सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19 दादू जल दल राम का, हम लेवैं परसाद । संसार का समझैं नहीं, अविगत भाव अगाध ॥ 29 ॥ परमेश्वर के भाव का, एक कणूँका खाइ । दादू जेता पाप था, भ्रम कर्म सब जाइ ॥ 30 ॥ दादू कौण पकावै, कौण पीसै, जहाँ तहाँ सीधा ही दीसै ॥ 31 ॥ दादू जे कुछ खुसी खुदाइ की, होवेगा सोई । पच पच कोई जनि मरै, सुन लीज्यो लोई ॥ 32 ॥ दादू छूट खुदाइ कहीं को नांही, फिरिहो पृथ्वी सारी । दूजी दहन दूर कर बौरै, साधू शब्द विचारी ॥ 33 ॥ दादू बिना राम कहीं को नांही, फिरिहो देश विदेसा । दूजी दहन दूर कर बौरै, सुनि यहु साधु संदेशा ॥ 34 ॥ दादू सिदक सबूरी साच गह, साबित राख यकीन । साहिब सौं दिल लाइ रहु, मुरदा ह्वै मसकीन ॥ 35 ॥ दादू अनवांछित टूका खात हैं, मर्महि लागा मन । नाम निरंजन लेत हैं, यों निर्मल साधु जन ॥ 36 ॥ अनबांछा आगे पड़े, खिरा विचार रू खाइ । दादू फिरै न तोड़ता, तरुवर ताक न जाइ ॥ 37 ॥ अनबांछा आगे पड़े, पीछे लेइ उठाइ । दादू के सिर दोष यहु, जे कुछ राम रजाइ ॥ 38 ॥ अनबांछी अजगैब की, रोजी गगन गिरास । दादू सत करि लीजिये, सो सांई के पास ॥ 39 ॥ कर्त्ता कसौटी मीठे का सब मीठा लागै, भावै विष भर देइ । दादू कड़वा ना कहै, अमृत कर कर लेइ ॥ 40 ॥
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श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19 विपति भली हरि नाम सौं, काया कसौटी दुख । राम बिना किस काम का, दादू संपति सुख ॥ 41 ॥ विश्वास संतोष दादू एक बेसास बिन, जियरा डावांडोल । निकट निधि दुःख पाइये, चिंतामणि अमोल ॥ 42 ॥ दादू बिन बेसासी जीयरा, चंचल नांही ठौर । निश्चय निश्चल ना रहे, कछू और की और ॥ 43 ॥ दादू होना था सो है रह्या, स्वर्ग न बांछी धाइ । नरक कनै थी ना डरी, हुआ सो होसी आइ ॥ 44 ॥ दादू होना था सो है रह्या, जनि बांछे सुख दुःख । सुख मांगे दुख आइसी, पै पीव न बिसारी मुख ॥ 45 ॥ दादू होना था सो है रह्या, जे कुछ किया पीव । पल बधै न छिन घटै, ऐसी जानी जीव ॥ 46 ॥ दादू होना था सो है रह्या, और न होवै आइ । लेना था सो ले रह्या, और न लिया जाइ ॥ 47 ॥ ज्यों रचिया त्यों होइगा, काहे को सिर लेह । साहिब ऊपरि राखिये, देख तमाशा येह ॥ 48 ॥ पतिव्रता निष्काम ज्यों जाणों त्यों राखियो, तुम सिर डाली राइ । दूजा को देखूं नहीं, दादू अनत न जाइ ॥ 49 ॥ ज्यों तुम भावै त्यों खुसी, हम राजी उस बात । दादू के दिल सिदक सौं, भावै दिन को रात ॥ 50 ॥ दादू करणहार जे कुछ किया, सो बुरा न कहना जाइ । सोई सेवक संत जन, रहबा राम रजाइ ॥ 51 ॥
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श्री दादूवाणी-विश्वास का अंग 19 विश्वास-संतोष दादू कर्त्ता हम नहीं, कर्त्ता औरै कोइ। कर्त्ता है सो करेगा, तूं जनि कर्त्ता होइ ॥ 52 ॥ हरि भरोसा काशी तज मगहर गया, कबीर भरोसे राम। सैंदेही सांई मिल्या, दादू पूरे काम ॥ 53 ॥ दादू रोजी राम है, राजिक रिजक हमार। दादू उस प्रसाद सौं, पोष्या सब परिवार ॥ 54 ॥ पंच संतोषे एक सौं, मन मतिवाला मांहि। दादू भागी भूख सब, दूजा भावै नांहि ॥ 55 ॥ दादू साहिब मेरे कापड़े, साहिब मेरा खाण। साहिब सिर का ताज है, साहिब पिंड प्राण ॥ 56 ॥ विनती सांई सत संतोष दे, भाव भक्ति विश्वास। सिदक सबूरी साँच दे, माँगे दादू दास ॥ 57 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य उन्नीसवां विश्वास का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 19 ॥ साखी 57 ॥
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पीव पहिचान का अंग www.dadooram.org
