छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
आप जारज सन्तान हैं फिर भी आपके शरीर में भोसलों का रक्त है। आपकी स्थिति विदुर की है।'' इसी तरह के अनेक ताने देकर सोमनाथ ने हिरोजी के मन में विषारोपण कर दिया था। अपने वंशजों का जारज की सन्तान कहा जाएगा और मुझे स्वयं में भी राजगद्दी मिलने की आशा नहीं है। ऐसे विचारों के कारण हिरोजी के मन में शम्भूराजा के प्रति कटुता और तिरस्कार की भावना निर्मित हो गयी थी। "एक बार फैसला हो जाना चाहिए-" ऐसा कहकर हिरोजी क्रोधावेश में आ गये। उन्होंने अण्णाजी से कहा, "स्वयं राजगद्दी प्राप्त करने के लिए जो पिता की मृत्यु की कामना करता है। गद्दी के लिए जो कलशाभिषेक जैसा राक्षसी अनुष्ठान करता है, ऐसे शम्भूराजा से न्याय और नीति की अपेक्षा क्यों की जाये? अण्णाजी आप बिलकुल चिन्ता न करें। मैं आपके पीछे खड़ा हूँ।" "वाह हिरोजी लाख रुपये की बात कही। अण्णाजी विजयी मुद्रा में चारों ओर देखने लगे। अचानक कुछ स्मरण करके अण्णाजी दत्तो ने हिरोजी से पूछा- "अरे फर्जन्द जी, उस शहजादे के स्वागत के लिए सम्भाजी ने आपको भेजा था। पानी के साथ लकड़ी भी सड़ जाती है। इतने दिनों के साहचर्य में आपको कम से कम शहजादे को तो अपनी ओर कर लेना था। फर्जन्द ने खिलखिलाकर हँसते हुए कहा, "उसकी बात छोड़िए। उसको तो मैंने इतना प्रसन्न कर लिया है कि चुटकी बजाते ही वह पाली मे दौड़कर रायगढ़ आ जाएगा, हमारे लिए।" फर्जन्द की इस बात मे अण्णाजी गम्भीर हो गये। उनकी आँखों में प्रतिशोध का भाव झलकने लगा। उनके चहरे का रंग बदल गया। अपने कान की बाली को खींचते हुए उन्होंने प्रश्न किया- "हिरोजी क्या तुम विश्वास के साथ कह सकते हो कि शहजादा हमारी बात सुनेगा? "बिलकुल, चिन्ता क्यों करते हैं? आप बस निर्णय लीजिए, वह भी जल्दी से।" हिरोजी की बात सुनकर अण्णाजी भाव विह्वल हो गये। उन्होंने अपने दाँतों और ओठों को चबाते हुए कहा, "हिरोजी आपकी बात बिलकुल सच है। शहजादा अगर हाँ कहता है तो अब हम क्यों रुकें? जिसने हमारी जीवन भर की कमाई छीन ली, हमेशा हमें भ्रष्ट और चोर सिद्ध करने की कोशिश की, अपनी रानी को हीरे- जवाहरात के साज-शृंगार के बदले हमारे हिसाब में ताक झाँक करने के लिए बिठा दिया, दान-धर्म छोड़कर एक स्त्री को हमारे सिर पर बिठाकर हमें अपमानित किया, हमारी बेटी की इज्जत लूटी, हमें कैदी बनाकर पन्हाला से रायगढ़ तक हमारी छीछालेदर की। ऐसे घमंडी हृदयहीन, अविचारी, अन्यायी युवराज को भगाने का अवसर आ रहा है और उसके लिए अकबर भगवान का दूत बनकर यहाँ आया है तो हम कहते हैं कि ऐसा सुनहग अवसर हम क्यों छोड़ें?" 278 · सम्भाजी
केवल उस कल्पना से ही अण्णाजी को बड़ी राहत मिल रही थी। "परन्तु अण्णाजी यह सब होगा कैसे ?" हिरोजी आगे सरक आये। पन्त के कान के पास जाकर बोले, "फिर से पहले जैसा खेल खेलेंगे। सम्भाजी को जेल भेजेंगे और उस बच्चे राजाराम को गद्दी पर बिठायेंगे।" सारी बात अच्छी तरह निश्चित हो गयी। आखिर शहजादा अकबर कोई ऐरा-गैरा आदमी था। वह बादशाह का बेटा था। आज नहीं तो कल वह दिल्ली की गद्दी पर बैठेगा ही। उसकी सहायता से सम्भाजी को हटाने का निर्णय लिया गया। बात चीत के दौरान अण्णाजी का चेहरा क्रोध से तमतमा गया। उन्होंने कहा- "अब स्वराज्य में देवताओं और ब्राह्मणों के दिन नहीं रहे। इन शाक्तपन्थियों ने यहाँ का सारा वातावरण भ्रष्ट कर दिया है। मदिरापान, मांसभक्षण। छी. छी. जितना कहा जाये कम ही होगा। वह शम्भूराजा का मित्र है इसलिए हम उसे कितना सहें ? उसके लिए यहाँ रायगढ़ में नये महल की व्यवस्था, वहाँ गोवा के पास डिचोली में अपने साथ साथ इस लफंगे के लिए फिरंगियों से नया महल खरीद लिया। और अब उस मलकापुर में अपने साथ ही उसका महल बनना शुरू है। अरे मैं कहता हूँ, कौन है यह टिक्कोजी राव ? न अपनी जाति का न धर्म का ? फर्जन्द गणेश की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, इस अमंगलमय वातावरण में हमारी जीने तक की इच्छा नहीं होती।" हिरोजी ने अण्णाजी को स्मरण दिलाते हुए कहा, "जितना भी सत्यानाश होना है एक बार हो जाने दीजिए। परन्तु पिछली बार की तरह हमें राजद्रोही ठहराने की नौबत न आए।" फर्जन्द की बात पर अण्णाजी बहुत क्रुद्ध हुए। वे गर्म सीसे की तरह तड़कते हुए बोले, "राजद्रोह शब्द का अर्थ कौन और किस तरह सिखाएगा ? यह सम्भाजी जो दिलेर खान के पास भाग गया था और जिसने शिवाजी जैसे पिता की आँख से आँसू गिराये-वह कुलकलंक ?" रात बीतती जा रही थी। बाहर तेज हवा चल रही थी। चिरागों में दो-दो बार तेल डाला गया। फिर भी बात समाप्त नहीं हो रही थी। ईश्वर को साक्षी मानकर सौगन्धें ली गयीं। बीच में किसी ने सोयराबाई के अपने पक्ष में आने के प्रति आशंका व्यक्त की। इस पर अण्णाजी ने धोती फटकारते हुए कहा, "यूँ ही किसी स्त्री को राजमाता का पद मिल रहा हो तो उसे बुरा लगेगा ? और सोयराबाई के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है ?" कुएँ के तल से निकलती हुई सी राहुजी सोमनाथ की आवाज आयी- "लेकिन बालोबा चिटणीस का क्या है ?" इस नये प्रश्न से अण्णाजी का खिला हुआ चेहरा एकदम उदास हो गया। सभी लोग घबराये हुए एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। सम्भाजी : 279
