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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२९२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है वह व्यान है, वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है और वही यह श्री एवं यश है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह श्रीमान् और यशस्वी होता है ॥ २ ॥

| अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिरस्तत्स्थो वायुविशेषः स वीर्यवत्कर्म कुर्वन्विगृह्य वा प्राणापानौ नाना वानीतीति व्यानस्तत्संबद्धमेव च तच्छ्रोत्रमिन्द्रियं तथा स चन्द्रमाः- “श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च चन्द्रमाश्च” इति श्रुतेः। सहाश्रयौ पूर्ववत्। <br><br> तदेतच्छ्रीश्च विभूतिः श्रोत्रचन्द्रमसोर्ज्ञानान्नहेतुत्वम् अतस्ताभ्यां श्रीत्वम्। ज्ञानान्नवतश्च यशः ख्यातिर्भवतीति यशोहेतुत्वाद्यशस्त्वम्, अतस्ताभ्यां गुणाभ्यामुपासीतेत्यादि समानम् ॥ २ ॥ | तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है उसमें स्थित जो वायुविशेष है वह वीर्यवान् कर्म करता हुआ गमन करता है या प्राण और अपानसे विरोध करके अथवा नाना प्रकारसे गमन करता है, इस कारण 'व्यान' कहलाता है। उससे सम्बद्ध जो श्रोत्र है वह इन्द्रिय है। तथा उसीसे सम्बद्ध वह चन्द्रमा है, जैसा कि “[ विराट्के ] श्रोत्रद्वारा दिशा और चन्द्रमा रचे गये हैं” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। पूर्ववत् ( चक्षु और आदित्यके समान ) ये भी एक ही आश्रयवाले हैं। <br><br> वह यह [ व्यानसंज्ञक ब्रह्म ] श्री यानी विभूति है। श्रोत्र और चन्द्रमा क्रमशः ज्ञान और अन्नके हेतु हैं; इसलिये उनके द्वारा व्यानका श्रीत्व माना गया है। ज्ञानवान् और अन्नवान्‌का यश अर्थात् प्रसिद्धि होती है; अतः यशका हेतु होनेसे उसकी यशःस्वरूपता है। अतः उन दो गुणोंसे युक्त उसकी उपासना करे—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९३ ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※

हृदयान्तर्गत पश्चिमसुषिभूत अपानकी उपासना

अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः सोऽपानः सा वाक्सो-
ऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्य-
न्नादो भवति य एवं वेद ॥ ३ ॥

तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही वह ब्रह्मतेज एवं अन्नाद्य है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः पश्चिमस्तत्स्थो वायुविशेषः स मूत्रपुरीषाद्यपनयन्नधोऽनितीत्य-पानः सा तथा वाक्; तत्संबन्धात्, तथाग्निः तदेतद्ब्रह्मवर्चसं वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं तेजो ब्रह्म-वर्चसम्; अग्निसंबन्धाद् वृत्तस्वाध्यायस्य। अन्नग्रसनहेतुत्वाद-पानस्यान्नाद्यत्वम्। समानमन्यत् ॥ ३ ॥तथा इसका जो प्रत्यङ् सुषि—प्रत्यङ् यानी पश्चिम उसमें स्थित जो वायुविशेष है वह मलमूत्रादिको दूर करता हुआ नीचेकी ओर ले जाता है। इसलिये 'अपान' कहलाता है। तथा वही वाक् और अग्नि है, क्योंकि इनका उस (समष्टि अपान) से सम्बन्ध है। वह यह ब्रह्मतेज है—सदाचार और स्वाध्यायके कारण होनेवाले तेजका नाम ब्रह्मवर्चस है, क्योंकि सदाचार और स्वाध्याय अग्निसे सम्बद्ध हैं। अन्न निगलनेमें हेतु होनेके कारण अपानका अन्नभोक्तृत्व स्वीकृत किया गया है। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥

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१६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

१६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३


हृदयान्तर्गत उत्तरसुषिभूत समानकी उपासना

अथ योऽस्योदङ् सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान्व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥

तथा इसका जो उत्तरीय छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है और वही यह कीर्ति और व्युष्टि (देहका लावण्य) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह कीर्तिमान् और व्युष्टिमान् होता है ॥ ४ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथ योऽस्योदङ् सुषिरुदग्गतः सुषिस्तत्स्थो वायुविशेषः सोऽशितपीते समं नयतीति समानः। तत्संबद्धं मनोऽन्तःकरणं स पर्जन्यो वृष्ट्यात्मको देवः पर्जन्यनिमित्ताश्चाप इति, "मनसा सृष्टा आपश्च वरुणश्च" इति श्रुतेः।तथा इसका जो उदङ् सुषि—उत्तरवर्ती छिद्र है, उसमें स्थित हुआ जो वायुविशेष है वह खाये-पिये अन्न-जलको समानरूपसे [सम्पूर्ण शरीरमें] ले जाता है, इसलिये 'समान' है। उसीसे सम्बन्ध रखनेवाला मन—अन्तःकरण और वह पर्जन्य यानी वृष्टिरूप देव है, क्योंकि "[विराट् पुरुषके] मनसे अप् और वरुण रचे गये हैं" इस श्रुतिके अनुसार अप् (जल) मेघहीसे होनेवाले हैं।
तदेतत्कीर्तिश्च, मनसो ज्ञानस्य कीर्तिहेतुत्वात्; आत्मपरोक्षं विश्रुतत्वं कीर्तिः; यशः स्वकरण-तथा यह (समाननामक ब्रह्म) ही कीर्ति है, क्योंकि मन यानी ज्ञान ही कीर्तिका हेतु है। अपने पीछे जो विख्यात होती है उसे कीर्ति कहते हैं। जो ख्याति अपनी

