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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २११ ( द्वितीयः पादः ) अथातः प्राणकामीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब हम 'प्राण कामीय' नामक-रसायन पाद की व्याख्या करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ प्राणकामाः शुश्रूषध्वमिदमुच्यमानममृतमिवाऽपरमदितिसुतहित- करमचिन्त्याद्भुतप्रभावमायुष्यमारोग्यकरं वयसः स्थापनं निद्रा-तन्द्रा- श्रम क्लमालस्य-दौर्बल्यापहरमनिल-कफ-पित्त-साम्य-करं स्थैर्यकरमवृद्ध- मांसहरमन्तरग्निसंधुक्षणं प्रभा-वर्ण-स्वरोत्तमकरं रसायनविधानम् । अनेन च्यवनादयो महर्षयः पुनर्मुवत्वमापुर्नारीणां चेष्टतमा बभूवुः । स्थिर-सम-सुविभक्त मांसाः सुसंहतस्थिरशरीराः सुप्रसन्न-बल-वर्ण न्द्रियाः सर्वत्राप्रतिहतपराक्रमा सर्वक्लेशसहाश्च । सर्वे शरीरदोषा भवन्ति ग्राम्याहारादम्ल-लवण-कटुक-क्षार-शुष्क-शाक-माष १ तिल-पलल-पिष्टान्न- भोजिना विरूढ-नव-शूक-शमी धान्य-विरुद्धासात्म्य-रूक्ष- क्षाराभिष्य- न्दिभोजिनां क्लिन्न-गुरू-पूति-पर्युषित भोजिना विषमाशनाध्यशनप्रि- याणां २ दिवास्वप्न-स्त्री-मद्य-नित्यानां विषमातिमात्र-व्यायाम-संक्षोभित- शरीराणां भय-क्रोध-शोक लोभ मोहायास-बहुलानाम् । अतो निमित्तं हि शिथिली-भवन्ति मांसानि, विमुच्यन्ते सन्धयो- विदह्यते रक्तं, विष्यन्दते चानल्पं मेदो, न सन्धीयतेऽस्थिषु मज्जा, शुक्रं न प्रवर्तते, क्षयमुपैत्योजः। स एवभूतो ग्लायति, सीदति, निद्रा-तन्द्रातस्य-समन्वि- तोऽनारतमाशु चेव निरुत्साहः श्वसिति, असमर्थश्चेष्टाना शारीरमान- साना, नष्ट-स्मृति-बुद्धि-च्छायो रोगाणामधिष्ठानभूतो न सर्वमायुर- वाप्नोति । तस्मादेतान्दोषानवेक्षमाणः सर्वान्यथोक्तान्हितानपास्याऽऽ- हारविहारान् रसायनानि प्रयोक्तुमर्हतीत्युक्त्वा भगवान् पुनर्वसुरा- त्रेय उवाच—॥ ३ ॥ आमलकाना सुभूमिजाना कालजानामनुपहत-गन्ध-वर्ण-रसाना- मापर्ण-रस-प्रमाण-वीर्याणा स्वरसेन पुनर्नवा-कल्क-संप्रयुक्तेन सर्पिष साधयेदाढकं अतः परं विदारीस्वरसेन जीवन्ती-कल्क-सप्रयुक्तेन, अत· परं चतुर्गुणेन पयसा बलातिबलाकषायेण शतावरी-कल्क-संप्रयुक्तेन । अनेन क्रमेणैकैकं शतपाकं सहस्रपाकं वा शर्करा-क्षौद्र-चतुर्भागसंप्रयुक्तं १. 'मास' इति च पाठः । २ "प्रायाणा' इति च पाठः ।

२१२ चरकसंहिता [ अ० १

सौवर्णे राजते मार्त्तिके वा शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेत् ।
तद्यथोक्तेन विधिना यथाग्नि प्रातः प्रातः प्रयोजयेत्, जीर्णे च क्षीर-
सर्पिभ्यां शालिषष्टिकमश्नीयात् । अस्य त्रिवर्षप्रयोगाद्वर्षशतं वयोऽ-
जरं तिष्ठति, श्रुतमवतिष्ठते, सर्वामयाः प्रशाम्यन्ति, अप्रतिहतगतिः
स्त्रीष्वपत्यवान् भवति ॥ ४ ॥
हे प्राण (दीर्घ आयु और स्वस्थता) की कामना रखनेवालों ! सुनो जो
हम कहते हैं, अमृत जिस प्रकार मे देवताओं के लिये हितकारी है, उसी
प्रकार से यह रसायन विधि तुम्हारे लिये दूसरे अमृत के समान हितकारी और
उपयोगी है, यह रसायन विधि अचिन्त्य प्रभाव होने से अद्भुत शक्तिवाली,
आयुवर्द्धक, आरोग्यदायक, आयुस्थापक, निद्रा (वैकारिक), तन्द्रा, श्रम
(थकान), क्लम (पीड़ा), आलस्य और निर्बलता को दूर करनेवाली, वात,
कफ और पित्त को शान्त करती है, स्थिरता (दृढता) को उत्पन्न करती है,
अबद्ध (शिथिल) मांस को सुगठित बनाती है, कायाग्नि को प्रदीप्त करती है,
प्रभा (कान्ति), स्वर और वर्ण को श्रेष्ठ बनाती है। इस रसायन विधि से
च्यवन आदि महर्षियों ने फिर से जवानी प्राप्त की थी। इसीसे वे स्त्रियों के अति-
प्रिय बने, उनके शरीर की मांसपेशियां दृढ़, समानरूप, सुगठित हो गई थी,
उनके शरीर मजबूत तथा स्थिर हो गये थे, उनके बल, वर्ण और इन्द्रियां
श्रेष्ठ कोटि की हो गई थीं। उनका पराक्रम अप्रतिहत (बेरोक-टोक) था और वे
सब प्रकार के क्लेश उठा सकते थे।
जो व्यक्ति खट्टा, लवण, कटु, क्षार, शुष्क, शाक, माष (वा मास), तिल
कल्क, पिष्टान्न (पिठ्ठी के बने पदार्थ) का सेवन करते हैं, अङ्कुरित (जड़ाया
हुआ), या नये (उसी साल के) शूक या शमीधान्य का उपयोग करते हैं,
परस्पर विरुद्ध, असात्म्य, रूक्ष, क्षार, अभिष्यन्दी द्रव्य का सेवन करते हैं, जो
क्लिन्न (गीला), गुरु, सड़ा, बासी भोजन करते हैं, विषम भोजन या अध्यशन
(भोजन पर और अधिक भोजन) करते हैं, जो दिन में सोते, स्त्री-संग या
मद्य का सेवन करते, विषम या अधिक व्यायाम के कारण शरीर को चलाते
डुलाते हैं, जो भय, क्रोध, शोक, लोभ और आयास से पीड़ित होते हैं, उन
व्यक्तियों में ग्राम्य आहार के कारण सब दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसी कारण
से उनकी मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं। सन्धियां अलग होने लगती हैं, रक्त
विदग्ध (जलफुक) जाता है, मेद अधिक मात्रा मे बाहर आता है, मज्जा
अस्थियों को छोड़ देती है, शुक्र उत्पन्न नहीं होता, ओज क्षीण हो जाता है।
इस प्रकार की अवस्था में मनुष्य ग्लानियुक्त (ढीला, हर्षरहित) रहता है,

पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१३

पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१३ दुःखित रहता है, निरन्तर निद्रा, तन्द्रा, आलस्ययुक्त रहता है, शीघ्र ही उत्साह- हीन होकर हापने लगता है, शारीरिक और मानसिक चेष्टाओं में असमर्थ हो जाता है, स्मृति, बुद्धि और छाया (कान्ति) नष्ट हो जाती है, रोगों का घर बन जाता है और सम्पूर्ण आयु को भी नहीं भोग पाता । इसलिये इन उपरोक्त दोषों को देखते हुए पूर्व कथित अहित आहारविहार का त्याग करके ही मनुष्य रसायन का उपयोग करने के योग्य होता है। यह कहकर भगवान् पुनर्वसु आत्रेय बोले-अच्छी भूमि मे समय पर उत्पन्न हुए एव जिन के गन्ध, वर्ण और रस नष्ट नहीं हुए हों और जिनका रस वीर्य और प्रभाव भरपूर हो ऐसे आवंलों के स्वरस से, पुनर्नवा (सारोड़ी) के कल्क द्वारा घी का एक आढक (२॥ सेर) सिद्ध करे ॐ । इसी प्रकार विदारीकन्द के स्वरस और जीवन्ती कल्क के द्वारा घी का एक आढक सिद्ध करे। इसी प्रकार चौगुने दूध और बला-अतिबला के कषाय स तथा शतावरी कल्क से घृत सिद्ध करे । इस प्रकार से एक एक घी का शत पाक (सौ बार) या हजार बार पाक करे । इस प्रगर से सावित घृत मे चतुर्थांश शर्करा और मधु मिला कर घी से भावित, पवित्र एव दृढ बने स्वर्ण या चांदी अथवा मिट्टी के बर्तन मे इस घी को रख देना चाहिये । फिर कुटी प्रावेशिक पूर्वोक्त विधि से अपनी पाचनशक्ति के अनुसार प्रातःकाल प्रतिदिन खाना चाहिये। औषध के जीर्ण होने पर घी और दूध के साथ शालि (सांठी के चावलों) का भात खाना चाहिये। इस प्रयोग को तीन साल तक सेवन करने पर सौ वर्ष तक बिना वृद्धावस्था के आयु बनी रहती है। पढा सुना सब याद रहता है, सब रोग नष्ट हो जाते हैं, बेरोक- टोक के ससार में विचरता है, स्त्रियों मे अपत्यशाली होता है, उसके बहुत सन्तान होतो हैं । [ सौ बार की अपेक्षा हजार बार किया पाक अधिक गुणशाली है। एक एक घृत का पृथक् २ पाक करना चाहिये । रजत के पात्र की अपेक्षा स्वर्ण मे, मिट्टी के बर्तन की अपेक्षा रजत में अधिक गुण है।]॥ ३४॥ भवतश्चात्र । बृहच्छरीरं गिरिमारसारे स्थिरेन्द्रिय चातिबलेन्द्रियं च । अधृष्यमन्यैरतिकान्तरूपं प्रशान्तपूजासुखचित्तभाक्च ॥ ५ ॥ ॐ परिभाषांनुसार स्वरस दुगुना होगा । घी से चार गुणा स्वरस और कल्क घी का चौथाई होगा। अर्थात् यदि घृत १ आढक हो तो स्वरस ८ आढक और कल्क चौथाई आढक होगा। १ आढक = ६४ पल = ६ सेर ३२ तोले के ।

२१४ चरकसंहिता [ अ० १ बलं महद्वर्णविशुद्धिरग्र्या स्वरो घनौघस्तनितानुकारी । भवत्यपत्यं विपुलं स्थिरं च समश्नतो योगमिमं नरस्य ॥ ६ ॥ इत्यामलकघृतम् । इस प्रयोग के सेवन से शरीर लम्बा, चौड़ा तथा लोहे के समान दृढ़ और अति बलवान् हो जाता है । इन्द्रिया मजबूत और बलशाली हो जाती हैं। कोई इसको तिरस्कृत नहीं कर सकता, रूप भी मनोहर हो जाता है, उत्तम पूजा, उत्तम सुख (आरोग्य) और उत्तम मन (या ज्ञान) युक्त होता है । बल अति अधिक हो जाता है, वर्ण अत्यन्त निर्मल हो जाता है, स्वर बादलों के गर्जन के तुल्य गम्भीर हो जाता है। सन्तान बहुत दृढ़ (नीरोग) होती है ॥ ५-६ ॥ आमलकसहस्रं पिप्पलीसहस्रसंप्रयुक्तं पलाश-तरुण-क्षारोदकोत्तरं तिष्ठेत्, तदनुगतक्षारोदकमनातपशुष्कमनस्थिचूर्णीकृतं चतुर्गुणाभ्यां मधुसर्पिर्भ्यां संनीय शर्करा-चूर्ण-चतुर्भाग-संप्रयुक्तं घृतभाजनस्थं षण्मा- सान् स्थापयेदन्तर्भूमेः, तस्योत्तरकालमग्नबलसमां मात्रां खादेत् पौर्वा- ह्निकः प्रयोगः, सात्म्यपथ्यश्चाऽऽहारविधिर्नापराह्निकः । अस्य प्रयोगा- द्वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ ७ ॥ इत्यामलकावलेहः । आमलकावलेह—एक हजार आवले, और एक हजार पिप्पली, न तो बहुत बच्चे और न बहुत वृद्ध अपितु तरुण ढाक के क्षारोदक में डूबी रहे । [ क्षारोदक विधि—युवा ढाक को जला कर राख कर लेनी चाहिये । इस भस्म से ६ गुना जल डाल कर बिलोड़ना चाहिये । फिर अगले दिन नितार ले । इस प्रकार इक्कीस बार करना चाहिये । इस सारे नितारे पानी को पका कर क्षार तैयार कर लेते हैं । नितरे पानी में क्षार का सब भाग आ जाता है, इस- लिये उसे क्षारोदक कहते हैं । ] जिस समय क्षार जल इनके अन्दर घुस जाये तब इनको छाया मे सुखा कर, गुठलिया निकाल कर चूर्ण बना ले । इस चूर्ण में चार गुणा घी और शहद मिलावे । चूर्ण का चतुर्थांश निर्मल खाण्ड मिलावे । अब इसको एक पात्र में रख कर छः मास तक भूमि में गाड़ दे । छः मास के पीछे अग्नि बल के अनुसार इसकी मात्रा प्रातःकाल खावे । आहार का विचार सात्म्य की अपेक्षा से है । दिन के उत्तर भाग में सेवन न करे। इसके प्रयोग से सौ वर्ष तक जरारहित आयु रहती है, अन्य सब गुण पूर्वोक्त रसायन के तुल्य

पा० २] चिकित्सितस्थानम् २१५

पा० २] चिकित्सितस्थानम् २१५

ही हैं। [ अष्टांगसंग्रह में—'अभयामलाकसहस्रं' पाठ है। अभया ५०० और आंवला ५०० ] ॥ ७ ॥ आमलक-चूर्णाढकमेकविंशतिरात्रमामलक-सहस्र-स्वरस-परिपूतं मधुघृताढकाभ्यां द्वाभ्यामेकीकृतमष्टभागपिप्पलीकं शर्करा-चूर्ण-चतुर्भाग- संप्रयुक्तं घृतभाजनस्थं प्रावृषि भस्मराशौ निदध्यात्, तद्वर्षान्ते सात्म्य- पथ्याशी प्रयोजयेत्। अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरमायुस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ ८ ॥ इत्यामलकचूर्णम् । आमलक चूर्ण—एक आढक आवले के चूर्ण को एक हजार आवलों के स्वरस में इक्कीस दिन तक भावना देवे । इसमें घी और मधु प्रत्येक के दो दो आढक मिलावे । इन सब का अष्टमांश पिप्पली चूर्ण तथा चूर्ण का चतुर्थांश शर्करा मिला कर घी से भावित पात्र मे रख दे । इस पात्र को बरसात में भस्म के ढेर मे गाड़ दे । वर्षा बीत जाने पर सात्म्यभोजन होने पर इसका प्रयोग करे । इसके प्रयोग से आयु सौ बरस तक बिना वृद्धावस्था तक रहतो है । शेष गुण पूर्व की भाति हैं ॥ ८ ॥ विडङ्ग तण्डुल-चूर्णानामाढकं पिप्पली-तण्डुलानामध्यर्द्धाढकं सिता- पला-सर्पिस्तैल-मध्वाढकै. षड्भिरेकीकृतं घृतभाजनस्थं प्रावृषि भस्म- राशाविति सर्वं समानं पूर्वेण यावदाशीः ॥ ६ ॥ इति विडङ्गावलेप. । विडंगावलेह—छिलके रहित विडंग का चूर्ण एक आढक, पिप्पलो बाज का चूर्ण १॥ आढक, मिश्री घी, तैल और शहद इनका एक एक आढक लेकर छ. वस्तुओं को मिला कर घी से भावित पात्र में बरसात के प्रारम्भ में भस्म के ढेर में दाब दे, आगे सब पूर्व की भांति है ॥ ६ ॥ यथोक्तगुणानामामलकानां सहस्रमार्द्र-पलाश-द्रोण्या सपिधानायां बाष्पमनुद्गमन्त्यामारण्यगोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत्, तानि सुस्विन्नशीता- न्युद्धृतकुलकान्यापाथ्याऽऽढकेन पिप्पलीचूर्णानामाढकेन च विडङ्ग- तण्डुलचूर्णानामध्यर्धेन चाढकेन शर्कराचूर्णाना द्वाभ्या द्वाभ्यामाढकाभ्यां तैलस्य मधुनः सर्पिषश्च समायोज्य शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेदे- कविंशतिरात्रमत उर्ध्वं प्रयोगः, अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरमायुस्तिष्ठ- तीति समानं पूर्वेण ॥ १० ॥ इत्यामलकावलेहोऽपरः। आमलकावलेह ( २ )—पूर्वोक्त गुणवाले एक हजार आवलों को लेकर ढाक की गीली लकड़ी से बनी, ढाक के ढकनवाली नाद में भर कर ढकन लगा कर जंगली उपलों की आग पर ऐसे गरम करे कि उसके बाष्प बाहर न

