छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
"उस बन्दे को गलतफहमी तो नहीं हो गयी है कि फिरंगियों की अव्वल दर्जे की तोपों का वह मुकाबला कर लेगा।" असदखान ने हँसकर कहा। वजीर की इस प्रतिक्रिया पर सभी सरदार हँस पड़े, किन्तु बादशाह कुछ अधिक गम्भीर हो गया। ऐसा लगा कि उसे शत्रु की हिम्मत और शक्ति का ठीक- ठीक अन्दाजा था। इसीलिए उसने अपनी अनेक रातें चिन्ता में जागकर बितायीं। उसने एक जोखिम भरी योजना बनाई। इस योजना की रूपरेखा अपने सहयोगियों के सामने स्पष्ट करते हुए बादशाह ने कहा, "सम्भा ने फिरंगियों से सम्बन्ध बिगाड़ लिया है। उसका एक पाँव फिरंगियों के जबड़े में फँस गया है। ऐसे में हम दूसरी ओर हमला करेंगे। हमारा एक गाजी चालीस-पचास हजार की फौज लेकर निकलेगा। कोल्हापुर, बेलगाँव की ओर से रामदरिया घाट पार करेगा और दक्षिण कोंकण पर हमला बोल देगा।" "लेकिन हुजूर ?" असदखान अपना आधा ही मुँह खोल पाया था। "हाँ बोलो वजीरे ?" "इतनी बड़ी फौज के खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी ? उन्हें रसद कौन पहुँचाएगा ?" "वाह असदखान, आपकी यह चिन्ता शाहंशाह के वजीर के लिए उचित ही है। मगर इसका भी इन्तजाम हमने कर लिया है। हमारा सूरत का सूबेदार रसद से भरी जहाजों को गुजरात के किनारे से भेजेगा। ये जहाजें अरब सागर से मुम्बई, जंजीरा, राजापुर होते हुए पणजी की ओर बढ़ेंगी।" "लेकिन जहाँपनाह, समुद्रतट पर शिवाजी और सम्भाजी द्वारा बनाए गये अनेक जलदुर्ग और नौसेना की चौकियाँ हैं।" "उनकी नौसेना का मुकाबला करने की शक्ति हमारी नौसेना में निश्चित रूप से है। इसके अतिरिक्त हमारी मदद करने के सिवा फिरंगियों के पास भी कोई दूसरा उपाय नहीं है।" बादशाह की इस योजना को सुनकर अनुभवी और बुजुर्ग सरदारों ने अपनी गर्दनें हिलाईं। किन्तु जुल्फिकार लम्बी साँसें छोड़ने लगा। बादशाह ने उसकी सशंक आँखों को देखा। "बोलो जुल्फिकार तुम्हारा शक क्या है?" "जहाँपनाह आपका मनोबल बुलन्द है। पर रामदरिया गोवा की ओर से हमारी इतनी बड़ी फौज घुसेगी तो सम्भा वहाँ से भागकर सीधा अपने रायगढ़ के पहाड़ी गर्भगृह में जा घुसेगा, उसका क्या करना ?" बादशाह मुस्कराया फिर नक्शे पर उँगली दिखाते हुए कहने लगा, "उसी समय दूसरा गाजी दूसरी फौज लेकर कल्याण और पनवेल से होता हुआ रागयगढ़ सम्भाजी :. 457
की ओर बढ़ेगा। दोनों फौजें यहाँ पहाड़ और निजामपुर के पास मिलेंगी। दोनों फौजें अपनी पूरी ताकत से काफिरों की इस पत्थर की राजधानी को बारूद लगाकर सिंहासन के साथ नीचे पटक देंगी।" बादशाह के मायाजाल के उस विलक्षण फैलाव को देखकर सभी सरदार अवाक् थे। सभी बादशाह की प्रशंसा करने लगे। तब बादशाह ने कहा, "इतने से खुश न हो जाइए। अपनी-अपनी जिम्मेदारी पर ध्यान दीजिए। ये दोनों फौजें वक्त पर एक साथ मिल पायीं तभी यह योजना कामयाब होगी। नहीं तो कुछ भी हाथ नहीं आएगा।" सरदार और अधिकारी के दृढ़ चेहरे की ओर गम्भीरता से सभी देखने लगे। उसी समय बादशाह ने कहा, "एक बार यदि दोनों फौजें एक जगह पर मिल गयीं तो मैं एक दूसरी चाल चलूँगा। ये देखो कोंकण में नीचे उतरने वाले घाट। यह बोरघाट, यह कावल घाट, यह वरंदघाट दूसरी ओर का यह अंवाघाट। यदि वक्त पर दोनों फौजें इकट्ठा हो गयीं तो मैं इन घाटों से दस-दस हजार फौजों की टुकड़ियाँ और भी नीचे उतारूँगा। ये फौजें पूरे कोंकण को अंगारे पर पड़ी मछली की तरह भून डालेंगी। किन्तु यदि समय का तालमेल नहीं बैठा तो हमारी फौजें सह्याद्रि की इन घाटियों में डूब जाएँगी। पूछो क्यों?" "क्यों जहाँपनाह ? "हमारी ताकत के जरा भी कमज़ोर होने का अन्दाजा होते ही इन वनों और जंगलों के लोग, लाड़ियों और कुल्हाड़ियों के साथ बाहर निकल पड़ेंगे। बीच रास्ते में फँसाकर हमारे लोगों को पीटेंगे। औरतें और बच्चे भी आगे पीछे नहीं देखेंगे। क्योंकि यह सारा मुल्क शिवा और सम्भा के साथ दिलोजान से मुहब्बत करता है।" बादशाह को आगे के सभी फैसले शीघ्र लेने थे। दक्षिण कोंकण के सैन्यदल का नेतृत्व किसे सौंपना है? इस सम्बन्ध में बादशाह ने सभी से परामर्श किया। सभी ने बड़े शहजादे मुअज्जम का नाम सुझाया। मुअज्जम ऊँचा, बलिष्ठ, मर्दाना आकर्षण और लुभावनी आवाज वाला व्यक्ति था। सभी लोग उसे एक कुशल, बुद्धिमान, वफादार आदर्श शहजादा के रूप में देखते थे। वह अभी पैंतीस वर्ष का था। मुअज्जम के नाम पर सर्वसम्मति से बादशाह एक क्षण के लिए चकित हुआ। मुअज्जम के साथ और किस-किस को भेजा जाय? इसका निर्णय भी उसी बैठक में लिया गया। इखलासखान, लतीफशाह दखनी, तोपखाने का दरोगा आतिश खान, इस प्रकार बादशाह ने एक-एक नाम लिया। इसके बाद सभी सरदार अभिवादन करते हुए एक-एक करके खड़े हो गये। इसके बाद औरंगजेब ने नेक मराठा नागोजी 458 :: सम्भाजी
माने म्हसवड़कर का नाम लिया। नाम लेते ही छः फुट ऊँचा, हट्टा-कट्टा नागोजी उठकर खड़ा हो गया। नागोजी की ओर संकेत करते हुए औरंगजेब ने गर्व से कहा, "बेटे मुअज्जम, एक बात का ध्यान हमेशा रखना। महाराष्ट्र में कुछ ऐसे नेक, कुलीन और प्रामाणिक मराठा वंश हैं जो चाहे आदिलशाही हो या निजामशाही हो अथवा हम मुगल, ये लोग वफादार रहे हैं। इन्होंने शिवा-सम्भा या विद्रोही जमींदारों को कभी अपना राजा माना ही नहीं। इन्हीं में से एक है नागोजी। भविष्य में भी यह ईमानदार आदमी बादशाह की नमकहलाली करेगा।" बादशाह ने प्रश्न किया कि कल्याण और पनवेल का सेनानायक कौन नियुक्त किया जाए? इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए जुल्फिकार स्वयं उठकर खड़ा हो गया। परन्तु उसके घमंड के घोड़े को लगाम लगाते हुए बादशाह ने कहा, "जुल्फिकार बेटा, तुम उम्र में कम और रिश्ते में मेरे मौसेरे भाई हो। मैं तुम्हें निराश नहीं करना चाहता। पर मुझे वहाँ केवल साहसी योद्धा नहीं बल्कि कोई कूटनीतिज्ञ चाहिए। उस ओर दुश्मनों का सिर और मन्दिरों का कलश गिराने वाला इस्लाम का कोई वफादार बन्दा मुझे चाहिए। इसलिए मैं पूरी तरह सोच विचारकर शहाबुद्दीन उर्फ गाजिउद्दीन फिरोजजंग को वहाँ के लिए चुन रहा हूँ।" उत्तरी कमान का सूत्र सौंपने के लिए शहाबुद्दीन को तुरन्त सन्देशा भेजा गया। जुन्नर में ताल ठोंक कर जमे हुए शहाबुद्दीन को बादशाह ने सूचित किया। आप