर सासाँ ॥ और पिटार सब सोने भरा। अइस न जानउँ किह कँह धरा ॥५ चलहु राउ वहि मारि के, सूछे अबरइ जाइ ।६ घरहिं माझ होइ उजिआरा, अस तिरिया जो आइ ॥७ टिप्पणी—कडवकका शीर्षक विषयसे से सम्बन्ध नहीं रखता। ऐसा बान पड़ता है कि लिपिक उससे सम्बद्ध कडवक लिखना छोड़ गया है। ३१९ ( मनेर १५०ख ) दास्तान बाज गुश्तेन शुदन व आमदने राज गँगेव बर लोरक ( राज गँगेवका तैयार होकर लोरकके पास आना ) पहिल लोरक राइ घर आवा। फिर गँगेउ गइ होइ आवा ॥१ चाँद लेउँ ताहि सरग चलावउँ। सरग तरायीं माँझ यमावउँ ॥२ कहा सार तुम्ह खाँड मँभारहु। मुहि मेंड गँगेउ तुम्ह न पागुहु ॥३ एक खाँड लरिक तम लावा। फिर फाट तावर महँ आवा ॥४

५६ पाप पाप के आप उबारसि । मिल माइ कै पैं जिउ हारसि ॥५ कहसि घेर तोर हा, होइ हीँ अगसर के मुँह लाग ।६ कहा छोर सेटौं सेवक, गँगोट अइस बोल कहि भाग ॥७ टिप्पणी—(१) घर भाषा—'गुहरावा अथवा फिरावा पाठ भी सम्भव है। इस प्रसंग स्पष्ट न होनेसे पाठका निश्चय करना सम्भव नहीं है। ३२० (रीडिंग्स २४८ : बम्बई २७ ) तंग करने लोरक का कोतवाल व विद्यारानी ( लोरकका कोतवाल और विद्यारानीसे युद्ध ) तीनहुँ हाँक फिरा कोतवारा । पोलत बोलि माँछ सँदि मारा ॥१ देखि मकेरी' चितैहि न लागहिं । दुँहु मेह अनै लै चाहहिं ॥२ देहि दान औ बिनति कराहीं । कहा चलहु राजा पहँ वाहीं ॥३ कहा न सुनैं औ दान न लीन्हें । बात कहत अनउत्तर दीन्हें ॥४ लोरक चाँदहि अस मत कहई' । अस मनुखै कै बैरी मई' ॥५ लोरक खड़ग हथवासा, चाँदे धनुख चढ़ाइ ।१० छोट जन सबही मारे, जान न कोऊ पाइ' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शी र्तक—नशिश्तने जकबारियान दरमियाने राह अज्याने चाँदा व लोरक (चाँदा और लोरकके मध्यमें दानियोंका बैठना ) ! १—बैठ दानी औ कतवारा । २—मजु । ३—अकेल । ४—जावा । —दानु मह एक पै रह धावा । ६—दान देहि औ बिनय कराहीं । ७—कह । ८—छोहन । ९—अल वाहत । १०—लोर चाँदा दुहुन कहि मई । ११—अस बिनती कहि औ इट गई । १२—लोर बीर हथवासा काढ़न चाँदा धनुख चढ़ाउ । १३—छोर जन सबै सँहारे, जान न कोऊ पाउ ॥ ३२१ (अनुपलब्ध)

