भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

१९६ लोरिकने कहा—उसकी व्यवस्था मैं कल कर दूंगा। आज खेल लेने दो। यह सुनकर मीमरुने रजईसे कहा—न जाने कहाँका मूर्ख आकर मजाक कर रहा है। उसे धक्का देकर निकाल बाहर करो। यह सुनकर रजई लोरिकके पास आया और उससे भिड़ गया। पर वह लोरिकका कुछ न बिगाड़ सका। तब दूसरे मल्लाखिये भी आ जुटे पर लोरिकने उनको झटक दिया। अन्तमें मीमरु स्वयं लोरिकसे आ भिड़ा। उसे भी लोरिकने देखते-देखते परास्त कर दिया। यह देखकर जो लोग वहाँ थे वे भागकर हरदी पहुँचे और जाकर सारा हाल राजासे कहा। राजाने यह सुनकर अपनी सारा सेनाको तत्काल तैयार होनेका आदेश दिया। जब चन्दाने राजाको सेना लेकर आते देखा तो स्वयं भी अपनी सखियोंके साथ नदी के किनारे पहुँची और राजाको न मारनेका जो वचन लोरिकने दिया था उसे दिला- कर पीछे वापस ले जानेको प्रेरित किया और साथ ही लोरिकके क्रोधको भी शान्त किया। उस समय तो राजा वापस लौट आया। मगर लोरिकका हरदीमें रहना अपने लिए खतरेसे खाली न देख मन्त्रीसे कोई ऐसा उपाय करनेको कहा जिससे यह शत्रु सहज ही ढक जाय। यह सुनकर मन्त्रीने कहा—इसका सीधा उपाय है। हर साल नेठरपुरका हरेश भुताहा हरदी आता है और कई मासकी एकत्र की गयी सामग्री एक ही दिनमें समाप्त कर देता है और उससे सारे हरदीवासी परेशान हो उठते हैं। अतः इसे उसीके पास भेज देना चाहिए। उससे कहा जाय कि हरेशने नेठरपुरमें म्नेह राजकुमारको बन्दी कर रखा है। उसे छुड़ा लाओ। इस योजनाके अनुसार लोरिकसे नेठरपुर जानेको कहा गया। लोरिक घोड़ेपर सवार होकर नेठरपुर पहुँचा। आगेकी कथा उपलब्ध न हो सकी। जे डी बेगलरने अपने १८७१-१८७३ ई के पुरातत्त्वान्वेषण यात्राके विवरणमें बड़ागाँव (जिला शाहाबाद बिहार) के प्रसंगमें लोरिक-चन्दाकी कथा संक्षिप्त रूपमें दी है।१ उसमें आरम्भिक कथाओं यथा—लोरिकका जन्म, मंजरीके विवाह आदिकी कथा नहीं है। उन्होंने केवल लोरिक चन्दाके प्रेमकी कथा दी है। उसमें नेठरपुरवाली कथा भी नहीं है; फिर भी उससे कथाके अन्तका कुछ आभास मिलता है। बेगलरवाले रूपको डब्ल्यू. क्रूकने अपनी पुस्तक पापुलर रेलिजन एण्ड फोक लोर आफ नार्थनं इण्डियामें२ और वेरियर एलविनने फोकलोर आफ छत्तीसगढ़ में३ लगभग अविकल रूपमें उद्धृत किया है। वहींसे यह हिन्दीके कतिपय ग्रन्थोंमें भी उद्धृत हुई है। उसके अनुसार कथा इस प्रकार है :— १ आर्कोलाजिकल सर्वे रिपोर्ट १. ८-७ पृष्ठ ८ पृ. ७९-८ । २ खण्ड १,पृ ११७-१६१ ३ पृ ३१ ।

किसी समय शिवभर नामक एक व्यक्ति रहता था जिसे पार्वती ने नपुंसक हो जानेका शाप दे दिया था। शाप देनेके कारणको बेगलरने बताना उचित न समझकर नहीं दिया है। पार्वतीका शाप पानेसे पूर्व बचपनमें ही उसका विवाह हो गया था। यथा समय जब उसकी पत्नी चन्दन युवती हुई तो उसका गोना हुआ और शिवभर अपनी पत्नीको अपने घर लिवा लाया। शिवभरके नपुंसक्त्वके कारण उसकी पत्नी उससे असन्तुष्ट रहने लगी। उसने अपने गाँवके ही एक व्यक्ति चोरीसे सम्बन्ध स्थापित कर लिया और उसके साथ घरसे भाग निकली। शिवभरने उसका पीछा किया और उन्हें जा पकड़ा। लेकिन उसकी पत्नीने उपहास करते हुए लौटनेसे इन- कार कर दिया। बोली—जब मैं तुम्हारे घर थी तब तो तुमने परवाह न की और अब मेरे पीछे बेकार भाग रहे हो। लेकिन शिवभरने उसकी एक न सुनी। फलतः शिवभर और चोरी दोनोम घोर युद्ध हुआ और शिवभर हार गया। चोरी और चन्दन आगे चले। बड़गाँवके निकट जहाँ एक मुण्डहीन मूर्ति पड़ी है गङ्गापतिया नामक जुआरियोंके सरदारसे उनकी भेंट हुई। वह जुआगार गाँवका रहनेवाला था। चोरीने उसके साथ जुआ खेलनेकी इच्छा प्रकट की और दोनों खेलने बैठ गये। जुएमें चोरीके पास जो कुछ था वह तो हार ही गया साथ ही चन्दनको भी हार गया। जब गङ्गापतिया चन्दनको पकड़ने बढा तो चन्दन बोली—मानती हूँ कि मैं दाँवपर लगायी गयी थी और मैं हारी गयी हूँ किन्तु मेरे तनपर जो आभूषण हैं, वे दाँवपर नहीं लगाये गये थे। अतः उन आभूषणोंके साथ अभी एक दाँव और खेलो। जुआरी खेलने बैठ गया। चन्दन अपने प्रेमी चोरीके पीछे और जुआरीके सामने जुआ देखनेके बहाने जा खड़ी हुई। खेल देखनेमें लीन होनेका बहाना करते हुए उसने अपनेको इस ढंगसे विवस्त्र कर दिया मानों वह अनजाने अकस्मात् हो गया हो। जुआरी उसके रूप सौन्दर्यपर इस प्रकार मुग्ध हुआ कि उसकी ओरसे उसकी आँख हटती ही न थीं। फलतः वह हारने लगा। चोरीने न केवल अपना सब हारा हुआ धन जीत लिया वरन् उसके पास और जो कुछ भी था वह भी ले लिया। अन्तमें हार मानकर जुआरीने खेलना बन्द कर दिया। तब चन्दनने सामने आकर चोरीसे अपनी कारवाई कह सुनाइ और बताया कि जिस तरह वह उसे कञ्जाई औरतोंसे खेल रहा था। अन्तमें बोली कि इस दुष्टको मार डालो ताकि वह डींग न हाँक सके कि उसने मुझे विवस्त्र देखा है। चोरी बड़ा बली था। उसकी तलवार दो मनकी थी और उसका नाम था विज्ञाधर। एक ही झटकेमें उसने जुआरीका सर अलग कर दिया जो जुआगारमें जा गिरा और धड़ जहाँ वह बैठा था वहीं पाषाणयी हो गया। तबसे वहीं उसके शरीरके दोनों भाग पत्थर बने पड़े हैं। चोरी कुर्यरकटई नामक आकेरा नटका था। उसका विवाह भगोरी गाँव की जिसे अब रजोकी कहते हैं और वह हजारीबागसे बिहार जानेवाली सड़कपर स्थित

