सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 आन लगन-व्यभिचार तब ही कारा होत है, हरि बिन चितवत आन । क्या कहिये समझै नहीं, दादू सिखवत ज्ञान ॥ 84 ॥ साच दादू पाणी धोवैं बावरे, मन का मैल न जाइ । मन निर्मल तब होइगा, जब हरि के गुण गाइ ॥ 85 ॥ दादू ध्यान धरे क्या होत है, जो मन नहीं निर्मल होइ । तो बग सब ही उद्धरैं, जे इहि विधि सीझै कोइ ॥ 86 ॥ दादू ध्यान धरे क्या होत है, जे मन का मैल न जाइ । बग मीनी का ध्यान धर, पसू बिचारे खाइ ॥ 87 ॥ दादू काले थैं धोला भया, दिल दरिया में धोइ । मालिक सेती मिलि रह्या, सहजैं निर्मल होइ ॥ 88 ॥ दादू जिसका दर्पण ऊजला, सो दर्शन देखै मांहि । जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥ 89 ॥ दादू निर्मल शुद्ध मन, हरि रंग राता होइ । दादू कंचन कर लिया, काच कहै नहीं कोइ ॥ 90 ॥ यहु मन अपना थिर नहीं, कर नहीं जानै कोइ । दादू निर्मल देव की, सेवा क्यों कर होइ ॥ 91 ॥ दादू यहु मन तीनों लोक में, अरस परस सब होइ । देही की रक्षा करैं, हम जनि भीटै कोइ ॥ 92 ॥ दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ । उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥ 93 ॥ दादू हाडौं मुख भव्या, चाम रह्या लिपटाय । मांहीं जिभ्या मांस की, ताही सेती खाइ ॥ 94 ॥ दादू नौवों द्वारे नरक के, निशदिन बहै बलाइ । शुचि कहाँ लौं कीजिये, राम सुमरि गुण गाइ ॥ 95 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 प्राणी तन मन मिल रह्या, इंद्री सकल विकार । दादू ब्रह्मा शूद्र धर, कहाँ रहै आचार ॥ 96 ॥ मन की चपलता दादू जीवै पलक में, मरतां कल्प बिहाइ । दादू यहु मन मसखरा, जनि कोई पतियाइ ॥ 97 ॥ दादू मूवां मन हम जीवित देख्या, जैसे मरघट भूत । मूवां पीछे उठ उठ लागै, ऐसा मेरा पूत ॥ 98 ॥ निश्चल करतां जुग गये, चंचल तब ही होहि । दादू पसरै पलक में, यहु मन मारै मोहि ॥ 99 ॥ दादू यहु मन मींडका, जल सौं जीवै सोइ । दादू यहु मन रिंद है, जनि रु पतीजै कोइ ॥ 100 ॥ मांही सूक्ष्म है रहै, बाहरि पसारै अंग । पवन लाग पौढ़ा भया, काला नाग भुवंग ॥ 101 ॥ आशय विश्राम सपना तब लग देखिये, जब लग चंचल होइ । जब निश्चल लागा नाम सौं, तब सपना नांही कोइ ॥ 102 ॥ जागत जहाँ जहाँ मन रहै, सोवत तहँ तहँ जाइ । दादू जे जे मन बसै, सोइ सोइ देखै आइ ॥ 103 ॥ दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति । बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥ 104 ॥ सावण हरिया देखिये, मन चित ध्यान लगाइ । दादू केते जुग गये, तो भी हऱ्या न जाइ ॥ 105 ॥ जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम । भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥ 106 ॥ जहाँ मन राखै जीवतां, मरतां तिस घर जाइ । दादू वासा प्राण का, जहाँ पहली रह्या समाइ ॥ 