छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
दिलवर की समझ में नहीं आती क्या?" "वह तो भगवान को मालूम होगा।" गोदू धीमे स्वर में बोली, "मेरी समझ में तो इतना ही आता है कि उसकी पत्नी साक्षात् माता लक्ष्मी है। उसे दुखी करने का साहस मैं नहीं कर सकती।" एक ओर तो रायगढ़ में दोषपूर्ण ढंग से शम्भूराजा के विरोध में योजनाबद्ध रूप से अफवाह फैलाई जा रही थी। इससे वे दुखी हो रहे थे। किन्तु दूसरी ओर उनका तन-मन कर्नाटक की लड़ाई की ओर लगा रहता था। प्रतिदिन विजय के समाचार उनके कानों तक आते थे। शिवाजी महाराज के स्वागत में पूरा भागानगर (हैदराबाद) रास्ते पर उतर आया था। गोलकोंडा के कुतुबशाह ने उनका खूब स्वागत किया था। कुतुबशाह के प्रमुख प्रधान की समझ में ही नहीं आ रहा था कि महाराज को कहाँ रखें कहाँ नहीं। सुदूर जिंजी के बुर्ज पर घोड़ों को चढ़ाकर मराठा सैनिकों ने हिन्दुस्तान का दक्षिणी दरवाजा अपने घोड़ों की टाप के नीचे कर लिया था। खुशी की ये खबरें सुनकर युवराज प्रसन्नचित हो जाते थे। गोदू जिस दिन वापस गयी उसी दिन येसूबाई ने शम्भूराजा से कहा, "युवराज का गुस्सा ऐसा है जैसे गरजते गरजते बरस जाने वाली लहर। वह जितने वेग से आती है उसी गति से नष्ट हो जाती है।" "नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं है।" शम्भूराजा ने उत्तर दिया। ऐसा नहीं है तो रायगढ़ के जिन वसूली कर्मचारियों को आप महीने भर की यातनापूर्ण सजा देने वाले थे, उन्हें दो दिन में ही मुक्त क्यों कर दिया? उल्टे कविकलाश को हुक्म दिया कि उनके भोजन और आने-जाने की व्यवस्था करें।" इस बात पर शम्भूराजा अपनी हँसी रोक नहीं पाये। दो ही दिन में दिलेर खान के जासूस नया सन्देश लेकर, गुप्त रूप से श्रृंगारपुर में दाखिल हुए। कवि कलश ने वह सन्देश पत्र युवराज के सम्मुख प्रस्तुत किया। युवराज ने क्रुद्ध होकर कहा— "क्या पागल हो गया है, वह बुड्ढा खान?" उनकी दृष्टि तेजी से सन्देश पत्र की पंक्तियों पर दौड़ने लगी। "रुस्तम ए दख्खन संभाजी महाराज!" मेहरबानी करो। हमारे पास आ जाओ। पातशाह औरंगजेब गाजी है। उसे सह्याद्रि के साथ पूरा दख्खन देश जीतना है। गुस्ताखी माफ। हमें आपके शाही खानदानी मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं हैं। मगर फिर भी हम आपके दिल का दर्द जानते हैं। आपके पिता की सच्ची मोहब्बत सोयराबाई और राजाराम से है। दरबार के मारे कारकून आपके जैसे स्वाभिमानी मर्द को दुश्मन की निगाह से 94 सम्भाजी
देखते हैं। इसीलिए तुम्हें रियासत के एक टुकड़े का शहजादा बनकर अपमान से रहना पड़ रहा है। इससे तो अच्छा आप आलमगीर के पास जाओ। हमारी दोस्ती का हाथ थाम लो। आज नहीं तो कल आलमगीर साहब दक्खन में आएँगे ही तुम्हारी और हमारी किस्मत रोशन हो जाएगी।'' अपनी आँखों के सामने से सन्देश पत्र को हटाते हुए शम्भुराजा ने कहा— ‘‘कविराज ! दिलेर को लगे हाथ जवाब दो। उसका खत बिना जवाब के नहीं रहना चाहिए।’’ ‘‘राजन ! इसका क्या अभिप्राय है ?’’ ‘‘हमारे चुप रहने का अर्थ वह हमारी मौन सहमति न लगा ले।’’ शम्भुराजा के मुख से शब्द निकलने लगे। वहीं पर पैर मोड़कर, लिखने की मेज पर कागज रखकर कवि कलश उत्तर लिखने लगे— ‘‘खान साहेब, हमें अपना मानकर, हमारे विषय में जो चिन्ता प्रकट करते हो उसके लिए हमें अल्लाह का शुक्रगुजार होना चाहिए। हमारे राजपरिवार में गृह- भेद, दरार पड़ने की खबर आपने जो सुनी है वह सच है। मगर उससे आपको जरा भी आनन्दित होने की आवश्यकता नहीं है। यह वतन हम सभी के हाथों में सौंपकर मेरे पिताजी कितने विश्वास से दूसरे प्रदेश में चले गये है। क्या आपका कहना है कि उनके पीछे हम गद्दारी करके राज्य को अपनी झोली में डाल लेंगे ? हमारे हाथ से ऐसा कुछ घटित होने का मतलब होगा, मेरे प्यारे दिलेर भाई रावण की मदद के लिए श्रीराम का दशरथ से बगावत करना। शिवाजी महाराज जैसा पिता दैवी कृपा से मिला है उस वटवृक्ष की शीतल छाया छोड़कर तुम्हारी सोने की लंका का हमें क्या करना ?’’ खत की इबारत बोलते-बोलते संभाजी राजा की आँखें भर आयीं। उनका अपने पिता और स्वराज के प्रति प्रेम देखकर कवि कलश भी गद्गद हो गये। इसी बीच मन में कुछ सोचकर युवराज एकाएक रुके और पत्र को थैली में बाँधते हुए कवि कलश से बोले, ‘‘रुको, मुझे लगता है कि इस पत्र में कुछ और जोड़ दें।’’ ‘‘जैसी आज्ञा।’’ दोनों फिर से नीचे बैठ गये। युवराज ने पुनः बोलना आरम्भ किया— ‘‘दिलेर जी, यदि तुम्हें और तुम्हारे पातशाह को सचमुच हमारा पराक्रम बहुत पसन्द है तो हम दोनों एक हो जाएँ और दूसरा कोई देश जीतकर पातशाह को भेंट कर दें।’’ ‘‘किन्तु राजन ! जिससे हाथ नहीं मिलाना है उसमे हाथ क्यों मिलाएँ ?’’ कवि कलश आवेश में पूछने लगे। सम्भाजी . 95
शम्भूराजा का मुख उतर गया। बनावटी मुस्कान के साथ, लम्बी साँस छोड़ते हुए बोले, "कविराज ! मनुष्य की जिन्दगी में समय पूछकर नहीं आता।" दो राजमहल के अलिन्द पर येसूबाई खड़ीं थीं। वे संगमेश्वर की ओर ध्यान से देख रही थीं। उन्हें घने जंगलों के बीच एक दल तेजी से दौड़ता दिखाई दिया। येसूबाई ने पैर उठाकर और ध्यान से देखा। यह घुड़सवारों का दल था। येसूबाई ने देखा कि सामने से आ रहे घुड़सवारों के हाथ में भगवा झंडा था। येसूबाई को तत्काल बड़े महाराज का स्मरण हो आया। उनके मन की कली खिल गयी। लगभग पौने दो वर्ष बाद शिवाजी महाराज पन्हालगढ़ लौटे थे। चार ही दिन पहले उनके आने का समाचार युवराज और युवराज्ञी के कानों तक पहुँचा था। तभी से दोनों के कान पन्हालगढ़ की ओर लगे थे कि कब वहाँ से बुलावा आ जाय। पन्हाला से शृंगारपुर आये सवारों की खबर तुरन्त फैल गयी। कवि कलश तत्काल अपने आवास से दरबार में आ गये। शिवाजी महाराज का समाचार जानने के लिए मानो सारा चराचर उत्सुक हो उठा। दरबार में सरदार विश्वनाथ, कवि कलश, राणूबाई युवराज पर प्राण निछावर करने वाले अन्य साथी इकट्ठा हो गये थे। स्वास्थ्य ठीक न होने पर भी बूढ़े पिताजी शिर्के भी कपड़े ठीक ठाक करके उसी समय शम्भूराजा दरबार में आ गये थे। सभी के मन में उत्सुकता भरी थी। उसी समय शम्भूराजा दरबार में हाजिर हुए। सभी ने उनका अभिवादन किया। उनके पीछे ही येसूबाई आयीं और सामने वाले आसन पर प्रसन्न मुद्रा में बैठ गयीं। महत्त्वपूर्ण पत्र को कवि कलश ही पढ़ेंगे ऐसी दरबार की प्रथा बन गयी थी। उनकी ओर संकेत करके सम्भाजी राजा बोले, "कविराज चलो पढ़ो।" "प्रिय शंभो ! कर्नाटक अभियान में विजयी होकर हम प्रतिदिन बड़ी तेजी से दौड़े चले आ रहे थे। हम कितने उत्सुक थे कि वायु वेग से आकर हम आपको बाँहों में लेकर, गले से लगाकर मिलेंगे। किन्तु " कवि कलश भयभीत होकर वहीं रुक गये। उन्होंने लम्बी साँस ली। सुनने वालों ने अपने मन को समझाया कि 'किन्तु' शब्द का प्रयोग कवि कलश ने अपने मन से किया होगा। "किन्तु आपके आपके " कविराज भय से काँप उठा। इसी समय युवराज की धीर गम्भीर वाणी दरबार 96 • सम्भाजी
