भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू देही मांहि दोइ दिल, इक खाकी इक नूर। खाकी दिल सूझै नहीं, नूरी मंझि हजूर ॥ 227 ॥ नमाज सिजदा दादू हौज हजूरी दिल ही भीतरि, गुसल हमारा सारं । उजू साजि अलह के आगे, तहाँ नमाज गुजारं ॥ 228 ॥ दादू काया मसीत कर पंच जमाती, मन ही मुल्ला इमामं । आप अलेख इलाही आगे, तहँ सिजदा करे सलामं ॥ 229 ॥ दादू सब तन तसबी कहै करीमं, ऐसा करले जापं । रोजा एक दूर कर दूजा, कलमा आपै आपं ॥ 230 ॥ दादू आठों पहर अलह के आगै, इकटक राहिबा ध्यानं । आपै आप अर्श के ऊपर, जहाँ रहै रहमानं ॥ 231 ॥ दादू अट्ठे पहर इबादती, जीवण मरण निबाहि । साहिब दर सेवै खड़ा, दादू छाड़ि न जाहि ॥ 232 ॥ साधु महिमा महात्म अट्ठे पहर अर्श में, ऊभोई आहे । दादू पसे तिनके, अल्लह गाल्हाये ॥ 233 ॥ अट्ठे पहर अर्श में, बैठा पीरी पसन्नि । दादू पसे तिन्न के, जे दीदार लहन्नि ॥ 234 ॥ अट्ठे पहर अर्श में, जिन्हीं रूह रहन्नि । दादू पसे तिन्न के, गुझ्यूं गाल्हि कन्नि ॥ 235 ॥ अट्ठे पहर अर्श में, लुड़ींदा आहीन । दादू पसे तिन्न के, असां खबर दीन ॥ 236 ॥ अट्ठे पहर अर्श में, वजी जे गाह्रीन । दादू पसे तिन्न के, कितेई आहीन ॥ 237 ॥ रस प्रेम प्याला प्रेम प्याला नूर का, आशिक भर दीया । दादू दर दीदार में, मतवाला कीया ॥ 238 ॥

  • 92 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

इश्क सलूनां आशिकां, दरगह तैं दीया। दर्द मोहब्बत प्रेम रस, प्याला भर पीया ॥ 239 ॥ दादू दिल दीदार दे, मतवाला कीया। जहाँ अर्श इलाही आप था, अपना कर लीया ॥ 240 ॥ दादू प्याला नूर दा, आशिक अर्श पीवन्न। अट्ठे पहर अल्लह दा, मुँह दिट्ठे जीवन्न ॥ 241 ॥ आशिक अमली साधु सब, अलख दरीबे जाइ। साहिब दर दीदार में, सब मिल बैठे आइ ॥ 242 ॥ राते माते प्रेम रस, भर भर देहु खुदाइ। मस्तान मालिक कर लिये, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥ 243 ॥ लांबी भक्ति अगाध दादू भक्ति निरंजन राम की, अविचल अविनाशी। सदा सजीवन आतमा, सहजैं परकाशी ॥ 244 ॥ दादू जैसा राम अपार है, तैसी भक्ति अगाध। इन दोनों की मित नहीं, सकल पुकारैं साध ॥ 245 ॥ दादू जैसा अविगत राम है, तैसी भक्ति अलेख। इन दोनों की मित नहीं, सहस मुखां कहै शेष ॥ 246 ॥ दादू जैसा निर्गुण राम है, तैसी भक्ति निरंजन जाणि। इन दोनों की मित नहीं, संत कहैं परमाणि ॥ 247 ॥ दादू जैसा पूरा राम है, तैसी पूरण भक्ति समान। इन दोनों की मित नहीं, दादू नांही आन ॥ 248 ॥ सेवा अखंडित दादू जब लग राम है, तब लग सेवक होइ। अखंडित सेवा एक रस, दादू सेवक सोइ ॥ 249 ॥ दादू जैसा राम है, तैसी सेवा जाणि। पावेगा तब करेगा, दादू सो परमाणि ॥ 250 ॥

