भारतकोश
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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३४२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| मध्यं स्वप्नान्तं सुषुप्तमित्येतत् ।<br><br>अथवा स्वप्नान्तं स्वप्नसत्तत्त्वमित्यर्थः । तत्राप्यर्थात्सुषुप्तमेव भवति; स्वमपीतो भवतीति वचनात् । न ह्यन्यत्र सुषुप्तात्स्वमपीतिं जीवस्येच्छन्ति ब्रह्मविदः । | रहती है उस] स्वप्नका नाम है; उसके मध्यको स्वप्नान्त अर्थात् सुषुप्त कहते हैं। अथवा 'स्वप्नान्त' इस शब्दका तात्पर्य 'स्वप्नका तत्त्व' ऐसा भी हो सकता है। ऐसा माननेपर भी अर्थतः सुषुप्त ही सिद्ध होता है; क्योंकि 'स्वमपीतो भवति' (अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है) ऐसा श्रुतिका वाक्य है; ब्रह्मवेत्तालोग सुषुप्तावस्थाको छोड़कर और किसी दशामें जीवकी स्वरूपप्राप्ति स्वीकार नहीं करते। | | तत्र ह्यादर्शापनयने पुरुषप्रतिबिम्ब आदर्शगतो यथा स्वमेव पुरुषमपीतो भवत्येवं मनआद्युपरमे चैतन्यप्रतिबिम्बरूपेण जीवेनात्मना मनसि प्रविष्टा नामरूपव्याकरणाय परा देवता सा स्वमेवात्मानं प्रतिपद्यते जीवरूपतां मनआख्यां हित्वा । अतः सुषुप्त एव स्वप्नान्तशब्दवाच्य इत्यवगम्यते । | जिस प्रकार दर्पणको हटा लेनेपर दर्पणमें स्थित पुरुषका प्रतिबिम्ब स्वयं पुरुषको ही प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार उस सुषुप्तावस्थामें ही मन आदिकी निवृत्ति हो जानेपर चैतन्यके प्रतिबिम्बरूपसे जीवात्मभावसे नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये मनमें प्रविष्ट हुआ वह परदेवता मनसंज्ञक जीवरूपताको त्यागकर स्वयं अपने स्वरूपको ही प्राप्त हो जाता है। अतः इससे यह विदित होता है कि 'स्वप्नान्त' शब्दका वाच्य 'सुषुप्त' ही है। | | यत्र तु सुप्तः स्वप्नान्पश्यति तत्स्वाप्नं दर्शनं सुखदुःखसंयुक्त- | किंतु जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष स्वप्न देखता है वह स्वप्नदर्शन सुख-दुःखसे युक्त होता |

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
मिति पुण्यापुण्यकार्यम्। पुण्यापुण्ययोर्हि सुखदुःखारम्भकत्वं प्रसिद्धम्। पुण्यापुण्ययोश्चाविद्याकामोपष्टम्भेनैव सुखदुःखतद्दर्शनकार्यारम्भकत्वमुपपद्यते नान्यथेत्यविद्याकामकर्मभिः संसारहेतुभिः संयुक्त एव स्वप्न इति न स्वमपीतो भवति “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य भवति” (बृ० उ० ४।३।२२) “तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दाः” (बृ० उ० ४।३।२१) “एष परम आनन्दः” (बृ० उ० ४।३।३३) इत्यादिश्रुतिभ्यः। सुषुप्त एव स्वं देवतारूपं जीवत्वविनिर्मुक्तं दर्शयिष्यामीत्याह— स्वप्नान्तं मे मम निगदतो हे सोम्य विजानीहि विस्पष्टमवधारयेत्यर्थः।है; इसलिये वह पुण्य-पापका कार्य है, क्योंकि पुण्य-पाप ही क्रमशः सुख-दुःखके आरम्भक रूपमें प्रसिद्ध हैं। किंतु पुण्य-पापका जो सुख, दुःख और उनके दर्शनरूप कार्यका आरम्भकत्व है वह अविद्या और कामनाके आश्रयसे ही सम्भव है, और किसी प्रकार नहीं, इसलिये स्वप्न संसारके हेतुभूत अविद्या, कामना और कर्म इनसे संयुक्त ही है; अतः उस अवस्थामें जीव अपने स्वरूपको प्राप्त नहीं होता; जैसा कि “[ उस अवस्थामें ] वह पुण्यसे असम्बद्ध, पापसे असम्बद्ध तथा हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार किये होता है” “इसका वह यह रूप अतिच्छन्दा (काम, धर्माधर्म तथा अविद्यासे रहित) है” “यह परम आनन्द है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। अतः 'मैं सुषुप्तिमें ही जीवभावसे रहित अपने देवतारूपको दिखलाऊँगा' ऐसा आरुणिने कहा। हे सोम्य! मेरे कथन करनेसे तू स्वप्नान्त (सुषुप्तावस्था) को विशेषरूपसे जान ले अर्थात् स्पष्टतया समझ ले।

