छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
दो काजियों का जत्था मिलकर चला गया। अगले तीन महीने तक बीजापुर का घेरा चलता रहा। बादशाह ने बड़ी मेहनत से नगर के किनारे की खाई को भर दिया। वर्षा शुरू हो गयी थी। शहर में अकाल कहर ढाने लगा। तटबन्दी के भीतर रसद समाप्त हो गयी थी। इसके पहले रात-बेरात बीजापुर के घोड़े बाहर झटके से निकलते थे और कहीं न कहीं से रसद ले आते थे। किन्तु अब बादशाह ने घेरे पर कड़ी नजर रखी थी। पहले पन्हाला से कवि कलश और हंबीरराव के घोड़े बीजापुर की मदद के लिए दौड़े आते थे। किन्तु अब कृष्णा नदी में बाढ़ आ जाने के कारण वह सम्भव नहीं था। मिरज-अथणी से कोल्हापुर जाने के रास्ते बन्द हो गये थे। औरंगजेब को अपनी सल्तनत पन्द्रह बीस सूबों में से कहीं न कहीं से रसद मिल सकती थी। किन्तु दक्षिण की तीनों शक्तियों के बुरे दिन आये थे। अन्त में बादशाह ने खाई पार कर अपने घोड़े बीजापुर में भेज दिये। अब तक वह शहर श्मशान बन गया था। 26 सितम्बर 1686 को सोलह वर्षीय सुकुमार सिकन्दर ने आत्मसमर्पण कर दिया। आदिलशाह के कैद होते ही बीजापुर में शोक की लहर फैल गयी। घोर विषाद के वातावरण में भी कुछ हिम्मतबाज अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। आदिलशाह के आत्मसमर्पण के समय बादशाह की आँख सर्जाखान पर लगी हुई थी। डूबते जहाज को छोड़कर मोटे चूहे ने उछाल मारकर दूसरी ओर शरण ले ली थी। सर्जाखान मुगलों का बड़ा मनसबदार बन गया था। औरंगजेब का महत्त्वाकांक्षी मन बीजापुर में रुका नहीं। वह अपनी फौज लेकर पुनः गोलकुंडा की ओर चला आया। वहाँ का किला, वहाँ की तटबन्दी और खाई बहुत मजबूत थे। द्रव्य से उनके तलघर भरे पड़े थे। तानाशाह अब भी शरणागत नहीं हो रहा था। बादशाह ने उसे गद्दार घोषित किया और गोलकुंडा पर घेरा डाल दिया। गोलकुंडा के घेरे के समय बादशाह को धूप, वर्षा और ठंडी हवाओं का सामना करना पड़ रहा था। अड़सठ वर्ष के इस बूढ़े के लिए एक हल्का झूलता सिंहासन बनाया गया था। कहार उसे कन्धे पर रखकर देर सबेर घुमाते थे। शाहंशाह अपनी फौज को आदेश देता था। एक बार तोप का गोला लगने से उसके अंगरक्षक का हाथ टूट गया। औरंगजेब से सिर्फ चार हाथ की दूरी से मौत आकर चली गयी थी। 552 . सम्भाजी
शहंशाह ने मुकर्रबखान जैसे हैदराबादी सरदार को फोड़ लिया। अबदुल्ला फन्नी नाम के एक अधिकारी ने सवेरे तीन बजे किले का द्वार खोल दिया। कपटनीति और दगाबाजी की जीत हुई। 29 सितम्बर 1687 को गोलकुंडा पराजित हुआ। वहाँ बादशाह को सात करोड़ रुपये का खजाना मिला। सालाना तीन करोड़ आय का प्रदेश मिला। केवल पचास हजार रुपये की तनख्वाह पर सिकन्दर आदिलशाह और कुतुबशाह को देवगिरि के किले के बन्दीखाने में भेज दिया गया। जिस समय हैदराबाद जीतकर बादशाह बीजापुर की ओर लौट रहा था, उस समय विजय की प्रसन्नता के साथ उसका एक विशिष्ट विषाद से भरा हुआ था। कुछ महीने पहले हैदराबाद के घेरे के समय एक घटना घट चुकी थी। इसके पहले शहजादा मुअज्जम के पास शम्भू महाराज के पत्र पकड़े गये थे। किन्तु उस रात को शहजादा आजम के द्वेष के अथवा किसी अन्य कारण से या महत्त्वाकांक्षा की ललक में मुअज्जम ने एक दुस्साहसी कदम उठाया। अपने बाप से बगावत करके उसी रात वह कुतुबशाह से मिलकर लड़ाई की घोषणा करने वाला था। उसे केवल इस बात का डर था कि उसके जाने के बाद उसका बाप उसके बीवी, बच्चों की दुर्गति करके हत्या कर देगा। इसलिए उसने रात में ही अपने बीवी बच्चों को लालबारी से लड़ाई के मैदान में आगे ले गया। वहाँ से छलाँग लगाना सरल था। मुअज्जम के इन कारनामों से बादशाह को बगावत का शक हुआ। उसने तुरन्त सेना भेजकर शहजादे मुअज्जम और उसके बीवी, बच्चों को हमेशा के लिए गिरफ्तार कर लिया। वृद्ध बादशाह का काफिला आगे निकल रहा था। उसकी दृष्टि पश्चिम की ओर न जाकर बार-बार सह्याद्रि की ओर घूम रही थी। पिछले सात वर्षों से उसे सम्भाजी मिल नहीं पा रहे थे। अविजित रामशेज और हैवतीगढ़ आज भी अबाधित थे। जो कुछ पाया उसकी अपेक्षा जो खोया उसका बादशाह को बड़ा दुख था। बादशाह का स्वाभिमानी मन बहुत सन्तप्त हो रहा था। प्रवास के समय ही असदखान बादशाह के समीप आकर कहने लगा, "बादशाह सलामत, कुछ राहत देने वाली खबर है।" "कौन-सी?" "अपना प्रिय शहजादा अकबर ईरान चला गया। सम्भा ने उसकी मदद की। राजापुर के बन्दरगाह में उन्होंने एक निजी जहाज तैयार किया। अन्ततः वह चला गया।" "कहाँ, ईरान को?" "जी मेरे मालिक।" सम्भाजी :: 553
बादशाह एक विषंड हँसी हँसा। कभी आसमान की ओर तो कभी धरती की ओर देखते हुए उसने कहा, "किसकी किस्मत और किसकी बदकिस्मत किस जंगल या किस पहाड़ में लिखी है? इसे तो खुदा ही जाने।" तीन एक दिन हंबीरराव ने महाराज से महज ही कहा, "शम्भू महाराज, स्वराज्य की स्थिति बिगड़ती जा रही है। जागीरों की लालच में अच्छे-अच्छे लोगों का दिमाग बदलता जा रहा है। इसको रोका भी जाये तो कैसे?" "मामा साहब, समय ही बहुत कठिन आ गया है।" "परन्तु महाराज, जैसा आपने कहा, इस कठिन समय को निभाना पड़ेगा। इसके लिए जैसे वह औरंगजेब जागीरें बाँट रहा है, वैसे हम भी नकली कागजातों पर कुछ लोगों को जागीरें दे दें।" "ऐसा कैसे हो सकता है, हंबीरमामा ?" हंबीरराव के सुझाव पर शम्भू महाराज अत्यन्त गम्भीर होकर बोले, "जागीरों को बाँटना पिताजी के द्वारा दिए गये आदेशों के विरुद्ध है। पिताजी कहते थे देवताओं को भी जागीर मत दो। उन्हें भ्रष्ट न करो।" शम्भू महाराज ने विनोद में आगे कहा, "मामा साहब आपको जागीर की आशा कब से लगी ?" विनोद के भाव को न समझने के कारण यह सीधा सा विनोदी प्रश्न हंबीरराव के कलेजे में तीर की तरह चुभ गया। कुछ क्षणों के लिए उन्हें कुछ समझ में नहीं आया। फिर भी उन्होंने हँसते हुए कहा, "शम्भू महाराज, आपने अपने मामा को क्या समझा है ?" वह विनोद का प्रसंग वहीं पर समाप्त हो गया। किन्तु हंबीरराव के भीतर शम्भू महाराज का प्रश्न चुभता रहा। उनका चेहरा अपमान के बोध से फीका पड़ गया। मानहानि के बोध से उनका कलेजा टूटने लगा। उन्होंने कहा, "शम्भू महाराज इस हंबीरराव को जागीर की जरूरत ही क्या है ? यदि मुझे सत्ता या राजपद की भूख होती तो अपने सगे भांजे राजाराम को रायगढ़ के सिंहासन पर बिठाकर आधे राज्य का मालिक बन गया होता। राजाराम को राजा बनाने के लिए हमारे बुजुर्ग 554 सम्भाजी
