भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 आवट कूटा होत है, अवसर बीता जाइ । दादू कर ले बंदगी, राखणहार खुदाइ ॥ 38 ॥ इस कलि केते ह्वै गये, हिंदू मुसलमान । दादू सांची बंदगी, झूठा सब अभिमान ॥ 39 ॥ कथनी बिना करणी पोथी अपना पिंड कर, हरि यश माँहीं लेख । पंडित अपना प्राण कर, दादू कथहु अलेख ॥ 40 ॥ काया कतेब बोलिए, लिख राखूं रहमान । मनवा मुल्लां बोलिये, श्रोता है सुबहान ॥ 41 ॥ दादू काया महल में नमाज गुजारूं, तहँ और न आवन पावै । मन मणके कर तसबीह फेरूं, तब साहिब के मन भावै ॥ 42 ॥ दिल दरिया में गुसल हमारा, ऊजू कर चित लाऊँ । साहिब आगेकरूं बंदगी, बेर बेर बलि जाऊँ ॥ 43 ॥ दादू पंचों संग संभालूं सांई, तन मन तब सुख पाऊँ। प्रेम पियाला पिवजी देवै, कलमा ये लै लाऊँ ॥ 44 ॥ शोभा कारण सब करै, रोजा बांग नमाज । मुवा न एकौ आह सौं, जे तुझ साहिब सेती काज ॥ 45 ॥ हर रोज हजूरी होइ रहु, काहे करै कलाप । मुल्ला तहाँ पुकारिये, जहाँ अर्श इलाही आप ॥ 46 ॥ हरदम हाजिर होना बाबा, जब लग जीवै बंदा । दायम दिल सांई सौं साबित, पंच वक्त क्या धंधा ॥ 47 ॥ हिंदू मुसलमानों का भ्रम दादू हिंदू मारग कहैं हमारा, तुरक कहैं रह मेरी । कहाँ पंथ है कहो अलह का? तुम तो ऐसी हेरी ॥ 48 ॥ दादू दुई दरोग लोग को भावै, सांई को साँच पियारा । कौन पंथ हम चलैं कहो धू, साधो करो विचारा ॥ 49 ॥

  • 166 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 खंड खंड कर ब्रह्म को, पख पख लीया बाँट। दादू पूरण ब्रह्म तज, बँधे भरम की गाँठ ॥ 50 ॥ मन विकार औषधि जीवत दीसै रोगिया, कहैं मूवां पीछे जाइ। दादू दुँह के पाठ में, ऐसी दारू लाइ ॥ 51 ॥ सो दारू किस काम की, जाथैं दर्द न जाइ। दादू काटै रोग को, सो दारू ले लाइ ॥ 52 ॥ दादू अनुभव काटै रोग को, अनहद उपजै आइ। सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौ लाइ ॥ 53 ॥ सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तत सार। सुनतां ही साहिब मिलै, मन के जाहिं विकार ॥ 54 ॥ चानक उपदेश औषध खाइ न पथ्य रहै, विषम व्याधि क्यों जाइ। दादू रोगी बावरा, दोष बैद को लाइ ॥ 55 ॥ एक सेर का ठांवड़ा, क्योंही भऱ्या न जाइ। भूख न भागी जीव की, दादू केता खाइ ॥ 56 ॥ पशुवां की नांई भर भर खाइ, व्याधि घणेरी बधती जाइ। पशुवां नांई करै अहार, दादू बाढै रोग अपार ॥ 57 ॥ राम रसायन भर भर पीवै, दादू जोगी जुग जुग जीवै। संयम सदा, न व्यापै व्याधी, रहै निरोगी लगै समाधी ॥ 58 ॥ शिश्न श्वास दादू चारै चित दिया, चिन्तामणि को भूल। जन्म अमोलक जात है, बैठे माँझी फूल ॥ 59 ॥ भरी अधौड़ी भावठी, बैठा पेट फुलाइ। दादू शूकर स्वान ज्यों, ज्यों आवै त्यों खाइ ॥ 60 ॥