107 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 जहाँ सुरति तहँ जीव है, जहाँ नांही तहँ नांहि। गुण निर्गुण जहाँ राखिये, दादू घर वन मांहि ॥ 108 ॥ जहाँ सुरति तहँ जीव है, आदि अन्त इस्थान। माया ब्रह्म जहाँ राखिये, दादू तहँ विश्राम ॥ 109 ॥ जहाँ सुरति तहँ जीव है, जीवन मरण जिस ठौर। विष अमृत तहँ राखिये, दादू नाहीं और ॥ 110 ॥ जहाँ सुरति तहँ जीव है, जहाँ जाणै तहँ जाइ। गम अगम जहाँ राखिये, दादू तहाँ समाइ ॥ 111 ॥ मन मनसा का भाव है, अन्त फलेगा सोइ। जब दादू बाणक बण्या, तब आशय आसण होइ ॥ 112 ॥ जप तप करणी कर गये, स्वर्ग पहुँचे जाइ। दादू मन की वासना, नरक पड़े फिर आइ ॥ 113 ॥ पाका काचा ह्वै गया, जीत्या हारे डाव। अंत काल गाफिल भया, दादू फिसले पांव ॥ 114 ॥ दादू यहु मन पंगुल पंच दिन, सब काहू का होइ। दादू उतर आकाश तैं, धरती आया सोइ ॥ 115 ॥ ऐसा कोई एक मन, मरै सो जीवै नाहिं। दादू ऐसे बहुत हैं, फिर आवै कलि माहिं ॥ 116 ॥ देखा देखी सब चले, पार न पहुँच्या जाइ। दादू आसन पहल के, फिर फिर बैठे आइ ॥ 117 ॥ जग जन विपरीत बरतन एकै भांति सब, दादू संत असंत। भिन्न भाव अन्तर घणां, मनसा तहाँ गच्छन्त ॥ 118 ॥ यहु मन मारै मोमिनां, यहु मन मारै मीर। यहु मन मारै साधकाँ, यहु मन मारै पीर ॥ 119 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 दादू मन मारे मुनिवर मुये, सुर नर किये संहार। ब्रह्मा विष्णु महेश सब, राखै सिरजनहार ॥ 120 ॥ मन बाहे मुनिवर बड़े, ब्रह्मा विष्णु महेश। सिद्ध साधक योगी यति, दादू देश विदेश ॥ 121 ॥ मनमुखी मान बड़ाई पूजा मान बड़ाइयां, आदर मांगै मन। राम गहै, सब परिहरै, सोई साधु जन ॥ 122 ॥ जहाँ जहाँ आदर पाइये, तहाँ तहाँ जीव जाइ। बिनआदरदीजे राम रस, छाड़ि हलाहल खाइ ॥ 123 ॥ करणी बिना कथनी करणी किरका को नहिं, कथनी अनंत अपार। दादू यों क्यों पाइये, रे मन मूढ गँवार ॥ 124 ॥ जाया माया मोहनी दादू मन मृतक भया, इंद्री अपने हाथ। तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 125 ॥ मन अब मन निर्भय घर नहीं, भय में बैठा आइ। निर्भय संग थैं बीछुट्या, तब कायर है जाइ ॥ 126 ॥ जब मन मृतक है रहे, इंद्री बल भागा। काया के सब गुण तजे, निरंजन लागा ॥ 127 ॥ आदि अंत मधि एक रस, टूटे नहीं धागा। दादू एकै रहि गया, तब जाणी जागा ॥ 128 ॥ दादू मन के शीश मुख, हस्त पांव है जीव। श्रवण नेत्र रसना रटै, दादू पाया पीव ॥ 129 ॥ जहँ के नवाये सब नवैं, सोई सिर कर जाण। जहँ के बुलाये बोलिये, सोई मुख परमाण ॥ 130 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 जहाँ के सुणाये सब सुणैं, सोई श्रवण सयाण । जहाँ के दिखाये देखिये, सोई नैन सुजाण ॥ 131 ॥ दादू मन ही सौं मल ऊपजै, मन ही सौं मल धोइ । सीख चली गुरु साध की, तो तूँ निर्मल होइ ॥ 132 ॥ दादू मन ही माया ऊपजै, मन ही माया जाइ । मन ही राता राम सौं, मन ही रह्या समाइ ॥ 