  • 93 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 सांई सरीखा सुमिरण कीजे, सांई सरीखा गावै। सांई सरीखी सेवा कीजे, तब सेवक सुख पावै ॥ 251 ॥ परिचय करुणा विनती दादू सेवग सेवा कर डरै, हम थैं कछु न होइ। तूँ है तैसी बन्दगी, कर नहिं जाणै कोइ ॥ 252 ॥ दादू जे साहिब मानै नहीं, तऊ न छाडूं सेव। इहि अवलंबन जीजिये, साहिब अलख अभेव ॥ 253 ॥ सूक्ष्म सौंज अरचा बन्दगी आदि अंति आगे रहे, एक अनुपम देव। निराकार निज निर्मला, कोई न जाणे भेव ॥ 254 ॥ अविनासी अपरंपरा, वार वार नहीं छेव। सो तूँ दादू देखि ले, उर अंतर कर सेव ॥ 255 ॥ दादू भीतर पैसि कर, घट के जड़े कपाट। सांई की सेवा करै, दादू अविगत घाट ॥ 256 ॥ घट परिचै सेवा करै, प्रत्यक्ष देखै देव। अविनाशी दर्शन करै, दादू पूरी सेव ॥ 257 ॥ भ्रम विध्वंस पूजनहारे पास हैं, देही माहिं देव। दादू ताकौं छाड़ कर, बाहर मांडी सेव ॥ 258 ॥ परिचय दादू रमता राम सौं, खेलैं अन्तर मांहि। उलट समाना आप में, सो सुख कतहूँ नाहिं ॥ 259 ॥ दादू जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव। उलट समाने आप में, अंतर नांही पीव ॥ 260 ॥ परगट खेलैं पीव सौं, अगम अगोचर ठांव। एक पलक का देखना, जीवण मरण का नांव ॥ 261 ॥

  • 94 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी आत्म मांही राम है, पूजा ताकी होइ । सेवा वंदन आरती, साध करें सब कोइ ॥ 262 ॥ परिचै सेवा आरती, परिचै भोग लगाइ । दादू उस प्रसाद की, महिमा कही न जाइ ॥ 263 ॥ मांहि निरंजन देव है, मांहि सेवा होइ । मांहि उतारै आरती, दादू सेवक सोइ ॥ 264 ॥ दादू मांहि कीजै आरती, मांहि पूजा होइ । मांहि सतगुरू सेविये, बूझै विरला कोइ ॥ 265 ॥ संत उतारैं आरती, तन मन मंगलचार । दादू बलि बलि वारणैं, तुम पर सिरजनहार ॥ 266 ॥ दादू अविचल आरती, जुग-जुग देव अनन्त । सदा अखंडित एक रस, सकल उतारैं संत ॥ 267 ॥ ॥ सौंज मंत्र ॥ सत्यराम, आत्मा वैष्णव, सुबुद्धि भूमि, संतोष स्थान, मूल मंत्र, मन माला, गुरु तिलक, सत्य संयम, शील शुचिता,ध्यान धोवती, काया कलश, प्रेम जल, मनसामंदिर,निरंजन देव, आत्मा पाती, पुहुप प्रीति, चेतनाचंदन, नवधा नाम, भाव पूजा, मति पात्र, सहज समर्पण, शब्द घंटा, आनन्द आरती, दया प्रसाद, अनन्य एक-दशा, तीर्थ सत्संग, दान उपदेश, व्रत स्मरण, षट्गुण ज्ञान, अजपा जाप, अनुभव आचार, मर्यादा राम, फल दर्शन, अभि अन्तर सदा निरन्तर सत्य सौंज दादू वर्तते, आत्मा उपदेश, अंतर्गति पूजा ॥268 ॥ पीव सौं खेलूँ प्रेम रस, तो जियरे जक होइ । दादू पावै सेज सुख, पड़दा नाहीं कोइ ॥ 269 ॥ सूक्ष्म सौंज सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ । दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥ 270 क ॥