में गूँज उठी, "कलश जो भी हो पढ़कर सुनाओ।" अपने को किसी प्रकार सँभालते हुए कविराज धीमी गति से एक-एक शब्द पढ़ने लगे— "परन्तु आपके एक-एक कारनामे हमारे कानों तक आये और हम धन्य हो गये। युवराज! आप कोई बच्चे नहीं हैं, इक्कीस-बाइस वर्ष के जवाँमर्द हो चुके हैं। हमारी पीठ पीछे आपने न केवल कर डुबाने वालों को माफी दी बल्कि हमारे कर्मचारियों को बार-बार अपमानित किया। हमारे अष्टप्रधानों को आपने समझ क्या रखा है? विगत पचीस-पचीस तीस-तीस वर्षों से हमारे साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर स्वराज के हित में रात-दिन काम करने वाले, हमारे लिए प्राणों की बाजी लगाने वाले वे हमारे अभिन्न साथी हैं। उनकी आयु उनके अनुभव और उनकी सेवा का लिहाज न करके आपने सदैव ही उनका अपमान किया है और उन्हें सताया है। आप मुझसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक हैं, ऐसा मैं समझता हूँ। किन्तु इसके बाद अपना मुँह दिखाने का कष्ट न करें। पत्र को विराम देते हैं।" कवि कलश भय दुःख और आश्चर्य से मौन हो गये । उनका हाथ थरथराने लगा। दरबार में उपस्थित शम्भूराजा के सम्बन्धी हित मित्र सभी पत्थर की भाँति जड़ हो गये। कविराज ने शम्भूराजा की ओर दुखभरी दृष्टि फेरी। वे दुख की आग में जल रहे थे। फिर भी शम्भूराजा ने पत्र को आगे पढ़ने का संकेत किया। इतने में येसूबाई ने कड़े शब्दों में कहा, "रुक जाओ"। भरी सभा में लोगों के सामने अपना दुखड़ा रोने या बताने की उनकी इच्छा नहीं थी। फिर भी उनकी आँखें भर आयीं। येसूबाई ने फिर कहा, "बस! बस! कविराज । अब आगे एक भी शब्द हमसे सुना नहीं जाएगा।" "कविराज! रुक जाना ही ठीक है।" राणूबाई ने कहा। "क्यों? क्यों नहीं सुना जाएगा? ये शब्द अपने शिवप्रभु के ही हैं। कविराज रुको नहीं। क्योंकि आधा-अधूरा पत्र सुनकर लोग चले गये तो कल इससे भी अधिक अफवाहों के बुलबुले उठेंगे। उससे तो यही अच्छा है कि जो भी है वह लोगों के कानों तक जाए।" कवि कलश पत्र आगे पढ़ने लगे— "अभी भी यदि भूले बिसरे आपमें कुछ विवेक बुद्धि बची हो तो हमारा सुझाव है कि मुझसे मिलने पन्हाला आने के बदले आप सज्जनगढ़ चले जाइए। वहाँ श्री रामदास स्वामी के सत्संग में कुछ समय रहिए। कुछ सदाचार और सद्व्यवहार सीखिए। समय से पहले समझदार हो जाइए। स्वामीजी का प्रसाद लेकर जीवन भर सुखी रहिए।" यह पत्र सुनकर सारा दरबार अवाक रह गया। बिना कुछ कहे लोग धीरे-धीरे निकल गये। पिलाजी शिर्के भी बहुत दुखी मन से बाहर निकले। युवराज्ञी की ओर सम्भाजी . 97
तो देखा नहीं जाता था। उनका शरीर काँप रहा था। युवराज पत्थर की तरह जड़वत् होकर वहीं बैठ गये। बहुत समय तक कोई कुछ बोला नहीं। अन्त में शम्भूराजा एक गहरी साँस छोड़ते हुए निराश स्वर में बोले, "देखो वह दिलेर खान शत्रु होकर भी कितनी समझदारी की बात हमें सिखाता है। माया, ममता, नाते, रिश्ते सब झूठ हैं। अनेक बार शत्रुओं के मुख से भी पवित्र सूक्तियाँ निकलती हैं। "राजन् कृपा करें! आप धीरज न छोड़ें।" कविराज ने व्याकुलता से कहा। "इसके अतिरिक्त आज तक हम कर ही क्या रहे हैं?" गहरी साँस छोड़ते हुए शम्भूराजा बोले, "पौने दो वर्ष तक पिताजी का असह्य वियोग के बाद उनसे मिलने की प्रतीक्षा हम कितनी उत्सुकता से कर रहे थे? कर्नाटक की ओर जाने से पहले पिताजी ने हमें वचन दिया था कि आने के बाद मेरी शिकायतों और अधिकारियों के आरोपो के सम्बन्ध में हमारे साथ गम्भीर चर्चा करेंगे। किन्तु "युवराज ?" "हाँ। किन्तु अब न मिलना न सीधी नजर से देखना, न ही प्रेमपूर्ण कोई संवाद या पत्र। बिना स्पष्टीकरण का अवसर दिये हमें दोषी घोषित कर दिया गया है। महाराज ने हमारे लिए भेजा भी तो यह फटे जूतों का हार।" जैसे किसी बाघ के बच्चे को तेजधार वाले तीरों से घायल करके छोड़ दिया जाता है और वह पीड़ा से छटपटाता रहता है, उसी तरह शम्भूराजा बेचैनी से छटपटा रहे थे। उन्होंने भोजन नहीं किया। दोपहर ढल गयी। परछाइयाँ लम्बी होने लगीं। थोड़े समय बाद युवराज्ञी डरते डरते भोजन की थाली लेकर आयीं। शम्भूराजा ने उसे तत्काल दूर हटा दिया। युवराज बिस्तर पर छटपटा रहे थे। बिस्तर मानो अंगारों का ढेर बन गया था। उसमें युवराज का सारा शरीर जल रहा था। युवराज्ञी आगे आयीं। ज्वर से तपते शम्भूराजा गौर भाल पर हाथ हल्के से फेरती हुई बोलीं "इतना ग्लानिग्रस्त न हों। ये दिन भी बीत जाएँगे। खुद को सँभालें।" "येसू कैसे सँभालूँ और कैसे सँवारू ? यहाँ कर्मचारी लोग गन्दा कीचड़ उछाल रहे हैं। वहाँ माँ सोयराबाई महाराज के बिस्तर के चारों ओर मेरे विरोध में ईर्ष्या की अगरबत्ती रात दिन जला रखी है। केवल ममत्व के भूखे शिवाजी महाराज के पुत्र के भाग्य में पिता की छाया तक सम्भव नहीं है। आज रायगढ़ दुर्जनगढ़ बन गया है। येसू आज हम न किसी के रह गये हैं और न हमारा कहने के लिए ही कोई बचा है।" विरोधियों के षड्यन्त्र रुक नहीं रहे थे। रायगढ़ और पन्हालगढ़ के आसपास मे शम्भूराजा के निजी जासूस भी खबरें ला रहे थे। उनके अनुसार अष्टप्रधानों के महलों शिवाजी महाराज के दरबार में कुछ अलग ही राजनीति चल रही थी। वहाँ ५४ सम्भाजी
