छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८८४ | छाान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८८४ | छाान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| तदप्यनयोः श्रवणगोचरत्वमेष्यतीति मत्वोवाच प्रजापतिः । अनुपलभ्य यथोक्तलक्षणमात्मानमननुविद्य स्वात्मप्रत्यक्षं चाकृत्वा विपरीतनिश्चयौ च भूत्वेन्द्रविरोचनावेतौ व्रजतो गच्छेयाताम् । अतो यतरे देवा वासुरा वा किं विशेषितेनैतदुपनिषद आभ्यां या गृहीतात्मविद्या सेयमुपनिषद्येषां देवानामुसुराणां वा त एतदुपनिषद एवंविज्ञाना एतन्निश्चया भविष्यन्तीत्यर्थः । ते किं पराभविष्यन्ति श्रेयोमार्गात्पराभूता बहिर्भूता विनष्टा भविष्यन्तीत्यर्थः । | वाक्यके समान यह वचन भी उनके कानोंमें पड़ जायगा; कहा— 'ये इन्द्र और विरोचन उपर्युक्त लक्षणवाले आत्माको बिना जाने—उसे अपने प्रत्यक्ष किये बिना विपरीत निश्चयवाले होकर जा रहे हैं। इसलिये विशेषरूपसे क्या कहा जाय, जो भी देवता या असुर इस उपनिषद्वाले होंगे—इनके द्वारा जो आत्मविद्या ग्रहण की गयी है वही जिन देवता या असुरोंकी उपनिषद् होगी वे ऐसे उपनिषद्—ऐसे विज्ञान अर्थात् ऐसे निश्चयवाले जो भी होंगे। उनका क्या होगा ? उनका पराभव होगा। तात्पर्य यह है कि वे श्रेयोमार्गसे पराभूत—बहिर्भूत अर्थात् विनष्ट हो जायेंगे।' | | स्वगृहं गच्छतोः सुरासुरराजयोर्योऽसुरराजः स ह शान्तहृदय एव संन्विरोचनोऽसुराञ्जगाम । गत्वा च तेभ्योऽसुरेभ्यः शरीरात्मबुद्धिर्योपनिषत्तामेतामुपनिषदं प्रोवाचोक्तवान् । देहमात्रमेवात्मा पित्रोक्त इति । | अपने घरको जानेवाले देवराज और असुरराजोंमें जो असुरराज था वह विरोचन शान्तचित्तसे ही असुरोंके पास पहुँचा। तथा वहाँ पहुँचकर उन असुरोंके प्रति जो देहात्मबुद्धिरूप उपनिषद् थी वही उपनिषद् सुना दी। अर्थात् यह कह दिया कि प्रजापतिने देहको ही आत्मा बतलाया है। इसलिये |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८५
| तस्मादात्मैव देह इह लोके महय्यः पूजनीयस्तथा परिचर्यः परिचरणीयस्तथात्मानमेवेह लोके देहं महयन् परिचरंश्चोभय- लोकाववाप्नोतीमं चामुं च। इह- लोकपरलोकयोरेव सर्वे लोकाः कामाश्चान्तर्भवन्तीति राज्ञोऽभि- प्रायः ॥ ४ ॥ | इस लोकमें देहरूप आत्मा ही महय्य—पूजनीय तथा परिचर्य—सेवनीय है और इस लोकमें देहरूप आत्माकी ही पूजा-सेवा करनेसे इस और उस दोनों लोकोंको प्राप्त कर लेता है। इस लोक और परलोकमें ही सम्पूर्ण लोक और भोग अन्तर्भूत होते हैं—ऐसा राजा विरोचनका अभिप्राय है ॥४॥ |
तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणां ह्येषोपनिषत्प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसने- नालङ्कारेणेति संस्कुर्वन्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५ ॥
इसीसे इस लोकमें जो दान न देनेवाला, श्रद्धा न करनेवाला और यजन न करनेवाला पुरुष होता है उसे शिष्टजन 'अरे ! यह तो आसुर (आसुरीस्वभाववाला) ही है' ऐसा कहते हैं। यह उपनिषद् असुरोंकी ही है। वे ही मृतक पुरुषके शरीरको [ गन्ध-पुष्प-अन्नादि ] भिक्षा, वस्त्र और अलंकारसे सुसज्जित करते हैं और इसके द्वारा हम परलोक प्राप्त करेंगे—ऐसा मानते हैं ॥ ५ ॥
| तस्मात्तत्सम्प्रदायोऽद्याप्यनुव- <br><br> र्तत इतीह लोकेऽददानं दानम- <br><br> कुर्वाणमविभागशीलमश्रद्दधानं <br><br> सत्कार्येषु श्रद्धारहितं यथाश- | इसीसे उन (असुरों) का सम्प्रदाय इस समय भी विद्यमान है। अतः इस लोकमें अददान—दान न करनेवाले अर्थात् जिसका स्वभाव अपने धनका विभाग करनेका नहीं है, अश्रद्दधान-- |
