छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
( ९५८ )
| मन्त्र प्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| तद्य इह रमणीयचरणाः | ५ | १० | ७ | ५२९ |
| तद्य एवैतं ब्रह्मलोकम् | ८ | ४ | ३ | ८४० |
| तद्य एवैतावरं च | ८ | ५ | ४ | ८४७ |
| तद्यत्प्रथमममृतम् | ३ | ६ | १ | २५७ |
| तद्यत्रैतत्सुप्तः | ८ | ६ | ३ | ८५७ |
| ,, ,, | ८ | ११ | १ | ९०१ |
| तद्यथा महापथ आततः | ८ | ६ | २ | ८५६ |
| तद्यथा लवणेन | ४ | १७ | ७ | ४३८ |
| तद्यथेषीकातूलमग्नौ | ५ | २४ | ३ | ५७० |
| तद्यथेह कर्मजितो लोकः | ८ | १ | ६ | ८१९ |
| तद्यदृक्तो रिष्येद् भूः | ४ | १७ | ४ | ४३५ |
| तद्यन्दक प्रथममागच्छेत् | ५ | १९ | १ | ५६३ |
| तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी | ३ | १९ | २ | ३४७ |
| तथा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि | १ | २ | ८ | ४१ |
| तद्यध्यक्षरतदादित्यम् | ३ | १ | ४ | २४७ |
| ,, ,, | ३ | २ | ३ | २५० |
| ,, ,, | ३ | ३ | ३ | २५१ |
| ,, ,, | ३ | ४ | ३ | २५२ |
| ,, ,, | ३ | ५ | ३ | २५४ |
| तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम | ४ | ६ | २ | ३८९ |
| तमु ह परः प्रत्युवाच | ४ | १ | ३ | ३५६ |
| ` तमु ह परः प्रत्युवाचाह | ४ | २ | ३ | ३६४ |
| तयोरन्यतरां मनसा | ४ | १६ | २ | ४३० |
| तस्मा आदित्याश्च | २ | २४ | १६ | २४१ |
| तस्मा उ ह ददुस्ते | ४ | ३ | ८ | ३७६ |
| तस्मादप्यद्येहाददान० | ८ | ८ | ५ | ८८५ |
| तस्मादाहुः सोष्यति | ३ | १७ | ५ | ३३२ |
| तस्मादु हैवंविद्यद्यपि | ५ | २४ | ४ | ५७१ |
| तस्माद्वा एतं सेतुम् | ८ | ४ | २ | ८३९ |
| तस्मिन्निमानि सर्वाणि | २ | ९ | २ | १७४ |
| तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ | ५ | ४ | २ | ४८४ |
| ,, ,, | ५ | ५ | २ | ४८८ |
( ९५९ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ | ५ | ६ | २ | ४९० |
| ,, ,, | ५ | ७ | २ | ४९१ |
| ,, ,, | ५ | ८ | २ | ४९४ |
| तस्मिन्यावत्सम्पातम् | ५ | १० | ५ | ५१४ |
| तस्मै श्वा श्वेतः | १ | १२ | २ | १४० |
| तस्य क्व मूलँ स्याद् | ६ | ८ | ४ | ६५१ |
| ,, ,, | ६ | ८ | ६ | ६५६ |
| तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम | ३ | १५ | २ | ३१८ |
| तस्य यथा कप्यासम् | १ | ६ | ७ | ९४ |
| तस्य यथाभिनहनम् | ६ | १४ | २ | ६८६ |
| तस्य ये प्राञ्चो रश्मयः | ३ | १ | २ | २४४ |
| तस्यर्क् च साम च गेष्णौ | १ | ६ | ८ | ९६ |
| तस्य ह वा एतस्य | ३ | १३ | १ | २८९ |
| तस्य ह वा एतस्यात्मनः | ५ | १८ | २ | ५६१ |
| तस्य ह वा एतस्यैवम् | ७ | २६ | १ | ७९८ |
| तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन् | ४ | २ | ५ | ३६६ |
| तस्यैषा दृष्टिर्यत्रैतत् | ३ | १३ | ८ | ३०० |