अधिकारी बेताब हो रहे थे। मुझे तो उसमें कोई कठिनाई नहीं थी। ' ' ' 'हंबीरमामा! कृपया इस बात को इतनी गम्भीरता से न लें मैंने तो विनोद में कहा था।' ' शम्भू महाराज ने उन्हें मनाने के स्वर में कहा। शम्भू महाराज मनाने की पूरी कोशिश कर रहे थे किन्तु सेनापति हंबीरमामा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। उन्होंने कहा, ' 'हमारी वफादारी की परीक्षा लेने औरंगजेब के दूत भी आये थे। हमने उनकी दाढ़ी मूँछें मुड़वाकर उन्हें भगा दिया। फिर भी आपने आज हमारी ऐसी परीक्षा ली।' ' हंबीरराव का स्वाभिमानी मन विनोद में किये गये आरोप को सह नहीं पा रहा था। वे आवेश में ही वहाँ से उठकर चले गये। इस प्रसंग से येसूबाई भी आश्चर्यचकित रह गयीं। शम्भू महाराज के लिए अब वहाँ रुक पाना सम्भव नहीं हो रहा था। वह भी उठकर अपने कक्ष में चले गये। इस छोटे से वाद विवाद से रायगढ़ का रंग ही बदल गया। अपने कक्ष में उदास बैठे शम्भू महाराज के पास येसूबाई गयीं। उन्होंने शान्त स्वर में बड़ी सावधानी से कहा, ' 'जो भी हुआ अच्छा नहीं है। राजा और सेनापति के बीच अनबन से सल्तनत का विनाश हो जाता है। इस घटना की भनक औरंगजेब को लगने की देर है। आप दोनों में दरार पैदा करने के लिए वह जी जान से कोशिश करेगा।' ' ' 'आखिर मैंने ऐसा क्या कह दिया था, युवराज्ञी?' ' ' 'महाराज, हंबीरमामा ने जो कुछ कहा वह भी गलत नहीं था।' ' येसूबाई ने बड़े विवेक से कहा, ' 'चलिए उठिए उन्हें सम्मान के साथ पुनः बुलाकर ले आयें। आप उम्र में छोटे हैं। उनकी मान मर्यादा की रक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।' ' ' 'हम तो बच्चे हैं। हम क्यों जाएँ उनके पास? वे बड़े हैं इसलिए उन्हें ही हमें मनाने आना चाहिए।' ' इस घटना से उत्पन्न सन्ताप के कारण महाराज ने रात को भोजन में कुछ भी ग्रहण नहीं किया। बिस्तर में आधी रात तक तड़पते रहे। दूसरे दिन देव पूजन भी नहीं कर सके। विगत अनेक वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ था। दोपहर को महारानी के आग्रह के कारण किसी प्रकार आधा प्याला दूध लिया। दूसरी रात महारानी येसूबाई बेचैन हो गयीं। किले पर शीतल हवा चल रही थी। इस छोटी सी घटना को लोगों ने बहुत बड़े झगड़े के रूप में प्रचारित कर दिया था। यह सब कुछ न सह पाने के कारण महारानी जाकर महाराज के सामने खड़ी हो गयीं। वे अपने भीतर का रोष छुपा न सकीं। उन्होंने कहा, ' 'बस, अब बहुत हो चुका। महाराज! आपको पता है? पिछले दो दिनों में मामा ने अन्न का एक दाना सम्भाजी :: 555
ग्रहण नहीं किया है।" शम्भू महाराज झट से उठकर खड़े हो गये। उनका गला भर आया। उन्होंने कहा, "क्या कह रही हो येसू? आपने दोपहर को ही मुझे यह क्यों नहीं बताया? हमारे हंबीरमामा को आप क्या समझती हैं। पिछले पाँच छह वर्षों में पिताजी के पुण्य की छाया और हंबीरमामा का साथ के अतिरिक्त क्या किसी और ने हमारा साथ दिया है?" शम्भू महाराज ने अपने वस्त्र ठीक किये, सेवकों ने जो रत्नाभूषण सामने किये उन्हें पहन लिये। शम्भू महाराज और महारानी दोनों हंबीरमामा के घर जाने के लिए दरवाजे से बाहर निकले। महाराज ने मशाल की रोशनी में देखा तो बाहर मन्द पवन का सेवन करते हंबीरमामा स्वयं खड़े थे। वे स्वयं महाराज से मिलने आये थे। महाराज कुछ पूछें उससे पहले सत्तर वर्ष की आयु पूरा कर चुके, मजबूत कदकाठी वाले हंबीरमामा ने बड़ी व्यग्रता के साथ कहा, "शम्भू बेटे, आपने यह क्या चला रखा है? पिछले दो दिनों से आपने कुछ भोजन ही नहीं लिया।" "मेरी बात जाने दीजिए। परन्तु मामा आपने उपवास क्यों रखा है?" "हम तो पीले पत्ते हैं। हमारी इतनी चिन्ता क्यों करते हैं? आपको तो हिन्दवी स्वराज्य का भविष्य गढ़ना है। हम तो आज हैं, कल हों न हों।" आगे बढ़ते हुए महाराज बोले, "हंबीरमामा, ऐसी अशुभ बात मुँह से न निकालें। आपके न होने की कल्पना मात्र से हमें ऐसा लगता है जैसे हमारे ऊपर पहाड़ टूट पड़ा हो।" बाहर शीतल हवा चल रही थी। राजमहल के बन्द वातावरण में जाने का किसी का मन नहीं हो रहा था। मामा-भांजे साथ-साथ पश्चिम की ओर चलते रहे। कुछ दूरी पर कातीव छोर था और दूसरी ओर हिरकणी बुर्ज। वहीं पर एक समतल पत्थर पर दोनों बैठ गये। पास ही एक पत्थर पर बैठकर येसूबाई दोनों के मनोमिलाप को बड़े कुतूहल से देख रही थीं। आधी रात के समय स्वयं महाराज के बुर्ज पर आने से पहरेदारों में हलचल मच गयी थी। वहीं पर राजमहल से भोजन मँगवाया गया। महाराज और सेनापति ने वहीं पर भोजन किया। चर्चा के दौरान कई बातें निकलीं। हंबीरमामा ने कहा, "हमारे सगे भांजे और जवाई राजाराम को राजा बनाने के लिए राज कर्मचारी हठ कर रहे थे, इसका पता है शम्भू महाराज?" महाराज ने सिर्फ मामा की ओर देखा। "महाराज, उन संकट के दिनों में मैंने आपको शिवाजी के पुत्र के नाते नमन नहीं किया था बल्कि यह मानकर कि आप हमारे शिवाजी के स्वप्नों के सच्चे उत्तराधिकारी हैं इसलिए आपके सामने हमारी गर्दन झुकी थी।" "आपके उन उपकारों को यह हिन्दवी स्वराज्य कभी भी भूल नहीं पाएगा, 556 :: सम्भाजी