२१६ चरकसंहिता [ अ० १ जायें। जिस समय आवले सीज जायें और ठण्डे हो जायें तब निकाल कर, कूट कर, गुठली बाहर कर देनी चाहिये। इनके रेशे साफ करके, इसमें पिप्पली चूर्ण एक आढक, विडग-तण्डुल चूर्ण एक आढक, शर्करा (चीनी) शाआढक, तैल २ आढक, मधु दो आदक और घी दो आढक (परिभाषानुसार ४ । ४ आढक), मिला कर घी से भावित स्वच्छ और दृढ पात्र में रख देना चाहिये। इक्कीस दिन के पीछे इसका प्रयोग करना चाहिये। इसके प्रयोग से जरारहित आयु एक सौ वरस की होती है और सब पूर्व की भाँति लाभ होते हैं॥ १०॥ धन्वनि कुशास्तीर्णे स्निग्ध-कृष्ण मधुर-मृत्तिके सुवर्ण-वर्ण-मृत्तिके वा व्यपगत-विष-श्वापद-पवन-सलिलाग्निदोषे कर्षणा-वल्मीक श्मशान- चैत्योषरावसथ-वर्जिते देशे यथर्तु-सुख-पवन-सलिलादित्य-सेविते जा- तान्यनुपहतान्यनध्यारूढान्यबालान्यजीर्णान्यविगतवीर्याणि शीर्ण-पुराण- पर्णान्यसंजातान्यपर्णानि तपसि तपस्ये वा मासे शुचिः प्रयतः कृत- देवार्चनः स्वस्ति वाचयित्वा द्विजातीन् बले सुमुहूर्ते नागबला- मूलान्युद्धरेत्, तेषां सुप्राक्षालितानां त्वक्पिण्डमाम्रमात्रमक्षमात्रं वा श्लक्ष्णपिष्टमालोड्य पयसा प्रातः प्रयोजयेत्, चूर्णीकृतानि वा पिबेत् पयसा, मधुसर्पिर्थ्या वा संयोज्य भक्षयेत्। जीर्णे च क्षीरसर्पिर्भ्यां शालिषष्टिकमश्नीयात्। संवत्सरप्रयोगादस्य वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठ- तीति समानं पूर्वेण ॥ ११ ॥ इति नागबलारसायनम् । नागबला रसायन - जागल प्रदेश में उत्पन्न, कुशा से व्याप्त भूमि में चिकनी काली और मधुर मिट्टी में या सुवर्ण के समान रंग की मिट्टी में उत्पन्न, विष, हिंस्र जन्तु, वायु और जल तथा अग्नि के दोषों से रहित, जहाँ पर हल न चला हो, वल्मीक (बमीठ) श्मशान, चैत्य (देवायतन), जहा ऊषर भूमि न हो, जो रहने की भूमि न हो, ऋतु के अनुसार जहा पर वायु, पानी, धूप पहुचती हो, ऊचाई पर उत्पन्न, पाले आदि से न मरी, कीड़े आदि से न खाई, समीपस्थ वृक्ष या लता से न घिरी, न तो बहुत छोटी और न बहुत पुरानी, (अपितु तरुण), वीर्य से भरपूर, जिसके पुराने पत्ते झड़ गये हो, नये पत्ते अभी उत्पन्न न हुए हों, ऐसी नागबला (गंगेरन) को माघ या फाल्गुन मास में उखाड़े। उखाड़ते समय वैद्य पवित्र और सयमवाले मन से देव- ताओं की पूजा करके, मगल पाठ पढ़ कर, ब्राह्मणो का पूजन करके उत्तम बलवान् मुहूर्त्त में नागबला की जड़ को उखाड़े। इन जड़ों को पानी से भली प्रकार धोकर इनकी त्वचा आम्रमात्र (एक पल भर) या अक्ष (कर्ष) मात्र

पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१७

पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१७ उतार ले । इस छाल को खूब बारीक पीस कर दूध में मिला कर पीवे, अथवा इस छाल का चूर्ण करके दूध के साथ पीवे, अथवा घी और शहद में मिला कर चाटे। जीर्ण होने पर दूध और घी के साथ शालि या साठी का भात खावे। एक साल तक इस प्रकार प्रयोग करने पर एक सौ बरस की जरा ( बुढापा ) से रहित आयु होती है और सब गुण पूर्व की भाति होते है ॥११॥ बलातिबला-चन्दनागुरु-धव-तिनिश-खदिर-शिंशपासन स्वरसाः पुनर्नवान्ताश्चौषधयो दश नागबलया व्याख्याताः। स्वरसानामलाभे त्वयं स्वरसविधिः—चूर्णानामाढकमाढकमुदस्याहोरात्रस्थितं मृदितपूतं स्वरसवत्प्रयोज्यम् ॥ १२ ॥ बला ( खरैंटी ), अतिबला, चन्दन, अगरु, धव, तिनिश ( सादन, स्यन्दन वृक्ष जिसका रथ बनता था ), खदिर, शिशपा ( शीशम ), असन इनके स्वरस तथा पुनर्नवा तक गिनी हुई अमृता, गिलोय, अभया, हरड, धात्री, आवला, मुक्ता, रास्ना ( जीवन्ती ), श्वेता ( दूर्वा अपराजिता ), जीवन्ती, अतिरसा ( शतावरी ), दस औषधियो का प्रयोग भी नागबला से बतला दिया है । अर्थात् जिस प्रकार नागबला का स्वरस प्रयुक्त होना है, उसी प्रकार से इनका स्वरस प्रयोग करना चाहिये । यदि स्वरस प्राप्त न हो सके तो इनका स्वरस तैयार करने का यह प्रकार है कि औषध का चूर्ण एक आढक और पानी एक आढक ( परिभाषा से दुगुना ) लेकर चौबीस घन्टे इसमें भिंगो कर रखना चाहिये । फिर इसको मथ कर, छान कर स्वरस के समान प्रयोग करना चाहिये । [ स्वरस के न मिलने पर यह भी विधि है कि शुष्क द्रव्य को आठ गुणे जल में काथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान कर प्रयोग करना चाहिये । बला आदि के स्वरस का ही ऐसा प्रयोग करना चाहिये । भोजन विधि नागबला के ही समान जाने ] ॥ १२ ॥ भल्लातकान्यनुपहतान्यनामयान्यापूर्णरसप्रमाणवीर्याणि पक्व-जा- म्बव-प्रकाशानि शुचौ शुक्रे वा मासे संगृह्य यवपल्ले माषपल्ले वा निधा- पयेत्, तांन चतुर्मासस्थितानि सहसि सहस्ये वा मासे प्रयोक्तुमारभेत शीत-स्निग्ध-मधुरोपस्कृत-शरीरः, पूर्वं दश भल्लतकान्यापोथ्याष्टगुनेना- म्भसा साधु साधयेत्, तेषा रसमष्टभागावशिष्टं पूतं सपयस्कं पिबेत् सर्पिषाऽन्तर्मुखमभ्यज्य । तान्येकैकभल्लातकोत्कर्षापकर्षेण दश भल्लात- कान्यात्रिंशतः प्रयोज्यानि, नातः परमुत्कर्षः प्रयोगविधानेन, सहस्रपर एव भल्लातकप्रयोगः । जीर्णे च ससर्पिषा पयसा शालिषष्टिकाशनमुप-