| त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रयः | २ | २१ | १ | २०४ |
| त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञः | २ | २३ | १ | २१४ |
| त्रयो होद्गीथे | १ | ८ | १ | १०६ |
| ता आप ऐक्षन्त | ६ | २ | ४ | ५९९ |
| तानि वा एतानि यजूं ष्येतम् | ३ | २ | २ | २४९ |
| तानि वा एतानि सामानि | ३ | ३ | २ | २५१ |
| तानि ह वा एतानि | ७ | ४ | २ | ७२९ |
| ,, ,, | ७ | ५ | २ | ७३५ |
| ,, ,, | ८ | ३ | ५ | ८३४ |
| तानु तत्र मृत्युरंया | १ | ४ | ३ | ७९ |
| तान्यभ्यतपत्तेभ्यः | २ | २३ | ३ | २३१ |
| तान्होवाच प्रातर्वः | ५ | ११ | ७ | ५४३ |
| तान्होवाचाश्वपतिर्वे | ५ | ११ | ४ | ५४० |
| तान्होवाचोहैव | १ | १२ | ३ | १४० |
| तान्होवाचैते वै खलु | ५ | १८ | १ | ५५९ |
( ९६० )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| तावानस्य महिमा | ३ | १२ | ६ | २८४ |
| तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकाम् | ६ | ३ | ३ | ६१० |
| ,, ,, | ६ | ३ | ४ | ६१२ |
| तेजसः सोम्याश्यमानस्य | ६ | ६ | ४ | ६३० |
| तेजो वावाद्भ्यो भूयः | ७ | ११ | १ | ७५५ |
| तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते | ६ | ५ | ३ | ६२५ |
| तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः | ५ | ११ | ५ | ५४० |
| तेन तँ ह बकः | १ | २ | १३ | ६२ |
| तेन तँ ह बृहस्पतिः | १ | २ | ११ | ६१ |
| तेन तँ हायास्य | १ | २ | १२ | ६१ |
| तेनेयं त्रयी विद्या | १ | १ | ९ | ४२ |
| तेनोभौ कुरुतो यश्चैतत् | १ | १ | १० | ४४ |
| ते यथा तत्र न विवेकम् | ६ | ९ | २ | ६६४ |
| ते वा एते गुह्याः | ३ | ५ | २ | २५४ |
| ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरसः | ३ | ४ | २ | २५२ |
| ते वा एते पञ्च | ३ | १३ | ६ | २९६ |
| ते वा एते रसानाँ रसाः | ३ | ५ | ४ | २५५ |
| तेषां खल्वेषां भूतानाम् | ६ | ३ | १ | ६०४ |
| ते ह प्राणाः प्रजापतिम् | ५ | १ | ७ | ४४७ |
| ते ह नासिक्यम् | १ | २ | २ | ५० |
| ते ह यथैवेह | १ | १२ | ४ | १४१ |
| ते ह सम्पादयाञ्चक्रुरुद्दालकः | ५ | ११ | २ | ५३८ |
| ते होचुरूपकोसलेषा | ४ | १४ | १ | ४१६ |
| ते होचुर्येन हैवार्थेन | ५ | १३ | ६ | ५४२ |
| तौ वा एतौ द्वौ | ४ | ३ | ४ | ३२७ |
| तौ ह द्वात्रिँ शतं वर्षाणि | ८ | ७ | ३ | ८७० |
| तौ ह प्रजापतिरुवाच | ८ | ७ | ४ | ८७१ |
| ,, ,, | ८ | ८ | २ | ८७८ |
| तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिः | ८ | ८ | ४ | ८८३ |
| तौ होचतुर्यथैववेद० | ८ | ८ | ३ | ८८१ |
| दध्नः सोम्य मथ्यमानस्य | ६ | ६ | १ | ६२९ |
| दुग्धेऽस्मै वाग्दोहम् | १ | १३ | ४ | १४७ |
| ,, ,, | २ | ८ | ३ | १७२ |