८८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| क्त्ययजमानमयजनस्वभावमाहु-<br>रासुरः खल्वयं यत एवंस्वभावो<br>बतेति खिद्यमाना आहुः शिष्टाः।<br>असुराणां हि यस्मादश्रद्दधानता-<br>दिलक्षणैषोपनिषत् ।<br><br>तयोपनिषदा संस्कृताः सन्तः<br>प्रेतस्य शरीरं कुणपं भिक्षया<br>गन्धमाल्यान्नादिलक्षणया वस-<br>नेन वस्त्रादिनाच्छादनादिप्रका-<br>रेणालङ्कारेण ध्वजपताकादिक-<br>रणेनेत्येवं संस्कुर्वन्त्येतेन कुणप-<br>संस्कारेणामुं प्रेत्य प्रतिपत्तव्यं<br>लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥५॥ | सत्कार्योंमें श्रद्धा न रखनेवाले और<br>अयजमान—जिसका स्वभाव<br>यथाशक्ति यजन करनेका नहीं है<br>उस पुरुषको शिष्टजन 'क्योंकि<br>यह ऐसे स्वभाववाला है इसलिये<br>निश्चय यह आसुर ही है' ऐसा<br>खेद करते हुए कहते हैं; क्योंकि<br>यह अश्रद्धानता आदि लक्षणोंवाली<br>उपनिषद् असुरोंकी ही है।<br><br>उस उपनिषद्से संस्कारयुक्त<br>होकर वे मृतक पुरुषके शरीर अर्थात्<br>शवको गन्ध, पुष्प एवं अन्नादिरूप<br>भिक्षा, वसन--वस्त्रादिद्वारा<br>आच्छादनादि करनेकी विधिसे और<br>ध्वजा-पताकादि लगानेरूप<br>अलंकारसे संस्कृत करते हैं और<br>ऐसा मानते हैं कि इस शवके<br>संस्कारसे हम मरकर अपने प्राप्त<br>होनेयोग्य लोकको प्राप्त कर लेंगे।५। |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये ऽष्टमखण्ड-
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥
नवम खण्ड
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इन्द्रका पुनः प्रजापतिके पास आना
अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्शरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवा-यमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परि-वृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥
किंतु इन्द्रको देवताओंके पास बिना पहुँचे ही यह भय दिखायी दिया। जिस प्रकार इस शरीरके अच्छी प्रकार अलंकृत होनेपर यह (छायात्मा) अच्छी तरह अलंकृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होता है उसी प्रकार इसके अंधे होनेपर अंधा हो जाता है, स्राम होनेपर स्राम हो जाता है और खण्डित होनेपर खण्डित हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह भी नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥
| अथ ह किलेन्द्रोऽप्राप्यैव देवान् दैव्याक्रौर्यादिसम्पदा युक्तत्वाद्गुरोर्वचनं पुनः पुनः स्मरन्नेव गच्छन्नेतद्वक्ष्यमाणं भयं स्वात्मग्रहणनिमित्तं ददर्श दृष्टवान् । उदशरावदृष्टान्तेन | किंतु इन्द्रने देवताओंके पास बिना पहुँचे ही, क्योंकि वे अक्रूरता आदि दैवीसम्पत्तिसे युक्त थे इसलिये गुरुवाक्योंको बारंबार स्मरण करते हुए जाते-जाते अपने किये हुए आत्मस्वरूपके ग्रहणके कारण यह भय देखा। जलपात्रके दृष्टान्तसे प्रजापतिने जिसके लिये [अर्थात् देहका अनात्मत्व प्रदर्शित |
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८८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| प्रजापतिना यदर्थो न्याय उक्तस्तदेकदेशो मघवतः प्रत्यभाद्बुद्धौ, येन च्छायात्मग्रहणे दोषं ददर्श । | करनेके लिये जो व्यभिचारित्वरूप ] न्याय प्रदर्शित किया था उसका एकदेश इन्द्रकी बुद्धिमें स्फुरित हुआ, जिससे कि उन्हें छायाको आत्मरूपसे ग्रहण करनेमें दोष दीखने लगा । |
| कथम् ? यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलंकृते छायात्मापि साध्वलंकृतो भवति सुवसने च सुवसनः परिष्कृते परिष्कृतो यथानखलोमादिदेहावयवापगमे छायात्मापि परिष्कृतो भवति नखलोमादिरहितो भवति; एवमेवायं छायात्माप्यस्मिञ्छरीरे नखलोमादिभिर्देहावयवत्वस्य तुल्यत्वादन्धे चक्षुषोपगमेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः । स्रामः किलैकनेत्रस्तस्यान्धत्वेन गतत्वात् । चक्षुर्नासिका वा यस्य सदा स्रवति स स्रामः । परिवृक्णश्छिन्न- | कैसा दोष दिखायी दिया ?—जिस प्रकार निश्चय ही इस शरीरके अच्छी तरह अलंकृत होनेपर यह छायात्मा अच्छी तरह अलंकृत हो जाता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होता है अर्थात् नखलोमादि शरीरके अवयवोंकी निवृत्ति होनेपर छायात्मा भी परिष्कृत — नखलोमादिरहित हो जाता है; उसी प्रकार यह छायात्मा भी—इस शरीरमें नखलोमादिसे चक्षुआदिकी देहावयवत्वमें समानता होनेके कारण [ शरीरके ] अंधे होनेपर अंधा हो जाता है, स्राम होनेपर स्राम हो जाता है। स्रामका प्रसिद्ध अर्थ एक नेत्रवाला है, किंतु वह अन्धत्वसे ही गतार्थ हो जाता है इसलिये जिसके चक्षु या नासिका सदा स्रवित होते रहते हैं उसे 'स्राम' समझना चाहिये । परिवृक्ण—जिसके हाथ या पैर |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८८९