तुरन्त नाणे घाट से नीचे उतरें। वहाँ से उत्तरी कोंकण को जलाते हुए आगे बढ़ें। मुअज्जम और आप दोनों को सम्भा को फँसाकर पकड़ना है बहुत सावधानी से काम लें। सम्भा बहती हुई हवा है। इसके बाद उसका हाथ में आना मुश्किल है।" रामदरा और गोंवा की ओर से मराठों को नेस्तनाबूद करने के लिए मुअज्जम उर्फ शाहआलम निकला था। जोर शोर से तैयारी हो रही थी। रेवदंड और चोल में सम्भाजी की सफलता की सूचनाएँ मिलीं। उसी रात बादशाह ने मुअज्जम को अपने पास बुलाया। उसे एक सूचना सिर्फ मुअज्जम को देनी थी। बादशाह ने कहा, "वह काफिर का बच्चा सम्भा आजकल मेरे साथ खिलवाड़ कर रहा है। उसने हमारे शहजादे अकबर को गुप्तरूप से बाँधा की ओर भेज दिया है। इसमें कुछ दाल में काला नजर आ रहा है। जब तुम रामघाट से नीचे उतरो, उसी समय बाँधा पर हमला कर दो। उस मूर्ख शहजादे को बन्दी बनाओ। दूसरे ही दिन सवेरे औरंगजेब ने अपने निजी सेवकों को बादशाही सामान इकट्ठा करने का आदेश दिया। उसने असदखान से कहा, "अब बहुत समय तक औरंगाबाद में डेरा डाले रहने से नहीं चलेगा। मुझे दुश्मनों के और मैदानेजंग के करीब जाना चाहिए। कुछ समय के लिए अब हमारा डेरा अहमदनगर में होगा।" सम्भाजी :: 459
"जहाँपनाह इतनी जल्दी?" "वजीरे-आजम दोस्त हो या दुश्मन, एक बात तो सच है कि शिवाजी के इस लड़के ने मुझे बुढ़ापे में भी जवान बना दिया है।" दो राजापुर की खाड़ी में हवा तेजी से चल रही थी। तम्बू की कनातें हिल रही थीं। न जाने क्यों शंभूराजा को नींद नहीं आ रही थी। खंडो बल्लाल तीन दिन पहले ही वहाँ आ चुके थे। राजा ने उन्हें बुलवाया। खंडोजी के तम्बू में आते ही राजा का ध्यान उनकी लम्बी नाक और तेजस्वी आँखों पर गया। कुछ क्षण के लिए उन्हें बालाजी चिटणीस के ही आ जाने का आभास हुआ। राजा ने खंडोजी को सामने बैठने का आदेश दिया। कुछ देर विचार-विमर्श करने के बाद शंभूराजा ने कहा, "खंडोबा आप हमारे राज्य के सचिव हैं। आजकल तारापुर, थाना, चोल, रेवदंडा जैसी अनेक जगहों पर समुद्रतट में युद्ध छिड़ा है। एक ही समय में कहाँ और कितनी सेना भेजनी है? इसका विचार आपको करना है। ऐसे समय में आपका रायगढ़ पर रहना अति आवश्यक है।" "परन्तु महाराज।" "अकेली महारानी के कन्धों पर कितनी जिम्मेदारी देंगे? कविराज यदि वहाँ होते तो हमें वहाँ की इतनी चिन्ता न होती। मुझे लगता है कि शीघ्रातिशीघ्र वहाँ के लिए प्रस्थान करें।" खंडो बल्लाल वैसे सिर नीचा किये बैठे रहे। उनकी निरुत्साही प्रतिक्रिया से शम्भू महाराज भी कुछ विचलित हो गये थे। यह देखकर खंडो बल्लाल ने कहा, "यहाँ मैं अपने मन से थोड़े ही आया हूँ? महारानी साहिबा ने मुझे आने के लिए विवश किया।" "क्या मतलब?" "उनके विचार से आजकल आपकी ग्रह स्थिति कुछ ठीक नहीं है। इसलिए आपके साथ पराछाईं बनकर रहने के लिए कहा गया है।" अपनी प्रिय रानी की स्मृति से शम्भूराजा का मन प्रसन्न हो गया। शंभूराजा की प्रसन्न मुद्रा देखकर खंडो बल्लाल की जान में जान आयी। उन्होंने कहा, "महाराज यहाँ रुकने में मेरा भी कुछ स्वार्थ है।" 460 :: सम्भाजी
शंभूमहाराज की आँखें चमक उठीं। उन्होंने खंडोजी की ओर आश्चर्य से देखा। कुछ गद्दारों के कारण बालाजी चिटणीस की मौत, औंदा गाँव की वह बंजर भूमि, सेना की भूलें आदि स्मरण करके शंभूमहाराज का मन भारी हो गया। वे कम्पित स्वर में बोले—"खंडोजी बालाजी काका के दुखद अन्त के बाद चिटणीस का पद मैंने आपको प्रदान किया। हमारी महारानी ने आपको और निलोगा को अपना बेटा मानकर गोद में खेलाया, परन्तु—" शंभूमहाराज बोलते-बोलते रुक गये, उनकी जबान भारी हो गयी, आँखों के गर्म आँसुओं को उन्होंने बड़ी सावधानी से पोंछ लिया। शंभूमहाराज ने पुनः कहा, "औढ़ा शब्द के स्मरण होते ही मेरे कलेजे मे कुल्हाड़ियों के पाव की पीड़ा होती है। खंडोबा वह कोई षड्यन्त्र नहीं केवल एक दुर्घटना थी जिसमें बालाजी काका का अन्त हुआ। मनुष्य के जीवन में ऐसे भी प्रसंग आते हैं जब वस्तुस्थिति से हम अलग हो जाते हैं। एक ओर गद्दारों के कारण काकाजी का गिरफ्तार हो जाना दूसरी ओर दुर्भाग्य मे उनके महत्त्वपूर्ण पत्र हमारे पास तक न पहुँच पाना, कारण बन गया। खंडोजी हम अपराधी हैं। चिटणीस ही हत्या का पाप हमसे ही हुआ।" "महाराज, इसमें किसी का भी दोष नहीं है। हमारा समय ही बुरा था। यह हमारा ही दुर्भाग्य था।" उन्होंने आगे कहा, "महाराज जो भी हुआ उसे भूल जाइये। आपने हमारे लिए क्या नहीं किया? चिटणीस बनाकर अपनी गोद में संभाला - " "खंडोजी कभी कभी लगता है कि बालाजी की मृत्यु के हम ही कारण हैं इस पाप का शमन करने के लिए, आक्रमण पर निकलने से पहले मैंने रायगढ़ के किलेदार को आदेश दिया है—" "जहाँ हमारे बालाजी का अन्त हुआ है, औढ़ा की उस बंजरभूमि पर शिवालय के निर्माण का तो नहीं?" "हाँ, वहाँ के शिवलिंग पर गिरने वाली शीतल जलधारा ही हमारी और बालाजी काका के लिए अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि होगी।" खंडो बल्लाल ने उठकर शंभूमहाराज के चरण पकड़े और बोले, "महाराज राजसेवा करते समय इस प्रकार अनेक सैनिक शहीद होते हैं। पर उनकी याद किसी को नहीं आती। आपने हमारे बालाजी को इतनी अच्छी तरह अपनी स्मृति में रखा है। उनकी स्मृति को अपने हृदय में स्थान दिया है। आपका विशाल हृदय और वात्सल्य भाव देखकर मैं गद्गद हो गया हूँ। शंभूमहाराज ने उच्छ्वास लेते हुए कहा, "खंडोबा, उस ईश्वर की महिमा अपार है। पता नहीं मनुष्य क्यों मनुष्य के प्रेम में फँस जाता है ? ईश्वर और नियति का वह खेल सर्वथा अबूझ है।" ऐसा कहते समय महाराज की आँखों के सामने अहमदनगर किले की तटबन्दी दिख रही थी। तटबन्दी के पीछे तीन वर्ष से कैदी के संभाजी :: 461