( ९६१ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| देवा वै मृत्योर्बिभ्यतः | १ | ४ | २ | ७८ |
| देवासुरा ह वै यत्र | १ | २ | १ | ४७ |
| द्यौरेवर्गादित्यः | १ | ६ | ३ | ९१ |
| द्यौरेवोदन्तरिक्ष गीः | १ | ३ | ७ | ७२ |
| ध्यानं वाव चित्ताद्भूयः | ७ | ६ | १ | ७३८ |
| नक्षत्राण्येवर्क्चन्द्रमाः | १ | ६ | ४ | ९१ |
| न वधेनास्य हन्यते | ८ | १० | २ | ८९५ |
| ” ” | ८ | १० | ४ | ८९६ |
| न वै तत्र न निम्लोच | ३ | ११ | २ | २७३ |
| न वै नूनं भगवन्तस्ते | ६ | १ | ७ | ५८० |
| न वै वाचो न चक्षूंषि | ५ | १ | १५ | ४५३ |
| न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति | १ | १० | ४ | १२४ |
| न ह वा अस्मा उदेति | ३ | ११ | ३ | २७४ |
| न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् | २ | ४ | २ | १६२ |
| नान्यस्मै कस्मैचन | ३ | ११ | ६ | २७६ |
| नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः | ७ | १ | ४ | ७१८ |
| नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति | ८ | ९ | २ | ८८९ |
| निधनमिति त्र्यक्षरम् | २ | १० | ४ | १८४ |
| नैवैतेन सुरभि न | १ | २ | ९ | ५८ |
| न्यग्रोधफलमत आहरेतीदम् | ६ | १२ | १ | ६७६ |
| पञ्च मा राजन्यबन्धुः | ५ | ३ | ५ | ४७६ |
| परोवरीयो हास्य भवति | २ | ७ | २ | १६८ |
| पर्जन्यो वाव गौतमाग्निः | ५ | ५ | १ | ४८७ |
| पशुषु पञ्चविधम् | २ | ६ | १ | १६५ |
| पुरा तृतीयसवनस्योपा० | २ | २४ | ११ | २३९ |
| पुरा प्रातरनुवाकस्योपा० | २ | २४ | ३ | २३५ |
| पुरा माध्यन्दिनस्य | २ | २४ | ७ | २३८ |
| पुरुषँ सोम्योत | ६ | १६ | १ | ६९८ |
| पुरुषँ सोम्योतोपतापिनम् | ६ | १५ | १ | ६९४ |
| पुरुषो वाव गौतमाग्निः | ५ | ७ | १ | ४९१ |
| पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य | ३ | १६ | १ | ३२३ |
| पृथिवी वाव गौतमाग्निः | ५ | ६ | १ | ४८९ |
( १६३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ख० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षम् | २ | १७ | १ | १९४ |
| प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् | २ | २३ | २ | २३० |
| ” ” | ४ | १७ | १ | ४३४ |
| प्रवृत्तोऽश्वतरीरथः | ५ | १३ | २ | ५५० |
| प्रस्तोतर्या देवता | १ | १० | १ | १२८ |
| प्राचीनशाल औपमन्यवः | ५ | ११ | १ | ५३६ |
| प्राण इति होवाच | १ | ११ | ५ | १३३ |
| प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः | ३ | १८ | ४ | ३४२ |
| प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति | ५ | १९ | २ | ५६४ |
| प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः | २ | ७ | १ | १५७ |
| प्राणो वा आशायाः | ७ | १५ | १ | ७६७ |
| प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि | ७ | १५ | ४ | ७७२ |