अथ पीव पहिचान का अंग २० मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।। सारों के सिर देखिये, उस पर कोई नांहि । दादू ज्ञान विचार कर, सो राख्या मन मांहि ।। 2 ।। सब लालों सिर लाल है, सब खूबों सिर खूब । सब पाकों सिर पाक है, दादू का महबूब ।। 3 ।। परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनम् । निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वंदनम् ।। 4 ।।
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श्री दादूवाणी-पीव पहिचान का अंग 20 ना वह जामै ना मरै, ना आवै गर्भवास । दादू ऊंधे मुख नहीं, नरक कुंड दस मास ॥ 17 ॥ कृत्रिम नहीं सो ब्रह्म है, घटै बधै नहिं जाइ । पूरण निश्चल एक रस, जगत न नाचे आइ ॥ 18 ॥ उपजै विनशै गुण धरै, यहु माया का रूप । दादू देखत थिर नहीं, क्षण छांहीं क्षण धूप ॥ 19 ॥ जे नांही सो ऊपजै, है सो उपजै नांहि । अलख आदि अनादि है, उपजै माया मांहि ॥ 20 ॥ शिष्य जिज्ञासा जे यहु कर्ता जीव था, संकट क्यों आया ? कर्मों के वश क्यों भया, क्यों आप बंधाया ? 21 ॥ उत्तर जीव लक्षण दादू कृत्रिम काल वश, बंध्या गुण मांही । उपजै विनशै देखतां, यहु कर्त्ता नांही ॥ 22 ॥ जाती नूर अल्लाह का, सिफाती अरवाह । सिफाती सिजदा करै, जाती बेपरवाह ॥ 23 ॥ खंड खंड निज ना भया, इकलस एकै नूर । ज्यों था त्यों ही तेज है, ज्योति रही भरपूर ॥ 24 ॥ परम तेज प्रकाश है, परम नूर निवास । परम ज्योति आनन्द में, हंसा दादू दास ॥ 25 ॥ परम तेज परापरं, परम ज्योति परमेश्वरं । स्वयं ब्रह्म सदई सदा, दादू अविचल स्थिरं ॥ 26 ॥ अविनाशी साहिब सत्य है, जे उपजै विनशै नांहि । जेता कहिये काल मुख, सो साहिब किस मांहि ॥ 27 ॥ सांई मेरा सत्य है, निरंजन निराकार । दादू विनशै देखतां, झूठा सब आकार ॥ 28 ॥
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श्री दादूवाणी-पीव पहिचान का अंग 20 राम रटण छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ । बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥ 29 ॥ उरैं ही अटकै नहीं, जहाँ राम तहँ जाइ । दादू पावै परम सुख, विलसै वस्तु अघाइ ॥ 30 ॥ दादू उरैं ही उरझे घणे, मूये गल दे पास । ऐन अंग जहाँ आप था, तहाँ गये निज दास ॥ 31 ॥ सेवा का सुख प्रेम रस, सेज सुहाग न देइ । दादू बाहे दास को, कहै दूजा सब लेइ ॥ 32 ॥ सुन्दरी विलाप पर पुरषा सब परिहरे, सुन्दरि देखे जाग । अपना पीव पिछाण कर, दादू रहिये लाग ॥ 33 ॥ आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भर्तार । हौं अबला समझूं नहीं, तूं जाणै कर्तार ॥ 34 ॥ लोहा माटी मिलि रह्या, दिन दिन काई खाइ । दादू पारस राम बिन, कतहूँ गया विलाइ ॥ 35 ॥ लोहा पारस परस कर, पलटै अपणा अंग । दादू कंचन ह्वै रहै, अपने सांई संग ॥ 36 ॥ दादू जिहिं परसे पलटै प्राणियाँ, सोई निज कर लेह । लोहा कंचन ह्वै गया, पारस का गुण येह ॥ 37 ॥ विचार परचै जिज्ञासु उपदेश दहदिशि फिरै सो मन है, आवै जाय सो पवन । राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 38 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत- सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश- ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य बीसवां पीव पहिचान कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 20 ॥ साखी 38 ॥
