सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 स्मरण नाम निःसंशय सांई सन्मुख जीवतां, मरतां सन्मुख होइ । दादू जीवन मरण का, सोच करै जनि कोइ ॥ 17 ॥ पतिव्रत साहिब मिल्या तो सब मिले, भेंटे भँटा होइ । साहिब रह्या तो सब रहे, नहीं तो नाहीं कोइ ॥ 18 ॥ दादू रीझै राम पर, अनत न रीझै मन। मीठा भावै एक रस, दादू सोई जन ॥ 19 ॥ दादू मेरे हृदय हरि बसै, दूजा नांही और। कहो कहाँ धौं राखिये, नहीं आन को ठौर ॥ 20 ॥ दादू नारायण नैना बसै, मनही मोहन राइ। हिरदा मांही हरि बसै, आतम एक समाइ ॥ 21 ॥ दादू तन मन मेरा पीव सौं, एक सेज सुख सोइ। गहिला लोग न जाणही, पच पच आपा खोइ ॥ 22 ॥ दादू एक हमारे उर बसै, दूजा मेल्या दूर। दूजा देखत जाइगा, एक रह्या भरपूर ॥ 23 ॥ निश्चल का निश्चल रहै, चंचल का चल जाइ। दादू चंचल छाड़ि सब, निश्चल सौं ल्यौ लाइ ॥ 24 ॥ साहिब रहतां सब रह्या, साहिब जातां जाइ। दादू साहिब राखिये, दूजा सहज स्वभाइ ॥ 25 ॥ मन चित मनसा पलक मैं, सांई दूर न होइ। निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥ 26 ॥ कथनी बिना करणी जहाँ नाम तहँ नीति चाहिये, सदा राम का राज। निर्विकार तन मन भया, दादू सीझै काज ॥ 27 ॥
- 119 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 सुन्दरी विलाप जिसकी खूबी, खूब सब, सोई खूब सँभार। दादू सुन्दरी खूब सौं, नखशिख साज सँवार ॥ 28 ॥ दादू पंच आभूषण पीव कर, सोलह सब ही ठांव। सुन्दरी यहु श्रृंगार करि, ले ले पीव का नांव ॥ 29 ॥ यहु व्रत सुन्दरी ले रहै, तो सदा सुहागिनी होइ। दादू भावै पीव कौं, ता सम और न कोइ ॥ 30 ॥ पतिव्रता निष्काम साहिब जी का भावता, कोई करै कलि मांहि। मनसा वाचा कर्मना, दादू घटि घटि नांहि ॥ 31 ॥ आज्ञा मांहीं बैसै ऊठै, आज्ञा आवै जाइ। आज्ञा मांहीं लेवै देवै, आज्ञा पहरै खाइ ॥ 32 ॥ आज्ञा मांही बाहर भीतर, आज्ञा रहै समाइ। आज्ञा मांही तन मन राखै, दादू रहै ल्यौ लाइ ॥ 33 ॥ पतिव्रता गृह आपने, करै खसम की सेव। ज्यों राखै त्यों ही रहै, आज्ञाकारी टेव ॥ 34 ॥ सुन्दरी विलाप दादू नीच ऊँच कुल सुन्दरी, सेवा सारी होइ। सोई सुहागिन कीजिये, रूप न पीजे धोइ ॥ 35 ॥ दादू जब तन मन सौंप्या राम को, ता सन क्या व्यभिचार। सहज शील संतोष सत, प्रेम भक्ति लै सार ॥ 36 ॥ पर पुरुषा सब परहरै, सुन्दरी देखै जागि। अपणा पीव पिछाण करि, दादू रहिये लागि ॥ 37 ॥ आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भरतार। हूँ अबला समझं नहीं, तूं जानै करतार ॥ 38 ॥
- 120 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 जिसका तिसकौं दीजिये, सांई सन्मुख आइ। दादू नख शिख सौंप सब, जनि यहु बंट्या जाइ ॥ 39 ॥ सारा दिल सांई सौं राखै, दादू सोई सयान। जे दिल बंटै आपना, सो सब मूढ़ अयान ॥ 40 ॥ दादू सारों सौं दिल तोरि कर, सांई सौं जोड़ै। सांई सेती जोड़ करि, काहे को तोड़ै ॥ 41 ॥ साहिब देवै राखणा, सेवक दिल चोरै। दादू सब धन साह का, भूला मन थोरै ॥ 42 ॥ पतिव्रत दादू मनसा वाचा कर्मना, अंतर आवै एक। ताको प्रत्यक्ष राम जी, बातें और अनेक ॥ 43 ॥ दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव। अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥ 44 ॥ दादू मनसा वाचा कर्मना, हरि जी सौं हित होइ। साहिब सन्मुख संग है, आदि निरंजन सोइ ॥ 45 ॥ दादू मनसा वाचा कर्मणा, आतुर कारण राम। सम्रथ सांई सब करै, परगट पूरे काम ॥ 46 ॥ नारी पुरुषा देख करि, पुरुषा नारी होइ। दादू सेवक राम का, शीलवन्त है सोइ ॥ 47 ॥ आन लग्न व्यभिचार पर पुरुषा रत बांझणी, जाणे जे फल होइ। जन्म बिगोवै आपना, दादू निष्फल सोइ ॥ 48 ॥ दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ। ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥ 49 ॥