सोमाजी दत्तो ने कहा, "वह बालाजी चिटणीस सम्भाजी का पक्का पक्षधर है। परन्तु इस नयी योजना में यश प्राप्ति की सम्भावना है तो चिटणीस को अपने पक्ष में किये बिना कोई उपाय नहीं है।" राजा के सेनापति की अनुपस्थिति में युद्ध करने का निर्णय पक्का किया गया था। किन्तु चिटणीस का बीच में आना धोखादायक था। हिरोजी ने कहा, "मेरी सुनिए, यह चिटणीस मर जाएगा लेकिन हमारे साथ नहीं आएगा। "उसकी जाति कौन-सी है? आप लोगों को पता है?" फर्जन्द ने प्रश्न किया। "यहाँ जाति का क्या सम्बन्ध है?" "अरे, वही तो महत्त्वपूर्ण है। शिवाजी के जमाने से प्रत्येक किले के अधिकारी का पद 'प्रभु' लोगों को ही मिलता रहा है। वे सभी बालाजी का बड़ा सम्मान करते हैं। बालाजी को हाथ लगाया तो किले के प्रभु लोग आपके पीछे पड़ जाएँगे। इसीलिए मैं कहता हूँ कि थोड़ी शान्ति से काम लीजिए। थोड़े प्रेम से, थोड़ी मिठास से उस चिटणीस को अपने क़ब्ज़े में कीजिए।" फर्जन्द की वह सलाह सुनकर अण्णाजी होश में आये। वे प्रसन्न होकर बोले, "हिरोजी सच कह रहे हो। कुछ भी करके बालाजी को हमें अपनी ओर करना है। उसी के हस्ताक्षर से शहजादा अकबर को पत्र लिखेंगे। सभी मिलकर औरंगजेब के बेटे के पास जाएँगे और उसके पैरों पर नाक रगड़कर कहेंगे- 'बाबा रे एक बार हामी भर दो। परन्तु जब राज्यक्रान्ति सफल हो जाएगी, तब हम सबके भाग्य खुलेंगे।" बोलते-बोलते अण्णाजी की आँखें भर आयीं। दस पुण्य मनुष्य को एक बार आलसी बना सकता है किन्तु पाप उसे किसी भी समय सोने नहीं देता। आधी रात बीते एक घंटा हो चुका था, किन्तु राज्य कर्मचारियों की आँखों में नींद का नाम नहीं था। वे साहस करके उठे और साहस करके पीछे की ओर चिटणीस के घर की ओर चले गये, दूर कहीं पर एक कुत्ता रो रहा था। आकाश में बादल छाये थे। इसलिए एक भी तारा दिखाई नहीं पड़ रहा था। रक्षकों 280 : सम्भाजी
के जोर से आवाज देने पर बालाजी चिटणीस चौंककर उठे। आँख मलते-मलते बाहर के दरवाजे तक आए। आँखों पर जोर देकर बालाजी पन्त ने अविश्वासपूर्वक सामने देखा। चिराग के उजाले में कारभारियों का चेहरा साफ नजर आ रहा था। वे सभी तुलसी वृन्दावन के पास ऐसे खड़े थे जैसे उनके पैर काँटों पर हों। चिटणीस की ओर देखकर अण्णाजी पन्त ने सूचित किया कि सोयराबाई ने उन्हें तत्काल बुलाया है। चिटणीस ने जल्दी-जल्दी जूते पहने। उन्होंने सोचा पन्हालगढ़ से राजा का कोई सन्देशा आया होगा। कोई-न-कोई आवश्यक कार्य अवश्य होगा। अन्यथा ये प्रधान लोग आधी रात को क्यों आते? चिटणिस ने कपड़े पहने। इसी बीच सोये हुए आवजी को भी अण्णाजी ने जगा लिया था। उन पिता-पुत्र को साथ लेकर सभी लोग शीघ्रता से महल के बाहर निकले। इन अधिकारी कर्मचारियों को इतनी रात गये दरवाजे पर देखकर पहरेदार डर गये। उनकी किसी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये बिना अण्णाजी ने उन्हें डाँटा— "ऐसे क्यों देख रहे हो? जाकर रानी साहब को उठाओ। उनसे कहो कि आपके आदेशानुसार सभी लोग आये हैं। सोयराबाई थोड़ी ही देर में बाहर आ गयीं। चिराग के प्रकाश मे उन्होने कर्मचारियों को देखा, बालाजी आवजी को भी ध्यान से देखा। दृश्य अविश्वसनीय था पर सच था। अण्णाजी दत्तो के चेहरे पर विजय का उन्माद छिप नहीं पा रहा था। सोयराबाई ने इस समझा। जब सभी पहरेदार और परिचारक बाहर चले गये तब उन्होंने दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया। मुँह का पसीना आँचल से पोंछते हुए बैठ गयीं। सोयराबाई ने एक बार पुनः सभी की ओर ध्यान से देखा और शीघ्रता से पूछा, "पन्त, इस बार तो आप सब एक मत होकर आये हैं न?" "महारानी, आप अब रायगढ़ की राजमाता होने वाली हैं। इस तरह डरने से कैसे चलेगा?" अण्णाजी ने शिकायत करना आरम्भ किया—"क्या कहें रानी साहब शिवाजी महाराज जैसे प्रतापी राजा के साथ हमने काम किया है। पर आजकल यहाँ राजधानी में इतनी गड़बड़ी मची हुई है कि क्या कहें? बहुत सह लिया। बहुत हो चुका। इसीलिए आपसे प्रार्थना है कि इस राज्य को आप बचा लें। राजाराम साहब को फिर से गद्दी पर बिठाएँ।" "पन्त जरा धीरे बोलिए।" "जाने दीजिए, हम किसी से डरते नहीं। जो भी होना है हो जाये।" अण्णाजी बहुत आवेश में आ गये थे। आँखों के सामने यह सब घटित होते देखकर बालाजी चिटणीस का सारा शरीर पानी-पानी हो गया। आवजी भी घबराकर अपने पिता की ओर टकटकी सम्भाजी :: 281
लगाकर देखने लगे। उनकी अवस्था ऐसी हो गयी थी जैसे पंछी शिकारी के हाथ आ गया हो। शेष सभी का विचार दृढ़ था। अण्णाजी के इस प्रस्ताव से सोयराबाई प्रसन्न थीं। कुछ विमुग्ध भी हो गयीं थीं। उनका कंठावरोध हो गया था। उन्होंने कहा, "आज हृदय को शान्ति मिली। क्या कहूँ? मुझे एक सामान्य गुलाम की तरह जीना पड़ रहा है। मुझे जीजामाता जैसी कठोर स्वभाव की सास मिली थीं। लेकिन उन्होंने भी कभी मुझे नीचा नहीं दिखाया। कल की छोरी इस येसूबाई के ठाट तो देखो। 'श्री सखी रानी जयन्ती ऐसी मुहर बनवायी हैं।' बुजुर्गों पर हुक्म चलाती हैं निस पर हमारे ये शम्भूराजा स्वयं को बाघ का बच्चा कहलाते हैं और बर्ताव स्त्री की तरह करते हैं। नहीं-नहीं इस जीने से तो मर जाना ही अच्छा है। मेरे सगे भाई हंबीरराव भी शत्रु से मिले हैं। अपनी तकदीर को हम क्या कहें?" सोयराबाई की यह अवस्था अण्णाजी से देखी न गयी। वे हाथ जोड़कर बोले, "रानी साहब यहाँ का अत्याचर अब सहा नहीं जाता। यहाँ शिवाजी महाराज की दुर्दशा हो जाये और वहाँ निरंकुश अविवेकी राजा अपना हुक्म चलाकर राज्य को नष्ट कर दे। वहाँ कन्नौज का एक नालायक मान्त्रिक 'कलाश' कुछ मन्त्र फूँके और मन्त्रों के बल पर सारे दरबार पर जादू-टोना करता रहे। यह अब सहा नहीं जाता।" "आपको क्या करना है, पन्त?" उत्तर मालूम होने पर भी सोयराबाई ने प्रश्न किया। "रानी साहिबा, अभी समय बीता नहीं है। अभी भी हम हारी हुई लड़ाई को फिर से जीत सकते हैं।" अण्णाजी ने कहा। "किसकी सहायता से?" "शहजादा अकबर नाम का एक बड़ा जादूगर आया है न, अपने राज्य में। वह किसी सामान्य जमींदार का बेटा नहीं है। वह पृथ्वीपति औरंगजेब का बेटा है। यह अच्छा अवसर है। सम्भाजी वहाँ दूर पन्हालगढ़ पर अपने कामकाज में अटके हैं। तब तक हम अपना काम निपटा लेंगे।" अण्णाजी ने स्पष्ट किया। "भगवान अपने पीछे खड़े हैं। किन्तु पिछली बार की तरह इस बार नहीं होना चाहिए। इस कान की खबर उस कान को नहीं होनी चाहिए।" "महारानी आप चिन्ता न करें। ग्रह अच्छे हैं।" अण्णाजी ने कहा, "देखिए न इस बालाजी का विचार भी अपने जैसा ही है। ये अपने पुत्र को भी साथ लेकर आये हैं।" सोयराबाई ने एक बार पुनः अविश्वास की दृष्टि से देखा। उन्होंने पूछा- "क्यों चिटणीस जी, बहुत देर से आप कुछ बोल नहीं रहे हैं?" जैसे किसी भेड़िये की दृष्टि खरगोशों के झुंड पर पड़ जाये और खरगोशों के प्राण उनकी आँखों में उतर आयें और वे कातर दृष्टि से देखने लगें वही स्थिति पिता-पुत्र की हुई। सभी की नजरें उन्हें चीरने लगीं। उनके गले सूख गये। 282 :. सम्भाजी