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २९५

संवेद्यं विश्रुतत्वम् । व्युष्टिः कान्तिर्देहगतं लावण्यम् । ततश्च कीर्तिसंभवात्कीर्तिश्चेति । समानमन्यत् ॥ ४ ॥इन्द्रियोंसे गृहीत की जा सकती है उसे यश कहते हैं। व्युष्टि—कान्ति यानी देहगत सुन्दरताको कहते हैं। उससे भी कीर्तिकी उत्पत्ति होती है अतः वह भी कीर्ति ही है। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ४ ॥

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हृदयान्तर्गत ऊर्ध्वसुषिभूत उदानकी उपासना

अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥

तथा इसका जो ऊर्ध्व छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है और वही यह ओज और महः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी (बलवान्) और महस्वान् (तेजस्वी) होता है ॥ ५ ॥

अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदान आ पादतलादारभ्योर्ध्वमुत्क्रमणादुत्कर्षार्थं च कर्म कुर्वन्ननितीत्युदानः स वायुस्तदाधारश्चाकाशः। तदेतद् वाय्वाकाशयोरोजोहेतुत्वादोजो बलं महत्त्वाच्च मह इति समानमन्यत् ॥५॥तथा इसका जो ऊर्ध्व-छिद्र है वह उदान है। पैरके तलुएसे लेकर ऊपरकी ओर उत्क्रमण करनेके कारण और उत्कर्षके लिये कर्म करता हुआ चेष्टा करता है—इसलिये वह 'उदान' है। वही वायु और उसका आधारभूत आकाश भी है। वायु और आकाश ओजके हेतु हैं अतः यह (उदानसंज्ञक ब्रह्म) ही ओज—बल है और महत्ताके कारण महः भी है। शेष अर्थ पूर्ववत् है॥५॥

२९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ३

२९६छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ३

उपर्युक्त प्राणादि द्वारपालोंकी उपासनाका फल

ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वार-
पाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वार-
पान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य
एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद॥६॥

वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं। वह जो कोई भी स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंको जानता है उसके कुलमें वीर उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच पुरुषोंको जानता है वह स्वर्गलोकको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

ते वा एते यथोक्ताः पञ्चसुषिसंबन्धात्पञ्च ब्रह्मणो हार्दस्य पुरुषा राजपुरुषा इव द्वारस्थाः स्वर्गस्य हार्दस्य लोकस्य द्वारपा द्वारपालाः। एतैर्हि चक्षुःश्रोत्रवाङ्मनः प्राणैर्बहिर्मुखप्रवृत्तैर्ब्रह्मणो हार्दस्य प्राप्तिद्वाराणि निरुद्धानि। प्रत्यक्षं ह्येतदजितकरणतया बाह्यविषयासङ्गानृतप्ररूढत्वान्न हार्दे ब्रह्मणि मनस्तिष्ठति। तस्मात्सत्यमुक्तमेते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपा इति।वे ही ये, जैसे कि ऊपर बतलाये गये हैं, पाँच सुषियोंके सम्बन्धके कारण हृदयस्थ ब्रह्मके पाँच पुरुष हैं, अर्थात् द्वारस्थ राजपुरुषोंके समान हृदयस्थ स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं। चक्षु, श्रोत्र, वाक्, मन और प्राणोंके द्वारा बाहरकी ओर प्रवृत्त हुए इन्हींके द्वारा हृदयस्थित ब्रह्मकी प्राप्तिके द्वार रुके हुए हैं। यह बात प्रत्यक्ष ही है कि अजितेन्द्रियताके कारण बाह्य विषयोंकी आसक्तिरूप अनृतसे व्याप्त रहनेके कारण मन हृदयस्थित ब्रह्ममें स्थित नहीं होता। अतः यह ठीक ही कहा है कि ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं।

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अतः स य एतानेवं यथोक्तगुणविशिष्टान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद उपास्त उपासनया वशीकरोति स राजद्वारपालानिवोपासनेन वशीकृत्य तैरनिवारितः प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं राजानमिव हार्दं ब्रह्म ।अतएव जो कोई इन उपर्युक्त गुणविशिष्ट स्वर्गलोकके द्वारपालोंको इस प्रकार जानता है—उपासना करता है अर्थात् उपासनाद्वारा अपने अधीन करता है, वह राजाके द्वारपालोंके समान इन्हें उपासनाद्वारा वशीभूत कर इनसे निवारित न होता हुआ राजाको प्राप्त होनेके समान स्वर्गलोक यानी हृदयस्थित ब्रह्मको प्राप्त होता है।
किं चास्य विदुषः कुले वीरः पुत्रो जायते वीरपुरुषसेवनात् । तस्य चर्णापाकरणेन ब्रह्मोपासनप्रवृत्तिहेतुत्वम् । ततश्च स्वर्गलोकप्रतिपत्तये पारम्पर्येण भवतीति स्वर्गलोकप्रतिपत्तिरेवैकं फलम् ॥ ६ ॥तथा वीर पुरुषका सेवन करनेके कारण इस विद्वान्के कुलमें वीर पुत्र उत्पन्न होता है । वह पुत्र पितृऋणकी निवृत्ति करके उसे ब्रह्मकी उपासनामें प्रवृत्त करनेका हेतु होता है । अतः वह परम्परासे उसकी स्वर्गलोकप्राप्तिका भी कारण होता है; इसलिये स्वर्गलोककी प्राप्ति ही इसका एकमात्र फल है ॥ ६ ॥
अथ यदसौ विद्वान्स्वर्गं लोकं वीरपुरुषसेवनात्प्रतिपद्यते, यच्चोक्तं "त्रिपादस्यामृतं दिवि" इति तदिदं लिङ्गेन चक्षुःश्रोत्रेन्द्रिय-तथा वह विद्वान् वीर पुरुषका सेवन करनेसे जिस स्वर्गलोकको प्राप्त होता है और जिस स्वर्गका "इसका तीन पादरूप अमृत द्युलोकमें है" इस प्रकार वर्णन किया गया है उसीको अब अनुमापक लिङ्गद्वारा चक्षु और श्रोत्रेन्द्रियका विषय