छा० उ० २१—

६४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
कदा स्वप्नान्तो भवति ? इत्युच्यते-यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम भवति पुरुषस्य स्वप्स्यतः प्रसिद्धं हि लोके स्वपितीति । गौणं चेदं नामेत्याह-यदा स्वपितीत्युच्यते पुरुषः, तदा तस्मिन्काले सता सच्छब्दवाच्या प्रकृतया देवतया सम्पन्नो भवति सङ्गत एकीभूतो भवति । मनसि प्रविष्टं मनआदिसंसर्गकृतं जीवरूपं परित्यज्य स्वं सद्रूपं यत्परमार्थसत्यमपीतोऽपि गतो भवति । अतस्तस्मात्स्वपितीत्येनमाचक्षते लौकिकाः । स्वमात्मानं हि यस्मादपीतो भवति । गुणनामप्रसिद्धितोऽपि स्वात्मप्राप्तिर्गम्यत इत्यभिप्रायः ।स्वप्नान्त होता कब है ? सो बतलाते हैं जिस समय सोनेवाले पुरुषका 'स्वपिति' ऐसा नाम होता है। लोकमें स्वपिति (सोता है) ऐसा व्यवहार प्रसिद्ध है। तथा यह नाम गौण (गुणसम्बन्धी) है-इस आशयसे कहते हैं-जिस समय यह पुरुष 'स्वपिति' ऐसा कहा जाता है उस समय यह सत्‌से-प्रकरण प्राप्त 'सत्' शब्दवाच्य देवतासे सम्पन्न-संगत अर्थात् एकीभूत हो जाता है। यह मनमें प्रविष्ट हुआ मन आदिके संसर्गसे प्राप्त हुए जीवरूपको त्यागकर अपने सद्रूपको, जो कि परमार्थ सत्य है, प्राप्त हो जाता है। इसीसे लौकिक पुरुष इसे 'स्वपिति' ऐसा कहकर पुकारते हैं; क्योंकि यह 'स्वम्'—आत्माको 'अपीतः'-प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि इस गौण नामकी प्रसिद्धिसे भी अपने आत्माकी प्राप्ति ज्ञात होती है।
कथं पुनर्लौकिकानां प्रसिद्धा स्वात्मसम्पत्तिः । जाग्रच्छ्रमनिमित्तोद्भवत्वात्स्वापस्येत्याहुः ।किंतु लौकिक पुरुषोंको स्वात्माकी प्राप्ति कैसे प्रसिद्ध हुई ? [ऐसा प्रश्न होनेपर] आचार्योंने कहा है-'क्योंकि सुषुप्ति जाग्रत् अवस्थाके श्रमके कारण होती है [इसलिये उसे लोकमें स्वात्मप्राप्ति कहते हैं] ।
जागरिते हि पुण्यापुण्यनिमित्तसुख-जाग्रत् अवस्थामें पुरुष पुण्य-पापके

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५


संस्कृत भाष्यभाष्यार्थ
दुःखाद्यनेकायासानुभवाच्छ्रान्तो भवति; ततश्चायस्तानां करणानामनेकव्यापारनिमित्तग्लानानां स्वव्यापारेभ्य उपरमो भवति । <br><br> श्रुतेश्च “श्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः” ( बृ० उ० १ । ५ । २१ ) इत्येवमादि । तथा च “गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः” ( बृ० उ० २ । १ । १७) इत्येवमादीनि करणानि प्राणग्रस्तानि; प्राण एकोऽश्रान्तो देहे कुलाये यो जागर्ति, तदा जीवः श्रमापनुत्तये स्वं देवतारूपमात्मानं प्रतिपद्यते । <br><br> नान्यत्र स्वरूपावस्थानाच्छ्रमापनोदः स्यादिति युक्ता प्रसिद्धिर्लौकिकानां स्वं ह्यपीतो भवतीति।कारण होनेवाले सुख-दुःख आदि अनेक प्रकारका श्रम अनुभव करनेसे थक जाता है । उसके कारण पीड़ित अर्थात् अनेक प्रकारके व्यापाररूप निमित्तसे शिथिल हुई इन्द्रियोंकी अपने व्यापारोंसे निवृत्ति हो जाती है । <br><br> “वाक् भी थक जाती है और चक्षु भी थक जाती है” इत्यादि श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । इसी प्रकार “[ सुषुप्तिमें विज्ञानमय आत्माद्वारा ] वाक् गृहीत हो जाती है, चक्षु गृहीत हो जाती है, श्रोत्र गृहीत हो जाते हैं और मन गृहीत हो जाता है” इस प्रकार ये सब इन्द्रियाँ प्राणसे गृहीत हो जाती हैं; एक प्राण ही अश्रान्त रहता है जो कि देहरूप घरमें जागता रहता है । उस समय जीव श्रमकी निवृत्तिके लिये अपने स्वाभाविक देवतारूपको प्राप्त हो जाता है, <br><br> क्योंकि स्वरूपमें स्थित होनेके सिवा और कहीं श्रमकी निवृत्ति नहीं हो सकती—इसलिये उस समय वह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है, ऐसी लौकिक पुरुषोंकी प्रसिद्धि ठीक ही है ।

३४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३४६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| दृश्यते हि लोके ज्वरादि-रोगग्रस्तानां तद्विनिर्मोके स्वात्मस्थानां विश्रमणं तद्वदिहापि स्यादिति युक्तम्। "तद्यथा श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः" (बृ० उ० ४।३।१९) इत्यादिश्रुतेश्च ॥ १ ॥ | लोकमें ज्वरादि रोगोंसे ग्रस्त हुए पुरुषोंको उनसे छुटकारा मिलनेपर स्वस्थ होकर विश्राम करते देखा भी जाता ही है; उसी प्रकार यहाँ भी हो सकता है, अतः यह प्रसिद्धि ठीक ही है। यही बात "जिस प्रकार बाज अथवा कोई दूसरा पक्षी सब ओर उड़कर थक जानेपर" इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होती है॥१॥ |

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तत्रायं दृष्टान्तो यथोक्तेऽर्थे—उस उपर्युक्त अर्थमें यह दृष्टान्त है—

स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते प्राणबन्धनꣳहि सोम्य मन इति ॥२॥