चिटणीस घबराकर बोले— "आपकी आज्ञा सिर आँखों पर, रानी साहब।" "देख लीजिए चिटणीस। आप और शम्भुराजा में बहुत मेल है। आपके बच्चे उन्हीं के महल में पड़े रहते हैं। वह येसू आपके खंडो और निलो को अपने पुत्र की तरह मानती हैं।" "पर रानी साहब पहले का समय अब नहीं रहा।" राहुजी सोमनाथ बीच में ही बोल पडे— "वह कैसे?" "महाड का वह हरामजादा दादजी रघुनाथ देशपांडे पन्हाला में जाकर बैठा है। उसे शम्भुराजा से चिटणीस पद चाहिए।" "क्या करते हो? बालाजी को निकालकर?" सोयराबाई ने कहा। "जी हाँ। दादजी कलश का मित्र है।" राहुजी ने कहा। पहले तो पिता पुत्र लोगों की गहरी नजर से दब गये थे। उसमें अब एक और जानकारी मिल रही थी। इस प्रकार बहाना करके उन्होने अपना पक्ष रख दिया। परन्तु सोयराबाई को उन पर भरोसा नहीं था। बालाजी ने पुनः कहा, "पन्हाला मे महाराज को कैद करने का पत्र हमारे आवजी ने लिखा था। तभी से हम उनके कोप भाजन बन गये। आपकी सूचना सही हमारा यह चिटणीस पद कितने दिन टिकेगा? भगवान ही जाने।" बालाजी चिटणीस आँखे फाडकर देखने लगे। उन्होंने लम्बी साँस लेकर कहा, "शम्भुराजा के साथ हमारी मैत्री हमारा भूतकाल है। पर आजकल राजा का बर्ताव कुछ ठीक नहीं है। उनकी अपेक्षा हमारे रायराम साहब ही क्या बुरे हैं?" सोयराबाई और अण्णाजी दत्तों के साथ सभी लोग चिटणीस की ओर प्रसन्नता से देखा। ग्यारह पन्हालगढ़ की हवा बडी आनन्ददायक थी किन्तु उतनी ही भयानक भी। सवेरे सवेरे कवि कलश ने शम्भूराजा का अभिवादन किया। राजा ने मुड़कर कवि कलश की ओर देखा। उनकी मुद्रा बहुत डरावनी लग रही थी। उनके चेहरे पर स्पष्ट दिख रही थी कि कोई न कोई भयानक घटना अवश्य घटी है। सम्भाजी 283
कवि कलश को अधिक प्रतीक्षा न करवाकर सम्भाजी ने सीधा प्रश्न किया— "कविराज, यदि कोई सामान्य कर्मचारी या लेखक राजद्रोह का अपराध करे तो धर्मशास्त्र के अनुसार उसे क्या दंड मिलना चाहिए?" "राजन, ऐसे गुनाह के लिए देहान्त प्रायश्चित के अतिरिक्त दूसरा कोई दंड धर्मशास्त्र में नहीं है।" "और यदि यह अपराध किसी प्रधान या मन्त्री ने किया हो तो?" राजा ने कविराज की ओर घूरते हुए देखा। शम्भुराजा के दूसरे प्रश्न से कविराज एकदम चौंक गये। धर्मशास्त्र के जटिल नियमों को बताते हुए उन्होंने कहा— "कोई गरीब सेवक थोड़े से लोभ के कारण दुर्भाग्यवश ऐसे अपराध में फँस सकता है। राजा के विवेक के कारण ऐसा व्यक्ति दया का पात्र भी हो सकता है। किन्तु शत्रु के साथ मैत्री करने वाला व्यक्ति बहुत घातक होता है। शत्रु से हाथ मिलाने वाला व्यक्ति प्रधानमन्त्री या उनके स्तर का अधिकारी हो तो यह भयानक दायित्वहीनता होती है। ऐसे व्यक्ति की यदि राजा ने कठोर से कठोर दंड न दिया तो राजा और खेत में खड़े किए गये बिजूका में कोई अन्तर ही नहीं रहेगा।" अपने द्वारा दिये गये उत्तर से कविराज स्वयं चौंक गये। किन्तु शम्भुराजा उनसे नाराज नहीं हुए। उन्हें झेंप आ रही थी। वे दुविधा में पड़ गये कि अगला प्रश्न पूछें या न पूछें? फिर भी उन्होंने पूछा— "मान लीजिए बाल-बच्चों का विचार करके किसी प्रधान को इस प्रकार के अपराध के लिए एक बार क्षमा कर दिया, फिर भी उसी प्रधान ने इसी प्रकार के अपराध की पुनरावृत्ति की तो?" "तो- ? राजा यदि इस प्रकार रोज क्षमादान की मिठाई बाँटता रहेगा तो उस राजा को राज्य का कार्य भार छोड़कर पशुओं को सँभालना अधिक अच्छा होगा।" राजा से बात करते-करते कविराज सावधान हुए। पीछे शीशे के खम्भे के समीप एक ऊँचे कद का गजपूत खड़ा था। उसकी छँटी हुई दाढ़ी और महीन जालीदार कुर्ता-उसके व्यक्तित्व को अलग गरिमा प्रदान कर रहे थे। कविराज से उसका परिचय कराते हुए शम्भुराजा ने कहा— "यह गौरव सिंह हैं।" "कहाँ से आये?" "पाली के जंगल से। शहजादा अकबर और दुर्गादास राठौड़ ने विशेष रूप से इन्हें यहाँ भेजा है।" कविकलग्र आगे के आदेश की प्रतीक्षा में खड़े रहे। उसी समय शम्भुराजा ने ग्लानिग्रस्त स्वर में कहा— 284 :: सम्भाजी
"कविराज, बहुत-बहुत विपरीत घट चुका है। एक बार नहीं अनेक बार ऐसा हो चुका है।" "स्वामी के भोजन के साथ मछली में विष मिलाने की वह घटना?" "हाँ कविराज ! छोटे बच्चे सचमुच ईश्वर के स्वरूप होते हैं। उन्हें न स्वार्थ होता है न किसी चीज की इच्छा। विष डाले हुए उस मछली के टुकड़े का मैं जैसे मुँह के पास ले गया वैसे ही रसोईघर में एक छोटी-सी बच्ची बड़े जोर से चीखी। उस पर किसी का गहरा दबाव था। उसने स्पष्ट रूप से कुछ कहा नहीं। किन्तु उसकी घबराहट और हड़बड़ी से मुझे जो समझना था मैं समझ गया। मैंने मछली के टुकड़े कुत्ते के सामने फेंक दिये। कुछ ही क्षणों में वह बेचारा कुत्ता तड़पते हुए मर गया।" "मेरे विचार से विष का षड्यन्त्र रचने वाले सामान्य सैनिक ही रहे होंगे ?" कविराज ने कहा। "सामान्य आदमी का लोभ होता कितना है, कविराज ? राजा की मृत्यु मे उन्हें क्या लेना देना?" शम्भूराजा ने मुस्कराते हुए कहा। "मतलब यह राज्य के अधिकारियों का ही षड्यन्त्र था?" "बिल्कुल, यह घटना यहाँ पन्हाला पर घटी किन्तु इसके सूत्रधार रायगढ के ही थे। कविराज इस सारी घटना का स्मरण करके मेरा मन एक अन्य कारण से सन्तप्त होता है। हमने मनुष्य जाति की बेईमानी को सिद्ध करने के लिए अपने वफादार कुत्ते की जान ले ली, कविराज।" शम्भूराजा ने अकबर द्वारा भेजा गया