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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

मुनासिबखान अपने साथ के सैनिकों को लेकर जंगल में घुसा। किन्तु शम्भूराजा और उनके साथी तेज गति से आगे निकल चुके थे। उनका पीछा करते हुए बालेखान की फौज बहुत आगे जा चुकी थी। यह जानकर मुनासिब हैरान हो गया। अपने घोड़े को बार-बार ललकारते हुए, उस जानवर को अपनी जाँघों से दबाते हुए वह पवन की गति से आगे निकल रहा था। शाम होने को आ गयी। परछाइयाँ जंगलों में उतरने लगीं। नाचता हुआ मोर जिस प्रकार अपने पंख समेटता है उसी प्रकार सूर्य की एक-एक किरण विलुप्त हो रही थी। सूर्य डूब चला। एक पहाड़ी पर से मुनासिबखान ने घाटी में देखा। वहाँ एक बड़ा झरना बह रहा था। झरने के किनारे शम्भूमहाराज को एक पेड़ के तने से बाँधा गया था। जंगल में आकर उनसे मिले साठ शृंगारपुरी सैनिकों में से आधे मरकर एक ओर गिरे थे। पीछा करते समय बड़ी लड़ाई हो चुकी थी, यह साफ साफ दिखाई पड़ रहा था। शम्भूराजा का सारा शरीर खून से लथपथ था। चेहरा भी खून लगे खरोंचों से भर गया था। उनकी खरोंचों और उनके शरीर के घावों से स्पष्ट दिख रहा था कि इस बहादुर ने कम-से-कम साठ-सत्तर लोगों को घायल किया होगा। उनका और बालेखान का जोरदार झगड़ा चल रहा था। उनके झगड़े को मुनासिबखान ऊपर से देख रहा था। बालेखान हाथ में तलवार नचाते हुए संभाजी राजा के सामने नाच रहा था। दोनों क्रोधित होकर एक-दूसरे को गालियाँ दे रहे थे। यह दृश्य देखकर मुनासिब का कलेजा हिल गया। वह अपने भतीजे की ओर देखकर चिल्लाया—"बेटे बालेखानऽ ठहरोऽऽ। आगे मत बढ़ोऽऽ। खुदा के वास्ते बेटेऽऽ।" ऐसा कहते हुए उसने घोड़े पर से नीचे छलाँग मारी। घोड़े पर जो हथियार लदे थे उसमें से पल्लेदार भाला हाथ में लिया। भाले के डंडे का सहारा लेते हुए सीधे रास्ते से उतरते सरकते नीचे जाने लगा। अभी भी बालेखान और शम्भूराजा के झगड़े की ऊँची आवाज उसके कानों तक पहुँच रही थी। सरकते सरकते नीचे जाने वाला मुनासिबखान बीच-बीच में बोल रहा था, "बेटे बालेखान कुछ मत करना। मैं आ रहा हूँ, बेटे।" मुनासिब ढलान उतरकर कुछ ही दूर गया था कि उसने देखा। कि क्रुद्ध बालेखान आगे बढ़कर बँधे हुए शम्भूराजा को मुट्ठियों से मार रहा है। उन्हें गालियाँ दे रहा है। क्रोध-उन्मत्त होकर उसने शम्भूमहाराज की दाढ़ी पकड़कर खींची। शम्भूराजा बहुत चिढ़ गये। उन्होंने बालेखान के मुँह पर जोर से थूक दिया। इस पर बालेखान अपने क्रोध पर नियन्त्रण खो बैठा। उसने म्यान से अपनी तलवार खींच ली। तलवार की नोक से शम्भूराजा के सिर पर वार करने ही वाला था कि पीछे से एक गर्जना आयी—"बालेखानऽऽ बेटेऽऽ।" उसके ठीक बाद तीर की गति से 148 :. सम्भाजी

भाला आया और उमकी नोक तेजी से बालेखान की पीठ में घुस गयी। देखते- देखते बालेखान अपने ही खून के गड्ढे में गिर गया। स्वयं शम्भूमहाराज, उन्हें घेरकर खड़े हजारों मुमलमान सैनिक और भाला फेंकने वाले मुनासिबखान सभी आश्चर्यचकित रह गये। दूसरे ही क्षण मुनासिब बालेखान की ओर झपटा। खून से लथपथ बालेखान का शरीर उसने बाँहों में भर लिया। उसे पानी पिलाने का भी व्यर्थ प्रयास किया। बालेखान तो कब का समाप्त हो चुका था। मुनासिब उसके लिए दहाड़ें मारकर रो रहा था। मुनासिबखान के अनेक फौजी साथी आगे आये। उन्हें अपने मालिक पर बहुत क्रोध आया। उनमें से एक ने बहुत सन्तप्त होकर पूछा—“चाचा, एक जहन्नमी काफिर को बचाने के लिए आपने यह क्या किया? अपने भतीजे को ही मार डाला?" बालेखान के शव को देखकर एकबार पुनः मुनासिब को रोना आया। आँसू बहाते हुए वह बोला, “जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ। दोस्तोऽऽ यह तुम्हारा मुखिया था और मेरा इस दुनिया में एकलौता वारिस।” "वही कह रहा हूँ खानसाहब ! एक मूर्ख काफिर के लिए अपने ही बच्चे की हत्या करने की आपको क्या ज़रूरत थी?” "क्यों बेटे, सिर्फ एक मुर्दा देखकर तुमको इतना बुरा लग गया?" "मतलब?" अपने सहयोगियों पर एक तीखी नजर फेंकते हुए मुनासिबखान गरजा, “अथणी और तिकोता में उस बदमाश दिलेरखान ने भरे चौक में किसकी इज्जत लूटी थी? अनेक औरतों, माँ, बहनों को नंगी करके पेड़ों पर किसने लटकाया था? भूल गये आप लोग? उन बेसहारा औरतों में हिन्दू कम मुसलमान ज्यादा थीं। किन्तु उस दारुण दृश्य को देखकर तुम में से किसी की भी तलवार म्यान से बाहर क्यों नहीं निकली?" "याने?" "उस अत्याचार को देखकर जिसके शरीर का खून खौल उठा था, उस अत्याचारी दिलेरखान पर आक्रमण करने जो व्यक्ति गया था, वह एक ही व्यक्ति था शिवाजी का बेटा। आप में से कोई नहीं था। तब कहाँ थीं अपनी तलवारें? कहाँ चुप बैठी थी यह मर्दानगी?" सभी चुप हो गये। मुनासिब की बात से सभी चकरा गये। उनमें से एक ने अधीर होकर पूछा- "चाचा, आप कहना क्या चाहते हैं?" "बस इतना ही! हम सबकी बड़ी इच्छा थी। इसलिए छः महीने पहले हम सम्भाजी १२१

सब अपनी बीजापुर की चाकरी छोड़कर दिलेरखान से मिल गये। वह हमारी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा गुनाह था। आज औरंगजेब का एक सरदार दक्खिन में आकर हमारी मुस्लिम माँ-बहनों पर इतना अत्याचार कर रहा है तो कल औरंगजेब के आने के बाद क्या होगा?'' “चाचा, आप ठीक कहते हैं।'' सामने से कुछ आवाजें आयीं। “मैं ख़ुदा की कसम खाकर कहता हूँ आज शियापन्थी दक्खिन मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा काफ़िर बादशाह औरंगजेब है। बच्चो! दिल्ली का यह शैतान मराठों का राज्य नेस्तनाबूद करने में कामयाब हो गया तो अपनी बीजापुर और गोलकुंडा की सल्तनतों को एक दिन के लिए भी ज़िन्दा नहीं छोड़ेगा। हम कैसे भूल सकते हैं? पिछले साल बीजापुर की सहायता के लिए शिवाजी महाराज ने दस हजार बैलों की पीठ पर लादकर अनाज भेजा था। औरंगज़ेब ने नहीं। इसलिए कहता हूँ कि औरंगजेब के अत्याचारों से दक्खिनियों को मुक्ति दिलाने के लिए शिवाजी का राज्य बना रहना चाहिए।'' मुनासिबखान ने अपनी कमर की कटार बाहर निकाली। बात ही-बात में उसने शम्भुराजा के सारे बन्धन काट दिये। सामने से उसने अपने कुछ साथियों को पास बुलाया। शम्भुमहाराज को ले जाने के लिए आये हुए लोगों को पच्चीस-तीस नये घोड़े दिये। शम्भुराजा की पीठ पर प्यार से हाथ थपथपाते हुए मुनासिब ने अपने साथियों से कहा, “शिवाजी पर एहसान करने के लिए नहीं, दक्खिन की हिफ़ाज़त के लिए शिवाजी का बेटा सलामत रहना चाहिए। जाऽऽ बेटेऽऽ भाग जा। निश्चिन्त होकर निकल जाऽऽ।'' शम्भुराजा ने ख़ून से लथपथ अपनी बाँहों में मुनासिब को भर लिया। सभी को अलविदा कहा। संभा किस चतुराई से भाग गया? दिलेरखान को क्या बताया जाय? यही सोचते-सोचते बीजापुरी फौज वापस लौटी। फौजी बालेखान का खून से भीगा शव कन्धे पर उठाये दफ़नाने के लिए ले जा रहे थे। साथ में घोड़े पर चल रहा मुनासिब अपने वारिस के शव को बार-बार देख रहा था। वह अपनी बूढ़ी दाढ़ी पर निरन्तर गिर रहे आँसुओं को पोंछने का प्रयास कर रहा था। 150 · सम्भाजी