133 ॥ दादू मन ही मरणा ऊपजै, मन ही मरणा खाइ । मन अविनासी ह्वै रह्या, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 134 ॥ मन ही सन्मुख नूर है, मन ही सन्मुख तेज । मन ही सन्मुख ज्योति है, मन ही सन्मुख सेज ॥ 135 ॥ मन ही सौं मन थिर भया, मन ही सौं मन लाइ । मन ही सौं मन मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥ 136 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य दसवां मन का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 10 ॥ साखी 136 ॥
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अथ सूक्ष्म जन्म का अंग ११ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू चौरासी लख जीव की, प्रकृति घट मांहि। अनेक जन्म दिन के करै, कोई जाणै नांहि ॥ 2 ॥ अनेक जन्म दिन के करै दादू जेते गुण व्यापैं जीव को, ते ते ही अवतार। आवागमन यहु दूर कर, समर्थ सिरजनहार ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-सूक्ष्म जन्म का अंग 11 सब गुण सब ही जीव के, दादू व्यापैं आइ। घट मांहि जामैं मरै, कोइ न जाणै ताहि ॥ 4 ॥ जीव जन्म जाणै नहीं, पलक पलक में होइ। चौरासी लख भोगवै, दादू लखै न कोइ ॥ 5 ॥ अनेक रूप दिन के करै, यहु मन आवै जाइ। आवागमन मन का मिटै, तब दादू रहै समाइ ॥ 6 ॥ निशिवासर यहु मन चलै, सूक्ष्म जीव संहार। दादू मन थिर कीजिये, आतम लेहु उबारि ॥ 7 ॥ कबहुँ पावक कबहुँ पाणी, धर अम्बर गुण बाइ। कबहुँ कुंजर कबहुँ कीड़ी, नर पशुवा ह्वै जाइ ॥ 8 ॥ करणी बिना कथनी शूकर स्वान सियाल सिंह, सर्प रहैं घट मांहि। कुंजर कीड़ी जीव सब, पांडे जाणै नांहि ॥ 9 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य ग्यारहवां सूक्ष्म जन्म का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 11 ॥ साखी 9 ॥
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माया का अंग www.dadooram.org
माया क अंग ११ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।। साहिब है पर हम नहीं, सब जग आवै जाइ । दादू सपना देखिये, जागत गया बिलाइ ।। 2 ।। दादू माया का सुख पंच दिन, गर्व्यों कहा गँवार । सपने पायो राज धन, जात न लागे बार ।। 3 ।। दादू सपने सूता प्राणिया, किये भोग विलास । जागत झूठा ह्रै गया, ताकी कैसी आस ।। 4 ।।
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
यों माया का सुख मन करै, सेजां सुंदरी पास । अंत काल आया गया, दादू होहु उदास ॥ 5 ॥ जे नांही सो देखिये, सूता सपने माँहि । दादू झूठा है गया, जागे तो कुछ नांहि ॥ 6 ॥ यहु सब माया मृग जल, झूठा झिलमिल होइ । दादू चिलका देखि कर, सत कर जाना सोइ ॥ 7 ॥ झूठा झिलमिल मृग जल, पाणी कर लीया । दादू जग प्यासा मरै, पसु प्राणी पीया ॥ 8 ॥ पति पहचान छलावा छल जायगा, सपना बाजी सोइ । दादू देख न भूलिये, यहु निज रूप न होइ ॥ 