जीवन बिता रही दुर्गा देवी और रानू दीदी की मूर्ति उनकी आँखों के सामने नाचने लगी। साथ ही पैरों में घुँघरू बाँधे छोटी-सी गुड़िया भी आँखों के सामने नाचने लगी। उसी प्रवाह में शम्भूमहाराज कहने लगे, "आज भी हमें अनुभव नहीं होता कि चिटणीस काका हमारे बीच नहीं हैं। खंडोबा, कोंडाजी के बलिदान के बाद का एक प्रसंग आपको बताता हूँ। जंजीरा के सामने वाली खाड़ी के किनारे हम प्रातःकाल घूम रहे थे। उस सुबह वहाँ एकदम सुनसान था। उसी समय एक मध्यम कद, पैंसठ वर्ष का, एक सुन्दर तेजस्वी व्यक्ति दिखाई पड़ा। एकदम चिटणीस काका जैसा। हम उन्हें पुकारते हुए, पानी की लहरों से भींगती हुई काली चट्टान पर बैठ गये। फिर वहाँ कोई नहीं दिखाई पड़ा। एक ओर समुद्र की लहरों का शोर और दूसरी ओर राजापुर का पड़ाव। कहाँ चला गया होगा वह व्यक्ति? समुद्र में या पहाड़ियों में?" "वह कभी-कभी केवल आभास होता है।" "नहीं खंडोजी, इन आभासों में भी सत्य का बड़ा अंश छुपा होता है। हमें लगता है कि बालाजी काका का बचपन जंजीरा के किले में ही बीता। कहीं यह छायामूर्ति यह तो नहीं कह रही है कि यदि मैं होता तो अवश्य ही मदद करता।" बहुत समय से बातें चल रहीं थी। सवेरे जल्दी उठकर जाना था। तम्बू के मुख्य द्वार पर ईमानदार रायप्पा बैठा हुआ था। उसने कुछ बेचैन होते हुए पूछा- "राजाजी कब तक जागते रहोगे? कुछ विश्राम भी कर लीजिये।" वह साहस बटोरकर बोला। खंडोजी को आदेश देते हुए महाराज ने कहा, "खंडोजी कब निकल रहे हैं रायगढ़ की ओर?" खंडो बल्लाल ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज आपके साथ जंजीरा का मुकाबला करना बाबाजी के नसीब में नहीं था। कम से कम मुझे तो गोवा के आक्रमण के लिए अपने साथ आने दें।" तीन अब अधिक समय नष्ट करने से क्या लाभ, राजन? यह वाइसराय केवल चालाक और धूर्त ही नहीं, बहुत बड़ा कपटी और गद्दार भी है अब रुकिए नहीं। किसी भी 462 :: सम्भाजी
तरह से उस फिरंगी को युद्ध में उतारना पड़ेगा।" दुर्गादास राठौर ने आग्रहपूर्वक कहा। राजापुर के पास की पहाड़ियों के समीप शम्भूमहाराज का तम्बू खड़ा किया गया है। तम्बू में महत्त्वपूर्ण विषय पर विचार-विमर्श चल रहा था। शम्भूमहाराज के सामने कवि कलश, दुर्गादास राठौर, शहजादा अकबर, सरदार येसाजी कंक बैठे थे। तम्बू के नीचे एक ढलान की बगल में राजापुर की खाड़ी थी। यहाँ पर पानी और हवा के साथ लहराने वाले नारियल और सुपारी के पेड़ थे। शम्भूमहाराज, सत्तर वर्ष की आयु को पहुँच रहे येसाजी कंक की ओर एकटक देख रहे थे। येसाजी बाबा के सिर पर बहारदार पगड़ी, शरीर पर जरीदार ढीला अँगरखा, कमर में लिपटा शुभ्र जामा सुशोभित थे। ऐसी वेशभूषा में उनकी वृद्ध छवि और भी खिल उठी थी। उनकी बगल में एक आकर्षक और तेजस्वी युवक बैठा था। लगभग पचीस वर्ष का वह युवक कृष्णाजी, येसाजी कंक का पुत्र था। शम्भूमहाराज ने कहा, "येसाजी आप हमारी थल सेना के सेनापति हैं। इस बार हम आप पर एक बड़ी जोखिमभरी जिम्मेदारी सौंप रहे हैं।" महाराज यदि आप आग में कूदने को कहें तो भी यह बूढ़ा किसी बात का विचार नहीं करेगा। महाराज अभी कल कोंडाजी जैसा वीर आपके लिए जलकर खाक हो गया। आज यह शिवाजी का येसाजी आपके लिए जलकर खाक होने के लिए तैयार है। गोवा पर आक्रमण करने की चर्चा होने लगी। वहाँ के बन्दरगाह वहाँ की खाड़ियाँ, फिरंगियों के किले, उनकी चर्चें, संरक्षण करने वाली फिरंगी सेनाएँ, पणजी का गोलाकार गुम्बद, सशक्त प्रवेश द्वार आदि सभी बातों पर विस्तार से चर्चा हुई। कांट दी आल्होर नामक फिरंगी से शम्भूमहाराज बहुत दुखी थे। उन्होंने कहा, "यह फिरंगी स्वार्थी, धोखेबाज और कमाल का नाटक करने वाला है। एक ओर तो यह पुत्ररत्न प्राप्ति के उपलक्ष्य में हमें बधाई का सन्देश भेजता है, बच्चे के लिए हीरे-जवाहिर और मणि-माणिक्य का उपहार तो दूसरी ओर यह जानकर कि नारवातीर्थ में हम बहुत कम सैनिकों के साथ आ रहे हैं, हमें जिन्दा पकड़कर बादशाह को सौंपने की योजना बनाता है अब बताइए इसका क्या किया जाए?" "आक्रमण, गोवा पर आक्रमण, और दूसरा क्या?" येसाजी कंक ने गरजकर कहा। "कल यदि औरंगजेब की फौज गोवा में आयी तो ये फिरंगी मेंढक की तरह कूदकर पहले उधर ही जाएँगे। ये चोर हमारे साथ मैत्री का जितनी भी दिखावा करें हम इनकी असलियत जानते हैं। हमें पता है कि पुर्तगालियों ने बादशाह के साथ एक अत्यन्त गुप्त लिखित समझौता किया है।" राजा ने सभी को बता दिया। सम्भाजी :: 463
"क्या कह रहे हैं महाराज?" सभी ने आश्चर्य से पूछा। "कविराज, कहाँ है वह कागज ?" कवि कलश ने एक कागज प्रस्तुत किया। गुप्तचरों नें पुर्तगालियों और बादशाह के गुप्त समझौते की प्रतिलिपि तैयार कर ली थी। उसके अनुसार मराठों के कोंकण का जो भाग पुर्तगाली और मुगल सेना द्वारा जीता जाएगा, वह सब पुर्तगालियों को दे दिया जाएगा। उसके बदले में पुर्तगाली पणजी के समीप बादशाह को नौसेना का अड्डा बनाने की अनुमति देंगे। वाइसराय की सारी पोल खुल गयी थी। शंभूमहाराज ने दृढ़तापूर्वक कहा, "यह साला औरंगजेब से जाकर मिले उससे पहले ही उसे लंजुपुंज कर देना चाहिए।" "फिर देर किस बात की? चलें गोवा पर हमला करें।" राजा के सभी सहयोगियों ने एक साथ उद्घोष किया। ऐसा लग रहा था कि उस बैठक में ही युद्ध के नगाड़े बज रहे हों। अत्यन्त तनावपूर्ण मनःस्थिति में महाराज ने कहा, "फिरंगियों द्वारा की गयी पणजी की तटबन्दी, आगे चलने वाली उनकी तोपें, फौजों का कुशल संचालन, उच्चकोटि का बारूद और समुद्र में मुक्त रूप से घूमने वाली उनकी नौकाओं आदि का विचार करने से उन पर सीधा आक्रमण हमारे लिए खतरनाक हो सकता है। पर देखेंगे, कोई-न-कोई रास्ता अवश्य निकलेगा।" उसी रात महाराज ने मुबई के अंग्रेजों को सन्देश भेजा। दक्षिण की ओर जिंजी में उन्हें व्यापार की अनुमति चाहिए थी। इस माँग को लेकर अँग्रेजों ने रायगढ़ की अनेक यात्रायें की थीं। महाराज ने कहा, "कविराज ! जिंजी के पास वाले क्षेत्र में व्यापार की अनुमति उन्हें तुरन्त दे दी जाय। एक ही समय में सभी से लड़ाई मोल लेना हमारे लिए अच्छा नहीं होगा।" रात में कवि कलश, खंडो बल्लाल और येसाजी कंक राजापुर की खाड़ी के किनारे टहल रहे थे। खाड़ी के भीतर टूटने वाली लहरों की प्रतिध्वनि सीधे कानों से टकरा रही थी। शंभूराजा ने अपने मन की शंका को व्यक्त करते हुए कहा, "येसाजी काका गोवा में फिरंगियों को स्थापित हुए सौ वर्ष बीत चुके हैं। इस तथ्य को नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता कि उनके पास तोपें और लड़ाकू जहाजें बड़ी मात्रा में हैं। समुद्र के पानी पर हमारे घोड़ों के पाँव कैसे चल पाएँगे?" बात करते-करते शंभूमहाराज के पैर तट की बालू में धँस गये। वे रुके और प्रसन्न होकर पूछा, "येसाजी, कविराज खंडोजी, कोई योजना बनाकर उस फिरंगी को ही अपने घोड़ों की टापों के पास खींच लिया जाये तो?" 464 :: सम्भाजी