विचार हो रहा था कि हिन्दवी स्वराज को दो भागों में बाँट दिया जाय। रायगढ़ के साथ पूरे मावल प्रदेश को छोटे युवराज अर्थात राजाराम को दे दिया जाय और बिना भरोसे का जिंजी वाला हिस्सा शम्भुराजा को दिया जाय। विरोधी पक्ष के लोग शर्त लगाकर कह रहे थे कि शिवाजी महाराज का भी ऐसा ही विचार है। श्रृंगारपुर का वनवास न तो सहन हो रहा था न ही समाप्त। इसी प्रकार घाव पर नमक छिड़कने की तरह दिलेरखान की ओर से एक और सन्देश आ पहुँचा। "बदनसीब शहजादे, शम्भूराजे! अपने कार्यकर्ताओं द्वारा इतनी अच्छी सेवा करने के बाद भी तुम किसके फैसले का इन्तजार कर रहे हैं? वहाँ सुदूर जिंजी जाने की अपेक्षा भीमकाठ की बादशाह की छावनी शामियाना करीब नहीं है क्या? दिल में बिना कोई शंका रखे हमारे पास आ जाओ तुम्हारे स्वागत के लिए हमारे शामियानों के दरवाजे कब से बेसब्र हैं।" दिलेरखान के इस ताजे खत से शम्भुराजा सावधान हो गये। मन्दिर के देवता पत्थर बनकर बैठे थे और दूर मस्जिद के ऊपर चाँद तारे उनके विवश मन को संकेत कर रहे थे। मित्रता का हाथ बढ़ाने वाले दिलेरखान कोई सरल आदमी नहीं था। लम्बा नारियल के पेड़ जैसा, मजबूत काठी का दिलेरखान एक कट्टर रोहिला था। गगा यमुना का पानी पिया हुआ, औरंगजेब के दरबार में सिर ऊँचा करके खड़ा होने वाला योद्धा था। दिलेरखान को यही इच्छा हमेशा तड़पाती रहती थी कि वह आलमगीर औरंगजेब की कुछ ऐसी अद्भुत सेवा कर दे कि वे चकित रह जायें। एक दिन कभी दरबार में उसे सबसे ऊँचा स्थान देकर उसकी पगड़ी में स्वयं सम्मान का चार चाँद लगाये। काबुल और कंधार से लेकर बंगाल तक औरंगजेब को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। शिवाजी महाराज ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे। औरंगजेब अपने विशिष्ट मित्रों की मंडली में कहता था- "यदि हमने शिवाजी को जीत लिया तो समझो सारी दुनिया फतेह कर ली।" दिलेरखान सोचता था कि बादशाह की ऐसी मनोदशा में यदि वह शिवाजी के कलेजे के टुकड़े संभाजी को अलग करके औरंगजेब के कदमों में पेश कर दे तो कितने आनन्द की बात होगी? इसी इच्छा की पूर्ति के लिए वह दो बार फन्दा फेंककर अधीर होकर बैठा था। वह अपने गुप्तचरों से रायगढ़ में संभाजी की उपेक्षा और उनके अपमान की छोटी-छोटी खबरें लेता रहता था। शम्भूराजा ने भी बड़ी चतुराई से नये नये दाव खेलना आरम्भ किया। उन्होंने जोत्याजी केसकर को गुप्त रूप से दिलेरखान के मुल्क में भेज दिया। उन्होंने परिस्थिति के सूक्ष्म निरीक्षण का आदेश दिया। इस बात का पता जब येसूबाई को सम्भाजी :: 99
चला तो वे अत्यन्त चिन्तित हो गयीं। एक दिन प्रातःकाल संभाजी राजा ने अपनी लम्बी पूजा समाप्त की। पवित्र मन से नंगे शरीर मन्दिर से बाहर आये। उसी समय अचूक निशाना साधकर येसूबाई सामने आयीं और अत्यन्त विनम्र स्वर में बोलीं, "युवराज! इतनी तामसी वृत्ति ठीक नहीं है। संयम रखें और संघर्ष को टालें।" अपने पैरों में पड़ी युवराज्ञी की चिन्ता किये बिना शम्भुराजा बोले- "युवराज्ञी तुम कुछ भी कहो या समझो। यह संभाजी अब तुम्हारे स्वराज के लिए निरर्थक हो गया है।" "तो क्या इसीलिए आप उस दगाबाज दिलेरखान की गोद में अपना सिर रखने के लिए निकले हैं?" येसूबाई की आँखों में क्रोध की चिनगारियाँ नाचने लगीं। उन्होंने गरजते स्वर में पूछा, "आपको मालूम है कि कौन है यह दिलेरखान ? पुरन्दर के घेराव में अपने वीर मुरार बाजी का सिर काटने वाला चंडाल यही है। युवराज धैर्य धारण करो। सोचो।" "तो यहाँ रुककर हम करेंगे क्या? इस राज्य का युवराज होते हुए भी हमें युद्ध में जाना नहीं है, अपने राजमहल में रहना नहीं है हजार दो हजार घोड़ों की सेना भी हम तैयार नहीं कर सकते, प्रजा की छोटी सी फरियाद भी सुनने की आज्ञा हमें नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या हमें सज्जनगढ़ पर जाकर केवल तालियाँ बजाते हुए जिन्दगी काटनी है। शम्भुराजा के चेहरे पर दुख की छाया स्पष्ट दिख रही थी। वे अधीर स्वर में बोले, "येसू! आजकल मुझे अकारण भी भय लगने लगता है। अगले महीने हम दोनों छोटे युवराज राजाराम को लेकर पिताजी से मिलने जाने वाले थे। अपने कुल का दीपक उनके चरणों में समर्पित करने वाले थे। परन्तु उसकी जगह - उससे पहले हमें जंजीरों से जकड़कर जेरबन्द करके, गर्दन में फाँस लगाकर रायगढ़ में प्रस्तुत होने का आदेश पिताजी ने नहीं दिया, यही बहुत बड़ी कृपा है।" "युवराज! एक पक्ष से ही इतना क्यों सोच रहे हो? अपने वीर पिता के सम्बन्ध में कुछ नहीं सोचते हो? जो कुछ भी चल रहा है, वह बहुत गलत चल रहा है।" येसूबाई ने युवराज से कहा। संभाजी राजा ने अपनी उद्विग्नता और अपमान के ज्वार को भीतर ही भीतर दबाते हुए कहा, "अपने युवराज की निन्दा करने वाला इस प्रकार का पत्र पिताजी को नौकर के हाथ क्यों भेजना चाहिए था। सामने बुलाकर हमारी खाल भी खींच लेते तो भी मुझे इतना दुख न होता।" येसूबाई एक महीने में ही बच्चे को जन्म देने वाली थीं! उनके पेट का आकार बहुत बढ़ गया था और शरीर शिथिलता आ गयी थी किन्तु ऐसे समय में भी अपने 100 · सम्भाजी
पुरुषार्थी पति को अपमान की आग में जलते देखकर उनका हृदय चूर चूर हो रहा था। उनके महल की बगल में ही दुर्गाबाई का महल था। उन्होंने राणुबाई के सामने अपनी सौत दुर्गाबाई को रात में बुलाया था। उन्हें विश्वास में लेते हुए येसूबाई ने कहा, "दुर्गावती युवराज की मानसिक अवस्था ठीक नहीं है। हमें उनको सँभालना चाहिए।" दुर्गाबाई ने चुपचाप अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया। एक बार सुपे के जाधवराव के घर शम्भूराजा को भोजन के लिए आमन्त्रित किया गया था। उसी समय विशिष्ट अतिथियों को भोजन परोसने के लिए जाधवराव की रूपवती कन्या दुर्गा सामने आयी थी। उसकी स्त्री सुलभ विनम्रता, शालीन व्यवहार, मीठी वाणी आदि ने पहली नजर में ही शम्भूराजा को आकर्षित कर लिया था। दुर्गा येसूबाई की भाँति लम्बी और गोरी नहीं थी। इसके विपरीत वे कुछ नाटे कद की, थोड़ी मोटी किन्तु आकर्षक शरीर और सुन्दर तथा कोमल कपोलों वाली लड़की थीं। उनकी आँखें येसूबाई जैसी बड़ी-बड़ी हिरनी जैसी नहीं थीं, किन्तु छोटी दिखने वाली उनकी आँखों में किसी को भी वशीभूत कर लेने वाला विलक्षण जादू था। दुर्गा के साथ एक-दो बार नजरें मिलीं और शम्भूराजा का सुपे और बारामती की ओर