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समर्थ का अंग अथ समर्थता का अंग २१ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू कर्त्ता करै तो निमष मैं, कीड़ी कुंजर होइ । कुंजर तैं कीड़ी करै, मेट सकै नहिं कोइ ॥ 2 ॥ दादू कर्त्ता करै तो निमष में, राई मेरु समान । मेरु को राई करै, तो को मेटै फरमान ॥ 3 ॥ दादू कर्त्ता करै तो निमष में, जल मांही थल थाप । थल मांही जलहर करै, ऐसा समर्थ आप ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21 दादू कर्त्ता करै तो निमष में, ठाली भरै भंडार। भरिया गह ठाली करै, ऐसा सिरजनहार ॥ 5 ॥ दादू धरती को अम्बर करै, अम्बर धरती होइ। निशि अँधियारी दिन करै, दिन को रजनी सोइ ॥ 6 ॥ मृतक काढ मसाण तैं, कहु कौन चलावै। अविगत गति नहिं जाणिये, जग आन दिखावै ॥ 7 ॥ दादू गुप्त गुण परगट करै, परगट गुप्त समाइ। पलक मांहि भानै घड़ै, ताकी लखी न जाइ ॥ 8 ॥ पोषपाल रक्षक दादू सोई सही साबित हुआ, जा मस्तक कर देइ। गरीब निवाजे देखतां, हरि अपना कर लेइ ॥ 9 ॥ सूक्ष्म मार्ग दादू सब ही मारग सांइयाँ, आगै एक मुकाम। सोई सन्मुख कर लिया, जाही सेती काम ॥ 10 ॥ पोष प्रतिपाल रक्षक मीरां मुझ सौं महर कर, सिर पर दीया हाथ। दादू कलियुग क्या करै, सांई मेरा साथ ॥ 11 ॥ ईश्वर समर्थाई दादू समर्थ सब विधि सांइयाँ, ताकी मैं बलि जाऊँ। अंतर एक जु सो बसै, औरां चित्त न लाऊँ ॥ 12 ॥ सूक्ष्म मार्ग दादू मार्ग महर का, सुखी सहज सौं जाइ। भवसागर तैं काढ कर, अपणे लिये बुलाइ ॥ 13 ॥ ईश्वर समर्थाई दादू जे हम चिन्तवैं, सो कछु न होवै आइ। सोई कर्त्ता सत्य है, कुछ औरै कर जाइ ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21
एकौं लेइ बुलाइ कर, एकौं देइ पठाइ। दादू अद्भुत साहिबी, क्यों ही लखी न जाइ ॥ 15 ॥ ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही। सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥ 16 ॥ दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे। बाजीगर का बांदरा, भावै तहाँ फेरे ॥ 17 ॥ ज्यों राखै त्यों रहेंगे, मेरा क्या सारा। हुक्मी सेवक राम का, बन्दा बेचारा ॥ 18 ॥ साहिब राखै तो रहे, काया मांही जीव। हुक्मी बन्दा उठ चले, जब ही बुलावे पीव ॥ 19 ॥ पति पहचान खंड खंड प्रकाश है, जहाँ तहाँ भरपूर। दादू कर्त्ता कर रह्या, अनहद बाजै तूर ॥ 20 ॥ ईश्वर समर्थाई दादू दादू कहत हैं, आपै सब घट मांहि। अपनी रुचि आपै कहैं, दादू तैं कुछ नांहि ॥ 21 ॥ दादू हम तैं हुआ न होइगा, ना हम करणे जोग। ज्यों हरि भावै त्यों करै, दादू कहैं सब लोग ॥ 22 ॥ दादू दूजा क्यों कहै, सिर पर साहिब एक। सो हम कौं क्यों बीसरै, जे जुग जाहिं अनेक ॥ 23 ॥ समर्थ साक्षीभूत आप अकेला सब करै, औरों के सिर देइ। दादू शोभा दास को, अपना नाम न लेइ ॥ 24 ॥ आप अकेला सब करै, घट में लहरि उठाइ। दादू सिर दे जीव के, यों न्यारा ह्वै जाइ ॥ 25 ॥
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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21 ईश्वर समर्थता ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी। जेती बाबा तैं कही, इन इक न मानी ॥ 26 ॥ दादू परचा माँगें लोग सब, कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ। समर्थ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥ 27 ॥ दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ। ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥ 28 ॥ समर्थ साक्षीभूत समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ। घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥ 29 ॥ रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ। आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥ 30 ॥ कर्त्ता साक्षीभूत श्रम नहीं सब कुछ करै, यौं कल धरी बनाइ। कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥ 31 ॥ लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापै कोइ। दादू निश्चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥ 32 ॥ बिन गुण व्यापै सब किया, समर्थ आपै आप। निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥ 33 ॥ ईश्वर समर्थाई समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि। सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 34 ॥ पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ। हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 35 ॥ यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार। पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥ 36 ॥
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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21 पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ। सांई मेरे सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 37 ॥ है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ। हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 38 ॥ नहीं तहाँ तैं सब किया, आपै आप उपाइ। निज तत न्यारा ना किया, दूजा आवै जाइ ॥ 39 ॥ नहीं तहाँ तैं सब किया, फिर नांहीं ह्वै जाइ। दादू नांहीं होइ रहु, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 40 ॥ दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ। लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥ 41 ॥ देबे की सब भूख है, लेबे की कुछ नांहि। सांई मेरे सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 42 ॥ कस्तूत कर्म दादू जे साहिब सिरजै नहीं, तो आपै क्यों कर होइ। जे आप ही ऊपजै, तो मर कर जीवै कोइ ॥ 43 ॥ कर्म फिरावै जीव को, कर्मों को करतार। करतार को कोई नहीं, दादू फेरनहार ॥ 44 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इक्कीसवां समर्थता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 21 ॥ साखी 44 ॥
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अथ शब्द का अंग २२ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ आत्म बोधक गुरु उपदेश शब्द की महिमा दादू शब्दैं बँध्या सब रहै, शब्दैं ही सब जाइ । शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥ 2 ॥ दादू शब्दैं ही सचु पाइये, शब्दैं ही संतोंख । शब्दैं ही सुस्थिर भया, शब्दैं भागा शोक ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22 दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान । शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥ 4 ॥ दादू शब्दैं ही मुक्ता भया, शब्दैं समझे प्राण । शब्दैं ही सूझे सबै, शब्दैं सुरझे जाण ॥ 5 ॥ सृष्टि क्रम दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग । अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥ 6 ॥ ओंकार तैं ऊपजै, विनशै बहुत विकार । भाव भक्ति लै थिर रहै, दादू आतम सार ॥ 7 ॥ पहली किया आप तैं, उत्पत्ति ओंकार । ओंकार तैं ऊपजै, पंच तत्त्व आकार ॥ 8 ॥ पंच तत्त्व तैं घट भया, बहु विधि सब विस्तार । दादू घट तैं ऊपजै, मैं तैं वर्ण विकार ॥ 9 ॥ एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समर्थ सोइ । आगे पीछे तो करै, जे बलहीना होइ ॥ 10 ॥ निरंजन निराकार है, ओंकार आकार । दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥ 11 ॥ आदि शब्द ओंकार है, बोलै सब घट माँहि । दादू माया विस्तरी, परम तत्त यहु नांहि ॥ 12 ॥ ईश्वर समर्थाई पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ । हिक मत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 13 ॥ यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार । पंचों का रस नाद है, दादू बोलनहार ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22 पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ । सांई मेरे सब किया, बूझै विरला कोइ ॥ 15 ॥ दादू एक शब्द सौं ऊनवै, वर्षन लागै आइ । एक शब्द सौं बीखरै, आप आपको जाइ ॥ 16 ॥ दादू साधु शब्द सौं मिल रहै, मन राखै बिलमाइ । साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 17 ॥ दादू शब्द जरै सो मिल रहै, एक रस पूरा । कायर भाजै जीव ले, पग मांडै शूरा ॥ 18 ॥ शब्द विचारै करणी करै, राम नाम निज हिरदै धरै । काया मांहीं शोधै सार, दादू कहै लहै सो पार ॥ 19 ॥ दादू काहे कौड़ी खर्चिये, जे पैके सीझै काम । शब्दों कारज सिध भया, तो सुरम न दीजै राम ॥ 20 ॥ दादू राम हृदय रस भेलि कर, को साधु शब्द सुनाइ । जानो कर दीपक दिया, भ्रम तिमिर सब जाइ ॥ 21 ॥ दादू वाणी प्रेम की, कमल विकासै होहि । साधु शब्द माता कहैं, तिन शब्दों मोह्या मोहि ॥ 22 ॥ दादू हरि भुरकी वाणी साधु की, सो परियो मेरे शीश । छूटे माया मोह तैं, प्रेम भजन जगदीश ॥ 23 ॥ दादू भुरकी राम है, शब्द कहैं गुरु ज्ञान । तिन शब्दों मन मोहिया, उनमन लागा ध्यान ॥ 24 ॥ दादू वाणी ब्रह्म की, अनभै घट प्रकाश । राम अकेला रह गया, शब्द निरंजन पास ॥ 25 ॥ शब्दों माहिं राम धन, जे कोई लेइ विचार । दादू इस संसार में, कबहुं न आवे हार ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22
दादू राम रसायन भर धन्या, साधुन शब्द मंझार । कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥ 27 ॥ शब्द सरोवर सुभर भव्या, हरि जल निर्मल नीर । दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अख्रिल शरीर ॥ 28 ॥ शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया । आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥ 29 ॥ गुरुमुख कसौटी कारज को सीझै नहीं, मीठा बोलै बीर । दादू साचे शब्द बिन, कटै न तन की पीर ॥ 30 ॥ शब्द दादू गुण तजि निर्गुण बोलिये, तेता बोल अबोल । गुण गहि आपा बोलिये, तेता कहिये बोल ॥ 31 ॥ साचा शब्द कबीर का, मीठा लागै मोहि । दादू सुनतां परम सुख, केता आनन्द होहि ॥ 32 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य बाईसवां शब्द काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 22 ॥ साखी 32 ॥
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जीवत मृतक का अंग www.dadooram.org अथ जीवित मृतक का अंग २३ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥ धरती मत आकाश का, चंद सूर का लेइ । दादू पानी पवन का, राम नाम कहि देइ ॥ 2 ॥ दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार। सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥ 3 ॥ जीवित माटी मिल रहै, सांई सन्मुख होइ। दादू पहली मर रहै, पीछे तो सब कोइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दीनता-गरीबी दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार । गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 5 ॥ मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान । सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥ 6 ॥ झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान । दादू दीन गरीब है, पाया पद निर्वाण ॥ 7 ॥ जीवित मृतक यही निशानी, दुर्बल देही निर्मल वाणी । दादू भाव भक्ति दीनता अंग, प्रेम प्रीति सदा तिहिं संग ॥ 