२१८ चरकसंहिता [ अ० १ चारः, प्रयोगान्ते च द्विस्तावत् पयसैवोपचारः । तत्प्रयोगाद्वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ १३ ॥ इति भल्लातकक्षीरम् । भल्लातक क्षीर—जिन पर किसी प्रकार की चोट न लगी हो, जिनमें किसी प्रकार का रोग ( कृमि आदि ) न हो, जो रस और वीर्य से भरपूर हों, अच्छे परिपुष्ट हों, तथा जा पके हुए जामुन के समान काले रंग के हों, ऐसे भिलावों को ज्येष्ठ ओर आषाढ मास में एकत्रित करके जौ से भरे कोठे में या उड़द के ढेर में रख देवे । चार मास के पीछे अगहन या पौष मास मे इनका सेवन आरम्भ करे। [ जौ आदि में से निकाल कर तुरन्त इनका सेवन न करे, बल्कि शीत काल मे शीत गुण युक्त शरीरावस्था मे ही इनका उपयोग करे ] । अर्थात् खाने से पूर्व शरीर को शीतल, स्नग्ध तथा मधुर वस्तुओं से संस्कृत करे । इनको सेवन करने का प्रकार यह है कि पहिले दस भिलावो को कुचल कर आठ गुण पानी मे पकावे । जब आठवा भाग रस रह जाये तब इसको छान कर इसमे दूध मिला कर पीवे और पीने से पूर्व मुख मे घी का लेप लगा लेव जिससे मुख के भीतर का सारी त्वचा चिकनी हो जाय । इस प्रकार से प्रति दिन एक एक भिलावे को बढाते हुए तीस भिलावे तक बढावे । तीस से ऊपर भिलावे की मात्रा नहीं बढावे और फिर उसी प्रकार से घटा कर दस तक ले आवे । इस प्रकार से एक हजार भिलावों का प्रयोग करे। भिलावों के जीर्ण होने पर घी और दूध के साथ शालि या साठी के चावल खावे । प्रयोग के उपरान्त [ जितने दिन भिलावों को प्रयोग किया उसमे दुगुने दिनों तक ] दूध का ही उपयोग करे अर्थात् दोनों समय दूध पीवे । इस प्रकार करने से एक सौ बरस की बिना वृद्धावस्था के आयु होता है। शेष पूर्व की भाति गुण हैं । [ अष्टाग सग्रह के टीकाकार इन्दु ने निम्न प्रकार से खाने की विधि बताई है । प्रथम दिन १० भिलावें, दूसरे दिन ११, तीसरे दिन १२ इस प्रकार से बढ़ाते हुए बीसवें दिन २६, इक्कीसवे दिन ३०, बाईस से लेकर २७ वे दिन तक तीस तीस ही ले, आगे न बढ़ाये । २८ वे दिन २६, २९ वें दिन २८, तीसवें दिन २७, इस प्रकार से घटा कर सैनालिसवें दिन १० पर ले आवे, ४८ वें दिन भी दस ही देवे । इस प्रकार से एक हजार पूरे हो जायेगे । यह एक हज़ार संख्या आवश्यकतानुसार कम भी हो सकती है। प्रकृति की अपेक्षा से कम में भी परि- त्याग किया जा सकता है। अष्टागसग्रह के अनुसार जितने दिन भिलावे का प्रयोग किया हो उससे तिगुने दिनों तक दूध चावल खाना चाहिये ] ॥ १३ ॥ भल्लातकानां जर्जरीकृतानां पिष्टस्वेदनं पूरयित्वा भूमावाकण्ठं

पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २१६

पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २१६ ~ ~ ~ ~ ~ ~ निखातस्य स्नेहभावितस्य दृढस्योपरि कुम्भस्याऽऽश्लेषोडुपेनापिधाय कृष्णमृत्तिकावलिप्त गोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत्, तेषा यः स्वरसः कुम्भ प्रपद्येत तमष्टभाग-मधु संप्रयुक्तं द्विगुणघृतमद्यात् । तत्प्रयोगाद्वर्षशतम- जरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ १४ ॥ इति भल्लातकक्षौद्रम् । भल्लातक क्षौद्र—भिलावो को कुचल कर पिष्ट स्वेद विधि से (पेदी में छिद्र किये हुए ) घड़े में रखे । एक दूसरे घड़े में घी का लेप करके इस घड़े को गले तक मिट्टी मे गाड़ दे । इस बड़े के मुख पर भिलावेवाला घड़ा रख कर इसका मुख ढक्कन से बन्द कर दे । इनकी सन्धियों को काली मिट्टी से बन्द कर दे । अब ऊपर के घड़े के चारों ओर उपले बिन कर आग लगावे । आग की आच से तैल निचले घड़े मे आयेगा । इस तेल में आठवा भाग मधु और दुगना घी मिलाकर खावे । [ मात्रा आधा बूंद से २ बूंद तक ] । इसके प्रयोग से एक सौ बरस की बुढ़ापे से रहित परम आयु होती है । शेष गुण पूर्वोक्त रसायनों के समान है ॥ १४ ॥ भल्लातकतैलपात्र सपयस्कं मधुकेन कल्केनाक्षमात्रेण शतपाकं कुर्यात् । समानं पूर्वेण । १५ ॥ इति भल्लातकतैलम् । भल्लातक तैल—पूर्वोक्त विधि से तैयार किया भल्लातक तैल दो आढक, दूध आठ आढक और मुलहठी का कल्क १ अक्ष ( २ तोला ) इनसे यथा- विधि पाक करे । इस प्रकार मे एक सौ बार पाक करके तैल सिद्ध करे । उसका सेवन पूर्व के तुल्य ही करे । इसके गुण भी पूर्व की भाति ही समझें ॥१५॥ भल्लातकक्षीर भल्लातकक्षोद्र भल्लातकतैलमेव गुडभल्लातकं भल्लातक- यूषो भल्लातक-सर्पि-र्भल्लातक-पललं भल्लातकसक्तवो भल्लातकळवणं भल्ला- तकतर्पणमिति भल्लातकविधानमुक्तम् ॥१६॥ इति भल्लातकविधिः । भल्लातक विधान—भल्लातक क्षीर, भल्लातक क्षोद्र, भल्लातक तैल के समान भल्लातक घी, भल्लातक गुड़ ( भिलावे का गुड़ के साथ ), भल्लातक यूष (भल्ला- तक क्षीर के समान ), भल्लातक तेल, भल्लातक पलल ( भिलावे का तिल कल्क के साथ ), भल्लातकसक्तु ( भिलावे का जौ के सत्तु के साथ ), भल्लातक लवण ( भिलावे का सेन्धा नमक के साथ ), भल्लातक तर्पण (भिलावे का लाजा के सत्तूओं के साथ सेवन ) होता है, ये भल्लातक विधान भी पूर्व के तुल्य ही जानने चाहिये ॥ १६ ॥ [ अष्टाग-सग्रह में भल्लातकप्राश घृत का भी प्रयोग लिखा है—पुष्ट, परि- पक्क आढक भर भल्लातक लेकर उनको ईंट के चूर्ण से रगड़ कर जल से धोकर