आना-जाना बढ़ गया। शिकार के बहाने वे करहा नदी के किनारे-किनारे सुपे के जाधवराव के घर पहुँच जाते थे। कुछ ही दिनों में शम्भूराजा की इस भेदभरी यात्रा का पता चल गया। उन्होंने स्वयं ही अपने पतिदेव के लिए दुर्गाबाई का हाथ माँग लिया। विवाह के बाद एक दिन दोपहरी में येसूबाई दुर्गा से मन्दिर में मिलीं। दुर्गा के कोमल हाथों को अपने हाथों में लेते हुए येसूबाई ने कहा, "एक बात ध्यान में रख ! तुम्हें इस राजमहल में यों ही नहीं लाया गया है। शम्भूराजा जैसा जलता- धधकता अंगारा सँभालना मेरे अकेले के बस का नहीं है। इसीलिए तुम्हें अपनी बड़ी बहन की सहायता के लिए मैं तुम्हें ले आयी हूँ।" येसूबाई का स्वभाव अधिक बोलने वाला था किन्तु दुर्गाबाई शान्त स्वभाव की और कम बोलने वाली थीं। येसूबाई ने उसे अपने समीप लाकर कहा, "दुर्गा ! इसके बाद आने वाला समय तुम्हारे और मेरे लिए बहुत कठिन है। शरीर की शिथिलता और पेट में आठ महीने का बच्चा ले युवराज के पीछे भागना मेरे लिए सम्भव नहीं है। दुर्गा ! युवराज को सँभालोगी न ? करोगी न उनकी सहायता ?" "दीदी हम आपकी आज्ञा के बाहर हैं क्या ?" दुर्गा ने कहा। एक रात शम्भूराजा सारी रात लगातार कुछ लिखते हुए बैठे रहे। उन्होंने बिना किसी लिपिक अथवा कवि कलश की सहायता लिए यह कार्य आरम्भ किया था। पलंग पर लेटी येसूबाई की आँखें जड़ हो रही थीं। बीच-बीच में उनकी नींद उचट जाती थी, तब सम्भाजी :: 101
वे युवराज को देखती थीं। युवराज अपनी मेज पर बैठे लगातार लिखते ही रहे। भोर हो गयी। बगल के बरगद और पीपल के पेड़ों पर से चमगादड़ों की आवाजें आने लगीं, तब जाकर शम्भूराजा उठे और बिस्तर पर निढाल होकर लेट गये। येसूबाई अब पूरी तरह जग गयी थीं। उन्होंने मेज की ओर देखा। वहाँ चारों ओर बहुत से कागज बिखरे पड़े थे। येसूबाई धीरे-से उठीं। उन्होंने सामने देखा तो मेज पर एक शाही थैली दिखाई पड़ी। उस पर लगी औरंगजेब की मुहर को येसूबाई ने तत्काल पहचाना। उनका मन अनेक शंकाओं से घिर गया। उनसे उस थैली में आया समाचार बिना पढ़े नहीं रहा गया। उसे पढ़ने के बाद उन्होंने जाना कि औरंगजेब का पुत्र शाहआलम दक्खन का सूबेदार बनकर आया है। शाहआलम के हस्ताक्षर और मुहर के साथ दिलेरखान ने शम्भूराजा के पास इस आशय का पत्र भेजा था कि यदि शम्भूराजा मुगलों से जाकर मिलें तो उन्हें अभयदान दिया जाएगा। शम्भूराजा की भावी दिशा येसूबाई की समझ में आ गयी। शम्भूराजा देर से सोकर उठे । येसूबाई आँसू भरी आँखों से उनके चरणों में नत थीं। युवराज के पैरों को पकड़कर येसूबाई उपालम्भ के स्वर में बोलीं, "दया करो युवराज ! इस तरह का गलत निर्णय न लें। आपके जाने से शत्रु के महल पर विजय का ध्वज चढ़ेगा। राज्य कर्मचारियों से नाराज होकर शिवाजी महाराज के स्वराज्य का गला मत घोंटो युवराज।" "आपको क्या पता युवराज्ञी ? हम मूर्ख ही ठहराये जा रहे हैं। वहाँ पन्हाला पर पक्का निर्णय हो चुका है, बारा भावल और रायगढ़ का राज्य राजाराम को मिलेगा और हम जिंजी की ओर चलते बनेंगे।" येसूबाई ने अपनी आँखों को आँचल से पोंछ लिया। युवराज की आँखों में आँखें डालते हुए उन्होंने सीधा प्रश्न किया— "राज्य गया तो गया किन्तु युवराज! आप जैसे संस्कृत विद्वान, तलवार वीर और कवि हृदय विवेकी पुरुष को राज्य और सत्ता का लोभ कब से सताने लगा ? युवराज ! एक ओर विशाल साम्राज्य और दूसरी ओर शिवाजी महाराज जैसा पिता इनमें से आप किसको चुनेंगे ?" "इस प्रश्न का उत्तर आपको पता है। इसलिए उसी प्रश्न को बार-बार पूछने का पागलपन मत करो। येसूराणी आपको यह भी पता है कि शिवाजी महाराज के बिना, उनके सपनों के बिना, यह संभाजी एक पल भी नहीं जी सकता। परन्तु जिस महाराज के हृदय में सारी दुनिया के लिए इतनी ममता है उसी के हृदय में आज इस शम्भू के लिए दया और ममता का एक कण भी शेष नहीं है? ऐसा क्यों है?" येसूबाई मौन हो गयीं। युवराज का असह्य दुख देखकर उनकी आँखों से आँसू भी पलायन कर गये। उसी रात में येसूबाई को तीव्र ज्वर चढ़ गया। वैद्यराज ने काढ़ा बनाया। 102 :: सम्भाजी
युवराज ने अपने हाथ से काढ़े का प्याला येसूबाई के होठों से लगाया। उनके ज्वर का सही कारण युवराज को ज्ञात था। अस्वस्थ येसू के चेहरे पर हल्के हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा, "डरो मत! अधिक सोचकर अपनी जान संकट में मत डालो, इतना कष्ट न उठाओ। मान लो कल को हम मुगलों से जाकर मिलें भी तो कौन-सा आसमान टूट पड़ने वाला है? इससे पहले स्वयं पिताजी ने हमारी छोटी उँगलियाँ पकड़कर मुगलों का शामियाना हमें नहीं दिखाया था क्या? दो बार मुगलों की अच्छी भली मनसबदारी की है, हमने।" येसूबाई किसी तरह मुस्कराते हुए बोलीं, "उस समय आपका जाना ससुर जी की राजनीति का एक हिस्सा था।" किन्तु अब भी हमें और कितना शान्त बैठना चाहिए? इन राज्य कर्मचारियों को लगता है कि शम्भू की गर्दन में रीढ़ की हड्डी नहीं है, सीने में आग नहीं है। येसू अब हमें एक ही उपाय सूझता है। अपने अपमान को मिटाने के लिए, बाहर यश कमाकर पिताजी के सामने सिर ऊँचा करके खड़े होने के लिए हम भी थोड़ा खेल खेलें। शम्भुराजा की बातें सुनकर भी येसूबाई का भ्रम दूर नहीं हुआ। इसलिए संभाजी राजा उन्हें समझाते हुए बोले, "फिलहाल तो कुछ समय के लिए हम भी मधुर भाव से शत्रु से मिलेंगे और समय आने पर पेट फाड़कर बाहर निकल आएँगे।" "युवराज, दिलेरखान कोई मछली नहीं पूरा मगरमच्छ है।" "यह बालक भी नासमझ बच्चा नहीं है। यह शिवाजी महाराज का बेटा है, मुगलों का काल बनने वाला है।" युवराज और युवराज्ञी सारी रात जागते रहे। येसूबाई की राय थी कि युवराज को मुगलों के पास जाना ही नहीं चाहिए। येसूबाई का मुरझाया चेहरा, चढ़ता हुआ ज्वर, धीरे से निकलने वाला स्वर आदि शम्भुराजा के सबल पावों में ममता की जंजीर डाल रहे थे। उसे तोड़कर बाहर निकलने के लिए शम्भुराजा छटपटा रहे थे। अन्त में येसूबाई ने अपने मातृत्व, स्त्रीत्व और मैत्रीभाव की शक्ति को एकत्र की। शम्भुराजा का हाथ अपने सीने पर रखते हुए बोलीं, "युवराज! अपनी नित्य सहचरी को एक वचन दोगे?" "बोलो।" "पहले महाराज की आज्ञानुसार सज्जनगढ़ जाएँगे। स्वामी रामदास का कृपाप्रसाद लेकर ही आगे जाएँगे?" "हाँ! दिया वचन।" सम्भाजी :: 103