पत्र कविराज को दिया। कविराज की आँखें उस पत्र के अक्षरों पर घूमने लगीं। कविराज ने पास रखी सुराही से पानी पिया। पत्र का विषय ही पसीना छुड़ाने वाला था। उस पर महारानी सोयराबाई, हिरोजी फर्जन्द, बालाजी, आवजी चिटणीस और अण्णाजी दत्तो के हस्ताक्षर थे। कवि कलश बार बार पत्र को आँख फाड़ फाड़कर देख रहे थे। बादशाह ए हिन्दुस्तान अकबर साहेब। आपकी कीर्ति बहुत सुनी है। उससे हम कृतार्थ हो गये हैं। हमारे हिरोजी फर्जन्द बाबा से पेड़से में आपकी भेंट हो चुकी है। उस समय मशारनिल्हे ने आपसे हमारी बात का संकेत किया था। किसी समय हम शिवाजी महाराज के वफादार सेवक थे। आज हम चींटी जैसी जिन्दगी जी रहे हैं। सूरज की गोद में जिस तरह शनिश्चर उसी तरह शिवाजी की गोद में संभाजी। इस उद्दंड, तामसी, बदमिजाज व्यक्ति ने हमारे जैसे एकनिष्ठ सेवकों के प्राण संकट में डाल दिये हैं। हमारे अनुभवहीन राजा की छाया में कन्नौज का वह पापी कलश यहाँ रहता है। उस शाक्त मूर्ख मान्त्रिक ने हम सभी को नरक के द्वार पर धकेल दिया है। यदि आप मन सम्भाजी :: 285
से चाहेंगे तो इन दोनों को अवश्य नष्ट कर देंगे। इस समय तो आप इस दुष्ट राजा को जीवित पकड़ें या उसकी हत्या करें, पर हमें मुक्ति दिलाएँ। उसके बदले में हम अपना आधा राज्य आपके कदमों में सौंपने को तैयार हैं। अन्त में हम यही चाहते हैं कि बालक राजाराम, महारानी सोयराबाई और हम कर्मचारियों को अपनी जगह तथा गरीब ब्राह्मणों एवं नेक मराठों को अपनी पूर्व सम्पदा के साथ उनका वतन वापस मिल जाये। हे दिल्लीपति! कुछ भी करके हमारे इस संकटकाल में दौड़कर आइए। सम्भाजी की कैद से हमें बचाइए। बाकी देन-लेन की बात बाद में मिलने पर निश्चित करेंगे। कवि कलश ने एक साँस में उस पत्र को दो बार पढ़ लिया और आगे के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। राजा ने कहा— "उस शहजादे को सुबुद्धि आयी तभी तो यह गुप्त पत्र हमारे पास तक आ सका।" "ये षड्यन्त्रकारी हैं कहाँ? कहीं भाग तो नहीं गये?'' कविराज ने चिन्ता प्रकट की। "नहीं, नहीं, शहजादे ने उनसे मीठी मीठी बातें करके उन्हें सुधागढ़ के महल में रोक रखा है।" "और सोयराबाई कहाँ है? महारानी?" "वे रायगढ़ पर ही रुकी हैं। यदि यह योजना असफल हो गयी तो अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए कहेंगी इसमें उनका कोई हाथ नहीं है।" शम्भूराजा के सिर में पीड़ा उठ गयी थी। राज्य में ऐसी कोई घटना नहीं घटी थी कि कर्मचारी इस प्रकार प्राण के भूखे हो जाएँ, इतनी भयंकर योजना बनाएँ। पिछले वर्ष सम्भाजी ने राज्य का कार्यभार बहुत अच्छी तरह सँभाला था। कर्मचारियों के अपराधों को क्षमा करके उन्हें उनके पद वापस दे दिये थे। क्रोध से अपनी मुट्ठी बगल के खम्भे पर मारते हुए शम्भूराजा ने कहा— "कविराज देखिए! आँखें फाड़कर देखिए। हस्ताक्षर पहचाना? बताइए! इस पत्र पर किसके हस्ताक्षर हैं?" "चिटणीस का हस्ताक्षर है।" कविराज का हाथ काँप गया। "देखा कविराज यह योजना कितनी बड़ी है? चिटणीस जैसा बुद्धिमान और हमारा परमप्रिय व्यक्ति भी इस भयंकर योजना में सम्मिलित है। इसका क्या मतलब? यह हवा का झोंका नहीं तूफान है। इसे समय पर नियन्त्रित नहीं किया गया तो हम स्वयं पत्तों की तरह उड़ जाएँगे, कविराज!" "अब पन्हालगढ़ पर अधिक समय रुकना व्यर्थ है। उसी रात को वहाँ से निकलना निश्चित किया गया। लम्बी दौड़ लगाकर संभाजी और कवि कलश 286 :: सम्भाजी
सुधागढ़ की दूसरी ओर पहुँचे। दो दिन की यात्रा करके उनके घोड़े घोडसे के क्षेत्र में पहुँच गये। वह भाद्रपद पूर्णिमा से पहले का दिन था। आसमान में तारे जगमगा रहे थे। हल्की हवा में सागौन पत्तों से संगीत मुखर हो रहा था। शम्भूराजा की दृष्टि सुधागढ़ की ओर गयी। वहीं पर राजद्रोहियों को रोका गया था, ऐसा उन्हें बताया गया था। घोडसा में अन्दर की ओर एक बड़े घर में शहजादा अकबर ठहरा हुआ था। शम्भूराजा घोड़े पर से कूद गये। उसी समय एक चिराग की रोशनी के साथ शहजादा और दुर्गादास राठौड़ शम्भूराजा के सामने आ गये। दोनों राजा से गले मिले। उनका हाथ पकड़कर राजा ने भावुक होकर कहा, "शहजादे और दुर्गादासजी आपके उपकार मैं कम से-कम इस जन्म में तो नहीं भूलूँगा।" "सम्भाजी महाराज आपके पिता का—शिवाजी महाराज का यह राज्य वस्तुतः सभी धर्मावलम्बियों के लिए अपना देव मन्दिर है। इसलिए यह राजस्थानी दुर्गादाम एक मुसलमान शहजादे को लेकर आश्रय के लिए आया है।'' दुर्गादाम ने कहा। "परन्तु अपनी भेंट का यह समय कितना दुर्भाग्यपूर्ण है?" लम्बी साँस लेकर सम्भाजी ने कहा, "दुर्गादास, राजस्थान और दिल्ली मे कितनी बड़ी आशा लेकर आप यहाँ मराठों के आश्रय में आये हैं। किन्तु उसी ममय हमारे राज्य के अच्छे अष्ट प्रधान अपने राजा से गद्दारी करके आपके सामने सहायता के लिए घुटने टेक रहे हैं। कितनी शर्म की बात है?" उसी जंगल में दो-तीन दरियाँ बिछाकर बैठक तैयार की गयी। दो दिनों की यात्रा से शम्भूराजा बहुत थक गये थे। सैनिकों ने उनके हाथ में नारियल का पानी दिया। राजा का ध्यान कहीं और था। वे बार बार सिर उठाकर सुधागढ़ की ओर देख रहे थे। अब चन्द्रमा आसमान के बीचोंबीच आ गया था। शम्भूराजा की बेचैनी देखकर शहजादा अकबर ने कहा, "महाराज आप चिन्ता न करें। हमने आपके गद्दार कर्मचारियों को ऊपर गढ़ पर इतनी अच्छी तरह रखा है कि वे जान ही नहीं पाएँगे कि तीर कहाँ है और सिर कहाँ?" परन्तु राजा फिर भी चिन्तित थे। उन्होंने उन दोनों से धीमी आवाज में कहा, "सुबह होने की प्रतीक्षा न करो। आधी रात को ही किसी को गढ़ पर भेज दीजिए। उनसे मीठी बातें करके सवेरा होने से पहले ही यहाँ नीचे ले आइए।" "आपकी जैसी आज्ञा, महाराज।" शहजादे ने सिर हिलाया। आधी रात को किले पर भेजे गये सिपाही नीचे उतर रहे थे। उनके हाथ की मशालें धुआँ उड़ा रही थीं। उस दल के साथ राजा ने जानबूझकर अपने पचास सैनिक भेजे थे। सैनिक नीचे उतरते हुए जोर जोर से चिल्लाने लगे—"महाराज, सम्भाजी :: 287