जीव ही शिव

एक

कल देर रात शिवाजी महाराज की पालकी पन्हालगढ़ पर आ पहुँची थी। उस समय सिंह द्वार पर तोपें दागी गयी थीं। महाराज का स्वागत किया गया था। उसी भीड़ में सामने की ओर शम्भूमहाराज खड़े थे। शिवाजी महाराज ने उन्हें अपनी बाँहों में भर लिया। वे अपने काँपते हाथों को उनकी पीठ पर फेरने लगे। मन भर आया। उन्हें बहुत सी बातें करनी थीं। किन्तु इस भीड़ के सामने खुलकर बातें करना उचित नहीं था। शम्भूमहाराज को पन्हाना आये एक महीना बीत चुका था। वे प्रायः बाहर नहीं निकलते थे। उनके जैसा सुयोग्य युवराज मुसलमान शत्रुओं से जाकर मिल जाय, इस कल्पना से ही प्रजा को बड़ा दुख हो रहा था। यदि वे सहज रूप में घोड़े पर बाहर निकलते तो भी लोग उन्हें कुछ विचित्र दृष्टि से देखते थे। इसलिए महल के भीतर बैठे रहना ही युवराज को ठीक लगता था। कल रात तक शम्भूमहाराज के मन में भयंकर भ्रम बना हुआ था। वे भीतर ही भीतर बहुत तड़प रहे थे। तोप के सामने जाना उतना भयानक नहीं था जितना स्वराज्य द्रोह जैसा भयानक अपराध करके पिता के सामने जाना। कौन सा मुँह लेकर पिता के सामने जाएँ? किन्तु कल रात को पिता का आलिंगन शम्भू महाराज को बहुत आह्लादकारी और आश्वस्तिकारक प्रतीत हुआ। सुबह संभाजी राजा ने अपने शरीर पर से चादर हटाई। खिड़कियाँ खोल दीं। प्रभात की शीतल हवा अन्दर आकर उनके शरीर का स्पर्श करने लगी। रात समाप्त हो रही थी। मस्तिष्क के गर्भगृह में पवित्रता की घंटियाँ बज रही थीं। युवराज की स्मृति अतीत की ओर मुड़ रही थी। तेरह वर्ष पहले आगरा के वे तूफानी दिन याद आ रहे थे। मराठा साम्राज्य के शिवराय भयंकर जानलेवा संकट में फँस गये थे। उस समय शम्भूमहाराज की उम्र सिर्फ नौ वर्ष थी। उनके चेहरे की शिशुता समाप्त नहीं सम्भाजी :: 151

हुई थी। तब भी अपनी कमर में छोटी-सी तलवार सँभाले हुए दिल्ली के शाहंशाह के दरबार में उपस्थित थे। शिवाजी महाराज के लिए आगरा के उस शाही दरबार में आने की यात्रा बहुत अपमानजनक थी। मराठों के छत्रपति को साधारण पाँच हजारी मनसबदार के खूँटे से बाँधा गया था। उस अपमान से शिवाजी महाराज बहुत क्रुद्ध हुए थे। उन्होंने भरे दरबार में विरोध की फुफकार व्यक्त कर दी थी। किन्तु ऊँचे आसन पर बैठा बादशाह शान्ति से जपमाला के मनके गिन रहा था। अन्त में दरबार समाप्त हुआ। क्रोध से काँपते हुए शिवाजी महाराज रामसिंह के साथ जयपुर महल की ओर आये। भरे दरबार में दिये गये अपमान के जलते दाग से शिवाजी का शरीर अभी भी जल रहा था। उनका दम घुट रहा था। उनके क्रुद्ध चेहरे की ओर संभाजी मासूम आँखों से देखते रह गये थे। शिवाजी ने दरबार में जो विरोध प्रकट किया था, औरंगजेब के दरबारियों ने उस पर पूरा ध्यान दिया था। दरबार ने अनुमान लगा लिया था कि यह अभिमानी मराठा इतने मे ही सन्तुष्ट न होगा, वह कल्पना से परे कुछ असम्भव कदम उठाएगा। यही कारण था कि शिवाजी और संभाजी के जयपुर महल में पहुँचने के साथ ही वहाँ पर पीछे पीछे घुड़सवारों के दल और साँडिनियों के दल भी पहुँच गये। महल का घेराव कर लिया। शिवाजी महाराज ने झरोखे से देखा तो लगा कि महल के चारों ओर मानो अस्त्र-शस्त्रों का जंगल उग आया है। वह समय आपातकाल का था। महाराष्ट्र की धरती आगरा से सैकड़ों कोस की दूरी पर थी। आसपास कोई भी अपना लगा सगा नहीं था। औरंगजेब जैसा उल्टे दिमागवाला असुर सीने पर पाँव रखकर खड़ा था। पलभर को महाराज को लगा जैसे उनकी सारी शक्ति ही समाप्त हो गयी। सब कुछ समाप्त हो गया। पहरे पर लगी मशालें भयवह लगने लगी थीं। दुश्मन के घुड़सवार सैनिक महल को घेर कर ऐसे खड़े थे, जैसे भूतों के समूह ने घेरा डाल रखा हो। बड़े महाराज फूट-फूटकर रो पड़े। उनकी गोरी और लम्बी लम्बी उँगलियों से भी जैसे आँसू टपक रहे थे। इतने में ही एक छोटा सा हाथ उनके लम्बे लम्बे बालों में फिरने लगा। उस कोमल और ममता भरे हाथ के स्पर्श से महाराज का शरीर रोमांचित हो गया। उनके सामने नौ वर्ष के भोले-भाले संभाजी खड़े थे। महाराज ने उन्हें बाँहों में भर लिया। पश्चाताप में जलते हुए शिवाजी महाराज ने कहा, "कलेजा फट रहा है रे बेटाऽऽ। इस दुर्दैवी चक्रव्यूह में से मातृभूमि तक जाने का रास्ता कैसे मिलेगा मुझे और तुमको?" बालराजा कुछ नहीं बोले। उन्होंने सिर्फ महाराज का मुँह अपने गुड्डे की तरह अपने पास लेकर उससे प्यार किया। उनको थपथपाया, उनके ऊपर हाथ फेरा, उन्हें प्यार किया। उस स्थिति में भी महाराज को हँसी आ गयी। उन्होंने संभाजी से 152 :: सम्भाजी