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है, एक लड़कीसे हुआ था। किन्तु उसकी पत्नी छठमैना अभी बच्ची थी और उसका गौना नहीं हुआ था। उसके एक बहन थी, जिसका नाम छुरी था। गोरीके एक भाई था जिसका नाम सेमरू था। अनाथ होनेके कारण उसे गोरीके पिताने अपने बेटेकी तरह पाला था। वह अगोरीके पास ही पाली नामक गाँवमें रहता था। गोरी और चन्देन दोनों हरहुंग पहुँचे। मुँगेरसे उत्तर वह जो बिजुकी मस्जिदपर स्थित था। उन्होंने वहाँके राजाको हराकर देश जीत लिए। हारे हुए राजाने कलिंगके राजासे सहायता ली और गोरीको गिरफ्तारकर एक कोठरीमें बन्द कर दिया। वहाँ उसे बिठाकर उसके हाथ-पैरोंमें कील ठोंक दिये गये और उसके छातीपर भारी सील रख दिया गया। इस तरह वहाँ वह बहुत दिनोंतक पड़ा रहा। अन्तमे आराधना करनेपर दुर्गा प्रसन्न हुईं और उसे छुटकारा मिला। छूटनेके बाद उसने राजासे फिर लड़ाई की और हरहुंगको जीत लिया और चन्देनसे उसका मिलन हुआ। वहाँ उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ और वे वहाँ बहुत दिनोंतक रहते रहे। एक दिन उनके मनमें स्वदेश लौटनेकी इच्छा जाग्रत हुई और वे बहुत सा धन लेकर पाली लौट आये। इस बीच उसके पोष्य भ्राता सेमरूको लोगोंने मारकर उसकी गायें और धन- दौलत लूट लिया था। उसके एक लड़का था। उसका परिवार बड़े कष्टसे जीवन बिता रहा था। गोरीकी पत्नी भी सयानी होकर सुन्दर युवती हो गयी थी और अपने मायकेमें ही कष्टके जीवन बिता रही थी। गोरीने पहुँचकर प्रचार किया कि दूर देशका एक राजा आया है। रूप इतना बदल गया था कि कोई उसे पहचान न सका। इस प्रकार अपनेको छिपाकर उसने अपनी पत्नीके सतीत्वकी परीक्षा लेनेका निश्चय किया। फलतः यह जानकर कि उसके शिविरमें दूध बेचने आनेवाली स्त्रियोंमें उसकी पत्नी भी है और उसे पहचानकर (उसकी पत्नीने उसे नहीं पहचाना) उसने अपने शिविर आनेके मार्गमें एक धोती फैला दी ताकि कोई भी उसे रौंदे बिना न आ सके। दूसरे दिन प्रातःकाल, जब औरतें दूध बेचने आयीं तो उसने अपनी पत्नी (चन्देन) से कहा कि उनसे लपककर आनेको कहे। छठमैना चन्देनके कहनेपर थोड़ीतक तो तेजीसे आयी मगर वहाँ आकर वह रुक गयी। दूसरी औरतें उसपर चलती चली गयीं। छठमैनाने धोतीको रौंदकर आनेके सिवा कोई रास्ता न देखकर धोती हटा देनेके लिए कहा। यह देखकर गोरी बहुत प्रसन्न हुआ। जब वह दूध बेच चुकी और दाम माँगने लगी तो गोरीने उसकी टोकरीम जवाहरात रखकर चावलसे ढक दिया। बिना किसी प्रकार सन्देह किये वह लेकर चली गयी। घरपर उसकी बहनने टोकरी खाली करते हुए उन जवाहरातोंको देखा और अनुमान किया कि उसने उन्हें दुराचार द्वारा प्राप्त किया है। तदनुसार वह छठमैनापर आरोप करने लगी। छठमैनाने जवाहरातोंके प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। अन्तमें दोनोंने सन्देह दूर करनेके लिए एक साथ जानेका निश्चय किया। दूसरे दिन वे दोनों साथ गयीं। छुरीने गोरीको पहचान लिया और तब वास्तविकता प्रकट हो

२९९ गयी। लोगोंके हर्षका पारावार न रहा। लोरीको अपनी स्त्रीकी उपेक्षा करने और रखैलके साथ सुखपूर्वक रहनेपर काफी फटकार सुननी पड़ी। अन्ततोगत्वा व्यवस्था ऐसी हुई कि लोरीको अपनी रखैल छोड़नी न होगी। इस बीच लोरीके भतीजेने जब अपनी चाचीके दुराचारकी बात सुनी तो वह बड़ा बिगड़ा और लोरीसे लड़नेकी तैयारी की। घरपर हुर्की और सतमैनाको न पाकर वह और भी क्रुद्ध हुआ और उसने लोरीपर आक्रमण कर दिया। बहुत देरतक लड़ाई होती रही। लोरी परास्त हो गया और अपना जीवन खोने ही वाला था कि हुर्की और सतमैना भागी हुई वहाँ पहुँचीं और वास्तविकता प्रकट की। लड़ाई तत्क्षण बन्द हो गयी। लोरी अपनी प्रजापर न्यायपूर्वक शासन करने लगा। उसने कृषिको इतना प्रोत्साहन दिया कि रसोलीके आस-पासके जंगलोंको भी उपजाऊ भूमि बना दिया। फलतः पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ोंके रहने योग्य कोई जगह ही नहीं रही। सभी पशु पक्षी और कीट-मकोड़ोंने इन्द्रसे जाकर लोरीकी शिकायत की। लोरीको अपनी प्रजापर न्यायपूर्वक शासन करते देख इन्द्रको लगा कि उसे हानि पहुँचाना उनकी शक्तिसे बाहर है। जबतक वह कोई कुकर्म न करे, उसको हानि पहुँचाना सम्भव नहीं है। अतः उन्होंने दुर्गासे सलाह की। लोरीसे पापरत करनेके लिए दुर्गाने चन्दैनका रूप धारण किया और जिस तरह चन्दैन नित्य भोजन ले जाती थी भोजन लेकर लोरीके पास पहुँचीं। लोरीको इस मायाजालका कुछ ज्ञान न था। उसने देखा कि आज तो चन्दैन नित्यसे अधिक सुन्दरी लग रही है, वह उसके सौन्दर्यपर विमोहित हो गया। भोजन छोड़कर उसे आलिंगन करने लगा। उसने शरीर छुआ ही था कि दुर्गाने उसे पथभ्रष्ट जानकर कसकर एक तमाचा दिया, जिससे उसका सिर घूम गया। दुर्गा तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। लोरीको यह देखकर अत्यन्त लज्जा आयी और खेद हुआ। उसने काशी जाकर मरनेका निश्चय किया। उसके सारे सम्बन्धी भी मोक्षवश उसके साथ गये। वहाँ वे सभी निद्राभूत हो मणिकर्णिका घाटपर पत्थर बने पड़े हैं। • मिर्जापुरी रूप मिर्जापुर जिले (उत्तर प्रदेश) में प्रचलित लोरिक और चन्दानी कथाका रूप जे० सी० नेस्फील्डने कलकत्ता रिव्यूमें प्रकाशित किया था। उसे लखनऊके दैनिक पायोनियरने अपने १९ मार्च १८८८ के अंकमें उद्धृत किया है। उक्त अनुसार यह कथा इस प्रकार है— गंगाके दक्षिणी किनारेपर स्थित रिसोंकोट्का राजा चेरो जातिका मकरा दुर्गतराय था। गंगाके उत्तरी किनारेपर रिसोंसे २ ३ मील दूर गौरा नामक एक दूसरा कोट था। वहाँ अहीर जातिका लोरिक नामक एक वीर रहता था। दोनों परस्पर घनिष्ठ मित्र थे।

कोई OCR पाठ नहीं।

लोग भागते हुए जब भरकुम्बी दर्रेके पास पहुँचे तो मंजरीने लोरिकसे अपने साथ लायी पिताकी साँडका प्रयोग करनेको कहा । किन्तु लोरिक न माना और अपनी ही साँड़से काम लेता रहा। जब उसकी साँड़ पत्थरकी चट्टानसे टकराकर दो टुकड़े हो गयी तो हारकर उसे मंजरीकी लायी हुई साँडको लेना पड़ा। उसके लगते ही पत्थरके चट्टानके टुकड़े-टुकड़े हो गये और लोरिक उसकी सहायतासे शत्रुओंको मार भगानेमें सफल रहा। इस प्रकार विजयपूर्वक वे लोग मंजरीको अपने घर ले आये।

भागलपुरी रूप

शरच्चन्द्र मित्रने अहीरोंमें दुर्गाकी पूजाके प्रचलनपर विचार करते हुए लोरिककी कथा इस प्रसंगसे दी है कि लोरिकने ही उसका आरम्भ किया था। उनकी दी हुई कथा स प्रकार है — लोरिक गौरका निवासी ग्वाला था और दुर्गाकी निरन्तर आराधना कर उनका प्रिय भक्त बन गया था। उसकी पत्नी माँजर ज्योतिष विद्यामे पारंगत थी। अकस्मात् उसे एक दिन अपने विद्या बलसे ज्ञात हुआ कि उसका पति लोरिकका उसीके गाँवके हीनजातीय राजाकी बेटी चानेनके साथ गुप्त प्रेम-सम्बन्ध चल रहा है। अपने विद्या बलसे उसे यह भी मालूम हुआ कि उसी रातका उसका पति चानेनको लेकर भाग जाने वाला है। उसने यह बात तत्काल अपनी सासको बतायी और कहा—आज धान इतनी देर तक कूटा जाय ताकि खाना बनानेमें देर हो जाय और अधिक-से-अधिक तरहकी चीजें बनायी जायें जिससे खाना तैयार होनेमें और भी देर हो। इस तरह खाना बनानेमें रात बहुत बीत गयी। जब सबेरा होनेको आया तब घरके लोग सोने गये। लोरिक भाग न जाय, इसलिए माँजरने उसे अपनी साड़ीसे बाँध दिया। बाहर जानेका रास्ता बन्द करनेके निमित्त उसकी मा दरवाजाके सामने खाट डालकर सोयी। जब राजाकी बेटी चानेनन उस पेड़के नीचे जहाँ लोरिकने मिलनेका वादा किया था उसे नहीं पाया तो बहुत घबरायी और दुर्गाका स्मरण कर उनसे सहायता की याचना की। दुर्गाने लोरिकको ले आनेका वचन दिया और कहा कि अगर लोरिकके आनेमें देर हुई और वह सबेरा होनेसे पहले न आ सका तो मैं रात सातगुनी कर दूँगी। पश्चात् दुर्गाने छप्पर फाड़कर लोरिकके लिए भाग बना दिया ताकि वह अपनी प्रेमिकाके साथ भाग सके। इस प्रकार दोनों प्रेमी नगरसे निकल कर हरदीके लिए रवाना हुए। रास्तेमें चानेनने कहा—जब तक तुम मुझे अपनी पत्नी न बना लोगे तब तक मैं तुम्हारी थालीमें नहीं खाऊँगी। निदान बहुत सोचोके पश्चात् लोरिकने चानेनके माथेमें सिन्दूर पहना दिया। यह तो विवाहका द्योतक मात्र था। वास्तविक विवाह तो पीछे देवी दुर्गाने अपनी सात बहनोंकी सहायतासे किया।