9 ॥ चितावणी सपने सब कुछ देखिये, जागे तो कुछ नांहि । ऐसा यहु संसार है, समझ देखि मन माँहि ॥ 10 ॥ दादू ज्यों कुछ सपने देखिये, तैसा यहु संसार । ऐसा आपा जानिये, फूल्यो कहा गँवार ॥ 11 ॥ दादू जतन जतन करि राखिये, दिढ़ गहि आतम मूल । दूजा दृष्टि न देखिये, सब ही सैंबल फूल ॥ 12 ॥ दादू नैनहुँ भर नहिं देखिये, सब माया का रूप । तहँ ले नैना राखिये, जहाँ है तत्त्व अनूप ॥ 13 ॥ हस्ती हय बर धन देख कर, फूल्यो अंग न माइ । भेरि दमामा एक दिन, सब ही छाड़े जाइ ॥ 14 ॥ दादू माया बिहड़ै देखतां, काया संग न जाइ । कृत्रिम बिहड़ै बावरे, अजरावर ल्यौ लाइ ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 दादू माया का बल देख कर, आया अति अहंकार। अन्ध भया सूझै नहीं, का करि है सिरजनहार ॥ 16 ॥ विरक्तता मन मनसा माया रती, पंच तत्व प्रकाश। चौदह तीनों लोक सब, दादू होहु उदास ॥ 17 ॥ माया देखे मन खुशी, हिरदै होइ विकास। दादू यहु गति जीव की, अंत न पूगै आस ॥ 18 ॥ मन की मूठि न माँडिये, माया के नीसाण। पीछे ही पछिताहुगे, दादू खूटे बाण ॥ 19 ॥ शिश्न स्वाद कुछ खातां कुछ खेलतां, कुछ सोवत दिन जाइ। कुछ विषिया रस विलसतां, दादू गये विलाइ ॥ 20 ॥ संगति कुसंगति माखन मन पाहण भया, माया रस पीया। पाहण मन माखन भया, राम रस लीया ॥ 21 ॥ दादू माया सौं मन बिगड़या, ज्यों कांजी करि दुग्ध। है कोई संसार में, मन करि देवे शुद्ध ॥ 22 ॥ गंदी सौं गंदा भया, यों गंदा सब कोइ। दादू लागै खूब सौं, तो खूब सरीखा होइ ॥ 23 ॥ दादू माया सौं मन रत भया, विषय रस माता। दादू साचा छाड़ कर, झूठे रंग राता ॥ 24 ॥ माया के संग जे गये, ते बहुरि न आये। दादू माया डाकिनी, इन केते खाये ॥ 25 ॥ दादू माया मोट विकार की, कोइ न सकै डार। बहि बहि मूये बापुरे, गये बहुत पचि हार ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 दादू रूप राग गुण अनुसरे, जहाँ माया तहँ जाइ । विद्या अक्षर पंडिता, तहाँ रहे घर छाइ ॥ 27 ॥ साधु न कोई पग भरै, कबहुँ राज दुवार । दादू उलटा आप में, बैठा ब्रह्म विचार ॥ 28 ॥ आशय-विश्राम दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार । सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥ 29 ॥ माया दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार । माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥ 30 ॥ शिश्न स्वाद दादू विषय के कारणै रूप राते रहैं, नैन नापाक यों कीन्ह भाई । बदी की बात सुनत सारा दिन, श्रवण नापाक यों कीन्ह जाई ॥ 31 ॥ स्वाद के कारणै लुब्धि लागी रहे, जिभ्या नापाक यों कीन्ह खाई । भोग के कारणै भूख लागी रहे, अंग नापाक यों कीन्ह लाई ॥ 32 ॥ दादू नगरी चैन तब, जब इक राजी होइ । द्वै राजी दुख द्वन्द्व में, सुखी न बैसे कोइ ॥ 33 ॥ इक राजी आनन्द है, नगरी निश्चल वास । राजा प्रजा सुखी बसै, दादू जोति प्रकाश ॥ 34 ॥ शिश्न स्वाद जैसे कुंजर काम वश, आप बंधाणा आइ । ऐसे दादू हम भये, क्यों कर निकस्या जाइ ॥ 35 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 जैसे मर्कट जीभ रस, आप बंधाणा अंध। ऐसे दादू हम भये, क्यों कर छूटै फंध ॥ 36 ॥ ज्यों सूवा सुख कारणै, बंध्या मूरख माँहि। ऐसे दादू हम भये, क्यों ही निकसै नाहि ॥ 37 ॥ जैसे अंध अज्ञान गृह, बंध्या मूरख स्वाद। ऐसैं दादू हम भये, जन्म गँवाया बाद ॥ 38 ॥ दादू बूड रह्या रे बापुरे, माया गृह के कूप। मोह्या कनक अरु कामिनी, नाना विधि के रूप ॥ 39 ॥ शिश्न स्वाद दादू स्वाद लागि संसार सब, देखत परलै जाइ। इन्द्री स्वारथ साच तजि, सबै बंधाणै आइ ॥ 40 ॥ विष सुख माँहैं रम रहे, माया हित चित लाइ। सोई संतजन ऊबरे, स्वाद छाड़ि गुण गाइ ॥ 41 ॥ आसक्तता मोह दादू झूठी काया झूठ घर, झूठा यहु परिवार। झूठी माया देखकर, फूल्यो कहा गँवार ॥ 42 ॥ दादू झूठा संसार, झूठा परिवार, झूठा घर बार, झूठा नर नार, तहाँ मन माने। झूठा कुल जात, झूठा पितु मात, झूठा बंधु भ्रात, झूठा तन गात, सत्य कर जाने। झूठा सब धंध, झूठा सब फंध, झूठा सब अंध, झूठा जाचंध, कहा मग छाने। दादू भाग, झूठ सब त्याग, जाग रे जाग, देख दीवाने ॥ 43 ॥ दादू झूठे तन के कारणै, कीये बहुत विकार। गृह दारा धन संपदा, पूत कुटुम्ब परिवार ॥ 44 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 ता कारण हत आतमा, झूठ कपट अहंकार। सो माटी मिल जायगा, बिसऱ्या सिरजनहार ॥ 45 ॥ दादू जन्म गया सब देखतां, झूठी के संग लाग। साचे प्रीतम को मिले, भाग सके तो भाग ॥ 46 ॥ दादू गतं गृहं, गतं धनं, गतं दारा सुत यौवनं। गतं माता, गतं पिता, गतं बंधु सज्जनं। गतं आपा, गतं परा, गतं संसार कत रंजनं। भजसि भजसि रे मन, परब्रह्म निरंजनं ॥ 47 ॥ आसक्ति मोह जीवों माँही जीव रहै, ऐसा माया मोह। सांई सूधा सब गया, दादू नहीं अंदोह ॥ 48 ॥ विरक्तता माया मगहर खेत खर, सद्गति कदे न होइ। जे बंचे ते देवता, राम सरीखे सोइ ॥ 49 ॥ कालर खेत न नीपजै, जो बाहे सौ बार। दादू हाना बीज का, क्या पचि मरै गँवार ॥ 50 ॥ दादू इस संसार सौं, निमष न कीजे नेह। जामण मरण आवटणा, छिन छिन दाझै देह ॥ 51 ॥ दादू मोह संसार को, विहरै तन मन प्राण। दादू छूटै ज्ञान कर, को साधु संत सुजाण ॥ 52 ॥ मन हस्ती माया हस्तिनी, सघन वन संसार। तामैं निर्भय हो रह्या, दादू मुग्ध गँवार ॥ 53 ॥ दादू काम कठिन घट चोर है, घर फोड़ै दिन रात। सोवत साह न जागई, तत्त्व वस्तु ले जात ॥ 54 ॥ काम कठिन घट चोर है, मूसे भरे भंडार। सोवत ही ले जायगा, चेतन पहरे चार ॥ 55 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 ज्यों घुण लागै काठ को, लोहा लागै काट। काम किया घट जाजरा, दादू बारह बाट ॥ 56 ॥ करतूति कर्म राहु गिलै ज्यों चंद को, ग्रहण गिलै ज्यों सूर। कर्म गिलै यों जीव को, नख-सिख लागै पूर ॥ 