  • 167 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 दादू खाटा मीठा खाइ करि, स्वादैं चित दीया । इन में जीव विलंबिया, हरि नाम न लीया ॥ 61 ॥ भक्ति न जाणै राम की, इन्द्री के आधीन । दादू बँध्या स्वाद सौं, ताथैं नाम न लीन ॥ 62 ॥ सांच दादू अपना नीका राखिये, मैं मेरा दिया बहाइ । तुझ अपने सेती काज है, मैं मेरा भावै तीधर जाइ ॥ 63 ॥ जे हम जाण्या एक कर, तो काहे लोक रिसाइ । मेरा था सो मैं लिया, लोगों का क्या जाइ ॥ 64 ॥ करणी बिना कथनी दादू द्वै द्वै पद किये, साखी भी द्वै चार । हमको अनुभव ऊपजी, हम ज्ञानी संसार ॥ 65 ॥ सुन सुन पर्चै ज्ञान के, साखी शब्द्दी होइ । तब ही आपा ऊपजै, हम-सा और न कोइ ॥ 66 ॥ सो उपज किस काम की, जे जण जण करै क्लेश । साखी सुन समझै साधु की, ज्यों रसना रस शेष ॥ 67 ॥ दादू पद जोड़ै साखी कहै, विषय न छाड़ै जीव । पानी घालि बिलोइये तो, क्यों करि निकसै घीव ॥ 68 ॥ दादू पद जोड़े का पाइये, साखी कहे का होइ । सत्य शिरोमणि सांइयां, तत्त न चीन्हा सोइ ॥ 69 ॥ कहबा सुनबा मन खुशी, करबा औरै खेल । बातों तिमिर न भाजई, दीवा बाती तेल ॥ 70 ॥ दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर । कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥ 71 ॥ कहे कहे का होत है, कहे न सीझै काम । कहे कहे का पाइये, जब लग हृदै न आवै राम ॥ 72 ॥

  • 168 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 चौंप चरचा दादू श्रोता घर नहीं, वक्ता बकै सु बादि । वक्ता श्रोता एक रस, कथा कहावै आदि ॥ 73 ॥ वक्ता श्रोता घर नहीं, कहै सुनै को राम । दादू यहु मन थिर नहीं, बाद बकै बेकाम ॥ 74 ॥ विचार दृढ़ ज्ञान अन्तर सुरझे समझ कर, फिर न अरूझे जाइ । बाहर सुरझे देखतां, बहुरि अरूझे आइ ॥ 75 ॥ झूठै गुरु आतम लावै आप सौं, साहिब सेती नांहि । दादू को निपजै नहीं, दोन्यूं निष्फल जांहि ॥ 76 ॥ तू मुझ को मोटा कहै, हौं तुझ बड़ाई मान । सांई को समझै नहीं, दादू झूठा ज्ञान ॥ 77 ॥ कस्तूरिया मृग सदा समीप रहै संग सन्मुख, दादू लखै न गूझ । सपने ही समझै नहीं, क्यों कर लहै अबूझ ॥ 78 ॥ बेखर्च व्यसनी दादू सेवक नाम बुलाइये, सेवा सपनैं नांहिं । नाम धराये का भया, जे एक नहीं मन माहिं ॥ 79 ॥ नाम धरावै दास का, दासातन थैं दूर । दादू कारज क्यों सरै, हरि सौं नहीं हजूर ॥ 80 ॥ भक्त न होवै भक्ति बिन, दासातन बिन दास । बिन सेवा सेवक नहीं, दादू झूठी आस ॥ 81 ॥ राम भक्ति भावै नहीं, अपनी भक्ति का भाव । राम भक्ति मुख सौं कहै, खेलै अपना डाव ॥ 82 ॥

