सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
अथ लै का अंग ७ दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ लय का स्वरूप लक्षण दादू लै लागी तब जाणिये, जे कबहुँ छूट न जाइ । जीवत यों लागी रहै, मूवां मंझ समाइ ॥ 2 ॥ दादू जे नर प्राणी लै गता, सोई गत ह्वै जाइ । जे नर प्राणी लै रता, सो सहजैं रहै समाइ ॥ 3 ॥ सब तज गुण आकार के, निश्चल मन ल्यौ लाइ । आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहै समाइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 तन मन पवना पंच गह, निरंजन ल्यौ लाइ । जहाँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू सहज समाइ ॥ 5 ॥ अर्थ अनुपम आप है, और अनर्थ भाई । दादू ऐसी जानि कर, तासौं ल्यौ लाई ॥ 6 ॥ लै लगाने की विधि ज्ञान भक्ति मन मूल गह, सहज प्रेम ल्यौ लाइ । दादू सब आरंभ तजि, जनि काहू संग जाइ ॥ 7 ॥ अगम संस्कार पहली था सो अब भया, अब सो आगे होइ । दादू तीनों ठौर की, बूझै बिरला कोइ ॥ 8 ॥ अध्यात्म योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव । मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥ 9 ॥ सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि । लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 10 ॥ दादू बिन पायन का पंथ है, क्यों कर पहुँचे प्राण । विकट घाट औखट खरे, मांहि शिखर असमान ॥ 11 ॥ मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम । शब्द गुरु का ताजणा, कोई पहुँचे साधु सुजान ॥ 12 ॥ सूक्ष्म मार्ग किहिं मारग ह्वै आइया, किहिं मारग ह्वै जाइ । दादू कोई ना लहै, केते करैं उपाइ ॥ 13 ॥ शून्य हि मार्ग आइया, शून्य हि मारग जाइ । चेतन पैंडा सुरति का, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 14 ॥ दादू पारब्रह्म पैंडा दिया, सहज सुरति लै सार । मन का मारग मांहि घर, संगी सिरजनहार ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 लय राम कहै जिस ज्ञान सौं, अमृत रस पीवै । दादू दूजा छाड़ि सब, लै लागी जीवै ॥ 16 ॥ राम रसायन पीवतां, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ । दादू आत्म राम सौं, सदा रहै ल्यौ लाइ ॥ 17 ॥ रस रंग सुरति समाइ सन्मुख रहै, जुग जुग जन पूरा। दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवै सूरा ॥ 18 ॥ अध्यात्म दादू जहाँ जगद्गुरु रहत है, तहाँ जे सुरति समाइ । तो इन ही नैनहुँ उलट कर, कौतुक देखै आइ ॥ 19 ॥ अख्यूं पसण के पिरी, भिरे उलथौं मंझ। जिते बैठो मां पिरी, निहारी दो हंझ ॥ 20 ॥ दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण । सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥ 21 ॥ सुरति अपूठी फेरि कर, आत्म मांही आन । लाग रहै गुरुदेव सौं, दादू सोई सयान ॥ 22 ॥ सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी जहाँ आत्म तहँ राम है, सकल रह्या भरपूर । अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 23 ॥ दादू अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, सदा सुरति सौं गाइ । यहु मन नाचै मगन ह्वै, भावै ताल बजाइ ॥ 24 ॥ दादू पावै सुरति सौं, बाणी बाजै ताल । यहु मन नाचै प्रेम सौं, आगे दीन दयाल ॥ 25 ॥ दादू सब बातन की एक है, दुनिया तैं दिल दूर । सांई सेती संग कर, सहज सुरति लै पूर ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 दादू एक सुरति सौं सब रहें, पंचों उनमनि लाग। यहु अनुभव उपदेश यहु, यहु परम योग वैराग ॥ 27 ॥ दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अंग। अरस परस मिल एक है, सन्मुख रहबा संग ॥ 