पूछा, "वाह ! वाह ! एकदम बड़े आदमी जैसा बर्ताव करने लगा है। ये सब कहाँ से सीखा बेटेऽऽ ?" "जीजा माता के पास ! और कहाँ ?" महाराज ने निश्चय कर लिया कि चाहे जान भले ही चली जाय किन्तु औरंगजेब के अपमानजनक दरबार का मुँह वे दुबारा नहीं देखेंगे। किन्तु यह भी निश्चित था कि ऐसी अहंकारी भाषा और किसी का ऐसा गुरूर औरंगजेब कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। उसके सन्तोष के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। इस प्रकार आग्रह करते हुए रामसिंह महाराज के पास बैठे रहे। अन्त में उन दोनों ने एक उपाय ढूँढ़ निकाला। तय हुआ कि शिवाजी महाराज बीमार हो जाने का बहाना करें और उनके स्थान पर छोटे संभाजी राजा औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हों। पहले दिन जब संभाजी दरबार में जाने लगे तो शिवाजी ने स्वयं उन्हें तैयार किया। अन्त में उन्होंने उनके गोरे-गोरे मस्तक पर केसर चन्दन का टीका लगाया। संभाजी के गोल-मटोल चेहरे को देखकर महाराज का मन भर आया। उन्होंने बड़ी ममता से संभाजी के गालों पर, पीठ पर हाथ फेरा। शम्भुराजा हँस पड़े। अपने छोटे-से हाथ में महाराज के हाथ को कसने का प्रयास करते हुए संभाजी बोले, "पिताजी, आप इस तरह परेशान मत होइए। जहाँ- जहाँ भी आप उपस्थित नहीं रह सकेंगे, उस जगह को भरने का प्रयास यह शम्भू अवश्य करेगा।" सवेरे ही बड़े महाराज का सन्देश आया। उन्होंने सवेरे ही शम्भुराजा को गढ़ पर महालक्ष्मी के मन्दिर में बुलाया था। उनके आगमन के लिए महापूजा का संकल्प किया गया था। विधिवत पूजा समाप्त होते-होते बहुत समय निकल गया। अन्ततः पिता-पुत्र दोपहर को ही एकान्त में मिल पाये। बड़े महाराज ने हँसते-हँसते कहा, "शम्भुराजा ! मुसलमानों का साथ छोड़ देने पर भी आप स्वराज्य में वापस लौटेंगे इसमें मुझे शक था और इस चिन्ता ने हमें बेचैन कर दिया था। मुझे लगता था कि वहाँ आने में आप संकोच करेंगे। हो सकता था कि किसी दूसरी जगह चले जाते।" "पिताजी, बहुत दुनिया देखी। अँधेरे में रास्ता चलते-चलते अटक गये। किन्तु फिर अपने ही हाथों से अपना फटा हुआ कलेजा जोड़ लिया। सोचा, सूर्यदेव की ओर ही जाना है तो डरना क्यों?" शम्भुराजा ने कहा। "शम्भू, मैं कहता हूँ कि पहले आप कवि हैं, बाद में युवराज।" शिवाजी महाराज ने बड़े प्यार से कहा। संभाजी राजा को शिवाजी महाराज अपनी आँखों में समा लेने का प्रयास कर रहे थे। एकाएक उनकी आँखों से गालों पर मोती झर पड़े थे। भरे गले से वे दुखी सम्भाजी :: 153

स्वर में बोले, "तो शम्भूराजा आप अकेले ही वापस आये?" "क्षमा करें पिताजी!" शिवाजी महाराज के प्रश्न पूछने पर संभाजी का हृदय विदीर्ण हो गया। पिता-पुत्र दोनों ही बहुत दुखी हो गये थे। संभाजी बोले, "पिताजी, दुर्गा और राणू दीदी से मैंने साथ निकलने के लिए बहुत आग्रह किया। जी-जान लगाकर प्रार्थना की। किन्तु उन्होंने सुना ही नहीं।" "नहीं, नहीं शम्भू बेटे! उन बेटियों का सोचना ही ठीक था। उनको साथ ले आने की कोशिश में आप स्वयं वहाँ हमेशा के लिए अटक जाते। ठीक है शम्भू बेटे! आज नहीं तो कल, माँ भवानी आपके हाथ में शक्ति देंगी। तब अपने मजबूत हाथों से दोनों को छुड़ाकर ले आना बस।" अपने होनहार पुत्र पर दृष्टि डालते हुए शिवाजी महाराज ने कहा, "शम्भू बेटे कर्नाटक युद्ध पर आपको अपने साथ न ले जाकर मैंने आपके साथ बड़ा अन्याय किया। आप ऐसा ही समझते हैं न?" शम्भूमहाराज कुछ हिचकिचाए अवश्य, किन्तु चुप्पी तोड़कर बोले, "क्यों न समझँ पिताजी! मैं जब केवल नौ वर्ष का था तब भी आपने मुझे दूर रखा। पुरन्दर की सन्धि के अनुसार मिर्जाराजा जयसिंह के पास मुझे गिरवी रखा।" "शम्भू बेटे! वे सभी बातें मुझे स्मरण हैं।" शिवाजी महाराज ने कहा। "और थोड़ी याद दिलाता हूँ, पिताजी।" युवराज आगे कहने लगे, "औरंगजेब के शहजादे, तेज-तर्रार मुअज्जम को फोड़कर पिता औरंगजेब से बगावत कराने का काम आपने मुझे सौंपा था। आपने कहा था कि बगावत के लिए मैं उसे मजबूर करूँ।" उस बात को याद करके शिवाजी मन्द-मन्द मुस्कराये। शिवाजी महाराज की प्रसन्न मुद्रा को देखकर शम्भूराज ने बात को आगे बढ़ाया। "क्यों पिताजी? प्रयत्न करने पर भी मुझे उस कार्य में सफलता नहीं मिली। किन्तु केवल ग्यारह-बारह वर्ष की उस उम्र में आपने जिस युवराज पर, औरंगजेब के शहजादे को बाप से अलग करने का जोखिम भरा दायित्व सौंपा था, वही आपका पुत्र बीस वर्ष की उम्र में अपने पिता की उँगली पकड़कर मुहिम पर जाने के लिए अयोग्य कैसे हो गया?" शिवाजी महाराज का चेहरा खिन्न हो गया। उन्होंने कहा, "शम्भू! कर्नाटक की मुहिम पर साथ न ले जाने की घटना मेरे जीवन के लिए एक कड़ुआ अहसास है। आप जब छत्रपति बनेंगे तभी मेरे दर्द को ठीक-ठीक समझ पाएँगे। कभी-कभी राज्य की, समाज की भलाई के लिए अपने प्रियजनों से जानबूझकर अन्याय करना पड़ता है। क्या उतना भी अधिकार आप पर नहीं था मेरा, शम्भू बेटे?" "परन्तु रायगढ़ में तो हमें सुख से रहने दे सकते थे?" रायगढ़ का नाम सुनते ही शिवाजी महाराज चुप हो गये। एक लम्बी आह 154 सम्भाजी

भरते हुए बोले, "शम्भू बेटे! रायगढ़ अब पहले जैसा नहीं रहा। साधारण लोगों की भूख एकदम छोटी रहती है। किन्तु बड़े स्त्री-पुरुषों की प्यास बहुत बड़ी होती है, उसमें भी राज्यलिप्सा जैसी जहरीली प्यास दूसरी नहीं होती। राज्य की प्यास बुझाने के लिए कभी कभी बच्चे भी अपने बाप का गला घोंट देते हैं। माताएँ भी दुश्मन बन जाती हैं। आजकल रायगढ़ में इस तरह की राज्यलिप्सा की लम्बी जबान निकलने लगी है। ये सारी बातें सोचकर ही मैंने आपको वहाँ न रखने का निर्णय लिया था। दिलेरखान के क़ब्ज़े से शम्भुराजा के छूट जाने की महाराज को बड़ी प्रसन्नता थी। उन्होंने कहा, "आप वापस आ गये और हम भाग्यशाली हो गये। पूरे राज्य को सूर्यग्रहण लग गया था। यह तो अपने स्वराज्य का भाग्य अच्छा था, अन्यथा आपको समाप्त करने के लिए औरंगजेब ने पक्का निश्चय कर लिया था। शम्भुराजा, आपके स्वराज्य में वापस आने का समाचार मुझे जालना के रास्ते में ही मिल गया था। उस आनन्द के नशे में मैंने चार दिन में ही जालना की लड़ाई जीत ली थी। वहाँ बड़ी लूट से लदे हुए हाथी और ऊँट झुक गये थे। किन्तु- " "क्या हुआ, पिताजी ?" "यह केवल ईश्वर की कृपा है कि आज हम आपसे मिल रहे हैं।" कुछ खिन्नता और कुछ भयभीत स्वर में शिवाजी महाराज ने कहा। 'क्यों? रास्ते में आपकी तबीयत खराब हो गयी थी क्या?' शम्भुराजा ने चिन्तित होकर पूछा। "शम्भू बेटे, तबीयत की बात छोड़ो। हम जान बचाकर वापस आ गये हैं। यही क्या कम है?" जब लूट के सामान से लदे जानवरों के साथ हम अपनी सेना लेकर जालना से आ रहे थे, संगमनेर घाट के पास, जंगल के बीच में, रणमस्तखान नाम के मुगल सरदार ने औरंगाबाद से बीस हज़ार की फौज लेकर हमारा रास्ता रोक लिया। चारों ओर से हमें घेरकर संकट में डाल दिया। रायगढ़ का राजदंड हम वहाँ खो देते तो क्या होता? किन्तु ऐन मौके पर हमारे सहायक बने वहाँ के घने जंगल और अपने बहिर्जी नाइक। वह जंगल इतना घना था कि तीन दिनों तक उस जंगल में सूर्य की किरण भी हमारे पास तक नहीं पहुँच पायी।" इस प्रसंग को सुनते सुनते शम्भुमहाराज हक्का बक्का हो गये। बड़े महाराज ने आगे कहा, "कितनी भी वीरता हो, उसका क्या लाभ? दुर्भाग्य से यदि हम मुगलों के हाथ लग गये होते तो हमारी क्या इज्जत रहती ? शम्भू बेटे, मनुष्य चाहे जितना भी बहादुर हो, उसके सभी प्रयासों को भगवान का सहारा होना ही चाहिए।" बड़े महाराज बहुत प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। सम्भाजी 155

"हम फिर से मिल गये, यह जगदम्बा की महंती कृपा है। किन्तु एक बात हमेशा याद रखना कि मोह-माया में न फँसते हुए राजा को अनेक बार कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं।" शम्भुराजा ने चकित भाव से महाराज की ओर देखा। महाराज आनन्दित होकर बोले, "जिस समय मैं कर्नाटक की ओर था उस समय आपने गरीब किसानों और मजदूरों के कर में छूट देने का निर्णय लिया, उसकी मैंने पूरी पूछताछ की है। उससे प्रसन्न होकर इस बूढ़े राजा ने अपने युवराज को नहीं, प्रजा के हित में कार्य करने वाले उत्तराधिकारी को शुभाशीर्वाद देने का निश्चय किया।" शम्भुराजा शिवाजी महाराज की ओर आश्चर्य से देखने लगे। तब उनके कन्धे पर हाथ रखकर शिवाजी महाराज ने कहा, "अभी तक औरंगजेब काबुल, कन्धार जैसी अनेक लड़ाइयों में उलझा हुआ था। किन्तु शम्भू, गुप्तचरों से मिली सूचनाएँ बहुत चिन्ताजनक हैं। साल-दो-साल में औरंगजेब बड़ी फौज लेकर दक्खिन में आये बिना नहीं रहेगा। इसीलिए उसने गुजरात, बुरहानपुर और मालवा में भी डेढ़ दो लाख की नयी फौज तैयार कर ली है।" शम्भुराजा बड़े महाराज की ओर देखकर ठठाकर हँसे। गर्व से महाराज की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, "पिताजी, अब समझ में आया कि पिछले कुछ सालों से आप फिरंगियों से इतना अधिक बारूद क्यों खरीद रहे हैं?" "बेटे! मेरे सच्चे बारूद तो आप हैं। एक मिर्जाराजा जयसिंह और दूमरा दिलेरखान, ये दो ही सरदार औरंगजेब ने महाराष्ट्र में भेजे थे। उन दोनों ने ही हमारी नाक में दम करके पुरन्दर की अपमानजनक सन्धि पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश कर दिया था। हमारी पीठ पर दहशत की तलवार लगाकर आगरा जाने के लिए विवश किया था। आज तो पूरे स्वराज्य पर दस्तूरखुद औरंगजेब के आक्रमण का भय निर्मित हो गया है। यह नहीं भूलना चाहिए कि आज दुनिया के दो तीन बड़े साम्राज्यशालियों में औरंगजेब एक है। उसका सामना दक्षिण के मैदान में केवल हमारा बेटा कर सकता है। यह घोषित करने के लिए हमें किमी ऐरे गैरे ज्योतिषी की आवश्यकता नहीं है-'बेटाऽऽ, उस कराल काल से जान की बाजी लगाकर लड़! यहाँ के हर जंगल को, पशु पक्षियों को, गरीब बच्चों को, प्रजा को मुक्ति दो'।" शम्भुराजा झट से नीचे झुके। बड़े महाराज के पैर छूकर कृतज्ञभाव से बोले- "पिताजी, आपके आशीर्वाद से मैं इधर का पर्वत भी उधर कर सकता हूँ।" शिवाजी महाराज मुस्कंराते हुए बोले, "बेटा! जूझना, लड़ना मनुष्य के हाथ में होताः है किन्तु नियति सम-विषम चाल और भाग्य की आड़ी-टेढ़ी रेखाओं पर मनुष्ट का वश नहीं होता। भविष्य में आपके और औरंगजेब के युद्ध के समय मैं रहूँ 156 :• सम्भाजी

या न रहूँ, परन्तु मेरे आशीर्वाद और पुण्य कर्म आपका साथ अवश्य निभाएँगे। दो लगभग तीन वर्ष बाद महाराज अपने ज्येष्ठ पुत्र से मिल रहे थे। जिस प्रकार पानी में लाठी मारने से पानी नहीं फटता ठीक उसी प्रकार आत्मीय माया और ममता भी अटूट होती है। अनुभव और अभ्यास से दोनों का दृढ़ मत बन गया था कि पुत्र को ऐसा असाधारण पिता दूसरा नहीं मिल सकता है और वैसे किसी भाग्यवान पिता को इससे अधिक होनहार पुत्र मिलना असम्भव है। इसलिए इन दोनों की दिनचर्या और उनके वार्तालाप को एक अलग ऊँचाई मिल जाती थी। उनकी समझ में नहीं आता था कितनी बात करें और कितनी न करें? प्रातःकाल ही पिता-पुत्र की पालकियाँ किले पर घूमने के लिए निकलती थीं। वे कभी भवानी मन्दिर में रुकते थे तो कभी राज्य की राजकीय गतिविधियों का निरीक्षण करते थे। शाम के समय तो ठंडी हवा खाने के लिए किसी-न किसी तटबन्दी के ऊपर से पालकियाँ निकलती ही थीं। आज शाम को पालकियाँ तीन दरवाजे के पास आकर रुकीं। पिता-पुत्र उस भव्य दरवाजे के ऊपरी छज्जे पर बैठकर पश्चिम दिशा के प्रदेश को देख रहे थे। उस ओर दूर-दूर तक गजापुर और विशालगढ़ के जंगल फैले थे। जैसे कोई भक्त भगवान की शरण में पूर्ण समर्पित होकर, कीर्तन भजन करने लगता है, आजकल उसी प्रकार शम्भूराजा शिवाजी के भक्त हो गये थे। आपस की गलतफहमियों वाली मोम की दीवारें कब की पिघल चुकी थीं। अपने तरुण और सुयोग्य पुत्र को समझदार पिता अपनी ममता की गरमाहट से कर्तव्यपरायणता की शिक्षा दे रहा था। शिवाजी महाराज ने कहा, "आप और छोटे राजाराम दोनों सगे भाई हैं। भाइयों के बीच आपसी लड़ाई का मराठी तरीका छोड़कर आपस में राजी-खुशी से मिलजुलकर रहो। माँ भवानी आप लोगों का कल्याण करेंगी।" "पिताजी! आपके चरणों के आशीर्वाद के अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। केवल दूधभात खाकर भी मैं आपकी और हिन्दवी स्वराज्य की सेवा करता रहूँगा।" शिवाजी महाराज किसी तीव्र विचार से प्रेरित होकर कहने लगे, "बेटे! सम्भाजी :: 157