१ क्वार्टर्ली जर्नल आव द मिथिक सोसाइटी भाग ३ पृ १९३-१३ । ६१

४२ एक दिन रातको चानैन एक पेड़के नीचे सो रही थी कि उसे एक साँप ने डँस लिया और वह मर गयी। लोरिक उसके वियोगमें इतना दुखी हुआ कि चिता बनाकर चानैनके शवके साथ स्वयं जा बैठा और आग लगा दी। किन्तु तभी अदृश्य शक्तिने आकर उसकी अग्नि बुझा दी। लोरिकने पुनः आग लगायी और फिर उसी अदृश्य शक्तिने उसे बुझा दिया। यह क्रम कुछ देर तक चलता रहा। आकाशमें देवता यह देखकर बहुत चिंतित हुए कि एक पति अपने दिवंगत पत्नीकी चिता पर जल मरनेका प्रयत्न कर रहा है। अतः उसे इस कार्यसे विरत करनेके लिए उन्होंने दुर्गाको पृथ्वी पर भेजा। दुर्गा बुढ़ियाका रूप धारण कर लोरिकके पास आयीं और उसे समझाने लगीं कि वह चितापर न जले। किन्तु लोरिक अपने निश्चयसे टससे मस न हुआ। अन्ततोगत्वा हार मानकर दुर्गाने उसकी पत्नीको जीवित करनेका वचन दिया और जिस साँपने चानैनको डँसा था उसे बुलवाया। साँपने आकर घावसे अपना सारा जहर चूस लिया और चानैन पुनः जीवित हो गयी। दोनों प्रेमी वहाँसे आगे बढ़े और रोहिनी पहुँचे जहाँ महापतिवा नामक सुनार राज्य करता था। उस राजाके कर्मचारियोंने वहाँ उन्हें घेर कर महलमें चलकर जुआ खेलनेका आग्रह किया। राजा महाधूर्त था। उसने अपने बनाये हुए पासेसे जुआ खेलकर लोरिकका सब कुछ यहाँ तक कि उसकी सुन्दरी पत्नी चानैनको भी, जिसपर कि उसकी आँख गड़ी हुई थी, जीत लिया। किन्तु चानैनने कहा—जब तक मुझे खेलमें न हरा लो मैं आत्मसमर्पण न करूँगी। निदान फिर खेल आरम्भ हुआ। इस बार चानैनने बनावटी पासेको उठाकर फेंक दिया और अपने पासेसे खेलने लगी। राजाने जो कुछ जीता था उसने वह सब धीरे-धीरे जीत लिया। रोहिनीसे वे दोनों हरदी पहुँचे। लोरिक वहाँके राजाके पास गया। किन्तु उसने समुचित अभिवादन नहीं किया। इससे राजा बहुत रुष्ट हुआ और बोला—हमारी गायें चराना स्वीकार करो तभी तुम हमारे राज्यमें रह सकते हो। लोरिकने भी क्षुब्ध होकर उत्तर दिया—मैं तुम्हारी गायें तभी चराऊँगा जब तुम्हारी बेटी स्वयं दूध दुहाने आया करे। फलतः दोनोंमें युद्ध छिड़ गया और सात दिन सात रात निरन्तर युद्ध होता रहा। राजाकी बहुत बड़ी सेना मारी गयी। चानैनने दुर्गाकी मनौती मानी कि जीत होनेपर मैं अपने प्रथम जात पुत्रकी भेंट चढ़ाऊँगी। फलतः दुर्गाने आकर लोरिककी सहायता की और उसकी विजय हुई और हरदीके पराजित राजाने लोरिकको अपना सहगामी राजा घोषित किया। इस प्रकार लोरिक बारह बरस तक हरदीमें राज करता रहा। हरदीमें राज करते हुए एक दिन रातमें लोरिकने एक बुढ़ियाको बुरी तरह रोते सुना। उसका पुत्र किसी कामसे बाहर तीन दिनके लिए शहर गया हुआ था। यह रोना सुनकर उसे ध्यान आया कि इन बारह बरसोंमें उसकी माँ और पत्नीने

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कितना रोया-कलप किया होगा । इसका ज्ञान होते ही वह तत्काल अपनी सुन्दरी प्रेयसी चानैनको लेकर अपेन घर चल पड़ा । घर पहुँच कर अपने घरके पास ही उसके लिए दूसरा घर बनवाया । यह कथा भागलपुर गजेटियरमें भी प्रायः इन्हीं शब्दोंमें अंकित है ।१ यत्र- तत्र थोड़ा विस्तार और कुछ नयी सूचनाएँ हैं । उक्त गजेटियरमें यह कथा हण्टर द्वारा संगृहीत स्टैटिकल एकाउण्टसे उद्धत की गयी है ।२ गजेटियरके अनुसार लोरिककी पत्नी मंजरने अपने पतिको एक दिन चानैनके साथ प्रेम-क्रीड़ा करते देख लिया । तब घर आकर उसने ज्योतिष ग्रन्थोंको देखा और उसे ज्ञात हुआ कि उसका पति उसी रातको भाग जानेकी योजना बना रहा है । इस ग्रन्थमें चानैनके पिताका नाम सहदीप माहार बताया गया है । गजेटियरमें दूसरी नयी बात यह है कि जब चानैन लोरिकको उस पेड़के नीचे नहीं पाती जहाँ उसने मिलनेका वादा किया था, तो उसपर डाक रंगसे पाँच चिह्न बनाकर पीछे हटकर दुर्गाका स्मरण करती है । तीसरी नयी सूचना गजेटियरमें यह है कि जब हरवीका राजा पराजित हो गया तो लोरिकसे बोला कि यदि तुम मेरे प्रतिद्वन्द्वी हेरवाके राजाका सिर काटकर ला दो मैं तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूँगा । लोरिकने इसे स्वीकार कर लिया है और उसे पूरा कर दिखाया । अन्तिम नयी ज्ञातव्य बात गजेटियरमें यह है कि बुढ़ियाको रोते देखकर लोरिकने अपनी प्रेयसीको उसका कारण जाननेके लिए भेजा और स्वय भी उसके पीछे पीछे छिपकर गया और उन दोनोंकी बात सुनने लगा । बुढ़ियाने बताया—मेरा बेटा परदेस गया है । तीन दिनसे नित्य भोजन बनाकर उसकी प्रतीक्षा करती हूँ कि वह आता होगा किन्तु वह अबतक नहीं आया । निराश होकर तीन दिनके एकत्र भोजन को देखकर रो रही हूँ । चानैनने यह सोचकर कि लोरिकको यह बात मालूम होगी तो हो सकता है उसे भी अपने माँ और पत्नीकी याद आ जाये और वह उनके पास जानेको आतुर हो उठे । अतः वह बुढ़ियासे बोली—यदि लोरिक उसके रोनेका कारण पूछे तो वह अपने रोनेका यह कारण कोई दुर्व्यवहार बताये । लोरिकने छिपकर सभी बातें सुन ली थीं । अतः जब चानैन बाहर आकर बातें बनाने लगी तो उसने उसपर विश्वास न किया और बोला—अगर तीन दिनके लिए जरूरी कामसे आनेपर माँ अपने बेटेके लिए इस तरह रो सकती है तो मेरी माँ और पत्नी मेरे लिए, जो अपन आप वनवास लेकर यहाँ आ बैठा है, कितना रोती होंगी । और तत्काल अपनी प्रेयसीके साथ घर लौट आया ।