| प्राप ह्याचार्यकुलम् | ४ | ९ | १ | ३९७ |
| बलं वाव विज्ञानाद्भूयः | ७ | ८ | १ | ७४५ |
| ब्रह्मणः सोम्य ते पादम् | ४ | ६ | ३ | ३९० |
| ” ” | ४ | ७ | ३ | ३९२ |
| ” ” | ४ | ८ | ३ | ३९५ |
| ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति | ४ | ५ | २ | ३८७ |
| ब्रह्मवादिनो वदन्ति | २ | २४ | १ | २३३ |
| ब्रह्मविदिव वै सोम्य | ४ | ९ | २ | ३९७ |
| भगव इति ह प्रतिशुश्राव | ४ | १४ | २ | ४१७ |
| भगवाँस्त्वेव मे | १ | ११ | ३ | १३२ |
| भवन्ति हास्य पशवः | २ | ६ | २ | १६६ |
| मघवन्मर्त्यं वा इदम् | ८ | १२ | ९०६ | |
| मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या | १ | १० | १ | १२२ |
| मद्गुष्टे पादं वक्तेति | ४ | ८ | १ | ३९४ |
| मनो ब्रह्मेत्युपासीत | ३ | १८ | १ | ३३८ |
| मनोमयः प्राणशरीरः | ३ | १४ | २ | ३०६ |
| मनो वाव वाचो भूयः | ७ | ३ | १ | ७२४ |
| मनो हिङ्कारो वाक् | २ | ११ | १ | १८७ |
| मनो होच्चक्राम | ५ | १ | ११ | ४५० |
| मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक् | ४ | १७ | १० | ४४० |
( ११३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| मासेभ्यः पितृलोकम् .... | ५ | १० | ४ | ५११ |
| मासेभ्यः संवत्सरम् .... | ४ | १० | २ | ५०० |
| यं यमन्तमभिकामः .... | ८ | २ | १० | ८२४ |
| य आत्मापहतपाप्मा .... | ८ | ७ | १ | ८६६ |
| य एते ब्रह्मलोके .... | ८ | १२ | ६ | ९३५ |
| य एष स्वप्ने महीयमानः .... | ८ | १० | १ | ८९४ |
| य एषोऽक्षिणि पुरुषः .... | ४ | १५ | १ | ४२० |
| यच्चन्द्रमसो रोहितँ रूपम् .... | ६ | ४ | ३ | ६१५ |
| यत्र नान्यत्पश्यति .... | ७ | २४ | १ | ७८६ |
| यथा कृतायविजितायाधरेयाः .... | ४ | १ | ४ | ३५७ |
| „ „ .... | ४ | १ | ६ | ३५९ |
| यथा विलीनमेवाङ्ग .... | ६ | १३ | २ | ६८१ |
| यथा सोम्य पुरुषम् .... | ६ | १४ | १ | ६८५ |
| यथा सोम्य मधु मधुकृतः .... | ६ | ९ | १ | ६६३ |
| यथा सोम्यैकेन .... | ६ | १ | ४ | ५७७ |
| यथा सोम्यैकेन नख० .... | ६ | १ | ६ | ५७९ |
| यथा सोम्यैकेन लोह० .... | ६ | १ | ५ | ५७९ |
| यथेह क्षुधिता बाला मातरम् .... | ५ | २४ | ५ | ५७२ |
| यदग्ने रोहितँ रूपम् .... | ६ | ४ | १ | ६१३ |
| यदादित्यस्य रोहितम् .... | ६ | ४ | २ | ६१५ |
| यदप उच्छुष्यन्ति .... | ४ | ३ | २ | ३७० |
| यदा वा ऋचमाप्नोति .... | १ | ४ | ४ | ८० |
| तदा वै करोत्यथ .... | ७ | २१ | १ | ७८२ |
| यदा वै निस्तिष्ठत्यथ .... | ७ | २० | १ | ७८१ |
| यदा वै मनुतेऽथ .... | ७ | १८ | १ | ७७९ |
| यदा वै विजानात्यथ .... | ७ | १७ | १ | ७७६ |
| यदा वै श्रद्दधात्यथ .... | ७ | १९ | १ | ७८० |
| यदा वै सुखं लभतेऽथ .... | ७ | २२ | १ | ७८३ |
| यदुदिति स उद्गीथः .... | २ | ८ | २ | १७१ |