तीन शृंगारपुर के बाहर का शिवमन्दिर प्रातःकाल ही शम्भूराजा के संगी-साथियों से खचाखच भर गया था। आसपास में घने बादल छाये थे। नयी ऊर्जा और नये धैर्य से मार्ग पर निकलना था। शम्भूराजा ने महादेव का अभिषेक आरम्भ किया था। अनेक शास्त्री पंडित बिना कुर्ता पहने शिवालय के गर्भगृह में उपस्थित थे। एक घंटे में अभिषेक पूर्ण हो गया। काले बादल भी छँट गये थे और सफेद बादल बाहर आ गये थे। दीवान सरदार विट्ठलराव मन्दिर से बाहर निकले। अब गर्भगृह में केवल शम्भूराजा और कवि कलश ही खड़े थे। कवि कलश से नहीं रहा गया, उन्होंने कहा, "राजन् आगरा-मथुरा से लेकर आजतक हम आपकी छाया बने रहे हैं। यह मानकर कि आप ही हमारे घर बार और वतन हैं, आपके पीछे-पीछे घूमते रहे हैं।" शम्भूराजा कवि कलश की ओर देखकर मन्द मन्द मुस्कराये। उन्होंने कहा, "मुझे अकेले ही जाने दीजिए। यदि आप हमारे साथ आये तो जानते हैं कि ये जहरीली जुबान वाले राज्याधिकारी चिल्ला-चिल्लाकर क्या कहेंगे? दुष्ट दगाबाज कवि कलश ने ही सारी गड़बड़ी की है। पागल शम्भू को तन्त्र मन्त्र करके मुगलों के झुंड में खींच ले गया।" कलश खिन्नता से हँसे। शम्भूराजा की जुदाई का दुख उनके चेहरे से हट नहीं रहा था! उनका धैर्य बँधाते हुए शम्भूराजा ने कहा, "यदि आप यहाँ रहेंगे तो हमारे जाने के बाद भी शत्रुओं को आपकी दहशत बनी रहेगी। वहाँ मुझ पर कोई विपत्ति आयी तो आपको बुला तो सकेंगे।" "राजन् आपकी जो आज्ञा।" कवि कलश ने कहा, "किन्तु युवराज आपके जाने के बाद भी धूर्त प्रवृत्ति शान्त नहीं रहेगी। महाराज से सीधे शिकायत करके हमें भी निष्कासित करवाने का आग्रह करेंगे। ये लोग कैसी भी शिकायत करते हैं। कहते हैं, हम भैंसे की खाल पर बैठकर साधना करते हैं।" "ऐसे आरोप केवल अधिक चालाक बनने वाले लोग ही कर सकते हैं। भैंस की खाल कितनी मोटी होती है? उसे काटने और बिछाने के लिए कितने लोग लगते हैं? इसका ज्ञान क्या इन महानुभावों को है?" कविराज को धीरज देते हुए शम्भूराजा ने कहा, "आपकी बुद्धिमत्ता और मेरे ऊपर आपकी निष्ठा महाराज को भली-भाँति मालूम है। जैसा हमारे शत्रु कहते हैं वैसे यदि आप होते और पिताजी 104 :: सम्भाजी
को मालूम पड़ता कि उनका पुत्र सचमुच एक ढोंगी तान्त्रिक के जाल में फँस गया है तो आपको कब का निकाल फेंक दिया होता, कविराज। " कवि कलश कुछ अधिक नहीं बोल पाये। शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में लेकर इतना ही कहा, "राजन् अपने आपको सँभालें।" दोपहर के समय काली घटाएँ घिर आयी थीं। श्रृंगारपुर पर उनकी छाया पड़ रही थी। अपने ढाई हजार घुड़सवारों के साथ संभाजी सज्जनगढ़ की ओर निकल रहे थे। उन्हें और राणूबाई तथा दुर्गाबाई को बिदा करने के लिए आधा शहर सीमा के पास जमा हो गया था। बिदाई के समय कवि कलश का गला भर आया था। येसूबाई को लेकर आयी पालकी एक विशाल जामुन के पेड़ के नीचे रुकी थी। येसूबाई का चेहरा सूज गया था। आँखें एकदम उतर आयी थीं। उनका चेहरा आसमान के बादलों की तरह दुख से भर गया था। उनकी आँखों से आँसू बरसने लगे। आँखों का काजल गोरे कपोलों पर उतर आया। शम्भूराजा ने अपने उत्तरीय से उनके आँसू पोंछने का प्रयास किया। येसूबाई और दुर्गाबाई राणूबाई के पास गयीं। राणूबाई ने दुर्गाबाई की पीठ पर हाथ फेरते हुए धीमी आवाज में बोली, "सँभालो।" शम्भूराजा ने राणूबाई से बार- बार आग्रह किया कि वे येसूबाई के साथ रहें। किन्तु राणूबाई ने कहा, "शम्भूराजा मैं आपको सज्जनगढ़ में स्वामी जी के दरवाजे पर पहुँचा दूँगी और वहीं से वाई चली जाऊँगी।" शम्भूराजा को कुछ उदास देखकर, येसूबाई उन्हें सान्त्वना देते हुए बोली— "मुझे विश्वास है युवराज, आपको सज्जनगढ़ पर स्वामी जी मिलेंगे। मन का सारा भ्रम दूर हो जाएगा। ये दिन भी बीत जाएँगे।" "युवराज्ञी अब आप भी श्रृंगारपुर में नहीं रहिए।" "तो फिर?" "शीघ्र ही पन्हाला पहुँचिए।" "पन्हाला? वह क्यों?" येसूबाई ने आश्चर्य से पूछा। "आपको पता नहीं है क्या? हमारे पिताजी बहुत थक गये हैं। बहुत बुड्ढे दिखाई देने लगे हैं। उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए अपने घर का कोई उनके निकट नहीं होना चाहिए क्या?" संभाजी राजा ने कहा। यह सुनकर येसूबाई की आँखों से आँसू अपने आप सूख गये। पति के ऊपर अभिमान के कारण उनका सिर ऊँचा हो गया। सम्भाजी .: 105
चार अपमान और अवहेलना का अंगार कितना दाहक होता है, इसकी कल्पना कोई भावुक और स्वाभिमानी व्यक्ति ही कर सकता है। संभाजी राजा अपने सैनिकों के साथ सज्जनगढ़ के दरवाजे के पास पहुँचे तो अत्यधिक विचार मंथन के कारण उनका सिर दुखने लगा था। ऐसे सिरदर्द की दवा यही है कि या तो गैंडे की तरह पत्थर पर सिर पटक-पटक कर हमेशा के लिए शान्त हो जाना या तुकाराम अथवा स्वामी रामदास जैसे किसी सन्त के चरणों में मत्था टेककर उनके ज्ञान के कुएँ से अमृत पान करना और उसी आधार पर जीवन की सफलता को ढूँढ़ना। किन्तु आजकल युवराज जहाँ भी जाते थे, दुर्दैव की अघोरी छायाएँ उनका पीछा करती रहती थीं। जिस दिन युवराज सज्जनगढ़ पहुँचे उससे ठीक एक दिन पहले स्वामी जी कोल्हापुर की ओर निकल गये थे और पन्द्रह दिन तक उनके लौटने की सम्भावना नहीं थी। येसूबाई के न रहने पर दुर्गाबाई युवराज की देखभाल कर रहीं थीं। राणूबाई युवराज को यही समझाने का बार-बार प्रयत्न कर रही थीं कि आज नहीं तो कल सारी उलझनें अपने आप सुलझ जाएँगी। इसलिए युवराज को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। शम्भूराजा भी सज्जनगढ़ पर अपना मन बहलाने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने गढ़ के एक छोर पर स्थित अन्न मारुति के दर्शन किये। अपने पीछे लगे सारे संकट दूर हो जायें इसके लिए वे मारुति और शनिदेव की उपासना कर रहे थे। अनेक बार अपने रक्षकों की एक टुकड़ी लेकर वे बाहर निकलते थे। कभी वे डोरकटी पतंग की भाँति गढ़ के आसपास घूमते थे तो कभी रामगढ़ी के पास जाकर ध्यानस्थ हो जाते थे। आकाश में सफेद बादलों को देखकर उन्हें येसूबाई और कविकलेश की बहुत याद आती थी। एक दिन सन्ध्या काल लिम्ब गाँव का सदानन्द गोसावी दौड़ता हुआ युवराज के पास आया। उसने अपने मठ की बन्द की गयी वृत्ति को फिर से शुरू करने की माँग की। युवराज ने दूसरे दिन उसका निर्णय करने का निश्चय किया। उस रात शम्भूराजा का मन बहुत आश्वस्त और शान्त था। बहुत दिनों के बाद राज्य के कार्यव्यापार में ध्यान देने का उन्हें अवसर मिला था। दुर्गाबाई और राणूबाई के साथ चर्चा करते हुए बड़े महाराज का प्रसंग आ गया। शम्भूराजा की मुखमुद्रा विषादग्रस्त हो गयी। यह देखकर राणूबाई ने पूछा, "शम्भूराजा! कितना गुस्सा करोगे हमारे पिताजी पर?" 106 :: सम्भाजी