| हस्तश्छिन्नपादो वा । स्रामे परिवृक्णे वा देहे छायात्मापि तथा भवति । तथास्य देहस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥ | कट गये हों। शरीरके स्राम या परिवृक्ण होनेपर छायात्मा भी वैसा ही हो जाता है; तथा इस देहका नाश होनेपर यह भी नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ |
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| अतः— | अतः— |
नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति स समित्पाणिः पुनरे- याय तꣳह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्रा- जीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयं भगवोऽस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
‘इस [छायात्मदर्शन] में मैं कोई भोग्य नहीं देखता।’ इसलिये वे समित्पाणि होकर फिर प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा—‘इन्द्र! तुम तो विरोचनके साथ शान्तचित्त होकर गये थे, अब किस इच्छासे पुनः आये हो?’ उन्होंने कहा—‘भगवन्! जिस प्रकार यह (छायात्मा) इस शरीरके अच्छी तरह अलंकृत होनेपर अच्छी तरह अलंकृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत हो जाता है उसी प्रकार इसके अंधे होनेपर अंधा, स्राम होनेपर स्राम और खण्डित होनेपर खण्डित भी हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह नष्ट भी हो जाता है, मुझे इसमें कोई फल दिखायी नहीं देता’ ॥ २ ॥
४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| नाहमत्रास्मिंश्छायात्मदर्शने देहात्मदर्शने वा भोग्यं फलं पश्यामीति। एवं दोषं देहच्छायात्मदर्शनेऽध्यवस्य स समित्पाणिर्ब्रह्मचर्यं वस्तुं पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच—मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः प्रगतवानसि विरोचनेन सार्धं किमिच्छन् पुनरागम इति। विजानन्नपि पुनः पप्रच्छेन्द्रामिप्रायाभिव्यक्तये। यद्वेत्थ तेन मोपसीदेति यद्वत्तथा च स्वाभिप्रायं प्रकटमकरोद्यथैव खल्वयमित्यादि, एवमेवेति चान्वमोदत प्रजापतिः। | इस छायात्मदर्शन या देहात्मदर्शनमें मैं कोई भोग्य फल नहीं देखता। इस प्रकार देहात्मदर्शन या छायात्मदर्शनमें दोष निश्चयकर वे समित्पाणि हो पुनः ब्रह्मचर्यवास करनेके लिये लौट आये। उनसे प्रजापतिने कहा—'हे इन्द्र ! तुम तो विरोचनके साथ शान्तचित्तसे चले गये थे, अब क्या इच्छा करते हुए तुम पुनः आये हो?' उन्होंने अच्छी तरह जानते हुए भी इन्द्रके अभिप्रायकी अभिव्यक्तिके लिये [इस प्रकार] पुनः प्रश्न किया। [सप्तमाध्यायमें सनत्कुमारजीके] 'तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे प्रति उपसन्न होओ' ऐसा पूछनेपर जिस प्रकार नारदजीने अपना अभिप्राय प्रकट किया था उसी प्रकार इन्द्रने 'यथैव खल्वयम्' इत्यादि वाक्यसे अपना अभिप्राय प्रकट किया और प्रजापतिने 'एवमेव' ऐसा कहकर उसका अनुमोदन किया। |
| ननु तुल्येऽक्षिपुरुषश्रवणे देहच्छायामिन्द्रोऽग्रहीदात्मेति देहमेव तु विरोचनस्तत्किन्निमित्तम्। | शङ्का—किंतु अक्षिपुरुषका समानरूपसे श्रवण करनेपर भी इन्द्रने देहकी छायाको आत्मरूपसे ग्रहण किया और विरोचनने स्वयं देहको ही—सो ऐसा किस कारणसे हुआ ? |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थं ८९१