| यदु रोहितमिवाभूदिति .... | ६ | ४ | ६ | ६२१ |
| यद्विज्ञातमिवाभूत् .... | ६ | ४ | ७ | ६२१ |
| यद्विद्युतो रोहितँ रूपम् .... | ६ | ४ | ४ | ६१६ |
( २६४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदम् | ३ | १२ | ४ | २८२ |
| यद्वै तद्ब्रह्मे तीदम् | ३ | १२ | ७ | २८५ |
| यस्तद्वेद स वेद | २ | २१ | ४ | २०६ |
| यस्यामृचि तामृचम् | १ | ३ | ९ | ७४ |
| यां दिशमभिष्ठोष्यन् | १ | ३ | ११ | ७५ |
| या वाक्सर्त्तस्मात् | १ | ३ | ४ | ६९ |
| यावान्वा अयमाकाशः | ८ | १ | ३ | ८०९ |
| या वै सा गायत्रीयम् | ३ | १२ | २ | २८० |
| या वै सा पृथिवीयम् | ३ | १२ | ३ | २८१ |
| येनच्छन्दसा | १ | ३ | १० | ७५ |
| येनाश्रुतँ॒ श्रुतम् | ६ | १ | ३ | ५७६ |
| यो वै भूमा तत्सुखम् | ७ | २३ | १ | ७८५ |
| योषा वाव गौतमाग्निः | ५ | ८ | १ | ४९३ |
| यो ह वा आयतनम् | ५ | १ | ५ | ४४५ |
| यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च | ५ | १ | १ | ४४३ |
| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद | ५ | १ | ३ | ४४४ |
| यो ह वै वसिष्ठं वेद | ५ | १ | २ | ४४४ |
| यो ह वै सम्पदं वेद | ५ | १ | ४ | ४४५ |
| रैक्वेमानि षट्शतानि | ४ | २ | २ | ३६३ |
| लवणमेतदुदकेऽवधायाथ | ६ | १३ | १ | ६८० |
| लो ३ कद्दारमपावा ३ र्णू | २ | २४ | ४ | २३६ |
| ,, ,, | २ | २४ | ८ | २३८ |
| ,, ,, | २ | २४ | १२ | २४० |
| लोकेषु पञ्चविधँ॒ सामोपासीत | २ | २ | १ | १५४ |
| लोम हिङ्कारस्त्वक्प्रस्तावः | २ | १९ | १ | २०० |
| वसन्तो हिङ्कारः | २ | १६ | १ | १९६ |
| वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य | ५ | २ | ५ | ४६६ |
| वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः | ३ | १८ | ३ | ३४० |
| वागेवर्क् प्राणः | १ | १ | ५ | ३७ |
| वाग्वाव नाम्नो भूयसी | ७ | २ | १ | ७२१ |
| वायुर्वाव संवर्गो यदा | ४ | ३ | १ | ३६९ |
| विज्ञानं वाव ध्यानाद्भूयः | ७ | ७ | १ | ७४१ |
( १६५ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| विनर्दि साम्नो वृणे | २ | २२ | १ | २०८ |
| वृष्टौ पञ्चविधम् | २ | ३ | १ | १५९ |
| वेत्थ यथासौ लोको न | ५ | ३ | ३ | ४७४ |
| वेत्थ यदि॒तोऽधि प्रजाः | ५ | ३ | २ | ४७३ |
| व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति | ५ | २० | २ | ५६५ |
| श्यामाच्छबलं प्रपद्ये | ८ | १३ | १ | ९३७ |
| श्रुतँ ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यः | ४ | ९ | ३ | ३९८ |
| श्रोत्रँ॒ होच्चक्राम | ५ | १ | १० | ४४९ |
| श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः | ३ | १८ | ६ | ३४२ |
| श्रोत्रमेवङ्मर्नः | १ | ७ | ३ | ९९ |
| श्वेतकेतुर्हारुणेयः | ५ | ३ | १ | ४७२ |
| ” ” | ६ | १ | १ | ५७४ |