जिस प्रकार डोरीमें बँधा हुआ पक्षी दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेपर अपने बन्धनस्थानका ही आश्रय लेता है इसी प्रकार निश्चय ही हे सोम्य ! यह मन दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेसे प्राणका ही आश्रय लेता है, क्योंकि हे सोम्य ! मन प्राणरूप बन्धनवाला ही है ॥ २ ॥

स यथा शकुनिः पक्षी शकुनिघातकस्य हस्तगतेन सूत्रेण प्रबद्धः पाशितो दिशं दिशंजिस प्रकार चिड़ीमारके हाथमें पकड़ी हुई डोरीसे बँधा हुआ— उसमें फँसाया हुआ पक्षी उस बन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छासे

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७


| बन्धनमोक्षार्थी सन्प्रतिदिशं पतित्वान्यत्र बन्धनादायतनमाश्रयं विश्रमणायालब्ध्वाप्राप्य बन्धनमेवोपश्रयते । एवमेव यथायं दृष्टान्तः—खलु हे सोम्य तन्मनस्तत्प्रकृतं षोडशकलमन्नोपचितं मनो निर्धारितम्, तत्प्रविष्टस्तत्स्थस्तदुपलक्षितो जीवस्तन्मन इति निर्दिश्यते । मञ्चाक्रोशनवत्स मनआख्योपाधिर्जीवोऽविद्याकामकर्मोपदिष्टं दिशं दिशं सुखदुःखादिलक्षणां जाग्रत्स्वप्नयोः पतित्वा गत्वानुभूयेत्यर्थः, अन्यत्र सदाख्यात्स्वात्मन आयतनं विश्रमणस्थानमलब्ध्वा प्राणमेव, प्राणेन सर्वकार्यकरणाश्रयेणोपलक्षिता प्राण इत्युच्यते सदाख्या परा देवता, | दिशा-विदिशाओंमें उड़कर विश्राम करनेके लिये बन्धनके सिवा कोई और आयतन--आश्रय न पानेपर बन्धनस्थानका ही अवलम्ब लेता है; उसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, हे सोम्य ! निश्चय ही वह मन — वह सोलह कलाओंवाला प्रकृत मन जो कि अन्नसे उपचित हुआ निश्चय किया गया है, उसमें प्रविष्ट होकर उसीमें स्थित हो, उसके ही द्वारा उपलक्षित होनेवाले जीवका ही वहाँ 'तन्मनः' ( वह मन ) इस कथनके द्वारा निर्देश किया गया है। मञ्चके आक्रोश (बोलने)* की भाँति वह मनसंज्ञक उपाधिवाला जीव जाग्रत् और स्वप्नके समय अविद्या, कामना और कर्मद्वारा उपदिष्ट सुख-दुःखादिरूप दिशा-विदिशामें उड़कर—जाकर अर्थात् उन्हें अनुभव कर अपने सत्-संज्ञक स्वात्मासे अतिरिक्त और कहीं आश्रय—विश्रामस्थान न पाकर प्राणको ही सम्पूर्ण कार्य और करणके आश्रयभूत प्राणद्वारा उपलक्षित हुआ सत्-संज्ञिका परादेवता यहाँ |


* जिस प्रकार 'मञ्चाः क्रोशन्ति' ( मञ्च बोलते हैं ) इस वाक्यमें 'मञ्च' शब्दसे उसपर बैठे हुए लोगोंका ग्रहण होता है उसी प्रकार यहाँ 'मन' शब्दसे मनमें स्थित—मनरूप उपाधिवाला जीव उपलक्षित होता है ।

६४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६४८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| “प्राणस्य प्राणम्” (बृ०उ० ४।४।१८) “प्राणशरीरो भारूपः” (छा० उ० ३।१४।२) इत्यादिश्रुतेः। अतस्तां देवतां प्राणं प्राणाख्यामेवोपश्रयते। प्राणो बन्धनं यस्य मनसस्तत्प्राणबन्धनं हि यस्मात्सोम्य मनः प्राणोपलक्षितदेवताश्रयम्, मन इति तदुपलक्षितो जीव इति ॥ २ ॥ | ‘प्राण’ कहा गया है, जैसा कि “उस प्राणके प्राणको [ जो जानते हैं ]” “वह प्राणशरीर और प्रकाशस्वरूप है” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है; अतः उस प्राण अर्थात् प्राणाख्य देवताको ही आश्रय करता है; क्योंकि हे सोम्य ! प्राण जिसका बन्धन है वह मन प्राणबन्धन है; तात्पर्य यह है कि मन यानी उससे उपलक्षित होनेवाला जीव प्राणोपलक्षित देवताके ही आश्रित है॥२॥ |


—: ० :—

| एवं स्वपितिनामप्रसिद्धिद्वारेण यज्जीवस्य सत्यस्वरूपं जगतो मूलम्, तत्पुत्रस्य दर्शयित्वाथान्नादिकार्यकारणपरम्परयापि जगतो मूलं सद्दिदर्शयिषुः— | इस प्रकार ‘स्वपिति’ इस नामकी प्रसिद्धिद्वारा जीवका जो सत्यस्वरूप जगत्का मूल है उसे पुत्रको दिखलाकर अन्नादि कार्यकारणपरम्परासे भी जगत्के मूलभूत सत्को दिखानेकी इच्छासे आरुणिने कहा— |

अशनापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमूत्पतितꣳ सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥

खण्ड ८ ]शाङ्करभाष्यार्थ६४९

'हे सोम्य ! तू मेरेद्वारा अशना ( भूख ) और पिपासा ( प्यास ) को जान । जिस समय यह पुरुष 'अशिशिषति' ( खाना चाहता है ) ऐसे नामवाला होता है, उस समय जल ही इसके भक्षण किये हुए अन्नको ले जाता है ? जिस प्रकार लोकमें [गौ ले जानेवालेको] गोनाय, [ अश्व ले जानेवालेको ] अश्वनाय और [ पुरुषोंको ले जानेवाले राजा या सेनापतिको ] पुरुषनाय कहते हैं। उसी प्रकार जलको 'अशनाय' ऐसा कहकर पुकारते हैं । हे सोम्य ! उस जलसे ही तू इस [ शरीररूप ] शुङ्ग ( अङ्कुर ) को उत्पन्न हुआ समझ, क्योंकि यह निर्मूल ( कारण-रहित ) नहीं हो सकता ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यभाषार्थ
अशनापिपासे अशितुमिच्छाशना, यालोपेन; पातुमिच्छा पिपासा ते अशनापिपासे अशनापिपासयोः सतत्त्वं विजानीहीत्येतत् । यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम पुरुषो भवति, किं तत् ? अशिशिषत्यशितुमिच्छतीति तदा तस्य पुरुषस्य किंनिमित्तं नाम भवति ? इत्याह—यत्तत्पुरुषेणाशितमन्नं कठिनं पीता आपो नयन्ते द्रवीकृत्य रसादिभावेन विपरिणमयन्ते, तदा भुक्तमन्नंअशनापिपासे—अशन ( भक्षण ) की इच्छाको 'अशना' कहते हैं, 'या' का लोप करनेसे अशना शब्द बनता है [ वस्तुतः यह 'अशनाया' शब्द है ] और पीनेकी इच्छा 'पिपासा' कहलाती है। ये ही अशना-पिपासा हैं; इन अशना-पिपासाका तत्त्व तू जान ले—ऐसा इसका तात्पर्य है। जब अर्थात् जिस समय यह पुरुष इस नामवाला होता है, किस नामवाला ?—'अशिशिषति' अर्थात् खाना चाहता है; उस समय पुरुषका यह नाम किस कारणसे होता है ? सो बतलाते हैं—उस पुरुषद्वारा खाया हुआ जो कठिन अन्न होता है उसे उसका पीया हुआ जल द्रवीभूत करके ले जाता है अर्थात् रसादि-रूपसे परिणत कर देता है । तभी

३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| जीर्यति । अथ च भवत्यस्य नामाशिषिषतीति गौणम् । जीर्णेऽन्नेऽशितुमिच्छति सर्वो हि जन्तुः ।<br><br>तत्रापामशितनेतृत्वादशनाया इति नाम प्रसिद्धमित्येतस्मिन्नर्थे । यथा गोनायो गां नयतीति गोनाय इत्युच्यते गोपालः, तथाश्वान्नयतीत्यश्वनायोऽश्वपाल इत्युच्यते, पुरुषनायः पुरुषान्नयतीति राजा सेनापतिर्वा, एवं तत्तदाप आचक्षते लौकिका अशनायेति विसर्जनीयलोपेन ।<br><br>तत्रैवं सत्यङ्गी रसादिभावेन नीतेनाशितेनान्नेन निष्पादितमिदं शरीरं वटकणिकायामिव | उसका भक्षण किया हुआ अन्न पचता है । तत्पश्चात् उसका ‘अशिषिषति’ ऐसा गौण नाम होता है, क्योंकि सभी जीव अन्नके जीर्ण हो जानेपर ही भोजन करनेकी इच्छा करते हैं ।<br><br>अशित (भक्षित अन्न) का नेता (ले जानेवाला) होनेके कारण जलका ‘अशनाया’ ऐसा नाम प्रसिद्ध है । [इस विषयमें यह दृष्टान्त है-] जिस प्रकार ‘गोनायः’ गौको ले जाता है इसलिये ग्वाला ‘गोनायः’ कहा जाता है, तथा अश्वोंको ले जाता है इसलिये अश्वपाल ‘अश्वनायः’ ऐसा कहा जाता है और पुरुषोंको ले जाता है इसलिये राजा या सेनापति ‘पुरुषनायः’ कहलाता है । इसी प्रकार उस समय [अशितको ले जानेके कारण] लौकिक पुरुष जलको ‘अशनाय’ ऐसा विसर्गका लोप करके कहते हैं [अर्थात् ‘अशनायः’ इस पदके विसर्गका लोप करके ‘अशनाय’ ऐसा कहते हैं] ।<br><br>ऐसा होनेपर ही जलद्वारा रसादिभावको प्राप्त हुए अन्नद्वारा निष्पन्न हुआ यह शरीररूप अङ्कुर वटके बीजसे उत्पन्न होनेवाले अङ्कुर- |

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५१


शुङ्गोऽङ्कुर उत्पतित उद्गतः; तमिमं शुङ्गं कार्यं शरीराख्यं वटादिशुङ्गवदुत्पतितं हे सोम्य विजानीहि । किं तत्र विज्ञेयम् ? इत्युच्यते—शृण्विदं शुङ्गवत्कार्यत्वाच्छरीरं नामूलं मूलरहितं भविष्यति ॥ ३ ॥के समान उत्पन्न हुआ है। हे सोम्य ! वटादिके अङ्कुरके समान उत्पन्न हुए उस इस शरीरसंज्ञक शुंग—कार्यको तू जान । उसमें क्या विज्ञेयं है ? सो बतलाया जाता है—सुन, अङ्कुरके समान कार्यरूप होनेके कारण यह शरीर अमूल—कारणरहित नहीं हो सकता ॥ ३ ॥