२६१ ३२२ (रीडैम्ब्डूस २७९; बम्बई ४५ मनेर १५९ अ) गिरफ्तार शुदने बिद्या व दस्त बुरीदने गोरक (विद्याका पकड़ा जाना और गोरकका उसका हाथ काटना) विद्यादानि¹ बीत कर गहा² । दस अँगुरी मुख मेलत³ अहा ॥१ कहा पीर मुँहि देहु⁵ जितैं दान् । जीठ छाड़ि काढ़ु मङ् कान्⁷ ॥२ मूँड़ मूँड़ि सब छारै घरे⁸ । हाथ काट अँगुरा⁹ मुँइँ परै¹⁰ ॥३ नौखंड प्रियमी सुना¹¹ न काऊ । वइस दान को देहि¹² बटाऊँ¹³ ॥४ अस कहि दानि अन्यायी होई¹⁴ । जो अस करै पाठ तस सोई¹⁵ ॥५ मुँह फारा कै¹⁶ विद्या,¹⁷ पठवा¹⁸ बेल बँधाई ।६ आपुन राउ¹⁹ फरका, विद्या²⁰ बेग हँकारहु²¹ जाइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति— शीर्षक—(ब) कुसुम्मत शुदन बाज़ गवारियान व गोरक बा घोड़ा (गोरक और जोड़ेका दानियोंकी मरम्मत करना) (म) दास्तान इज्जो इनहाज कर्दने खुद पेशो गोरक (हुदरंका कारूसे अनुनय करना)। दोनों ही प्रतियोंम पंक्ति ४ और ५ क्रमशः ५ और ४ हैं। १—(ब) बिद्या जोर, (म) हुदरं बाह। २—(म) पर कहा। ३—(म) दस अँगुरी मुँह मेलत (१)। ४—(ब म) कहइ। ५— (ब) मुहि; (म) मोहि। ६—(म) दै। ७—(ब) किय। ८— (ब म) दानूँ। ९—(ब) कहा नाक औ काट काँनूँ (म) ठावेऊं नाक और काटउँ कानूँ। १०—(ब) मूँह मूँड़ि सर खोरिया परी; (म) मूँड सुझाइ सर बोरी घरी। ११—(ब म) अँगुरी। १२—(म) परी। १३—(ब; म) प्रियभी सुनों। १४—(ब) देह (म) दह। १५—(म) न पाऊ। १६—(ब) अस अन्याई दानि न हो- (म) अइस दानि अन्याइ न हाई। १७—(म) होई। १८—(ब; म) सुरत कापी। १९—(ब) कर। २०—(ब) बुदया; (म) हुदई। २१—(म) पैठि। २२—(म) राह। २३—(म) 'विद्या' शब्द नहीं है; (ब) हुदर। २४—(ब) बुलवैहु। २५— (म) कह बाह। टिप्पणी—(१) बीत कर गहा—'पीत कर गहा' पाठ भी सम्भव है। (४) प्रियमी—पृथिवी।

१६२ (६) बहवा—मेवा। बेल—सिरफल : श्रीफल एक फल जिसका छिलका अत्यन्त कड़ा होता है। (७) हँकारहु—पुकारो। ३२३ (रीडँगड्स १५ : मनेर १५१ख) आमदने बिद्या पेशे राव ब फरियाद करदन (विद्याका रायके पास आकर फरियाद करना) कटि हाथ मुख कीन्हा¹ फारा। बाँधे बेल तिँह जोरी बारा² ॥१ इहिँ बर बिद्या आइ तुलानाँ। देखि नगर महँ परा भगानौँ ॥२ देखत लोग अचम्मै⁵ रहा। पूछतँ⁶ बात न बिद्याहिँ कहा ॥३ बिद्यहिँ राइहिँ कीन्ह पुकारा। हुत जेवनारहिँ राऊ हँकारा⁷ ॥४ बिद्यहिँ राइहिँ कीन्हि (जुहारा)⁷। पूछा राऊ कँ यह सारा¹¹ ॥५ कौन परै अस राजा, आबा देस हमार¹² ॥६ राउत पायक बँदिको, लागो जाइ गुहार¹³ ॥७ मूलपाठ—(५) जुहार। पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान रफ्ती गुप्त बूरीदने नोरक ऊ रा (नोरकका उसका हाथ कान काट लेना)। १—हाथ काटि कीन्हो मुख। २—बाँध बेल थी जोरी बारा। ३— इहँ बिध सुरर। ४—म०—सभ। ५—अचम्मो। ६—पूछहि। ७— जुहारँ। ८—पानी फफ्ती सार। —बाँउ राउ वहाँ जेवनारा। ९— जुहार राजहि जाइ जुहारा। ११—पूछ मँडारी बिकठै जस बारा। १२— मयऊँ बड़े अस राजा बिद्यह देखन्त (?) हमार। १३—दानी मार कांधवार जा मारी जाग्रद् बेगि गुहार। टिप्पणी—(१) फारा—फाना। बेल—श्रीफल सिरफल। जोरी बारा—केशको बाँधा।

२६३

३२४

(रीडिंग्स् २५१ : मनेर १६ अ) पुरखीदन राव बिदा रा, व जवाब दादने ऊ (रावका बिदासे पूछना और उसका उत्तर देना)