| षोडशकलः सोम्य | ६ | ७ | १ | ६३३ |
| संकल्पो वाव मनसः | ७ | ४ | १ | ७२७ |
| स एतां त्रयीं विद्याम् | ४ | १७ | ३ | ४३५ |
| स एतास्तिस्रो देवताः | ४ | १७ | २ | ४३५ |
| स एवाधस्तात्स उपरि० | ७ | २५ | १ | ७९३ |
| स एष परोवरीयानुद्गीथः | १ | ९ | २ | ११८ |
| स एष ये चैतस्मात् | १ | ७ | ६ | १०३ |
| स एष रसानाँ॒ रसतमः | १ | १ | ३ | ३४ |
| स जातो यावदायुषम् | . | ९ | २ | ४९८ |
| सत्यकामो ह जाबालः | ४ | ४ | १ | ३८० |
| सदेव सोम्येदमग्रे | ६ | २ | १ | ५८२ |
| स ब्रूयान्नास्य जरयैतत् | ८ | १ | ५ | ८१३ |
| समस्तस्य खलु | २ | १ | १ | १४९ |
| समान उ एवायं चासौ | १ | ३ | २ | ६६ |
| समाने तृप्यति मनस्तृप्यति | ५ | २२ | २ | ५६७ |
| स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्ते | ७ | १२ | २ | ७६० |
| स य आशां ब्रह्मेत्युपास्ते | ७ | १४ | २ | ७६५ |
| स य इदमविद्वानग्निहोत्रम् | ५ | २४ | १ | ५६९ |
| स य एतदेवं विद्वानक्षरम् | १ | ४ | ५ | ८१ |
| स य एतदेवं विद्वान् | २ | १ | ४ | १५२ |
( ९६६ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| स य एतदेवममृतं वेद | ३ | ६ | ३ | २५९ |
| ” ” | ३ | ७ | ३ | २६२ |
| ” ” | ३ | ८ | ३ | २६४ |
| ” ” | ३ | ९ | ३ | २६८ |
| ” ” | ३ | १० | ३ | २७० |
| स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलम् | ४ | ५ | ३ | ३८८ |
| ” ” | ४ | ६ | ४ | ३९१ |
| ” ” | ४ | ७ | ४ | ३९३ |
| ” ” | ४ | ८ | ४ | ३९५ |
| स य एतमेवं विद्वानादित्यम् | ३ | १९ | ४ | ३५० |
| स य एतमेवं विद्वानुपास्ते | ४ | ११ | २ | ४१० |
| ” ” | ४ | १२ | २ | ४१२ |
| ” ” | ४ | १३ | २ | ४१४ |
| स य एवमेतत्साम | २ | २१ | २ | २०५ |
| स य एवमेतद्वृहदादित्ये | २ | १४ | २ | १९३ |
| स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु | २ | १९ | २ | २०० |
| स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ | २ | १२ | २ | १९० |
| स य एवमेतद्गायत्रम् | २ | ११ | २ | १८८ |
| स य एवमेतद्राजनं देवतासु | २ | २० | २ | २०२ |
| स य एवमेतद्वामदेव्यम् | २ | १३ | २ | १९१ |
| स य एवमेतद्वैराजमृतुषु | २ | १६ | २ | १९६ |
| स य एवमेतद्वैरूपम् | २ | १५ | २ | १९५ |
| स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु | २ | १७ | २ | १९८ |
| स य एवमेता रेवत्यः | २ | १८ | २ | १९९ |
| स य एषोऽणिमैतदात्म्यम् | ६ | ८ | ७ | ६६१ |
| ” ” | ६ | ९ | ४ | ६६६ |
| ” ” | ६ | १० | ३ | ६६९ |
| ” ” | ६ | १२ | ३ | ६७९ |
| ” ” | ६ | १३ | ३ | ६८४ |
| ” ” | ६ | १४ | ३ | ६९३ |
| ” ” | ६ | १५ | ३ | ६९६ |
| स यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते | ७ | ४ | ३ | ७३२ |
( ९६७ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | १३ | २ | ७६३ |