मैथिल रूप लोरिक-चाँदकी कथाका जो रूप मिथिलामें प्रचलित है वह प्रकाशित रूपमें अभी


१—पृष्ठ ४८-५ । २—इस पुस्तकका पृष्ठ निर्देश गजेटियरमें नहीं दिया गया है ।

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तक हमारे देखने में नहीं आया। बहेडा (जिला दरभंगा) निवासी ब्रजकिशोर वर्मा ने हमें सूचित किया है कि यह कथा मिथिलामें लोरिकानि अथवा महरायके नामसे प्रसिद्ध है। इस कथाके सात खण्ड हैं और एक-एक खण्ड आठ-आठ घण्टेमें गाये जाते हैं। इसके एक खण्डका नाम चनैन-खण्ड है। चन्दायमकी कथा इसी खण्डसे सम्बन्ध रखती है। अतः उन्होंने हमें केवल इसी खण्डका सारांश लिख भेजा है। वह इस प्रकार है— अगौरा नामक गाँवके राजाका नाम सहदेव था। उनके हलवाहेका नाम बूचे राउत और हलवाहेकी पत्नीका नाम कुवैन था। उन दोनोंके लोरिक और साँवर नामक दो बेटे थे। लोरिक बड़ा और साँवर छोटा था। ये दोनों छिल्हउके अखाड़ेमें कुश्ती खेला करते थे। लोरिक अत्यन्त बलवान और विशालकाय था। उसकी तलवार अस्सी मनकी थी। उसके तीन साथी थे—राउत धोबी, बप्पा चमार और शाह गुलाम। गौरा नामक एक दूसरे गाँवका राजा उसरा पँवार था जो अत्यन्त अत्याचारी और चरित्रहीन था। उसके राज्यकी प्रत्येक नवविवाहिताको, विवाहके पश्चात् पहली रात उस पँवार राजाके साथ बितानी पड़ती थी। उसी गाँवमें साठ गायोंकी स्वामिनी पद्मा मौहरि रहती थी। उसके मँजरि नामकी एक अत्यन्त रूपवती बेटी थी। उसरा पँवारकी आँखें उसपर लगी हुई थीं। वह इस प्रतीक्षामें था कि उसका विवाह हो और वह उसकी अंकशायिनी बने। अन्त- तोगत्वा मँजरिका विवाह लोरिकके साथ निश्चित हुआ और लोरिक अपने वीर पिता और योद्धा साथियोंके साथ मार्गमें अनेक युद्ध जीतता हुआ गौरा आया। धूम- धामके साथ उसका विवाह मँजरिके साथ सम्पन्न हुआ। तदनन्तर पँवारने लोरिकको मारकर मँजरिको छीन लेनेके अनेक प्रयत्न किये पर वह सफल न हो सका और लोरिकके हाथों मारा गया। लोरिक विपुल धनराशि प्राप्त कर अपनी पत्नी मँजरिके साथ अगौरा लौट आया। अगौराके राजा सहदेवके चनैन नामक एक रूपवती पुत्री थी। उसका विवाह शिवचर नामक राजकुमारसे हुआ था। वह बहुत बली था। एक दिन जब वह खड़ा होकर मूत्र त्याग कर रहा था उसी समय इन्द्र आकाश मार्गसे जा रहे थे। मूत्रके कुछ छींटे उनपर जा पड़े। फलतः इन्द्रने क्रुद्ध होकर शिवचरको नपुंसक हो जानेका शाप दे दिया और वह काम-शक्तिसे रहित हो गया।^१ अपनी इस अवस्थासे दुःखी होकर शिवचरने घर त्याग दिया और देवरा नदीके तटपर कुटी बनाकर रहने लगा। वहीं रहकर वह अपनी साठ गायोंको चराया करता। चनैन जब यौवनावस्थाको प्राप्त हुई और शिवचरका अपनी ओर आकृष्ट होत न पाया तो वह स्वयं एक दिन सोलहों शृंगार कर उसकी कुटीपर पहुँची।

१ चनैनकी दृष्टिसे नपुंसकताके इस कारणकी बात आजमगढ़के हुपनाम भिक्षुने भी हमसे कही थी। इससे जान पड़ता है कि भोजपुरी क्षेत्रके भी कुछ भागमें सम्भवतः यह कथा प्रचलित है।

किन्तु वह अपने पतिको अपनी ओर आकृष्ट करनेमें सफल न हो सकी। विवश होकर उसने इस प्रकारकी उपेक्षाका कारण पूछा। अपनी पत्नीके प्रश्नोंको सुनकर वह रोने लगा और रोते-रोते उसने अपनी काम-शक्तिहीनताकी बात कह सुनायी। तब चनैनने पूछा—ऐसी अवस्थामे मेरे उद्दाम यौवनका क्या होगा ? शिवधरने तत्काल किसी परपुरुषके संग जीवन व्यतीत करनेकी अनुमति दे दी। जब चनैन शिवधरके पाससे लौट रही थी तो रास्तेमें, गाँवके समीप ही, बण्ठा चमार मिल गया। वह उसके सौन्दर्यपर मुग्ध हो गया और उससे प्रणय निवेदन करने लगा। चनैनने उसे ठुकरा दिया तो वह बलात्कार करनेकी धमकी देने लगा। चनैनने इधर उधर देखा पर गाँव निकट होनेपर भी कोई आता-जाता दिखाई नहीं पड़ा जिसे वह अपनी सहायताके लिए पुकारती। इस संकटसे बचनेका उपाय वह सोच ही रही थी कि उसका ध्यान निकट ही खड़े एक अत्यन्त ऊँचे इमलीके वृक्षकी ओर गया। उसपर इमलीयोंके पके हुए गुच्छे लटक रहे थे। चनैनने कुछ सोचा और फिर मुस्कराकर बण्ठासे बोली—मुझे फुनगी (पेड़के सबसे ऊपरी भाग) पर लगी पकी इमलीयाँ खिलाओ। इतना सुनना था कि बण्ठा निशंक हो गया और बिना कुछ सोचे-समझे तत्काल अपनी पगड़ी और जूते उतार, मगन होता हुआ पेड़के सिरेपर चढ़ गया और इमली तोड़कर गिराने लगा। चनैनको अवसर मिला। उसने बण्ठाके जूते और पगड़ीको उठाकर दूर फेक दिया और स्वयं भाग निकली। जब तक बण्ठा पेड़से नीचे उतरकर अपनी पगड़ी और जूतेको सँभाले, तब तक चनैन महलमें जा पहुँची। निराश बण्ठा क्षुब्ध हो उठा और अगीरामें जाकर उत्पात मचाने लगा। लोरिकने उसे समझानेकी बहुत कोशिश की पर बण्ठा अपनी हरकतोंसे बाज नहीं आया। तब लोरिकने क्रुद्ध होकर उसे युद्धके लिये ललकारा। युद्धमें बण्ठा मारा गया। बण्ठाके मारे जानेकी खुशीमें चनैनने भोजका आयोजन किया और बण्ठाके विजेता लोरिकको विशेष रूपसे आमन्त्रित किया। जिस समय लोरिक भोजन कर रहा था ऊपरसे कुछ तिनके आकर उसकी पत्तलपर गिरे। लोरिकन आँख उठाकर ऊपर देखा। रूपसी चनैन अपने सत्तखण्डे महलके झरोखेपर खड़ी मुस्करा रही थी। उसे देखते ही लोरिक उसपर मुग्ध हो गया। दोनोंमें परस्पर कुछ सम्बत हुआ। तदनन्तर दोनों एक दूसरेसे छुप-छिपकर मिलने लगे। और एक दिन अंधेरी रातमें दोनों अपना गाँव छोड़कर भाग निकले और हरदीथान पहुँचे। हरदीधाम मौनगरके मौजनि राजाके राज्यम पड़ता था। वह राज्य अत्यन्त प्रतापी था। टिठरा नामक एक नाई उसका सेवक था। एक दिन अकस्मात् टिठरा नाईने चनैनको देख लिया। चनैनका रूप देखते ही वह मूच्छित हो गया। होश आनेपर वह मोपनि राजाके पास पहुँचा और बोला—एक आदमी लोरिक चनन्को चुराकर लाया है। आपकी सातो रानियाँ उस सुन्दर नाहुओंकी बावन भी नहीं हैं। यह सुनकर मंपनि राजाने चनैनको प्राप्त करनेके लिए षड्यन्त्र रचा।