हंबीरमामा। किन्तु मुझसे यदि कोई भूल हुई है तो क्षमा करें मामाजी।'' "क्षमा की क्या बात कर रहे हैं शम्भू महाराज? हंबीरराव नाम की इस तलवार को शिवाजी महाराज ने फौलाद की दहकती भट्टी में निर्मित किया है, उसे सजाया सँवारा है। किन्तु चारों ओर उसने रणकौशल दिखाया तो आपके समय में।'' "सच है मामासाहब, कहाँ ब्रह्माणपुर, कहाँ मुर्तजापुर, अकोला, नान्देड़, सोलापुर से अथणी-बीजापुर, कोंकण का घाट हर एक रास्ता। दक्खिन की भूमि पर ऐसी कोई नदी या नाला नहीं होगा जहाँ हंबीरराव मोहिते के घोड़े ने पानी न पिया हो। पर हंबीरमामा आजकल आपको कुछ थकान महसूस होती है क्या?'' "मतलब?'' "मतलब, यदि स्वास्थ्य न ठीक हो तो आप कुछ आराम करें और हमारा मार्गदर्शन करते हुए अपना आशीर्वाद दें।'' रायगढ़ के पश्चिमी छोर की छाती पर पाँव रखते हुए हवा का एक तेज झोंका आया। हंबीरमामा ठठाकर हँसते हुए बोले, "अम्बा भवानी का सेवक जैसे हाथ में मशाल लेकर रात रातभर नाचते हुए जागरण करता है, उसी प्रकार शिवाजी का सेवक यह हंबीरराव युद्धभूमि में तोपों की ताल पर घोड़े नचाने का कार्य करता है।'' "मामासाहब इस सम्भाजी को भी औरंगजेब की तोपों या ढाल, तलवारों से जरा भी भय नहीं लगता। हमें केवल एक बात का भय लगता है—'' "—महाराज?'' "हाँ हंबीरमामा, कभी कभी लगता है कि यह देश सन्तों, महन्तों और बुद्धिमानों का न होकर, बाल बच्चों के नाम जागीरों के कागज-पत्र बनवाने के लिए आतुर जागीरदारों का हो गया है।'' "सच है महाराज, दुनिया में मनुष्य की कोख से बच्चे ही पैदा होते हैं। किन्तु अपने महाराष्ट्र की तरह अपने बाले बच्चों और उत्तराधिकारियों से ऐसा अन्धा प्रेम करने वाले लोग दुनिया में कहीं खोजने पर भी नहीं मिलेंगे।'' शम्भू महाराज ने भारी मन से पूछा "तो मामासाहब क्या किया जाय? निर्णय ले लिया जाय?'' "कौन सा?'' "स्वराज्य के टुकड़े टुकड़े करके सभी जागीरदारों में खैरात बाँट देने का?'' "नहीं, बिलकुल नहीं।'' हंबीरराव ने दृढ़ता से कहा, "शम्भू बेटे! उस औरंगजेब को हमारे कुछ मूर्खों को खुशी खुशी खैरात बाँटने दो किन्तु इस हंबीर और शम्भुराजा की ओर से शिवाजी महाराज के विचारों की हत्या नहीं की जाएगी।'' इस मूक संवाद में सारी रात कैसे बीत गयी पता ही नहीं चला। सम्भाजी 557
चार दुर्गादास राजपूताना के लिए प्रस्थान कर रहे थे। वे महाराज से मिलने के लिए आये। भाव भरे हृदय से दुर्गादास ने शम्भू महाराज से कहा, "शम्भू महाराज, आपने हमारे लिए बहुत किया। आपने जितना किया उसके लिए हम कितना भी धन्यवाद दें, कम ही होगा।" "दुर्गादास, हम भी और अधिक क्या कर सकते हैं? शहजादे का स्वभाव ऐशोआराम का था। किसी भी प्रकार की जागरूकता नहीं थी। थोड़ी भी हिम्मत की होती तो किसी न किसी रास्ते से हम शहजादा अकबर को दिल्ली-आगरा की ओर भेज दिए होते। उसके उधर जाने से बादशाह के दुश्मन अपने आप अकबर के झंडे के नीचे आ जाते। परन्तु क्या किया जाय? वह तो स्वभाव से ही डरपोक। दस-दस बीस-बीस हजार लोगों के सहायक होने पर क्या लाभ हो पाया?" "जाने दें महाराज! आप भी क्या कर सकते हैं? घोड़े की नयी नाल बँधवाने का कार्य लोहार के पास दिया जा सकता है, किन्तु आदमी की रीढ़ की हड्डी बनाने का काम किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। हमारा सात वर्षों का कष्ट, सारा संघर्ष व्यर्थ हो गया।" दुर्गादास ने दुखी स्वर में कहा। "दुर्गादास, एक बात कहूँ?" "आज्ञा हो महाराज।" "अम्बर के राजा रामसिंह ने औरंगजेब के राजाओं के संगठन बनाने के हमारे आवाहन को प्रतिसाद नहीं दिया। फिर भी मैंने हार नहीं मानी। किन्तु मुझे लगता है कि आपके जैसा देशाभिमानी, धर्माभिमानी व्यक्ति हमारे पास रहे। आप किसलिए राजपूताना जा रहे हैं? आप यहीं रहिये। जिस प्रकार कविराज भूषण के रहने से रायगढ़ की शोभा में वृद्धि हुई थी, उसी प्रकार आप जैसे भले व्यक्ति के साथ होने से हमारा विश्वास दृढ़ होगा।" "क्षमा करें महाराज! महाराज जसवन्तसिंह को मरने से पहले मैंने एक वचन दिया था। मैंने कहा था कि अजितसिंह को पाल पोसकर मैं बड़ा करूँगा। उसके अनुसार जोधपुर जाकर वहाँ की राजगद्दी की सेवा करना मेरा कर्तव्य है, महाराज।" 558 :: सम्भाजी
पाँच सवेरे ही बादशाह ने सर्जाखान को बुला लिया। अपनी थकी आवाज में बादशाह ने कहा, "सर्जा हमने बीजापुर की कठिन तटबन्दी तोड़ दी। गोलकुंडा को ध्वस्त कर वहीं की खन्दक में डाल दिया। किन्तु यदि सच कहूँ तो यह कोई बहादुरी का काम नहीं है। एक ही पीड़ा मेरे कलेजे को आज भी जला रही है।" "सम्भाऽऽ!" "बिल्कुल ठीक सर्जाखान बेटे। बुरहानपुर में पाँव रखने से पहले ही हम तुम्हें अपनी सेवा में बुला रहे थे। कोई बात नहीं तुम हमारे पास देर से आये हो, किन्तु दुरुस्त आये हो। हम तुमसे खुश हैं। नहीं तो सर्जाखान आजकल खुशी की कोई बात होती कहाँ है?" "जी बादशाह सलामत!" "तू बीजापुर वालों का सेनापति था। बीजापुर की एक बात की याद है तुमको?" "कौन सी जहाँपनाह ?" "वहाँ के बुर्ज के नीचे बारूद की सुरंग लगाने के लिए गड्ढे खोदे जा रहे थे। किन्तु वहाँ की पथरीली जमीन में हमारे कुदाल फावड़े काम नहीं आ रहे थे। उनकी धारें टूट जाती थीं। तब हमने बगल के गाँव से एक देहाती लोहार को बुलाया। तब उस बुड्ढे लोहार ने हँसते हुए हमें उपदेश दिया, "हुज़ूर, जहाँ का पत्थर तोड़ना हो वहीं की भाथी के बने हथियार का उपयोग करना चाहिए। क्या कुछ समझ में आया?" "हजरत- ?" "उस काफिर सम्भा को समाप्त करने की शक्ति हमारे तीन शहजादों, बाइस पोतों और तीस सरदारों में से किसी में भी नहीं है। उस शैतान का खात्मा तुम्हारे जैसा कोई दक्खिनी बहादुर ही कर सकता है।" बादशाह थोड़ा रुका फिर लम्बी साँस लेकर बोला, "जाओ जल्दी से जल्दी निकलो। जितनी भी फौज और रसद लेना चाहो, ले लो यदि सम्भा की गर्दन काटकर ले आया तो तू नसीब का सिकन्दर बन जाएगा। दक्खिन से बाजे गाजे के साथ तुम्हारा जुलूस हम उत्तर ले जाएँगे। लालकिले में राजसी वस्त्र पहनाकर हम तुम्हारा सम्मान करेंगे।" "जहाँपनाह मैं जरूर कोशिश-" सम्भाजी :: 559