57 ॥ दादू चन्द्र गिलै जब राहु को, ग्रहण गिलै जब सूर। जीव गिलै जब कर्म को, राम रह्या भरपूर ॥ 58 ॥ कर्म कुहाड़ा अंग वन, काटत बारंबार। अपने हाथों आप को, काटत है संसार ॥ 59 ॥ मित्रता शत्रुता आपै मारै आप कौं, यहु जीव बिचारा। साहिब राखणहार है, सो हितू हमारा ॥ 60 ॥ आपै मारै आपकौं, आप आपकौं, खाइ। आपै अपणा काल है, दादू कहै समझाइ ॥ 61 ॥ करतूती कर्म मरबे की सब ऊपजै, जीबे की कुछ नांहि। जीबे की जाणैं नहीं, मरबे की मन माँहि ॥ 62 ॥ बंध्या बहुत विकार सौं, सर्व पाप का मूल। ढाहै सब आकार को, दादू येह स्थूल ॥ 63 ॥ दादू यह तो दोज़ख देखिये, काम क्रोध अहंकार। रात दिवस जरबौ करै, आपा अग्नि विकार ॥ 64 ॥ विषय हलाहल खाइ कर, सब जग मर मर जाइ। दादू मोहरा नाम ले, हृदय राखि ल्यौ लाइ ॥ 65 ॥ जेती विषया विलसिये, तेती हत्या होइ। प्रत्यक्ष मानुष मारिये, सकल शिरोमणि सोइ ॥ 66 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
विषया का रस मद भया, नर नारी का माँस । माया माते मद पिया, किया जन्म का नाश ॥ 67 ॥ दादू भावै शाक्त भक्त हो, विषय हलाहल खाइ । तहँ जन तेरा राम जी, सपने कदे न जाइ ॥ 68 ॥ दादू खाडा बूजी भगत है, लोहरवाडा माँहि । परगट पैंडाइत बसैं, तहँ संत काहे को जांहि ॥ 69 ॥ साँपणि एक सब जीव को, आगे पीछे खाइ । दादू कहि उपकार कर, कोइ जन ऊबर जाइ ॥ 70 ॥ दादू खाये साँपणी, क्यों कर जीवैं लोग । राम मंत्र जन गारुड़ी, जीवैं इहि संजोग ॥ 71 ॥ दादू माया कारण जग मरै, पीव के कारण कोइ । देखो ज्यों जग परजलै, निमष न न्यारा होइ ॥ 72 ॥ काल कनक अरु कामिनी, परिहर इन का संग । दादू सब जग जल मुवा,ज्यों दीपक ज्योति पतंग ॥ 73 ॥ दादू जहाँ कनक अरु कामनी, तहँ जीव पतंगे जांहि । आग अनंत सूझै नहीं, जल-जल मूये माँहि ॥ 74 ॥ घट माँही माया घणी, बाहर त्यागी होइ । फाटी कंथा पहर कर, चिन्ह करै सब कोइ ॥ 75 ॥ काया राखे बन्ध दे, मन दह दिशि खेले । दादू कनक अरु कामिनी, माया नहीं मेले ॥ 76 ॥ दरसन पहरै मूंड मुंडावै, दुनियां देख त्याग दिखलावै । मन सौं मीठी मुख सौं खारी, माया त्यागी कहैं बजारी ॥ 77 ॥ माया मंदिर मीच का, तामैं पैठा धाइ । अंध भया सूझै नहीं, साध कहैं समझाइ ॥ 78 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 दादू केते जल मुए, इस जोगी की आग। दादू दूरै बंचिये, जोगी के संग लाग ॥ 79 ॥ ज्यों जल मैणी माछली, तैसा यहु संसार। माया माते जीव सब, दादू मरत न बार ॥ 80 ॥ दादू माया फोड़े नैन दोइ, राम न सूझै काल। साधु पुकारैं मेरू चढ़, देखि अग्नि की झाल ॥ 81 ॥ बिना भुवंगम हम डसे, बिन जल डूबे जाइ। बिन ही पावक ज्यों जले, दादू कुछ न बसाइ ॥ 82 ॥ दादू अमृत रूपी आप है, और सबै विष झाल। राखणहारा राम है, दादू दूजा काल ॥ 83 ॥ बाजी चिहर रचाय कर, रह्या अपरछन होइ। माया पट पड़दा दिया, तातैं लखै न कोइ ॥ 