| स यथा तत्र | .... ६ | १६ | ३ | ७०१ |
| स यथा शकुनिः सूत्रेण | .... ६ | ८ | २ | ६४६ |
| स यथोभयपाद्व्रजन्नथः | .... ४ | १६ | ५ | ४३२ |
| स यदवोचं प्राणम् | .... ३ | १५ | ४ | ३२० |
| स यदशिशिषति | .... ३ | १७ | १ | ३३० |
| स यदि पितरं वा मातरम् | .... ७ | १५ | २ | ७७० |
| स यदि पितृलोककामः | .... ८ | २ | १ | ८२१ |
| स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | ५ | ३ | ७३६ |
| स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | ११ | २ | ७५७ |
| स यावदादित्य उत्तरतः | .... ३ | १० | ४ | २७१ |
| स यावदादित्यः | .... ३ | ६ | ४ | २६० |
| स यावदादित्यः पश्चात् | .... ३ | ९ | ४ | २६९ |
| स यावदादित्यः पुरस्तात् | .... ३ | ७ | ४ | २६३ |
| स यावदादित्यो दक्षिणतः | .... ३ | ८ | ४ | २६४ |
| स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | ६ | २ | ७४१ |
| स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | १ | ५ | ७१९ |
| स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | ९ | २ | ७५१ |
| स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | १० | २ | ७५३ |
| स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | ८ | २ | ७४७ |
| स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | ३ | २ | ७२६ |
| स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | २ | २ | ७२३ |
| स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते | .... ७ | ७ | २ | ७४३ |
| सर्वं खल्विदं ब्रह्म | .... ३ | १४ | १ | ३०३ |
| सर्वकर्मा सर्वकामः | .... ३ | १४ | ४ | ३१२ |
| सर्वास्वप्सु पञ्चविधम् | .... २ | ४ | १ | १६१ |
| सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मानः | .... २ | २२ | ३ | २१० |
| सर्वे स्वरा घोषवन्तः | .... २ | २२ | ५ | २१२ |
| स वा एष आत्मा हृदि | .... ८ | ३ | ३ | ८२९ |
| स समित्पाणिः पुनरेयाय | .... ८ | १० | ३ | ८९५ |
| ” ” | .... ८ | ११ | २ | ९०३ |
( ९१८ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| स ह क्षत्तान्यिष्य | ४ | १ | ७ | ३६१ |
| स ह खादित्वातिशेषान् | १ | १० | ५ | १२६ |
| स ह गौतमो राज्ञः | ५ | ३ | ६ | ४७७ |
| स ह द्वादशवर्ष उपेत्य | ६ | १ | २ | ५७५ |
| स ह पञ्चदशाहानि | ६ | ७ | २ | ६३४ |
| स ह प्रातः संजिहानः | १ | १० | ६ | १२६ |
| स ह व्याधिनानशितुम् | ४ | १० | ३ | ४०२ |
| स ह शिलकः | १ | ८ | ३ | १०९ |
| स ह सम्पादयाञ्चकार | ५ | ११ | ३ | ५३९ |
| स ह हारिद्रुमतं गौतमम् | ४ | ४ | ३ | ३८२ |
| स हाशाथ हैनमुपससाद | ६ | ७ | ४ | ६३६ |
| स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तम् | १ | १० | २ | १२३ |