"किन्तु पिछले छह-सात वर्षों के अनुभव से मेरे सिर के बाल-" बादशाह बोलते-बोलते रुक गया। उसने अपने सिर पर हाथ फेरा। सिर पर मुकुट नहीं था। उसके सुनहरे बाल भी विरल हो गये थे। थका हुआ बादशाह बोला, "खैर, सम्भा का जिन्दा मिलना तो बहुत मुश्किल है। किन्तु यदि वह न मिला तो उसका एकाध हाथ या पैर तोड़कर-" "मतलब ?" "उसका एक बड़े से बड़ा किला-जैसे रायगढ़, राजगढ़, पन्हाला या हंबीरगढ़ऽ !" "जरूर, जहाँपनाह जरूर।" कोयना नदी पार कर हंबीरराव की सेना तलबीड पहुँच गयी। अब तक आधी रात बीत चुकी थी। घर में सभी लोग जग रहे थे। लड़ाई पर जाते समय करहाड क्षेत्र से गुजरते हुए हंबीरराव तेज हवा के झोंके की तरह अपने तलबीड के घर पर जाते थे। कुछ घंटे रुककर वे हवा के झोंके की तरह ही निकल जाते थे। यदि घर के लोग रात रुकने का आग्रह करने लगते तो वे कहते, "औरंगजेब को दफन किये बिना हमें पीठ टिकाने की आज्ञा भगवान कहाँ देने वाले हैं?" परन्तु आज वे तन-मन से बहुत देर तक घर पर रुके रहे। उनकी प्यारी बेटी ताराऊ रायगढ़ से मायके आयी थी। अपने मायके में आनन्दित थी। हंबीरराव ने उसके पति राजारामसाहब और महारानी येसूबाई की कुशलक्षेम पूछी। उन्होंने बड़े वात्सल्यभाव से ताराबाई से कहा, "तारूऽ, येसूबाई का बराबर ध्यान रखना। स्वराज्य पर संकट बढ़ने के कारण महाराज चिन्ताग्रस्त हैं। महाराज तनाव में हैं इसलिए येसूबाई भी तनावग्रस्त हैं।" "बाबा, आजकल बड़ी बाईसाहब मुझे अपनी छाया की तरह लिये रहती हैं।" "देख बेटी बराबर ध्यान रखती रहना। यह कभी न भूलना कि तुम शिवाजी महाराज की पुत्रवधू हो।" "उसके साथ ही मैं हंबीरराव की बेटी हूँ। इस बात को मैं कभी भूल नहीं सकती, बाबा।" तारा के यह कहने पर सारा घर ठठाकर हँस पड़ा। आधी रात हो चुकी थी। हंबीरराव और उनके पच्चीस-तीस विशिष्ट साथी भोजन के लिए तैयार हुए। आँगन के मध्य में पत्तलें बिछा दी गयीं। खुली हवा में हंबीरराव सुखपूर्वक भोजन कर रहे थे। इसी समय घर के दरवाजे पर घोड़ों की टाप सुनाई दी। हंबीरराव के कान हिरनों की तरह सावधान हो गये। वे चिन्तित होकर इधर-उधर देखने लगे। हंबीरराव चार ग्रास खा लें इसलिए घर के लोगों ने हरकारे 560 : सम्भाजी
को कुछ समय के लिए रोक लिया। किन्तु समय पूछकर नहीं आता। हंबीरराव ने ऊँची आवाज में पुकारा, "बाहर कौन है? अन्दर आ जाओ।" हरकारा सामने आकर खड़ा हो गया। हंबीरराव ने पूछा, "क्यों रे जानू? क्या खबर है?" "सरकार, अपने देश पर औरंगजेब ने आक्रमण करने के लिए सर्जाखान को भेजा है। "क्याऽऽ?" हंबीरराव ने भोजन छोड़कर हाथ धो लिया। उन्होंने दुपट्टे से हाथ पोंछते हुए खड़े-खड़े ही पूछा, "कहाँ? किस तरफ हैं वे शत्रु?" "वे अभी तलबीड पर नहीं आये हैं। किन्तु दोपहर में उनकी सेना औंधघाट के रहिमतपुर में उतरी थी। सन्ध्या समय वे कृष्णा नदी पार कर रहे थे।" "कितनी सेना है?" "दस-बारह हजार।" "—और दिशा उन्होंने कौन सी पकड़ी है?" "प्रतापगढ़ की ओर जा रहे हैं। खान ने कुछ भी करके दो दिन में प्रतापगढ़ जीतने का बीड़ा उठाया है।" अपने सामने की थाली बगल में सरकाकर सभी उठ गये। सभी शीघ्रता से घर के बाहर निकले। अपने पति को चार ग्रास खाने को भी नहीं मिलता यह सोचकर हंबीरराव की पत्नी को बड़ा दुख हुआ। उन्होंने अपने अश्रुओं को छिपाने का प्रयास किया। किन्तु उनकी ओर देखने का सेनापति के पास समय ही नहीं था। किन्तु घर की देहरी पर शुभेच्छा में हाथ हिलाती प्यारी बेटी खड़ी थी। हंबीरराव ने एक क्षण के लिए घोड़े को रोका, "बोल बेटी, मायके की ओर से तुम्हारे लिए क्या करूँ?" "बाबा कुछ नहीं। दुश्मनों के हाथ में अपने प्रतापगढ़ को न जाने दें। वहीं पर अपनी भवानी का मन्दिर है।" 'हर हर महादेव' की गर्जना के घोड़ों ने अँधेरे की राह पकड़ी। रास्ते में दूसरे हरकारे मिले। उन्होंने बताया कि सर्जाखान की पन्द्रह-सत्रह हजार की फौज सातारा से वाई की ओर बढ़ रही है। हंबीरराव ने अपने सहयोगी नारोजी भोंसले से कहा, "अपनी मुख्य फौज तो अंबा-घाट के नीचे कोंकण में गयी है। यहाँ तो हम यों ही चले आये थे। अब क्या किया जाय? इस तरह के अचानक संकट की तो हमने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।" "सेनापति, कुछ भी करके शत्रु को रोकना चाहिए। यदि उसने प्रतापगढ़ जीत लिया तो हमारी इज्जत का कचरा हो जाएगा।" सम्भाजी :: 561