महाराज धोखा हो गया।'' इन शब्दों को सुनते ही शम्भुराजा और कवि कलश तुरन्त उठकर खड़े हो गये। उनकी आँखों की नींद जाने कहाँ उड़ गयी। यह सब सुनकर अकबर और दुर्गादास भी डर गये। शम्भुराजा क्रुद्ध होकर उनकी ओर देखने लगे। उनकी आँखों से आग की लपटें निकल रही थीं। सभी लोग एक साथ बताने लगे— "महाराज! धोखा हुआ। किले की दूसरी ओर भोरप्या नाले से नीचे उतरने के लिए जंगल की ओर जाने का एक रास्ता है। हमारे वहाँ पहुँचने के पहले गद्दारों ने वहाँ भाग जाने का उपाय किया होगा।" "किन्तु हमारे यहाँ आने की उन्हें खबर दी किसने?" "महाराज बाहर इतनी चटक चाँदनी छिटकी थी।" "लेकिन हम तो जंगल से होकर आये थे।" "नहीं महाराज, यहाँ पहुँचने से पहले बीच में एक कोस का खुला मैदान है न? वहाँ से हजार डेढ़ घोड़े आते हुए किसी को दिखाई नहीं पड़ेंगे क्या?" "बाबा तुम्हारी बात सच है।" सम्भाजी निराश स्वर में बोले, "अपने अण्णाजी सियार की नजर रखते हैं। बुर्ज पर से उसी बूढ़े ने आते हुए संकट को देखा होगा।"
बारह
हताश होकर शम्भुराजा अपनी जगह पर बैठ गये। उन्होंने बहुत देर तक आँखें बन्द किये ईश्वर का स्मरण किया। आगे के कार्यक्रम के लिए वे कोई आदेश ही नहीं दे रहे थे। कुछ देर के बाद शम्भुराजा ने कहा— "चलिए जो हुआ सो हुआ। वे गद्दार भागकर जाएँगे कहाँ? अण्णाजी पन्त तो पालकी के बिना चल भी नहीं सकते। बालाजी इस बुढ़ापे में घोड़े पर ठीक से बैठ नहीं सकते। केवल फर्जन्द काका ही इस उम्र में भी दौड़ सकते हैं। किन्तु षड्यन्त्रकारियों और दगाबाजों का समूह हमेशा साथ साथ रहता है। एक यदि आगे-पीछे हो गया तो दूसरों को फँसाएगा। इसलिए वे किसी को अधिक आगे पीछे नहीं होने देते। षड्यन्त्रकारियों की गति अपने आप धीमी हो जाती है। सामने सागौन के तने की तरह ऊँचे और सशक्त दिखाई पड़ने वाले अपने साथियों की ओर शम्भुराजा ने देखा। उन्होंने कहा, "जोत्याजी, रूपाजी, चलिए घोड़े दौड़ाइए। दूसरी ओर की घाटी में ही कहीं होंगे वे गद्दार। भोजन के समय 288 :: सम्भाजी
तक सारा जंगल छान मारो।'' ‘‘उन राजद्रोहियों को पेड़ों से बाँध दो और तुरन्त दूत के द्वारा यहाँ समाचार भेजो। अपने बुजुर्ग और जिम्मेदार प्रधानों द्वारा इस प्रकार का धोखा किसी भी राजा के लिए सह्य नहीं होगा। शम्भुराज ने अष्ट प्रधानों को एक बार माफ कर दिया था किन्तु उन्होंने दुबारा दगाबाजी का षड्यन्त्र किया था। शम्भुराजा को इस व्यवहार से गहरा धक्का लगा था। दुर्गादास और शहजादा अकबर जैसे लोग इतनी दूर से यहाँ आये थे। किन्तु उनके साथ बात करने की स्थिति शम्भुराजा की नही थी। उन्होंने दुर्गादास से स्पष्ट शब्दो मे कहा दिया—‘‘हम पन्द्रह दिनो के भीतर आगम से मिलेंगे, आज नहीं।''
तेरह
शम्भुराजा ने किसी तरह सवेरे स्नान किया। पूजा की। नाश्ते का समय होने के पहले ही रूपाजी और मानाजी के घोडे वापस आ गये। उन्होंने महाराज का अभिवादन किया। उनके प्रसन्न चेहरे को देखकर सम्भाजी ने सब कुछ समझ लिया। उन्होंने पूछा, ‘‘कहाँ हैं वे सब?'' ‘‘पहाड़ के पीछे की ओर। औढ के पास पकड़ा उन गद्दारों को। वहीं पर अपनी मराठी सेना की एक टुकडी है। उन्हीं की देख रेख मे उन्हें सौंपा है। आगे के लिए आदेश करें, महाराज।'' शम्भुराजा ने आसपास एकत्र हुए अपने सहयोगियों की ओर देखा। अपनी सेना के बुजुर्गों को एकत्र अलग करके बगल मे सघन छाया वाले पीपल वृक्ष के नीचे दरबार लगाया। पिता की उम्र वाले बुजुर्गों को उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उस समय अनेक बुजुर्गों ने लज्जा से सिर नीचे कर लिया। शम्भुराजा ने उद्विग्न स्वर मे कहा, ‘‘एक पुराना कहावत है कि यदि राजा उदार हुआ तो हाथ पर कद्दू रख देता है। लेकिन भाइयो, इन अष्ट प्रधानो ने राजगद्दी से हमारा हक छीनकर मुझे कैद करने का हुक्म दिया था। उसके बाद भी मैंने उनके हाथों पर कद्दू नहीं रखा, उल्टे इन सभी राजद्रोहियों को मैने एक बार पुनः अष्ट प्रधानों के पद पर ससम्मान बिठाया। उनके सम्मान की रक्षा की। बताइएSS, बताइए। क्या पिछले एक वर्ष मे मेरे हाथ से कोई ऐसा कार्य हुआ, जिससे आपके शिवाजी महाराज के यश को कलंक लगे। उल्टे इन्हीं महानुभावों ने सम्भाजी 289
मेरे भोजन में विष मिलाने का जघन्य अपराध किया। वहाँ पर हमेशा राजनिष्ठा की झूठी कसमें खाते हैं और यहाँ शहजादे के सामने विद्रोह का झंडा खडा करते हैं। इन बुजुर्गों की क्रूरता से हम थक गये हैं। हमारी बुद्धि कुंठित हो गयी है। अब राजा को क्या करना चाहिए। इसका निर्णय अब प्रजा को करना है।" एक हट्टा कट्टा मूँछो वाला साठ साल का बुजुर्ग खडा होकर बोला- "महाराज बहुत हो गया यह सब, अब आप राजा की तरह कठोर निर्णय लीजिए।" "उन गद्दारों का गला घोंट दीजिए।" पाँच छः जनों ने एक साथ कहा, "महाराज, आप भूल गये क्या कि बड़े महाराज राजद्रोही गद्दारों को किस तरह की सजा देते थे ?" एक दूसरे व्यक्ति ने कहा। "जावली के चन्द्रराव मोरे की तो दुर्दशा की ही साथ ही उसके दो जवान बेटों को जावली से पुणे तक खींचकर ले गये और वहाँ भरे बाजार में उनके गले काटकर गद्दारी का गला घोंटा था।" आगे क्या करना है ? यह सर्वसम्मति से निश्चित किया गया। इस पर शम्भुराजा ने कहा- "इतिहास रचने वाले फर्जन्द काका को भी मैंने एक बार क्षमा कर दिया था। मैंने सोचा कि हिरोजी बाबा पिताजी के खजाने के कौस्तुभ मणि हैं। उन्हें मैंने फिर से समुचित सम्मान दिया। बादशाह औरंगजेब के शहजादे का स्वागत करने के लिए लाखों मराठियों को छोड़कर मैंने उन्हें अपना वकील चुना। उन सभी बातों को भूलकर उन्होंने ही हमारे पैर में कुल्हाड़ी मारी। अण्णाजी दत्तो के सम्बन्ध में मैं क्या बोलूँ ? हमारे रास्ते पर विष बोने के लिए ही जैसे प्रकृति ने उनकी नियुक्ति की है। इन सबों में मुझे केवल बालाजी चिटणीस के लिए बुरा लगता है। कौन जाने ? उनका ईमानदार रक्त इस षड्यन्त्र में सम्मिलित न हो। मेरा मन तो बार-बार मुझसे यही कहता है।" "यह भी कोई बात हुई, महाराज ? इस पत्र पर बालाजी का हस्ताक्षर स्पष्ट है।" जोत्याजी ने क्रुद्ध होकर कहा। " और यदि वे इसमें सम्मिलित न होते तो रायगढ़ पर अपना चिटणीस का कार्यभार छोड़कर यहाँ क्यों आते ? " अक्षर उनके हैं। वे स्वयं अन्य गद्दारों के साथ यहाँ उपस्थित हैं। अब और किस प्रमाण की प्रतीक्षा करनी है ?" सभी लोग बोलने लगे। तत्काल निर्णय लेना आवश्यक था। शम्भुराजा ने कवि कलश से कहा, "कविराज, आप मुझसे बार बार कहते हैं कि मुझे राजधर्म का पालन करना चाहिए। चलिए हमारे हुक्म की तत्काल तामील कीजिए।" "मतलब ?" 290 सम्भाजी