२२० चरकसंहिता [ अ० १ वायु से सुखा कर कूट कर, एक जल के घड़े में पकावे, एक चौथाई बचे तो उसे छान कर ठण्डा करले, फिर उसको दूध के घड़े में पकावे, एक चतुर्थांश बचे तो बराबर मात्रा घी की लेकर उसमें मिला कर धान्य के ढेर में सात दिन तक रखे। इस प्रकार 'अमृतरसपाक' बनता है, उसका सेवन करे और पचने के उपरान्त यथेष्ट जल, दूध या रस का सेवन करे। इससे स्मृति, मति, बल, मेधा, सत्त्व और सार इनसे सम्पन्न होकर सोने के समान उज्ज्वल गौर शरीर होकर दीर्घ आयु का भोग करता है । ] भवन्ति चात्र—भल्लातकानि तीक्ष्णानि पाकीून्यग्निसमानि च । भवन्त्यमृतकल्पानि प्रयुक्तानि यथाविधि ॥ १७ ॥ एते दशविधास्तेषां प्रयोगा. परिकीर्तिताः । रोगप्रकृतिसात्म्यज्ञास्तान् प्रयोगान् प्रकल्पयेत् ॥१८॥ कफजो न स रोगोऽस्ति न विबन्धोऽस्ति कश्चन । यं न भल्लातकं हन्याच्छीघ्रं मेधाग्निवर्धनम् ॥ १६ ॥ प्राणकामाः पुरा जीर्णाश्च्यवनाद्या महर्षयः । रसायनैः शिवैरेतैर्बभूवुरमितायुषः ॥ २० ॥ ज्ञानं १ तपो ब्रह्मचर्यमध्यात्मध्यानमेव च । दीर्घायुषो यथाकामं संभृत्य त्रिदिवं गताः ॥ २१ ॥ तस्मादायुःप्रकर्षार्थं प्राणकामैः सुखार्थिभिः । रसायनविधिः सेव्यो विधिवत्सुसमाहितैः ॥ २२॥ भिलावे अग्नि के समान तीक्ष्ण और पकानेवाले ( पाक रोग उत्पन्न करने वाले) होते हैं। परन्तु यदि इनका विधिपूर्वक प्रयोग किया जाये तो अमृत के समान होते हैं। यहाँ पर भिलावे के दस प्रयोगों का वर्णन कर दिया है। रोग और प्रकृति की और सात्म्य की विवेचना करके इनका प्रयोग करे। ऐसा कोई भी कफजन्य रोग नहीं है और नाहीं कोई ऐसी स्रोतो की रुकावट है, जिसको कि भिलावा दूर न कर सके। यह शीघ्र ही मेधा तथा अग्नि को बढ़ाता है। [भल्लातक के प्रयोग में अपथ्य कुल्थी, दधि, शुक्त (आचार आदि ), तैल का देह मे लगाना, अग्नि का सेवन और गरम पानी इनका त्याग करना चाहिये।] पुरातन काल मे प्राणों की कामना करनेवाले वृद्ध च्यवन आदि महर्षियों ने इन्हीं कल्याणकारी रसायनों के सेवन से अपरिमित आयु प्राप्त की थी । १ 'ब्राह्म' इति च पाठ ।

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२१ ये दीर्घ आयुवाले महर्षि यथेच्छ ज्ञान, तप, ब्रह्मचर्य, अध्यात्म ध्यान ( ब्रह्मध्यान ) का सञ्चय करके स्वर्ग मे गये । इसलिये प्राणों की कामना रखनेवाले सुख, आरोग्य के इच्छुक पुरुषों को चाहिये कि दीर्घायु प्राप्त करने के लिये विधिपूर्वक बड़ी सावधानी से रसायन-विधि का सेवन करें ॥२२॥ तत्र श्लोकः—रसायनानां संयोगाः सिद्धा भूतहितेषिणा । निर्दिष्टाः प्राणकामीये सप्तत्रिंशन्महर्षिणा ॥ २३ ॥ प्राणियों के हित को चाहनेवाले महर्षि आत्रेय ने प्राणकामीय अध्याय में रसायनों के ये ३७ प्रयोग बतलाये हैं ॥ २३ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने प्राणकामीयो नाम रसायनपादो द्वितीयः । ( तृतीयः पादः ) अथातः करप्रचितीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब हम ‘करप्रचितीय’ नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है—॥ १-२ ॥ करप्रचितानां यथोक्तगुणानामामलकानामुद्धृतास्थीनां शुष्कचूर्णि- तानां पुनर्माघे फाल्गुने वा मासे त्रिःसप्तकृत्वः स्वरसपरिपीतानां पुनः शुष्कचूर्णीकृतानामाढकमेकं ग्राहयेत्, अथ जीवनीयानां बृंहणीयानां स्तन्यजननानां वयःस्थापनानां षड्विरेचनशताश्रितीयोक्तानामौषधग- णानां चन्दनागुरु-धव-तिनिश-खदिर-शिंशपासन-साराणां चाणुशः क्षिप्तानामभया-बिभीतक-पिप्पली-वचा-चव्य-चित्रक-विडङ्गानां च सम- स्तानामाढकमेकं दशगुणाम्भसा साधयेत्, तस्मिन्नाढकावशेषे रसे सुपूते तान्यामलकचूर्णानि दत्त्वा गोमयाग्निभिर्वंश विदल-शर-तैजना- ग्निभिर्वा साधयेद्यावदपनयाद्रसस्य, तमनुपदग्धमुपहृत्यायसीषु पात्री- ष्वास्तीर्य शोषयेत्, सुशुष्कं कृष्णाजिनस्योपरि तद्-दृषदि श्लक्ष्णपिष्ट- मयःस्थाल्यां निधापयेत्सम्यक्, तच्चूर्णमयश्चूर्णाष्टभागसं प्रयुक्तं मधुस- र्पिभ्यामग्निबलमभिसमीक्ष्य प्रयोजयेदिति ॥ ३ ॥ आमलकायस ब्रह्म रसायन—माघ या फाल्गुन मास में पूर्वोक्त गुणोंवाले आवलों को वृक्ष पर से हाथों द्वारा तोड़ कर एकत्र करे ( भूमि पर गिरे आवकों

२२२ चरकसंहिता [ अ० १ को ग्रहण नहीं करे) । इनकी गुठली निकाल कर छाया में शुष्क करे। इनको इक्कीस बार आंवलों का स्वरस पिलावे। इस चूर्ण की एक आढक मात्रा ले लेवे । 'षड्विरेचन शताश्रितीय' अध्याय में वर्णित जीवनीय, बृहणीय, स्तन्यजनक, वय स्थापक ओषधि समूह और चन्दन, अगरु, धव तिनिश (साधने), खैर, शीशम और असन इन वृक्षों के सार (मध्य काष्ठ) को टुकड़े २ करके तथा हरड़, बहेड़ा, पिप्पली, वचा, चव्य, चित्रक, वायविडंग इन सब मिलित द्रव्यों का एक आढक लेकर दस गुणे जल मे पकावे और जब रस एक आढक रह जाये तब इसको छान- कर पूर्व तयार किया आंवले का चूर्ण मिला दे। फिर उपले और बास की खप्पच सरकण्डा, तेजबल की लकड़ियो से आग को तेज करके इस को पकाता जाये। जब सब रस शुष्क हो जाये (चूर्ण जले नही) तब उतार ले। बिना जले हुए अवलेह को उतार कर लोहे की थालियों में फैलाकर शुष्क करे। शुष्क हो जाने पर काले मृग की खाल पर रक्खी शिला पर खूब बारीक पीसकर लोहे की थाली में रख दे। इस चूर्ण में लोह भस्म आठवा भाग मिलाकर घी और मधु के साथ अग्निबल को देख कर सेवन करे ॥ ३ ॥ तत्र श्लोकाः-एतद्रसायनं पूर्वं वसिष्ठः कश्यपोऽङ्गिराः । जमदग्निर्भरद्वाजो भृगुरन्ये च तद्विधाः ॥ ४ ॥ प्रयुज्य प्रयता मुक्ताः श्रमव्याधिजराभयात् । यावदच्छस्तपेपुस्तत्प्रभावान्महाबलाः ॥ ५ ॥ तपसा ब्रह्मचर्येण ध्यानेन प्रशमेन च । रसायनविधानेन कालयुक्तेन चाऽऽयुषा ॥ ६ ॥ स्थिता महर्षयः पूर्वेम्, प्रथम वसिष्ठ, कश्यप, अंगिरा, जमदग्नि, भरद्वाज, भृगु, तथा अन्य इसी प्रकार के ऋषियों ने इसका प्रयोग किया था । इसके प्रयोग करने पर वे श्रम, रोग और बुढ़ापे से मुक्त हो गये थे । इसके प्रभाव से उन्होंने यथेच्छ तप किया था। पूर्व काल में महर्षि रसायन विधि के द्वारा तप, ब्रह्मचर्य, ध्यान, प्रशम तथा अनियत काल तक आयु का उपभोग करते रहे हैं ॥ ४-६ ॥ न हि किंचिद्रसायनम् । ग्राम्याणामन्यकार्याणां सिद्ध्यत्यप्रयतात्मनाम् ॥ ७ ॥ इदं रसायनं चक्रे ब्रह्मा वर्षसहस्रिकम् । जराव्याधिप्रशमनं बुद्धीन्द्रियबलप्रदम् ॥ ८ ॥ इत्यामलकायसब्रह्मरसायनम् ।