निधइँ आन घोर१ एक दीन्हौं । पूछहि बात२ सो आगें कीन्हा ॥१ डरनहिपुरुख सो कैसें अहा३ । कौन सँजोग कौन निधि रहा४ ॥२ एक पुरुख औ दूसर नारी५ । तीसर न कोउ नाठ औ पारी६ ॥३ मत बुध होइ पच कहत न सोई । वैं खतरी पुरुख औ जोई७ ॥४ वह रे अचूक८ पान सर मारइ । वह रन खेले९ सैरंग सँभारइ ॥५ देख सँजोग राइ तिहँ बोलेउँ१० , माँगिउ११ अजफर दान ॥६ बन मानुस सम१ जीव गँवायउँ, आपुन१२ नाकि औ कान ॥७

पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—पुरखीदने राव बुन्दै रा (रावका बुदरसे पूछना)। १—बुदर तुरी फन्दान । २—बात पूछि । ३—टर तिव पुरूस केर कस आही । ४—रही । ५—एक पुरुस दूसर इइ भारी । ६—तस न कठनों नाउ बारी । ७—इप बुद्ध कै पच जग मोहइ । रेन माँझ चाँद अस सोहइ ॥ ८—वह अचूक । ९—वह सुन गारी । १०—दवी सँजोग राइ मत मुहि कहें । ११—बिह माँगे बीउ । १२—उपरी ।

३२५

(रीडिंग्स् २५२ : मनेर १६ ब) मुशावरत कर्दने राव करका बा दानायाने खुद रा (राव करंका का अपने मन्त्रियोंसे परामर्श करना)

पाठ सुनत१ सब मिले समाने । कै तुम्ह२ नरपइ भये अयाने ॥१ जो परदेसी एक नर होई३ । रुख जो मिलै मान लें सोई४ ॥२ यहिफर साइन को सुधि पावइ । दयीं सँजोग दख न चखावइ ॥३ जानइ बात सबै संसैसारा । एक हारीं औ होई मुँह कारा ॥४ काई पाच दइ वह हँकवाई । अस खतरी जो रहु अरुझाई ॥५

२१४ यह पर साथ बुलाइ, अमरित बचन सुनाइ ९।६ गाँउ ठाँउ सब वहँकौं' दीजइ नित भाषइ तित जाइ" ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीषस—दास्तान तलबीने कर्दने बल्लभ रायतने मर्दुमान (जपन काज मिपासे पद्यमर्थ) १—सुनी। २—सबाने। ३—तुम्ह पुनि। ४—अपाने। ५—को परदेसी भाषा हाई। ६—एकहि एक मियरे होई। ७—सबी लैबोय बर बहि वमसनावइ। ८—दार। ९—सुहाइ। १ —विह। ११—नित नित भाषइ तुर आइ। ३२६ (री०कण्डम १५३। मनेर १६१अ) दिरस्तायने राव करका यह जुभारदाशन रा बरे गोरक (राव करंकरका दस ब्राह्मनोंको कोरबके पास भेजना) बाँमन दस बिप्रबंस बुलाये। बोल' बाष दै राठ' पठाए ॥१ जिहँ पर' आवहँ तिहँ पुन आनहु। जो यह कहँ सोइ तुम्ह मानहु ॥२ कही दान्ति हुत यह अन्यामी' । नाँक कान भल कूँचि कटाई ॥३ और जो मारे यह कोतबारा। तिहि औगुन है नियाउ तुम्हारा ॥४ राह पूर वह तुम्ह हँकराबै । जब चित पावई तब उठ जाई ॥५ इम राया" के परजा, बिप्रबंस पण्डित सब आइ" ॥६ दिस्टि पसार देखों को पावइ, इसै जूफरा काह" ॥७ पाठान्तर —मनेर प्रति— शीषस—दास्तान तलबीदने राव जुभारदाषन (रायका ब्राम्हनोंको बुलाना) १—बाध (?)। २—राड। ३ —विधि। ४—विधि। ५—कत। ६ —कहेउ बानी हुते अन्यायी। ७—कीन्ह कटाइ। ८—बुलवाइ। —ओ तिह। १ —बाध (?)। ११—पुनि नित भाषइ तुम्ह आई। —राभा (?)। १३—बोहि। १४—दिरिट अपार देखको पारे, पैन जगत कह आइ ॥