"औढ़ में जाइए और वहाँ जाकर हिरोजी, अण्णाजी दत्तो, उनके साथ आये सोमाजी, आवजी चिटणीस इन सभी गद्दारों को हाथी के पैर में बाँधकर उन्हें समाप्त कीजिए। केवल बालाजी की कोई हानि नहीं होनी चाहिए। उनके हाथ पैर में बेड़ियाँ डालकर तुरन्त रायगढ़ के बन्दीखाने में ले आइए।" इतना होने पर भी राजा के प्राण बालाजी में क्यों अटके हैं? यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। सभी लोग शंकित दृष्टि से शम्भुराजा की ओर देखने लगे। शम्भुराजा ने कुछ कहा नहीं। बहुत देर तक वे कलश की ओर देखते रहे। उनकी ओर से कोई प्रतिसाद न मिलने पर उन्होंने ऊँची आवाज में कहा, "अपने राजा की आज्ञा का पालन नहीं करना है। आप भी ऐसा निश्चय करके आये हैं क्या ?" "नहीं, नहीं, महाराज, कृपया इस प्रकार अन्यथा न समझें।" कवि कलश ने बड़ी आत्मीयता से कहा, "राजन, हमें केवल इतना कहना है कि आज आप मुझे वहाँ न भेजें। आपकी आँखों के सामने उन गद्दारों का सर्वनाश हर तरह से उचित होगा।" शम्भुराजा खिन्नता से हँसे। उन्होंने कहा, "कविराज साँझ सवेरे चौबीस घंटे आप मेरे साथ रहते हैं फिर भी आपने अपने मित्र को ठीक से पहचाना नहीं। क्या मैं ऐसा समझ लूँ? आज राजद्रोह के भयंकर अपराध में फँसे इन लोगों को मैंने बीस बीस वर्षों से मैंने अपने पिता के साथ घूमते हुए देखा है। मृत्यु के भय से थर थर काँपते उनके चेहरे देखकर मेरा मन विचलित हो गया और अपना निर्णय बदलने का विचार बन गया तो? नहीं कविराज नहीं। यदि ऐसा हुआ तो मेरा राजपद बच्चों का खेल बन जाएगा। इस प्रकार की गद्दार प्रवृत्ति को समाप्त करना है तो कठोर दंड के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।" "लेकिन, लेकिन महाराज मैं बाहर का व्यक्ति हूँ। अपने में से किसी को भेज दें। किसी मराठा या किसी ब्राह्मण को।" कविराज ने हाथ जोड़कर कहा। "कविराज अब समय बिलकुल न गँवाइए। मुझे चारों ओर गहरा अँधेरा ही दिखाई दे रहा है। इन लोगों ने राजद्रोह की हद कर दी है। ऐसे समय में स्वजनों की हत्या का कलंक इस सम्भाजी के माथे पर हमेशा के लिए लग गया तो भी कोई बात नहीं, किन्तु पिताजी और सन्तों के पुण्य से प्राप्त स्वराज्य डूब गया तो भविष्य को हम क्या उत्तर देंगे?" कवि कलश बहुत घबरा गये। उन्होंने कहा, "क्षमा करें महाराज, मेरी आत्मा कह रही है कि आप कृपा करके मुझे इस कार्य के लिए न भेजें।" "तो फिर दूसरे किसको भेजूँ? हंबीरराव यहाँ आसपास हैं नहीं। आप जैसा भरोसेमन्द आदमी कौन दूसरा है हमारे पास?" सम्भाजी २७1
“मेरे महाराज शम्भू! क्षमा करें। आप मेरी कठिनाइयाँ क्यों नहीं समझ रहे हैं?’’ बोलते-बोलते कवि कलश की आँखों में आँसू उमड़ आए। उन्होंने कहा, ‘‘राजन, इन कर्मचारियों ने पहले मुझे स्वराज्य के बुजुर्गों का विनाशक काल घोषित किया है। तन्त्रविद्या का एक महाराक्षस कहकर डुग्गी पीटी है और मुझे जन्म भर के लिए कलंकित कर दिया है। तिस पर यदि आपने पुनः इस कठोर कार्य के लिए भेजा तो यह कवि कलश जन्म-जन्मान्तर के लिए इस धरती पर एक खल पुरुष के रूप में बदनाम हो जाएगा।’’ कलश के उद्गारों को सुनकर शम्भुराजा ने एक तीखी नजर उन पर डाली। कवि कलश को राजा की ऐसी दृष्टि का सामना करने का अवसर नहीं आया था। वे घबरा गये। शम्भुराजा ने पीड़ा भरे स्वर में कहा— ‘‘कविराज, विष से भरा प्याला राजा से पहले उसके मित्र को पीना पड़ता है। एक सुप्रसिद्ध कथन को कभी भूलें नहीं कविराज— उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे। राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः।। ‘उत्सव व्यसन अकाल में व्यापक विप्लव काल राजद्वार श्मशान में साथ रहे सो बन्धु।’ अब रुकने का समय बिलकुल नहीं था। कविराज शम्भुराजा के सामने सिर ऊँचा करके खड़े रहे। उन्होंने राजा को बड़े आदर से अभिवादन किया। वे वहाँ से बड़ी शीघ्रता से बाहर के लिए निकले। किन्तु दरवाजे पर पहुँचकर उनके पैर रुक गये। शम्भुराजा ने रूखे स्वर में पूछा, ‘‘क्यों रुक गये? अब क्या चाहिए आपको?’’ ‘‘कल कोई प्रवाद नहीं होना चाहिए। कोई यह न कहे कि कवि कलश ही सारे अपराध का मूल कारण था या कलश ने राजाज्ञा का पालन मन से नहीं किया। ऐसा आरोप मुझे नहीं चाहिए। मेरे साथ एकाध साक्षी दें।’’ ‘‘कौन चाहिए?’’ ‘‘‘वादजी रघुनाथ देशपांडे को हमारे साथ कर दें।’’ ‘‘ठीक है। ले जाइए।’’ बीच में ही कविराज दुबारा राजा की ओर मुड़े। वे शम्भुराजा के एकदम समीप जाकर इतने धीरे से बोले कि केवल वे ही सुन सकें। ‘राजन राजद्रोह का अपराध भयंकर है ही। किन्तु अपराधी कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। महाराज ब्रह्महत्या के पाप का कलंक आपके माथे पर जन्म-जन्मान्तर लगा रहेगा।’ ‘‘कविराज, मैं राजधर्म का पालन कर रहा हूँ। आप केवल राजाज्ञा का पालन कीजिए। बस।’’ शम्भू ने दृढ़ स्वर में कहा। 292 सम्भाजी