घोषित करके, ललकारकर, नंगी तलवार हाथ में लेकर सामने से आक्रमण करने वाला शत्रु ठीक रहता है किन्तु अपने पल्लू में छिपे अंगार को ठंडा करने में बड़ी कठिनाई होती है। सामने आने वाले शत्रु को हम एकबार क्षमा कर सकते हैं क्योंकि वह हमारा शत्रु ही है, पर मराठों के इन जमींदारों को हम कभी भी क्षमा नहीं करेंगे।'' "हम समझे नहीं, पिताजी?" "इतनी जल्दी नहीं समझ पाओगे। हमें तो अपने जन्मकाल से ही इन लोगों की आग झेलनी पड़ी है। ये लोग शेखियाँ बघारते हुए हमेशा कहते थे कि इनका सूर्य कुल से रिश्ता है। ये लोग अपनी देहाती कोठियों में खड़े होकर मूँछों पर हाथ फेरते थे। अपने को राजा कहते थे। किन्तु इनकी सारी पीढ़ियाँ अहमदनगर के निजामशाह, बीजापुर के आदिलशाह और दिल्ली के यवनों की सेवा में ही जीवन बिता रही थीं। गाँव के इन लोमड़ों ने अपनी कोठियों की आड़ में गरीबों की बहू- बेटियों की इज्जत लूटी। मेहनत करने वाले किसानों की फसलें लूटकर अपनी जेबें भरीं। इसीलिए गाँवों की इन गढ़ियों (कोठियों) के साथ जमींदारी को दफन करके स्वराज्य के मन्दिर को खड़ा करना आवश्यक समझा। हमने कानून बनाया कि अपने गढ़ी या व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए कोई तटबन्दी नहीं बनाएगा। मैंने हिम्मत करके पुरानी गढ़ियों को नष्ट कर दिया। उस समय ये जमींदार जितना विरोध कर सकते थे, करते रहे।'' शिवाजी महाराज ये बातें बता रहे थे और शम्भूराजा बड़ी सावधानी से एकाग्र होकर सुन रहे थे। महाराज ने आगे कहा, "अरे यह राज्या का दुष्ट पाटिल कौन था? आज आपका सगा बहनोई फलटण का महादजी निंबालकर मुगलों की फौज में किसकी गुलामी कर रहा है? जावली के मोरे जैसे गद्दार देशद्रोही दूसरी जगह कहाँ मिलेंगे? शृंगारपुर के सुर्वे हों या हमारे दामाद गणोजी शिर्के, ये शरीर से स्वराज्य में रहते हैं किन्तु मन से वे मुगलों के ही साथ हैं।" "इस प्रकार के धोखेबाज स्वजनों के बीच रहते हुए भी आपने स्वराज्य खड़ा किया। पिताजी आप धन्य हैं।" शम्भूराजा ने कृतज्ञ भावना से कहा। "क्या बताऊँ शम्भू बेटे? दुश्मन को खून में नहलाते समय मेरी तलवार तेज से चमक जाती है किन्तु सम्बन्धियों एवं घर के गद्दारों और द्रोहियों पर उठते समय वह शर्म से पानी हो जाती है। इसीलिए कहता हूँ कि इन स्वार्थी मराठों और ब्राह्मण जागीरदारों से भविष्य में भी सावधान रहना।" सूर्य विशालगढ़ की दिशा में डूब रहा था। समुद्र में जैसे तूफान आ जाय और उसमें लहरों की अनेक पहाड़ियाँ बनकर एक-दूसरे से टकराने लगें वैसी ही हलचल महाराज के भीतर मची हुई थी। वे अपने पुत्र को बहुत-सी बातें समझा रहे

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थे। "शम्भू बेटे! राज्यशासन चलाते समय गरीब-से-गरीब प्रजा पर यहाँ तक कि गाय चराने वाले बच्चे से भी श्रद्धा रखो। उन्हें शक्ति दो। मैं अपनी जिन्दगी में यदि सँभल पाया तो इन्हीं लोगों के भरोसे। इन जमींदारों को तो मैंने हमेशा बगल में कंकड़ की तरह दबाकर रखा। गाय-भैंस चराने वालों को भी मैंने सैनिक बनाया। हल चलाने वाले किसानों को भी फौजी बनाया। उनके साहसी हाथों में भाले और तलवारें दीं। उनके भीतर छिपी चिनगारी को जागृत किया। उन्हीं में कोई तानाजी कोई मुरारबाजी पैदा हुआ। ये साधारण लोग ही स्वराज्य के साथ हमेशा निष्ठावान बने रहे।" बोलते बोलते शिवाजी महाराज कुछ क्षण के लिए रुके। फिर शम्भूमहाराज का हाथ अपने हाथ में लेकर उन्होंने कहा, "एक समय था जब सिंहगढ़ का हरा झंडा माताजी की आँखों में काँटे की तरह चुभता था। उसी तरह जंजीरे के किले की सिद्दीकी वहाँ उपस्थिति मेरे हृदय को घायल करती रहती थी। जंजीरे पर भगवा झंडा फहराने के लिए हम आठ बार लड़े, बार बार जूझे। किन्तु उस जलदुर्ग ने हमें सदैव ही धोखा दिया।" "जंजीरा क्या उतना महत्त्वपूर्ण है?" "महत्त्वपूर्ण ?" शिवाजी महाराज की मुद्रा कल्पनामात्र से जवाकुसुम की भाँति अरुणाभ हँसी में बदल गयी। अपने हाथ की मुट्ठियाँ बाँधते हुए ऊर्जस्वित स्वर में बोले, "बेटे, देश-विदेश की व्यापारिक नाड़ियों को अपने पैरों के नीचे दबाकर रखने वाला जंजीरा का वह जालिम किला एक बार अपने अधिकार में ले आइये, फिर देखिए कि अपने स्वराज्य की सीमा किस प्रकार गंगा-यमुना जाकर पहुँचती है?" पहले शम्भूमहाराज ने चार वर्ष तक रायगढ़ पर स्थानीय प्रशासन का कार्य सँभाला था। उनको प्रशासन की बारीकियों, शक्तिशाली बुर्जों, भूमिगत मार्गों की पूरी जानकारी थी। इसलिए अण्णाजी दत्तो जैसे राज्य कर्मचारी चाहते थे कि शम्भूमहाराज की जगह छोटे राजाराम गद्दी पर बैठें जिससे राजाराम को राजनीति सिखाने के बहाने वे अपना हित साध सकें और सत्ता का काजू आराम से खाते रहें। इसके विपरीत प्रजावर्ग और सेना को शम्भूमहाराज ही राजा के रूप में चाहिए थे। शम्भूमहाराज स्वार्थी राजकर्मचारियों के लिए संकट बन चुके थे। दरबारियों की राय थी कि शम्भूराजा को कर्नाटक का राज्य दे दिया जाय और रायगढ़ के साथ मराठी राज्य राजाराम की झोली में डाल दिया जाय। दरबारी ऐसा इसलिए चाहते थे कि उनकी प्रतिष्ठा और उनके राज्याधिकार सुरक्षित रहें। स्वराज्य के बँटवारे की बात सामने आते ही शिवाजी महाराज ने हँसते हुए कहा, "हमारा सम्भाजी :: 159

स्वराज्य किसी जमींदार की अपनी कमाई नहीं है। यह किसी की जागीर भी नहीं है। यह असंख्य लोगों के खून-पसीने से बना एक पवित्र मन्दिर है। दक्षिण की शक्ति, युक्ति और संस्कृति के प्रतीक इस मन्दिर को कैसे बाँटा जा सकता है, शम्भू बेटे?'' शिवाजी महाराज की बात सुनकर शम्भूराजा ने कातर स्वर में कहा, "पिताजी, सत्ता की प्यास मुझे कभी नहीं थी। आप मेरे हाथों में नारियल सुपारी रखेंगे तो भी मैं उसे आपका कृपा-प्रसाद मानकर ग्रहण करूँगा। आपके चरणों की पूजा करते हुए मैं दूध-भात पर भी अपने दिन काट लूँगा।'' गजापुर और विशालगढ़ की ओर सूर्य की सुनहरी किरणें सरक रही थीं। अस्ताचलगामी सूर्य की किरणों के आलोक में शम्भूराजा की मुखमुद्रा बड़ी लुभावनी लग रही थी। उनकी पेच में लगी रत्नमाला का एक छोर लटक रहा था। शिवाजी महाराज ने अपने हाथों से उसे उठाकर पगड़ी में लगा लिया और बोले, "शम्भू ! अपना रायगढ़ का सिंहासन कभी अच्छी तरह से देखा है क्या ?'' "बहुत बार।'' शम्भूमहाराज ने हँसते हुए कहा। "शम्भूराजा ! आज जानबूझकर ये बातें मैं तुम्हारे सामने ला रहा हूँ। पिता की गद्दी युवराज को उत्तराधिकार रूप में सारी दुनिया में मिल जाती होगी। किन्तु रायगढ़ की राजगद्दी दुनिया से अलग है।'' "इसका मतलब ? पिताजी !'' "वही कह रहा हूँ, शम्भू बेटे। उत्तराधिकार के हक से रकाब में पाँव रखकर घोड़ा दौड़ाने की उतावली बिल्कुल मत करो। रायगढ़ के सिंहासन के सामने एकबार पुनः जाकर खड़े हो जाओ। खुली आँखों से उस पवित्र सिंहासन को बार बार देखो। पाँच सीढ़ियों वाले सिंहासन का अच्छी तरह से दर्शन करो। "पहली सीढ़ी को ध्यान से देखोगे तो मोर के कलाप की तरह उस पर बहुत सी आँखें बनी दिखाई देंगी। ये आँखें हैं बारह मावलों और छत्तीस नेरों के किसानों और उनके पशुओं की। यदि ध्यान से उस पहले सोपान की आहट लोगे तो कृष्णा, भीमा, गोदावरी आदि पवित्र नदियों की कलकल ध्वनि और प्रवाही गति आपको सुनाई देगी। "दूसरे सोपान पर तुम पाँव रखोगे तो सह्याद्रि पर्वत, खाई में अथवा समुद्र के तल में बनाये गये साढ़े तीन सौ गढ़ों और दुर्गों के दर्शन होंगे। इन दुर्गों के पत्थरों को यदि समीप से और ध्यान से देखोगे तो वे वीर योद्धाओं के खून से रँगे दिखाई देंगे। "तीसरे सोपान पर तुम देखोगे जीजा माता और उनके साथ मावल की असंख्य बहू-बेटियों के चित्र। इन माँ बहनों ने स्वराज्य के लिए अपना सुहाग लुटा देने में ही गौरव माना। अपने बड़े बेटे को इन्होंने स्वराज्य के लिए प्रसन्नता से 160 :: सम्भाजी