४ ६ उसके सात सौ पहलवान गेरुवा नामक अखाड़ेमे कुश्ती लड़ा करते थे। गजभीमक उनका नायक था। वह अजेय समझा जाता था। राजाने लोरिकको बुलवाया और एक पत्र देकर उसे गजभीमकके पास भेजा। लोरिक पत्र ले जानेको तैयार हो गया। चनैनने राजाकी दुष्टतासे उसकी सवारीके लिये कटरा नामक प्रख्यात घोड़ेको चुना और उसपर सवार होकर लोरिक गजभीमकके पास चला। राजाने उस पत्रमें गजभीमकको आदेश दिया था कि पत्र देखते ही लोरिकको मार डालना। पर लोरिकको मारनेकी कौन कहे गजभीमक स्वयं लोरिकके हाथ अपने सात सौ पहलवानोंके साथ मारा गया! उस दिनसे मोचनि राजा लोरिकसे भयभीत रहने लगा और किसी प्रकार उसे मार डालनेकी फिक्रमें रहने लगा। इस बार उसने पत्र देकर लोरिकको हरेवा करेवाके पास भेजा। हरेवा-करेवा दो भाई थे और दोनों ही अत्यन्त अत्याचारी थे। उनके भयसे सारी प्रजा त्रस्त थी। लोरिक पत्र लेकर पहुँचा और मनविसुनीके मैदानमें उसकी हरेवा करेवासे लड़ाई शुरू हुई। युद्धमें पहले हरेवाका भागिनेय कोठा राघव का राजकुमार कुँवर अंगार मारा गया। पीछे लोरिकने हरेवा करेवाको भी अपने खड्गसे यमपुर पहुँचा दिया। वहॉँसे लौटकर लोरिकने राजा मोचनिको भी मार डाला। अब सोनहीघाटमें महल बनाकर लोरिक और चनैन सुखपूर्वक रहने लगे। चनैन राज-काज चलाने लगी। उधर लोरिकके वियोगमें उसकी पत्नी माँजरि सूखकर काँटा हो गयी। उसने गायोंको राजा कोल्हू मल्लवा छीन लेगया। उसके साथ लड़ते हुए लोरिकका भाई साँवर भी मारा गया और साँवरकी पत्नी भस्ममय देखकर सती होगयी। इस सब दुःखोंसे दुःखी होकर लोरिकके माता-पिता अन्धे हो गये। जब माँजरिने देखा कि उसका पति लौटकर नहीं आ रहा है तो उसने अपने पालतू कौवे—चाझिलके पैरमें पत्र बाँधकर लोरिकके पास भेजा। लोरिक पत्र पाकर घर लौटनेके लिये व्याकुल हो उठा और चनैनके लाख प्रतिरोध करनेपर भी उसे और अपने बेटे इन्द्रजीतको लेकर गौड़की ओर चल पड़ा। गौड़के निकट पहुँचकर लोरिक और चनैन दोनोंने अपना वेश बदल लिया और गौड़में अपना परिचय सलोनीके राजा-रानीके रूपमें दिया। चनैनके कहनेपर लोरिकके मनमें अपनी पत्नी माँजरिके प्रति संदेह जागा कि वह निश्चय ही अपना रूप सौन्दर्यमें बेचकर जीवन-यापन करती रही होगी। अतः अपने इस सन्देहकी पुष्टिके निमित्त उसने गाँव भरके दूधको खरीदनेकी योजना बना दी। फलतः गाँवकी सभी स्त्रियाँ उसके पास दूध बेचने आयीं। उनके साथ माँजरि भी आयी। चनैनने सब स्त्रियोंको तो दूधके मूल्यमें चावल दिये और माँजरिके दूध-पात्रको हीरे-मोतियोंसे भर दिये। चनैनने सोचा था कि हीरा-मोतियोंके प्रलोभनमें माँजरि पुनः आयेगी और उस राजा (लोरिक) की उपस्वामिनी बनना स्वीकार कर लेगी। किन्तु उसकी

४७

बाधाके विपरीत माँजरिने अपने श्लीलता अपहरणके इस षड्यन्त्रको ताड़ लिया और तत्काल इसकी सूचना अपने सास ससुरको दे दिया । सूचना पाते ही माँजरिके साथ उसकी कुमारी बहन हुरकी, रजक धोबी कूबे और सुभेन सभी सहसोके राज्य (लोरिक) के पड़ाव पर जा पहुँचे और उसे युद्धके लिए ललकारने लगे । ललकार सुनकर जैसे ही लोरिक बाहर आया, रजकने लपक कर उसका हाथ नेत्रहीन कूबेको पकड़ा दिया । हाथका स्पर्श होते ही कूबेको ज्ञात हो गया कि यह उसके बेटे लोरिकका हाथ है । अपनी इस धारणाको पुष्ट करनेके लिए उसने उसे अपने आलिङ्गनमें कसकर आबद्ध कर लिया । कूबेके वज्र आलिङ्गनको सहन करनेकी क्षमता लोरिकके सिवा किसीमें न थी । उसके आलिङ्गन पाशमें आबद्ध होकर भी जब लोरिक हँसता ही रहा तो कूबेको निश्चय हो गया कि वह लोरिक ही है । और वह स्नेहके साथ उसका पीठ सहलाने लगा । स्नेहातिरेकमें सुभेन और कूबे दोनोंके नेत्रोंकी खोई हुई ज्योति लौट आयी । इस बीच माँजरिकी बहन हुरकीने चनेनको जा पकड़ा और वह उसका प्राण लेने जा ही रही थी कि इन्द्रजीत रोता हुआ माँजरिकी ओर भागा । माँजरिने आकर चनेनको छुड़ाया । बोली—अपने प्रतिशोधके लिये किसी अबोध बालकके माँका प्राण नहीं लिया जा सकता । तत्पश्चात सब लोग घर आये और सुख पूर्वक रहने लगे । लोरिकने अपने भाईका प्रतिशोध लेनेका निश्चय किया और राजा कोल्ह मख्ड़ारको मार डाला । यही नहीं जितने भी अत्याचारी राजा थे, उन सबको यमलोक पहुँचा दिया । जब उससे लड़ने वाला कोई नहीं बचा तब उसने अपनी आराध्या भगवतीकी आज्ञा प्राप्त कर काशी करवट ले लिया । सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद अलेकजेण्डर कनिंघम ने अपने १८७८-८१ के उत्तरी और दक्षिणी भागकी यात्राका जो विवरण प्रस्तुत किया है उसमें उन्होंने लोरिक बरदाकी कथा दी है जो उपर्युक्त कथा से थोड़ा भिन्न है।¹ उन्होंने लिखा है कि उन्हें तिरहुत की यात्रामें हरवा-बरवा का नाम बहुत सुनाई पड़ा । उन्हें उनके सम्बन्धमें जो जानकारी प्राप्त हुई उसके अनुसार हरवा-बरवा भाई-भाई और जातिके दुसाध थे । वे नेउरपुरमें राज करते थे । वे बड़े ही लड़ाकू थे और उन्होंने बहुतसे राजाओंको लूट कर मार डाला था । उन्हीं दिनों लोरिक और सेउर ( अथवा सिरुक ) नामक दो पड़ोसी राजा थे जो गौरामें रहते थे । लोरिक अपनी पत्नी माँजरको त्याग कर चनाइनके साथ हरदी भाग गया । वहाँके राजा मख्बारने, जो जातिका अहीर था, उसका विरोध किया । दोनोंमें लड़ाई हुई । लोरिकने मख्बारको पराजित कर दिया । तदन्तर दोनों परस्पर मित्र बन गये ।

१ आर्कियोलोजिकल सर्वे रिपोर्ट खण्ड १६ १८८१ पृ. २७-२८ ।

५. मैना-संदेश, गोवर वापसी व उपसंहार (कड़वक ४०१-५२२)

उसके सात सौ पहलवान गेरुआ नामक अखाड़ेमें कुश्ती लड़ा करते थे। गजभीमल्ल उनका नायक था। वह अजेय समझा जाता था। राजाने लोरिकको बुलवाया और एक पत्र देकर उसे गजभीमल्लके पास भेजा। लोरिक पत्र ले जानेको तैयार हो गया। चनैनने राजाकी घुड़सालसे उसकी सवारीके लिये कंदरा नामक प्रख्यात घोड़ेको चुना और उसपर सवार होकर लोरिक गजभीमल्लके पास पहुंचा। राजाने उस पत्रमें गजभीमल्लको आदेश दिया था कि पत्र देखते ही लोरिकको मार डालना। पर लोरिकको मारनेको कौन कहे गजभीमल्ल स्वयं लोरिकके हाथसे अपने सात सौ पहलवानोंके साथ मारा गया। उस दिनसे मोचनिक राजा लोरिकसे भयभीत रहने लगा और किसी प्रकार उसे मार डालनेकी फिक्रमें रहने लगा। इस बार उसने पत्र देकर लोरिकको हरेवा-बरेवाके पास भेजा। हरेवा-बरेवा दो भाई थे और दोनों ही अत्यन्त अत्याचारी थे। उनके भयसे सारी प्रजा त्रस्त थी। लोरिक पत्र लेकर पहुँचा और बनविहुलीके मैदानमें उसकी हरेवा बरेवासे लड़ाई शुरू हुई। युद्धमें पहले हरेवाका भगिनेय कोठा रामपुर का राजकुमार कुँअर अंगार मारा गया। पीछे लोरिकने हरेवा-बरेवाको भी अपने खङ्गसे यमपुर पहुँचा दिया। वहाँसे लौटकर लोरिकने राजा मोचनिको भी मार डाला। अब सोनौथीघाटमें महल बनाकर लोरिक और चनैन सुखपूर्वक रहने लगे। चनैन राज-काज चलाने लगी। उधर लोरिकके वियोगमें उसकी पत्नी माँजरि सूखकर काँटा हो गयी। उसके गायोंको राजा कोलहू गबड़ा छीन लेगया। उससे साथ लड़ते हुए हम्ले लोरिकका भाई साँवर भी मारा गया और साँवरकी पत्नी अकलुम्म बेकर छती होगयी। इन सब दुःखोंसे दुःखी होकर लोरिकके माता-पिता अन्धे हो गये। जब माँजरिने देखा कि उसका पति लौटकर नहीं आ रहा है तो उसने अपने पालतू कौवे—वाञ्छिके पैरों में पत्र बाँधकर लोरिकके पास भेजा। लोरिक पत्र पाकर घर लौटनेके लिये व्याकुल हो उठा और चनैनके सख्त प्रतिरोध करनेपर भी उसे और अपने बेटे इन्द्रजीतको लेकर गौबर्दी ओर चल पड़ा। गाँवके निकट पहुँचकर लोरिक और चनैन दोनोंने अपना वेश बदल लिया और गाँवमें अपना परिचय सहदौलीके राजा-रानीके रूपमें दिया। चनैनके कहनेपर लोरिकके मनमें अपनी पत्नी माँजरिके प्रति सन्देह जागा कि वह निश्चय ही अपना रूप सौन्दर्यमें बेचकर जीवन-यापन करती रही होगी। अतः अपने इस सन्देहकी पुष्टिके निमित्त उसने पाँच रुपये दूधको खरीदनेकी घोषणा करा दी। फलतः गौबर्दी सभी स्त्रियाँ उसके पास दूध बेचने आयीं। उनके साथ माँजरि भी आयी। चनैनने सब स्त्रियोंको तो दूधके मूल्यमें चावल दिये और माँजरिके दूध पात्रको हीरे-मोतियोंसे भर दिये। चनैनने सोचा था कि हीरा मोतियोंके प्रलोभनमें माँजरि पुनः आयेगी और सहौली नरेश (लोरिक)की अनुचारिणी बनना स्वीकार कर लेगी। किन्तु उसकी