- 121 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 पतिव्रत नारी सेवक तब लगै, जब लग सांई पास। दादू परसै आन को, ताकी कैसी आस ॥ 50 ॥ आन लगन व्यभिचार दादू नारी पुरुष को, जाने जे वश होइ। पीव की सेवा ना करै, कामणिगारी सोइ ॥ 51 ॥ करूणा कीया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार। क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भर्तार ॥ 52 ॥ आन लग्न व्यभिचार करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक। अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥ 53 ॥ दादू पतिव्रता के एक है, व्यभिचारिणी के दोइ। पतिव्रता व्यभिचारिणी, मेला क्यों कर होइ ॥ 54 ॥ पतिव्रता के एक है, दूजा नांही आन। व्यभिचारिणी के दोइ हैं, पर घर एक समान ॥ 55 ॥ सुन्दरी सुहाग दादू पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग। जे जे जैसी ताहि सौं, खेलैं तिस हि रंग ॥ 56 ॥ पतिव्रत दादू रहता राखिये, बहता देइ बहाइ। बहते संग न जाइये, रहते सौं ल्यौ लाइ ॥ 57 ॥ जनि बाझैं काहू कर्म सौं, दूजै आरंभ जाइ। दादू ऐकै मूल गहि, दूजा देइ बहाइ ॥ 58 ॥ बावें देखि न दाहिने, तन मन सन्मुख राखि। दादू निर्मल तत्त्व गह, सत्य शब्द यहु साखि ॥ 59 ॥ दादू दूजा नैन न देखिये, श्रवणहुँ सुने न जाइ। जिह्या आन न बोलिये, अंग न और सुहाइ ॥ 60 ॥
- 122 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 चरणहुँ अनत न जाइये, सब उलटा मांहि समाइ । उलट अपूठा आप में, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 61 ॥ दादू दूजे अंतर होत है, जनि आने मन मांहि । तहाँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥ 62 ॥ भ्रम विध्वंस भ्रम तिमिर भाजै नहीं, रे जिय आन उपाइ । दादू दीपक साज ले, सहजैं ही मिट जाइ ॥ 63 ॥ दादू सो वेदन नहीं बावरे, आन किये जे जाइ । सब दुख भंजन सांइयाँ, ताहि सौं ल्यौ लाइ ॥ 64 ॥ दादू औषध मूली कुछ नहीं, ये सब झूठी बात । जे औषध ही जीविये, तो काहे को मर जात ॥ 65 ॥ पतिव्रत मूल गहै सो निश्चल बैठा, सुख में रहै समाइ । डाल पान भ्रमत फिरै, वेदों दिया बहाइ ॥ 66 ॥ सो धक्का सुनहाँ को देवै, घर बाहर काढै । दादू सेवक राम का, दरबार न छाड़े ॥ 67 ॥ साहिब का दर छाड़ि कर, सेवक कहीं न जाय । दादू बैठा मूल गह, डालों फिरै बलाय ॥ 68 ॥ दादू जब लग मूल न सींचिये, तब लग हरा न होइ । सेवा निष्फल सब गई, फिर पछताना सोइ ॥ 69 ॥ दादू सींचे मूल के, सब सींच्या विस्तार । दादू सींचे मूल बिन, बाद गई बेगार ॥ 70 ॥ सब आया उस एक में, डाल पान फल फूल । दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड़या मूल ॥ 71 ॥ खेत न निपजै बीज बिन, जल सींचे क्या होइ । सब निष्फल दादू राम बिन, जानत है सब कोइ ॥ 72 ॥