  • 169 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 भक्ति निराली रह गई, हम भूल पड़े वन माहिं। भक्ति निरंजन राम की, दादू पावै नांहिं ॥ 83 ॥ सो दशा कतहूँ रही, जिहि दिशि पहुंचै साध। मैं तैं मूरख गह रहे, लोभ बड़ाई बाद ॥ 84 ॥ दादू राम विसार कर, कीये बहु अपराध। लाजों मारे संत सब, नांव हमारा साध ॥ 85 ॥ करणी बिना कथनी मनसा के पकवान सौं, क्यों पेट भरावै। ज्यों कहिये त्यों कीजिये, तब ही बन आवै ॥ 86 ॥ दादू मिश्री मिश्री कीजिये, मुख मीठा नाहीं। मीठा तब ही होइगा, छिटकावै माहीं ॥ 87 ॥ दादू बातों ही पहुंचै नहीं, घर दूर पयाना। मारग पन्थी उठि चलै, दादू सोई सयाना ॥ 88 ॥ बातों सब कुछ कीजिये, अंत कछू नहिं देखै। मनसा वाचा कर्मना, तब लागै लेखै ॥ 89 ॥ समझ सुजानता दादू कासौँ कहि समझाइये, सब कोई चतुर सुजान। कीड़ी कुंजर आदि दे, नाहिंन कोई अजान ॥ 90 ॥ करणी बिना कथनी शूकर स्वान सियाल सिंह, सर्प रहैं घट माँहि। कुंजर कीड़ी जीव सब, पांडे जाणैं नाहिं ॥ 91 ॥ दादू सूना घट सोधी नहीं, पंडित ब्रह्मा पूत। आगम निगम सब कथैं, घर में नाचै भूत ॥ 92 ॥ पढे न पावै परमगति, पढे न लंघै पार। पढे न पहुंचै प्राणियां, दादू पीड़ पुकार ॥ 93 ॥

  • 170 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13

दादू निवरे नाम बिन, झूठा कथैं गियान । बैठे सिर खाली करें, पंडित वेद पुरान ॥ 94 ॥ दादू केते पुस्तक पढ़ मुये, पंडित वेद पुरान । केते ब्रह्मा कथ गये, नांहिन राम समान ॥ 95 ॥ सब हम देख्या सोध कर, वेद कुरानों माँहि । जहाँ निरंजन पाइये, सो देश दूर, इत नांहि ॥ 96 ॥ पढ पढ थाके पंडिता, किनहूँ न पाया पार । कथ कथ थाके मुनिजना, दादू नाम अधार ॥ 97 ॥ काजी कजा न जानहीं, कागद हाथ कतेब । पढतां पढतां दिन गये, भीतर नांहि भेद ॥ 98 ॥ मसि कागज के आसरे, क्यों छूटै संसार ? राम बिना छूटै नहीं, दादू भ्रम विकार ॥ 99 ॥ कागद काले कर मुए, केते वेद पुराण । एकै अक्षर पीव का, दादू पढै सुजान ॥ 100 ॥ एकै अक्षर प्रेम का, कोई पढेगा एक। दादू पुस्तक प्रेम बिन, केते पढ़ें अनेक ॥ 101 ॥ दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचै कोइ । बेद पुरान पुस्तक पढै, प्रेम बिना क्या होइ ॥ 102 ॥ दादू कहतां कहतां दिन गये, सुनतां सुनतां जाइ । दादू ऐसा को नहीं, कहि सुनि राम समाइ ॥ 103 ॥ मध्य निरपक्ष मौन गहैं ते बावरे, बोलैं खरे अयान । सहजैं राते राम सौं, दादू सोई सयान ॥ 104 ॥ करुणा कहतां सुनतां दिन गये, है कछू न आवा । दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछतावा ॥ 105 ॥

  • 171 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 अनाधिकारी दादू कथनी और कुछ, करणी करैं कछु और। तिन थैं मेरा जीव डरै, जिनके ठीक न ठौर ॥ 106 ॥ अन्तरगत औरै कछु, मुख रसना कुछ और। दादू करणी और कुछ, तिनको नांही ठौर ॥ 107 ॥ मन प्रबोध दादू राम मिलन की कहत हैं, करते कुछ औरे। ऐसे पीव क्यौं पाइये, समझि मन बौरे ॥ 108 ॥ बेखर्च व्यसनी दादू बगनी भंगा खाइ कर, मतवाले माँझी। पैका नांही गांठड़ी, पातशाह खांजी ॥ 109 ॥ दादू टोटा दालिदी, लाखों का व्यौपार। पैका नांही गांठड़ी, सिरै साहूकार ॥ 110 ॥ मध्य निष्पक्ष-सब मतों का निशाना एक दादू ये सब किसके पंथ में, धरती अरु आसमान। पानी पवन दिन रात का, चंद सूर रहमान ॥ 111 ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश का, कौन पंथ गुरुदेव। सांई सिरजनहार तूं, कहिये अलख अभेव ॥ 112 ॥ मुहम्मद किसके दीन में, जिब्राईल किस राह? इनके मुर्शिद पीर की, कहिये एक अल्लाह ॥ 113 ॥ दादू ये सब किसके ह्वै रहे, यहु मेरे मन माँहि। अलख इलाही जगत-गुरु, दूजा कोई नांहि ॥ 114 ॥ पतिव्रत व्यभिचार दादू औरैं ही औला तके, थीयां सदै बियंनि। सो तू मीयां ना घुरै, जो मीयां मीयंनि ॥ 115 ॥