चौदह गढ़ के नीचे पहुँचते ही गढ़ का बुर्ज दिखने लगता हैं। उस ओर ध्यान से देखने पर लगता है कि कोई पत्थर के विराट पंखों वाला गरूड़ किले के ऊपर बैठा है। शम्भुराजा ने वहीं पर अपना घोड़ा रोक लिया। अपने सफेद घोड़े की गर्दन थपथपाते हुए वे नीचे उतरे। उनके साथ आ रहे कवि, कलश, जोत्याजी, रूपाजी और दादजी भी वहीं रुक गये। आज राजा का मन ठिकाने नहीं था। उनके सीने में काँटे जैसी चुभन हो रही थी। उन्होंने फिर से एक बार रायगढ़ के उस पाषाण पंछी पर दृष्टि डाली। वहाँ पर उदास काली छाया देखी। आसमान में बादल घिर आये थे। शम्भुराजा ने अपने साथियों से कहा, "आप लोग आगे चलें। मुझे नहीं लगता कि मैं अगले और चार दिनों तक राजधानी में आ पाऊँगा?" "लेकिन राजन आप ठहरेंगे कहाँ?" कलश ने पूछा। "यहीं दूसरी ओर जीजामाता के महल में। मेरा मन कह रहा है कि आज राजमन्दिर में ही ठहर जाएँ।" शम्भुराजा ने कहा। कवि कलश, दादजी और जोत्याजी चितदरवाजा पार करके किले पर चढ़ने लगे। शम्भुराजा का घोड़ा पाचाड़ की ओर मुड़ गया। अच्छी बातें शीघ्रता मे नहीं फैलतीं किन्तु बुरी बातों के हाथ-पैर जल्दी उग आते हैं। शम्भुराजा का घोड़ा रायगढ़ पहुँचे इससे पहले ही औढ़ा गाँव के पास घटी घटना का समाचार सभी को मिल चुका था। गढ़ के ऊपर और निचले हिस्से में सैनिक और अन्य लोग आनन्द से चिल्ला रहे थे- "षड्यन्त्रकारी मारे गये ss दुष्ट विद्रोही मर गये ss।" इस समाचार को सुनकर कुछ लोग शक्कर और मिठाइयाँ बाँट रहे थे। परन्तु उसके साथ-साथ एक भयंकर खबर भी आयी। इस खबर को सुनकर लोक अवाक् रह गये। उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। "बालाजी चिटणीस हाथी के पैर के नीचे कुचलकर मारे गये।" शम्भुराजा भयभीत हो गये थे। उनके मन में भान हो रहा था कि उनके यश में कलंक लग गया है। वे जब पाचाड़ के महल में पहुँचे तब षड्यन्त्रकारियों से जिन्दा बचकर आने के कारण सभी ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। किन्तु यह भी सब अनुभव कर रहे थे कि कहीं तो कोई चूक हो गयी है। महल के प्रवेश द्वार पर चार हाथी झूम रहे थे। शम्भुराजा के स्वागत के लिए उन्हें सजाया गया था। छोटे-बड़े शीशे के टुकड़े जड़ा हुआ हाथियों का झुल्ल चमक रहा था किन्तु शम्भुराजा की सम्भाजी : 293
दृष्टि हाथियों के पैरों पर घूम रही थी। उन्हें लग रहा था कि हाथियों के पैर खून से लथपथ हैं। पाचाड़ की ओर राजा के स्वागत में नौबत बज रही थी। उसकी अनुगूँज से गढ़ के सप्त महल जाग उठे थे। दोपहर के पहले ही येसूबाई की शाही पालकी गढ़ से नीचे उतरी। उनके साथ दूसरी पालकी में कविराज की पत्नी तेजसबाई थीं। सम्भवतः किले के पास ही कविराज येसूबाई से मिले होंगे। कविराज के साथ अचानक येसूबाई को देखकर शम्भूराजा आश्चर्यचकित हुए। उनकी आँखों की भाषा समझकर येसूबाई ने कहा, "कविराज को मैं ही साथ ले आयी हूँ। कविराज के सम्बन्ध में आज गढ़ पर बड़ा प्रवाद मचा है।" "क्यों?" "कविराज द्वारा अपने वरिष्ठ अधिकारियों को हाथी के पैर के नीचे कुचलवा दिया, लोगों को लग रहा है कि कविराज कलश ही असली अपराधी हैं।" "लेकिन असली गुनहगार तो मैं हूँ...।" शम्भूराजा ने कहा। "लोगों को अन्दर की बातों का क्या पता? इसलिए उनके पूरे परिवार को लेकर मैं यहाँ आयी हूँ।" पछाड़ के महल की वह रात बड़ी सूनी सूनी लग रही थी। षड्यन्त्रकारियों की मृत्यु के समाचार से येसूबाई बहुत प्रसन्न हुई थीं। किन्तु बालाजी पन्त की मृत्यु के समाचार से उनका मन खिन्न हो गया। वे कुछ भयभीत भी हुईं। सप्त महल के पास अष्ट प्रधानों के महल थे। वहाँ बालाजी पन्त की वृद्धा पत्नी लक्ष्मीबाई का करुण क्रन्दन सुनाई पड़ रहा था। उसे सुनकर येसूबाई का गढ़ पर रहना कठिन हो गया है। इन्हीं खबरों से बनते विपरीत वातावरण के कारण ही येसूबाई गढ़ से नीचे उतर आयीं। बालाजी चिटणीस की आखिरी भेंट का प्रसंग येसूबाई को याद आ रहा था। सवेरे सवेरे वे किसी काम से परली की ओर जा रहे थे। जाते-जाते अपनी महारानी साहिबा से मिलने आये थे। उनके साथ हिरोजी और सोमाजी भी थे। वे लोग चिटणीस बिलकुल पास ही खड़े थे। बालाजी की मुद्रा अत्यन्त त्रस्त लग रही थी। वे कुछ कहना चाहते थे किन्तु किसी गम्भीर दबाव के कारण वे विवश हो रहे थे। येसूबाई ने बालाजी से पूछा था—"इतनी अफरातफरी में सवेरे-सवेरे सुधागढ़ और परली की ओर क्यों जा रहे हो? राजा तो पन्हालगढ़ पर हैं?" "राजा का ही काम है रानी साहिबा।" "कौन सा?" "राजा ने ही तो चिटणीस को शहजादे से मिलने के लिए कहा है। राजा ने उनसे बातचीत करने के लिए कहा है।" हिरोजी बीच में ही बोलने लगे। 294 :: सम्भाजी
"ठीक है फिर।" बीच का चौक पार करके चिटणीस थोड़ा आगे आ गये। फिर मुड़कर तुलसी वृन्दावन के पास खड़े हो गये। उन्होंने अपनी पगड़ी उतारकर सीने से लगा लिया। उन्होंने कहा— "रानी साहिबा हम थक गये हैं। अन्तिम समय समीप आ रहा है। क्या पता कब क्या हो जाय? अगर कुछ हो गया तो हमारे खंडोबा और निलोबा का ध्यान रखिएगा।" "आवजी कहाँ नजर नहीं आ रहे हैं?" येसूबाई ने पूछा। "आवजी भी हमारे साथ जाने वाले हैं।" हिरोजी बीच में ही बोल पड़े। "चिटणीस अब चलना है न?" सोमाजी पन्त ने कहा। अपनी आँखों में आँसू छुपाये बालाजी पन्त हिरोजी और सोमाजी के साथ निकलकर चले गये थे। यही उनका आखिरी दर्शन था। येसूबाई और शम्भुराजा को आज अपना महल श्मशान की तरह भयानक लग रहा था। बालाजी पन्त चिटणीस साधारण आदमी नहीं थे। उन्हें अपना भाई मानकर शिवाजी महाराज राजापुर से रायगढ़ ले आये थे। पन्त अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के थे। स्वराज्य के प्रति उनकी निष्ठा अटूट थी। शिवाजी महाराज के लिए सिसोंदिया वंशावली के सारे कागजात ढूँढ़ने के लिए वे स्वयं राजपूताना गये थे। उनका हस्तलेख मोती जैसा सुन्दर है। जटिल से जटिल इबारत को वे याद कर लेते थे फिर अपने सुन्दर अक्षरों में लिखकर रख लेते थे। ऐसी उनकी आदत थी। वे बड़ी-बड़ी ग्रन्थियों की लम्बी-लम्बी इबारतें अपने मस्तिष्क में