२४५ ३२७ (रीडिंग्स २५५; बम्बई २७) आमदने जुम्लारदारान व गुफ़्तन लोरक रा (ब्राह्मणोंका लोरकमे आकर कहना) बाँभन जाइ सो दीन्हि असीसा । बात सुनत सब' उतरी रीसा ॥१ लोरक कहा चाँ० कस कीजइ । इहँ बाँभन का' उत्तर दीजइ ॥२ बहुतै जन हम इहँके मारे । मूँड़ फाट के दीन्ह अवाय" ॥३ जं पर राजा लागि गुहारा । क्षस मरत कै दयी उपारा' ॥४ राजा आइ मल_तहँ नियाइ । सुनफे घास तिहिं कइसि पठाई ॥५ मता जो इम तुम उपजं, चाँदा अउर न काऊ आह' ।६ माइ पाप बन्धु कोउ नाहीं, बाँभन पूछहु काह' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—रसीदने जुम्लारदारान बर लोरक व चाँदा (लोरक और चाँदाके निकट ब्राह्मणोंका आना) १—बाँभन दीन्हि आ० अशीसा । २—मन । ३—इ पहुनहि (?) कस । ४—बहुत लोग । ५—मूँ० मुंड़ार जो रीस निसारे । ६—जै ऊपर अब उठे गुभारी । सूझि मरै जो लागि गुहारी ॥ ७—राउ बरा औ महै निवाइ । धन पान दइ बाघ पठा ॥ ८—सों पर भल आहि । ९—भा० बपु लोग न कुटुँबा पहुन (?) पुछ अब जाहि ॥ ३२८ (रीडिंग्स २५५ बम्बई २८; मनेर १९१ख) बाज आमदने जुम्लासदारान बर लोरक कलामे राव करका (ब्राह्मणोंका आकर लोरक से राव करका का सन्देश कहना) एक बाँभन गा फिर दस आये । बचन राइ कै आइ सुनाये ॥१ चलहु लोर अपने पी' धारहु । हम जियतैं जीउ जिन हारहु ॥२ पठा लोर सँजोइ उतारा । आइ करफ्स राइ जुहारा ॥३ बहुतै बैँरँ चलि हम आये । राजा सोक घरी सँवामे ॥४ नैन न देखा सुनौं न काऊ । दुइँ महँ दान लीन्ह बटाऊँ ॥५

२६६ वरइ^{१३} बिरोधैं^{१४} नरबइ, छाड़ि चलै घर बार। ६ इमरे अकेले दो मनई, न भिखारी फुटबार^{१५} ॥७ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति- शीर्षक—(ब) गुफ्तने शुमारदारान दर लोरक व पौदा करदन रवान करदन पेश राजे (लोरक और चाँदेसे ब्राह्मणोंका एकके पास एकका चलनेको कहना) ; (म)—रफ्तने लोरक पीछे राज करका (लोरकका राज करकाके सम्मुख जाना) दोनो प्रतियोंमें पंक्ति १ और २ क्रमशः २ और १ हैं। १—(ब) नै पुनि। २—(ब) आपुन पा; (म) आपुन पउ। ३—(ब म) हम बिफरें मन महँ किन हारहू। ४—(ब) नेवरि। ५—(ब) सँबो (म)—सँबोह। ६—(ब) जाइ करका पठ; (म) पठ करका जाइ दुआरा। ७—(ब म) भुवि। ८—(ब) चली (म)—पउत। ९—(ब) राह सेवै हम (म) रे सो हम। १०—(ब म) रुताये। ११—(म) दुँहु महँ एक थान ले राज; (ब) दुँह मह एक ले थान राउ। १२—(ब म) बीर। १३— (म) बिरोधैं। १४—(ब) हमरे अकेले आह दो जन, माइ बीर घरबार, (म) हम अकेले दोइ मानुस बैरी भए सर्वखार। टिप्पणी—(७) मनई—मनुष्य व्यक्ति। ३२९ (रीडींग्स १५६ बम्बई २१ : मनेर १६२ (१) क) जबाब दादन राव मर लोरक रा (रावका लोरकको उत्तर) सुनि राजे अस उतर दीन्हा। जो हम सूझी सो^{१} तुम कीन्हाँ ॥१ अर्थ कहु मो पात कराऊँ^{२}। के पारी कें घर फिराऊँ^{३} ॥२ सीस नाइ लोरहिं^{४} अस कहा। गरु नरिन्द^{५} राठ तूँ अहा ॥३ मेदिन कई बड़ा हुँत राऊ। राइ दुहुँ हैं बड़ा नियाऊ ॥४ तुम्ह नरबइ नियाठ सब मानहु। जो धुर करहिँ देस घर आनहु^{६} ॥५ मारग चले यहैँ दिसि, लोग असीस तोहि। ६ जो रे संतापइ कोइ, सा हत्या पुनि मोहि^{७} ॥७