- 123 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 दादू जब मुख मांहि मेलिये, तब सब ही तृप्ता होइ। मुख बिन मेले आन दिश, तृप्ति न माने कोइ ॥ 73 ॥ जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि। डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥ 74 ॥ दादू टीका राम को, दूसर दीजे नांहि। ज्ञान ध्यान तप भेष पक्ष, सब आये उस मांहि ॥ 75 ॥ साधू राखै राम को, संसारी माया। संसारी पल्लव गहै, मूल साधू पाया ॥ 76 ॥ आन लगन व्यभिचार दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध। कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥ 77 ॥ सब चतुराई देखिए, जे कुछ कीजै आन। दादू आपा सौंपि सब, पीव को लेहु पिछान ॥ 78 ॥ पतिव्रत दादू दूजा कुछ नहीं, एक सत्य कर जान। दादू दूजा क्या करै, जिन एक लिया पहचान ॥ 79 ॥ दादू कोई वांछै मुक्ति फल, कोइ अमरापुर वास। कोई वांछै परमगति, दादू राम मिलन की प्यास ॥ 80 ॥ तुम हरि हिरदै हेत सौं, प्रगटहु परमानन्द। दादू देखै नैन भर, तब केता होइ आनन्द ॥ 81 ॥ प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि। रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहें तिनको देहि ॥ 82 ॥ कोटि वर्ष क्या जीवना, अमर भये क्या होइ। प्रेम भक्ति रस राम बिन, का दादू जीवन सोइ ॥ 83 ॥ कछू न कीजे कामना, सगुण निर्गुण होहि। पलट जीव तैं ब्रह्म गति, सब मिलि मानैं मोहि ॥ 84 ॥
- 124 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 घट अजरावर ह्वै रहै, बन्धन नांही कोइ । मुक्ता चौरासी मिटै, दादू संशय सोइ ॥ 85 ॥ लाँबि रस निकटि निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव । दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 86 ॥ परिचय पतिव्रत सालोःय संगति रहै, सामीप्य सन्मुख सोइ । सारूप्य सारीखा भया, सायुज्य एकै होइ ॥ 87 ॥ राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार । अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥ 88 ॥ आन लग्न व्यभिचार स्वारथ सेवा कीजिये, ताथैं भला न होइ । दादू ऊसर बाहि कर, कोठा भरै न कोइ ॥ 89 ॥ सुत वित मांगैं बावरे, साहिब सी निधि मेलि । दादू वे निष्फल गये, जैसे नागर बेलि ॥ 90 ॥ फल कारण सेवा करै, जाचै त्रिभुवन राव । दादू सो सेवक नहीं, खेलै अपना दाव ॥ 91 ॥ सहकामी सेवा करैं, मागैं मुग्ध गँवार । दादू ऐसे बहुत हैं, फल के भूँचनहार ॥ 92 ॥ स्मरण नाम महात्म तन मन लै लागा रहै, राता सिरजनहार । दादू कुछ मांगैं नहीं, ते बिरला संसार ॥ 93 ॥ दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि । राई मन बैसंधरा, केते काठ जलांहि ॥ 94 ॥
- 125 -
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 करतूति कर्म कर्मै कर्म काटै नहीं, कर्मै कर्म न जाइ। कर्मै कर्म छूटै नहीं, कर्मै कर्म बँधाइ ॥ 95 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य आठवां निष्कर्मी पतिव्रता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 8 ॥ साखी 95 ॥
[दादूराम / राम / सत्यराम]
- 126 -