४७ आज्ञाके विपरीत माँजरिने अपने अभीष्ट अपहरणके इस षड्यन्त्रको ताड़ लिया और तत्काल इसकी सूचना अपने सास ससुरको दे दिया। सूचना पाते ही माँजरिके साथ उसकी कुंवारी बहन झुरकी, राऊल धोबी, कूबे और सुडेन सभी गसौलीके राजा (लोरिक)के पड़ाव पर आ पहुँचे और उसे युद्धके लिए ललकारने लगे। ललकार सुनकर जैसे ही लोरिक बाहर आया, राऊलने झपट कर उसका हाथ नेत्रहीन कूबेको पकड़ा दिया। हाथका स्पर्श होते ही कूबेको ज्ञात हो गया कि वह उसके बेटे लोरिकका हाथ है। अपनी इस धारणाको पुष्ट करनेके लिए उसने उसे अपने आलिंगनमें कसकर आबद्ध कर लिया। कूबेके वज्र आलिंगनको सहन करनेकी क्षमता लोरिकके सिवा किसीमें न थी। उसके आलिंगन पाशमें आबद्ध होकर भी जब लोरिक हँसता ही रहा तो कूबेको निश्चय हो गया कि यह लोरिक ही है। और वह स्नेहके साथ उसका पीठ सहलाने लगा। स्नेहातिरेकमें सुसैन और कूबे दोनोंके नेत्रोंकी खोई हुई ज्योति लौट आयी। इस बीच माँजरिकी बहन झुरकीने चनैनको जा पकड़ा और वह उसका प्राण लेने जा ही रही थी कि इन्द्रजीत रोता हुआ माँजरिकी ओर भागा। माँजरिने आकर चनैनको छुड़ाया। बोली—अपने प्रतिशोधके लिये किसी अबोध बालकके माँका प्राण नहीं लिया जा सकता। तत्पश्चात सब लोग घर आये और सुख पूर्वक रहने लगे। लोरिकने अपने भाईका प्रतिशोध लेनेका निश्चय किया और राजा मौष्ट मल्लाहको मार डाला। यही नहीं जितने भी अत्याचारी राजा थे, उन सबको यमलोक पहुँचा दिया। जब उससे लड़ने वाला कोई नहीं बचा तब उसने अपनी आराध्या भवानीकी आज्ञा प्राप्त कर काशी करवट ले लिया। सुप्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् अलेक्जेण्डर कनिंघम ने अपने १८७ ८-८१ के उत्तरी और दक्षिणी भागकी यात्राका जो विवरण प्रस्तुत किया है उसमें उन्होंने लोरिक चन्दाकी कथा दी है जो उपर्युक्त कथा से थोड़ा भिन्न है।¹ उन्होंने लिखा है कि उन्हें तिरहुत की यात्रामें हरषा-बरषा का नाम बहुत सुनाई पड़ा। उन्हें उनके सम्बन्धमें जो जानकारी प्राप्त हुई उसके अनुसार हरषा-बरषा भाई-भाई और जातिके दुसाध थे। वे नैठारपुरमें राज करते थे। वे बड़े ही लड़ाकू थे और उन्होंने बहुतसे राज्योंको लूट कर मार डाला था। उन्हीं दिनों लोरिक और छेछर (अथवा सिरक) नामक दो पड़ोसी राजा थे जो गौरामें रहते थे। लोरिक अपनी पत्नी माँजरको त्याग कर चनाइनके साथ हरदी भाग गया। वहाँके राजा मल्लारने जो जातिका अहीर था उसका विरोध किया। दोनोंमें लड़ाई हुई। लोरिकने मल्लारको पराजित कर दिया। तदनंतर दोनों परस्पर मित्र बन गये। १. आर्क्योलाजिकल सर्वे रिपोर्ट, खण्ड १९ १८८३ पृ २७-२८।

४८ एक दिन दोनों एक साथ स्नान करने गये। जब राजा मन्जारने अपने कपड़े उतारे तो उनकी पीठपर चोटके बहुतसे निशान दिखाई पड़े। लोरिकने जब पूछा कि ये कैसे निशान हैं तो मन्जारने बताया कि जब कभी हरेशा-बरेशा इस ओर आते हैं तो मुझे चोट पहुँचाते हैं। ये निशान उसीके हैं। यह देखकर लोरिकने तत्काल प्रतिज्ञा की कि जबतक हरेशा-बरेशाको पकड़ न दूँगा तब तक इस गाँवका अन्न-जल ग्रहण न करूँगा। और तत्काल चलनेको प्रवृत्त हो गया। मन्जारने कहा—पैदल तुम कभी उसके पास पहुँच न सकोगे। और उसे एक घोड़ा दिया। उस घोड़ेपर सवार होकर लोरिक दूसरे दिन सूरज निकलते-निकलते नेठरपुर पहुँचा। हरेशा-बरेशा उस समय शिकारको गये थे। लेकिन उन्हें खोजता हुआ वहाँ जा पहुँचा। वहाँ वह उनसे भिड़ गया और उनके सभी साथियोंको मारडाला। तब उन दोनोंने अपनी सहायताके लिए अपने साझे कंगारको बुलाया। लोरिकन उसे भी परास्त कर दिया और हरेशा बरेशाको मार डाला। फिर लौटकर लोरिक हरदौनें चलाइनके साथ सुख पूर्वक रहने लगा। कनिंगहमने अपनी रिपोर्टमें सबसे आश्चर्यजनक बात यह लिखा है कि उन्हें इस बातके अतिरिक्त कि लोरिक व्यक्तिका अहिर था उसके सम्बन्धमें उस क्षेत्रसे और कोई बात ज्ञात न हो सकी। छत्तीसगढ़ी रूप छत्तीसगढ़में लोरिक और चन्दाकी कथा जिस रूपमें प्रचलित है, उसे वरियर एलविनने विलासपुर जिलेके कठघोड़ा तहसीलके धुरी जमींदारी अन्तर्गत सुनेरा ग्रामनिवासी घिचू अहीरसे सुनकर अपनी पुस्तक फोक सांग्स ऑव छत्तीस गढ़में दिया है।१ उनके अनुसार वह कथा इस प्रकार है— बाबनबीर नामक एक अहीर था जो बावन भैंसोंको दूहकर उनका दूध पीता था। एक दिन उसके मित्र राउतने कहा कि गौनेका दिन आ गया है जाकर अपनी स्त्री चन्दैनीको लिवा लाओ। बाबनबीरने उत्तर दिया कि मेरे सिरमें दर्द हो रहा है तुम मेरी कटार और घोड़ा ले लो और जाकर दुल्हनिको लिवा लाओ। राउत जाकर चन्दैनीको लिवा लाया और बाहरसे ही उसने बाबनबीरको आवाज दी। उस समय वह भात खा रहा था। भात खाकर उसने जो डकार ली तो उसकी आवाज बारह कोसतक सुनाई पड़ी। साना खाकर पेट सहलाता हुआ घरसे बाहर निकला और दूध दूहनेकी तैयारी करने लगा। चन्दैनीको यह देखकर आश्चर्य हुआ कि मैं ब्याही हूँ और मेरी ओर उसने तनिक भी ध्यान नहीं दिया। वह स्वयं उसके पास गयी। पहले उसने उसके पैरकी ओर देखा फिर उसके मुँहकी ओर और फिर उसके छाँतियेकी ओर। तत्काल घरमें जाकर पैर धोनेके लिए वह गरम पानी ले आयी। बाबनबीरने पानीमें जैसे ही पैर डाला वह जल १ ४१७१२००