"ऐसा हम कैसे होने देंगे? औरंगजेब ने भले ही आदिलशाही और कुतुबशाही का खात्मा कर दिया हो, किन्तु लाख कोशिश करने पर भी शम्भू महाराज का एक भी किला पराजित नहीं हुआ।" "इसीलिए हम उसका पीछा करें।" "तब तक शत्रु वाई को पार कर परसणी घाट की घाटी चढ़ने लगेगा। भोसले यदि खिंडी पर उसने अधिकार कर लिया तो उसकी शक्ति दस गुना बढ़ जाएगी।" "तो फिर सेनापति जी किया क्या जाय?" हंबीरराव ने घोड़े की लगाम खींची। एक क्षण के लिए अँधेरे में वसन्तगढ़ के बुर्ज की ओर देखा। दूसरे ही क्षण उन्होंने कहा, "हम रास्ता ही बदल दें। कोयना के किनारे-किनारे, वासोटा किले के किनारे से जंगल का रास्ता पकड़ें। कल सुबह होने से पहले महाबलेश्वर पहुँच जाएँगे। वहाँ से पीछे मुड़ जाएँगे। शत्रु यदि हवा की गति से जाएगा तो भी उसे रास्ते में ही रोकेंगे।" "किन्तु हंबीरराव, यह रास्ता बहुत ही दुर्गम है। आदमियों और घोड़ों दोनों की दुर्गति हो जाएगी।" "मृत्यु के समान आयी इस आपदा को रोकने का दूसरा कोई उपाय नहीं। चलिए, बढ़ाइये घोड़ा। मुड़िये पीछे। हंबीरराव गरजे, "बोलो हर हर महादेवऽऽ।" कोयना नदी के किनारे का रास्ता शुरू हुआ। जंगल में कमर तक उगी घास में घोड़े दौड़ने लगे। विगत अनेक दिनों से हंबीरराव ठीक से सोये न थे। सुख चैन की नींद क्या होती है, इसका उन्हें पता ही न था। हंबीरमामा ने रिकेब से पाँव बाहर निकाल लिया। वे दौड़ते घोड़े पर झुक गये। घोड़े की जीन के साथ हाथ रखकर वे दौड़ते घोड़े पर ही सो गये। उनके घोड़े को भी अपने मालिक की दशा का ज्ञान था। पीठ पर अपने मालिक का ध्यान रखते हुए अपनी गति को बिना कम किये, वह बेजबान जानवर दौड़ रहा था। नींद में ही यह कठिन प्रवास हो रहा था। हंबीरराव की आँखों के सामने पहले के प्रतापगढ़ का दृश्य उभर आया। सजी हुई पालकी में बैठकर शिवाजी महाराज अफजलखान मे मिलने जा रहे थे। खान की दगाबाजी का महाराज द्वारा तत्काल लिया गया बदला। उसी तलहटी में घेरा डालकर सर्जाखान खड़ा था। प्रतापगढ़ के बुर्ज की ओर हँसते हुए देख रहा था। शिवाजी और सम्भाजी का नाम लेकर उपहासपूर्वक हँस रहा था। हंबीरराव अचानक ग्लानिग्रस्त होकर जाग गये। उन्होंने आवेश में घोड़ा दौड़ाया। उन्होंने नारोजी भोसले को सावधान करते हुए कहा, "चलो जल्दी अभी तक कोई मुगल सह्याद्रि का घाट पार करके आया नहीं है। यदि 'पारघाट' पर दुश्मन ने क़ब्ज़ा कर लिया तो गजब हो जाएगा।" 562 :: सम्भाजी
इतना लम्बा सफर हंबीरराव की सेना ने दस-बारह घंटों में तय कर लिया। दूसरे दिन सवेरे ही पूरी सेना महाबलेश्वर पहुँच गयी। शत्रु अभी वहाँ नहीं पहुँचा था, इसकी पक्की जानकारी मिली। सेना वापस मुड़कर घौड रास्ते से सीधे गुरेघर की चढ़ाई पार कर पाँचगणी पहुँच गयी। वहाँ पर सेना ने दोपहर का कुछ विश्राम किया। पाँचगणी से निकलते-निकलते अँधेरा घिर आया था। इस जंगली प्रदेश का चप्पा-चप्पा नारोजी भोसले को पता था। सर्जाखान की आधी फौज पाँचगणी का घाट पार कर ऊपर आ गयी थी। उसने रात बिताने के लिए घाट की एक खोह का आश्रय लिया। पाँचगणी की भोर की गुलाबी ठंडक में सर्जाखान सोया हुआ था। उसी समय 'हर हर महादेव' का शोर उठा। हंबीरराव के घोड़े सर्जाखान पर टूट पड़े। वह छोटी-सी घाटी घोड़ों और मनुष्यों से भर गयी। मार काट शुरू हुई। सोते समय ही मराठों ने खान पर आक्रमण किया था। अचानक ऊपर के पहाड़ से दैत्यों की तरह दौड़ते हुए आये थे। मुगल फौज की दुर्दशा हो रही थी। घाट के रास्ते से उनसे भागते भी नहीं बन रहा था। मराठों ने मुगलों के दो हजार सैनिकों को मार गिराया। इस भयंकर आक्रमण से मुगल सेना जान बचाकर भागने लगी। मुगल वाई की ओर भागने लगे। सूर्य के निकलने के पहले ही हंबीरराव ने घाटी और घाट के रास्ते पर अपना कब्जा जमा लिया था। प्रतापगढ़ की ओर बढ़ने के खान के स्वप्न को चूर चूर कर दिया था। दहशत खाई बीजापुरी और मुगल फौज नदी पार कर केंजल जंगल मे भाग गयी थी। सर्जाखान की फौज तीन गुना थी। कुछ लोग हड़बड़ा गये थे किन्तु आज हंबीरराव के शरीर में प्रचंड वीरत्व उत्पन्न हो गया था। अपने घोड़े को शिविर में नचाते हुए उन्होंने कहा, "चलो हमारा एक-एक वीर और एक-एक घोड़ा दस दस के लिए भारी है। बोलो हमला—" दुश्मन थोड़ा पीछे हट गया था। किन्तु साहसी हंबीरराव ने कहा, "लगे हाथ इन्हें आज ही समाप्त कर दो। कृष्णा नदी के किनारे सर्जाखान नाम की जहरीली लता को आज ही जड़ से उखाड़ कर फेंक दो। अन्य लोगों ने पूछा, "आज के दिन थोड़ा विश्राम किया जाये तो ?" हंबीरराव का शरीर कुछ ढीला पड़ गया था। वहीं पर दरी पर एक चद्दर डालकर मामा लेट गये। थोडी ही देर में वे गहरी नींद में सो गये। वर्षों के कष्ट, परिश्रम, चारों मौसमों की भाग दौड़ से मामा का शरीर दुख रहा था। किसी प्रकार आधा घंटा हुआ होगा कि उन्हें लगा जैसे कान में कोई कीड़ा घुस गया। वे झट से उठकर बैठ गये। उन्होंने अपने सहयोगियों को जोर से पुकारा, "चलो बच्चो उठो, हमारा शम्भूराजा हमारी राह देख रहा है। अभी ऐसी बहुत सी लड़ाइयाँ जीतनी हैं, सम्भाजी 563
अपने इन जन्मजन्मान्तरों के शत्रुओं के साथ।'' हंबीरराव आवेश में बोल रहे थे। सवेरे ग्यारह बजे के आसपास कृष्णा नदी के किनारे से केंजलगढ़ तक युद्ध शुरू हुआ। तलवारों से तलवारें टकराने लगीं। संख्या में कम होने पर भी मराठी घोड़े दुश्मन के घोड़ों से भिड़ गये। धक्कामुक्की, मारामारी जोर पर थी। रक्त के फौवारे फूटने लगे। दोनों दलों के सैनिकों के पेट और पीठ पर तलवारें पड़ने लगीं। सैनिकों के जिरह बख्तर फटने लगे। शस्त्रों के प्रबल आघात से सिर के टोप और हाथ की ढालें फूटने लगीं। कृष्णा तट के घनघोर युद्ध पर पूरे आसमान का ध्यान था। सुदूर मांतरदेवी के पहाड़ पर से कालूबाई अपनी चाँदी की आँखों से उसी ओर देख रही थीं। पूर्व की ओर चन्दन वन्दन किले का बुर्ज सिर ऊँचा करके घूम-घूमकर उसी ओर देख रहा था। सूर्य के पश्चिम की ओर ढलने तक सर्जाखान बड़े जोश में था। किन्तु सन्तप्त मराठों ने सर्जाखान के तीन-चार हजार और सैनिकों को काट डाला। हंबीरराव के दो तीन सौ सैनिक