अर्पित किया। यहीं पर आपको सुनाई देगी माँ बहनों की टूटी चूड़ियों की खनक। “चौथी सीढ़ी पर तो बहुत संभाल कर पाँव रखना होगा। वहाँ आपको सन्त तुकाराम की वाणी सुनाई देगी। वहाँ आप ज्ञानेश्वर की सदाबहार विराणी सुन सकेंगे। वहाँ पर समर्थ रामदास के साथ आपको सन्तों का विशाल समूह मिलेगा। “पाँचवीं सीढ़ी पर पहुँच जाने पर आपको लगेगा ऊँची ऊँची चोटियाँ आपकी ओर बड़ी आशा, आस्था और श्रद्धा से टकटकी लगाये देख रही हैं। आधे अधूरे सपनों से बेचैन अतीत बड़ी आशा से आपकी ओर देखेगा। जो घाव अभी भरे नहीं वे आपसे दवा माँगेंगे। आपके हाथ से कुछ मांगलिक और कल्याणप्रद कार्य हो जाय, इसके लिए सूर्य की भोरहरी किरणें दुआ करेंगी। इस प्रकार मेरे सिंहपुरुष बेटे शम्भू ! अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल हिरन के बच्चों की तरह आपके कदमों में रेंगते रहेंगे। “इन पाँच सीढ़ियों का ठीक ठीक दर्शन कर लेने के बाद मेरे प्रिय बेटे, तब स्वयं से एक प्रश्न करो। इन असीम जिम्मेदारियों, अनसुलझी समस्याओं के बड़े बड़े गट्ठरों और प्रजा की पर्वताकार आशाओं आकांक्षाओं के भारी बोझ को उठाने का साहस तुम्हारे कलेजे में है या नहीं? यदि आप में यह आत्मविश्वास है तभी उस दृढ़ विश्वास से, यहाँ की मिट्टी के प्रति पूरी निष्ठा के साथ उस पवित्र सिंहासन पर सुख से बैठो। किन्तु अपनी शक्ति और साहस में थोड़ी भी शंका हो तो उस सिंहासन की हवा के लिए भी न रुको। शरीर पर अचला पहनो और संन्यासी बनकर जंगल की ओर चले जाओ।” तीन रायगढ़ पर दशहरा-दीवाली का उत्सवी वातावरण बना था। दो-ढाई वर्ष के बाद शिवाजी महाराज राजधानी में वापस आये थे। इस आनन्द के साथ महाराज ने एक और मांगलिक कार्य की घोषणा की थी। महाराज के छोटे पुत्र राजाराम अब दस वर्ष के हो गये थे। उनका विवाह निश्चित कर दिया गया था। इस समाचार से सभी में असीम उत्साह उमड़ रहा था। मोरोपन्त पेशवा ने हँसते-हँसते अपने दरबारी सहयोगियों से कहा, “महाराज राजाराम का विवाह किसके साथ निश्चित करेंगे? इसकी हम सभी को बड़ी उत्सुकता थी। किन्तु जब उन्होंने प्रताप राव की जानकी सम्भाजी :: 161

को बहू के रूप में चुन लिया तो हम सभी को अपार हर्ष हुआ।" महाराज के घर के मंगलकार्य को अपना ही मानकर सभी सरदार कार्य में लग गये थे। महाराज की निजी बैठक में अष्टप्रधानों की व्यस्तता बढ़ गयी थी। महाराज स्वयं वर के पिता होने के नाते व्यस्त थे। वे बैठक के बीच में ही उठकर अन्तःपुर में चले जाते थे। पुनः बैठक में आते थे। सेवक और परिचारक अपना कार्य शीघ्रता से कर रहे थे। यह जानकर कि महाराज अन्तःपुर में व्यस्त हैं, बालाजी आवजी ने इसका फायदा उठाते हुए धीरे से प्रश्न किया, "पन्त यह बात सच है क्या?" "किस सम्बन्ध में पूछ रहे हैं?" "यही कि पन्हाला पर येसूबाई और संभाजी को निमन्त्रण नहीं भेजा गया है?" "बालाजी! दुर्भाग्य से यह बात सच है।" मोरोपन्त ने दुखी स्वर में कहा। बालाजी आवजी को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने कहा, "ऐसा कहा जाता है कि कम-से-कम शादी और मातम में तो किसी भी सम्बन्धी को भूलना नहीं चाहिए। शम्भूमहाराज तो राजाराम के बड़े भाई हैं।" वे दोनों धीमी आवाज में बात करने का प्रयास कर रहे थे। किन्तु उनका सारा भाषण दूसरी ओर बैठे अण्णाजी दत्तो के कानों में पड़ गया। उन्होंने सिर पर बँधे रूमाल को अलग किया। अपनी सफेद दाढ़ी में उँगलियों को घुमाते हुए झूठी हँसी हँसते हुए कहा, "दूध में नमक और विवाह जैसे मंगल कार्य में अनाहूत मेहमान चाहिए ही क्यों?" बालाजी ने कहा, "अण्णाजी पन्त! तुम कुछ ज्यादती कर रहे हो। शम्भूमहाराज के प्रति तुम्हारी रग-रग में क्रोध कूट कूट कर भरा है।" "युवराज की जवानी के शौक-पर-शौक पूरा करने के लिए जिन लोगों ने अपनी बहू-बेटियाँ गँवाई हैं, अपने दुःख की यातना वही जानते हैं, बालाजी! दूर से देखने वाले उसकी कल्पना नहीं कर सकते?" बोलते-बोलते अण्णाजी का गला भर आया। बैठक का रंग उड़ गया। अण्णाजी की जहरीली वाणी से सभी लोग चुप हो गये। बड़े महाराज के भय से सभी अष्टप्रधान आपस में ऐसा व्यवहार कर रहे थे जैसे उनमें परस्पर बड़ा सौहार्द हो किन्तु वास्तव में उनके बीच बहुत तू-तू मैं-मैं होती थी। मोरोपन्त और अण्णाजी में भी सौमनस्य नहीं था। इसीलिए बड़े महाराज किसी भी लड़ाई पर दोनों को माथ नहीं भेजते थे। दोपहर का समय हो गया। बैठक ममाप्त हो गयी। पेशवा मोरोपन्त भी अन्य 162 .: सम्भाजी