चितावनी का अंग www.dadooram.org अथ चितावनी का अंग ९ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ १ ॥ दादू जे साहिब कौं भावै नहीं, सो हम थैं जनि होइ । सतगुरु लाजै आपणा, साध न मानैं कोइ ॥ २ ॥ दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो सब परिहर प्राण । मनसा वाचा कर्मणा, जे तूं चतुर सुजाण ॥ ३ ॥ दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो जीव न कीजी रे । परिहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजी रे ॥ ४ ॥
- 127 -
श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9 दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो बाट न बूझी रे । सांई सौं सन्मुख रही, इस मन सौं झूझी रे ॥ 5 ॥ दादू अचेत न होइये, चेतन सौं चित लाइ । मनवा सूता नींद भर, सांई संग जगाइ ॥ 6 ॥ दादू अचेत न होइये, चेतन सौं करि चित्त । यह अनहद जहाँ थें ऊपजै, खोजो तहाँ ही नित्त ॥ 7 ॥ दादू जन ! कुछ चेत कर, सौदा लीजे सार । निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥ 8 ॥ स्मरण नाम चितावणी दादू कर सांई की चाकरी, ये हरि नाम न छोड़ । जाना है उस देश को, प्रीति पिया सौं जोड़ ॥ 9 ॥ आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग । दादू अवसर जात है, जाग सकै तो जाग ॥ 10 ॥ बार बार यह तन नहीं, नर नारायण देह । दादू बहुरि न पाइये, जन्म अमोलिक येह ॥ 11 ॥ एका एकी राम सौं, कै साधु का संग । दादू अनत न जाइये, और काल का अंग ॥ 12 ॥ दादू तन मन के गुण छाड़ि सब, जब होइ नियारा । तब अपने नैनहुं देखिये, प्रगट पीव प्यारा ॥ 13 ॥ दादू झांती पाये पसु पिरी, अंदरि सो आहे । होणी पाणे बिच्च में, महर न लाहे ॥ 14 ॥ दादू झांती पाये पसु पिरी, हाणे लाइ न बेर । साथ सभौंई हल्लियो, पोइ पसंदो केर ॥ 15 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
- 128 -
श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9 धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य आठवां चितावणी का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 9 ॥ साखी 15 ॥ दादूराम सत्यराम
- 129 -
अथ मन का अंग १० मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥ दादू यहु मन बरजि बावरे, घट में राखि घेरि । मन हस्ती माता बहै, अंकुश दे दे फेरि ॥ 2 ॥ हस्ती छूटा मन फिरे, क्यों ही बँध्या न जाइ । बहुत महावत पच गये, दादू कछु न वशाइ ॥ 3 ॥ जहाँ थैं मन उठ चलै, फेरि तहाँ ही राखि । तहँ दादू लै लीन कर, साध कहैं गुरु साखि ॥ 4 ॥
- 130 -
२. साखी भाग (मध्यम): माया-विवेक, मन, चित्त-शुद्धि, विश्वास व नाम-माहात्म्य
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 थोरे थोरे हठ किये, रहेगा ल्यौ लाइ। जब लागा उनमनि सौं, तब मन कहीं न जाइ ॥ 5 ॥ आड़ा दे दे राम को, दादू राखै मन। साखी दे सुस्थिर करै, सोई साधू जन ॥ 6 ॥ सोई शूर जे मन गहै, निमख न चलने देइ। जब ही दादू पग भरै, तब ही पकड़ि लेइ ॥ 7 ॥ जेती लहर समंद की, ते ते मनहि मनोरथ मार। वैसे सब संतोंष कर, गहि आत्म एक विचार ॥ 8 ॥ दादू जे मुख मांहीं बोलतां, श्रवणहुँ सुनतां आइ। नैनहुँ माँहैं देखतां, सो अंतर उरझाइ ॥ 9 ॥ दादू चुम्बक देख कर, लोहा लागै आइ। यों मन गुण इन्द्री एक सौं, दादू लीजै लाइ ॥ 10 ॥ मन का आसन जे जीव जानै, तौ ठौर ठौर सब सूझै। पंचों आनि एक घर राखै, तब अगम निगम सब बूझै ॥ 11 ॥ बैठे सदा एक रस पीवै, निर्वैरी कत जूझै। आत्माराम मिलै जब दादू, तब अंग न लागै दूजै ॥ 12 ॥ जब लग यहु मन थिर नहीं, तब लग परस न होइ। दादू मनवा थिर भया, सहज मिलैगा सोइ ॥ 13 ॥ दादू बिन अवलम्बन क्यों रहै, मन चंचल चल जाइ। सुस्थिर मनवा तो रहै, सुमिरण सेती लाइ ॥ 14 ॥ सतगुरु चरण शरण चलि जांहीं, नित प्रति रहिये तिनकी छांहीं। मन स्थिर करि लीजै नाम, दादू कहै तहाँ ही राम ॥ 15 ॥ हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ। दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥ 16 ॥
- 131 -
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 जब अंतर उरझ्या एक सौं, तब थाके सकल उपाइ। दादू निश्चल थिर भया, तब चलि कहीं न जाइ ॥ 17 ॥ दादू कौवा बोहित बैस कर, मंझि समंदाँ जाइ। उड़ि उड़ि थाका देख तब, निश्चल बैठा आइ ॥ 18 ॥ यहु मन कागद की गुडी, उड़ी चढ़ी आकास। दादू भीगे प्रेम जल, तब आइ रहे हम पास ॥ 19 ॥ दादू खीला गार का, निश्चल थिर न रहाइ। दादू पग नहीं साँच के, भ्रमै दहदिशि जाइ ॥ 20 ॥ तब सुख आनन्द आत्मा, जे मन थिर मेरा होइ। दादू निश्चल राम सौं, जे कर जाने कोइ ॥ 21 ॥ मन निर्मल थिर होत है, राम नाम आनंद। दादू दर्शन पाइये, पूरण परमानन्द ॥ 22 ॥ विषय विरक्ति दादू यों फूटे थैं सारा भया, संधे संधि मिलाइ। बाहुड़ विषय न भूँचिये, तो कबहुँ फूट न जाइ ॥ 23 ॥ दादू यहु मन भूला सो गली, नरक जाणै के घाट। अब मन अविगत नाथ सों, गुरु दिखाई बाट ॥ 24 ॥ दादू मन सुध साबित आपणा, निश्चल होवे हाथ। तो इहाँ ही आनन्द है, सदा निरंजन साथ ॥ 25 ॥ जब मन लागै राम सौं, तब अनत काहे को जाइ। दादू पानी लौन ज्यों, ऐसैं रहै समाइ ॥ 26 ॥ ज्यों जल पैसे दूध में, ज्यों पानी में लौन। ऐसैं आत्माराम सौं, मन हठ साधै कौन ॥ 27 ॥ मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश। दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥ 28 ॥
- 132 -
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 करुणा सो कुछ हम थैं ना भया, जा पर रीझे राम । दादू इस संसार में, हम आये बेकाम ॥ 29 ॥ क्या मुँह ले हँस बोलिये, दादू दीजे रोइ । जन्म अमोलक आपका, चले अकारथ खोइ ॥ 30 ॥ जा कारण जग जीजिये, सो पद हिरदै नाहिं। दादू हरि की भक्ति बिना, ध्रिक् जीवन कलि मांहि ॥ 31 ॥ किया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार । क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भरतार ॥ 32 ॥ इन्द्री स्वारथ सब किया, मन माँगे सो दीन्ह । जा कारण जग सिरजिया, सो दादू कछु न कीन्ह ॥ 33 ॥ किया था इस काम कौं, सेवा कारण साज । दादू भूला बंदगी, सज्या न एकौ काज ॥ 34 ॥ दादू विषै विकार सौं, जब लग मन राता । तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ॥ 35 ॥ दादू का जाणूँ कब होइगा, हरि सुमिरण इकतार । का जाणूँ कब छाड़ि है, यह मन विषय विकार ॥ 36 ॥ मन प्रबोध बादि हि जन्म गँवाइया, किया बहुत विकार । यहु मन सुस्थिर ना भया, जहाँ दादू निज सार ॥ 37 ॥ विषय अतृप्ति दादू जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग । देखत ही मर जाइगा, तज विषया रस भोग ॥ 38 ॥ आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग । दादू औसर जात है, जाग सके तो जाग ॥ 39 ॥
- 133 -