मारे गये। दोपहर के बाद शत्रु की फौज युद्धभूमि छोड़कर भागने लगी। मराठों को और भी जोश आ गया। सैनिक जोर-जोर से चिल्लाने लगे 'पकड़ोऽ, मारोऽऽ मारोऽऽ' चार बजते-बजते सर्जाखान की हिम्मत जवाब दे गयी। उसने कृष्णा के किनारे से जान बचाने हेतु नीचे की ओर घोड़ा भगाया। उसके साथ ही भागने वालों की संख्या बढ़ने लगी। सर्जाखान के दल को लूटा गया। उसके तम्बू और कनात के सामान हाथ में आ गये। सर्जाखान के पन्द्रह हाथी और डेढ़ हजार घोड़े भी हंबीरराव को मिल गये। युद्धभूमि भी थक गयी थी। खान की फौज छोटी मोटी तोपें और बारूद वहीं छोड़कर भाग गयी थी। विजय के नगाड़े बजने लगे। केंजल के नीचे सुहागिनें हंबीरराव की आरती उतारने के लिए बाहर निकल आयीं। घोड़ों की पीठ पर लूटा हुआ सामान लादकर मराठा वीर निकलने की तैयारी कर रहे थे। विजय की आभा से हंबीरराव की मुद्रा और भी तेजस्वी लग रही थी। सर्जाखान से लूटे गये हीरे जवाहरात लेकर परिचारक आगे निकल आये। हंबीरराव के घोड़े की जीन की झोली इन रत्नों से खचाखच भरी थी। 'सम्भाजी महाराज की जयऽऽ' की गर्जना से आसमान अनुगूँजित हो उठा। मंगल वाद्य बज रहे थे। केंजल माँ-बहनें आरती उतारने के लिए कुछ दूरी पर बाहर आ गयी थीं। हरी साड़ी और नाकों में नथ पहने हुए इन सुहागिनों को हंबीरराव आश्चर्य से देख रहे थे। उन्हीं सुहागिनों में मामासाहब की महारानी येसूबाई और उनका आँचल पकड़कर आती हुई बेटी ताराऊ दिखाई देने लगी। इसी समय बाँधवड़ी की फुलवारी में कुछ हलचल हुई। एक मुगल सिपाही खेत में बाँध के पास बेहोश पड़ा था। उसके पैर में गहरी चोट आयी थी। उसकी 564 :: सम्भाजी
एक आँख फूट जाने से गाल पर रक्त की धारा बह रही थी। वहाँ खून जम गया था। उसने पलकों को झपकाते हुए एक आँख खोली। थोड़ी ही दूरी पर घोड़े पर सवार हंबीरराव को देखा। बदले की भावना से उसका खून खौल उठा। पास ही तोप पड़ी हुई थी। उसने बड़ी कठिनाई से सामने पड़ी तोप में बत्ती लगाई। धूम-धड़ाम की तेज आवाज के साथ गोला निकला। धूल का बवंडर उठा। क्या इसका पता लगने से पहले गोला हंबीरराव की ओर आया। धुएँ को देखकर सभी का कलेजा मुँह को आ गया। 'माँमाँऽ' 'हंबीरमामाऽऽ' चिल्लाते हुए लोग उसी ओर दौड़ पड़े। सामने हंबीरमामा का आधा जला शरीर घोड़े के साथ गिरा पड़ा था। मस्तक के स्थान पर सिर्फ जला हुआ मांस ही दिखाई पड़ रहा था। रायगढ़ की सीढ़ियों का एक बलिष्ठ शिलाखंड केंजल की भूमि पर टूटकर चूर-चूर हो गया था। मनुष्य, पशु, पक्षी यहाँ तक कि सारा आकाश अवाक् हो गया। सारे दिन दूर से युद्ध को देखते रहने वाले चन्दन वन्दन किले का चेहरा भी स्याह हो गया। पास ही बह रही कृष्णा माई का प्रवाह ठहरा हुआ सा लग रहा था। मांढरदेवी पहाड़ी की देवी कालूबाई फूट फूटकर रो रही थी। एक महान संकल्प का दुखद अन्त हो गया था। हंबीरमामा का क्षत विक्षत शरीर उठाकर पालकी में रखा गया। उनके वीर घोड़े की भी ग्रामीणों ने आदरपूर्वक समाधि बनायी। घोड़े की जीन का सामान भी वहीं पड़ा था। मर्जाखान की सेना से लूटे गये हीरे जवाहरात भी वहीं पड़े थे। हबीरराव के रक्त मे काली मिट्टी सोना बन गयी थी। हीरे मोती की कीमत माटी के बराबर हो गयी थी। हंबीरराव के वीरगति प्राप्त करने का समाचार रायगढ़ पर पहुँचा। सभी जगह हाहाकार मच गया। शम्भू महाराज नीचे रायगढ़वाड़ी में गये थे। वहाँ पर अठारह कारखानों का निरीक्षण चल रहा था। वहीं पर उन्हें यह भयानक समाचार मिला। यह समाचार सुनकर शम्भू महाराज दो घंटे तक एक ही स्थान पर विक्षिप्त की भाँति बैठे रहे। फिर रायगढ़ की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। अन्य समय शम्भू महाराज घोड़े को नचाते हुए एक ही बार में किले पर चढ़ जाते थे। यदि पैदल हुए तो तेज गति से बिना कहीं रुके किले पर चढ़ते थे। अपने साथ चलने वालों साथियों और सेवकों को पसीने से तरबतर कर देते थे। किन्तु आज वे नंगे पाँव किला चढ़ रहे थे। रास्ते में बार बार बैठ जाते थे। सेवकों ने पालकी में बैठने का बार बार आग्रह किया किन्तु वे नहीं माने। महाराज किसी प्रकार किले के ऊपर आ गये। उन्होंने केवल खंडो बल्लाल से कहा, "हंबीरमामा के यथोचित अन्तिम संस्कार के लिए जितना भी आवश्यक हो, सरकारी खजाने से दे दीजिए। कराड के सूबेदार को इसकी सूचना यथाशीघ्र भेज दीजिए।" शम्भू महाराज अपने महल में न जाकर उसी स्थिति में जगदीश्वर के सम्भाजी 565
मन्दिर में जाकर बैठ गये। उन्होंने सेवकों से कहा, "महारानी को सूचित कीजिए...उनसे कहिए मुझे यहीं ईश्वर के सान्निध्य में रहने दें।" दो रात, दो दिन महाराज उन्हीं वस्त्रों में मन्दिर में बैठे रहे। चारों ओर हो हल्ला मचा हुआ था। हंबीरराव राजाराम के ससुर और ताराऊ के पिता थे। शोक सन्तप्त ताराबाई के पास येसूरानी बैठी थीं। ताराबाई के दुख की कोई सीमा नहीं थी। दूसरे दिन, राजकर्मचारी निजी बैठक में आये। जगह जगह पर युद्ध आरम्भ थे। येसूरानी ताराऊ का सिर अपनी गोद में रखकर थपथपा रही थीं। उन्हें सान्त्वना दे रही थीं। साथ ही पन्नों पर भी अपनी नजरें दौड़ा रही थीं। महारानी के इस रूप को देखकर ताराऊ ने पूछा, "दीदीजी यह सब आप कैसे सहन कर लेती हैं? कैसे सब कुछ संभाल लेती हैं? आपको इतनी शक्ति कहाँ से मिलती है?" "अरे ताराऊ! हम शिवाजी महाराज की पुत्र-वधुएँ हैं। जो भी बाधा आएगी उसके आगे हमें जाना ही होगा। हमारी दौलत अपनी सम्पदा पर अभिमान करने वाली मुगलों की बादशाहत नहीं है। हम तो परिश्रमी किसानों के राजा हैं।" "जी।" "कोई भी, और किसी भी प्रकार की विपत्ति आ जाय, तुमको और मुझको पैर मोड़कर बैठने की सुविधा