  • 172 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 सत्य असत्य गुरु पारख लक्षण आई रोजी ज्यों गई, साहिब का दीदार। गहला लोगों कारणैं, देखै नहीं गँवार ॥ 116 ॥ पतिव्रत निष्काम दादू सोई सेवक राम का, जिसे न दूजी चिंत। दूजा को भावै नहीं, एक पियारा मिंत ॥ 117 ॥ भ्रम विध्वंसण अपनी अपनी जाति सौं, सब को बैसैं पांति। दादू सेवग राम का, ताके नहीं भरांति ॥ 118 ॥ चोर अन्याई मसखरा, सब मिलि बैसैं पांति। दादू सेवक राम का, तिन सौं करें भरांति ॥ 119 ॥ दादू सूप बजायां क्यों टलै, घर में बड़ी बलाइ। काल झाल इस जीव का, बातन ही क्यों जाइ?120 ॥ साँप गया सहनाण को, सब मिलि मारैं लोक। दादू ऐसा देखिए, कुल का डगरा फोक ॥ 121 ॥ दादू दोन्यूँ भरम हैं, हिन्दू तुरक गंवार। जे दुहुवाँ थैं रहित है, सो गहि तत्त्व विचार ॥ 122 ॥ अपना अपना कर लिया, भंजन माँही बाहि। दादू एकै कूप जल, मन का भ्रम उठाहि ॥ 123 ॥ दादू पानी के बहु नाम धर, नाना विधि की जात। बोलणहारा कौन है, कहो धौं कहाँ समात ॥ 124 ॥ जब पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक। काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥ 125 ॥ अमिट पाप प्रचण्ड भाव भक्ति उपजै नहीं, साहिब का प्रसंग। विषय विकार छूटै नहीं, सो कैसा सत्संग ॥ 126 ॥

  • 173 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 बासण विषय विकार के, तिनको आदर मान । संगी सिरजनहार के, तिन सौं गर्व गुमान ॥ 127 ॥ अंधे को दीपक दिया, तो भी तिमिर न जाय । सोधी नहीं शरीर की, तासन का समझाइ ॥ 128 ॥ सगुरा निगुरा दादू कहिए कुछ उपकार को, मानै अवगुण दोष । अंधे कूप बताइया, सत्य न मानै लोक ॥ 129 ॥ कालर खेत न नीपजै, जे बाहे सौ बार । दादू हाना बीज का, क्या पचि मरै गँवार ॥ 130 ॥ कृत्रिम कर्ता दादू जिन कंकर पत्थर सेविया, सो अपना मूल गँवाइ । अलख देव अंतर बसै, क्या दूजी जगह जाइ ॥ 131 ॥ पत्थर पीवे धोइ कर, पत्थर पूजे प्राण । अन्तकाल पत्थर भये, बहु बूडे इहि ज्ञान ॥ 132 ॥ कंकर बंध्या गांठड़ी, हीरे के विश्वास । अंतकाल हरि जौहरी, दादू सूत कपास ॥ 133 ॥ दादू पहली पूजे ढूंढसी, अब भी ढूंढस बाणि । आगे ढूंढस होइगा, दादू सत्य कर जाणि ॥ 134 ॥ भ्रम विध्वंसण दादू पैंडे पाप के, कदे न दीजे पांव । जिहिं पैंडे मेरा पीव मिले, तिहिं पैंडे का चाव ॥ 135 ॥ दादू सुकृत मारग चालतां, बुरा न कबहुँ होइ । अमृत खातां प्राणिया, मुवा न सुनिया कोइ ॥ 136 ॥ कुछ नाहीं का नाम क्या, जे धरिये सो झूठ। सुर नर मुनिजन बंधिया, लोका आवट कूट ॥ 137 ॥