"पिताजी को कर्नाटक से आये कितने दिन हो गये? इसका विचार आप लोगों ने किया?" "कितने दिन?" "वे गर्मियों में चैत्र के महीने में स्वराज्य में लौटे। इस बात को एक दो नहीं छः महीने हो गये। आज मेरी उम्र बीस वर्ष है। इतने बड़े और समझदार पुत्र को उसका पिता छः-छः महीने तक नहीं मिल पा रहा है। वे मिलने के लिए सन्देश तक नहीं भेजते। मैंने स्वयं मिलने की इच्छा व्यक्त की तो उसका उत्तर तक नहीं मिलता। राणू दीदी, दुर्गाबाई आप ही बताएँ कि इस संभाजी ने ऐसा कौन सा पाप किया है? सारी दुनिया के लिए नदी की तरह अविरल भाव से प्रवाहित होने वाला आपके शिवाजी महाराज का हृदय अपने स्वयं के बेटे के लिए इतना शुष्क क्यों रहता है? आखिर यह संभाजी कोई भावनाहीन नींव का मौन पत्थर तो नहीं है।" जिस प्रकार आकाश में गर्जन तर्जन के साथ बादल एकत्र होते हैं और तड़पते हुए वर्षा के पानी की मसक खाली करके नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार शम्भुराजा बहुत देर तक छटपटाते हुए लेटे रहे। दूसरे दिन लिम्ब गाँव के गोसावी के साथ पूरी पूछ ताछ करने के बाद उन्होंने कहा, "आप पर अन्याय हुआ है, यह स्पष्ट दिख रहा है। किन्तु इस सम्बन्ध में सरकारी अधिकारी होने के नाते अण्णाजी दत्तो को ही आदेश देना चाहिए। मैं आज ही उन्हें सन्देश भेज देता हूँ।" सदानन्द गोसावी का चेहरा उतर गया। घुटनों के बल उठते हुए उसने बड़ी व्यग्रता से अभिवादन करते हुए कहा, "युवराज! ऐसा अधूरा न्याय न करें। आप अपनी मुहर लगाकर, कागज़ बनाकर देने की कृपा करें।" "देखो गोसावी, पिताजी के कार्यव्यापार में हम व्यतिक्रम कैसे पैदा कर सकेंगे? सरकारी मुहर लगे कागज आपको अण्णाजी दत्तो के पास से ही मिलेंगे। आप चिन्ता न करें। अण्णाजी दत्तो को हम आज ही सन्देश भेज देते हैं। चार पाँच दिन बाद आप उनसे जाकर मिल लें।" "जैसी आज्ञा।" कहते हुए गोसावी सिर हिलाकर बाहर निकल गये। चार सप्ताह और बीत गये। समर्थ रामदास स्वामी अभी तक गढ़ पर नहीं लौटे। उनके पट्ट शिष्य से और किले के अधिकारी बासुदेव बालकृष्ण तथा कृष्णाजी भास्कर से युवराज बार बार पूछ रहे थे कि स्वामी जी कब आएँगे? उन्हें उत्तर मिलता था कि स्वामीजी कोल्हापुर और बेलगाँव में ही अटके पड़े हैं। परली और सज्जनगढ़ के परिसर में घूम-घूमकर युवराज ऊब गये थे। एक महीने के बाद गोसावी फिर आये। युवराज ने उन्हें देखते ही पूछा, "मिल गये कागज?" सम्भाजी • 107
"कैसे मिलेंगे?" सदानन्द गोसावी संतप्त होकर बोले, "युवराज, आपके आदेशानुसार तीन हफ्ते तक रायगढ़ की बाहरी सीढ़ियाँ बैठे-बैठे घिस गयीं। अण्णाजी और राहुजी की टालने वाली और उपहास करने वाली नजरों को देखते देखते ऊब गया। अन्त में हिम्मत करके अण्णाजी से पूछ लिया—"पन्त सच्चाई क्या है? हमें बता दीजिए।" तब अण्णाजी ने कहा, "हमारा राजा आजकल पन्हालगढ़ पर रहता है, सज्जनगढ़ पर नहीं।" जब दुखी होकर गढ़ से उतरने लगा तो लोगों की चर्चा सुनकर बात समझ में आयी। "कैसी चर्चा ?" "लोग कह रहे थे महाराज की पहले जैसी कृपा आप पर नहीं है। इसलिए आपके द्वारा दिये गए न्याय का कोई अर्थ नहीं है। आपके आदेश का कार्यान्वयन तो दूर आपके द्वारा दिये कागज़ को हाथ लगाने का कष्ट भी अधिकारी नहीं उठाना चाहते।" बात करते-करते सदानन्द गोसावी जलती तीली को घास की गट्टी में फेंककर चले गये और आग भड़कती गयी। शम्भुराजा का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उनकी आँखों में खून उतर आया। कनिष्ठ श्रेणी के कर्मचारियों को शम्भुराजा ने बैठक से बाहर जाने को कहा। किले के अधिकारी वासुदेव बालकृष्ण की ओर अपनी सन्तप्त दृष्टि घुमाई। वासुदेव बालकृष्ण हड़बड़ा गये। उन्होंने युवराज के सामने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, "महाराज उस गोसावी का कहना बिलकुल झूठ नहीं था। ऊपर से आदेश दिया गया है कि युवराज द्वारा दिये गए आदेशों और निर्णयों को जहाँ तक सम्भव हो टाला जाए।" "लिखित ?" "लिखित नहीं, मौखिक।" "पन्हाला से? पिताजी का आदेश?" "वहाँ से नहीं, रायगढ़ से, राहुजी सोमनाथ और अन्य लोगों से।" "उसके ऊपर आपने क्या निर्णय लिया?" "सरकार हम आपके नौकर हैं। जब रायगढ़ से मौखिक आदेश आया तो उसके स्पष्टीकरण के लिए हमने महाराज के पास पन्हालगढ़ दूत भेजे। किन्तु चार दिन वहाँ रहने के बाद भी दूत को महाराज से कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। आप ही बताएँ हम सेवक लोग इसका क्या अर्थ समझें?" शम्भुराजा उदासी से हँसे। कर्मचारियों के सामने वे कुछ बोले नहीं। किन्तु वहाँ उनका रहना अब कठिन हो गया। वे दुर्गाबाई और राणूबाई से बोले, "कर्नाटक से लौटे लगभग आठ महीने बीत गये। पिताजी हमें मिले नहीं। यहाँ सज्जनगढ़ पर 108 :: सम्भाजी