| तत्र मन्यन्ते—यथेन्द्रस्यो-<br>दशरावादिप्रजापतिवचनं स्मरतो<br>देवानप्राप्तस्यैवाचार्योक्तबुद्ध्या<br>छायात्मग्रहणं तत्र दोषदर्शनं<br>चाभूत् । न तथा विरोचनस्य,<br>किं तर्हि ? देह एवात्मदर्शनं नापि<br>तत्र दोषदर्शनं बभूव तद्वदेव ।<br>विद्याग्रहणसामर्थ्यप्रतिबन्धदो-<br>षाल्पत्वबहुत्वापेक्षमिन्द्रविरोच-<br>नयोश्छायात्मदेहयोर्ग्रहणम् ।<br>इन्द्रोऽल्पदोषत्वादृदृश्यत इति<br>श्रुत्यर्थमेव श्रद्धानतया जग्राहे-<br>तरश्छायानिमित्तं देहं हित्वा<br>श्रुत्यर्थं लक्षणया जग्राह प्रजाप-<br>तिनोक्तोऽयमिति दोषभूय-<br>स्त्वात् । यथा किल नीलानील- | समाधान—इस विषयमें शिष्टजन<br>ऐसा मानते हैं—जिस प्रकार<br>इन्द्रको प्रजापतिका जलपात्रादि-<br>सम्बन्धी वाक्य स्मरण करते-करते<br>देवताके पास पहुँचे बिना ही<br>आचार्यकी बतलायी हुई दृष्टिसे<br>छायात्माका ग्रहण और उसमें दोष-<br>दर्शन भी हुआ; तथा विरोचनको<br>वैसा नहीं हुआ, तो क्या हुआ ?<br>—उसकी देहमें ही आत्मदृष्टि हुई<br>और उसमें कोई दोषदर्शन भी नहीं<br>हुआ—उसी प्रकार विद्याग्रहण-<br>की सामर्थ्यका प्रतिबन्ध करनेवाले<br>दोषकी न्यूनाधिकताकी अपेक्षासे<br>इन्द्र और विरोचनका छायात्म<br>और देहात्मसम्बन्धी ग्रहण है ।<br>इन्द्रने अल्पदोषयुक्त होनेके कारण<br>श्रद्धा करते हुए 'दृश्यते' इस श्रुति-<br>के अर्थको ही ग्रहण किया और<br>दूसरे ( विरोचन ) ने दोषकी<br>अधिकताके कारण श्रुत्यर्थको छोड़-<br>कर लक्षणासे 'प्रजापतिने देहके<br>विषयमें ही कहा है' इस प्रकार देह-<br>को ही ग्रहण किया । जिस प्रकार<br>दर्पणमें दीखनेवाले नील और<br>अनीलवर्ण वस्त्रोंमें जो नील है वह |
८९२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ८
८९२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ८
| योरादर्श दृश्यमानयोर्वाससोर्यन्नीलं तन्महार्हमितिच्छायानिमित्तं वास एवोच्यते नच्छाया तद्वदिति विरोचनाभिप्रायः । स्वचित्तगुणदोषवशादेव हि शब्दार्थावधारणं तुल्येऽपि श्रवणे ख्यापितं दाम्यत दत्त दयध्वमिति दकारमात्रश्रवणाच्छ्रुत्यन्तरे । निमित्तान्यपि तदनुगुणान्येव सहकारीणि भवन्ति ।२। | बहुमूल्य है'—इस कथनसे छायाका निमित्तभूत वस्त्र ही कहा जाता है, छाया नहीं कही जाती उसी प्रकार [प्रजापतिके] इस कथनसे देह ही विवक्षित है—ऐसा विरोचनका अभिप्राय था । एक अन्य श्रुतिमें (बृह० अ० ५ में) केवल दकारके श्रवणसे तुल्य श्रवण होनेपर भी अपने चित्तके गुण-दोषके कारण ही 'दमन करो, दान करो, दया करो' ऐसा विभिन्न शब्दार्थ-ज्ञान देखा गया है । अपने-अपने गुणोंके अनुसार ही युक्तिरूप निमित्त भी सहकारी हो जाते हैं ॥ २ ॥ |
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एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥३॥
'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है' ऐसा प्रजापतिने कहा, 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा। अब तुम बत्तीस वर्ष यहाँ और रहो।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और निवास किया। तब प्रजापतिने उससे कहा ॥ ३ ॥
| एवमेवैष मघवन्सम्यक् त्वयावगतं नच्छायात्मेत्युवाच प्रजापतिर्यो मयोक्त आत्मा प्रकृत | 'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है तुमने ठीक समझा है, छाया आत्मा नहीं है—ऐसा प्रजापतिने कहा, 'मैंने तुम्हारे प्रति जिस प्रकृत |
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खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१३