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२३ कोई भी रसायन ग्राम्य ( नगर में रहने वाले ) पुरुषों तथा काम-धन्धे में फंसे हुए तथा ब्रह्मचर्य आदि सयम का पालन न करनेवाले पुरुषों में फलवती नहीं होती । इसलिये इनसे पृथक् होकर एकाग्र चित्त से रसायन-विधि करनी चाहिये। सहस्र वर्ष की आयु प्रदान करने वाले और जरा तथा रोग को दूर ,करनेवाले तथा बुद्धि और इन्द्रिय बल को देनेवाले इस आमलक रसायन का ब्रह्मा ने आविष्कार किया था ॥ ७-८ ॥ संवत्सरं पयोवृत्तिर्गवां मध्ये वसेत्सदा । सावित्रीं मनसा ध्यायन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ९ ॥ संवत्सरान्ते पौषीं वा माघीं वा फाल्गुनीं तिथिम् । त्र्यहोपवासी शुद्धश्च प्रविश्यामलकीवनम् ॥ १० ॥ बृहत्फलाढ्यमारुह्य द्रुमं शाखागतं फलम् । गृहीत्वा पाणिना तिष्ठेज्जपन् ब्रह्मामृतागमात् ॥ ११ ॥ तदा ह्यवश्यममृतं वसत्यामलके क्षणम् । शर्करामधुकल्पानि स्नेहवन्ति मृदूनि च ॥ १२ ॥ भवन्त्यमृतसंयोगात्तानि यावन्ति भक्षयेत् । जीवेद्वर्षसहस्राणि तावन्त्यागतयौवनः ॥ १३ ॥ सौहित्यमेषां गत्वा तु भवत्यमरसन्निभः । स्वयं चास्योपतिष्ठन्ते श्रीर्वेदा वाक् च रूपिणी ॥ १४ ॥ इति केवलामलकं रसायनम् । केवलामलक रसायन—एक वर्ष तक केवल दूध पर निर्वाह रखकर गायों के बीच में वास करे । वहां पर ब्रह्मचर्य्य का पालन करते हुए मन में सावित्री का ध्यान करे । एक साल के पीछे पौष या माघ अथवा फाल्गुन की किसी शुभ तिथि में आंवले के जंगल में पहुंचे । वहां पर जाने से पूर्व तीन दिन उपवास करे । फिर शुद्ध होकर वन में घुसे । वहां पर आंवले से लदे बड़े वृक्ष पर चढ़कर हाथ से फल को पकड़ कर अमृत के आने तक ब्रह्म, 'ओङ्कार' का जप करता रहे । इस प्रकार जप करने से क्षण भर के लिये आंवले में अमृतत्व आ जाता है । अमृत के आने से आंवले शर्करा और मधु के समान मीठे, स्नेहवाले, कोमल हो जाते हैं, इनको खावे। वह जितने भी आंवले खायेगा उतने हजार वर्षों तक युवारहकर जीवंत रहेगा । यदि भरपेट तृप्त होकर खाये तो अमर हो जाये, बहुत दीर्घायु हो । कान्ति वेदवाणी, लक्ष्मी, सरस्वती स्वयं इसके आगे आकर उपस्थित हो जाती है।९-१४।

२२४ चरकसंहिता [ अ० १ त्रिफलाया रसे मूत्रे गवां क्षारे च लावणे। क्रमेण चेङ्गुदीक्षारे किंशुकक्षार एव च ॥ १५ ॥ तीक्ष्णायसस्य पत्राणि वह्निवर्णानि वापयेत्। चतुरङ्गुलदीर्घाणि तिलोत्सेधसमानि च ॥ १६ ॥ ज्ञात्वा तान्यञ्जनाभानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत्। तानि चूर्णानि मधुना रसेनामलकस्य च ॥ १७ ॥ युक्तानि लेहवत्कुम्भे स्थितानि घृतभाविते। संवत्सरं निधेयानि यवपल्ले तदेव च ॥ १८ ॥ दद्यादालोडनं मासे सर्वत्रालोडयन् बुधः। संवत्सरात्यये तस्य प्रयोगो मधुसर्पिषा ॥ १९ ॥ प्रातः प्रातर्बलापेक्षी सात्म्यं जीर्णे च भोजनम्। एष एव च लोहानां प्रयोगः संप्रकीर्तितः ॥ २० ॥ अनेनैव विधानेन हेम्नश्च रजतस्य च। आयुःप्रकर्षकृत्सिद्धः प्रयोगः सर्वरोगनुत् ॥ २१ ॥ नाभिघातैर्न चातङ्कूर्जरया न च मृत्युना। स धृष्य स्याद् गजप्राणः सदा चातिबलेन्द्रियः ॥ २२ ॥ धीमान् यशस्वी वाक्सिद्धः श्रुतधारी महाधनः। भवेत्समा प्रयुञ्जानो नरो लौहरसायनम् ॥ २३ ॥ इति लौहादिरसायनम्। लौहादिरसायन—तीक्ष्ण लौह (फौलाद) के चार अगुल लम्बे और तिल भर मोटे पत्रों को आग में लाल करके क्रमशः त्रिफला के क्वाथ में, गोमूत्र मे मालकंगनी के क्षारोदक में, तथा इगुदी (हिंगौट) के क्षार मे, और पलाश (ढाक) के क्षारोदक मे बुझा ले । बुझाने से पूर्व फिर २ तपा कर लाल कर लिया करे । बुझाने पर जब पत्र अजन के समान काले और टूटनेवाले हो जायें, तब इनका बारीक चूर्ण बना लेवे । इस चूर्ण को मधु तथा आंवले के रस मे मिला कर अवलेह को भांति कर ल । इस अवलेह को घी से भावित घड़े मे रख कर एक साल तक जौ के ढेर में दबा दे । प्रत्येक मास लकड़ी क डण्डे से इसको चला देवे । एक साल के पीछे इसको घी और शहद के साथ प्रतिदिन प्रातः अग्निबल के अनुसार प्रयोग करे । जीर्ण होने पर प्रकृति के अनुकूल भोजन करे । इसी प्रकार से अन्य लोहों (धातुओं) का प्रयोग करना चाहिये । इस भांति स्वर्ण, चांदी का प्रयोग आयु को लम्बा करता है और सम्पूर्ण रोगों को

पा० ३ ] १५ चिकित्सितस्थानम् २२५

पा० ३ ] १५ चिकित्सितस्थानम् २२५ नष्ट करता है । लौह रसायन के एक साल तक प्रयोग करने पर पुरुष चोट, रोग, जरा, मृत्यु इनसे पराभूत नहीं होता । हाथी के समान शक्तिशाली हो जाता है, इन्द्रियां अति बलवान् हो जाती हैं। मेधावी, यशस्वी, वाक्सिद्ध ( जो कहेगा सो होगा ), श्रुतधारी ( सुनते ही धारण करनेवाला ), महाधन- शाली ( रसायन के प्रभाव से ही ) हो जाता है ॥ १५-२३ ॥ ऐन्द्री मत्स्याक्षको ब्राह्मी वचा ब्रह्मसुवर्चला । पिप्पल्यो लवण हेम शङ्खपुष्पी विषं घृतम् ॥ २४ ॥ एषा त्रियवकान् भागान् हेयसर्पिर्विषैर्विना । द्वौ यवौ तत्र हेम्नस्तु तिलं दद्याद्विषस्य च ॥ २५ ॥ सर्पिषश्च पलं दद्यात्तदैकध्यं प्रयोजयेत् । घृतप्रभूत सक्षौद्रं जीर्णे चान्नं प्रशस्यते ॥ २६ ॥ जराव्याधिप्रशमनं स्मृतिमेधाकरं परम् । आयुष्यं पौष्टिकं बल्यं स्वरवर्णप्रसादनम् ॥ २७ ॥ परमोजस्करं चैतत्सिद्धमेतद्रसायनम् । नैनं प्रसहते कृत्या नालक्ष्मीर्न विषं न रुक् ॥ २८ ॥ श्वित्रं सकुष्ठं जठराणि गुल्माः प्लीहा पुराणो विषमज्वरश्च । मेधास्मृतिज्ञानहराश्च रोगाः शाम्यन्त्यनेनातिबलाश्च वाताः ॥ २९ ॥ इत्यैन्द्रीरसायनम् । ऐन्द्री रसायन—ऐन्द्री ( इन्द्रवारुणी या दिव्य औषध ), मत्स्याक्षक ( मच्छीछी ), ब्राह्म, वचा, ब्रह्मसुवर्चला ( मण्डूकपर्णी ), १पिप्पली, सैन्धव लवण, स्वर्ण, शखाहुली, विष, घी इनमें स्वर्ण, विष और घी को छोड़कर प्रत्येक तीन २ जौ भर लेना चाहिये । स्वर्ण दो जौ, विष एक तिल भर और घी एक पल मिलाना चाहिये । इसको खाकर प्रभूत घी तथा शहद मिश्रित अन्न जीर्ण होने पर खाना चाहिये । इसके खाने से जरा और रोग शान्त होते हैं, स्मृति और मेधा बढ़ती है। आयुवर्धक, पौष्टिक, बलकारक, स्वर, वर्ण को शुद्ध करता है। यह सिद्ध रसायन अत्यन्त ओज-वर्धक है। इसके प्रयोग से कृत्या ( पाप या आभिचारिक कर्म ), अलक्ष्मी ( दरिद्रता ), विष और रोग भी प्रभाव नहीं करते । श्वित्र, कुष्ठ, उदर रोग, गुल्म, प्लीहा, पुराना विषम ज्वर, मेधा, स्मृति और ज्ञान को नष्ट करनेवाले रोग तथा अत्यन्त बलवान् वायु रोग भी इसके सेवन से नष्ट हो जाते हैं ॥ २४-२९ ॥ १ ब्रह्मसुवर्चला दिव्य औषधी है- 'हिरण्यक्षीरा पुष्करसदृशपत्रा।'