  • 95 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू सूतां पीछे सुरति निरति सूं, बालक ज्यूं पय पीवे। ऐसेअन्तर लगन नाम सूं, आतम जुग-जुग जीवे ॥ 270 ख ॥ ज्यों रसिया रस पीवतां, आपा भूलै और। यों दादू रह गया एक रस, पीवत पीवत ठौर ॥ 271 ॥ जहाँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि। दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥ 272 ॥ दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार। तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥ 273 ॥ तेज पुंज “को बिलसना”, मिलि खेलैं इक ठांव। भर भर पीवै राम रस, सेवा इसका नांव ॥ 274 ॥ अरस परस मिल खेलिये, तब सुख आनंद होइ। तन मन मंगल चहुँ दिशि भये, दादू देखे सोइ ॥ 275 ॥ सुन्दरी सुहाग मस्तक मेरे पांव धर, मंदिर माहीं आव। सैंयां सोवै सेज पर, दादू चम्पै पांव ॥ 276 ॥ ये चारों पद पलंग के, साँई की सुख सेज। दादू इन पर बैस कर, साँई सेती हेज ॥ 277 ॥ प्रेम लहर की पालकी, आतम बैसे आइ। दादू खेलै पीव सौं, यहु सुख कह्या न जाइ ॥ 278 ॥ अर्चना भक्ति दादू देव निरंजन पूजिये, पाती पंच चढाइ। तन मन चंदन चर्चिये, सेवा सुरति लगाइ ॥ 279 ॥ भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने कोइ। दादू भक्ति भगवंत की, देह निरन्तर होइ ॥ 280 ॥ देही मांही देव है, सब गुण तैं न्यारा। सकल निरंतर भर रह्या, दादू का प्यारा ॥ 281 ॥

  • 96 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 जीव पियारे राम को, पाती पंच चढ़ाइ। तन मन मनसा सौंपि सब, दादू विलम्ब न लाइ ॥ 282 ॥ अध्यात्म ध्यान शब्द सुरति लै सान चित्त, तन मन मनसा मांहि। मति बुद्धि पंचों आतमा, दादू अनत न जांहि ॥ 283 ॥ दादू तन मन पवना पंच गहि, ले राखै निज ठौर। जहाँ अकेला आप है, दूजा नांही और ॥ 284 ॥ दादू यहु मन सुरति समेट करि, पंच अपूठे आणि। निकटि निरंजन लाग रहु, संगि सनेही जाणि ॥ 285 ॥ मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि। दादू पंचों पूर ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥ 286 ॥ दादू भीगे प्रेम रस, मन पंचों का साथ। मगन भये रस में रहे, तब सन्मुख त्रिभुवन-नाथ ॥ 287 ॥ दादू शब्दैं शब्द समाइ ले, पर आतम सौं प्राण। यहु मन मन सौं बंधि ले, चित्तैं चित्त सुजान ॥ 288 ॥ दादू सहजैं सहज समाइ ले, ज्ञानैं बंध्या ज्ञान। सूत्रैं सूत्र समाइ ले, ध्यानैं बंध्या ध्यान ॥ 289 ॥ दादू दृष्टैं दृष्टि समाइ ले, सुरतैं सुरति समाइ। समझैं समझ समाइ ले, लै सौं लै ले लाइ ॥ 290 ॥ दादू भावैं भाव समाइ ले, भक्तैं भक्ति समान। प्रेमैं प्रेम समाइ ले, प्रीतैं प्रीति रस पान ॥ 291 ॥ दादू सूरतैं सुरति समाइ रहु, अरु बैनहुं सौं बैन। मन ही सौं मन लाइ रहु, अरु नैनहुँ सौं नैन ॥ 292 ॥ जहाँ राम तहँ मन गया, मन तहँ नैना जाइ। जहाँ नैना तहँ आतमा, दादू सहजि समाइ ॥ 293 ॥

  • 97 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 जीवन मुक्ति, विषय वासना निवृत्ति प्राण खेलै प्राण सौं, मनन खेलै मन । शब्दन खेलै शब्द सौं, दादू राम रतन ॥ 294 ॥ चित्तन खेलै चित्त सौं, बैनन खेलै बैन । नैनन खेलै नैन सौं, दादू प्रकट ऐन ॥ 295 ॥ पाकन खेलै पाक सौं, सारन खेलै सार । खूबन खेलै खूब सौं, दादू अंग अपार ॥ 296 ॥ नूर न खेलै नूर सौं, तेज न खेलै तेज । ज्योतिन खेलै ज्योति सौं, दादू एकै सेज ॥ 297 ॥ पंच पदारथ मन रतन, पवना माणिक होइ । आतम हीरा सुरति सौं, मनसा मोती पोइ ॥ 298 ॥ अजब अनूपम हार है, सांई सरीषा सोइ । दादू आतम राम गल, जहाँ न देखे कोइ ॥ 299 ॥ दादू पंचों संगी संग ले, आये आकासा । आसन अमर अलेख का, निर्गुण नित वासा ॥ 300 ॥ प्राण पवन मन मगन है, संगी सदा निवासा । परचा परम दयालु सौं, सहजैं सुख दासा ॥ 301 ॥ दादू प्राण पवन मन मणि बसै, त्रिकुटि केरे संधि । पाँचों इन्द्री पीव सौं, ले चरणों में बंधि ॥ 302 ॥ प्राण हमारा पीव सौं, यों लागा सहिये । पुहुप वास घृत दूध में, अब कासौँ कहिये ॥ 303 ॥ पाहण लोह बिच वासदेव, ऐसे मिल रहिये । दादू दीन दयाल सौं, संग हि सुख लहिये ॥ 304 ॥ दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्ष्म जैसा अंग । पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥ 305 ॥