8 ॥ तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार । यों दादू जीवित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 9 ॥ दादू राव रंक सब मरेंगे, जीवै नाहीं कोइ । सोई कहिये जीवता, जे मरजीवा होइ ॥ 10 ॥ दादू मेरा वैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोइ । मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होइ ॥ 11 ॥ वैरी मारे मरि गये, चित तैं बिसरे नाहिं । दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥ 12 ॥ उभै असमाव दादू तो तूं पावै पीव को, जे जीवित मृतक होइ । आप गँवाये पीव मिलै, जानत हैं सब कोइ ॥ 13 ॥ दादू तो तूं पावै पीव का, आपा कुछ न जान । आपा जिस तैं ऊपजै, सोई सहज पिछान ॥ 14 ॥ दादू तो तूं पावै पीव को, मैं मेरा सब खोइ । मैं मेरा सहजैं गया, तब निर्मल दर्शन होइ ॥ 15 ॥ मैं ही मेरे पोट सिर, मरिये ताके भार । दादू गुरु प्रसाद सौं, सिर तैं धरी उतार ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 मेरे आगे मैं खड़ा, ता तैं रह्या लुकाइ । दादू प्रकट पीव है, जे यहु आपा जाइ ॥ 17 ॥ सूक्ष्म-मार्ग दादू जीवित मृतक होइ कर, मारग मांही आव । पहली शीश उतार कर, पीछे धरिये पांव ॥ 18 ॥ दादू मारग साधु का, खरा दुहेला जान । जीवित मृतक ह्वै चलै, राम नाम नीशान ॥ 19 ॥ दादू मारग कठिन है, जीवित चलै न कोइ । सोई चलि है बापुरा, जो जीवित मृतक होइ ॥ 20 ॥ मृतक होवै सो चलै, निरंजन की बाट। दादू पावै पीव को, लंघै औघट घाट ॥ 21 ॥ जीवित मृतक दादू मृतक तब ही जानिये, जब गुण इंद्रिय नांहि । जब मन आपा मिट गया, तब ब्रह्म समाना मांहि ॥ 22 ॥ दादू जीवित ही मर जाइये, मर माँही मिल जाइ । सांई का संग छाड़ कर, कौन सहै दुख आइ ॥ 23 ॥ उभय निर्दोष दादू आपा कहा दिखाइये, जे कुछ आपा होइ । यहु तो जाता देखिये, रहता चीन्हों सोइ ॥ 24 ॥ दादू आप छिपाइये, जहाँ न देखै कोइ । पीव को देख दिखाइये, त्यों त्यों आनन्द होइ ॥ 25 ॥ आपा निर्दोष दादू अंतरगति आपा नहीं, मुख सौं मैं तैं होइ । दादू दोष न दीजिये, यों मिल खेलैं दोइ ॥ 26 ॥ जे जन आपा मेट कर, रहें राम ल्यौ लाइ । दादू सब ही देखतां, साहिब सौं मिल जाइ ॥ 27 ॥
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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दीनता गरीबी गरीब गरीबी गह रह्या, मसकीनी मसकीन । दादू आपा मेट करि, होइ रह्या लै लीन ॥ 28 ॥ उभय असमाव मैं हूँ मेरी जब लगै, तब लग विलसै खाइ । मै नाहीं मेरी मिटै, तब दादू निकट न जाइ ॥ 29 ॥ दादू मना मनी सब ले रहे, मनी न मेटी जाइ । मना मनी जब मिट गई, तब ही मिले खुदाइ ॥ 30 ॥ दादू मैं मैं जाल दे, मेरे लागो आग । मैं मैं मेरा दूर कर, साहिब के संग लाग ॥ 31 ॥ दादू मैं नांहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ । मैं तैं पड़दा मिटि गया, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 32 ॥ मनमुखी मान दादू खोई आपणी, लज्जा कुल की कार । मान बड़ाई पति गई, तब सन्मुख सिरजनहार ॥ 33 ॥ परचै करुणा बिनती नूर सरीखा कर लिया, बंदों का बंदा । दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गंदा ॥ 34 ॥ जीवत मृतक दादू सीख्यों प्रेम न पाइये, सीख्यों प्रीति न होइ । सीख्यों दरद न ऊपजै, जब लग आप न खोइ ॥ 35 ॥ कहबा सुनबा गत भया, आपा पर का नाश । दादू मैं तैं मिट गया, पूर्ण ब्रह्म प्रकाश ॥ 36 ॥ दादू सांई कारण मांस का, लोही पानी होइ । सूखे आटा अस्थि का, दादू पावै सोइ ॥ 37 ॥
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