  • 174 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 कुछ नाहीं का नाम धर, भरम्या सब संसार। सच झूठ समझै नहीं, ना कुछ किया विचार ॥ 138 ॥ कस्तूरिया मृग दादू केई दौडे द्वारिका, केई काशी जांहि। केई मथुरा को चले, साहिब घट ही माँहि ॥ 139 ॥ पूजनहारे पास हैं, देही माँही देव। दादू ताको छाड़ कर, बाहर माँडी सेव ॥ 140 ॥ सांच ऊपरि आलम सब करें, साधू जन घट माँहि। दादू एता अन्तरा, ताथैं बनती नांहि ॥ 141 ॥ दादू सब थे एक के, सो एक न जाना। जने जने का है गया, यहु जगत दिवाना ॥ 142 ॥ दादू झूठा साचा कर लिया, विष अमृत जाना। दुख को सुख सब को कहै, ऐसा जगत दिवाना ॥ 143 ॥ सूधा मारग साच का, साचा हो सो जाइ। झूठा कोई ना चलै, दादू दिया दिखाइ ॥ 144 ॥ साहिब सौं साचा नहीं, यहु मन झूठा होइ। दादू झूठे बहुत हैं, साचा विरला कोइ ॥ 145 ॥ दादू साचा अंग न ठेलिये, साहिब माने नांहि। साचा सिर पर राखिये, मिलि रहिये ता माँहि ॥ 146 ॥ जे कोई ठेले साच कौं, तो साचा रहै समाइ। कौड़ी बर क्यों दीजिये, रत्न अमोलक जाइ ॥ 147 ॥ साचे साहिब को मिले, साचे मारग जाइ। साचे सौं साचा भया, तब साचे लिये बुलाइ ॥ 148 ॥ दादू साचा साहिब सेविये, साची सेवा होइ। साचा दर्शन पाइये, साचा सेवक सोइ ॥ 149 ॥

  • 175 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 साचे का साहिब धणी, समर्थ सिरजनहार । पाखंड की यहु पृथ्विी, प्रपंच का संसार ॥ 150 ॥ कहै दादू जन जो कृत धारै, भलो बुरो फल ताही लारै । झूठा परगट साचा छानै, तिन की दादू राम न मानै ॥ 151 ॥ कहँ आशिक अल्लाह के, मारे अपने हाथ । कहँ आलम औजूद सौं, कहै जुबां की बात ॥ 152 ॥ दादू पाखंड पीव न पाइये, जे अंतर साच न होइ । ऊपर थैं क्यूं ही रहो, भीतर के मल धोइ ॥ 153 ॥ सच अमर जुग जुग रहै, दादू विरला कोइ । झूठ बहुत संसार में, उत्पत्ति परलै होइ ॥ 154 ॥ दादू झूठा बदलिये, साच न बदल्या जाइ । साचा सिर पर राखिये, साध कहै समझाइ ॥ 155 ॥ साच न सूझै जब लगै, तब लग लोचन अंध । दादू मुक्ता छाड़ कर, गल में घाल्या फंद ॥ 156 ॥ साच न सूझै जब लगै, तब लग लोचन नांहि । दादू निर्बंध छाड़ कर, बंध्या द्वै पख माँहि ॥ 157 ॥ एक साच सौं गहगही, जीवन मरण निबाहि । दादू दुखिया राम बिन, भावै तीधर जाहि ॥ 158 ॥ चितावणी दादू छानै छानै कीजिये, चौड़े प्रगट होइ । दादू पैस पयाल में, बुरा करे जनि कोइ ॥ 159 ॥ अनकिया लागै नहीं, किया लागै आइ । साहिब के दर न्याय है, जे कुछ राम रजाइ ॥ 160 ॥ आत्मार्थी भेख सोइ जन साधु सिद्ध सो, सोइ सतवादी शूर । सोइ मुनिवर दादू बड़े, सन्मुख रहणि हजूर ॥ 161 ॥