| एतमेवात्मानं तु ते भूयः पूर्वं व्याख्यातमप्यनुव्याख्यास्यामि। यस्मात्सकृद्व्याख्यातं दोषरहितानामवधारणविषयं प्राप्तमपि नाग्रहीस्तः केनचिद्दोषेण प्रतिबद्धग्रहणसामर्थ्यस्त्वमतस्तत्क्षपणाय वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीत्युक्त्वा तथोषितवते क्षपितदोषाय तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ | आत्माका वर्णन किया है, पहले व्याख्या किये हुए उस आत्माकी ही मैं तुम्हारे प्रति पुनः व्याख्या करूँगा। क्योंकि यद्यपि दोषरहित पुरुषोंको वह एक बार व्याख्या करनेपर ही ज्ञानका विषय हो जाता है तथापि तुम उसे ग्रहण नहीं कर सके। इसलिये किसी दोषसे तुम्हारी ग्रहणशक्ति प्रतिबद्ध है। उसकी निवृत्तिके लिये तुम अगले बत्तीस वर्ष यहाँ और ब्रह्मचर्यवास करो।' ऐसा कहकर, उसी प्रकार निवास करनेवाले क्षीणदोष इन्द्रसे प्रजापतिने कहा ॥ ३ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
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इन्द्रके प्रति स्वप्नपुरुषका उपदेश
| य आत्मापहतपाप्मादिलक्षणो य एषोऽक्षिणीत्यादिना व्याख्यात एष सः । कोऽसौ ? | जो आत्मा अपहतपाप्मादि लक्षणोंवाला है जिसकी 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादि वाक्यद्वारा व्याख्या की गयी है वह यह है । वह कौन है ? |
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य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श तद्यद्यपीदँशरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥
'जो यह स्वप्नमें पूजित होता हुआ विचरता है यह आत्मा है' ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है।' ऐसा सुनकर वे (इन्द्र) शान्तहृदयसे चले गये । किंतु देवताओंके पास बिना पहुँचे ही उन्हें यह भय दिखायी दिया 'यद्यपि यह शरीर अंधा होता है तो भी वह (स्वप्नशरीर) अनन्ध होता है और यदि यह स्राम होता है तो भी वह अस्राम होता है। इस प्रकार यह इसके दोषसे दूषित नहीं होता' ॥ १ ॥
| यः स्वप्ने महीयमानः स्त्र्यादिभिः पूज्यमानश्चरत्यनेकविधान् स्वप्नभोगाननुभवतीत्यर्थः। | 'जो स्वप्नमें महीयमान—स्त्री आदिसे पूजित होता हुआ विचरता अर्थात् अनेक प्रकारके भोगोंको अनुभव करता है, वही आत्मा है' |
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९५
| एष आत्मेति होवाचेत्यादि समानम् । स हैवमुक्त इन्द्रः शान्तहृदयः प्रवव्राज । स हाप्राप्यैव देवान् पूर्ववदस्मिन्नप्यात्मनि भयं ददर्श । कथम् ? तदिदं शरीरं यद्यप्यन्धं भवति स्वप्नात्मा योऽनन्धः स भवति। यदि स्राममिदं शरीरमस्रामश्च स भवति नैवैष स्वप्नात्मास्य देहस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥ | ऐसा प्रजापतिने कहा इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है । इस प्रकार कहे जानेपर वे--इन्द्र शान्तहृदयसे चले गये । किंतु उन्होंने देवताओंके पास बिना पहुँचे ही इस आत्मामें भी यह भय देखा । क्या देखा ?—'यद्यपि यह शरीर अंधा हो तो भी जो स्वप्नशरीर है वह अनन्ध होता है और यदि यह शरीर स्राम हो तो भी वह स्राम नहीं होता । इस प्रकार यह स्वप्नशरीर इस शरीरके दोषसे दूषित नहीं होता' ॥ १॥ |
न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
‘यह इस देहके वधसे नष्ट भी नहीं होता और न इसकी स्रामतासे स्राम होता है । किंतु इसे मानो कोई मारता हो, कोई ताडित करता हो, यह मानो अप्रियवेत्ता हो और रुदन करता हो—ऐसा हो जाता है; अतः इसमें (इस प्रकारके आत्मदर्शनमें) मैं कोई फल नहीं देखता' ॥ २ ॥
स समित्पाणिः पुनरेयाय तꣳह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ ३ ॥
८९६ छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
८९६ छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ४ ॥
[अतः] वे समिद्पाणि होकर फिर [प्रजापतिके पास] आये । उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्त होकर गये थे अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! यद्यपि यह शरीर अंधा होता है तो भी वह (स्वप्नशरीर) अनन्ध रहता है, और यह स्राम होता है तो भी वह अस्राम रहता है; इस प्रकार वह इसके दोषसे दूषित नहीं होता ॥३॥ न इसके वधसे उसका वध होता है और न इसकी स्रामतासे वह स्राम होता है; किंतु उसे मानो कोई मारते हों, कोई ताडित करते हों और [उसके कारण] मानो वह अप्रियवेत्ता हो और रुदन करता हो—[ऐसा अनुभव होनेके कारण] इसमें मैं कोई फल नहीं देखता।' तब प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है, मैं तुम्हारे इस (आत्मतत्त्व) की पुनः व्याख्या करूँगा, तुम बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और निवास किया; तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ ४ ॥
| नाप्यस्य वधेन स हन्यते छायात्मवन्न चास्य स्राम्येण स्रामः स्वप्नात्मा भवति । यदध्यायादावागममात्रेणोपन्यस्तं नास्य जरयैतज्जीर्यतीत्यादि, | न तो छायात्माके समान इस देहके नाशसे उस (स्वप्नशरीर) का नाश ही होता है और न इसकी स्रामतासे वह स्राम होता है । इस अध्यायके आरम्भमें जो केवल शास्त्रप्रमाणसे कहा गया है कि 'इसकी जरावस्थासे वह जीर्ण नहीं होता' |
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| तदिह न्यायेनोपपादयितुमुपन्यस्तम् । | इत्यादि, उसीका न्यायतः उपपादन करनेके लिये यहाँ उल्लेख किया गया है। |
| न तावदयं छायात्मवद्देहदोषयुक्तः, किन्तु घ्नन्ति त्वेवैनम्। एवशब्द इवार्थे। घ्नन्तीवैनं केचनेति द्रष्टव्यम्, न तु घ्नन्त्येवेति, उत्तरेषु सर्वेष्विवशब्ददर्शनात्। | [ इस प्रकार ] यह छायात्माके समान देहके दोषोंसे तो युक्त नहीं है; किंतु इसे मानो कोई मारते हैं। [ 'घ्नन्ति त्वेव' इस पदमें ] 'एव' शब्द 'इव' अर्थमें है; अतः इसका 'मानो इसे कोई मारते हैं' यही भाव समझना चाहिये, 'मारते ही हैं' ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि उत्तरवर्ती सब वाक्योंमें 'इव' शब्द ही देखा जाता है। |
| नास्य वधेन हन्यत इति विशेषणाद्घ्नन्ति त्वेवेति चेत् ? नैवम्, प्रजापतिं प्रमाणीकुर्वतोऽनृतवादित्वापादनानुपपत्तेः । 'एतदमृतम्' इत्येतत्प्रजापतिवचनं कथं मृषा कुर्यादिन्द्रस्तं प्रमाणीकुर्वन् । | यदि कहो कि 'यह इस ( स्थूल शरीर ) का नाश होनेसे नष्ट नहीं होता' ऐसा विशेषण होनेके कारण 'इसे कोई मारते ही हैं' यहो अर्थ समझना चाहिये तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्रजापतिको प्रामाणिक माननेवाले व्यक्तिके लिये उनपर मिथ्यावादित्वका आरोप करना सम्भव नहीं है। भला, प्रजापतिको प्रामाणिक माननेवाला इन्द्र उनके 'यह अमृत है' इस वचनको मिथ्या कैसे कर सकता है। |
८९८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८९८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| ननुच्छायापुरुषे प्रजापतिनोक्ते 'अस्य श रस्य नाशमन्वेष नश्यति' इति दोषमभ्यदधात्, तथेहापि स्यात् । | शङ्का—किंतु प्रजापतिके बतलाये हुए छायापुरुषमें तो [इन्द्रने] 'शरीरका नाश होनेके पश्चात् यह भी नष्ट हो जाता है' ऐसा दोष दिखलाया था; उसी प्रकार यहाँ भी हो सकता है । | | नैवम्; कस्मात् ? 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इति नच्छायात्मा प्रजापतिनोक्त इति मन्यते मघवान् । कथम् ? अपहतपाप्मादिलक्षणे पृष्टे यदिच्छायात्मा प्रजापतिनोक्त इति मन्यते तदा कथं प्रजापतिं प्रमाणीकृत्य पुनः श्रवणाय समित्पाणिर्गच्छेत् ? जगाम च । तस्मान्नच्छायात्मा प्रजापतिनोक्त इति मन्यते । तथा च व्याख्यातम्—द्रष्टाक्षिणि दृश्यत इति । | समाधान—यह बात नहीं है; कैसे नहीं है ? क्योंकि 'यह जो नेत्रमें पुरुष दिखायी देता है' इस वाक्यसे प्रजापतिने छायात्माका निरूपण नहीं किया—ऐसा इन्द्र मानते हैं । किस प्रकार ?—यदि वे ऐसा मानते कि अपहतपाप्मादि लक्षणवाले आत्माके विषयमें पूछे जानेपर प्रजापतिने छायात्मा बतलाया है तो प्रजापतिको प्रामाणिक मानकर भी वे श्रवण करनेके लिये पुनः समित्पाणि होकर उनके पास क्यों जाते ? और गये थे ही । इसलिये वे यही मानते थे कि प्रजापतिने छायात्माका वर्णन नहीं किया। तथा हमने भी 'जो द्रष्टा नेत्रमें दिखायी देता है' ऐसी ही व्याख्या की है । | | तथा विच्छादयन्तीव विद्रावयन्तीव, तथा च पुत्रादिमरण- | तथा मानो इसे कोई विच्छादित-विद्रावित ( ताडित ) करते हों और इसी प्रकार पुत्रादि-मरणके |