  • 98 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर कुछ नांहि। ज्यों पाला पाणी कों मिल्या, त्यों हरिजन हरि मांहि ॥ 306 ॥ दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब सब पड़दा दूर। ऐसैं मिल एकै भया, बहु दीपक पावक पूर ॥ 307 ॥ दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर नांही रेख। नाना विधि बहु भूषणां, कनक कसौटी एक॥ 308 ॥ दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब पलक न पड़दा कोइ। डाल मूल फल बीज में, सब मिल एकै होइ ॥ 309 ॥ फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि। सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥ 310 ॥ दादू काया कटोरा दूध मन, प्रेम प्रीति सौं पाइ। हरि साहिब इहि विधि अंचवै, वेगा वार न लाइ ॥ 311 ॥ टगा टगी जीवन मरण, ब्रह्म बराबरि होइ। परगट खेलै पीव सौं, दादू बिरला कोइ ॥ 312 ॥ दादू निबरा ना रहै, ब्रह्म सरीखा होइ। लै समाधि रस पीजिये, दादू जब लग दोइ ॥ 313 ॥ बेखुद खबर होशियार बाशद, खुद खबर पैमाल। बेकीमत मस्तान गलतान, नूर प्याले ख्याल ॥ 314 ॥ दादू माता प्रेम का, रस में रह्या समाइ। अन्त न आवै जब लगै, तब लग पीवत जाइ ॥ 315 ॥ पीया तेता सुख भया, बाकी बहु वैराग। ऐसे जन थाके नहीं, दादू उनमनि लाग ॥ 316 ॥ निकट निरंजन लाग रघु, जब लग अलख अभेव। दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 317 ॥

  • 99 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

राम रतणि छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ । बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥ 318 ॥ दादू हरि रस पीवतां, कबहुँ अरुचि न होइ । पीवत प्यासा नित नवा, पीवणहारा सोइ ॥ 319 ॥ दादू जैसे श्रवणा दोइ हैं, ऐसे होंहि अपार । राम कथा रस पीजिये, दादू बारंबार ॥ 320 ॥ जैसे नैना दोइ हैं, ऐसे होंहि अनंत । दादू चंद चकोर ज्यों, रस पीवैं भगवंत ॥ 321 ॥ ज्यों रसना मुख एक है, ऐसे होंहि अनेक। तो रस पीवै शेष ज्यों, यों मुख मीठा एक ॥ 322 ॥ ज्यों घट आत्म एक है, ऐसे होंहि असंख । भर भर राखै रामरस, दादू एकै अंक ॥ 323 ॥ ज्यों ज्यों पीवै राम रस, त्यों त्यों बढै पियास । ऐसा कोई एक है, बिरला दादू दास ॥ 324 ॥ राता माता राम का, मतवाला मैमंत । दादू पीवत क्यों रहै, जे जुग जांहि अनन्त ॥ 325 ॥ दादू निर्मल ज्योति जल, वर्षा बारह मास । तिहि रस राता प्राणिया, माता प्रेम पियास ॥ 326 ॥ रोम रोम रस पीजिए, एती रसना होइ । दादू प्यासा प्रेम का, यों बिन तृप्ति न होइ ॥ 327 ॥ तन गृह छाड़ै लाज पति, जब रस माता होइ । जब लग दादू सावधान, कदे न छाड़े कोइ ॥ 328 ॥ आंगण एक कलाल के, मतवाला रस मांहि । दादू देख्या नैन भर, ताके दुविधा नांहि ॥ 329 ॥