चार पणजी बन्दरगाह के शराबखाने मे लोगों की भीड़ थी। किनारे पर लंगर डाले हुए अनेक जहाजों के नाविक, देश-विदेश के मुसाफिर, व्यापारी, चोर-उचक्के जैसे हर प्रकार के लोगों की भीड़ होती थी। दो-तीन दिनों से कुछ अपरिचित लोग वहाँ आते-जाते दिखाई पड़ते थे। उनकी वेशभूषा से उन्हें ठीक-ठीक पहचानना असम्भव था। यदि उन्हें नीली आँखों वाले कोंकणी लोगों के रूप में जाना जाये तो उनकी लम्बी, काली, नुकीली दाढ़ी अफगानियों की थी। गोरे रंग के कारण उन्हें फिरंगी समझा जा सकता था किन्तु उनकी रहन-सहन और दबी जबान में बातचीत विचित्र थी। मदिरा का प्याला खाली करते हुए वे एक-दूसरे से कह रहे थे-‘‘संभा ने फोंडा के किले पर चार-पाँच करोड़ का खजाना लाकर रखा है। बारूद का बड़ा भंडार भी रखा है कुछ दिनों में उसकी फौज भी वहाँ आनेवाली है। दो-तीन दिनों में ही इस गुप्तचर्चा के असंख्य पैर उग आये। फिरंगियों के गुप्तचर खबरों को एकत्र करने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर सदैव बने रहते थे। उन्होंने यह खबर तत्काल कांट-द-आल्होर तक पहुँचा दी। जिन दो गुप्तचरों ने वाइसराय तक यह खबर पहुँचाई थी उनकी सूचना कभी गलत नहीं हुई थी। वाइसराय कहने लगा-‘‘शिवाजी के इस छोकरे को पहले से ही गोवा में बड़ी रुचि है। कुछ दिन पहले वह अंजदीव टापू पर चूना-पत्थर लेकर आया था। वहाँ पर वह किला बनाना चाहता था।’’ वाइसराय ने बड़ी सावधानी से जासूसों के एक दूसरे गुट से उस खबर की निगरानी की। कांट द आल्होर ने फोंडा के किले की ओर भी कुछ गुप्तचर भेज दिये। उन्हें खबर मिली की फोंडा किले की मराठा सेना बहुत कम और कमजोर है। किन्तु यह भी पता चला कि वहाँ कुछ विशेष बात है। ऐसी खबर मिलते ही कांट अपनी विजय की कल्पना करके नाचने लगा। दो महीना पहले नारवा नदी से बच निकला था। अब देखता हूँ। वाइसराय अपने आपसे बोल रहा था। उसे यह भी खबर मिल गयी थी कि शीघ्र ही औरंगजेब की सेना इधर आ रही है। उसके आने के पहले ही किला जीतकर खजाना लूट लिया जाएगा। अपनी विजय की कल्पना करके वह थैया-थैया करके नाचने लगा। वाइसराय ने अपने सहयोगियों के साथ विचार विमर्श किया। कांट को सहायता के लिए गोवा के अनेक पादरी, कैप्टन दिओगो, आदि आ गये। अन्ततः वाइसराय ने तीन हजार थल सेना जमा की। उसमें दो हजार साष्टी महल के सम्भाजी :: 465
कन्नड़भाषी सैनिक थे। अक्तूबर 1683 के अन्त में एक सुहानी सुबह यह सेना पणजी से बाहर निकलने लगी। इस सेना का नेतृत्व वाइसराय स्वयं कर रहा था। दूर तक मार करने वाली बड़ी-बड़ी तोपों को खींचते-खींचते बैल व्याकुल हो रहे थे। हाथों में बन्दूक और तलवार संभाले सैनिक एक-दो, एक-दो के कदमताल से आगे बढ़ रहे थे। फ़ौज प्रातःकाल ही पांडवी नदी की सहायक एक छोटी नदी के किनारे पहुँच गयी। पैर के नीचे की भुसभुसी मिट्टी में सैनिकों के जूते धँसने लगे। बहुत वर्षों बाद गोवा के भूमि पर एक बड़ा युद्ध होने जा रहा था। इसलिए आसपास की चर्चों पर, पेड़ों पर, पहाड़ियों पर लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गयी थी। जैसे-जैसे दुर्भाट बन्दरगाह समीप आ रहा था, वाइसराय के सहयोगी भयभीत होने लगे। वाइसराय का सचिव चिन्ताग्रस्त स्वर में बोला- "सर, दुर्भाट बन्दर छोड़ दिया जाय तो अच्छा होगा।" "क्यों?" "वहाँ पर मराठों का वीर सूबेदार दुलबा नाइक अपनी फौज के साथ हमेशा के लिए ताल ठोंककर बैठा है।" "चलो तो सही !" वाइसराय ने सोत्साह कहा। दुर्भाट बन्दर के पास फौज पहुँची तो सभी दर्शकों ने अपनी साँस रोक ली। सभी इस अनुमान से आँखें फाड़कर देखने लगे कि अभी दोनों फौजों में घमासान युद्ध होगा। दुलबा नंगी तलवार लेकर आने की जगह मेले में किसी बालक की तरह अपनी पगड़ी उछालते और नाचते हुए आया। उसने वाइसराय को आलिंगन दिया। वाइसराय ने ममता से उसके गाल नोंच लिए। दुलबा फिरंगियों से मिला हुआ था। इसलिए फोंडा की तटबन्दी आसानी से भेदकर उस पर क़ब्ज़ा कर लेंगे, ऐसे विश्वास से वाइसराय अपना घोड़ा आगे बढ़ा रहा था। दिन में हम कहाँ और किसलिए जा रहे हैं, इसका उसने किसी को पता ही नहीं चलने दिया। रात को सेना फोंडा किले के पास पहुँची। वहाँ ठंडी हवा ने किले के भीतर मराठों और बाहर फिरंगी सेना को परेशान कर दिया था। आधी रात तक फिरंगियों की बन्दूकों से कोई गोली दागी नहीं गयी थी। किन्तु इसी समय आकाश से बादल बरसने लगे। जैसे उछलते घोड़े दौड़ते हुए सामने आ रहे हो वैसे ही गर्जन- तर्जन के साथ बरसात ने जोर पकड़ा। उसने पेड़-पत्तों के साथ खड़ी फिरंगी सेना को खूब पीटा। एक बार किले के पास तक पहुँचकर पीछे मुड़ना भी अच्छा नहीं था वर्षा में वाइसराय के वस्त्र भीग गये। अपने ऊपर छाता ताने खड़े नौकर को भी उसने भगा दिया। तेज बारिश और अन्धकार का फायदा उठाने की बात वाइसराय ने सोची। रात में ही उसने तीन बड़ी तोपों को किले की सामने वाली पहाड़ी पर खड़ा कर दिया। चढ़ाई चढ़ते समय बैलों के पैर कीचड़ में धँसने के 466 :: सम्भाजी
कारण बैल गिरने लगे। कुछ बैलों के पैर टूट गये। तोपों को खींचने वाले सैनिक बेहाल हो गये। किन्तु वाइसराय ने किसी बात की चिन्ता नहीं की। कांट ने सही जगह पर तोपों को खड़ा कर दिया। वह जगह ऐसी थी जहाँ से किले पर सीधा निशाना साधा जा सकता था। वाइसराय ने बहुत धीमी आवाज में कहा, "मराठे नींद में बेसुध दीखते हैं। चलों उन्हें वहीं पर गाड़ देंगे।" आधी रात को ही फिरंगियों की तोपों से धड़ाम धूम, धड़ाम-धूम करके बड़े-बड़े गोले किले पर बरसने लगे। फिरंगी सेना उत्सव मनाने लगी। कुछ ही क्षणों में सामने की दीवार थरथराने लगी। थोड़ी देर में ऊपर के बुर्ज से मराठे भी धामऽऽ धामऽऽ" धुड़म धामऽऽ प्रत्युत्तर देने लगे। तोपों से तोपों और गोलियों से गोलियों की भिड़न्त शुरू हो गयी। बरसात के पानी के साथ साथ ही आग का भी खेल आरम्भ हुआ। तोपों से निकलने वाली आग, चिनगारियों से सजकर लाल मिट्टी पर गिर रही थी। उन गिरने वाली बूँदों की शोभा निराली थी। किन्तु दूसरी रात मराठों के लिए इतनी भाग्यशाली नहीं थी। फिरंगियों की तोपों के धमाके बहुत जहरीले