गया और चन्दैनीको गालियों देने लगा । तब चन्दैनी ठण्डा पानी ले आयी और बाबनबीरने पैर धोया और उसकी सराहना की । उसके बाद चन्दैनी खाना बनाकर लायी । उसने उसे बड़े प्रेमसे सराह सराहकर खाया । खाना खाकर मूँह सूँघनेके लिए उठा । पर अचानक ही वह बिस्तर बिछाकर सो गया । चन्दैनी घरके काम धन्धेसे छुट्टी पाकर तेल लेकर अपने पतिके पास गयी । उसके हाथको अपने हाथमें लेकर तेल लगाने लगी । बाबन जाग उठा और जागते ही उसने चन्दैनीको एक चाँटा मार दिया । चन्दैनीने सोचा कि नींद मैं अनजाने ही मार दिया होगा । अतः फिर मलने लगी । तब बाबनने उसे लात मार दिया और वह मुँहके बल जा गिरी । सारा तेल दुलक गया । वहीं पड़े-पड़े चन्दैनी सो गयी और उसे पता भी नहीं चला कि कब सबेरा हुआ । सुबह उठकर उसने अपनी ननदसे कहा कि मेरा भाई महन्त बीमार है, उसे देखने जाऊँगी । तुम चुपकेसे मेरी साड़ी उठा लाओ । चन्दैनी अपना कपड़ा लेकर चुपकेसे घरसे भाग निकली । घने जङ्गलमे होकर जब वह जा रही थी तो रास्तेमे उसे लकड़ी काटनेके लिए घूमता हुआ वीर बठवा मिला । चन्दैनीको देखते ही बोल उठा—मौसी कहाँ जा रही हो ? चन्दैनी सोचने लगी कि कभी तो वह इस तरह नहीं पुकारता था । सदा मैं उसकी भाई-बहू ही रही आज यह मौसी क्यों कह रहा है । कुछ दालमें काला अवश्य है । किस तरह इससे मैं अपने आपको बचाऊँ । कुछ सोचकर उसने सिर ऊपर उठाया । जामुनसे लदा पेड़ देखकर बोली—देवर मेरे, तुमसे क्या कहूँ । जामुन खानेकी इच्छा हो रही है । थोड़ेसे तोड़ लाओ । पीछे हम दोनों हँसी-मजाक करेंगे । वीर बठवाने आव न देखा न ताव, पट पेड़पर चढ़ ही तो गया और लगा जामुन तोड़ तोड़कर गिराने । पर चन्दैनी सयानी थी बोली—मैं इतने नीचे लगे जामुन नहीं खाती, इसे तो छोटे-छोटे चरवाहे भी तोड़ ले जाते हैं । तब बठवा और ऊँचे चढ़ गया और अच्छे-अच्छे फल तोड़ने लगा । तब चन्दैनी बोली—मेरे अच्छे देवर, जरा अपने कमरमें बँधी छुरी तो गिरा देना । मै फलोंको काटूँगी । बठवाने अपनी छुरी गिरा दी । चन्दैनीने अपने कपड़ोंको कसकर बाँधा और चाकूसे कटीली डाल काट-काट कर पेड़के चारों ओर चुन दिया और भाग चली । भागते-भागते वह गेहूँके खेतोंको पारकर गयी, तब वीर बठवाने नीचे देखा । पेड़के नीचे काँटे लगे देखकर चकित हुआ और इधर-उधर नजर दौड़ायी तो चन्दैनी दूरपर भागती हुई दिखाई पड़ी । बोला—अच्छा चन्दैनी आज तो तुम धोखा देकर निकल गयी । किसी दिन जब नदीपर मिलोगी तब तुम्हारी इज्जत लुटूँगा । खाम पकड़कर तुम्हें बेइज्जत करूँगा । वह नीचे उतरने लगा । जबतक वह एक डालीसे दूसरी डालीपर उतरे तबतक वह दो कोस पहुँच गयी । जबतक पेड़से उतर पाये, वह अपन गाँवके निकट पहुँच गयी । बठवाने उसका पीछा किया । जबतक वह पास आने वह अपने घरके पास पहुँच

४१ गयी। उसने उसका चाकूको तालाबमें फेंक दिया। बीर बढ़था चाकू लेने तालाबमें कूदा और कीचड़में फँस गया। जबतक वह वहाँसे निकल पाये, चन्दैनी अपने घरमें घुस गयी। बीर बढ़था गुस्सेमें भरा गलीमें चक्कर लगाने लगा। कोई भी लड़की उसके डरसे पानी भरने नहीं निकलती। अहीरके लड़के मारे डरके गाय चराने नहीं जाते। गायें तबेलेमें पड़ी-पड़ी मरने लगीं भैंसे छनमें से खींचकर घास चबाने लगीं। लोग घरमें पड़े-पड़े भूखसे अलबले होने लगे। जिनके घरमें कुआँ था, वे तो कुछ खा पका लेते थे। जिनके पास नहीं था वे जानवरोंकी तरह प्याससे छटपटाने लगे। यह देखकर चन्दैनीकी माँ बोली—मुझे तो तीनों लोकमें अकेला वीर लोरिक ही एक आदमी ऐसा दिखाई देता है जो बीर बढ़थाको मार सकता है। और कोई दूसरा नहीं तो दिखाई देता। यह कहकर लाठी टेकती हुई बुढ़िया लोरिकके घरकी ओर चल पड़ी। वह छोटी-छोटी गलियों फिर छोटे-बड़े बाजारोंको पार करती हुई वहाँ पहुँची जहाँ लोरिक सोया हुआ था। जाकर बोली— तुमसे मैं क्या कहूँ नाक कटना है तो जातका चमार, नीच पर है वह मोटा। उसने मेरी लड़कीपर हाथ लगाया है। उसकी इज्जत बचानेमें सब लोग असमर्थ हैं। यह सुनते ही लोरिक खाटसे उठ पड़ा और अपनी लाठी कठ उठाकर चलने लगा। तभी घरके भीतर छिपी मँजरियाने उसे देख लिया। उसकी पत्नीने आकर रोका। बोली—मत जाओ ईश्वरके लिए मत जाओ। वह चमार महाधूर्त है उसे तुम हरा न सकोगे। हट जा मनजरिया—लोरिक बोला—है तो चमार ही। भला वह मुझे कैसे हरायेगा ? अगर मैं उसे भून न डालूँ तो मैं अपनी मूँछ कटा डालूँगा। मनजरिया बोली—उसे हरानेका एक ही उपाय है। उसे ऐसी जगह लिवा जाओ जहाँकी जमीन बहुत कड़ी हो। वहाँ पाँच हाथके अन्तरपर दो गड्ढे कमरकी गहराई तक खोदो। एक गड्ढेमें उस चमारकी बीबी तुम्हें गाड़े और दूसरेमें मैं उस बढ़थाकी गाड़ूँ। जो उसमेंसे पहले निकलकर दूसरेको पीटे, वही विजयी माना जाय। अच्छा तो जल्दीसे तैयार हो जा मनजरिया।—लोरिकने कहा। मनजरिया सज धजकर सिरपर मथिलाइयोंकी थाल रखकर चल पड़ी। आगे-आगे लोरिक चला उसके पीछे बुढ़िया और सबसे पीछे मनजरिया। गलीमें मकानके सामने बढ़था टहल रहा था। देखते ही लोरिक चिल्लाया—रास्तेसे हट बढ़था नहीं तो लाठीसे तेरा सिर तोड़ दूँगा तेरी बसौली बाहर निकल पड़ेगी। हट जाओ लोरिक नहीं तो ऐसी मार मारूँगा कि तेरी बसौली तेरे पेटमें समा जायेगी। तब लोरिक बोला—हो सकता है कि मैं तुमको न मार सकूँ लेकिन तुम