भी हमें आये दो-ढाई महीने हो गये। समर्थ स्वामी का कुछ अता-पता नहीं। मुझसे ऐसा कौन सा पाप हो गया है कि रायगढ़ के स्वामी ने हमें इस प्रकार झटक दिया और सज्जनगढ़ के स्वामी हमें इस प्रकार टाल रहे हैं? युवराज होते हुए भी प्रजा की शिकायत हम सुन नहीं सकते। यदि कोई फैसला दिया तो कर्मचारी सच सुनेंगे नहीं। अपने लोगों को, देश को, अपनी मिट्टी को यदि हम इतने पराये लग रहे हैं तो किसी परकीय देश में चले जाने में कौन सी बुराई होगी?'' ‘‘शम्भुराजा धीरज रखो। संकट टल जाएँगे।’’ राणूबाई ने युवराज को अपनी बाँहों में भर लिया। उन्हें शान्त करने का प्रयास करती रहीं। उसी दोपहर को माहुली के सूबेदार खेलोजी नाइक भणगे युवराज से मिलने आये। खेलोजी बाबा की उम्र सत्तर की ओर झुक रही थी। किन्तु अभी भी वे एक युवक के उत्साह से कार्य करते थे। बड़े महाराज पर उनकी बड़ी निष्ठा थी। शम्भुराजा को वे प्राणों से भी अधिक चाहते थे। खेलोजी बाबा से शम्भुराजा ने कहा, ‘‘कल बड़ा पवित्र दिन है। इसलिए कल हम पवित्र स्नान के लिए आपके माहुली क्षेत्र में आ रहे हैं। मेरे आने की सूचना किसी को भी न दें। कल प्रातः एकदम शान्त चित्त से अपने स्वराज्य में स्नान करने दें।’’ 3 दिसम्बर, 1678 भोर में ही शृंगारपुर की अश्वसेना में से चुने हुए तीन सौ सवारों का दल लेकर संभाजी माहुली क्षेत्र की ओर निकल पड़े। सवेरा होते-होते उनके घोड़े कृष्णा नदी के तट पर पहुँच गये। माहुली गाँव के पास कृष्णा और वेण्णा नदियों का संगम है। सवेरे के ठंडे वातावरण में शम्भुराजा संगम के पास खड़े थे। दोनों नदियां का पानी एक दूसरे की बाँहों में उलझ रहा था। नदी के इस पार हिन्दवी स्वराज्य अर्थात शिवाजी महाराज का प्रदेश था और दूसरी ओर बीजापुर के आदिल शाह का। उनके सतारा क्षेत्र का रहिमतपुर थाना यहाँ से अधिक दूर नहीं था। इन दोनों नदियों के किनारे बहुत पुराने पीपल और बरगद के पेड़ थे। जटाधारी बरगद तपस्या में समाधिस्थ महान सन्तों जैसे दिखाई पड़ते थे। आज पुण्य पर्व था इसलिए बहुत सवेरे से ही वहाँ संगम पर पंडितों, भिक्षुकों, यात्रियों और साधुओं की भीड़ जमा हो गयी थी। युवराज अपने प्रिय हैबती घोड़े से जैसे ही नीचे उतरे, खेलो बाबा की सफेद दाढ़ी-मूँछों में प्यार की मुस्कान बिखर गयी। शिवाजी महाराज के पुत्र का स्वागत करते हुए उनकी बूढ़ी पीठ नम्रता से और भी झुक गयी। संगम पर पूजा-पाठ आरम्भ था। किन्तु संभाजी का ध्यान उस पूजा-अर्चना की ओर रंचमात्र भी नहीं था। वे नदी के पूर्वी छोर की ओर गर्दन घुमाकर बार-बार देख रहे थे। देखते-देखते प्रभात का प्रकाश फैल गया। संगम का हरा परिसर साफ सम्भाजी 109
साफ दिखने लगा। घाट पर पंछियों का कलरव और भावुक भक्तों का शोर बढ़ने लगा। नदी में अनेक स्थानों पर गहरी खाई बन गयी थी। वैसे नदी में कमर के बराबर ही पानी था। अनेक भक्त इस पार से उस पार तक आ जा रहे थे। खेलोजी उनकी ओर बड़ी स्नेहभरी दृष्टि से देख रहे थे। शम्भुराजा ने भी वहीं पर स्नान किया। नदी के उस पार के खेत से अचानक कुछ आवाज आयी। एक हरी झंडी कुछ संकेत करके अदृश्य हो गयी। इस दृश्य से खेलोजी चकित हो उठे। किन्तु वह शत्रु का क्षेत्र था, इसलिए खेलोजी ने अधिक ध्यान नहीं दिया। शम्भुराजा ने शीघ्रता से वस्त्र पहने। सिर पर जरीदार रेशमी टोप रखते ही उनका रूप निखर आया। किसी को भी बन्दी बना लेने वाली उनकी आँखें, जादू का प्रभाव डालने वाला गोरा रंग, शिवाजी महाराज जैसी ही गरुड़ सी नाक। उन्हें देखते हुए खेलोजी को लगा कि स्वयं शिवाजी महाराज ही आ गये हैं। इसी धुन में वे युवराज को देखते रह गये। इसी समय शम्भुराजा ने अपने हैवती घोड़े की लगाम खींचकर उसे संकेत किया। घोड़ा उत्साह से नाच उठा और हिनहिनाया। जिस तरह बाघ अपने अगले पैरों को उठाकर झपट्टा लगाता है, उसी तरह घोड़ा अपने अगले पैरों को उठाकर मस्ती से झूम गया। खेलोजी कुछ क्षण के लिए मुग्ध हो गये। युवराज ने नदी के किनारे से परली की ओर घोड़ा ले जाने के बदले सीधे नदी के पानी में उतार दिया। संभाजी राजा के पीछे उनके समर्थक सैनिकों ने भी अपने घोड़ों को नदी में उतार दिया। सूर्योदय के पूर्व ही नदी के उस पार मुगल सैनिकों की एक कतार बहुत पहले से ही आकर खड़ी हो गयी थी। हरे रंग के कुर्ते सलवार पहने, लम्बी लम्बी दाढ़ी-मूँछ वाले मुगल घुड़सवार शम्भुराजा को मुग्ध भाव से देख रहे थे। युवराज के नदी में उतरते ही मुगल घुड़सवारों ने अपने हरे झंडे और अपनी तलवारों को हवा में लहराया। 'अल्लाहो अकबर' और 'जय जय शम्भुमहाराज' के नारे लगाये। यह अप्रिय और अभद्र दृश्य देखकर खेलोजी का कलेजा काँप उठा। वे भी जो वस्त्र पहने थे उनके साथ ही नदी में छलाँग लगा दी। हाथ में नंगी तलवार लेकर शम्भुराजा का पीछा करते हुए वे चिल्लाये—"छोटे राजा, कहाँ चले?" शम्भुराजा ने शीघ्रता से गर्दन घुमाई और दुखी स्वर में बोले, "खेलोजी, बाबा, अब सब समाप्त हो चुका है। इसके बाद आपके और हमारे रास्ते अलग अलग हैं।" "ऐसे क्या कट्टर शत्रु की तरह बोल रहे हो, युवराज? शिवाजी महाराज का पुत्र और खान की छाया में? पूनम कैसे खड़ी होगी अमावस के साथ?" खेलोजी जी-जान से युवराज को मना रहे थे, "बस युवराज! अब इससे आगे एक कदम भी न बढ़ाओ। चुपचाप वापस आ जाओ।" 110 · सम्भाजी
शम्भूराजा ने पानी में ही घोड़े को घुमाया। उन्होंने आश्चर्य से देखा कि खेलोजी के पीछे तीस चालीस मराठे पानी में उतर चुके थे। वे शम्भूराजा की ओर ही बढ़ रहे थे ! उन्हें युवराज को इस अविचारपूर्ण कार्य से पीछे लौटाना था। युवराज को भय लगा कि ये मराठे उन पर बरसेंगे और उन्हें आगे जाने से रोकेंगे। इसलिए वे म्यान से तलवार खींचकर सावधान हो गये। खेलोजी ने जान की बाजी लगाकर अपने घोड़े को आगे दौड़ाया। युवराज के समीप जाकर ये बूढ़ी हड्डियाँ आँखों में आँसू भरकर बोलीं, "नहीं युवराज ! ऐसी बात मुँह से न निकालो। आपके इस कृत्य से शिवाजी महाराज का कलेजा चूर चूर हो जाएगा।" शम्भूराजा ने घोड़े पर से कृष्णा का पानी हाथ में लिया और गरजती आवाज में बोले, "खेलो बाबा, कृष्णमाता की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, उचित समय आने पर आपको मालूम हो जाएगा कि संभाजी कौन है ? और कैसा है ? सह्याद्रि के साथ सारी दुनिया को जीतकर आपके पास प्रणाम करने के लिए आऊँगा।" यकायक कृष्णा नदी में भाग-दौड़ का खेल शुरू हो गया। 