  • 100 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

पीवत चेतन जब लगै, तब लग लेवै आइ। जब माता दादू प्रेम रस, तब काहे को जाइ ॥ 330 ॥ दादू अंतर आत्मा, पीवै हरि जल नीर। सौंज सकल ले उद्धरै, निर्मल होइ शरीर ॥ 331 ॥ लांबी रस दादू मीठा राम रस, एक घूँट कर जाऊँ। पुणग न पीछे को रहे, सब हिरदै मांहि समाऊँ ॥ 332 ॥ चिड़ी चंचु भरि ले गई, नीर निघट नहिं जाइ। ऐसा बासण ना किया, सब दरिया मांहि समाइ ॥ 333 ॥ दादू अमली राम का, रस बिन रह्या न जाइ। पलक एक पावै नहीं, तो तबहिं तलफ मर जाइ ॥ 334 ॥ दादू राता राम का, पीवै प्रेम अघाइ। मतवाला दीदार का, मांगै मुक्ति बलाइ ॥ 335 ॥ उज्जवल भँवरा हरि कमल, रस रुचि बारह मास। पीवै निर्मल वासना, सो दादू निज दास ॥ 336 ॥ नैनहुँ सौं रस पीजिये, दादू सुरति सहेत। तन मन मंगल होत है, हरि सौं लागा हेत ॥ 337 ॥ पीवै पिलावै राम रस, माता है हुसियार। दादू रस पीवै घणां, औरों को उपकार ॥ 338 ॥ नाना विधि पिया राम रस, केती भाँति अनेक। दादू बहुत विवेक सौं, आत्म अविगत एक॥ 339 ॥ परिचय महात्म परिचय का पय प्रेम रस, जे कोई पीवै। मतवाला माता रहै, यों दादू जीवै ॥ 340 ॥ परिचय का पय प्रेम रस, पीवै हित चित लाइ। मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ 341 ॥

  • 101 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

परिचय पीवै राम रस, युग युग सुस्थिर होइ। दादू अविचल आतमा, काल न लागै कोइ ॥ 342 ॥ परिचय पीवै राम रस, सो अविनाशी अंग। काल मीच लागै नहीं, दादू सांई संग ॥ 343 ॥ परिचय पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ। मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ 344 ॥ परिचय पीवै राम रस, राता सिरजनहार। दादू कुछ व्यापै नहीं, ते छूटे संसार ॥ 345 ॥ अमृत भोजन राम रस, काहे न विलसै खाइ। काल विचारा क्या करै, रम रम राम समाइ ॥ 346 ॥ सजीवन दादू जीव अजा बिघ काल है, छेली जाया सोइ। जब कुछ बस नहीं काल का, तब मीनी का मुख होइ ॥ 347 ॥ मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढै आकास। पग रहि पूरे साच के, रोपि रह्या हरि पास ॥ 348 ॥ तन मन वृक्ष बबूल का, कांटे लागे सूल। दादू माखण ह्रै गया, काहू का स्थूल ॥ 349 ॥ दादू संषा शब्द है, सुनहाँ संशा मारि। मन मींडक सूं मारिये, शंका सर्प निवारि ॥ 350 ॥ दादू गांझी ज्ञान है, भंजन है सब लोक। राम दूध सब भरि रह्या, ऐसा अमृत पोष ॥ 351 ॥ दादू झूठा जीव है, गढ़िया गोविन्द बैन। मनसा मूंगी पंखि सौं, सूरज सरीखे नैन ॥ 352 ॥ सांई दीया दत घणां, तिसका वार न पार। दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥ 353 ॥

  • 102 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चतुर्थो परिचय का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 4 ॥ साखी 353 ॥ दादूराम राम सत्यराम

  • 103 -

जरणा का अंग www.dadooram.org अथ जरणा का अंग ५ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।। जरणा का स्वरूप को साधु राखै रामधन, गुरु बाइक वचन विचार । गहिला दादू क्यों रहै, मरकत हाथ गँवार ।। 2 ।। जनि खोवै दादू रामधन, हिरदै राखि जनि जाइ । रतन जतन करि राखिये, चिंतामणि चित लाइ ।। 3 ।। दादू मन ही मांहि समझ कर, मन ही मांहि समाइ । मन ही मांहि राखिये, बाहर कहि न जनाइ ।। 4 ।।