२९८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२९८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| गोचरमापादयितव्यम्, यथाग्न्यादि धूमादिलिङ्गेन । तथा ह्येवमेवेदमिति यथोक्तेऽर्थे दृढा प्रतीतिः स्यात् । अनन्यत्वेन च निश्चय इति । अत आह— | बनाना है जिस प्रकार कि धूमादि लिङ्गसे अग्नि आदिकी प्रतीति करायी जाती है । ऐसा होनेपर ही उपर्युक्त पदार्थके विषयमें "यह ऐसा ही है" ऐसी दृढ़ प्रतीति हो सकती है और इसी प्रकार उसका अभेद-रूपसे निश्चय भी हो सकता है । इसीलिये श्रुति कहती है— |

हृदयस्थित मुख्य ब्रह्मकी उपासना

अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥ ७ ॥

तथा इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर यानी सबके ऊपर, जिनसे उत्तम कोई दूसरा लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोंमें प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुषके भीतर ज्योति है ॥७॥

| यदतोऽमुष्माद्दिवो द्युलोकात्, परः परमिति लिङ्गव्यत्ययेन, ज्योतिर्दीप्यते, स्वयंप्रभं सदाप्रकाशत्वाद्दीप्तत इव दीप्यत इत्युच्यते; अग्न्यादिवज्ज्वलनलक्षणाया दीप्तेरसम्भवात् । | इस दिव अर्थात् द्युलोकसे परे—यहाँ 'परः' इस पुँल्लिङ्ग पदको नपुंसकलिङ्गमें बदलकर 'परम्' समझना चाहिये—जो ज्योति दीप्त है; नित्य प्रकाशमान होनेसे वह ज्योति स्वयं-प्रकाश है, अतः 'दीप्यते' इस पदसे वह मानो दीप्त होती है—इस प्रकार कहा जाता है, क्योंकि अग्नि आदिके समान उसमें प्रज्वलित होनारूप दीप्तिकी कोई सम्भावना नहीं है । |

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थं २९९


विश्वतः पृष्ठेष्वित्येतस्य व्याख्यानं सर्वतः पृष्ठेष्विति, संसारादुपरीत्यर्थः, संसार एव हि सर्वः, असंसारिण एकत्वान्निर्भेदत्वाच्च। अनुत्तमेषु, तत्पुरुषसमासाशङ्कानिवृत्तय आह, उत्तमेषु लोकेष्विति, सत्यलोकादिषु हिरण्यगर्भादिकार्यरूपस्य परस्येश्वरस्यासम्भवादुच्यते, उत्तमेषु लोकेष्विति ।'विश्वतः पृष्ठेषु' इसीकी व्याख्या 'सर्वतः पृष्ठेषु' ये पद हैं; अर्थात् संसारसे ऊपर, क्योंकि संसार ही सब है; असंसारी ब्रह्म तो एक और भेदरहित है। 'अनुत्तमेषु' इस पदमें [ जो उत्तम न हो—ऐसा अर्थ करके होनेवाली ] तत्पुरुषसमासकी शङ्काको निवृत्त करनेके लिये 'उत्तमेषु लोकेषु' ऐसा कहा है। सत्यलोकादिमें हिरण्यगर्भादि कार्यरूप ब्रह्म समीप रहता है, इसलिये उनके विषयमें 'उत्तमेषु लोकेषु' ऐसा कहा गया है।
इदं वावेदमेव तद्यदिदमस्मिन् पुरुषेऽन्तर्मध्ये ज्योतिश्चक्षुःश्रोत्रग्राह्येण लिङ्गेनोष्णिम्ना शब्देन चावगम्यते। यत्त्वचा स्पर्शरूपेण गृह्यते तच्चक्षुषैव; दृढप्रतीतिकरत्वात्त्वचः, अविनाभूतत्वाच्च रूपस्पर्शयोः ॥ ७ ॥वह निश्चय यही है जो कि यह इस पुरुषके भीतर ज्योति है, जो क्रमशः चक्षु और श्रोत्रसे ग्रहण किये जाने योग्य उष्णता और शब्दरूप लिङ्गसे जानी जाती है। त्वचाद्वारा स्पर्शरूपसे जिसका ग्रहण किया जाता है उस वस्तुका मानो चक्षुसे ही ग्रहण होता है, क्योंकि त्वचा तो केवल उसकी दृढ़ प्रतीति करानेवाली है, तथा रूप और स्पर्श ये एक-दूसरेके बिना रह नहीं सकते ॥७॥
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हृदयस्थित परमज्योतिका अनुमापक लिङ्ग