थे। उन्होंने मराठों की तोपों को व्यर्थ कर दिया। एक दुखद घटना यह घटी कि गढ़ी का ऊपरी हिस्सा बारिश में भीगकर गिर गया। एक तोप भी अपनी जगह से लुढ़क गयी। किसी चट्टान की तरह वह तोप लुढ़कते हुए नीचे गिर गयी। किले के ऊपर बनी मजबूत गढ़ी भी गिर गयी। फिरंगियों में उत्साह का माहौल हो गया। तटबन्दी की दीवार टूटने पर भी कोई मराठा पीछे नहीं हटा। वाइसराय निराश हुआ। पिछले दिन से वह तीन बार भीग चुका था। तीन दिनों से मराठों के साथ मुठभेड़ चल रही थी, पर किले का दरवाजा खुल नहीं पा रहा था। वाइसराय ने दुलबा नाईक की गर्दन पकड़कर उससे पूछा, "बोल दुलबा, किले मे लोग हैं भी तो कितने ?" "सरकार मेरी जानकारी के अनुसार अन्दर सिर्फ दस बारह लोग थे।" अपनी जबान काटते हुए दुलबा ने आगे कहा, "पता नहीं पिछले तीन दिनों से उन्होंने लड़ाई जारी कैसे रखी ? उस कपटी सम्भाजी ने क्या जादू किया है, कुछ पता नहीं चल रहा है?" "जादू नहीं दुलबा, उस सम्भा ने बड़ी कुशलता से कुछ बलवान मराठी जवानों की फौज को तैनात किया है। नहीं तो इस मिट्टी के ढेर में इतनी हिम्मत कहाँ से आती ?" एक बार फिर कांट द आल्होर ने हिम्मत करके अपनी तोपों को ऊपर से नीचे उतार दिया। उसने किले के सामने से तोपों को दागना शुरू किया। सामने वाले बुर्ज में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ने लगीं। स्थिति को समझने के लिए कांट ने कुछ समय के लिए गोलाबारी रोक दी। गन्धक और कीचड़ सने हाथों को कपड़ों से पोंछता हुआ वह बहुत देर तक वहीं पर खड़ा रहा। भीतर से किसी हलचल का संकेत नहीं सम्भाजी :: 467
मिला। फिरंगी सैनिकों का उत्साह बढ़ गया। वे खुशी से नाचने लगे। किले के चारों ओर गहरी खाई खोदी गयी थी। उसके कारण भीतर जाना कठिन था। फिरंगी मजदूरों ने ईंट-पत्थर आदि डालकर उस खाई को पाटने का कार्य आरम्भ किया। देखते ही देखते उस खाई पर रास्ता तैयार हो गया। उस रास्ते से फिरंगी आगे बढ़े फिर भी भीतर की ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला। फिरंगी बन्दरों की तरह सीढ़ियों पर चढ़ने लगे। इसी समय किले के भीतर 'हर हर महादेव' की गर्जना सुनाई दी। अपने हाथ में दुधारी तलवार नचाते हुए येसाजी कंक दहाड़ते हुए शेर की तरह आगे बढ़े। वृद्ध येसाजी के शरीर में कमाल की शक्ति आ गयी थी। येसाजी सीढ़ियों पर चढ़ रहे फिरंगियों को सपासप काटना आरम्भ किया। उनका नौजवान बेटा कृष्णाजी सीढ़ियों को पीछे फेंकने लगा। घबराये हुए फिरंगी खाई में गिरने लगे। किले में छः सौ मराठा सैनिक हाथ में नंगी तलवारें खड़े थे। बाहर जंगले में हुए दो सौ मराठों के हाथ भी युद्ध के लिए आतुर हो रहे थे। भीतर और बाहर दोनों ओर से फिरंगी सेना पर जोरदार आक्रमण हुआ। फोंडा किले पर क़ब्ज़ा करने के लिए फिरंगियों ने हर सम्भव प्रयास किया। पाँच दिन तक लगातार तोपें दागते रहे। तीन तगह से किले की दीवार तोड़ दी। किन्तु मराठा वीरों ने उन्हें अन्दर नहीं आने दिया। तेज बारिश और मराठा सैनिकों के तीव्र प्रतिरोध से वाइसराय पूर्णतया हताश हो गया दुलबा नाईक ने साहब को समझाते हुए बोला, "सरकार, लड़ाई बहुत हो गयी। अब हमें पीछे हटना ही होगा।'' "‘सात समुद्र पार पुर्तगाल से हम यहाँ किसलिए आये हैं? इन मामूली मरगठों से मार खाने?'' वाइसराय पीछे हटने को तैयार नहीं था। पीछे हटने से होने वाला अपमान उसे सत्य नहीं था। एक दिन सात-आठ फिरंगियों को टोली तलवार भाँजते हुए एक बड़ी सुराख से भीतर घुस आयी। अचानक उनकी घुसपैठ से सामने का मराठी दल कमजोर पड़ने लगा। इस स्थिति को कृष्णाजी कंक ने देख लिया। क्रोध से उनका खून खौल उठा। उसी आवेश में वे दीवार से नीचे कूद पड़े। उनके पैर में मोच आ गयी। किन्तु शरीर में समाया हुआ युद्ध-ज्वर उन्हें शान्त बैठने नहीं दे रहा था। अपने दुख रहे पैर को घसीटते हुए वे फिरंगियों पर टूट पड़े। वह अपनी तलवार को चारों ओर घुमा रहे थे। लड़ते लड़ते उनके मुख से झाग आने लगा, फिर भी वे पीछे नहीं हटे। उनके पेट और पीठ पर अनेक गहरे घाव लग गये थे। उनके शरीर से खून की धाराएँ बह रही थीं। उन्होंने दस बारह फिरंगियों को तलवार के घाट उतारा किन्तु सुराख से आने वाले फिरंगियों की संख्या बढ़ती जा रही थी। 468 :: सम्भाजी
कृष्णाजी पर हो रहे आक्रमण पर येसाजी की दृष्टि गयी। उनके मुख से उद्घोष निकला, "बेटा"। फिरंगियों का सामना करने के लिए वे हथेली पर जान लेकर आगे बढ़े। उन पिता-पुत्र की सहायता के लिए लगभग सौ सैनिकों का एक दल वहाँ पहुँच गया। घमासान युद्ध हुआ। मराठों के तेज प्रहार के सामने फिरंगी भागने लगे। येसाजी और उनके बहादुर सैनिकों ने सभी फिरंगियों को बाहर खदेड़ दिया। अनेक घावों से घायल कृष्णाजी गिर पड़े थे। शरीर खून मे लथपथ था और वस्त्र रक्त से भीग गये थे। मराठों ने कृष्णाजी को पालकी में बिठाकर पीछे के डेरे में पहुँचा दिया। वहाँ पर अनेक वैद्य कृष्णाजी के शरीर पर औषधियों का प्रयोग करने लगे। किन्तु घाव इतने गहरे थे कि खून का बहना बन्द ही नहीं हो रहा था। अपने बेटे की यह दशा देखकर येसाजी का हृदय चूर चूर हो रहा था। पालकी पर झुककर येसाजी अपने पुत्र के मुँह पर हाथ फेर रहे थे। उसका धैर्य का प्रयत्न कर रहे थे। किन्तु अभी-अभी समाप्त हुए युद्ध में येसाजी के पैर में गहरा घाव लग गया था। घाव मे बहते खून को सैनिकों ने देख लिया। उस घाव की ओर येसा का ज़रा भी ध्यान नहीं था। सेवकों ने उनके पैर को बाँध दिया। कृष्णाजी का रक्तस्राव रुक नहीं रहा था। इसलिए निश्चित किया गया कि पीछे बांदा भेज दिया जाय। येसाजी को समझाते हुए मानाजी मोरे ने कहा, "बाबाजी, आप अपने बच्चे पर ध्यान दीजिए। पालकी के साथ आप भी चले जाइये। यहाँ पर लड़ाई का सब काम हम देख लेंगे।" "ऐसा कैसे हो सकता है मेरे बच्चे? इन फिरंगियों की आँतों को बाहर खींचने का मैंने शम्भूमहाराज को वचन दिया है। मैं युद्धभूमि से हट कैसे सकता हूँ?" दूसरे दिन का सूरज निकला। सवेरे सवेरे रणभूमि कुछ शान्त रही। अपमान के बोध से वाइसराय बन्दर की तरह नाच रहा था। एक बड़ी टक्कर देकर किले तबाह कर देने का उसने निश्चय किया था। इसके लिए फिरंगियों ने तट के बाहर ऊँची ऊँची सीढ़ियाँ इकट्ठी करनी आरम्भ कर दी थीं। कमर में डोर से सामान बाँधकर फिरंगी सैनिक तैयार हो गये। आगे की बहादुरी दिखाने के उत्साह में वे अपनी जगह पर ही भेड़ की तरह नाचने लगे। उसी समय नदी की ओर नारियल और सुपारी के वनों में किसी भयंकर तूफान के आने का एहसास हुआ। 'हर हर महादेव' 'शिवाजी महाराज की जय' जैसे नारों से आकाश गूँज उठा। उसके बाद दोनों में शोरगुल शुरू हुआ। किले के अन्दर किले के भीतर से 'आयेऽऽ आयेऽऽ, सम्भाजी महाराज आयेऽऽ' महाराज आये महाराज आये हाथ में नंगी तलवारें झंडे की तरह लहराते हुए मराठा सैनिक एक स्वर में चिल्लाने लगे। देखते देखते शम्भू सम्भाजी 469