  • 104 -

श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5 दादू समझ समाइ रहु, बाहरि कहि न जनाइ। दादू अद्भुत देखिया, तहँ ना को आवै जाइ ॥ 5 ॥ कहि कहि क्या दिखलाइये, सांई सब जाने। दादू प्रगट क्या कहै, कुछ समझि सयाने ॥ 6 ॥ दादू मन हीं मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ। मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ 7 ॥ जरणा करने की विधि लै विचार लागा रहै, दादू जरता जाइ। कबहुँ पेट न आफरै, भावै तेता खाइ ॥ 8 ॥ सोइ सेवक सब जरै, जेती उपजै आइ। कहि न जनावै और को, दादू मांहि समाइ ॥ 9 ॥ सोइ सेवग सब जरै, जेता रस पीया। दादू गुझ गंभीर का, प्रकाश न कीया ॥ 10 ॥ सोई सेवक सब जरै, जे अलख लखावा। दादू राखै रामधन, जेता कुछ पावा ॥ 11 ॥ सोइ सेवक सब जरै, प्रेम रस खेला। दादू सो सुख कस कहै, जहाँ आप अकेला ॥ 12 ॥ सोई सेवक सब जरै, जेता घट परकास। दादू सेवक सब लखै, कहि न जनावै दास ॥ 13 ॥ अजर जरै रस ना झरै, घट मांहि समावै। दादू सेवक सो भला, जे कहि न जनावै ॥ 14 ॥ अजर जरै रस ना झरै, घट अपना भर लेइ। दादू सेवक सो भला, जारै जाण न देइ ॥ 15 ॥ अजर जरै रस ना झरै, जेता सब पीवै। दादू सेवक सो भला, राखै रस जीवै ॥ 16 ॥

  • 105 -

श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5 अजर जरै रस ना झरै, पीवत थाकै नांहि। दादू सेवक सो भला, भर राखै घट मांहि ॥ 17 ॥ साधु महिमा जरणा जोगी जुग जुग जीवै, झरणा मर मर जाइ। दादू जोगी गुरुमुखी, सहजैं रहै समाइ ॥ 18 ॥ जरणा जोगी जग रहै, झरणा परलै होइ। दादू जोगी गुरुमुखी, सहज समाना सोइ ॥ 19 ॥ जरणा जोगी थिर रहै, झरणा घट फूटै। दादू जोगी गुरुमुखी, काल थैं छूटै ॥ 20 ॥ जरणा जोगी जगपती, अविनाशी अवधूत। दादू जोगी गुरुमुखी, निरंजन का पूत ॥ 21 ॥ जरै सु नाथ निरंजन बाबा, जरै सु अलख अभेव। जरै सु जोगी सब की जीवन, जरै सु जग में देव ॥ 22 ॥ जरै सु आप उपावनहारा, जरै सु जगपति सांईं। जरै सु अलख अनूप है, जरै सु मरणा नांहीं ॥ 23 ॥ जरै सु अविचल राम है, जरै सु अमर अलेख। जरै सु अविगत आप है, जरै सु जग में एक ॥ 24 ॥ जरै सु अविगत आप है, जरै सु अपरम्पार। जरै सु अगम अगाध है, जरै सु सिरजनहार ॥ 25 ॥ जरै सु निज निराकार है, जरै सु निज निरधार। जरै सु निज निर्गुणमयी, जरै सु निज तत सार ॥ 26 ॥ जरै सु पूरण ब्रह्म है, जरै सु पूरणहार। जरै सु पूरण परमगुरु, जरै सु प्राण हमार ॥ 27 ॥ दादू जरै सु ज्योति स्वरूप है, जरै सु तेज अनन्त। जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥ 28 ॥

  • 106 -

श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5 दादू जरै सु परम प्रकाश है, जरै सु परम उजास । जरै सु परम उदीत है, जरै सु परम विलास ॥ 29 ॥ दादू जरै सु परम पगार है, जरै सु परम विगास । जरै सु परम प्रभास है, जरै सु परम निवास ॥ 30 ॥ परमेश्वर की दयालुता दादू एक बोल भूले हरि, सो कोई न जाणै प्राण । औगुण मन आणै नहिं, और सब जाणै हरि जाण ॥ 31 ॥ सतगुरु अगम बात जानने के लिए विनय करते हैं दादू तुम जीवों के औगुण तजे, सु कारण कौन अगाध ? मेरी जरणा देख कर, मति को सीखें साध ॥ 32 ॥ धारणा पवना पानी सब पिया, धरती अरु आकास । चन्द सूर पावक मिले, पंचों एक ग्रास ॥ 33 ॥ चौदह तीनों लोक सब, ढूंगे श्वासै श्वास । दादू साधू सब जरैं, सतगुरु के विश्वास ॥ 34 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य पांचवां जरणा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 5 ॥ साखी 34 ॥