  • मुझको नहीं मार सकते। अच्छा हो व था

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क। लोरिकने अपनी बात नवाबी। बठवाने तत्काल अपनी चमारिनको बुलवा भेजा। मेरी धूमो, इस रावतको जमीनमें इस तरह कसकर गाड़ दो कि वह कभी निकल न सके। मैं उसे ऐसा गाड़ूँगी कि वह कभी निकल ही न सके और तुम आकर उसे मार कर वीर कहाओ—चमारिन बोली और हाथ भरका एक खोंता ले आयी। गड्ढा खोदकर वह लोरिकको गाड़ने लगी। तब मनजरियाने चारों ओर अशर्फियाँ बिखेर दीं। लालची, चमारिन अपना काम छोड़कर उन्हें बटोरने लगी। इस बीच लोरिकने भीतर ही भीतर अपना पैर ढीला कर लिया। उधर मनजरियाने बठवाको खूब कसकर गाड़ा। फिर वहाँसे हटकर बोली—शत्रुको अब मारो। बठवाने गड्ढेसे बाहर आनेकी बहुत कोशिश की लेकिन एक तिल भी हट न सका। उधर लोरिक इतनी जोरसे उछला कि जमीनसे पाँच हाथ ऊपर चला गया। नीचे आकर उसने अपने लट्ठसे बठवाकी खूब मरम्मत की। इतना मारा कि उसकी लाठी टूट गयी। उसने दूसरी लाठी उठायी। तब बठवा हाथ जोड़कर कहने लगा—बस करो रावत, लंगड़ा लूला जैसा भी जीने भर दो। मैं तुम्हारा गौरागढ़ छोड़ दूँगा। तुम्हारी चम्पमें सेवा करूँगा। यह सुनकर मनजरियाने लोरिकको मारनेसे रोका और धूमोसे बोली—ले जा अपने पतिको अरण्डके पत्तोंसे सेंक कर। लोरिक और मनजरिया दोनों घर लौट आये। छिपे-छिपे चन्देनीने उन दोनों को आते देखा। वह मन ही मन कहने लगी—अरे नाथ मेरे देवता, तुम्हारी तरह का आदमी त्रिलोकमें नहीं है। वह दिन कब आयेगा जब मैं एक प्रेमिकाकी तरह तुम्हारे साथ भाग चलूँगी। और तब चन्देनी अपने भाई महन्तीसे बोली—लोरिकके आने जानेके रास्ते- में मेरे लिए एक झूला डाल दो। भाइने झूला डाल दिया। लोरिकने उस रास्तेमें आना ही बन्द कर दिया। दिन गिनते गिनते चन्देनीकी उँगलियाँ घिस गयी उसकी राह देखते-देखते आँखें थक गयी पर लारीक सिवा कुछ दिखाई न दिया। तब वह देवी देवताओंको मनाने लगी। एक दिन लोरिक अपने अखाड़ेसे उसी रास्ते अपने घर लौटा। उसे आते देख चन्देनी अपने झूलेपर बैठ गयी। बोली—कुछ झूल न झूल लोगे रावत ! ना ना—लोरिक बोला—अरे लोग सब देख रहे होंगे और हमीं बदनाम हो जाऊँगा। मेरी झूल न झूलोगे तो तुम्हें अपनी मा-बहनकी कसम। कसम सुनकर लोरिकको गुस्सा आ गया। उसने इतनी जोरसे झूला लगाया कि चन्देनी काफी दूर आसमानमें फेंका गयी और उल्काकी तरह नीचे गिरने लगी। उसने दस हाथ ऊँचे

आभूषण बिखर गये। इस तरह उसे अर्धशून्य गिरते देख लोरिकने सोचा कि उसके टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे; उनको कौन बटोरता फिरेगा। उसने उसे अपनी लाठीपर ही रोक लिया और फिर धीरेसे भूमिपर रख दिया। चन्दैनी खड़ी होकर गालियाँ देने लगी। लोरिक बोला—तुमने कहा और मैंने उतार दिया। यह कहकर वह अपने घर चला गया। चन्दैनी भी उदास होकर घर चली गयी। शामको अपनी मौसीसे बहानाकर वह कण्डा लेकर पड़ौसीके घरसे आग लेने निकली। रास्तेमें लोरिक मिला। वह खिसक उठी। बोली—मुझसे नाराज क्यों हो। मैंने तो मजाक किया था। मेरा घर देखा है न देवर ! क्या बताऊँ मौसी आज तो मौका निकल गया। कल तुम्हारे घर जरूर आऊँगा। म न मत आना देवर। मेरे घर पहरेदार बहुत हैं। पहले तो सड़कपर पहरा देनेवाला हाथी है। उसके बाद बाघ है तब मूंछकी गाय और तब उसके बाद भालू। अपनी जान जोखिममें डालकर मत आना। पानीमें छिपनेपर भी बच न पाओगे। लोरिक घर आकर मन्जरियासे बोला—कस्वीके भात पका है। गौरागढ़की गलीमें एक सभा है वहाँ जाना है। जल्दीसे उसने गाना गावा अच्छे-से अच्छे कपड़ा पहना और गहरिबाके घर जाकर एक चितकबरा बकरा लिया फिर कुछ ईख और हलवाईके घरसे मिठाई लेकर चन्दैनीके घरकी ओर चल पड़ा। हाथी देखते ही उसने उसके सामने ईख डाल दी बाघको उसने बकरा दे दिया गायको भात और भालूको मिठाई। इस तरह सारी बाधाएँ पारकर वह चन्दैनीके कमरेमें जा पहुँचा। चन्दैनी देखनेमें सारा शरीर ढंककर सो रही थी; पर भीतर ही भीतर जाग रही थी मुँह नहीं खोलती थी। भीतर ही से बोली—कौन हो तुम, अपने भाई महरुदीको बुलाती हूँ। वह तेरा सिर काट डालेगा। क्यूं चन्दैनी तुमने बुलाया तो मैं आया। अब धमकी देती है। यह कहकर लोरिकने धीरजको लात मार दिया और स्वयं धरनपर चढ़ गया। चन्दैनी बोली—देवर, मैं तो मजाककर रही थी। तुम नाराज हो गये। और वह अन्धायसे लोरिकको ढूंढने लगी। धरनपर बैठा-बैठा लोरिक बोला—मैं धरनपर बैठा हूँ। तुम अपनी कहानी कहो। चन्दैनीने अपने आँसू पोंछ डाले और कहानी कहने लगी। पर एक जनममें मैने एक हिरनीकी कोखमें जन्म लिया था। हिरनकी तरह एक ब्राह्मण मुझे अपने घरमें पालती-पोसती थी। एक दिन एक राजा उस राह से गया उसने मुझपर बाण चला दे दिया। उसके हाथ से मैं मर गयी। तब मैंने गायके रूपमें जन्म लिया और चरवाहेकी गायोंमें फिरती थी। इस बार फिर एक राजाने बाण लिया

और मैं मर गयी । दूसरे जन्ममें कुतियाके गर्भमें जन्म लिया और मैं गली-गली भूँकती फिरती थी । फिर राजाने शाप दिया और मैं मर गयी। और अन्तम मैने राजा गोयन्थीके घर जन्म लिया और बीर बावनसे विवाही गयी किन्तु अपने सभी जन्मोंमें मैं कभी सुखी न रह सकी। यह सुनते ही लोरिक झरनपरसे उतर आया। चन्दैनीने इत्र फुलेलसे उसका स्वागत किया और मिठाई खिलायी। दूसरे दिन सुबह हल्ला हुआ—लोरिक कहाँ है, लोरिक कहाँ है आवाज सुनते ही वह जागा और खाटपरसे उठकर भागा। जल्दीमें उसने चन्दैनीकी साड़ी पहन ली। आँगनमें बुढ़िया धोबिन गुहारती हुई मिली। बोली—नन्दके लाल तुम कहाँ थे ! तुम्हारे गाल काजल और सेंदुरसे लाल क्यों हैं ? लोरिकने बहाना किया मै अपनी गाये ढूँढ रहा था। गेरूसे खेल रहा था वहीं मुँह पर लग गया होगा ! धोबिन बोली—अरे लबाड़िये, चुप रह। तेरी धोती कहाँ है ! चन्दैनीकी साड़ी क्यों पहने है ? लोरिकने अपने शरीर की ओर देखा और फिर गिड़गिड़ाने लगा—किसीसे मत कहना, तुझे दो सूप गेहूँ दूँगा। यह साड़ी, चन्दैनीके घर दे आओ। बुढ़िया साड़ी लेकर चन्दैनीके घर गयी। वहाँसे लोरिकके कपड़े ले आयी। लोरिक उन्हें नदी पर धोकर घर पहुँचा। उस समय मनजरिया घर बुहार रही थी। उसने देखते ही कहा—मैने कहा न था कि सभामें मत जाओ। ऐसी सभा तो पहले कभी नहीं होती थी। तुम्हारी आँखें उदास-सी क्यों हैं ! और वह बड़बड़ाती हुई घड़ा लेकर तालमकी ओर चली। तालब पर चन्दैनी अपने कपडे धो रही थी। उसे देखते ही चन्दैनीने पूछा— किसे कोस रही हो बहन। मनजरियान अपने पतिके आँखोंके उदासीकी चर्चा की। तब चन्दैनीने लोरिक के अपने घर आनेकी बात कह दी। बोली—वे घरके परनापर चढ गये और मुझे एक पल सोने नहीं दिया। और हँस पडी। मनजरियाको सन्देह हो गया। मर जा तू चन्देन—कोसती हुई मनजरिया घर आयी। लोरिकको बड़े प्रेमसे नहलाया फिर खाना खिलाया। खाना खाकर लोरिक सोया। शाम हुई तो उसे चन्दैनीकी याद आयी। गाँवकी गायोंको दुहनेके बहाने अपने कपड़े छिपाकर घरसे निकला। रास्तेमें बुढिया धोबिन मिली। बोली—इस रास्ते रोज-रोज मत आया करा नही तो बदनाम हो जाओगे। उसकी खिड़कीसे रस्सी बाँध लो उसीके सहारे बिना किसी के जाने आया-जाया करो। धोबिनके कहनेके अनुसार लोरिकने रस्सी तैयार की। मंजरीयाने रस्सी देख ली और जान गयी कि वह किस कामके लिए बनायी गयी है। उसने उसे कोठारम छिपा दिया। लोरिकने मजरियाकी खुशामद की और उसे मनाकर फिर रस्सी ले ली।