महाराज की फौज किले के पास पहुँच गयी। इस समाचार से ही फिरंगियों का जोश ठंडा पड़ गया। 'चलो, आगे बढ़ो' की ललकार हुई किन्तु फिरंगियों की दशा भीगी हुई भेड़, बकरियों जैसी हो गयी थी। दूसरी ओर शम्भूराजा के आगमन से प्रत्येक मराठा सैनिक में तूफान की शक्ति आ गयी थी। सम्भाजी महाराज का घोड़ा किले के द्वार पर पहुँच गया। उन्होंने किले के द्वार पर अपने श्वेत अश्व को नचाना आरम्भ किया। उनके पीछे पीछे खंडो बल्लाल का घोड़ा भी मध्यम चाल में उछलते हुए वहीं पर आ गया। लड़ाई की स्थिति समझकर शम्भू महाराज ने अपने आठ सौ सैनिकों में से सौ सैनिक किले के चारों ओर लगा दिए। कांट साहब ने चिल्लाते हुए अपने सैनिकों को बन्दूक चलाने के लिए विवश किया। किन्तु युद्ध के लिए मदोन्मत्त मराठों के घोड़े फिरंगियों की गोलियों को जरा भी महत्त्व नहीं दे रहे थे। मराठों का बढ़ता जोश देखकर एक कैप्टन ने वाइसराय के कानों में बोला, "झट से पीछे मुड़ जाएँगे, नहीं तो हमारे पीछे सम्भाजी के सैनिक नदी में उतर जाएँगे। नदी में फँसकर हमारी मौत होगी। द पाथ ऑफ रिट्रीट बिल बी कम्प्लीटली लास्ट।" वाइसराय ने अभी तक हिम्मत नहीं हारी थी। किन्तु उसकी सेना का साहस छूट चुका था। भाग्य ही उसका साथ नहीं दे रहा था। उसने अपने आँसुओं को रोकते हुए सेना को पीछे मुड़ने का आदेश दे दिया। आदेश मिलते ही पिछले दस दिनों से बारिश की मार और मराठों के तीव्र प्रतिरोध से जर्जर फिरंगी जान बचाकर पीछे भागने लगे। फिरंगियों की बची हुई फौज दूसरे दिन दुर्भाट की खाड़ी के पास पहुँच गयी। आगे की पहाड़ियों पर मराठों का एक दल छुपकर बैठा था। बुरी तरह अपमानित वाइसराय कांट में एक बार फिर 'वीरत्व जागृत हुआ। उसने पहाड़ी पर छिपी मराठों की सेना को समाप्त कर देने का आदेश दिया। पराजय स्वीकारने का बहाना बनाकर मराठों का दल पीछे हट गया। उन्होंने फिरंगियों को ठीक जगह पर सुविधा से आने दिया और फिर एकाएक उन पर टूट पड़े। फिरंगियों ने गोलियाँ दागनी शुरू कीं किन्तु मराठों ने उन्हें अपनी ढालों पर रोका। कभी घोड़े की आड़ से चकमा देकर उन पर आक्रमण किया। थोड़ी ही देर में फिरंगी सैनिक घोड़ों की टापों के नीचे कुचलकर मरने लगे। लड़ाई हार जाने पर भी वाइसराय का जोश कम नहीं हुआ था। एक मराठा वीर आगे बढ़कर अपनी धारदार तलवार से कांट साहब के सिर पर वार किया। यद्यपि तलवार वाइसराय के चमड़े के कोट से नीचे सरक गयी फिर भी तलवार की तेज नोंक उनकी पसलियों में घुस ही गयी। इस प्रकार एक बार नहीं दो बार कांट अपने भाग्य से बच गये। बचे हुए सौ-सवा सौ फिरंगियों ने अपनी जान बचाने के लिए मांडवी नदी का सहारा लिया। जिन्हें तैरने का अभ्यास नहीं था वे डूब गये। 170 सम्भाजी
जिन्हें तैरना आता था वे घबराकर कीचड़ में धँस गये। जो कुछ बचकर बाहर आये उन्हें कांट ने लाठी से पीटना शुरू किया। उन्होंने फिर से युद्ध में लौटने का असफल प्रयास किया। लड़ाई हाथ से छूट गयी थी। लाल चमड़ी का वाइसराय कीचड़ और मिट्टी में बुरी तरह सन गया था। आँसुओं से उसकी आँखों में बाढ़ आ गयी थी। वाइसराय की तीन हजार की सेना को सम्भाजी महाराज के वीरों ने विनष्ट कर दिया था। बहती हुई मांडवी नदी उसका साक्ष्य दे रही थी। पाँच अभी केवल दस दिन पहले शम्भू महाराज ने फिरंगियों को करारी शिकस्त दी थी। उनके घाव अभी सूखे नहीं थे। वाइसराय की पसलियों का घाव भी अभी भरा नहीं था। फिर भी वह दिखावा कर रहा था कि फिरंगियों का साम्राज्य किस प्रकार अजेय है। इस प्रदर्शन के लिए उसने 25 अक्टूबर, 1683 की रात को चुना। फिरंगियों के इतिहास में इस दिन का बड़ा महत्त्व था। कुछ दशकों पूर्व इसी तिथि को उन्होंने गोवा पर अधिकार किया था। इस शुभ दिन पर पणजी नगर में विजयोत्सव मनाने का सरकारी आदेश दिया गया था। उसी रात राजभवन में शहर के अमीर उमराओं के मनोरंजन के लिए नाच गाने का आयोजन किया गया था। यद्यपि यह सब दिखावा हो रहा था परन्तु कांट दी आल्होर मन ही मन बहुत डर रहा था। पहले उसे मराठों की वीरता और उनकी युद्ध पद्धति का पूर्ण ज्ञान नहीं था। साथ ही उसे अपनी फौजों पर अत्यधिक विश्वास था। एक और बड़ी बात हो गयी थी। शहजादा अकबर का एक वकील अपने मालिक के लिए एक जहाज की माँग करके चला गया था। इस चालाक वकील ने जाते जाते यह सलाह भी दे दी कि, "सम्भाजी की फौज में सभी भगोड़े सिपाहियों का ही जमघट है। उसे अधिक महत्त्व देने की आवश्यकता नहीं है।" कांट अनुभवी और शातिर दिमाग वाला था। इससे पहले उसने स्पेन की लड़ाई में अपनी तलवार का करिश्मा दिखाया था। वहाँ आने से पहले किसी मंगोल नामक स्थान पर उसने गर्वनर का कार्यभार भी सँभाला था। पणजी नगर के चारों ओर पत्थरों से बनी रक्षा दीवार थी। जगह जगह पर मजबूत बुर्ज बने थे। उसके पास गोला बारूद का बड़ा भंडार था। नदी के पास आग्वाद, मूरगाव, काबू रेश द सम्भाजी . 471