  • 176 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 सोइ जन साचे सो सती, सोइ साधक सुजान । सोइ ज्ञानी सोई पंडिता, जे राते भगवान ॥ 162 ॥ दादू सोइ जोगी, सोइ जंगमा, सोइ सूफी सोइ शेख । सोइ सन्यासी, सेवड़ा, दादू एक अलेख ॥ 163 ॥ सोइ काजी सोई मुल्ला, सोइ मोमिन मुसलमान । सोइ सयाने सब भले, जे राते रहमान ॥ 164 ॥ राम नाम को बणिजन बैठे, ताथैं माँड्या हाट । सांई सौं सौदा करैं, दादू खोल कपाट ॥ 165 ॥ अधिकारी अनअधिकारी बिच के सिर खाली करैं, पूरे सुख सन्तोष । दादू सुध बुध आत्मा, ताहि न दीजे दोष ॥ 166 ॥ सुध बुध सौं सुख पाइये, कै साधु विवेकी होइ । दादू ये बिच के बुरे, दाधे रीगे सोइ ॥ 167 ॥ जनि कोई हरि नाम में, हमको हाना बाहि । ताथैं तुमथैं डरत हूँ, क्यों ही टलै बला हि ॥ 168 ॥ परमार्थी जे हम छाड़ैं राम को, तो कौन गहेगा ? दादू हम नहिं उच्चरैं, तो कौन कहेगा ? 169 ॥ विरक्तता एक राम छाड़ै नहीं, छाड़ै सकल विकार । दूजा सहजैं होइ सब, दादू का मत सार ॥ 170 ॥ जे तू चाहै राम को, तो एक मना आराध । दादू दूजा दूर कर, मन इन्द्री कर साध ॥ 171 ॥ विरक्तता कबीर बिचारा कह गया, बहुत भाँति समझाइ । दादू दुनिया बावरी, ताके संग न जाइ ॥ 172 ॥

  • 177 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 सूक्ष्म मार्ग पावैंगे उस ठौर को, लंघेंगे यहु घाट। दादू क्या कह बोलिये, अजहुं बिच ही बाट॥ 173 ॥ सांच साचा राता सांच सौं, झूठा राता झूठ। दादू न्याय निबेरिये, सब साधों को पूछ॥ 174 ॥ अद्वैत निरुपण जे पहुँचे ते कह गए, तिनकी एकै बात। सबै सयाने एक मत, उनकी एकै जात॥ 175 ॥ जे पहुँचे तेहि पूछिये, तिनकी एकै बात। सब साधों का एक मत, ये बिच के बारह बाट॥ 176 ॥ सबै सयाने कह गये, पहुँचे का घर एक। दादू मार्ग माहिं ले, तिन की बात अनेक॥ 177 ॥ सूरज साखी भूत है, साच करै परकास। चोर डरै चोरी करै, रैन तिमिर का नाश॥ 178 ॥ चोर न भावै चांदणां, जनि उजियारा होइ। सूते का सब धन हरूँ, मुझे न देखै कोइ॥ 179 ॥ संस्कार आगम घट घट दादू कह समझावै, जैसा करै सो तैसा पावै। को घट पापी को घट पुण्य। को घट चेतन को घट शून्य? को काहू का सीरी नांहीं, साहिब देखे सब घट माँहीं॥ 180 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्नान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तेरहवां साँच कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 13 ॥ साखी 180 ॥

  • 178 -

भेष का अंग भेष का अंग १४ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।। पतिव्रत निष्काम दादू बूड़े ज्ञान सब, चतुराई जल जाइ । अंजन मंजन फूंक दे, रहै राम ल्यौ लाइ ॥ 2 ॥ राम बिना सब फीका लागै, करणी कथा गियान । सकल अविरथा, कोटि कर दादू जोग धियान ॥ 3 ॥

  • 179 -

श्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 ज्ञानी पंडित बहुत हैं, दाता शूर अनेक। दादू भेष अनन्त हैं, लाग रह्या सो एक॥ 4 ॥ आत्मार्थी इंद्रियार्थी भेष कोरा कलश अवाह का, ऊपरि चित्र अनेक। क्या कीजे दादू वस्तु बिन, ऐसे नाना भेष ॥ 5 ॥ बाहर दादू भेष बिन, भीतर वस्तु अगाध। सो ले हिरदै राखिये, दादू सन्मुख साध ॥ 6 ॥ दादू भांडा भर धर वस्तु सौं, ज्यों महँगे मोल बिकाइ। खाली भांडा वस्तु बिन, कौड़ी बदले जाइ ॥ 7 ॥ दादू कनक कलश विष सौं भऱ्या, सो आवै किस काम। सो धन कूटा चाम का, जामें अमृत राम ॥ 8 ॥ दादू देखे वस्तु को, बासन देखे नांहि। दादू भीतर भर धऱ्या, सो मेरे मन मांहि ॥ 9 ॥ दादू जे तूं समझै तो कहूँ, सांचा एक अलेख। डाल पान तज मूल गह, क्या दिखलावै भेख ॥ 10 ॥ दादू सब दिखलावैं आपको, नाना भेष बनाइ। जहाँ आपा मेटन, हरि भजन, तिहिं दिशि कोइ न जाइ ॥ 11 ॥ सो दशा कतहूँ रही, जिहिं दिश पहुँचे साध। मैं तैं मूरख गहि रहे, लोभ बड़ाई वाद ॥ 12 ॥ दादू भेष बहुत संसार में, हरिजन विरला कोइ। हरिजन राता राम सौं, दादू ऐकै होइ ॥ 13 ॥ हीरे रीझै जौहरी, खल रीझै संसार। स्वाँगी साधु बहु अन्तरा, दादू सत्य विचार ॥ 14 ॥ स्वांगी साधु बहु अन्तरा, जेता धरणी आकाश। साधु राता राम सौं, स्वांगी जगत की आश ॥ 15 ॥