लोगों के साथ बाहर निकले। उनके पीछे-पीछे प्रह्लाद निराजी भी निकले। उसी समय अण्णाजी ने निराजी का हाथ कसकर पकड़ा। "थोड़ा रुको," उन्होंने आँखों से संकेत किया। बैठक से अन्तःपुर की ओर जा रहे शिवाजी महाराज को सामने से रोक लिया। विनम्र मुद्रा में उन्होंने बड़ी व्यग्रता से कहा, "महाराज, आप थोड़ा रुक जाएँगे तो अच्छा होगा। स्वामी से हमारा एक निवेदन है।" "बोलो।" महाराज के कदम रुक गये। "रामदास जैसे युगपुरुष ने आपको इतना सम्मान ऐसे ही नहीं दिया है। जो कुछ भी महाराष्ट्र-धर्म बचा है वह केवल आपके कारण। ऐसे अपने महाराज से हम थोड़े न्याय, थोड़े न्यायोचित बर्ताव की माँग करें तो गलत तो नहीं होगा?" "पन्त ऐसा आड़ा-टेढ़ा क्यों बोल रहे हो? जो कुछ कहना है साफ-साफ बोलो।" महाराज ने कहा। "अजी अण्णाजी, महाराज जल्दी में हैं, इतना लम्बा-चौड़ा भाषण क्यों दे रहे हो?" बालाजी आवजी ने बीच में ही टोका। अण्णाजी को बालाजी की चाटुकारिता पर बहुत क्रोध आया। वे अपना एक हाथ उठाकर न्यायाधीश की मुद्रा में बोले, "मुझे इतना ही कहना है कि स्वराज्य द्रोह जैसे अपराध के लिए शिवाजी महाराज के पास तिनके जितनी भी दया नहीं होती है।" शिवाजी महाराज का चेहरा अत्यन्त भ्रमित हो गया। उस समय बालाजी को छोड़कर शेष सभी अधिकारी काँप उठे थे। लोगों को आश्चर्य था कि ऐसी साहसी धृष्टता अण्णाजी कर सकते हैं? अण्णाजी का आक्रामक रुख महाराज ने पहले ही पहचान लिया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "देखो अण्णाजी, इस प्रकार यहाँ- वहाँ ऐसे ही घोड़े दौड़ाते मत घूमो। तुम्हारी शम्भूराजा के बारे में जो शिकायत हो एक बार साफ-साफ बोल दो और मुक्त हो जाओ।" अण्णाजी अपराधी की मुद्रा में खड़े हो गये। किन्तु शीघ्र ही साहस बटोरते हुए बोले, "क्षमा करें महाराज! मैं ही नहीं धर्मशास्त्र भी यही सिखाता है कि न्याय के पलड़े में एक चरवाहे और युवराज का स्थान समान होता है।" अण्णाजी ने अपने उत्तरीय से चेहरे का पसीना पोंछा और पुनः हाथ जोड़ते हुए बोले, "प्रजा को ऐसी गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि अपने राज्य में राजद्रोह के लिए दंड के स्थान पर पुरस्कार मिलता है। अपराधी स्वतन्त्र होकर घूमते हैं।" अन्तःपुर की ओर जा रहे बड़े महाराज के कदम रुक गये। वे वापस आकर बैठक में बैठ गये। भरे दरबार में अण्णाजी दत्तो शिवाजी महाराज का विरोध कर रहे सम्भाजी :: 163

थे। महाराज ने निश्चय कर लिया कि जो कुछ होना है एक बार हो जाय। उन्होंने हँसने का अभिनय करते हुए कहा, "युवराज शम्भू यवनों से जाकर मिले कि उन्हें इस अपराध की सजा नहीं दी गयी। इसकी शिकायत लेकर मेरे पास कोई नहीं आया। किन्तु मुझे पक्का विश्वास था अण्णाजी पन्त शिकायत लेकर अवश्य आएँगे।" "हमारा इतना ही कहना है महाराज ! शम्भूराजा कास्तकारों को बहुत चाहते हैं। उनके लिए बहुत दया भाव रखते हैं। कर डुबाने वालों का कर माफ कर देते हैं।" "अण्णाजी उस सारे प्रकरण की मैंने गहराई से पूछताछ कर ली है। हमारे गुप्तचरों ने उन गरीब किसानों की सही जानकारी जब मुझे दी तो मुझे मालूम पड़ा वे किसान खाने के लिए भी मोहताज थे। यदि शम्भू ने उन्हें माफ न किया होता तो यह एक अपराध होता।" तो भी शम्भूराजा का व्यवहार अनेक बार अच्छा नहीं रहा है, महाराज।" शिवाजी महाराज चकित हो गये। उन्हें इस बात का कतई अनुमान न था कि अण्णाजी इस प्रकार का नाजुक प्रश्न भरी सभा में उठाएँगे। इन सारी बातों का मूल स्रोत अण्णाजी से जुड़ा था इसलिए इतनी स्पष्टता से बात को उठाना उचित नहीं था। इसलिए महाराज को लगा कि अब कुछ भी छुपाना ठीक नहीं हैं उन्होंने दृढ़ता से सीधे-सीधे कहा, "देखो अण्णाजी पन्त ! आप की जवान बेटी की मृत्यु जिस प्रकार दुर्घटना में हुई उसका आपको कितना गहरा दुख होगा, इसकी कल्पना हम कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में शम्भूराजा के सम्बन्ध में पूरी जानकारी लेने का काम मैंने महारानी सोयराबाई को सौंपा था। उनकी सारी पूछताछ के बाद ऐसा कोई भी सबूत नहीं मिला कि इस दुर्घटना में शम्भू दोषी हैं।" "महाराज! आपने तो मुसलमान सूबेदार की बहू को भी साड़ी-चोली दी थी।" "उसी तरह हम आपसे वादा करते हैं अण्णाजी पन्त, शम्भू के दुर्व्यवहार का आप कोई प्रमाण प्रस्तुत कीजिए। यदि वे अपराधी सिद्ध होते हैं तो हम अपने पुत्र को उचित दंड अवश्य देंगे। उन्हें कैद करेंगे।" "महाराज! हमारी गोद का क्या हुआ?" अण्णाजी पन्त पीछे हटने को तैयार नहीं थे। "देखो, उसकी फरियाद और रंगपंचमी के दिन हुई सारी गड़बड़ी की मैंने बड़ी बारीकी से जाँच-पड़ताल कर ली है। त्र्यम्बकराव और निवासराव, पिता-पुत्र को शत्रु का साथ देते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। उन दोनों ने लिंगाणा के ऊपर की कालकोठरी से रात में बाहर भागने का प्रयत्न किया। इस कोशिश में वे दोनों पहाड़ 164 . सम्भाजी

के ऊपर से कालदरी में जा गिरे और चूर-चूर हो गये। इस घटना की जानकारी आप को भी है।" दरबार में बहुत तनाव का वातावरण बन गया था। महाराज के स्वाभिमानी मन के तार को अण्णाजी पन्त ने छेड़ दिया था। अण्णाजी पन्त चाहते थे कि राजाराम के विवाह के अवसर पर या किसी अन्य निमित्त से शम्भूमहाराज रायगढ़ न आ सकें। इसीलिए उन्होंने इस प्रसंग को छेड़ा था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने महाराज के क्रोध की भी चिन्ता नहीं की। इसी समय अन्तःपुर की ओर खुलने वाले दरवाजे का पर्दा हिला। उस ओर पैर-बिछुओं के बजने की आवाज महाराज ने सुनी। यह आवाज उनकी परिचित थी। महाराज ने धमकाते हुए कहा, "महारानी जी, पर्दे के पीछे से शायद आपको हमारी सारी बातें ठीक-ठीक सुनाई नहीं पड़ेंगी। आप सीधे बाहर ही आ जाइये न?" अपनी दृष्टि पैरों की ओर झुकाए सोयराबाई बाहर आ गयीं। बैठक में आकर एक ओर बैठ गयीं। महाराज ने विवादपूर्ण दृष्टि से महारानी की ओर देखा, मानो कह रहे हों कि संभाजी का एक और प्रेमी व्यक्ति आ गया। महाराज के प्रश्नों से अण्णाजी बहुत डर गये थे, किन्तु महारानी सोयराबाई के आ जाने से उनमें कुछ साहस आ गया। अन्य सभी प्रधान भारी तनाव में आ गये थे। महाराज ने अपने क्रोध को भीतर ही पी लिया। वे संयत स्वर में बोले, "देखिए शम्भूराजा जिस प्रकार हमारे पुत्र और आत्मीय हैं उसी प्रकार आप में से बहुतों के साथ हमारी जीवनभर की मित्रता है। आपने भी स्वराज्य के निर्माण में बड़ा कष्ट उठाया है। इसे हम कभी नहीं भूल सकते।" अण्णाजी पन्त ने अपने ओंठ आधे खोले। उन्होंने महारानी सोयराबाई की आँखों में झाँका। उन्हें अपने प्रति विश्वास और सहानुभूति दिखाई पड़ी। अण्णाजी पन्त में साहस आ गया। उन्होंने कहा, "महाराज ! क्या इन बातों का हम यह अर्थ निकालें कि ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं। शम्भूराजा यवनों से जाकर मिले ही नहीं। वे वहाँ गये ही नहीं थे। श्रृंगारपुर के महल में ही बैठे थे— ?" "अण्णाजी पन्त, यह मत भूलो कि शम्भूराजा दिन दहाड़े खुल्लमखुल्ला यवनों से मिले थे। प्रश्न यह उठता है कि यवनों से मिलकर उन्होंने स्वराज्य का क्या अहित किया ? मोरोपन्त कहाँ हैं ? उन्हें बुलाइए।" "महाराज ! युवराज अल्हड़ स्वभाव के हैं। किसी को वे उपद्रवी भी लग सकते हैं। किन्तु मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ कि वे मन के बहुत साफ हैं।" अण्णाजी पन्त और सोयराबाई की जहरीली नजरों की चिन्ता किये बिना, बालाजी पन्त चिटणीस ने कहा। महाराज के आदेशानुसार एक गुप्त पत्र लेकर मोरोपन्त पेशवा दरबार में आये। सम्भाजी : 165