मागोश जैसे मजबूत किले भी थे। फिर भी मराठों के हाथ उसकी जो दुर्दशा हुई थी। कोंडा में मराठों ने उसका जो हाल किया था उससे कांट अन्दर ही अन्दर टूटता जा रहा था। वाइसराय जितना कुशल प्रशासक था उतना ही चालाक भी। लाभ की बातों का वह स्वयं निर्णय लेता था। कहीं पर हानि की सम्भावना होती थी तो गोवा के राज्य सलाहकार की सहायता लेता था। कल रात को उसने गोवा के अमीर उमराओं अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की एक बैठक किले में आयोजित की थी। इस बैठक में उसने लड़ाई के खर्च के लिए लोगों से तीन लाख अशर्फियों की माँग की थी। बड़े मीठे स्वर और व्याकुल भाव से उसने कहा- "सम्भाजी सेना ने हमारे राज्य में चारों ओर उपद्रव मचा रखा है। उसकी अश्वसेना और थल सेना उत्तर में बसई, दमण, रेवदांडा से लेकर गोवा के पास इस्तेहांव, साष्टी से बार देश तक लूटमार मचा रखी है। हमारे पास पर्याप्त जनशक्ति नहीं है। बार-बार प्रार्थना करने पर भी पुर्तगाल से कोई सहायता नहीं आ रही है। औरंगजेब जैसा कोई मित्र हमारी सहायता करेगा, इसकी भी कोई सम्भावना नहीं दिख रही है। हमारे कुछ फिरंगी सैनिक बड़ी कठिनाई से किलों की रक्षा कर रहे हैं। अपने राज्य को बचाये रखना है तो सेना, शस्त्र और वस्त्र पर धन खर्च करना होगा। इसलिए कृपा करके हमारी सहायता कीजिए।" उस रात बहुत सारा धन एकत्र हुआ। राज्य सलाहकार मंडल ने निर्णय लेकर लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा, "कांट सर के लिए सेना सम्भव हो सके तैयार करो। गोवा के कैदखाने के कैदियों को मुक्त करके उनके हाथों में बन्दूकें पकड़ाओ मराठों के घोड़े मांडवी नदी के पानी में उतरने न पाएँ।" उस रात गुप्तचरों ने समाचार दिया था कि आसपास के जंगलों में कुछ मराठा घुड़सवार छुपते-छुपाते देखे गये हैं। इस खबर से कांट बहुत चिन्तित था। जब नगर में उत्सव चल रहा था, उसी समय गोवा के उत्तर में केवल दो मील की दूरी पर, पूर्वोत्तर दिशा में एक अलग नाटक चल रहा था। पुराने गोवा के उत्तर में मांडवी नदी की दो धारायें बन जाती हैं। उसकी एक धारा के किनारे जुबे द्वीप पर पुर्तगालियों का इस्तेहांव किला था। किले की तटबन्दी प्राचीर ऊँची और बहुत मजबूत थी। पिछली रात से ही शम्भूराजा की फौज आसपास की झाड़ियों, नारियल-सुपारी के बगीचों में छुपकर बैठी थी। घोड़े पर बैठे हुए शम्भू महाराज किले की तटबन्दी की ओर बड़ी उत्सुकता से आँखें फाड़कर देख रहे थे। "महाराज अभी कुछ ही दिन पहले फोंडा किले पर हुई मुठभेड़ में हमने फिरंगियों को दिन में ही तारे दिखा दिये थे। फिर भी उन्हें अकल नहीं आयी ?" 472 :: सम्भाजी
खंडो बल्लाल ने पूछा। “उन्हें हमसे क्या सीखना है? वह तो वे स्वयं निश्चित करेंगे। किन्तु खंडोबा, हाल ही में सूरत से अनाज से लदे कई जहाज गोवा में उतार गये हैं। फिरंगियों की रसद पर मुगल मदमस्त होकर हमारे राज्य को निगल जाना चाहते हैं।” “यह बात तो एकदम सच है, महाराज!” “इसीलिए कह रहा हूँ, इन फिरंगियों पर एक बार और भीषण प्रहार करके इनकी पसलियों को तोड़े बिना, ये चुप नहीं बैठेंगे।” घोड़े की लगाम खींचकर उसकी गर्दन जोर से थपथपाते हुए शम्भू महाराज ने कहा। रात दस बजे समुद्र में भाटा शुरू हुआ। मांडवी का पाट खुल रहा था। उसी का लाभ उठाते हुए शम्भू महाराज तूफान के वेग से घोड़े पर आगे बढ़े। नदी पार करते समय मराठा दल बहुत सावधान था। किसी को कानोंकान मालूम न पड़ सके, इसलिए वे दबे पाँव चल रहे थे। किसी के हाथ में मामूली मशाल तक न थी। नदी के किनारे शम्भू महाराज अपने घोड़े को दुलारते हुए खड़े थे। शम्भू महाराज ने खंडो बल्लाल को आगे बढ़ने का संकेत किया। उसी समय चालीस मराठा घुड़सवार सावधानी से नदी में उतर पड़े। नदी पार करके उन्होंने मध्य रात्रि में ही इस्तेहांव किले को घेर लिया। किले की तटबन्दी ऊँची थी, उस पर चढ़ना बहुत कठिन था। किन्तु मराठा वीर उन पर सहसा टूट पड़े। खंडो बल्लाल की तलवार कलम की तरह तेजी से चलने लगी। फिरंगियों के सिर कटने लगे। आधे घंटे के भीतर ही मराठा वीरों ने किले पर अधिकार कर लिया। खंडो बल्लाल के दल ने किले की एक तोप को दाग दिया। उसकी धुडुमधामऽऽ, धुडुमधाम आवाज सुनकर शम्भूराज प्रसन्न हो गये। विजय का संकेत मिलते ही घने जंगलों में बाहर छुपी मराठा फौज ने उद्घोष किया। तटबन्दी से तोपों की तेज आवाज और उसके साथ 'हर हर महादेव' की गर्जना से गोवा के भीतर हाहाकार मच गया। जगह-जगह पर उत्सव के लिए एकत्र हुए पादरी, ईसाई जिधर से भी रास्ता मिला भागने लगे। तोपों की आवाज से जो सोये हुए थे, वे जग गये। 'आ गये आ गये ..मराठों ने गोवा पर आक्रमण कर दिया है।'-ऐसा चिल्लाते हुए फिरंगी अँधेरे में इधर-उधर टकराने और गिरने लगे। गोवा का हृदय भय से थर्रा उठा। समुद्र तट की सफेद बालू भी भय से काँपने लगी। खाड़ी से बहने वाली हवा शान्त हो गये थी, समुद्री लहरों का नर्तन थम गया था। आस-पास के पेड़-पौधे भेड़-बकरियों की तरह गुमसुम खड़े थे। खतरे का संकेत देने वाली चर्च की घंटियाँ बजने लगीं, नगाड़े भी बजने लगे। सम्भाजी :: 473
फिरंगी अत्यन्त भयभीत होकर चर्चों में दबी जबान से यीसू का नाम जपने लगे। शहर में घरों की खिड़कियाँ-दरवाजे बन्द होने लगे। हाथों में शस्त्र लिए कुछ लोग शहर के तट की ओर दौड़ पड़े। इनमें कांट द आल्होर सबसे आगे था! 'सर थोड़ा धीरज रखें' ऐसा उसके सहयोगी कह रहे थे। किन्तु एक दिन में दूसरा किला भी मराठों के अधिकार में चले जाने से वाइसराय पागल हो उठा। दूसरे दिन सवेरे- सवेरे अपने सहयोगियों के साथ-साथ शान्त इस्तेहांव के किले की तटबन्दी से भिड़ गया। फिरंगियों की डेढ़ सौ सैनिकों की टुकड़ी ने किले को घेरने का प्रयास किया। उसी समय शम्भू महाराज के नेतृत्व में मराठा सैनिक 'हर हर महादेव' की गर्जना के साथ फिरंगियों पर टूट पड़े। उनका जोश और आवेश ऐसा था कि उनके घोड़े को देखते ही फिरंगी भागने लगे। भागकर मांडवी नदी में कूदने लगे। मराठों का एक तीव्रगामी दल कांट आल्होर का पीछा करते हुए उसके पास पहुँच गया। उनकी नंगी तलवारें देखकर कांट के पैरों के तले की जमीन खिसकने लगी। इसी बीच उसके कुछ घुड़सवार आकर उसे बचाकर लेकर भागे। मांडवी के पानी में बाढ़ आ रही थी। दोनों किनारों पर पानी चढ़ रहा था। किन्तु मराठा वीर फिरंगियों का पीछा करना नहीं छोड़ रहे थे। मराठा वीरों को प्रोत्साहित करते हुए शम्भूमहाराज अपना घोड़ा आगे बढ़ा रहे थे। 'काटो-काटो, मारो-मारो' की गर्जना करते हुए वे मांडवी के बढ़ते रूप को निहार रहे थे। फिरंगी घुड़सवार वाइसराय को खींचते हुए पानी के अन्दर लिए जा रहे थे। बाद में कुछ ऐसी भाग-दौड़ शुरू हुई कि हर फिरंगी अपने शस्त्रों वस्त्रों की चिन्ता किये बिना अपने प्राणों को बचाने में लग गया। सभी फिरंगी नदी की ओर भागे। अनेक फिरंगी कीचड़ में फँस गये। उनमें से अनेक मराठों के बाणों और गोलियों के शिकार हो गये। कुछ पानी में डूबकर मर गये। जैसे मधुमक्खियों ने उनका पीछा करके बुरी तरह काटना शुरू किया हो। उसी तरह मराठों ने फिरंगियों को सताना आरम्भ किया। वाइसराय का भाग्य अच्छा था। उसे एक छोटी किश्ती का सहारा मिल गया। उस छोटी नाव में बैठकर भय से काँपता हुआ वाइसराय आधी नदी को पार कर चुका था। उसी समय मांडवी के दूसरे तट पर पहुँचे कुछ फिरंगी पानी से लबालब भरे बाँध को काटने लगे। परिणामस्वरूप नदी का पानी वेग से बढ़ने लगा। पानी से उठने वाली खलखलाहट की आवाज बाहर भी सुनी जा रही थी। पानी बढ़ता जा रहा था। शम्भूराजा निराश भाव से वाइसराय की आगे बढ़ती नाव को देख रहे थे। शिकार हाथ से निकला जा रहा था। शम्भूराजा को जीवित रूप में बादशाह औरंगजेब के हवाले करने की योजना बनाने वाला शत्रु उन्हें चकमा देकर भाग रहा था। शम्भू महाराज का मन उद्विग्न होने लगा। उनकी दृष्टि नदी के उस ओर गोवा पर पड़ी। 474 :: सम्भाजी