84 ॥ दादू बाहे देखतां, ढिग ही ढोरी लाइ। पीव पीव करते सब गये, आपा दे न दिखाइ ॥ 85 ॥ मैं चाहूँ सो ना मिलै, साहिब का दीदार। दादू बाजी बहुत हैं, नाना रंग अपार ॥ 86 ॥ हम चाहें सो ना मिलै, और बहुतेरा आइ। दादू मन मानै नहीं, केता आवै जाइ ॥ 87 ॥ बाजी मोहे जीव सब, हमको भुरकी बाहि। दादू कैसी कर गया, आपण रह्या छिपाइ ॥ 88 ॥ दादू सांई सत्य है, दूजा भ्रम विकार। नाम निरंजन निर्मला, दूजा घोर अंधार ॥ 89 ॥ दादू सो धन लीजिये, जे तुम सेती होइ। माया बांधे कई मुए, पूरा पड्या न कोइ ॥ 90 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 दादू कहै, जे हम छाड़े हाथ थैं, सो तुम लिया पसार । जे हम लेवैं प्रीति सौं, सो तुम दिया डार ॥ 91 ॥ दादू हीरा पग सौं ठेलि कर, कंकर को कर लीन्ह । पारब्रह्म को छाड़ कर, जीवन सौं हित कीन्ह ॥ 92 ॥ दादू सबको बणिजै खार खल, हीरा कोई न लेय । हीरा लेगा जौहरी, जो माँगे सो देय ॥ 93 ॥ दड़ी दोट ज्यों मारिये, तिहुँ लोक में फे र । धुरि पहुँचे संतोंष है, दादू चढिबा मेर ॥ 94 ॥ अनिल पंखी आकाश को, माया मेरु उलंघ । दादू उलटे पंथ चढ, जाइ बिलंबे अंग ॥ 95 ॥ दादू माया आगे जीव सब, ठाढे रहे कर जोड़ । जिन सिरजे जल बूँद सौं, तासों बैठे तोड़ ॥ 96 ॥ सुर नर मुनिवर वश किये, ब्रह्मा विष्णु महेश । सकल लोक के सिर खड़ी, साधु के पग हेठ ॥ 97 ॥ दादू माया चेरी संत की, दासी उस दरबार । ठकुराणी सब जगत की, तीनों लोक मंझार ॥ 98 ॥ दादू माया दासी संत की, शाकत की सिरताज । शाकत सेती भांडणी, संतों सेती लाज ॥ 99 ॥ चार पदार्थ मुक्ति बापुरी, अठ सिधि नव निधि चेरी । माया दासी ताकेआगे, जहाँ भक्ति निरंजन तेरी ॥ 100 ॥ दादू कहै, माया चेरी साधुहि सेवै । साधुन कबहूँ आदर देवै ॥ ज्यों आवै, त्यों जाइ बिचारी । विलसी, वितड़ी, न माथै मारी ॥ 101 ॥ दादू माया सब गहले किये, चौरासी लख जीव । ताका चेरी क्या करै, जे रंग राते पीव ॥ 102 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 विरक्तता दादू माया बैरिण जीव की, जनि कोइ लावे प्रीति । माया देखे नरक कर, यह संतन की रीति ॥ 103 ॥ माया माया मति चकचाल कर, चंचल कीये जीव । माया माते मद पिया, दादू बिसऱ्या पीव ॥ 104 ॥ आन लग्न व्यभिचार जने जने की राम की, घर घर की नारी । पतिव्रता नहीं पीव की, सो माथै मारी ॥ 105 ॥ जन जन के उठ पीछे लागै, घर घर भ्रमत डोलै । ताथैं दादू खाइ तमाचे, माँदल दुहुँ मुख बोलै ॥ 106 ॥ विषय विरक्तता जे नर कामिनी परहरैं,ते छूटैं गर्भवास । दादू ऊँधे मुख नहीं, रहैं निरंजन पास ॥ 107 ॥ रोक न राखै, झूठ न भाखै, दादू खरचै खाइ । नदी पूर प्रवाह ज्यों, माया आवै जाइ ॥ 108 ॥ सदका सिरजनहार का, केता आवै जाइ । दादू धन संचय नहीं, बैठा खुलावै खाइ ॥ 109 ॥ माया जोगिनी ह्वै जोगी गहै, सूफिनी ह्वै कर शेख । भक्तिनी ह्वै भक्ता गहै, कर कर नाना भेख ॥ 