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कथं पुनस्तस्य ज्योतिषो लिङ्गं त्वग्दृष्टिगोचरत्वमापद्यते ? इत्याह—किंतु उस ज्योतिका अनुमापक लिङ्ग त्वगिन्द्रियकी विषयताको किस प्रकार प्राप्त होता है ? इस विषयमें श्रुति कहती है—

३०० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

३०० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३


तस्यैषा दृष्टिर्यत्रैतदस्मिञ्शरीरे संस्पर्शैनोष्णि- मानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनद- मिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥

उस इस (हृदयस्थित पुरुष) का यही दर्शनोपाय है जब कि [मनुष्य] इस शरीरमें स्पर्शद्वारा उष्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपाय है जब कि यह कानोंको मूँदकर निनद (रथके घोष), नदथु (बैलके डकराने) और जलते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण करता है, वह यह ज्योति दृष्ट और श्रुत है—इस प्रकार इसकी उपासना करे। जो उपासक ऐसा जानता है [इस प्रकार उपासना करता है] वह दर्शनीय और विश्रुत (विख्यात) होता है ॥ ८ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
यत्र यस्मिन्काले, एतदिति क्रियाविशेषणम्, अस्मिञ्शरीरे हस्तेनालभ्य संस्पर्शैनोष्णिमानं रूपसहभाविनमुष्णस्पर्शभावं विजानाति, स ह्युष्णिमा नामरूपव्याकरणाय देहमनुप्रविष्टस्य चैतन्यात्मज्योतिषो लिङ्गमव्यभिचारात् । न हि जीवन्तमात्मान-‘यत्र’—जिस समय, ‘एतत्’ यह ‘विजानाति’ इस क्रियाका विशेषण है, इस शरीरमें हाथसे स्पर्श करके उस स्पर्शद्वारा रूपके साथ रहनेवाली उष्णताको जानता है; वह उष्णिमा ही नामरूपका विभाग करनेके लिये देहमें अनुप्रविष्ट हुए चैतन्यात्मज्योतिका अनुमान करानेवाला लिङ्ग है, क्योंकि उसका कभी व्यभिचार नहीं होता । जीवित शरीरको उष्णता कभी नहीं

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
मुष्णिमा व्यभिचरति । 'उष्ण एव जीविष्यञ्छीतो मरिष्यन्' इति हि विज्ञायते । मरणकाले च तेजः परस्यां देवतायामिति परेणाविभागत्वोपगमात् । अतोऽसाधारणं लिङ्गमौष्ण्यमग्नेरिव धूमः । अतस्तस्य परस्यैषा दृष्टिः साक्षादिव दर्शनं दर्शनोपाय इत्यर्थः ।त्यागती । जीवित रहनेवाला उष्ण ही होता है और मरनेवाला शीत होता है—ऐसा ही जाना जाता है। मरण-कालमें तेज पर देवतामें लीन हो जाता है, क्योंकि उस समय पर देवताके साथ उसका अभेद हो जाता है। अतः धूम जिस प्रकार अग्निका अनुमापक है उसी प्रकार उष्णता जीवनका असाधारण लिङ्ग है। इसलिये उस पर देवताकी यह दृष्टि यानी साक्षात् दर्शनके समान उसके दर्शनका साधन है—ऐसा इसका तात्पर्य है।
तथा तस्य ज्योतिष एषा श्रुतिः श्रवणं श्रवणोपायोऽप्युच्यमानः । यत्र यदा पुरुषो ज्योतिषो लिङ्गं शुश्रूषति तदेतत्कर्णावपिगृह्यैतच्छब्दः क्रियाविशेषणम् । अपिगृह्यापिधायेत्यर्थोऽङ्गुलिभ्यां प्रोर्णुत्य निनदमिव रथस्येव घोषो निनदस्तमिव शृणोति नदथुरिव ऋषभकूजितमिव शब्दो यथा चाग्ने-तथा यह उस ज्योतिकी श्रुति—श्रवण यानी सुननेका आगे कहा जानेवाला उपाय है। जहाँ—जिस समय पुरुष इस ज्योतिके लिङ्गको सुनना चाहता है उस समय, 'एतत् कर्णावपिगृह्य' यहाँ 'एतत्' शब्द 'अपिगृह्य' क्रियाका विशेषण है, अर्थात् कानोंको इस प्रकार मूँदकर—अङ्गुलियोंसे बंदकर निनदके समान—रथके घोषको 'निनद' कहते हैं, उसके समान शब्द सुनता है तथा नदथु—बैलके डकराने-के समान और जिस प्रकार बाहर

३०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| बहिर्ज्वलत एवं शब्दमन्तःशरीर उपशृणोति । <br><br> यदेतज्ज्योतिर्दृष्टश्रुतलिङ्गत्वाद् दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत । यथोपासनाच्चक्षुष्यो दर्शनीयः श्रुतो विश्रुतश्च । यत्स्पर्शगुणोपासननिमित्तं फलं तद्रूपे संपादयति चक्षुष्य इति, रूपस्पर्शयोः सहभावित्वात्, इष्टत्वाच्च दर्शनीयतायाः । एवं च विद्यायाः फलमुपपन्नं स्यान्न तु मृदुत्वादिस्पर्शवत्त्वे । य एवं यथोक्तौ गुणौ वेद । स्वर्गलोकप्रतिपत्तिस्तूक्तमदृष्टं फलम् । द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ८ ॥ | जलते हुए अग्निका शब्द होता है उस प्रकारके शब्दका अपने शरीरके भीतर श्रवण करता है। <br><br> इस प्रकार यह ज्योति दृष्ट और श्रुत लिङ्गयुक्त होनेसे दृष्ट और श्रुत है—इस तरह इसकी उपासना करे। इस प्रकार उपासना करनेसे वह उपासक चक्षुष्य—दर्शनीय और श्रुत—विख्यात हो जाता है। स्पर्शगुणसम्बन्धिनी उपासनासे जो फल होता है उसीको श्रुति 'चक्षुष्य' ऐसा कहकर रूपमें सम्पादन करती है, क्योंकि रूप और स्पर्श ये दोनों साथ-साथ रहनेवाले हैं और दर्शनीयता सबको इष्ट भी है। इस प्रकार [ दर्शनीयताके मिलनेसे ] ही इस विद्याका दृष्ट फल उत्पन्न हो सकता है, मृदुत्वादि स्पर्शयुक्त होनेसे नहीं। इस प्रकार जो इन दोनों गुणोंको जानता है [ उसे इस फलकी प्राप्ति होती है ]। स्वर्गलोककी प्राप्ति तो इसका अदृष्ट फल बतलाया गया है। 'य एवं वेद—य एवं वेद' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है॥८॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥

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चतुर्दश खण्ड

शाण्डिल्यविद्या

सर्वदृष्टिसे ब्रह्मोपासना

पुनस्तस्यैव त्रिपादमृतस्य ब्रह्मणोऽनन्तगुणवतोऽनन्तशक्तेरनेकभेदोपास्यस्य विशिष्टगुणशक्तिमत्त्वेनोपासनं विधित्सन्नाह—अब फिर उसी त्रिपादमृत, अनन्तगुणवान्, अनन्तशक्ति और अनेक प्रकारसे उपासनीय ब्रह्मकी विशिष्टगुणयुक्त और शक्तिमान् रूपसे उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है—

सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥

यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीसे उत्पन्न होनेवाला, उसीमें लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला है—इस प्रकार शान्त [रागद्वेषरहित] होकर उपासना करे, क्योंकि पुरुष निश्चय ही क्रतुमय—निश्चयात्मक है; इस लोकमें पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर होता है । अतः उस पुरुषको निश्चय करना चाहिये ॥१॥

सर्वं समस्तं खल्विति वाक्यालङ्कारार्थो निपातः । इदं जगन्नामरूपविकृतं प्रत्यक्षादिविषयं ब्रह्म कारणं वृद्धतमत्वादूब्रह्म ।सर्व—समस्त 'खलु' यह निपात वाक्यकी शोभा बढ़ानेके लिये है । यह अर्थात् नाम-रूपमय विकारको प्राप्त होनेवाला और प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषयभूत जगत् ब्रह्म—कारणरूप ही है । वृद्धतम [ सबसे बड़ा ] होनेके कारण वह [ जगत्-का कारण ] ब्रह्म कहलाता है ।

३०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| कथं सर्वस्य ब्रह्मत्वम् ? इत्यत आह—तज्जलानिति; तस्माद्ब्रह्मणो जातं तेजोऽबन्नादिक्रमेण सर्वम्, अतस्तज्जम्; तथा तेनैव जननक्रमेण प्रतिलोमतया तस्मिन्नेव ब्रह्मणि लीयते तदात्मतया श्लिष्यत इति तल्लम्, तथा तस्मिन्नेव स्थितिकालेऽनिति प्राणिति चेष्टत इति । एवं ब्रह्मात्मतया त्रिषु कालेष्वविशिष्टं तद्व्यतिरेकेणाग्रहणात् । अतस्तदेवेदं जगत् । यथा चेदं तदेवैकमद्वितीयं तथा षष्ठे विस्तरेण वक्ष्यामः ।<br><br>यस्माच्च सर्वमिदं ब्रह्म, अतः शान्तो रागद्वेषादिदोषरहितः संयतः सन्यत्तत्सर्वं ब्रह्म तद्वक्ष्यमाणैर्गुणैरुपासीत ।<br><br>कथमुपासीत ? क्रतुं कुर्वीत ऋतुर्निश्चयोऽध्यवसाय एवमेव | यह सब ब्रह्मरूप किस प्रकार है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—'तज्जलानिति'। तेज, अप् और अन्नादि क्रमसे सारा जगत् उस ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ है, इसलिये यह 'तज्ज' है तथा उसी जननक्रमके विपरीत क्रमसे उस ब्रह्ममें ही लीन होता है अर्थात् तादात्म्यरूपसे उसमें मिल जाता है, इसलिये 'तल्ल' है और अपनी स्थितिके समय उसीमें अनन-प्राणन यानी चेष्टा करता है, इसलिये 'तदन' है। इस प्रकार ब्रह्मात्मरूपसे वह तीनों कालोंमें समान रहता है, क्योंकि उसका उस (ब्रह्म) के बिना ग्रहण नहीं किया जाता; अतः वह (ब्रह्म) ही यह सारा जगत् है। जिस प्रकार यह जगत् 'वह एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही है' उसका हम छठे अध्यायमें विस्तारपूर्वक निरूपण करेंगे।<br><br>क्योंकि यह सब ब्रह्म है, अतः शान्त यानी राग-द्वेषसे रहित—संयतेन्द्रिय होकर वह जो सब ब्रह्म है उसकी आगे कहे जानेवाले गुणोंद्वारा उपासना करे।<br><br>उसकी किस प्रकार उपासना करे ? [सो बतलाते हैं—] क्रतु करे—'क्रतु' निश्चय यानी अध्यवसाय- |