वहाँ के चर्चों की ऊँची लाल आकृतियाँ, सुन्दर कमानें शम्भू महाराज के वीर हृदय को पुकारने लगीं। फिरंगी भीतर से टूट चुके थे। आगे बढ़कर गोवा पर अधिकार करने का यही सुअवसर था। गोवा हिन्दुस्तान के विदेश व्यापार की कुंजी थी। यह कुंजी कई बार शिवाजी महाराज के हाथ से निकल चुकी थी। इस अवसर को खोना वस्तुतः मूर्खता ही कही जाती। नदी के एक तट पर महाराज खड़े थे। उनके हाथ युद्ध के लिए बेचैन हो रहे थे। वीरत्व के आवेश से हृदय की धड़कन बढ़ गयी थी। अपनी सबल हथेली से उन्होंने घोड़े का कन्धा थपथपाया। घोड़े के एड़ लगाकर उन्होंने गर्जना की "चलो।" घोड़े के मुँह में लगाम के काँटे चुभने लगे। घोड़ा जोर-जोर से हिनहिनाने लगा। उसने सामने का भयंकर जल प्रवाह देख लिया था। इसलिए वह किनारे पर ही खड़ा हो गया था। दूसरे क्षण महाराज ने उसके पुट्ठे पर प्रहार किया। लगाम को उन्होंने इतने जोर से खींचा की घोड़े के मुख को गहरा आघात लगा और वह कराह उठा। उसे एक प्राणान्तक छींक आयी। अपने मालिक के आदेश का पालन करने के लिए वह बहादुर अश्व पानी में कूद पड़ा। पानी की पर्वताकार लहरों में घोड़े ने प्रवेश किया। पानी इतना अधिक और वेगवान था कि घोड़े का पैर टिकना असम्भव हो गया। पैर टिकते नहीं थे और ऊपर उड़ने के लिए पंख तो थे नहीं। तेज लहरों के कारण उसका तैरना भी कठिन हो गया। फिर भी शम्भू महाराज ने घोड़े को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने अपने दोनों पैरों से घोड़े को दबाकर रखा था। उस पर जोर जोर से प्रहार करते हुए 'चल चल' की गर्जना कर रहे थे। परन्तु पानी के बढ़ते वेगवान प्रवाह के आगे घोड़े की एक न चल पायी। घोड़े की नाक में पानी घुसने लगा। ऊँची ऊँची लहरों के तेज आघात भी उसे झेलने पड़ रहे थे। जैसे कोई सूखी लकड़ी पानी के बहाव में उलट पुलट होती है उसी प्रकार वह घोड़ा भी पानी में पलटी मारकर एक ओर झुक गया। शम्भू महाराज अपने को घोड़े से अलग करने का प्रयास करने लगे। वे हाथ-पाँव मारकर ऊपर आते थे और उसी वेग से गोता लगा लेते थे। किनारे पर खड़े सैनिक यह दृश्य देखकर जोर जोर से चिल्ला रहे थे। शम्भूमहाराज का दुर्भाग्य यह था कि उनका एक पैर रिकेब में फँस गया था। किनारे पर हाहाकार मच गया। भीड़ से आगे आकर खंडो बल्लाल ने यह दृश्य देखा। मराठों के परमप्रिय, शिवपुत्र और रामगढ़ के राजेश्वर को काल उनकी आँखों के सामने से लिए जा रहा था। यह दृश्य देखकर खंडोजी की धमनियों में प्रवाहित स्वामिभक्ति का खून खौल पड़ा—'महाराज, महाराज, शम्भूमहाराज' चिल्लाते हुए अपने पाखर घोड़े के सम्भाजी · 475
साथ वे नदी के कूद पड़े। जब उनके घोड़े के भी पैर उखड़ गये तो खंडोजी ने पानी में छलाँग लगा दी। पानी में रास्ता बनाते हुए खंडोजी महाराज की ओर बढ़ रहे थे। इस समय तक महाराज ने कई गोते खा लिए थे। वे अव्वल दर्जे के तैराक थे। शेर से भी लड़ जाने की उनमें शक्ति थी। किन्तु उनका घोड़ा अर्धमृत अवस्था में तैर रहा था और महराज का पैर रिकेब में फँस गया था। मुँह और नाक में अनेक बार पानी चले जाने के कारण उनकी आँखें सफेद हो चुकी थीं। महाराज ने खंडोजी को जोश के साथ अपनी ओर बढ़ते देख लिया। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "अरे खंडो, रिकेब की डोर काट दो उसमें मेरा पैर अटक गया है। खंडोजी ने तत्काल कमर से छुरी निकाली और उछलकर आगे बढ़े। पानी में डूबकर रिकेब की डोर काटते हुए उन्होंने भी दो-तीन गोते लगाए। सौभाग्य से सफलता हाथ लगी। खंडोजी ने महाराज को सहारा दिया। लहरों का सामना करते हुए खंडोजी के घोड़े की लगाम का सहारा लेकर बड़ी कठिनाई से दोनों किनारे पहुँचे। शम्भूमहाराज और खंडोजी अत्यधिक थकी हुई अवस्था में किनारे की बालू तक पहुँचे और शरीर से टपकते पानी के साथ वहीं बैठ गये। बहुत देर तक उनकी साँसें तेजी से चलती रहीं। पानी के भीतर चल रहे उस युद्ध को देखकर सभी घुड़सवार और घोड़े भी सकते में आ गये थे। यहाँ तक कि पंछी भी अपने पंखों को समेटकरु नीड़ों में छुप गये थे। मराठों के अधिकार में आया सांत इस्तेहांव का किला रात की शीतल हवाओं से भरे अँधेरे में गुमसुम खड़ा था। क़िले में शम्भूमहाराज और उनके साथी रुके हुए थे। बीच के आँगन में कुछ परिचारकों ने आग जला रखी थी। रायप्पा ने आग में बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ डाल रखी थीं। आग में लकड़ी रह-रह कर धधक उठती थी। उसका गेरूआ प्रकाश अपनी ऊष्णता के साथ चारों ओर फैल रहा था। गरम और कशीदाकारी की हुई शाल लपेटे शम्भू महाराज आग के पास बैठे थे। उनके साथ ही कवि कलश, जोत्याजी केसकर आदि भी थे किन्तु उन्होंने खंडोजी बल्लाल को अपने बहुत करीब बैठाया था। समुद्र के खारे पानी में गोते खाते हुए अनेक बार उनके मुँह और नाक में पानी गया था। परिणामस्वरूप उनका सिर भारी हो रहा था। आग और ऊष्णता की उन्हें अत्यधिक आवश्यकता थी। महाराज ने वहीं पर भोजन ग्रहण किया। उनके साथियों का भोजन भी हो चुका था। शम्भू महाराज ने उठकर खंडो बल्लाल का मस्तक अपनी गोद में ले लिया। उसकी पीठ पर प्यार की थपकी देते हुए बोले- "खंडोबा आज मराठों का राजकलश पानी में नहीं समुद्र के तल में पहुँच गया था। अपने प्राणों की चिन्ता न करते हुए आपने पानी में छलाँग लगाई। आपके 476 :: सम्भाजी