110 ॥ बुद्धि विवेक बल हरणी, त्रय तन ताप उपावनी । अंग अगनि प्रजालिनी, जीव घरबार नचावनी ॥ 111 ॥ नाना विधि के रूप धर, सब बांधे भामिनी । जग बिटंब परलै किया, हरि नाम भुलावनी ॥ 112 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 बाजीगर की पूतली, ज्यौं मर्कट मोह्या। दादू माया राम की, सब जगत बिगोया ॥ 113 ॥ शिश्न स्वाद मोरा मोरी देखकर, नाचै पंख पसार। यों दादू घर आंगणै, हम नाचे कै बार ॥ 114 ॥ पुरुष प्रकाशक दादू जिस घट दीपक राम का, तिस घट तिमिर न होइ। उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 115 ॥ माया दादू जेहि घट ब्रह्म न प्रकटै, तहँ माया मंगल गाइ। दादू जागै ज्योति जब, तब माया भ्रम विलाइ ॥ 116 ॥ पति पहचान दादू जोति चमकै तिरवरे, दीपक देखै लोइ। चन्द सूर का चान्दणा, पगार छलावा होइ ॥ 117 ॥ माया दादू दीपक देह का, माया प्रगट होइ। चौरासी लख पंखिया, तहाँ परै सब कोइ ॥ 118 ॥ पुरुष प्रकाशक दादू यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश। दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥ 119 ॥ विषय विरक्तता दादू मन मृतक भया, इंद्री अपणै हाथ। तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 120 ॥ जानै बूझै जीव सब, त्रिया पुरुष का अंग। आपा पर भूला नहीं, दादू कैसा संग ॥ 121 ॥ माया के घट साजि द्वै, त्रिया पुरुष धरि नांव। दोन्यूं सुन्दर खेलैं दादू, राखि लेहु बलि जांव ॥ 122 ॥
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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 बहिन बीर सब देखिये, नारी अरु भरतार । परमेश्वर के पेट का, दादू सब परिवार ॥ 123 ॥ पर घर परिहर आपणी, सब एकै उणहार । पसु प्राणी समझै नहीं, दादू मुग्ध गँवार ॥ 124 ॥ पुरुष पलट बेटा भया, नारी माता होहि । दादू को समझै नहीं, बड़ा अचंभा मोहि ॥ 125 ॥ माता नारी पुरुष की, पुरुष नारी का पूत । दादू ज्ञान विचार कर, छाड़ गये अवधूत ॥ 126 ॥ अध्यात्म दादू माया का जल पीवतां, व्याधि होइ विकार । सेझे का जल निर्मला, प्राण सुखी सुध सार ॥ 127 ॥ जीव गहिला जीव बावला, जीव दीवाना होइ । दादू अमृत छाड़ कर, विष पीवै सब कोइ ॥ 128 ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, सुर नर उरझाया । विष का अमृत नाम धर, सब किनहूँ खाया ॥ 129 ॥ माया माया मैली गुणमयी, धर धर उज्ज्वल नांम । दादू मोहे सबनि को, सुर नर सब ही ठांम ॥ 130 ॥ विषय अतृप्ति विष का अमृत नांव धर, सब कोई खावै । दादू खारा ना कहै, यहु अचरज आवै ॥ 131 ॥ दादू जे विष जारे खाइ कर, जनि मुख में मेलै । आदि अन्त परलै गये, जे विष सौं खेलै ॥ 132 ॥ जिन विष खाया ते मुये, क्या मेरा तेरा । आग पराई आपणी, सब करै निबेरा ॥ 133 ॥
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