| खण्ड १० ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८९९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| निमित्तमप्रियवेत्तेव भवति। अपि च स्वयमपि रोदितीव। | कारण मानो वह अप्रिय अनुभव करनेवाला होता है तथा वह स्वयं भी मानो रोता है। |
| नन्वप्रियं वेत्त्येव कथं वेत्तेवेति उच्यते ? | शङ्काः—किंतु वह तो अप्रिय जानता ही है, फिर उसे 'मानो अप्रिय जाननेवाला हो' ऐसा क्यों कहा जाता है ? |
| न; अमृताभयत्ववचनानुपपत्तेः। "ध्यायतीव" (बृ० उ० ४।३।७) इति च श्रुत्यन्तरात्। | समाधान—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि इससे उसका अमृतत्व और अभयत्वप्रतिपादन अनुपपन्न होगा तथा "मानो ध्यान करता है" ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है। |
| ननु प्रत्यक्षविरोध इति चेत् ? | शङ्का—किंतु ऐसा माननेसे तो प्रत्यक्ष अनुभवसे विरोध आता है। |
| न; शरीरात्मत्वप्रत्यक्षवद्भ्रान्तिसम्भवात्। | समाधान—नहीं, क्योंकि शरीर ही आत्मा है इस प्रत्यक्ष अनुभवके समान यह (अप्रियवेदनादि) भी भ्रान्तिजनित है। |
| तिष्ठतु तावदप्रियवेत्तेव न वेति; नाहमत्र भोग्यं पश्यामि। | वह मानो अप्रियवेत्ता हो अथवा न हो, यह बात अलग रहे, मुझे इसमें कोई भोग्य (फल) दिखायी नहीं देता। |
| स्वप्नात्मज्ञानेऽपीष्टं फलं नोपलभ इत्यभिप्रायः। | तात्पर्य यह है कि स्वप्नशरीरको आत्मा माननेमें भी मुझे इच्छित फल प्राप्त नहीं होता। |
| एवमेवैष तवाभिप्रायेणेति | [प्रजापतिने कहा—] 'आत्माका अमृत और अभय गुणवान् होना |
छा० उ० २९—
९०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
९०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| वाक्यशेषः । आत्मनोऽमृताभयगुणवत्त्वस्याभिप्रेतत्वात् ।<br><br>द्विरुक्तमपि न्यायतो मया यथावन्नावधारयति; तस्मात्पूर्ववदस्याद्यापि प्रतिबन्धकारणमस्तीति मन्वानस्तत्क्षपणाय वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमित्यादिदेश प्रजापतिः। तथोषितवते क्षपितकल्मषायाह ॥ २-४ ॥ | अभीष्ट है, अतः तुम्हारे अभिप्रायके अनुसार यह बात ऐसी ही है।* यहाँ 'एवमेवैष' इससे आगे 'तवाभिप्रायेण' यह वाक्यशेष है ।<br><br>फिर ऐसा समझकर कि 'मेरे दो बार युक्तिपूर्वक बतलानेपर भी यह ठीक-ठीक नहीं समझता, इसलिये पहलेकी भाँति अब भी इसमें प्रतिबन्धका कारण विद्यमान है'—प्रजापतिने उसकी निवृत्तिके लिये इन्द्रको 'बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो'—ऐसी आज्ञा दी। इस प्रकार ब्रह्मचर्यवास करके क्षीणदोष हुए इन्द्रसे प्रजापतिने कहा ॥ २-४ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥
* अर्थात् स्वप्नशरीरको आत्मा माननेमें वस्तुतः कोई लाभ नहीं है ।
एकादश खण्ड
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सुषुप्त पुरुषका उपदेश
| पूर्ववदेतं त्वेव त इत्याद्युक्त्वा— | पूर्ववत् ‘मैं तेरे प्रति इसकी [पुनः व्याख्या करूँगा]’ ऐसा कहकर— |
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तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाह खल्वयमेवँसम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ १ ॥
‘जिस अवस्थामें यह सोया हुआ दर्शनवृत्तिसे रहित और सम्यक्-रूपसे आनन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता वह आत्मा है’—ऐसा प्रजापतिने कहा ‘यह अमृत है, यह अभय है और यही ब्रह्म है।’ यह सुनकर इन्द्र शान्तचित्तसे चले गये; किंतु देवताओंके पास पहुँचे बिना ही उन्हें यह भय दिखायी दिया—‘उस अवस्थामें तो इसे निश्चय ही यह भी ज्ञान नहीं होता कि ‘यह मैं हूँ’ और न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है; उस समय तो यह मानो विनाशको प्राप्त हो जाता है। इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता’ ॥ १ ॥