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 मन हरि भावनि दादू सब कुछ विलसतां, खातां पीतां होइ। दादू मन का भावता, कहि समझावै कोइ ॥ 40 ॥ दादू मन का भावता, मेरी कहै बलाइ। साच राम का भावता, दादू कहै सुणि आइ ॥ 41 ॥ दादू ये सब मन का भावता, जे कुछ कीजै आन। मन गहि राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥ 42 ॥ जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ। दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥ 43 ॥ चाणक उपदेश पैंडे पग चालै नहीं, होइ रह्या गलियार। राम रथ निबहै नहीं, खाबे को हुशियार ॥ 44 ॥ पर प्रबोध दादू का परमोधै आन को, आपण बहिया जात। औरों को अमृत कहै, आपण ही विष खात ॥ 45 ॥ दादू पंचों ये परमोध ले, इन्हीं को उपदेश। यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥ 46 ॥ दादू पंचों का मुख मूल है, मुख का मनवां होइ। यहु मन राखै जतन कर, साधु कहावै सोइ ॥ 47 ॥ दादू जब लग मन के दोइ गुण, तब लग निपना नांहि। द्वै गुण मन के मिट गये, तब निपनां मिल मांहि ॥ 48 ॥ काचा पाका जब लगै, तब लग अंतर होइ। काचा पाका दूर कर, दादू एकै सोइ ॥ 49 ॥ मध्य निष्पक्ष सहज रूप मन का भया, तब द्वै द्वै मिटी तरंग। ताता शीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 50 ॥
- 134 -
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
मन दादू बहुरूपी मन जब लगै, तब लग माया रंग। जब मन लागा राम सौं, तब दादू एकै अंग ॥ 51 ॥ हीरा मन पर राखिये, तब दूजा चढै न रंग। दादू यों मन थिर भया, अविनाशी के संग ॥ 52 ॥ सुख दुख सब झांई पड़ै, तब लग काचा मन। दादू कुछ व्यापै नहीं, तब मन भया रतन ॥ 53 ॥ दादू पाका मन डोलै नहीं, निश्चल रहै समाइ। काचा मन दह दिशि फिरै, चंचल चहुँ दिशि जाइ ॥ 54 ॥ विरक्तता सीप सुधा रस ले रहै, पीवै न खारा नीर। मांहैं मोती नीपजै, दादू बंद शरीर ॥ 55 ॥ मन दादू मन पंगुल भया, सब गुण गये बिलाइ। है काया नौ-जोबनी, मन बूढ़ा है जाइ ॥ 56 ॥ दादू कच्छप अपने कर लिये, मन इन्द्री निज ठौर। नाम निरंजन लाग रहु, प्राणी परिहर और ॥ 57 ॥ जाचक मन इन्द्री अंधा किया, घट में लहर उठाइ। साँई सतगुरु छोड़ कर, देख दिवाना जाइ ॥ 58 ॥ दादू कहै राम बिना मन रंक है, जाचै तीनों लोक। जब मन लागा राम सौं, तब भागे दालिद्र दोष ॥ 59 ॥ इन्द्री के आधीन मन, जीव जंत सब जाचै। तिणे तिणे के आगे दादू, तिहुं लोक फिर नाचै ॥ 60 ॥ इंद्री अपने वश करै, सो काहे जाचन जाइ। दादू सुस्थिर आत्मा, आसन बैसै आइ ॥ 61 ॥
- 135 -
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 मन मनसा दोनों मिले, तब जीव किया भांड। पंचों का फेन्या फिरै, माया नचावै रांड ॥ 62 ॥ दादू नकटी आगे नकटा नाचे, नकटी ताल बजावे। नकटी आगे नकटा गावे, नकटी नकटा भावे ॥ 63 ॥ आन लगन व्यभिचार पांचों इंद्री भूत हैं, मनवा क्षेत्रपाल। मनसा देवी पूजिये, दादू तीनों काल ॥ 64 ॥ जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव। दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥ 65 ॥ मन अग्नि धूम ज्यों नीकलै, देखत सबै बिलाइ। त्यों मन बिछुटा राम सौं, दह दिश बीखर जाइ ॥ 66 ॥ घर छाड़े जब का गया, मन बहुरि न आया। दादू अग्नि के धूम ज्यों, खुर खोज न पाया ॥ 