खण्ड १४ ]शाङ्करभाष्यार्थ३०५
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
नान्यथेत्यविचलः प्रत्ययस्तं क्रतुं कुर्वीतोपासीतेत्यनेन व्यवहितेन संबन्धः । किं पुनः क्रतुकरणेन कर्तव्यं प्रयोजनम् ? कथं वा क्रतुः कर्तव्यः ? क्रतुकरणं चाभिप्रेतार्थसिद्धिसाधनं कथम् ? इत्यस्यार्थस्य प्रतिपादनार्थमथेत्यादिग्रन्थः ।को कहते हैं अर्थात् यह ऐसा ही है, इससे अन्य प्रकारका नहीं है—ऐसी जो अविचल प्रतीति है वही क्रतु है, उस क्रतुको करे—इस प्रकार इसका व्यवधानयुक्त ‘उपासीत’ इस क्रियासे सम्बन्ध है । किंतु उस क्रतुके करनेसे क्या प्रयोजन सिद्ध करना है ? अथवा किस प्रकार वह क्रतु करना चाहिये तथा वह क्रतु करना किस प्रकार अभीष्ट अर्थकी सिद्धिका साधन है ? इस सब विषयका प्रतिपादन करनेके लिये ही ‘अथ’ इत्यादि आगेका ग्रन्थ है ।
अथ खल्विति हेत्वर्थः । यस्मात् क्रतुमयः क्रतुप्रायोऽध्यवसायात्मकः पुरुषो जीवः; यथाक्रतुर्यादृशः क्रतुरस्य सोऽयं यथाक्रतुर्यथाध्यवसायो यादृङ्निश्चयोऽस्मिंल्लोके जीवन्निह पुरुषो भवति, तथेतोऽस्माद्देहात्प्रेत्य मृत्वा भवति; क्रत्वनुरूपफलात्मको भवतीत्यर्थः । एवं ह्येतच्छास्त्रतो दृष्टम्—‘‘यं यं वापि‘अथ खलु’ यह पदसमूह हेतुके लिये है । क्योंकि पुरुष यानी जीव क्रतुमय—क्रतुप्राय अर्थात् अध्यवसायात्मक है, इसलिये इस लोकमें जीवित रहता हुआ यह पुरुष यथाक्रतु—जिस प्रकारके क्रतुवाला होता है अर्थात् जिस प्रकारके अध्यवसायवाला—जैसे निश्चयवाला होता है, वैसे ही यहाँसे—इस देहसे ‘प्रेत्य’—मरकर होता है । तात्पर्य यह है कि वह अपने निश्चयके अनुसार फलवाला होता है । शास्त्रसे भी यह बात ऐसी ही देखी गयी है—‘‘जिस-

३०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३०६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| स्मरण्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्” (गीता ८।६) इत्यादि। यत एवं व्यवस्था शास्त्रदृष्टातः स एवं जानन्क्रतुं कुर्वीत यादृशं क्रतुं वक्ष्यामस्तम्। यत एवं शास्त्रप्रामाण्यादुपपद्यते क्रत्वनुरूपं फलम्, अतः स कर्तव्यः क्रतुः ॥ १ ॥ | जिस भावको स्मरण करता हुआ अन्तमें शरीर त्यागता है [उसी-उसी भावको प्राप्त होता है]” क्योंकि ऐसी व्यवस्था शास्त्रप्रतिपादित है, अतः इस प्रकार जाननेवाला वह पुरुष क्रतु करे—जिस प्रकारका क्रतु हम बतलाते हैं, वैसा ही क्रतु करे। क्योंकि इस प्रकार शास्त्रप्रामाण्यसे निश्चयके अनुरूप ही फल मिलना सिद्ध होता है, इसलिये उसे वह निश्चय करना चाहिये ॥ १ ॥ |

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समग्र ब्रह्ममें आरोपित गुण

कथम् ?किस प्रकार निश्चय करना चाहिये ?

मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥

[ वह ब्रह्म ] मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसंकल्प, आकाशशरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सम्पूर्ण जगत्‌को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है ॥ २ ॥

मनोमयो मनःप्रायः, मनुतेऽनेनेति मनस्तत्स्ववृत्त्या विष-मनोमय—मनःप्राय; जिसके द्वारा जीव मनन करता है उसे मन कहते हैं, यह अपनी वृत्तिद्वारा