—: ० :—

इत्युक्त आह श्वेतकेतुः—<br>यद्येवं समूलमिदं शरीरं वटादिशुङ्गवत्तस्यास्य शरीरस्य क्व मूलं स्याद्भवेदित्येवं पृष्ट आह पिता—[ आरुणिद्वारा ] इस प्रकार कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला 'यदि इस प्रकार वटादिके अङ्कुरके समान यह शरीर समूल है तो इसका मूल कहाँ हो सकता है ? इस प्रकार पूछे जानेपर पिताने कहा—

तस्य क्व मूलꣳस्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यानेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥

अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है ? इसी प्रकार हे सोम्य ! तू अन्नरूप शुंगके द्वारा जलरूप मूलको खोज और हे सोम्य ! जलरूप शुङ्गके द्वारा तेजोरूप मूलको खोज तथा तेजोरूप शुङ्गके द्वारा सद्रूप मूलका अनुसंधान कर । हे सोम्य ! इस प्रकार यह सारी प्रजा सन्मूलक है तथा सत् ही इसका आश्रय है और सत् ही प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥

६५२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६

६५२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६


| तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादन्नं मूलमित्यभिप्रायः। कथम्? अशितं ह्यन्नमद्भिर्द्रवीकृतं जाठरेणाग्निना पच्यमानं रसभावेन परिणमते। रसाच्छोणितं शोणितान्मांसं मांसान्मेदो मेदसोऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जा मज्जायाः शुक्रम्। तथा योषिद्भुक्तं चान्नं रसादिक्रमेणैव परिणतं लोहितं भवति। ताभ्यां शुक्रशोणिताभ्यामन्नकार्याभ्यां संयुक्ताभ्यामन्नेनैवं प्रत्यहं भुज्यमानेनापूर्यमाणाभ्यां कुड्यमिव मृत्पिण्डैः प्रत्यहमुपचीयमानोऽन्नमूलो देहशुङ्गः परिनिष्पन्न इत्यर्थः। | अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है? तात्पर्य यह है कि अन्न ही इसका मूल है किस प्रकार? क्योंकि खाया हुआ अन्न ही जलके द्वारा द्रवीभूत होकर जठराग्निद्वारा पचाया जानेपर रसरूपमें परिणत हो जाता है। वह रससे रक्त, रक्तसे मांस, मांससे मेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मज्जा और मज्जासे वीर्यरूपमें परिणत होता है। इसी प्रकार स्त्रीद्वारा खाया हुआ अन्न रसादिके क्रमसे परिणत होकर रज बनता है। उस परस्पर मिले हुए अन्नके कार्य तथा प्रतिदिन खाये जानेवाले अन्नसे पुष्ट हुए वीर्य और रजसे मृत्तिकाके पिण्डसे भीतके समान प्रतिदिन पुष्ट होनेवाला यह अन्नमूलक देहरूप अङ्कुर निष्पन्न हुआ है—ऐसा इसका तात्पर्य है? | | यत्तु देहशुङ्गस्य मूलमन्नं निर्दिष्टं तदपि देहवद्विनाशोत्पत्तिमत्वात्कस्माच्चिन्मूलादुत्पत्तितं शुङ्ग एवेति कृत्वाह—यथा | इस प्रकार जो देहरूप अङ्कुरका मूल अन्न बतलाया गया है वह भी देहके समान उत्पत्ति-नाशवाला होनेके कारण किसी मूलसे उत्पन्न हुआ अङ्कुर ही है—ऐसा मानकर आरुणि कहता है—'हे सोम्य! |

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३


| देहशुङ्गोऽन्नमूल एवमेव खलु सोऽस्यान्नेन शुङ्गेन कार्यभूतेनापो मूलमन्नस्य शुङ्गस्यान्विच्छ प्रतिपद्यस्व। अपामपि विनाशोत्पत्तिमत्त्वाच्छुङ्गत्वमेवेति, अद्भिः सोम्य शुङ्गेन कार्येण कारणं तेजो मूलमन्विच्छ। तेजसोऽपि विनाशोत्पत्तिमत्त्वाच्छुङ्गत्वमिति, तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमेकमेवाद्वितीयं परमार्थसत्यम्। | जिस प्रकार देहरूप अङ्कुर अन्नमूलक है उसी प्रकार कार्यभूत अन्नरूप अङ्कुरके द्वारा तू अन्नरूप अङ्कुरके मूल जलको खोज-प्राप्त कर। जल भी उत्पत्ति-नाशवान् होनेके कारण अङ्कुररूप ही है; अतः हे सोम्य! जलरूप शुंग यानी कार्यके द्वारा तू उसके मूल कारण तेजको खोज। नाशोत्पत्तिमान् होनेके कारण तेजका भी शुंगत्व ही है; अतः हे सोम्य! तेजरूप शुंगके द्वारा तू एकमात्र अद्वितीय परमार्थ सत्य सद्रूप मूलकी शोध कर। | | यस्मिन्सर्वमिदं वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं रज्ज्वामिव सर्पादिविकल्पजातमध्यस्तमविद्यया तदस्य जगतो मूलमतः सन्मूलाः सत्कारणा हे सोम्येमाः स्थावरजङ्गमलक्षणाः सर्वाः प्रजा न केवलं सन्मूला एवेदानीमपि स्थितिकाले सदायतना सदाश्रया एव ! न हि मृदमाश्रित्य घटादेः सत्त्वं स्थितिर्वास्ति। अतो मृद्वत्सन्मूलत्वात्प्रजानां सदाय- | जिस सद्रूप मूलमें यही वाणीरूप आश्रयवाला नाममात्र विकार रज्जुमें सर्पके समान अविद्यासे अध्यस्त है वही इस जगत्का मूल है। अतः हे सोम्य! यह स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सद्रूप कारणवाली है। यह सन्मूलक ही नहीं, इस समय स्थितिकालमें भी सदायतना अर्थात् सद्रूप आश्रयवाली ही है, क्योंकि मृत्तिकाको आश्रय किये बिना घटादिकी सत्ता अथवा स्थिति है ही नहीं। अतः मृत्तिकाके समान सन्मूलक होनेके कारण |