  • 180 -

श्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 दादू स्वांगी सब संसार है, साधू विरला कोइ । जैसे चन्दन बावना, वन वन कहीं न होइ ॥ 16 ॥ दादू स्वांगी सब संसार है, साधू कोई एक । हीरा दूर दिशन्तरा, कंकर और अनेक ॥ 17 ॥ दादू स्वांगी सब संसार है, साधू सोध सुजाण । पारस परदेशों भया, दादू बहुत पषाण ॥ 18 ॥ दादू स्वांगी सब संसार है, साधु समन्दां पार । अनल पंखी कहँ पाइये, पंखी कोटि हजार ॥ 19 ॥ दादू चन्दन वन नहीं, शूरन के दल नांहि । सकल समन्द हीरा नहीं, त्यों साधू जग मांहि ॥ 20 ॥ जे सांई का ह्रै रहै, सांई तिसका होइ । दादू दूजी बात सब, भेष न पावै कोइ ॥ 21 ॥ दादू स्वांग सगाई कुछ नहीं, राम सगाई साच । साधू नाता नाम का, दूजै अंग न राच ॥ 22 ॥ दादू एकै आत्मा, साहिब है सब मांहि । साहिब के नाते मिले, भेष पंथ के नांहि ॥ 23 ॥ दादू माला तिलक सौं कुछ नहीं, काहू सेती काम । अन्तर मेरे एक है, अहर्निशि उसका नाम ॥ 24 ॥ अमिट पाप प्रचण्ड भक्त भेख धरि मिथ्या बोलै, निंदा पर अपवाद । साचे को झूठा कहै, लागै बहु अपराध ॥ 25 ॥ दादू कब हूँ कोई जनि मिलै, भक्त भेष सौं जाइ । जीव जन्म का नाश है, कहैं अमृत, विष खाइ ॥ 26 ॥ चित्त कपटी दादू पहुँचे पूत बटाऊ होइ कर, नट ज्यों काछा भेख । खबर न पाई खोज की, हमको मिल्या अलेख ॥ 27 ॥

  • 181 -

श्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 दादू माया कारण मूंड मुंडाया, यहु तौ योग न होई । पारब्रह्म सूं परिचय नांहीं, कपट न सीझै कोई ॥ 28 ॥ पीव न पावै बावरी, रचि रचि करै श्रृंगार । दादू फिर फिर जगत सूं, करैगी व्यभिचार ॥ 29 ॥ प्रेम प्रीति सनेह बिन, सब झूठे श्रृंगार । दादू आतम रत नहीं, क्यों मानैं भरतार ॥ 30 ॥ दादू जग दिखलावै बावरी, षोडश करै श्रृंगार । तहँ न सँवारे आपको, जहाँ भीतर भरतार ॥ 31 ॥ इन्द्रियार्थी भेष सुध बुध जीव धिजाइ कर, माला संकल बाहि । दादू माया ज्ञान सौं, स्वामी बैठा खाइ ॥ 32 ॥ जोगी जंगम सेवड़े, बौद्ध सन्यासी शेख । षट् दर्शन दादू राम बिन, सबै कपट के भेष ॥ 33 ॥ दादू शेख मुशायख औलिया, पैगम्बर सब पीर । दर्शन सौं परसन नहीं, अजहूँ वैली तीर ॥ 34 ॥ दादू नाना भेष बनाइ कर, आपा देख दिखाइ । दादू दूजा दूर कर, साहिब सौं ल्यो लाइ ॥ 35 ॥ दादू देखा देखी लोक सब, केते आवैं जांहि । राम स्नेही ना मिलैं, जे निज देखैं मांहि ॥ 36 ॥ दादू सब देखैं अस्थूल को, यहु ऐसा आकार । सूक्ष्म सहज न सूझई, निराकार निरधार ॥ 37 ॥ दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ । बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥ 38 ॥ दादू यह परख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नाहीं । अन्तर की जानें नहीं, तातैं खोटा खाहिं ॥ 39 ॥