'रुकिए रुकिए' कहते हुए मगठे युवराज के पीछे दौड़ पड़े। युवराज का घोड़ा आगे न बढ़े इसलिए घेरा बनाकर पानी में गोल गोल घूमने लगे। यह देखकर कि मराठे युवराज को रोक रहे हैं, मुग़ल सैनिक पानी में कूद पड़े। मराठों के प्रयत्न का वे विरोध करने लगे। खेलोजी बहुत हठी स्वभाव के थे। शम्भूराजा ने देखा कि खेलोजी का घोड़ा उनके घोड़े की पूँछ से भिड़ रहा है। युवराज हड़बड़ा गये। तलवार से खेलोजी का सामना करना आसान था। किन्तु यदि खेलोजी ने 'शम्भू बच्चे शम्भू बच्चे' कहते हुए युवराज को गले से लगा लिया होता तो उनकी ममता के आगे युवराज की तलवार नीचे गिर जाती। उस क्षण को टालने के लिए शम्भूराजा ने सीधे किनारे की ओर अपना घोड़ा दौड़ाया। युवराज के सामने एक खड़ी चट्टान थी। यह चट्टान बहुत ऊँची थी। इसके पार जाने के लिए घोड़े को दाहिनी या बाईं ओर तिरछे होकर ले जाने की आवश्यकता थी। किन्तु उम भागा दौड़ी को टालने की धुन में युवराज ने अपना घोड़ा सीधे सामने की ओर दौड़ाया। किन्तु खड़ी चट्टान का अनुमान लगाकर घोड़ा अपनी जगह पर नाचने और हिनहिनाने लगा। युवराज ने क्रुद्ध होकर जोर से लगाम खींची और एड़ लगाई घोड़े की नाक से खून की धारा बहने लगी। किन्तु अपनी पीठ पर बैठे मालिक की जरूरत घोड़े की समझ में आयी। वह सचेत हो गया और खड़ी चट्टान पर चढ़ने की कोशिश करने लगा। घोड़ा भी समझ गया था कि इस खड़ी चट्टान को पार करना उसके बूते का नहीं था, फिर भी वह यह पागल प्रयत्न कर रहा था। वह बहुत प्रयत्नपूर्वक आगे बढ़ने लगा और इस प्रयत्न में ही नीचे गिर गया। घोड़े के साथ ही युवराज की भी मृत्यु का क्षण आ गया था, किन्तु उन्होंने घोड़े के गिरने के पहले ही छलाँग लगाकर अपने को बचा लिया। सम्भाजी 111
उस कठिन प्रयास में हैबती घोड़े की हड्डियाँ टूट गयी थीं। फेफड़े के फट जाने के कारण वह अन्तिम साँस ले रहा था। उसी समय किनारे पर मुगल सैनिक 'आइए युवराज, जल्द आइए' कहकर पुकार रहे थे। पीछे की ओर खेलोबाबा की बाँहें पकड़कर कुछ मुसलमान सिपाही उन्हें रोक रहे थे। घोड़े का सीना फट जाने से बहुत खून बह रहा था। उसकी नाक से तेज आवाज आ रही थी। पैरों की छटपटाहट में उसकी वेदना की तड़प को युवराज से देखा नहीं गया। किनारे खड़ी मुगल सेना को भूलकर वे पीछे भागे और घोड़े की जीन से बँधी चमड़े की थैली में पानी भरकर घोड़े के मुँह में डालने लगे। देखते देखते घोड़े का शरीर अकड़ गया। उसने हमेशा के लिए अपनी आँखें बन्द कर लीं। युवराज एक बार फिर निश्चय करके किनारे पर खड़ी मुगल सेना की ओर चल पड़े। हरे रंग में सजी मुगल सेना की ओर चलते समय उनका कलेजा फटा जा रहा था। कुछ तो भय भी उन्हें आगे जाने से रोक रहा था। नये रास्ते पर कदम बढ़ाने से पहले यह कैसा अपशकुन हुआ? किन्तु जाएँगे भी कहाँ? पीछे छूट गये स्वराज्य के वे खेत, वे लोग, वे किले, वे महल भी तो उनके कहाँ थे? सामने वाले हरे दृश्य के आगे क्या रखा है? यह भी ठीक ठीक ज्ञात नहीं था। किन्तु क्या वीरता ही मनुष्य का सच्चा आभूषण नहीं है? युवराज सोचते हैं—'अपने दादाजी शाहजी महाराज आदिलशाह के दरबार में नौकरी करते थे। तब पिताजी ने आदिल शाही के विरुद्ध बगावत नहीं की थी क्या? आज स्वराज्य की अविश्वास और अन्याय की खाई में सड़कर मरने की बजाय परदेश में प्रयत्न करेंगे, पराक्रम करेंगे, यश की माला पहनेंगे और फिर से पिताजी का मंगल आशीर्वाद लेने के लिए स्वराज्य में वापस आ जाएँगे। यह सब करने के लिए दिलेरखान नामक सोने की मछली के मुँह में बहादुरी से छलाँग के अतिरिक्त अपने हाथ में बचा ही क्या है?' पाँच सह्याद्रि का बछड़ा मुगलाई के जंगल को रौंदता हुआ तेजी से बढ़ा जा रहा था। उसके साथ चलने वाली मुगल सेना की टुकड़ी हुड़दंग मचाती हुई चल रही थी। यह घटना ही मुगलों के लिए विलक्षण थी। मराठों का युवराज बिना प्रयत्न के ही मुगलों के काँटे में फँस रहा था। इस खबर को सुनते ही दिल्ली के औरंगजेब से लेकर दक्षिण के दिलेरखान तक सभी अमीर उमराव प्रसन्न होने वाले थे। 112 :: सम्भाजी
जैसे-जैसे अपना प्रदेश पीछे छूटने लगा वैसे-वैसे शम्भूराजा के मन में घबराहट होने लगी। जलती हुई आग से बचने के लिए जब कोई आदमी बाहर निकलता है तो भी अंगारों के कण चटककर उसे क्रूरतापूर्वक जलाते हैं। ऐसी ही मानसिक अवस्था शम्भूराजा की हो रही थी। उनके इस कृत्य में बहादुरी से अधिक धोखा था। वाठार गाँव के पास दिलेरखान का सूबेदार एखलासखान और उसका भतीजा गैरत तीन हजार की सेना लेकर खड़े युवराज की राह देख रहे थे। उन दोनों ने युवराज का स्वागत किया। दिलेरखान द्वारा दी गयी हिदायतों के अनुकूल सब कुछ हो रहा था। सालपा घाट पीछे छूट गया। नीरा नदी भी पीछे गयी। कुरकुंभ गाँव के पास सजाये गये शामियाने के पास दिलेरखान पागल की भाँति इधर-उधर घूम रहा था। उसने जान बूझकर युवराज के स्वागत के लिए एखलास को आगे भेजा था। उसका मराठा जाति पर बिलकुल विश्वास नहीं था। उसे शंका थी कि कहीं शिवाजी और संभाजी बाप बेटे ने कोई षड्यन्त्र न रचा हो? इसी आशंका से उसका मन सम्भ्रमित हो रहा था। दिलेरखान बीच बीच में गद्गद होकर हँसता भी था। क्योंकि एक घंटा पहले दो घुड़सवार यह खुशखबरी लेकर शामियाने में पहुँचे थे 'कि शिवाजी का बेटा अपनी सेना में आ गया है।' उन दूतों के इस सन्देश पर दिलेरखान को क्षणभर के लिए विश्वास ही नहीं हुआ। पुरन्दर के जानलेवा घेरे में जब दिलेरखान ने मुरारबाजी देशपांडे की गर्दन काटी थी और खून से लथपथ हाथों को अपने किनखाफी कुर्ते से पोंछा था तब भी उस आसुरी आनन्द में आज जितनी खुशी नहीं मिली थी। अचानक दिलेरखान की दृष्टि दो-तीन कोस के मैदान की ओर गयी। आसमान में धूल के बादल उड़ाते हुए पागल घोड़े मस्ती से दौड़ रहे थे। कुछ समय में ही सेना दिलेरखान की दृष्टि सीमा में आ गयी। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने अपनी आँखों से आनन्द के आँसू पोंछे। सामने देखता है तो सिर से पाँव तक सजाये गये हाथी हौदे में एखलासखान के साथ संभाजी राजा रोब से बैठे थे। शिवाजी महाराज और संभाजी की मुखाकृति में पर्याप्त समानता थी। दिलेरखान उस हौदे को टकटकी लगाए पागल की तरह देखता रहा। परिचारकों का दल आगे दौड़ा। उन्होंने हाथी से उतरने के लिए सीढ़ी खड़ी की। किन्तु दिलेरखान, स्वयं ही, सीढ़ियों से चढ़कर तेजी से ऊपर गया। "आइए दक्खिन की शान! शेर संभाजी महाराज आइए।" ऐसा कहते हुए उसने वहीं पर संभाजी को बाँहों में भर लिया। हज की यात्रा में जैसे छूटा हुआ कोई छोटा भाई दस-बीस वर्ष बाद वापस आ गया हो। उसके आने की जैसी खुशी होती सम्भाजी :: 113