२२६ चरकसंहिता [ अ० १ मण्डूकपर्ण्याः स्वरसः प्रयोज्यः क्षीरेण यष्टीमधुकस्य चूर्णम् । रसो गुडूच्यास्तु समूलपुष्प्याः कल्कः प्रयोज्यः खलु शङ्खपुष्प्याः ॥ ३०॥ आयुःप्रदान्यामयनाशनानि बलाग्निवर्णस्वरवर्धनानि । मेध्यानि चैतानि रसायनानि मेध्या विशेषेण च शङ्खपुष्पी ॥ ३१ ॥ इति मेध्यरसायनानि । मेधाकर रसायन चार हैं। जैसे—( १ ) मण्डूकपर्णी का स्वरस प्रयोग करना चाहिये । ( २ ) गाय के दूध के साथ मुलहठी का चूर्ण खाना चाहिये । ( ३ ) गिलोय का रस प्रयोग करना चाहिये । ( ४ ) मूल और पुष्प के साथ शंखाहुली का कल्क बरतना चाहिये । * ये चारों रसायन आयुवर्धक, रोग नाशक बल, अग्नि, वर्ण ( कान्ति ) और स्वर को बढ़ाते हैं । ये रसायन मेधावर्धक हैं । इन में भी शंखपुष्पी खास कर बुद्धि को बढ़ाती है ॥३०-३१॥ पञ्च षट् १ सप्त दश वा पिप्पलीर्मधुसर्पिषा । रसायनगुणान्वेषी समामेकां प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥ तिस्रस्तिस्रस्तु पूर्वाह्ने भुक्त्वाऽग्रे भोजनस्य च । पिप्पल्यः किंशुकक्षारभाविता घृतभर्जिताः ॥ ३३ ॥ प्रयोज्या मधुसर्पिर्भ्यां २ रसायनगुणैषिणा । जेतुं कासं क्षयं शोषं श्वासं हिक्का गलामयान् ॥ ३४ ॥ अर्शांसि ग्रहणीदोषं पाण्डुतां विषमज्वरम् । वैस्वर्यं पीनस शोफं गुल्मं वातबलासकम् ॥ ३५ ॥ इति पिप्पलीरसायनम् । पिप्पली रसायन—रसायन गुण को चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि पांच, छः, सात या दस पिप्पली को ( चूर्ण, फाण्ट, कल्क ) मधु और घी के साथ एक साल तक भक्षण करे । पिप्पली को पलाश के क्षारोदक से भावना देकर गाय के घृत में भून लेवे । इनमें से तीन तीन पिप्पली को घी में

  • मण्डूकपर्णी की प्रयोगविधि—दोषों से रहित होकर उक्त प्रकार के आगार में रह कर मण्डूकपर्णी का स्वरस लेकर सहस्र सम्पात आहुति शेष कर बल से जल को आलोड़न करके उसका पान करे । इसका दूध अनुपान है । इसके जीर्ण होने पर यवान्न को दूध के साथ खावे । तीन मास दूध ही अन्नपान है । १. 'पञ्चाष्टौ' इति च पाठ. । २. 'मधुमिश्रा' इति च पाठः ।

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २५७ मिलाकर प्रातःकाल भोजन से पूर्व तथा पीछे तीन समय खाना चाहिये। इस प्रकार करने से कास, क्षय, श्वास, शोष, जिसकी, गले की बिमारिया, अर्श, ग्रहणी रोग, पाण्डु, विषम ज्वर, स्वरभंग, पीनस, शोफ, गुल्म और वात, कफजन्य रोग नष्ट होते हैं। [ पिप्पली प्रयोग में पाच से कम पिप्पली का भी प्रयोग कर सकते हैं। इसी प्रकार कफ की मात्रा अत्यधिक बढ़े होने पर प्रातः, मध्यावस्था में होने पर भोजन से पूर्व और कम होने पर भोजन के अन्त में देनी चाहिये । पिप्पली के अति सेवन से उत्पन्न दोष अन्य वस्तुओं के साथ सम्मिलित होने से उत्पन्न नहीं होते । भावना १ देते समय कम से कम सात भावना देनी चाहियें ।]॥३३-३५॥ क्रमवृद्ध्या दशाहानि दशपैप्पलिकं दिनम् । वर्धयेत्पयसा सार्धं तथा चापनयेत्पुनः ॥ ३६ ॥ जीर्णे जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा । पिप्पलीनां सहस्रस्य प्रयोगोऽयं रसायनम् ॥ ३७ ॥ पिष्टास्ता बलिभिः सेव्याः शृता मध्यबलैर्नरैः । शीतकृता ह्रस्वबलैर्योज्या दोषामयान् प्रति ॥ ३८ ॥ दशपैप्पलिकः श्रेष्ठो मध्यमः षट् प्रकीर्तितः । प्रयोगो यस्त्रिपर्यन्तः स कनीयान् स चाबलैः ॥ ३६ ॥ बृंहणं स्वर्यमायुष्यं प्लीहोदरविनाशनम् । वयसः स्थापनं मेध्यं पिप्पलीना रसायनम् ॥ ४० ॥ इति पिप्पलीवर्धमानं रसायनम् । पिप्पली वर्धमान—एक दिन में दस पिप्पलियो का दूध के साथ सेवन करे । दूसरे दिन बीस का, और तीसरे दिन तीस का । इस प्रकार से प्रत्येक दिन दस दिनों तक दस दस पिपलिया बढ़ाता जावे । साथ में दूध की मात्रा भी बढ़ाता जाय [ पिप्पली-वर्धमान के प्रयोग में दूध की मात्रा एक प्रकुञ्च (पल) से आरम्भ करके प्रतिदिन एक एक प्रकुञ्च बढानी चाहिये, फिर घटाने के साथ घटा देना चाहिये । ] दस दिन के पीछे ग्यारहवें दिन दस पिप्पली कम करे इस प्रकार से बीसवें दिन फिर दस पर ही आजावे । दूध की मात्रा भी कम १ भावना विधि—दिवा दिवाऽऽतपे शुष्कं रात्रौ रात्रौ निवासयेत् । श्लक्ष्णचूर्णं कृत द्रव्य सप्ताह भावनाविधिः ॥ दिन में धूप में सूखे रात्रि में खुले आकाश के नीचे रहे ।