67 ॥ सब काहू के होत हैं, तन मन पसरैं जाइ। ऐसा कोई एक है, उलटा मांहिं समाइ ॥ 68 ॥ क्यों करि उलटा आनिये, पसर गया मन फेरि। दादू डोरी सहज की, यों आनै घर घेरि ॥ 69 ॥ दादू साधु शब्द सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ। साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 70 ॥ चंचल चहुँ दिशि जात है, गुरु बाइक सौं बंध। दादू संगति साधु की, पारब्रह्म सौं संध ॥ 71 ॥ एक निरंजन नाम सौं, कै साधु संगति मांहि। दादू मन बिलमाइये, दूजा कोई नांहि ॥ 72 ॥
- 136 -
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 तन में मन आवै नहीं, निशदिन बाहर जाइ। दादू मेरा जीव दुखी, रहै नहीं ल्यौ लाइ ॥ 73 ॥ तन में मन आवै नहीं, चंचल चहुँ दिशि जाइ। दादू मेरा जीव दुखी, रहै न राम समाइ ॥ 74 ॥ कोटि यत्न कर कर मुये, यहु मन दह दिशि जाइ। राम नाम रोक्या रहै, नाहीं आन उपाइ ॥ 75 ॥ यहु मन बहु बकबाद सौं, बाय भूत है जाइ। दादू बहुत न बोलिये, सहजैं रहै समाइ ॥ 76 ॥ स्मरण नाम चितावणी भूला भौंदू फेर मन, मूरख मुग्ध गँवार। सुमिर सनेही आपणा, आतम का आधार ॥ 77 ॥ मन माणिक मूरख राखि रे, जण जण हाथ न देहु। दादू पारिख जौंहरी, राम साधु दोइ लेहु ॥ 78 ॥ दादू माज्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन। ज्ञान खड्ग गुरुदेव का, ता संग सदा सुजान ॥ 79 ॥ मन मन मृगा मारै सदा, ताका मीठा मांस। दादू खाइबे को हिल्या, तातैं आन उदास ॥ 80 ॥ कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम। विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥ 81 ॥ केता कहि समझाइया, मानै नहीं निलज्ज। मूरख मन समझै नहीं, कीये काज अकज्ज ॥ 82 ॥ सांच मन ही मंजन कीजिये, दादू दरपण देह। मांहीं मूरति देखिये, इहि औसर कर लेह ॥ 83 ॥
- 137 -
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 आन लगन-व्यभिचार तब ही कारा होत है, हरि बिन चितवत आन । क्या कहिये समझै नहीं, दादू सिखवत ज्ञान ॥ 84 ॥ साच दादू पाणी धोवैं बावरे, मन का मैल न जाइ । मन निर्मल तब होइगा, जब हरि के गुण गाइ ॥ 85 ॥ दादू ध्यान धरे क्या होत है, जो मन नहीं निर्मल होइ । तो बग सब ही उद्धरैं, जे इहि विधि सीझै कोइ ॥ 86 ॥ दादू ध्यान धरे क्या होत है, जे मन का मैल न जाइ । बग मीनी का ध्यान धर, पसू बिचारे खाइ ॥ 87 ॥ दादू काले थैं धोला भया, दिल दरिया में धोइ । मालिक सेती मिलि रह्या, सहजैं निर्मल होइ ॥ 88 ॥ दादू जिसका दर्पण ऊजला, सो दर्शन देखै मांहि । जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥ 89 ॥ दादू निर्मल शुद्ध मन, हरि रंग राता होइ । दादू कंचन कर लिया, काच कहै नहीं कोइ ॥ 90 ॥ यहु मन अपना थिर नहीं, कर नहीं जानै कोइ । दादू निर्मल देव की, सेवा क्यों कर होइ ॥ 91 ॥ दादू यहु मन तीनों लोक में, अरस परस सब होइ । देही की रक्षा करैं, हम जनि भीटै कोइ ॥ 92 ॥ दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ । उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥ 93 ॥ दादू हाडौं मुख भव्या, चाम रह्या लिपटाय । मांहीं जिभ्या मांस की, ताही सेती खाइ ॥ 94 ॥ दादू नौवों द्वारे नरक के, निशदिन बहै बलाइ । शुचि कहाँ लौं कीजिये, राम सुमरि गुण गाइ ॥ 95 ॥
- 138 -