६५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६५४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तनं यासां ताः सदायतनाः प्रजाः, अन्ते च सत्प्रतिष्ठाः सदेव प्रतिष्ठा लयः समाप्तिरवसानं परिशेषो यासां ताः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥ | जिस प्रजाका सत् ही आयतन (आश्रय) है वह प्रजा सदायतना है तथा अन्तमें सत्प्रतिष्ठा है—सत् ही जिसकी प्रतिष्ठा—लयस्थान—समाप्ति—अवसान अर्थात् परिशेष है ऐसी वह प्रजा सत्प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥ |

—: ० :—

अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्‌गमुत्पतितꣳसोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥

अब; जिस समय यह पुरुष ‘पिपासति’ (पीना चाहता है) ऐसे नामवाला होता है तो उसके पीये हुए जलको तेज ही ले जाता है। अतः जिस प्रकार गोनाय, अश्वनाय एवं पुरुषनाय कहलाते हैं उसी प्रकार उस तेजको ‘उदन्या’ ऐसा कहकर पुकारते हैं। हे सोम्य! उस (जलरूप मूल) से यह शरीररूप अङ्कुर उत्पन्न हुआ है—ऐसा जान, क्योंकि यह मूलरहित नहीं हो सकता ॥ ५ ॥

| यथेदानीमप्शृङ्गद्वारेण सतो मूलस्यानुगमः कार्य इत्याह-यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम पिपासति पातुमिच्छतीति पुरुषो भवति। अशिशिषतीतिवदिदमपि गौणमेव नाम भवति। द्रवीकृतस्याशितस्यान्नस्य नेत्र्य आपो- | अब—इस समय जलरूप अङ्कुरके द्वारा सद्रूप मूलका ज्ञान कराना है, इस अभिप्रायसे आरुणि कहता है—‘जिस समय यह पुरुष ‘पिपासति’—पीना चाहता है ऐसे नामवाला होता है। ‘अशिशिषति’ इस नामके समान यह भी उसका गौण नाम ही है। भक्षण किये हुए द्रवीकृत अन्नको ले जानेवाला |

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ऽन्नशृङ्गं देहं क्लेदयन्त्यः शिथिलीकुर्युरब्बाहुल्याद्यदि तेजसा न शोष्यन्ते । नितरां च तेजसा शोष्यमाणास्वप्सु देहभावेन परिणममानासु पातुमिच्छा पुरुषस्य जायते । तदा पुरुषः पिपासति नाम ।<br><br>तदेतदाह--तेज एव तत्तदा पीतमन्वादि शोषयद्देहगतलोहितप्राणभावेन नयते परिणमयति । तद्यथा गोनाय इत्यादि समानमेवं तत्तेज आचष्टे लोक उदन्येत्युदकं नयतीत्युदन्यम् । उदन्येतिच्छान्दसं तत्रापि पूर्ववत् अपामप्येतदेव शरीराख्यं शृङ्गं नान्यदित्येवमादि समानमन्यत् ॥ ५ ॥जल, यदि उसे तेजके द्वारा शोषित न किया जाता तो अपनी बहुलताके कारण अन्नके अङ्कुरभूत देहको आर्द्र करके शिथिल कर देता । देहभावमें परिणत होते हुए जलके तेजद्वारा सर्वथा शोषित किये जानेपर ही पुरुषको जल पीनेकी इच्छा होती है । उसी समय पुरुष 'पिपासति' इस नामवाला होता है ।<br><br>उसी बातको श्रुति इस प्रकार कहती है--'उस समय पीये हुए जल आदिको तेज ही सुखाकर देहगत रक्त एवं प्राणभावको ले जाता है अर्थात् उसे रक्त एवं प्राणरूपमें परिणत कर देता है । उसे जिस प्रकार कि 'गोनाय' आदि शब्द हैं उसी प्रकार लोक उस तेजको 'उदन्या' उदकको ले जानेके कारण 'उदन्य' कहते हैं । तेजके अर्थमें भी 'उदन्या' यह प्रयोग पूर्ववत् (जलके अर्थमें 'अशनाया'के समान) छान्दस है । जलका भी यह शरीर नामक अङ्कुर ही है--उससे भिन्न नहीं है--इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥५॥

६५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

६५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६


तस्य क्व मूलँस्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥

हे सोम्य ! उस (जलके परिणामभूत शरीर) का जलके सिवा और कहाँ मूल हो सकता है ? हे प्रियदर्शन ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तू तेजोरूप मूलकी खोज कर और हे सोम्य ! तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सदरूप मूलकी शोध कर । हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सदरूप आयतन और सदरूप प्रतिष्ठा (लयस्थान) वाली है । हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो जाता है वह मैंने पहले ही कह दिया । हे सोम्य मरणको प्राप्त होते हुए इस पुरुषकी वाक् मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है ॥ ६ ॥


| सामर्थ्यात्तेजसोऽप्येतदेव शरीराख्यं शुङ्गम् । अतोऽप्शुङ्गेन देहेनापो मूलं गम्यते । अद्भिः शुङ्गेन तेजो मूलं गम्यते । तेजसा शुङ्गेन सन्मूलं गम्यते पूर्ववत् । एवं हि तेजोऽबन्नमयस्य | त्रिवृत्करणके सामर्थ्यसे यह ज्ञात होता है कि तेजका भी यही शरीर-संज्ञक शुङ्ग (कार्य) है ? अतः जलके कार्यभूत देहद्वारा उसके मूल जलका ज्ञान होता है, जलरूप कार्यसे उसके मूल तेजका पता लगता है तथा तेजोरूप कार्यसे उसके मूल सतका ज्ञान होता है—ऐसा पूर्ववत समझना चाहिये । इस प्रकार तेज, जल और अन्नके |