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
येषु प्रवृत्तं भवति, तेन मनसा तन्मयः; तथा प्रवृत्त इव तत्प्रायो निवृत्त इव च। अत एव प्राणशरीरः प्राणो लिङ्गात्मा विज्ञानक्रियाशक्तिद्वयसंमूर्च्छितः; “यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः” (कौ० उ० ३। ३) इति श्रुतेः। स शरीरं यस्य स प्राणशरीरः, “मनोमयः प्राणशरीरनेता” (मु० उ० २। २। ७) इति च श्रुत्यन्तरात्।विषयोंमें प्रवृत्त हुआ करता है। उस मनके कारण वह मनोमय है; अतः पुरुष मनःप्राय होकर मनके प्रवृत्त होनेपर प्रवृत्त-सा होता है और निवृत्त होनेपर निवृत्त-सा हो जाता है। इसीलिये वह प्राणशरीर है, “जो प्राण है वही प्रज्ञा है और जो प्रज्ञा है वह प्राण है” इस श्रुतिके अनुसार विज्ञान और क्रिया इन दो शक्तियोंसे मिलकर बना हुआ लिङ्गशरीर ही प्राण है; वह प्राण जिसका शरीर है उसे प्राणशरीर कहते हैं; जैसा कि “आत्मा मनोमय और प्राणरूप शरीरको [अन्य देहमें] ले जानेवाला है” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है।
भारूपः, भा दीप्तिश्चैतन्यलक्षणं रूपं यस्य स भारूपः। सत्यसंकल्पः, सत्या अवितथाः संकल्पा यस्य सोऽयं सत्यसंकल्पः। न यथा संसारिण इवानैकान्तिकफलः संकल्प ईश्वरस्येत्यर्थः। अनृतेन मिथ्याफलत्वहेतुना प्रत्यूढत्वात्संकल्पस्य मिथ्याफलत्वम्। वक्ष्यति— ‘अनृतेन हि प्रत्यूढाः’ इतिभारूप—भा—दीप्ति अर्थात् चैतन्य ही जिसका रूप है उसे भारूप कहते हैं। सत्यसंकल्प— जिसके संकल्प सत्य यानी अमिथ्या हैं वह यह ब्रह्म सत्यसंकल्प है। तात्पर्य यह है कि संसारी पुरुषके समान ईश्वरका संकल्प अनैकान्तिक (कभी हो, कभी न हो ऐसे) फलवाला नहीं है। संसारी जीवका संकल्प अनृत अर्थात् मिथ्या फलरूप हेतुसे प्रत्यूढ—वृद्धिको प्राप्त होनेके कारण मिथ्या फलवाला होता है। ‘वे अनृतसे प्रत्यूढ हैं’ ऐसा आगे चलकर श्रुति कहेगी भी।

३०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३
आकाशात्मा, आकाश इवात्मा स्वरूपं यस्य स आकाशात्मा। सर्वगतत्वं सूक्ष्मत्वं रूपादिहीनत्वं चाकाशतुल्यतेश्वरस्य। सर्वकर्मा, सर्वं विश्वं तेनेश्वरेण क्रियत इति जगत्सर्वं कर्मास्य स सर्वकर्मा; "स हि सर्वस्य कर्ता" (बृ० उ० ४।४।१३) इति श्रुतेः। सर्वकामः सर्वे कामा दोषरहिता अस्येति सर्वकामः; "धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि" (गीता ७।११) इति स्मृतेः।आकाशात्मा—जिसका आत्मा यानी स्वरूप आकाशके समान हो उसे 'आकाशात्मा' कहते हैं। सर्वत्र व्यापक, सूक्ष्म तथा रूप आदिसे रहित होना ही ईश्वरका आकाशके समान होना है। सर्वकर्मा--उस ईश्वरके द्वारा सर्व यानी विश्वका निर्माण किया जाता है—इसलिये यह सारा जगत् उसका कर्म है; अतः वह ईश्वर सर्वकर्मा है, जैसा कि "वही सबका कर्ता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। सर्वकाम—सम्पूर्ण दोषरहित काम उस परमात्माके ही हैं इसलिये वह सर्वकाम है; जैसा कि "मैं प्राणियोंमें धर्मसे अविरुद्ध काम हूँ" इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है।
ननु कामोऽस्मीति वचनादिह बहुव्रीहिर्न संभवति सर्वकाम इति।शङ्का—किंतु 'कामोऽस्मि' (मैं काम हूँ) ऐसा वचन होनेके कारण 'सर्वकाम' इस पदमें बहुव्रीहिसमास नहीं हो सकता ?
न; कामस्य कर्तव्यत्वाच्छब्दादिवत्पारार्थ्यप्रसङ्गाच्चसमाधान—नहीं, क्योंकि काम का कार्यत्व स्वीकृत किया गया है*; इसलिये शब्दादिके समान भगवान्की भी

* अतः यदि बहुव्रीहि न मानकर कर्मधारय मानें तो समस्त काम (कार्य) और ब्रह्म एकरूप सिद्ध होंगे, ऐसी दशामें जैसे कार्य अनादि नहीं है उसी प्रकार ब्रह्म भी अनादि नहीं माना जा सकेगा। इसके अतिरिक्त जैसे सभी कार्य किसी चेतन कर्ताके अधीन होते हैं उसी तरह ब्रह्ममें भी पराधीनताका दोष उपस्थित होगा। इतना ही नहीं, शब्दादिके समान काम भी पदार्थ है अतः काम और ब्रह्मकी एकता माननेपर ब्रह्ममें भी पदार्थताकी आपत्ति होने लगेगी; इसलिये यहाँ बहुव्रीहिसमास ही ठीक है।