उन्होंने पत्र के साथ लगी चन्दन की डंडी महाराज के हाथ में पकड़ा दी। उसकी रेशमी डोरी खोलते हुए महाराज ने कहा, "यह देखो! कर्नाटक जाते समय मैंने शम्भू के आसपास गुप्तचरों को नियुक्त कर दिया था। शम्भू और दिलेरखान के बीच पत्राचार आरम्भ था। इसकी सूचना हमारे गुप्तचरों को थी। अनेक बार युवराज के पत्र को हस्तगत कर उसकी प्रतिलिपि गुप्तचर मेरे पास कर्नाटक भेजते थे। दिलेरखान को श्रृंगारपुर से भेजे गये शम्भू के पत्र की यह प्रतिलिपि देखिए। क्या लिखते हैं, हमारे बेटे इस पत्र में- " 'हमारे पिताजी मुझ पर भरोसा रखकर परदेश गये हैं। ऐसे में उन्हें धोखा देकर, आपके साथ मेलजोल रखना, हमारे धर्म को शोभा नहीं देता।' मित्रो ! आपको कुछ फर्क इसमें दिखाई देता है ? सत्ता के लिए अपने सगे भाइयों और बच्चों का बकरी की तरह सिर छाँट देने वाले कहाँ मुगलों के शहजादे और कहाँ यह पिता की अनुपस्थिति में राज्य की हानि करने से डरने वाला बहादुर राजकुमार ? यही अन्तर होता है मुगलों के शहजादों और मराठों के युवराज में।" महाराज की मुखमुद्रा बहुत व्यथित दिख रही थी। उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा, "दिलेरखान से जाकर मिलने का संभाजी का अपराध, एक प्रकार का अविवेक था। जवानी का पागल नशा था। अपने बारे में झूठी कल्पनाओं का एक दौरा था, इसमें कोई शक नहीं है। किन्तु उसी समय आपको यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यदि मराठी स्वराज्य का गला घोंटने और माता भवानी का सिर फोड़ने की गद्दार भावना से शम्भूराजा सचमुच पागल हो गया होता तो क्या होता? बताइए, बताइए! हमारी अनुपस्थिति में सीधे रायगढ़ पर आकर बगावत का नारा लगा देते तो ? यह भयानक समाचार पाने के बाद हमें घोड़ा दौड़ाते हुए यहाँ पहुँचने में कम-से-कम चार दिन लग जाते। तब तक कौन जाने कौन सी रामायण यहाँ घट चुकती?" महाराज की बात सुनकर सभी प्रधान चुप हो गये। अब दरबार में कोई भी कुछ बोल नहीं रहा था। महाराज की मुखमुद्रा, उनके भावभरे स्वर की गम्भीरता कुछ अलग ही लग रही थी। उन्होंने दुखी स्वर में कहा- "कुछ महीने पहले अपने दोनों पुत्रों संभाजी और राजाराम में राज्य का बँटवारा करने का मेरा विचार था। राज्य शिवाजी का हो या प्रभु रामचन्द्र का, राजा प्रधान होता है, शेष सभी अधिकारी और जनता मिट्टी के पुतले होते हैं। इसीलिए असंख्य बीमारियों ने सभी को ग्रस रखा है। आज स्वराज्य की पालकी उठाने के बदले लोग अपने-अपने स्वार्थों की टोकरियाँ ढोने में लगे हैं। परस्पर द्वेष और भेदभाव इतना बढ़ गया है कि किसी समय तोरणा किले पर किये गये मेरे मन्त्रघोष का एक भी स्वर आज बचा नहीं है। यहाँ हमारे अष्टप्रधानों में भी झगड़े हैं। एक 166 . सम्भाजी

ओर ब्राह्मणों का दल है तो दूसरी ओर चाँदसेनी कायस्थ प्रभुओं का। यहाँ दरबार में अण्णाजी दत्तो पन्त और बालाजी आवजी का सुर नहीं मिलता। ऊँच नीच के भेदभाव से मराठा जाति हमेशा के लिए पंगु हो गयी है। ऐसे अविश्वासपूर्ण दूषित वातावरण में स्वराज्य का बँटवारा करना यानी संकट के कीचड़ में और गहरे धँसना है। भविष्य में जो कुछ होगा उसका निर्णय समय स्वयं करेगा।" बड़े महाराज खड़े हो गये। प्रधानमंडल ने भी जाने की तैयारी की। उसी समय बड़े महाराज कुछ रुके। सभी की ओर देखते हुए अत्यन्त कातर स्वर में बोले— "शम्भुराजा के जन्म के समय हम प्रतापगढ़ की लड़ाई में व्यस्त थे। जिस समय शम्भुराजा का जन्म हुआ पुरन्दर के किले पर घनघोर वर्षा हो रही थी। वह छोटा सा कोमल मांस का गोला सईबाई ने मुझे और जीजा माता को सौंप दिया। अपने इस नवजात शिशु को छोड़कर बीमारी से जर्जर उसकी माँ भगवान को प्यारी हो गयी। शम्भू को जब मैंने अपने सीने से लगाया तो उसने मेरी उँगली जोर से पकड़ रखी थी। तब से अब तक मैंने और मेरे राजसी वस्त्रों के भीतर छिपे उसके पिता ने उसे बहुत समीप से जाँचा परखा है। रानी साहिब सोयराबाई, अण्णाजी पन्त! आपको हमारे शम्भुराजा क्रोधी स्वभाव के लग सकते हैं। किसी को उद्द्यत भी लग सकते हैं। किन्तु उस बात को भी हमेशा स्मरण रखें जिसकी याद मुझे जीजा माता दिलाती रहती थीं, वे कहती थीं, "शिवा! शम्भू के बाहर से दिखने वाले अनगढ़ और उद्यत स्वभाव पर कभी मत जाओ। वह खरे सोने की मुहर है। भविष्य में तुम्हारे हिन्दवी स्वराज्य पर कोई आपदा आएगी तो यही तुम्हारा पागल बेटा अपने प्राणों की बाजी लगा देगा किन्तु अपने सम्मान पर आँच नहीं आने देगा। इस बात को गाँठ बाँध लो।" चार भोगावती की घाटी और सुदूर विशालगढ़ की पगडंडियों से बादल उठते थे। म्हसाई के विस्तृत पठार से तैरते हुए आगे आते थे। उधर से आने वाले मेघों के आकार इतने चौड़े टेढ़े-मेढ़े और बिखरे हुए होते थे कि लगता था जैसे जटायु जैसा कोई विशाल पक्षी आकाश में उड़ानें भर रहा हो। कभी कभी फटे पंखों-सी मेघ- छायाएँ अशुभ के बीज बोती आती थीं और दैत्यों की भाँति आती थीं और भागते हुए सम्भाजी · 167