28 ॥ सुरति सदा सन्मुख रहै, जहाँ तहाँ लै लीन। सहज रूप सुमिरण करै, निष्कामी दादू दीन ॥ 29 ॥ सुरति सदा साबति रहै, तिनके मोटे भाग। दादू पीवैं राम रस, रहें निरंजन लाग ॥ 30 ॥ सूक्ष्म सौंज दादू सेवा सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं लाइ। जहाँ अविनाशी देव है, तहँ सुरति बिना को जाइ ॥ 31 ॥ विनती दादू ज्यों वै बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहँ ठाम। लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवै राम ॥ 32 ॥ अध्यात्म सहज योग सुख में रहै, दादू निर्गुण जाण। गंगा उलटी फेरि कर, जमुना मांहि आण ॥ 33 ॥ लय परआतम सो आत्मा, ज्यों जल उदक समान। तन मन पाणी लौंण ज्यों, पावै पद निर्वाण ॥ 34 ॥ मन ही सौं मन सेविये, ज्यों जल जलहि समाइ। आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 35 ॥ छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ। दादू ऐसे मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 36 ॥ यों मन तजै शरीर को, ज्यों जागत सो जाइ। दादू बिसरै देखतां, सहज सदा ल्यौ लाइ ॥ 37 ॥
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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 जिहि आसन पहली प्राण था, तिहि आसन ल्यौ लाइ । जे कुछ था सोई भया, कछू न व्यापै आइ ॥ 38 ॥ तन मन अपणा हाथ कर, ताहि सौं ल्यौ लाइ । दादू निर्गुण राम सौं, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 39 ॥ एक मना लागा रहै, अंत मिलेगा सोइ । दादू जाके मन बसै, ताको दर्शन होइ ॥ 40 ॥ दादू निबहै त्यौं चलै, धीरे धीरज मांहि । परसेगा पीव एक दिन, दादू थाके नांहि ॥ 41 ॥ लय जब मन मृतक ह्वै रहै, इन्द्री बल भागा । काया के सब गुण तजै, निरंजन लागा ॥ 42 ॥ आदि अंत मधि एक रस, टूटै नहीं धागा । दादू ऐकै रह गया, तब जाणी जागा ॥ 43 ॥ जब लग सेवग तन धरै, तब लग दूसर आहि । एकमेक ह्वै मिलि रहै, तो रस पीवन तैं जाइ ॥ 44 ॥ ये दोनों ऐसी कहैं, कीजे कौन उपाइ । ना मैं एक, न दूसरा, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 45 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य सातवां लै का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 7 ॥ साखी 45 ॥
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निष्कर्म पतिव्रता का अंग www.dadooram.org
अथ निष्कर्मी पतिव्रता का अंग ८ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।। एक तुम्हारे आसरे, दादू इहि विश्वास । राम भरोसा तोर है, नहिं करणी की आस ।। 2 ।। रहणी राजस ऊपजै, करणी आपा होइ । सबथैं दादू निर्मला, सुमिरण लागा सोइ ।। 3 ।। दादू मन अपना लै लीन कर, करणी सब जंजाल । साधू सहजैं निर्मला, आपा मेट संभाल ।। 4 ।।
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 दादू सिद्धि हमारे सांइयां, करामात करतार । ऋद्धि हमारे राम है, आगम अलख अपार ॥ 5 ॥ गोविन्द गोसांई तुम्हीं आमचे गुरु, तुम्हे अमचां ज्ञान । तुम्हे अमचे देव, तुम्हे अमचा ध्यान ॥ 6 ॥ तुम्हीं आमची पूजा, तुम्हीं आमची पाती । तुम्हीं आमचा तीर्थ, तुम्हीं आमची जाती ॥ 7 ॥ तुम्हीं आमचा नाद, तुम्हीं आमचा भेद । तुम्हीं आमचा पुराण, तुम्हीं आमचा वेद ॥ 8 ॥ तुम्हीं आमची युक्ति, तुम्हीं आमचा योग । तुम्हीं आमचा वैराग्य, तुम्हीं आमचा भोग ॥ 9 ॥ तुम्हीं आमची जीवनी, तुम्हीं आमचा जप । तुम्हीं आमचा साधन, तुम्हीं आमचा तप ॥ 10 ॥ तुम्हीं आमचा शील, तुम्हीं आमचा संतोष । तुम्हीं आमची मुक्ति, तुम्हीं आमचा मोक्ष ॥ 11 ॥ तुम्हीं आमचा शिव, तुम्हीं आमची शक्ति। तुम्हीं आमचा आगम, तुम्हीं आमची उक्ति ॥ 12 ॥ तूं सत्य तूं अविगत तूं अपरंपार, तूं निराकार तुम्हचा नाम । दादू चा विश्राम, देहु देहु अवलम्बन राम ॥ 13 ॥ दादू राम कहूँ ते जोड़बा, राम कहूँ ते साखि । राम कहूँ ते गाइबा, राम कहूँ ते राखि ॥ 14 ॥ दादू कुल हमारे केशवा, सगा तो सिरजनहार । जाति हमारी जगद्गुरू, परमेश्वर परिवार ॥ 15 ॥ दादू एक सगा संसार में, जिन हम सिरजे सोइ । मनसा वाचा कर्मणा, और न दूजा कोइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 स्मरण नाम निःसंशय सांई सन्मुख जीवतां, मरतां सन्मुख होइ । दादू जीवन मरण का, सोच करै जनि कोइ ॥ 17 ॥ पतिव्रत साहिब मिल्या तो सब मिले, भेंटे भँटा होइ । साहिब रह्या तो सब रहे, नहीं तो नाहीं कोइ ॥ 18 ॥ दादू रीझै राम पर, अनत न रीझै मन। मीठा भावै एक रस, दादू सोई जन ॥ 19 ॥ दादू मेरे हृदय हरि बसै, दूजा नांही और। कहो कहाँ धौं राखिये, नहीं आन को ठौर ॥ 20 ॥ दादू नारायण नैना बसै, मनही मोहन राइ। हिरदा मांही हरि बसै, आतम एक समाइ ॥ 21 ॥ दादू तन मन मेरा पीव सौं, एक सेज सुख सोइ। गहिला लोग न जाणही, पच पच आपा खोइ ॥ 22 ॥ दादू एक हमारे उर बसै, दूजा मेल्या दूर। दूजा देखत जाइगा, एक रह्या भरपूर ॥ 23 ॥ निश्चल का निश्चल रहै, चंचल का चल जाइ। दादू चंचल छाड़ि सब, निश्चल सौं ल्यौ लाइ ॥ 24 ॥ साहिब रहतां सब रह्या, साहिब जातां जाइ। दादू साहिब राखिये, दूजा सहज स्वभाइ ॥ 25 ॥ मन चित मनसा पलक मैं, सांई दूर न होइ। निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥ 26 ॥ कथनी बिना करणी जहाँ नाम तहँ नीति चाहिये, सदा राम का राज। निर्विकार तन मन भया, दादू सीझै काज ॥ 27 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 सुन्दरी विलाप जिसकी खूबी, खूब सब, सोई खूब सँभार। दादू सुन्दरी खूब सौं, नखशिख साज सँवार ॥ 28 ॥ दादू पंच आभूषण पीव कर, सोलह सब ही ठांव। सुन्दरी यहु श्रृंगार करि, ले ले पीव का नांव ॥ 29 ॥ यहु व्रत सुन्दरी ले रहै, तो सदा सुहागिनी होइ। दादू भावै पीव कौं, ता सम और न कोइ ॥ 30 ॥ पतिव्रता निष्काम साहिब जी का भावता, कोई करै कलि मांहि। मनसा वाचा कर्मना, दादू घटि घटि नांहि ॥ 31 ॥ आज्ञा मांहीं बैसै ऊठै, आज्ञा आवै जाइ। आज्ञा मांहीं लेवै देवै, आज्ञा पहरै खाइ ॥ 32 ॥ आज्ञा मांही बाहर भीतर, आज्ञा रहै समाइ। आज्ञा मांही तन मन राखै, दादू रहै ल्यौ लाइ ॥ 33 ॥ पतिव्रता गृह आपने, करै खसम की सेव। ज्यों राखै त्यों ही रहै, आज्ञाकारी टेव ॥ 34 ॥ सुन्दरी विलाप दादू नीच ऊँच कुल सुन्दरी, सेवा सारी होइ। सोई सुहागिन कीजिये, रूप न पीजे धोइ ॥ 35 ॥ दादू जब तन मन सौंप्या राम को, ता सन क्या व्यभिचार। सहज शील संतोष सत, प्रेम भक्ति लै सार ॥ 36 ॥ पर पुरुषा सब परहरै, सुन्दरी देखै जागि। अपणा पीव पिछाण करि, दादू रहिये लागि ॥ 37 ॥ आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भरतार। हूँ अबला समझं नहीं, तूं जानै करतार ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 जिसका तिसकौं दीजिये, सांई सन्मुख आइ। दादू नख शिख सौंप सब, जनि यहु बंट्या जाइ ॥ 39 ॥ सारा दिल सांई सौं राखै, दादू सोई सयान। जे दिल बंटै आपना, सो सब मूढ़ अयान ॥ 40 ॥ दादू सारों सौं दिल तोरि कर, सांई सौं जोड़ै। सांई सेती जोड़ करि, काहे को तोड़ै ॥ 41 ॥ साहिब देवै राखणा, सेवक दिल चोरै। दादू सब धन साह का, भूला मन थोरै ॥ 42 ॥ पतिव्रत दादू मनसा वाचा कर्मना, अंतर आवै एक। ताको प्रत्यक्ष राम जी, बातें और अनेक ॥ 43 ॥ दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव। अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥ 44 ॥ दादू मनसा वाचा कर्मना, हरि जी सौं हित होइ। साहिब सन्मुख संग है, आदि निरंजन सोइ ॥ 45 ॥ दादू मनसा वाचा कर्मणा, आतुर कारण राम। सम्रथ सांई सब करै, परगट पूरे काम ॥ 46 ॥ नारी पुरुषा देख करि, पुरुषा नारी होइ। दादू सेवक राम का, शीलवन्त है सोइ ॥ 47 ॥ आन लग्न व्यभिचार पर पुरुषा रत बांझणी, जाणे जे फल होइ। जन्म बिगोवै आपना, दादू निष्फल सोइ ॥ 48 ॥ दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ। ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥ 49 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 पतिव्रत नारी सेवक तब लगै, जब लग सांई पास। दादू परसै आन को, ताकी कैसी आस ॥ 50 ॥ आन लगन व्यभिचार दादू नारी पुरुष को, जाने जे वश होइ। पीव की सेवा ना करै, कामणिगारी सोइ ॥ 51 ॥ करूणा कीया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार। क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भर्तार ॥ 52 ॥ आन लग्न व्यभिचार करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक। अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥ 53 ॥ दादू पतिव्रता के एक है, व्यभिचारिणी के दोइ। पतिव्रता व्यभिचारिणी, मेला क्यों कर होइ ॥ 54 ॥ पतिव्रता के एक है, दूजा नांही आन। व्यभिचारिणी के दोइ हैं, पर घर एक समान ॥ 55 ॥ सुन्दरी सुहाग दादू पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग। जे जे जैसी ताहि सौं, खेलैं तिस हि रंग ॥ 56 ॥ पतिव्रत दादू रहता राखिये, बहता देइ बहाइ। बहते संग न जाइये, रहते सौं ल्यौ लाइ ॥ 57 ॥ जनि बाझैं काहू कर्म सौं, दूजै आरंभ जाइ। दादू ऐकै मूल गहि, दूजा देइ बहाइ ॥ 58 ॥ बावें देखि न दाहिने, तन मन सन्मुख राखि। दादू निर्मल तत्त्व गह, सत्य शब्द यहु साखि ॥ 59 ॥ दादू दूजा नैन न देखिये, श्रवणहुँ सुने न जाइ। जिह्या आन न बोलिये, अंग न और सुहाइ ॥ 60 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 चरणहुँ अनत न जाइये, सब उलटा मांहि समाइ । उलट अपूठा आप में, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 61 ॥ दादू दूजे अंतर होत है, जनि आने मन मांहि । तहाँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥ 62 ॥ भ्रम विध्वंस भ्रम तिमिर भाजै नहीं, रे जिय आन उपाइ । दादू दीपक साज ले, सहजैं ही मिट जाइ ॥ 63 ॥ दादू सो वेदन नहीं बावरे, आन किये जे जाइ । सब दुख भंजन सांइयाँ, ताहि सौं ल्यौ लाइ ॥ 64 ॥ दादू औषध मूली कुछ नहीं, ये सब झूठी बात । जे औषध ही जीविये, तो काहे को मर जात ॥ 65 ॥ पतिव्रत मूल गहै सो निश्चल बैठा, सुख में रहै समाइ । डाल पान भ्रमत फिरै, वेदों दिया बहाइ ॥ 66 ॥ सो धक्का सुनहाँ को देवै, घर बाहर काढै । दादू सेवक राम का, दरबार न छाड़े ॥ 67 ॥ साहिब का दर छाड़ि कर, सेवक कहीं न जाय । दादू बैठा मूल गह, डालों फिरै बलाय ॥ 68 ॥ दादू जब लग मूल न सींचिये, तब लग हरा न होइ । सेवा निष्फल सब गई, फिर पछताना सोइ ॥ 69 ॥ दादू सींचे मूल के, सब सींच्या विस्तार । दादू सींचे मूल बिन, बाद गई बेगार ॥ 70 ॥ सब आया उस एक में, डाल पान फल फूल । दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड़या मूल ॥ 71 ॥ खेत न निपजै बीज बिन, जल सींचे क्या होइ । सब निष्फल दादू राम बिन, जानत है सब कोइ ॥ 72 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 दादू जब मुख मांहि मेलिये, तब सब ही तृप्ता होइ। मुख बिन मेले आन दिश, तृप्ति न माने कोइ ॥ 73 ॥ जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि। डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥ 74 ॥ दादू टीका राम को, दूसर दीजे नांहि। ज्ञान ध्यान तप भेष पक्ष, सब आये उस मांहि ॥ 75 ॥ साधू राखै राम को, संसारी माया। संसारी पल्लव गहै, मूल साधू पाया ॥ 76 ॥ आन लगन व्यभिचार दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध। कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥ 77 ॥ सब चतुराई देखिए, जे कुछ कीजै आन। दादू आपा सौंपि सब, पीव को लेहु पिछान ॥ 78 ॥ पतिव्रत दादू दूजा कुछ नहीं, एक सत्य कर जान। दादू दूजा क्या करै, जिन एक लिया पहचान ॥ 79 ॥ दादू कोई वांछै मुक्ति फल, कोइ अमरापुर वास। कोई वांछै परमगति, दादू राम मिलन की प्यास ॥ 80 ॥ तुम हरि हिरदै हेत सौं, प्रगटहु परमानन्द। दादू देखै नैन भर, तब केता होइ आनन्द ॥ 81 ॥ प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि। रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहें तिनको देहि ॥ 82 ॥ कोटि वर्ष क्या जीवना, अमर भये क्या होइ। प्रेम भक्ति रस राम बिन, का दादू जीवन सोइ ॥ 83 ॥ कछू न कीजे कामना, सगुण निर्गुण होहि। पलट जीव तैं ब्रह्म गति, सब मिलि मानैं मोहि ॥ 84 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 घट अजरावर ह्वै रहै, बन्धन नांही कोइ । मुक्ता चौरासी मिटै, दादू संशय सोइ ॥ 85 ॥ लाँबि रस निकटि निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव । दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 86 ॥ परिचय पतिव्रत सालोःय संगति रहै, सामीप्य सन्मुख सोइ । सारूप्य सारीखा भया, सायुज्य एकै होइ ॥ 87 ॥ राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार । अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥ 88 ॥ आन लग्न व्यभिचार स्वारथ सेवा कीजिये, ताथैं भला न होइ । दादू ऊसर बाहि कर, कोठा भरै न कोइ ॥ 89 ॥ सुत वित मांगैं बावरे, साहिब सी निधि मेलि । दादू वे निष्फल गये, जैसे नागर बेलि ॥ 90 ॥ फल कारण सेवा करै, जाचै त्रिभुवन राव । दादू सो सेवक नहीं, खेलै अपना दाव ॥ 91 ॥ सहकामी सेवा करैं, मागैं मुग्ध गँवार । दादू ऐसे बहुत हैं, फल के भूँचनहार ॥ 92 ॥ स्मरण नाम महात्म तन मन लै लागा रहै, राता सिरजनहार । दादू कुछ मांगैं नहीं, ते बिरला संसार ॥ 93 ॥ दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि । राई मन बैसंधरा, केते काठ जलांहि ॥ 94 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 करतूति कर्म कर्मै कर्म काटै नहीं, कर्मै कर्म न जाइ। कर्मै कर्म छूटै नहीं, कर्मै कर्म बँधाइ ॥ 95 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य आठवां निष्कर्मी पतिव्रता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 8 ॥ साखी 95 ॥
[दादूराम / राम / सत्यराम]
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चितावनी का अंग www.dadooram.org अथ चितावनी का अंग ९ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ १ ॥ दादू जे साहिब कौं भावै नहीं, सो हम थैं जनि होइ । सतगुरु लाजै आपणा, साध न मानैं कोइ ॥ २ ॥ दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो सब परिहर प्राण । मनसा वाचा कर्मणा, जे तूं चतुर सुजाण ॥ ३ ॥ दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो जीव न कीजी रे । परिहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजी रे ॥ ४ ॥