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०९


देवस्य। तस्माद्यथेह सर्वकाम इति बहुव्रीहिस्तथा कामोऽस्मीति स्मृत्यर्थो वाच्यः।परार्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा।<br>अतः जिस प्रकार यहाँ 'सर्वकामः' पदमें बहुव्रीहिसमास किया गया है उसी प्रकार 'कामोऽस्मि' इस स्मृतिका अर्थ करना चाहिये। ✽
सर्वगन्धः, सर्वे गन्धाः सुखकरा अस्य सोऽयं सर्वगन्धः। "पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्" (गीता ७।९) इति स्मृतेः। तथा रसा अपि विज्ञेया अपुण्यगन्धरसग्रहणस्य पाप्मसम्बन्धनिमित्तत्वश्रवणात्। "तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च। पाप्मना ह्येष विद्धः" (छा० उ० १।२।२) इति श्रुतेः। न च पाप्मसंसर्ग ईश्वरस्य, अविद्यादिदोषस्यानुपपत्तेः।सर्वगन्ध—समस्त सुखकर गन्ध उसीके हैं इसलिये वह 'सर्वगन्ध' है; जैसा कि "पृथिवीमें मैं पुण्यगन्ध हूँ" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। इसी प्रकार पुण्यरस भी उसीके समझने चाहिये। क्योंकि श्रुतिने अपुण्यगन्ध और रसका ग्रहण तो पापसम्बन्धके निमित्तसे बतलाया है; जैसा कि "इसीसे उस (घ्राणेन्द्रिय) के द्वारा सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनोंको ही सूँघता है, क्योंकि यह पापसे विद्ध है" इस श्रुतिद्वारा प्रमाणित होता है। किंतु ईश्वरका पापसे संसर्ग नहीं है, क्योंकि उसमें अविद्यादि दोष होने सम्भव नहीं हैं।
सर्वमिदं जगदभ्यात्तोऽभिव्याप्तः। अततेर्व्याप्त्यर्थस्य कर्तरि निष्ठा। तथावाकी, उच्यते-इस सम्पूर्ण जगत्‌को वह सब ओर व्याप्त किये हुए है। व्याप्ति अर्थवाले 'अत्' धातुसे कर्ता अर्थमें निष्ठा (क्त) प्रत्यय होनेसे 'आत्तः' पद सिद्ध होता है। इसी प्रकार वह अवाकी भी है, जिसके द्वारा बोला जाता है उसे 'वाक्'

✽ तात्पर्य यह कि उक्त गीताके 'कामोऽस्मि' इन पदोंका 'काम हूँ' ऐसा अर्थ न करके 'कामवाला हूँ' यह अर्थ समझना चाहिये।

३१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| ऽन्येति वाक्, वागेव वाकः। यद्वा वचेर्घञन्तस्य करणे वाकः। स यस्य विद्यते स वाकी न वाकी अवाकी। वाक्यप्रतिषेधश्चात्रोपलक्षणार्थः। गन्धरसादिश्रवणादीश्वरस्य प्राप्तानि घ्राणादीनि करणानि गन्धादिग्रहणाय। अतो वाक्प्रतिषेधेन प्रतिषिष्यन्ते तानि। "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः" (श्वे० उ० ३।१९) इत्यादिमन्त्रवर्णात्। | कहते हैं, 'वाक्' ही 'वाक' है। अथवा 'वच्' धातुसे करण अर्थमें 'घञ्' प्रत्यय करनेसे 'वाक' शब्द निष्पन्न होता है। वह (वाक) जिसमें हो उसे 'वाकी' कहते हैं, जो वाकी न हो वही 'अवाकी' कहलाता है। यहाँ जो वाक्का प्रतिषेध किया गया है वह अन्य इन्द्रियोंका भी उपलक्षण करनेके लिये है। श्रुतिमें गन्ध और रसादिका प्रसंग होनेसे उन गन्धादिका ग्रहण करनेके लिये ईश्वरके घ्राणादि इन्द्रियाँ होनी सिद्ध होती हैं; अतः वाक्के प्रतिषेधद्वारा उन सबका भी प्रतिषेध किया गया है; जैसा कि "बिना हाथ-पावका ही वह वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है तथा बिना नेत्रका होकर भी देखता और बिना कर्णका होकर भी सुनता है" इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। | | अनादरोऽसंभ्रमः। अप्राप्तप्राप्तौ हि संभ्रमः स्यादनाप्तकामस्य। न त्वाप्तकामत्वान्नित्यतृप्तस्येश्वरस्य संभ्रमोऽस्ति क्वचित्॥२॥ | अनादर अर्थात् असम्भ्रम (आग्रहरहित) है। जो आप्तकाम नहीं है उसे ही अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिके लिये आग्रह हो सकता है। आप्तकाम होनेके कारण नित्यतृप्त ईश्वरको कहीं भी सम्भ्रम नहीं है॥२॥ |

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खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३११


ब्रह्म छोटेसे छोटा और बड़ेसे बड़ा है

एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥ ३ ॥

हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे, सरसोंसे, श्यामाकसे अथवा श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक अथवा इन सब लोकोंकी अपेक्षा भी बड़ा है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
एष यथोक्तगुणो मे ममात्मान्तर्हृदये हृदयपुण्डरीकस्यान्तर्मध्येऽणीयानणुतरो व्रीहेर्वा यवाद््वेत्याद्यत्यन्तसूक्ष्मत्वप्रदर्शनार्थम् । श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वेति परिच्छिन्नपरिमाणादणीयानित्युक्तेऽणुपरिमाणत्वं प्राप्तमाशङ्क्य अतस्तत्प्रतिषेधायारभते—एष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या इत्यादिना । ज्यायःपरिमाणाच्च ज्यायस्त्वं दर्शयन्ननन्तपरिमा-यह उपर्युक्त गुणविशिष्ट मेरा आत्मा अन्तर्हृदय—हृदयकमलके अन्तः—भीतर व्रीहि (धान) से, अथवा यवादिसे भी अणीयान्—सूक्ष्मतर है, यह कथन आत्माकी अत्यन्त सूक्ष्मता प्रदर्शित करनेके लिये है। वह श्यामाक और श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है—इस प्रकार परिच्छिन्न परिमाणसे सूक्ष्म बतलानेपर उसका अणुपरिमाणत्व प्राप्त होता है—ऐसी आशङ्का कर अब उसका प्रतिषेध करनेके लिये 'एष म आत्मा ज्यायान्पृथिव्याः' इत्यादि वाक्यसे श्रुति आरम्भ करती है। इस प्रकार स्थूलतर पदार्थोंकी अपेक्षा भी उसकी महत्ता प्रदर्शित कर श्रुति 'मनोमयः'