२२८ चरकसंहिता [ अ० १ करे। पिप्पली के जीर्ण होने पर साठी भात दूध और घी के साथ खावे। दोष और रोगों को देख कर बलवान् पुरुष पीसकर, मध्यम बलवाला क्वाथ बना कर और ह्रस्व बलवाला शीत कषाय करके प्रयोग करे। दस पिप्पली के प्रयोग को श्रेष्ठ, छः पिप्पली के प्रयोग को मध्यम और तीन पिप्पली के प्रयोग को अवर कहते हैं। पिप्पली-रसायन पुष्टिकारक, स्वरवर्धक, आयुष्य, प्लीहा, उदर रोग का नाशक, आयु को स्थिर रखने वाली और बुद्धिवर्धक है ॥ ३६-४० ॥ [ गंगाधर कविराज ने छः पिप्पली तथा तीन पिप्पली का प्रयोग भी एक हजार तक लेजाने को कहा है। यथा- प्रथम दिन दस पिप्पली लेवे। दूसरे दिन बारह, इस प्रकार से तेरह दिन तक बढ़ाता जाये और फिर चौदहवें दिन से छः छः कम करना आरम्भ करे। इस प्रकार से १०२४ पिप्पली का प्रयोग करे। तीन पिप्पली के प्रयोग में अठारह दिन तक क्रमशः तीन तीन बढ़ाते जावें। उन्नीसवें दिन तीन घटा देवें। इस प्रकार से १०२८ पिप्पली का प्रयोग करें। दस पिप्पली का प्रयोग श्लैष्मिक रोगी के लिये, छः का वातिक और तीन का पैत्तिक रोगी के लिये है। सुश्रुत के मत से पिप्पलियो को दूध में पीस कर पांच, सात वा दस की वृद्धि से पान करे। दस दिन तक दूध भात खावे। दस दिन के बाद फिर घटावे और घटाते २ पाच, सात और दस तक आजावे।]॥३६-४०॥ जरणान्तेऽभयामेकां प्राग्भुक्ते द्वे बिभीतके। भुक्त्वा तु मधुसर्पिर्भ्यांश्चत्वार्यामलकानि च ॥ ४१ ॥ प्रयोजयेत्समामेकां त्रिफलाया रसायनम् । जीवेद्वर्षशतं पूर्णमजरोऽव्याधिरेव च ॥ ४२ ॥ इति त्रिफलानां रसायनम्। त्रिफला रसायन-पूर्व किये भोजन के जीर्ण होने पर एक हरड़ प्रातःकाल, भोजन से पूर्व दो बहेड़ा और भोजन के पश्चात् चार आँवले मधु और घी के साथ खावे [इन द्रव्यों को कूटकर मधु और घी के साथ खाना चाहिये]। इस रसायन का एक वर्ष तक प्रयोग करने से सौ बरस तक बुढ़ापा और रोगों से मुक्त होकर जीता है ॥ ४१-४२ ॥ त्रैफलेनायसीं पात्रीं कल्केनालेपयेन्नवाम् । तमहोरात्रिकं लेपं पिबेत्क्षौद्रोदकाप्लुतम् ॥ ४३ ॥ प्रभूतस्नेहमशनं जीर्णे तत्र प्रशस्यते । अजरोऽरुक् समाभ्यासाज्जीवेच्चैव समाः शतम् ॥ ४४ ॥ इति त्रिफलारसायनमपरम् ।

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२६

त्रिफला रसायन—लोहे के नये घड़े में त्रिफला को पीसकर लेप कर देना
चाहिये । चौबीस घण्टे तक इसको लगा रहने देना चाहिये । फिर शहद के
पानी में बने घोल में मिलाकर पीना चाहिये । इसके जीर्ण होने पर बहुत सा
स्नेह ( घी ) पान करना चाहिये । इसके एक साल तक प्रयोग करने पर जरा
और रोगों से मुक्त होकर सौ बरस तक जाता है ॥ ४३-४४ ॥
मधुकेन तुगाक्षीर्या पिप्पल्या क्षौद्रसर्पिषा ।
त्रिफला सितया चापि युक्ता सिद्धं रसायनम् ॥ ४५ ॥
इति त्रिफलारसायनमरम् ।
त्रिफला रसायन --त्रिफला के साथ तुगाक्षीरी ( वंशलोचन ) मुलहठी,
पिप्पली, घी, मधु और शर्करा इन सबको एकत्र करके सेवन करे । यह एक
सिद्ध रसायन है १ ॥ ४५ ॥
सर्वलोहैः सुवर्णेन वचया मधुसर्पिषा ।
विडङ्गपिप्पलीभ्यां च त्रिफला लवणेन च ॥ ४६ ॥
संवत्सरप्रयोगेण मेधास्मृतिबलप्रदा ।
भवत्यायुष्प्रदा धन्या जरारोगनिबर्हणी ॥ ४७ ॥
इति त्रिफलारसायनमपरम् ।
त्रिफला रसायन—त्रिफला को सब धातुओं की भस्म ( स्वर्ण, रजत, ताम्र,
वंग, सीसक, लोह, यशद ), स्वर्ण, वच, घी, शहद, वायविडंग, पिप्पली और
सैन्धा नमक के साथ प्रयोग करे । इसके एक साल तक प्रयोग करने पर मेधा,
स्मृति, बल, आयु बढ़ती है, यह रसायन धन्य है तथा जरा और रोग को नष्ट
करती है । [ यद्यपि सब धातुओं में स्वर्ण आ जाता है, तथापि पृथक् ग्रहण
करने से पृथक् एक अंश और डालना चाहिये २ ] ॥ ४७ ॥
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१ कोई कोई आचार्य इनको छः योग मानते हैं । परन्तु यह मानने से
संख्या बढ़ जाती है ।
२ सप्त धातु—स्वर्णतारारताम्राणि नागवंगौ च तीक्ष्णकम् ।
धातवः सप्त विज्ञया अष्टमः क्वापि पारदः ॥
स्वर्णे तार च ताम्र च वङ्गो नागस्तु पञ्चमः ।
रीतिका च तथा घोषो लोहं चेत्यष्टधातवः ॥
कविराज श्री गंगाधर सेन ने इनको भी पृथक् पृथक योग माना है । ऐसा
मानने से संख्या बढ़ जाती है ।

२३० चरकसंहिता [ अ० १ अनम्लं च कषायं च कटु पाके शिलाजतु । नात्युष्णशीतं धातुभ्यश्चतुर्भ्यस्तस्य संभवः ॥ ४८ ॥ हेम्नश्च रजतात्ताम्राद्वर कृष्णायसादपि । रसायनं तद्विधिभिस्तद्वृष्यं तच्च रोगनुत् ॥ ४६ ॥ वातपित्तकफघ्नैस्तु निर्यूहैस्तत्सुभावितम् । वीर्योत्कर्षं परं याति सर्वैरेकैकशोऽपि वा ॥ ५० ॥ प्रक्षिप्योद्धृनमप्येवं पुनस्तत्प्रक्षिपेद्रसे । कोष्णे सप्ताहमेतेन विधिना तस्य भावना ॥ ५१ ॥ शिलाजतु—शिलाजतु में अम्ल रस नहीं, कषाय रस है । ( कोई आचार्य उसमें ईषद् अम्ल रस मानते हैं ) । विपाक मे कटु, वीर्य में समान, न तो अत्यन्त उष्ण और न अत्यन्त शीत, चारों धातुओं (स्वर्ण, लोह, ताम्र और रजत से, कई २ आचार्यों के मत में त्रपु और सीसक ) से यह उत्पन्न होता है । स्वर्ण, चांदी, ताम्र और उत्तम कृष्ण लोह से निकले शिलाजीत को विधि- पूर्वक प्रयोग करने पर यह उत्तम रसायन, वृष्य तथा रोगनाशक होता है । विशुद्ध शिलाजीत को वात, पित्त और कफनाशक औषधियों के क्वाथ से अथवा एक एक औषधि से भावना देने पर अधिक गुण बढ़ता है । [ रोगी के दोष आदि के अनुसार ओषधियों से भावना देनी चाहिये ] भावनार्थ—स्वच्छ पानी से शोधित शिलाजतु में वातघ्न औषधियों का क्वाथ डालकर धूप में सुखा दे । जब सब पानी शुष्क हो जाये तब पुनः कोष्ण क्वाथ डालना चाहिये । इस प्रकार से एक सप्ताह तक करना चाहिये । [ (१) भावना देने के लिये शिलाजतु के बराबर क्वाथ द्रव्य लेकर आठ गुने जल में क्वाथ करना चाहिये । और जब अष्टमांश रह जाये तब छान कर कोष्ण शिलाजतु में डालना चाहिये । यह तो अष्टांग संग्रह का मत है । (२) चक्रपाणि के अनुसार शिलाजतु के समान क्वाथ द्रव्य लेकर इसमें चौगुना पानी डालकर क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये इसकी भावना देनी चाहिये । (३) क्षारपाणि के नियम से शिलाजतु के समान क्वाथ द्रव्य लेकर इसमें अठगुणा पानी मिलाकर क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये ] ॥४८-५१॥ पूर्वोक्तेन विधानेन लोहैश्चूर्णीकृतैः सह । तत्पीतं पयसां दद्याद्दीर्घमायुः सुखान्वितम् ॥ ५२ ॥