| तद्यत्रैतत्सुप्त इत्यादि व्याख्यातं वाक्यम्। अक्षिणि यो | ‘तद्यत्रैतत् सुप्तः’ इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पहले हो चुकी है। ‘जो नेत्रस्थ द्रष्टा स्वप्नमें पूजित होता |
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९०२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
९०२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी-अनुवाद |
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| द्रष्टा स्वप्ने च महीयमानश्चरति स एष सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स्वाभिप्रेतमेव । | हुआ विचरता है, वह जब सो जानेपर दर्शनवृत्तिसे रहित और अत्यन्त आनन्दित होकर स्वप्न नहीं देखता तो वही आत्मा है यह अमृत और अभय है और यही ब्रह्म है' इस प्रकार प्रजापतिने अपने अभिप्रायके अनुसार ही आत्माका स्वरूप बतलाया । |
| मघवांस्तत्रापि दोषं ददर्श । | किंतु इन्द्रने उसमें भी दोष देखा । |
| कथम् ? नाह नैव सुषुप्तस्थोऽप्यात्मा खल्वयं सम्प्रति सम्यगिदानीं चात्मानं जानाति नैवं जानाति । कथम् ? अयमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि चेति, यथा जाग्रति स्वप्ने वा । अतो विनाशमेव विनाशमिवेति पूर्ववद्द्रष्टव्यम् । अपीतोऽपिगतो भवति विनष्ट इव भवतीत्यभिप्रायः । | सो किस प्रकार ?—'यह सुषुप्तस्थ आत्मा भी इस अवस्था में निश्चय ही अपनेको इस प्रकार नहीं जानता ।' किस प्रकार नहीं जानता ?— कि 'मैं यह हूँ' और न यह अन्य भूतोंको ही जानता है; जैसा कि यह जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें जानता था । अतः यह मानो विनाशको अपीत—प्राप्त हो जाता है; तात्पर्य यह है कि विनष्ट-सा हो जाता है । यहाँ पूर्ववत् 'विनाशमेव' के स्थानमें 'विनाशमिव' ऐसा समझना चाहिये । |
| ज्ञाने हि सति ज्ञातुः सद्भावोऽवगम्यते नासति ज्ञाने । न च सुषुप्तस्य ज्ञानं दृश्यतेऽतो विनष्ट इवेत्यभिप्रायः । न तु | ज्ञान होनेपर ही ज्ञाताकी सत्ता जानी जाती है, ज्ञानके अभावमें नहीं जानी जाती; और सुषुप्त पुरुषको ज्ञान होना देखा नहीं जाता । अतः तात्पर्य यह है कि उस समय यह नष्ट-सा हो जाता है । अमृत और |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०३
| विनाशमेवात्मनो मन्यतेऽमृताभयवचनस्य प्रामाण्यमिच्छन् ॥ १ ॥ | अभयवचनका प्रामाण्य चाहनेवाले इन्द्रदेव उस अवस्था में आत्माका साक्षात् विनाश ही नहीं मानते ॥ १ ॥ |
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स समित्पाणिः पुनरेयाय तꣳह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच नाह खल्वयं भगव एवꣳसम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥२॥
वे समित्पाणि होकर पुनः प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्तसे गये थे, अब किस इच्छासे तुम्हारा पुनः आगमन हुआ है।' इन्द्रने कहा—'भगवन् ! इस अवस्था में तो निश्चय ही इसे यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मैं हूँ' और न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है, यह विनाशको प्राप्त-सा हो जाता है। इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता' ॥ २ ॥
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| पूर्ववत्— | । पहलेहीके समान— |
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एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्माद्वसापराणि पञ्च वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकशतꣳ सम्पेदुरेतत्तद्यदाहुरेकशतꣳ ह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तस्मै होवाच ॥ ३ ॥