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श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9 दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो बाट न बूझी रे । सांई सौं सन्मुख रही, इस मन सौं झूझी रे ॥ 5 ॥ दादू अचेत न होइये, चेतन सौं चित लाइ । मनवा सूता नींद भर, सांई संग जगाइ ॥ 6 ॥ दादू अचेत न होइये, चेतन सौं करि चित्त । यह अनहद जहाँ थें ऊपजै, खोजो तहाँ ही नित्त ॥ 7 ॥ दादू जन ! कुछ चेत कर, सौदा लीजे सार । निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥ 8 ॥ स्मरण नाम चितावणी दादू कर सांई की चाकरी, ये हरि नाम न छोड़ । जाना है उस देश को, प्रीति पिया सौं जोड़ ॥ 9 ॥ आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग । दादू अवसर जात है, जाग सकै तो जाग ॥ 10 ॥ बार बार यह तन नहीं, नर नारायण देह । दादू बहुरि न पाइये, जन्म अमोलिक येह ॥ 11 ॥ एका एकी राम सौं, कै साधु का संग । दादू अनत न जाइये, और काल का अंग ॥ 12 ॥ दादू तन मन के गुण छाड़ि सब, जब होइ नियारा । तब अपने नैनहुं देखिये, प्रगट पीव प्यारा ॥ 13 ॥ दादू झांती पाये पसु पिरी, अंदरि सो आहे । होणी पाणे बिच्च में, महर न लाहे ॥ 14 ॥ दादू झांती पाये पसु पिरी, हाणे लाइ न बेर । साथ सभौंई हल्लियो, पोइ पसंदो केर ॥ 15 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
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श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9 धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य आठवां चितावणी का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 9 ॥ साखी 15 ॥ दादूराम सत्यराम
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अथ मन का अंग १० मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥ दादू यहु मन बरजि बावरे, घट में राखि घेरि । मन हस्ती माता बहै, अंकुश दे दे फेरि ॥ 2 ॥ हस्ती छूटा मन फिरे, क्यों ही बँध्या न जाइ । बहुत महावत पच गये, दादू कछु न वशाइ ॥ 3 ॥ जहाँ थैं मन उठ चलै, फेरि तहाँ ही राखि । तहँ दादू लै लीन कर, साध कहैं गुरु साखि ॥ 4 ॥
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२. साखी भाग (मध्यम): माया-विवेक, मन, चित्त-शुद्धि, विश्वास व नाम-माहात्म्य
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 थोरे थोरे हठ किये, रहेगा ल्यौ लाइ। जब लागा उनमनि सौं, तब मन कहीं न जाइ ॥ 5 ॥ आड़ा दे दे राम को, दादू राखै मन। साखी दे सुस्थिर करै, सोई साधू जन ॥ 6 ॥ सोई शूर जे मन गहै, निमख न चलने देइ। जब ही दादू पग भरै, तब ही पकड़ि लेइ ॥ 7 ॥ जेती लहर समंद की, ते ते मनहि मनोरथ मार। वैसे सब संतोंष कर, गहि आत्म एक विचार ॥ 8 ॥ दादू जे मुख मांहीं बोलतां, श्रवणहुँ सुनतां आइ। नैनहुँ माँहैं देखतां, सो अंतर उरझाइ ॥ 9 ॥ दादू चुम्बक देख कर, लोहा लागै आइ। यों मन गुण इन्द्री एक सौं, दादू लीजै लाइ ॥ 10 ॥ मन का आसन जे जीव जानै, तौ ठौर ठौर सब सूझै। पंचों आनि एक घर राखै, तब अगम निगम सब बूझै ॥ 11 ॥ बैठे सदा एक रस पीवै, निर्वैरी कत जूझै। आत्माराम मिलै जब दादू, तब अंग न लागै दूजै ॥ 12 ॥ जब लग यहु मन थिर नहीं, तब लग परस न होइ। दादू मनवा थिर भया, सहज मिलैगा सोइ ॥ 13 ॥ दादू बिन अवलम्बन क्यों रहै, मन चंचल चल जाइ। सुस्थिर मनवा तो रहै, सुमिरण सेती लाइ ॥ 14 ॥ सतगुरु चरण शरण चलि जांहीं, नित प्रति रहिये तिनकी छांहीं। मन स्थिर करि लीजै नाम, दादू कहै तहाँ ही राम ॥ 15 ॥ हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ। दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥ 16 ॥
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