कहाँ है? परिश्रमी किसानों की बहू बेटियों को कभी देखा है? हल खींचने वाला कोई बैल मर गया तो वे पल्लू बाँधकर जुआ अपनी गर्दन पर रख लेती हैं और बैल के साथ हल खींचती हैं। किन्तु बुआई अवश्य करती हैं। ताराऊ! प्रजा की भाँति ही राजा को भी रहना पड़ता है।" हंबीरमामा के आकस्मिक निधन से शम्भु महाराज के हृदय को कितना गहरा आघात लगा था, इसे सभी जानते थे। शोक सन्तप्त शम्भु महाराज जगदीश्वर के मन्दिर से निकलने को तैयार ही न थे। पिछले दो दिनों और दो रातों के बीच उन्होंने दो-तीन बार आधा आधा गिलास दूध पिया था। इसके अतिरिक्त केवल पानी ग्रहण किया था। तीसरे दिन प्रातःकाल येसाजी कंक, म्हालोजी घौड़पड़े और प्रह्लाद निराजी जैसे बुजुर्ग मन्दिर में जा पहुँचे। महारानी भी उनके साथ थीं। इन वरिष्ठ व्यक्तियों को महाराज को समझाकर मन्दिर से बाहर निकालने में अधिक समय नहीं लगा। किन्तु धीर गम्भीर प्रवृत्ति वाले महाराज को अब अपना दुख दबा पाना असम्भव हो गया। उन्होंने कातर स्वर में कहा, "पहाड़ जैसे हमारे पिताजी हमें छोड़कर चले गये। तब भी हम मन से इतना नहीं डरे। क्योंकि पिताजी के वियोग का स्मरण हंबीरमामा ने हमें कभी होने ही नहीं दिया। हमारे आधार के लिए हंबीरमामा का मजबूत कन्धा मौजूद था। आज वह कन्धा हमें छोड़कर चला गया। अब हम जाएँ १७० सम्भाजी
भी तो कहाँ?'' “महाराज यह तो जगत की रीति है। बूढ़ों को तो एक न एक दिन जाना ही है। अब हमारे पास खंडो बल्लाल, धनाजी, सन्ताजी जैसे नये तरुण हैं। इन्हीं में से एकाध नया हंबीरराव...'' येसाजी बाबा ने कहा। पहाड़ जैसे अनेक कठिन काम सामने पड़े थे। औरंगजेब जैसा बहुरूपिया शत्रु, नये नये जाल बिछा रहा था। शोक मनाने के लिए भी समय नहीं था। शम्भू महाराज उठे। नये जोश के साथ कमर कसकर तैयार हो गये। उन्होंने उसी दिन म्हालोजी बाबा घोडपड़े को नये सेनापति के रूप में नियुक्त करके उन्हें राजसी वस्त्र पहनाये। अपने पिता के उचित सम्मान से तरुण सन्ताजी घोडपड़े बेहद प्रसन्न दिखाई दे रहा था। सम्भाजी
कबड्डी-कबरी एक सैनिक कार्यवाही शीघ्रता से आरम्भ हो गयी। अलग अलग मोर्चों पर शम्भू महाराज के सरदार लड़ रहे थे। उन्हें पर्याप्त शस्त्रों, रसद और घोड़ों की पर्याप्त आपूर्ति हो रही है या नहीं, इसकी जाँच की जा रही थी। उसी समय बगल की तगाई कचहरी पर भी खूब भीड़ बढ़ रही थी। अलग अलग क्षेत्रों से माँगें आ रही थीं। जाँच पड़ताल के बाद किसानों को खेती के लिए कर्ज बाँटा जा रहा था। बीज आदि के लिए सरकार की ओर से धन दिया जा रहा था। दरबार में सैनिक और कृषिकार्य का काम साथ-साथ चल रहा था। शम्भू महाराज महारानी येसूबाई और कवि कलश कठिन परिश्रम कर रहे थे। प्रत्येक गाँव के मुखिया एवं सरदार को बुलाकर शम्भू महाराज ने सभी को समझाया, "स्वयं को जीवित रखते हुए अपने पशुओं को भी जीवित रखिये। अस्तबल और तबेले उजड़ जाएँगे तो भविष्य में बड़ी समस्या होगी। खेतों में अनाज पैदा नहीं होगा, तो हमारी सीमाओं की रक्षा कौन करेगा?" हमेशा की भाँति आज भी काम की भाग दौड़ जारी थी। उसी समय द्वारपाल दौड़ते हुए भीतर आया। उसने गणोजी शिर्के के आने की सूचना दी। द्वारपाल के पीछे पीछे महाराज की आज्ञा की बिना प्रतीक्षा किये गणोजी अन्दर आ गये। उनके आते ही दरबार की स्थिति बदल गयी। यह समझकर कि कोई गम्भीर समाचार लेकर गणोजी आये हैं, अन्य लोग बाहर चले गये। महारानी येसूबाई ने गणोजी की ओर देखा। गणोजी कल से ही आकर पाचाड़ के महल में रुके हैं। इसकी सूचना महारानी को मिल गयी थी। किन्तु उन्हें इस बात का अनुमान नहीं था कि वे इतने सवेरे गढ़ चढ़कर ऊपर आएँगे। गणोजी को देखकर महाराज और महारानी सावधान होकर बैठ गये। कवि कलश उठे और अपने हाथ के काग़ज पत्र पास की मेज पर रखकर बाहर जाने लगे। उनकी ओर 568 सम्भाजी
देखते हुए गणोजी शिर्के ने कहा, "कविराज, आपके बाहर जाने से कैसे चलेगा?" "'नहीं, ऐसे ही जाकर आता हूँ।'" "'ऐसे कैसे कविराज ? जा कहाँ रहे हैं? रायगढ़ के महाराज आपके बिना पानी तक नहीं पीते, श्वास भी नहीं लेते।'" "'ठीक कह रहे हो गणोजीराव ! राजा को ईमानदार व्यक्ति अपने समीप रखने पड़ते हैं और इसी प्रकार नालायकों को दस हाथ दूर ही रखना पड़ता है।'" शम्भू महाराज के इस उद्गार से येसूबाई का चेहरा खिल गया। महाराज ने तत्काल पूछा, "कहिये गणोजी, कैसे हैं?" गहरी साँस लेते हुए गणोजी ने कहा, "हमारे सगे जीजा स्वराज्य के छत्रपति हैं। इतने बड़े साम्राज्य के मालिक हैं। मेरी छोटी बहन रायगढ़ की साम्राज्ञी है। किन्तु यह सब व्यर्थ है। हमारे जीजाजी ने हमें कभी अपना माना ही नहीं। क्यों येसू सच है, कि गलत?" "किसलिए बहन को साक्षी बना रहे हैं, गणोजीराव?" सम्भाजी राजा का चेहरा तमतमा गया। वे अपने दाँतों से ओंठ चबाते हुए बोले, "दूर की बात क्यों करें ? पिछले तीन महीने में आप स्वयं छुप-छुपकर औरंगजेब से कितनी बार मिले हैं इसका पक्का सबूत दूँ आपको ? वे सारे प्रमाण और आपके हाथ के लिखे पत्रों को महारानी ने भी अपनी आँखों से देख लिया है।'" महाराज के सीधे आक्रमण से गणोजी कुछ घबराये अवश्य किन्तु दूसरे ही क्षण अपना मूल स्वर पकड़ते हुए आवेश में बोले, "मैं कहता हूँ, ठीक है। मैं मिला औरंगजेब से। किन्तु कोई व्यक्ति इतनी दूर तक क्यों चला जाता है इसका विचार राजमुकुट धारण करने वाले व्यक्ति को करना चाहिए या नहीं?" "जागीर के लिए ही न?" शम्भू महाराज ने गणोजी पर दृष्टि टिका दी। "वही कह रहा हूँ महाराज, आपके तीर्थस्वरूप पिता शिवाजी महाराज ने वचन दिया था कि मुझे यदि पुत्ररत्न प्राप्त होगा तो दाभोल की जागीर उसके नाम कर देंगे। अब हमारे चिरंजीव आठ वर्ष के हो गये हैं। कब दे रहे हैं आप हमें हमारी जागीर?" गणोजी उखड़ गये। "गणोजीराव आप समझते क्यों नहीं? समय बहुत खराब आया है। औरंगजेब जैसा शत्रु गर्दन पर सवार है। यदि आप अकेले को जागीर दी तो दूसरों को भी देनी पड़ेगी। अराजकता फैल जाएगी। इसीलिए कहता हूँ, थोड़ा धीरज रखिये।" सम्भाजी ने समझाते हुए कहा। बैठक में गणोजी और सम्भाजी की बातचीत चल रही थी। बातचीत की गर्म हवा बाहर भी पहुँच रही थी। बैठक की बातचीत समाप्त करने के लिए महाराज और महारानी प्रयत्न कर रहे थे कि भोजन के बहाने उठें और भीतर चले जायें। सम्भाजी :: 569