  • 107 -

हैरान का अंग अथ हैरान का अंग ६ दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ रतन एक बहु पारिखू, सब मिल करैं विचार । गूं गे गहिले बावरे, दादू वार न पार ॥ 2 ॥ अनेक मतवादी केते पारिख जौहरी, पंडित ज्ञाता ध्यान । जाण्या जाइ न जानिए, का कहि कथिये ज्ञान ॥ 3 ॥ केते पारिख पच मुये, कीमत कही न जाइ । दादू सब हैरान हैं, गूँगे का गुड़ खाइ ॥ 4 ॥

  • 108 -

श्री दादूवाणी-हैरान का अंग 6 सब ही ज्ञानी पंडिता, सुर नर रहे उरझाइ । दादू गति गोविन्द की, क्यों ही लखी न जाइ ॥ 5 ॥ जैसा है तैसा नाम तुम्हारा, ज्यों है त्यों कह सांई । तूं आपै जाणै आपको, तहँ मेरी गम नांहि ॥ 6 ॥ केते पारिख अंत न पावैं, अगम अगोचर मांही । दादू कीमत कोई न जानै, खीर नीर की नांही ॥ 7 ॥ जीव ब्रह्म सेवा करै, ब्रह्म बराबर होइ । दादू जाणै ब्रह्म को, ब्रह्म सरीखा सोइ ॥ 8 ॥ वारपार को ना लहै, कीमत लेखा नांहि । दादू एकै नूर है, तेज पुंज सब मांहि ॥ 9 ॥ पीव पिछान हस्त पांव नहिं शीश मुख, श्रवण नेत्र कहुं कैसा । दादू सब देखैं सुनैं, कहै गहै है ऐसा ॥ 10 ॥ ‘पाया पाया’ सब कहैं, केतक ‘देहुँ दिखाइ ।’ कीमत किनहूँ ना कही, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 11 ॥ अपना भंजन भर लिया, उहाँ उता ही जाण । अपणी अपणी सब कहैं, दादू बिड़द बखाण ॥ 12 ॥ पार न देवै आपना, गोप गूझ मन मांहि । दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥ 13 ॥ गूं गे का गुड़ का कहूँ, मन जानत है खाइ । त्यों राम रसायन पीवतां, सो सुख कह्या न जाइ ॥ 14 ॥ दादू एक जीभ केता कहूँ, पूरण ब्रह्म अगाध । वेद कतेबां मित नहीं, थकित भये सब साध ॥ 15 ॥ दादू मेरा एक मुख, कीर्ति अनन्त अपार । गुण केते परिमित नहीं, रहे विचार विचार ॥ 16 ॥

  • 109 -

श्री दादूवाणी-हैरान का अंग 6 सकल शिरोमणि नाम है, तूं है तैसा नांहि। दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥ 17 ॥ दादू केते कह गये, अंत न आवै ओर । हमहूँ कहते जात हैं, केते कहसी होर ॥ 18 ॥ दादू मैं क्या जानूँ क्या कहूँ, उस बलिये की बात । क्या जानूँ क्यों ही रहै, मो पै लख्या न जात ॥ 19 ॥ दादू केते चल गये, थाके बहुत सुजान। बातों नाम न नीकले, दादू सब हैरान ॥ 20 ॥ ना कहीं दिट्ठा ना सुण्या, ना कोई आखणहार। ना कोई उत्थों थी फिऱ्या, ना उर वार न पार ॥ 21 ॥ परमार्थ स्वरूप नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ। नहिं सूता नहिं जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥ 22 ॥ न तहाँ चुप ना बोलणां, मैं तैं नांहीं कोइ। दादू आपा पर नहीं, न तहाँ एक न दोइ ॥ 23 ॥ एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक। यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥ 24 ॥ देख दीवाने ह्वै गए, दादू खरे सयान। वार पार कोई ना लहै, दादू है हैरान ॥ 25 ॥ पतिव्रत निष्काम दादू करणहार जे कुछ किया, सोई हौं कर जाण। जे तूं चतुर सयाना जानराइ, तो याही परमाण ॥ 26 ॥ दादू जिन मोहनि बाजी रची, सो तुम्ह पूछो जाइ। अनेक एक तैं क्यों किये, साहिब कहि समझाइ ॥ 27 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा

  • 110 -

धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य छठा हैरान कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 6 ॥ साखी 27 ॥ दादूराम सत्यराम

  • 111 -