सुरक्षित रखते थे और उन्हें हू- ब-हू वैसे ही कागज पर उतार देते थे मानो किसी ने मुहर लगा दी हो। महल में खड़े काले दिखाई पड़ रहे थे। शम्भुराजा को नींद नहीं आ रही थी। वे इधर-उधर करवट बदलते हुए मछली की तरह छटपटा रहे थे। इसी बीच येसूबाई का स्वर उनके कानों में पड़ा--"महाराज, वे कोई सामान्य आदमी नहीं थे। मामाजी अपने समय के एक पहाड़ थे। जब लोगों को बड़े महाराज का आगरा प्रसंग स्मरण रहेगा, वे हिरोजी मामा को कैसे भूल सकते हैं?" येसूबाई के ये शब्द शम्भुराजा के सीने में तीर की तरह चुभ गये। वे तुरन्त बिस्तर से उठ गये। उन्होंने येसूबाई का हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख लिया और कहा "राजद्रोह की पहली कुटिल योजना हमने सह ली थी न? उन सभी को क्षमा कर दिया था न? येसू जो बात बहुत बुरी लगती है वह यह कि इस पागल सम्भाजी ने इन बुजुर्गों से हमेशा इतना प्यार किया और वे हमेशा मेरा प्राण लेने पर उतारू रहे। सम्भाजी : 295
"किसी जमाने में अण्णाजी ने दक्षिण कोकण के सूबे को एक चट्टान बनकर संभाला था। किन्तु अण्णाजी ने अपनी बाद की सारी जिन्दगी मुझसे द्वेष करने में ही गुजारी। इन सभी को शिवाजी के पुत्र से बादशाह का शहजादा अधिक प्रिय लगा। अण्णाजी अपनी पुत्री हंसा का दुख कभी भूल नहीं पाये। पर उसके एकतरफा प्रेम में मेरा क्या अपराध? येसू आपको क्या बताऊँ? औंढ़ा के समीप उस कड़ी धूप में पहुँचने पर कलश ने फिर से मेरे पास दूत भेजा था। उन्हें आशा थी कि सम्भवतः अपने निर्णय पर हम फिर विचार करें। उन्होंने पूछा था—"महाराज क्या हम आपके हुक्म की सचमुच तामील करें?" उस समय बुजुर्गों की हत्या का आदेश देते समय मुझे कितनी मानसिक यातना हुई थी? ये सारे बुजुर्ग थे किन्तु उनके इस प्रकार राजद्रोह करने पर उन्हें मृत्यु दंड देना हमारा राजधर्म था। हमने राजधर्म का ही पालन किया। आज हम आँसू बहा रहे हैं, उनके पूर्वकृत्यों के लिए किन्तु मैंने उन्हें हाथी से कुचलवाया उनके राजद्रोह के लिए।" "क्षमा करें महाराज! मामाजी बार-बार याद आ रहे हैं। उन्होंने इन सारे लोगों को तैयार किया था। स्वराज्य को खड़ा करने में उन सभी का महत्त्वपूर्ण सहयोग था। उन्होंने इस कार्य में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया था।" "परन्तु तब किसी के मन में स्वार्थ का भाव नहीं जागा था। सत्ता के एक बाग हाथ में आने के बाद, स्वार्थी विचार अपने आप चिपकने लगते हैं। लोग वही होते हैं, उनका शरीर वही होता है पर मन बदल जाते हैं।" क्षणभर के लिए येसूबाई दुविधा में पड़ गयी कि पूछें या न पूछें? अन्ततः उन्होंने पूछा- "लोग कहते हैं कि आपके क्रोधावेश का कलश ने नाजायज फायदा उठाया। उन्होंने क्रोध का रूपान्तरण पैशाचिक दंड में किया?" "बिल्कुल झूठ है यह। सजा देने का कार्य उनके बदले किसी और को दिया जाये ऐसी प्रार्थना करते हुए वे बच्चे की तरह रोये थे। अन्ततः अपने मालिक का आदेश उन्हें मानना पड़ा।" "परन्तु चिटणिस के सम्बन्ध में थोड़े धैर्य से काम लिया होता तो?" "क्या करें पक्के सबूत जो थे। शहजादे को लिखे गये षड्यन्त्रकारी पत्र में उनके हस्ताक्षर थे। मैंने तो कविराज को साफ साफ कहा था कि अन्य लोगों पर मेरा कोई भरोसा नहीं है, किन्तु बालाजी को कुछ मत कीजिएगा। उन्हें सिर्फ बेड़ियाँ डालकर कैद कीजिए।" "फिर भी कविराज ने ऐसा किया?" येसूबाई ने विस्मय से कहा, "वैसा 296 :: सम्भाजी
नहीं। हमारे लोगों ने जब पहले आवजी को पकड़ा तो बालाजी पन्त अपने बच्चे को सीने से लगाकर जोर-जोर से चिल्लाने लगे—'पहले मुझ पर हाथी चढ़ाइए फिर मेरे बच्चे को हाथ लगाइए।' राजा के पास पत्र पहुँचा कि नहीं? ऐसा भी कुछ बड़बड़ा रहे थे। ऐसी स्थिति में दंड देने का काम रोककर कविराज और दादाजी देशपांडे ने हमारे पास एक घुड़सवार भेजा। उस समय हमारी स्थिति बड़ी मोचनीय थी। उन बाप बेटों को छोड़ देते तो सभी को दंड से मुक्त करना पड़ता इसीलिए मैंने आदेश भेजा कि जो भी दोषी हैं उन सब को मृत्यु दंड दे दो। ऐसा मुझे विवशता में करना पड़ा।" जैसे-तैसे करके वह काली रात बीती। प्रात होते ही सुदूर की यात्रा करके महल में एक हरकारा आया। वह यमदूत की तरह काला और भयावना था। शम्भूराजा ने उसके हाथ का लिफाफा खोला। उनकी दृष्टि मोती जैसे सुन्दर अक्षरों पर गयी। उन्हें गहरा धक्का लगा। उनका चेहरा काला पड़ गया। पश्चाताप, उद्वेग और भय से उनके भीतर आग लग गयी। 'येसू! येसू!' कहकर वे जोर-जोर से चिल्लाने लगे। येसूबाई डर गयीं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में पूछा— "क्यों, क्या हुआ, स्वामी?" "यह देखिए?" "यह तो चिटणीसजी का हस्तलेख है।" राजा की मुखमुद्रा ऐसी हो गयी जैसे लाल रंग में कालिख मिल गया हो। उनकी आँखें डबडबा आयीं। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "येसूऽऽ यह पत्र हमें पन्हालगढ़ पर मिलता उसके पहले ही हम गद्दारों को दंड देने के लिए सुधागढ़ पाली के लिए दौड़ पड़े थे। यह चिटणीस का लिखा पत्र पन्हालगढ़ पर ही रह गया। यह पत्र मेरे पास क्यों नहीं पहुँचा? क्या मैं सचमुच इतना अभागा हूँ?" "परन्तु महाराज हुआ क्या?" "युवराज्ञी यह पत्र पढ़िए। आपके पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाएगी।" येसूबाई ने डरते हुए उस पत्र को पढ़ा— "क्षत्रिय कुलावतंस श्री राजा शम्भू छत्रपति को प्रभुकुलोत्पन्न बालाजी आवजी चिटणीस का अभिवादन। आप पन्हालगढ़ चले गये और आपके पीछे यहाँ अनेक षड्यन्त्र हुए। आपके दरबार के लोगों ने फिर से वही कारनामा आरम्भ कर दिया है। आपको गद्दी से उतारकर चिरंजीव राजाराम साहब को नामधारी राजा बनाने की उनकी योजना है। पाली जाकर औरंगजेब के लड़के के साथ साँठ-गाँठ करेंगे। शहजादे की संगति शस्त्र-बल प्राप्त करके स्वामी को राजगद्दी से उतार देने की उनकी साजिश सम्भाजी :: 297