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७


देहशुङ्गस्य वाचारम्भणमात्रस्यान्नादिपरम्परया परमार्थसत्यं सन्मूलमभयमसंत्रासं निरायासं सन्मूलमन्विच्छेति पुत्रं गमयित्वाऽशिशिषति पिपासतीति नामप्रसिद्धिद्वारेण यदन्यदिहास्मिन्प्रकरणे तेजोऽबन्नानां पुरुषेणोपयुज्यमानानां कार्यकारणसंघातस्य देहशुङ्गस्य स्वजात्यसाङ्कर्येणोपचयकरत्वं वक्तव्यं प्राप्तं तदिहोक्तमेव द्रष्टव्यमिति पूर्वोक्तं व्यपदिशति ।विकार वाचारम्भणमात्र देहरूप कार्यके परमार्थ सत्य निर्भय निस्त्रास और निरायास सद्‌रूप मूलको अन्नादि परम्परासे जान—ऐसा पुत्रको समझाकर और इसके सिवा ‘अशिशिषति’ और ‘पिपासति’ इन नामोंकी प्रसिद्धिके द्वारा इस प्रकरणमें जो पुरुषद्वारा उपभोगमें लाये जानेवाले तेज, जल और अन्नका अपनी जातिका सांकर्य न करते हुए भूत और इन्द्रियोंके संघातभूत इस शरीरका पोषकत्व बतलाना प्राप्त होता था वह भी ऊपर बतला ही दिया गया है—ऐसा जानना चाहिये—यह बतलानेके लिये आरुणि पहले कहे हुए प्रसंगका ही निर्देश करता है।
यथा नु खलु येन प्रकारेणेमास्तेजोऽबन्नाख्यास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यन्नमशितं त्रेधा विधीयत इत्यादि तत्रैवोक्तम् । अन्नादीनामशितानां ये मध्यमा धातवस्ते सप्तधातुकंहे सोम्य ! जिस प्रकार ये तेज, जल और अन्नसंज्ञक तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर इनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत-त्रिवृत् हो जाता है वह पहले ही कहा जा चुका है। ‘खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है’ यह बात वहीं कही गयी है। वहीं यह भी बतलाया गया है कि भक्षण किये हुए अन्नादिका जो

३५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३५८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| शरीरमुपचिन्वन्तीत्युक्तम्। मांसं भवति लोहितं भवति मज्जा भवत्यस्थि भवतीति। ये त्वणिष्ठा धातवो मनः प्राणं वाचं देहस्यान्तःकरण संघातमुपचिन्वन्तीति चोक्तम्—तन्मनो भवति स प्राणो भवति सा वाग्भवतीति। | मध्यम भाग होता है वह सात धातुओंवाले*शरीरका पोषण करता है; यथा—'मांस होता है', 'लोहित होता है', 'मज्जा होता है', 'अस्थि होता है' इत्यादि। तथा यह भी बतलाया गया है कि उनका जो सूक्ष्मतम भाग होता है वह मन, प्राण और वाक् इस देहके अन्तःकरणसंघातका पोषण करता है। यथा—'वह मन होता है', 'वह प्राण होता है' 'वह वाक होती है' इत्यादि। | | सोऽयं प्राणकरणसंघातो देहे विशीर्णे देहान्तरं जीवाधिष्ठितो येन क्रमेण पूर्वदेहात्प्रच्युतो गच्छति तदाहास्य हे सोम्य पुरुषस्य प्रयतो म्रियमाणस्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनस्युपसंह्रियते। अथ तदाहुर्ज्ञातयो न वदतीति। मनःपूर्वो हि वाग्व्यापारः, "यद्धै मनसा ध्यायति | वह यह प्राण और इन्द्रियोंका संघात देहके नष्ट होनेपर जीवसे अधिष्ठित हुआ जिस क्रमसे पूर्व देहसे च्युत होकर अन्य देहको प्राप्त होता है उसका वर्णन आरुणि करता है—'हे सोम्य ! इस पुरुषके मरते समय वाणी मनको प्राप्त हो जाती है अर्थात् वाणीका मनमें उपसंहार हो जाता है। उस समय जातिवाले कहा करते हैं कि 'यह नहीं बोलता' क्योंकि वाणीका व्यापार तो मनःपूर्वक ही होता है; जैसा कि "जो बात मनसे सोचता |


* शरीरके आधारभूत सात धातु ये हैं-त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि और वीर्य।