  • 182 -

श्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 इन्द्रीयार्थी भेष दादू झूठा राता झूठ सौं, साँचा राता साँच । एता अंध न जानहिं, कहँ कंचन, कहँ काँच ॥ 40 ॥ दादू सच बिन सांई ना मिलै, भावै भेष बनाइ । भावै करवत उर्ध्वमुख, भावै तीरथ जाइ ॥ 41 ॥ दादू साचा हरि का नाम है, सो ले हिरदै राखि । पाखंड प्रपंच दूर कर, सब साधों की साखि ॥ 42 ॥ आपा निर्दोष हिरदै की हरि लेइगा, अंतरजामी राइ । सच पियारा राम को, कोटिक करि दिखलाइ ॥ 43 ॥ दादू मुख की ना गहै, हिरदै की हरि लेइ । अन्तर सूधा एक सौं, तो बोल्याँ दोष न देइ ॥ 44 ॥ आत्म अर्थी भेष सब चतुराई देखिये, जे कुछ कीजे आन । मन गह राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥ 45 ॥ शब्द सूई सुरति धागा, काया कंथा लाइ । दादू जोगी जुग जुग पहिरै, कबहुँ फाट न जाइ ॥ 46 ॥ ज्ञान गुरु का गूदड़ी, शब्द, गुरु का भेष । अतीत हमारी आत्मा, दादू पंथ अलेख ॥ 47 ॥ इश्क अजब अबदाल है, दर्दवंद दरवेश । दादू सिक्का सब्र है, अक्ल पीर उपदेश ॥ 48 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चौदहवां भेष का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 14 ॥ साखी 48 ॥

  • 183 -

साधु का अंग www:dadooram.org अथ साधु का अंग १५ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।। साधु महिमा दादू निराकार मन सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं सेव । जे पूजे आकार को, तो साधु प्रत्यक्ष देव ।। 2 ।। दादू भोजन दीजे देह को, लिया मन विश्राम । साधु के मुख मेलिये, पाया आतमराम ।। 3 ।।

  • 184 -

श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 ज्यों यहु काया जीव की, त्यों सांई के साध। दादू सब संतोषिये, मांहि आप अगाध ॥ 4 ॥ सत्संग महात्म साधु जन संसार में, भव-जल बोहित अंग। दादू केते उद्धरे, जेते बैठे संग ॥ 5 ॥ साधु जन संसार में, शीतल चंदन वास। दादू केते उद्धरे, जे आये उन पास ॥ 6 ॥ साधु जन संसार में, हीरे जैसा होय। दादू केते उद्धरे, संगति आये सोय ॥ 7 ॥ साधु जन संसार में, पारस प्रकट गाइ। दादू केते उद्धरे, जेते परसे आइ ॥ 8 ॥ रूख वृक्ष वनराइ सब, चंदन पासैं होइ। दादू बास लगाइ कर, किये सुगन्धे सोइ ॥ 9 ॥ जहाँ अरण्ड अरु आक थे, तहँ चन्दन ऊग्या मांहि। दादू चन्दन कर लिया, आक कहै को नांहि ॥ 10 ॥ साधु नदी जल राम रस, तहाँ पखाले अंग। दादू निर्मल मल गया, साधु जन के संग ॥ 11 ॥ ब्रह्मांड हंड चढ़ाइया, मानौं ऊरे अन। कोई गुरु कृपा तैं ऊबरे, दादू साधू जन ॥ 11क॥ साधु बरसें राम रस, अमृत वाणी आइ। दादू दर्शन देखतां, त्रिविध ताप तन जाइ ॥ 12 ॥ साधु संग महिमा महात्म संसार विचारा जात है, बहिया लहर तरंग। भेरे बैठा ऊबरे, सत साधु के संग ॥ 13 ॥

  • 185 -