| स होवाच किं मेऽन्नम् | ५ | २ | १ | ४५८ |
| स होवाच किं मे वासः | ५ | २ | २ | ४६० |
| स होवाच भगवन्तं वा | १ | ११ | २ | १३१ |
| स होवाच महात्मनः | ४ | ३ | ६ | ३७३ |
| स॒ होवाच विजानाम्यहम् | ४ | १० | ५ | ४०४ |
| सा ह वागुच्चक्राम | ५ | १ | ८ | ४४८ |
| सा हैनमुवाच नाहम् | ४ | ४ | २ | ३८१ |
| सेयं देवतैक्षत | ६ | ३ | २ | ६०६ |
| सैषा चतुष्पदा षड्विधा | ३ | १२ | ५ | २८३ |
| सोऽधस्ताच्छकटस्य | ४ | १ | ८ | ३६१ |
| सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि | ७ | १ | ३ | ७१४ |
| स्तेनो हिरण्यस्य सुराम् | ५ | १० | ९ | ५३४ |
| स्मरो वावाकाशाद्भूयः | ७ | १३ | १ | ७६१ |
| हँस्ते पादं वक्तेति | ४ | ७ | १ | ३९२ |
| हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति | १ | ८ | ७ | ११४ |
॥ श्रीहरिः ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित विभिन्न गीताएँ
श्रीमद्भगवद्गीता-तत्त्वविवेचनी—
(टीकाकार-श्रीजयदयालजी गोयन्दका)
श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी टीका—
(टीकाकार-स्वामी रामसुखदासजी महाराज)
गीता-दर्पण— (स्वामी रामसुखदासजी महाराज)
गीता-दर्पण— (पाकेट साइज)
गीता-माधुर्य
गीता-शांकरभाष्य
गीता-चिन्तन— (ले० श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार)
श्रीमद्भगवद्गीता— मूल, पदच्छेद, अन्वय, साधारण भाषाटीका
श्रीमद्भगवद्गीता— माहात्म्यसहित, सटीक मोटे अक्षरोंमें
श्रीमद्भगवद्गीता— श्लोक, साधारण भाषाटीका, टिप्पणी-प्रधान विषय, मोटा टाइप, अजिल्द
श्रीमद्भगवद्गीता— केवल भाषा
श्रीमद्भगवद्गीता— साधारण भाषाटीका, पाकेट साइज
श्रीमद्भगवद्गीता— मूल मोटे अक्षरोंमें
श्रीपञ्चरत्नगीता— (श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम, श्रीभीष्मस्तवराज, श्रीअनुस्मृति, श्रीगजेन्द्रमोक्षके मूल-पाठ)
श्रीमद्भगवद्गीता— श्रीविष्णुसहस्रनामसहित छोटा साइज
गीताताबीजी— मूल
॥ श्रीहरिः ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित
उपनिषद्
| ईशादि नौ उपनिषद् | अन्वय, हिंदी व्याख्यासहित |
|---|---|
| ईशावास्योपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| केनोपनिषद् | ( ,, ,, ) |
| कठोपनिषद् | ( ,, ,, ) |
| माण्डूक्योपनिषद् | ( ,, ,, ) |
| मुण्डकोपनिषद् | ( ,, ,, ) |
| प्रश्नोपनिषद् | ( ,, ,, ) |
| तैत्तिरीयोपनिषद् | ( ,, ,, ) |
| ऐतरेयोपनिषद् | ( ,, ,, ) |
| श्वेताश्वतरोपनिषद् | ( ,, ,, ) |
| छान्दोग्योपनिषद् | ( ,, ,, ) |
| बृहदारण्यकोपनिषद् | ( ,, ,, ) |
[सील/मुहर: K. P. SABHA AMBPHALA LIBRARY No . . . . . . Date. . . . . . JAMMU]
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मिलनेका पता— गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस ( गोरखपुर )