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६५९

संस्कृत-मूलहिन्दी-भाष्यार्थ
तद्वाचा वदति" (नृ० पू० ता० उ० १ । १) इति श्रुतेः ।है वही वाणीसे बोलता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
वाच्युपसंहृतायां मनसि मनो मननव्यापारेण केवलेन वर्तते ।वाणीका मनमें उपसंहार हो जानेपर मन केवल मननव्यापार करता हुआ वर्तमान रहता है ।
मनोऽपि यदोपसंह्रियते तदा मनः प्राणे सम्बद्धं भवति-सुषुप्तकाल इव; तदा पार्श्वस्था ज्ञातयो न विजानातीत्याहुः । प्राणश्च तदोर्ध्वोच्छवासी स्वात्मन्युपसंहृतबाह्यकरणः संवर्गविद्यायां दर्शनाद्धस्तपादादीन्विक्षिपन्मर्मस्थानानि निकृन्तन्निव उत्सृजन्क्रमेणोपसंहृतस्तेजसि सम्पद्यते । तदाहुर्ज्ञातयो न चलतीति । मृतो नेति वा विचिकित्सन्तो देहमालभमाना उष्णं चोपलभमाना देह उष्णो जीवतीति । यदाजिस समय मनका भी उपसंहार होता है उस समय मन प्राणमें लीन हो जाता है । तब आस-पास बैठे हुए जातिवाले कहते हैं—'अब यह पहचानता नहीं है' उस समय, जिसने बाह्य इन्द्रियोंका अपनेमें उपसंहार कर लिया है वह प्राण ऊर्ध्वोच्छ्वासी होकर—क्योंकि संवर्ग विद्यामें※ [ प्राण, वागादिको अपनेमें लीन कर लेता है—ऐसा ] दिखलाया गया है—हाथ-पाँव पटकता हुआ मानो मर्मस्थानोंका छेदन करता बहिर्गत होनेके लिये क्रमशः उपसंहृत होकर तेजमें लीन हो जाता है । तब जातिवाले कहते हैं—'अब हिल-डुल नहीं सकता' । फिर यह शङ्का करते हुए कि अभी मरा है या नहीं वे देहका स्पर्श करते हैं और देहमें उष्णता देखकर कहते हैं 'अभी शरीर उष्ण है, अतः जीता है' । जिस समय

※ देखिये छान्दोग्य० ४ । ३ । ३ ।

६६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तदप्यौष्ण्यलिङ्गं तेज उपसंह्रियते तदा तत्तेजः परस्यां देवतायां प्रक्षाम्यति ।<br><br>तदैवं क्रमेणोपसंहृते स्वमूलं प्राप्ते च मनसि तत्स्थो जीवोऽपि सुषुप्तकालवन्निमित्तोपसंहारादुपसंह्रियमाणः सन्सत्याभिसन्धिपूर्वकं चेदुपसंह्रियते सदेव सम्पद्यते न पुनर्देहान्तराय सुषुप्तादिवोत्तिष्ठति । यथा लोके सभये देशे वर्तमानः कथञ्चिदिवाभयं देशं प्राप्तस्तद्वत् । इतरस्त्वनात्मज्ञस्तस्मादेव मुलात्सुषुप्तादिवोत्थाय मृत्वा पुनर्देहजालमाविशति यस्मान्मूलादुत्थाय देहमाविशति जीवः ॥ ६ ॥ | उष्णता ही जिसका लिङ्ग है वह तेज भी उपसंहृत हो जाता है तब वह तेज परदेवतामें प्रशान्त होता है ।<br><br>तब इस प्रकार क्रमशः उपसंहृत होकर मनके अपने मूलभूत पर देवताको प्राप्त होनेपर उसमें स्थिर जीव भी सुषुप्तकालके समान अपने निमित्त [ मन ] का उपसंहार हो जानेके कारण उपसंहृत होता हुआ यदि सत्यानुसंधानपूर्वक उपसंहृत होता है तो सत्‌को ही प्राप्त हो जाता है; सोनेसे जगे हुए पुरुषके समान फिर देहान्तरको प्राप्त नहीं होता; जिस प्रकार कि लोकमें भयपूर्ण देशमें रहनेवाला कोई प्राणी किसी प्रकार अभय देशमें पहुँच जानेपर [ फिर उससे नहीं लौटता ] उसी प्रकार [यह भी नहीं लौटता] । किंतु अन्य जो अनात्मज्ञ है वह सोनेसे जगे हुए पुरुषके समान मरनेके अनन्तर उस अपने मूलसे, जिस मूलसे कि जीव उठकर देहमें प्रवेश करता है, उठकर फिर देहपाशमें प्रवेश करता है ॥ ६ ॥ |


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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६६१


स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवा-न्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥

वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है [ आरुणिके इस प्रकार कहने-पर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ७ ॥


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
स यः सदाख्य एष उक्तोऽणिमाणुभावो जगतो मूलमैतदात्म्यमेतत्सदात्मा यस्य सर्वस्य तदेतदात्म तस्य भाव ऐतदात्म्यम् । एतेन सदाख्येनात्मनात्मवत्सर्वमिदं जगत् । नान्योऽस्त्यस्यात्मा संसारी, “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ” (बृ०उ० ३ । ८ । ११) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् ।<br><br>येन चात्मनात्मवत्सर्वमिदं जगत्तदेव सदाख्यं कारणं सत्यं परमार्थसत् । अतः स एवात्मा जगतः प्रत्यक्स्वरूपं सतत्त्वं याथात्म्यम् । आत्मशब्दस्य निरुपपदस्य प्रत्यगा-यह जो सत्संज्ञक अणिमा—अणुता जगत्का मूल बतलायी गयी है 'ऐतदात्म्य' यह सब है—जिस सबकी एतत् (यह) सत् आत्मा है उसे 'एतदात्म' कहते हैं उसका भाव 'ऐतदात्म्य' है; अर्थात् इस सत्संज्ञक आत्मासे यह सारा जगत् आत्मवान् है। इसका आत्मा कोई और संसारी नहीं है; जैसा कि “इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है, इससे अन्य कोई श्रोता नहीं है” इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है।<br><br>जिस आत्मासे यह सारा जगत् आत्मवान् है वही सत्संज्ञक कारण सत्य अर्थात् परमार्थ सत् है। अतः वह आत्मा ही जगत्का प्रत्यक् स्वरूप—सतत्त्व अर्थात् याथात्म्य है, क्योंकि जिस प्रकार गो आदि शब्द बैल, गाय आदि अर्थमें रूढ़