किन्तु सन्ताप से उफनते गणोजी राव रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बीच में राजा के हित की चिन्ता प्रकट करते हुए गणोजी बोले, "शम्भू महाराज चाहे आप मुझे कुछ भी न दें, किन्तु कलश नाम के इस काल सर्प को पहले बाहर निकाल दें। हमारे ससुर के पुण्यप्रताप से प्राप्त इस राज्य को बचाइये।" "गणोजीराव आपकी बात ठीक है। किन्तु कवि कलश को निकालकर मैं अपने सिर को किसके कन्धे से विश्वासपूर्वक टिकाऊँ? आपके? कौन है कविराज की जगह लेने वाला? हमारा दुर्दिन देखकर अर्जुन भोसले जैसा चचेराभाई साथ छोड़कर चला गया। सगे बहनोई महादजी निंबालकर आज वहाँ खान की फौज में हैं। हरजीराजा बहादुर हैं किन्तु लोभी हैं। बचे गणोजीराव। आप केवल शरीर से यहाँ हैं, मन से बादशाह के तम्बू में। माँ भवानी! कैसा कठिन समय आया है? स्वराज्य की नौका डूबे नहीं, इसके लिए हम एक-एक व्यक्ति को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। किन्तु वहाँ शिवाजी महाराज का सगा जामाता औरंगजेब की वन्दना कर रहा है।" शम्भू महाराज की स्पष्टोक्ति से गणोजीराव कुछ विचलित हुए। वे नितान्त अपमानित मुद्रा में लम्बी साँस लेते हुए बोले, "देखा येसू? तुम्हारे पतिदेव का मुझ पर कितना भरोसा है? और कोई बात नहीं है। उस कलश नाम के कालसर्प ने राजा के दिमाग में ऐसा जहर घोल दिया है कि उन्हें यह पता ही नहीं चल रहा है कि कौन अपना है और कौन पराया? मेरे जैसा पराक्रमी व्यक्ति भी उन्हें ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है।" "छोड़िए भी अब गणोजी शिर्के! वह कलश तो जाति का ब्राह्मण है, फिर भी जिस समय शहाबुद्दीनखान ने रायगढ़ पर अचानक आक्रमण किया था, उस समय कवि कलश ने साहसपूर्वक अपनी शिखा में गाँठ बाँध ली थी। हाथ में तलवार लेकर साहसपूर्वक मुकाबला किया था। घोड़े को नचाते हुए रायगढ़ को बचाया था।" "मतलब! इसका मतलब हमने कुछ भी नहीं किया।" "यह बात आप अपनी आत्मा से पूछें। हमने इतनी लड़ाइयाँ लड़ीं। उनमें से क्या किसी भी युद्ध का नाम आप बता सकते हैं, जिसमें गणोजीराव शिर्के नाम के, शम्भू महाराज के सगे साले ने हाथ में तलवार लेकर पहली पंक्ति में लड़े हों? पीछे रहकर कपड़े सँभालने वाले बच्चों में भी आप कभी नहीं थे।" इस तीखे प्रश्न से गणोजी सकपका गये। वे छटपटाकर बोले, "इसका मतलब आप मुझे उस कलश की पंक्ति में बिठा रहे हैं?" "बिल्कुल नहीं। इस गलतफहमी में आप न रहें। उनकी पंक्ति में बैठने के लिए आप किसी तरह से योग्य नहीं हैं। शम्भुराजा की मित्रता के लिए वह जमीन 570 सम्भाजी
पर रक्त का सैलाब फैलाने में भी आगा पीछा नहीं देखेगा।'' शम्भू महाराज और येसूबाई ने दोपहर का भोजन समाप्त किया। उसी समय एक दासी ने दौड़ते हुए आकर सूचित किया कि गणोजी राजा पुनः बैठक में आ गये हैं। यह सुनकर शम्भू महाराज विचित्र तरह हँसे। पति से झगड़कर कोई झगड़ालू औरत अपनी गठरी उठाकर गाँव की सीमा तक जाती है और फिर लौटकर पैर पटकते हुए दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती है। यही स्थिति गणोजीराव की हुई थी। हो सकता है कि अपनी बहन पर उनका प्रेम फिर उमड़ आया हो। यह भी हो सकता है कि जगदम्बा की कृपा से उन्हें अपने किये पर पश्चाताप हुआ हो। ऐसे ही कुछ महाराज ने सोचा। किन्तु दूसरे दिन भी गणोजी अपनी ही हठ पर कायम थे। अन्त में गणोजी के भीतर का जहर आखिर बाहर निकल पड़ा। शिर्के बेचैन होकर बोले, "सम्भाजी महाराज अभी विचार कीजिए, सीधे सीधे हमारी जागीर हमें दे दीजिए, नहीं तो इस रायगढ़ को मैं एक दिन बेंचिराग कर दूँगा।'' गणोजी के मुख से ये शब्द सुनकर शम्भू महाराज झट से खड़े हो गये और गणोजी का गला घोंटने के लिए झपटे। किन्तु बिजली की तेजी से येसूबाई बीच में आ गयीं। उन्होंने अपने भाई के लिए महाराज के सामने आँचल फैला दिया। बड़े भाई के लिए उनकी आँखों में आँसू उमड़ आये। वे अपने भाई के प्राणों की भीख माँगने लगीं। महारानी के आँसुओं में ऐसी विलक्षण शक्ति थी कि महाराज का प्रलयंकर क्रोध पिघलकर तरल हो गया। विवाद आगे न बढ़े और कोई अघटित न घटित हो इसलिए येसूबाई अपने भाई को लेकर अन्दर के दालान में चली गयीं। वहाँ भी गणोजी वही रट लगाए थे। उन्होंने पक्का निर्णय ले लिया था इस बार जागीर के सम्बन्ध में फैसला कर लेना है। अपने स्वार्थ के लिए गणोजी ने महाराज पर जो आरोप किये थे उससे महारानी भी रुष्ट थीं। उन्होंने अपने भाई से चिल्लाकर कहा, "भाई साहब पिताजी के न रहने पर आपकी जबान बहुत तेज चलने लगी है क्यों?" "हाँ येसू, पिताजी के दबाव के कारण ही मैं इतने दिन चुप बैठा रहा। परन्तु उन्हें भी इस बात की कल्पना कहाँ थी कि समय इस तरह बदल जाएगा। इसलिए येसू एक बात मैं बहुत साफ साफ कह देता हूँ।" "कौन सी?" "रायगढ़ के सिंहासन पर आज कोई राजा बैठा ही नहीं है।" "तो दूसरा कौन बैठा है?" "एक अविचारी उल्लू।" सम्भाजी 571