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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22 पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ । सांई मेरे सब किया, बूझै विरला कोइ ॥ 15 ॥ दादू एक शब्द सौं ऊनवै, वर्षन लागै आइ । एक शब्द सौं बीखरै, आप आपको जाइ ॥ 16 ॥ दादू साधु शब्द सौं मिल रहै, मन राखै बिलमाइ । साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 17 ॥ दादू शब्द जरै सो मिल रहै, एक रस पूरा । कायर भाजै जीव ले, पग मांडै शूरा ॥ 18 ॥ शब्द विचारै करणी करै, राम नाम निज हिरदै धरै । काया मांहीं शोधै सार, दादू कहै लहै सो पार ॥ 19 ॥ दादू काहे कौड़ी खर्चिये, जे पैके सीझै काम । शब्दों कारज सिध भया, तो सुरम न दीजै राम ॥ 20 ॥ दादू राम हृदय रस भेलि कर, को साधु शब्द सुनाइ । जानो कर दीपक दिया, भ्रम तिमिर सब जाइ ॥ 21 ॥ दादू वाणी प्रेम की, कमल विकासै होहि । साधु शब्द माता कहैं, तिन शब्दों मोह्या मोहि ॥ 22 ॥ दादू हरि भुरकी वाणी साधु की, सो परियो मेरे शीश । छूटे माया मोह तैं, प्रेम भजन जगदीश ॥ 23 ॥ दादू भुरकी राम है, शब्द कहैं गुरु ज्ञान । तिन शब्दों मन मोहिया, उनमन लागा ध्यान ॥ 24 ॥ दादू वाणी ब्रह्म की, अनभै घट प्रकाश । राम अकेला रह गया, शब्द निरंजन पास ॥ 25 ॥ शब्दों माहिं राम धन, जे कोई लेइ विचार । दादू इस संसार में, कबहुं न आवे हार ॥ 26 ॥

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श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22

दादू राम रसायन भर धन्या, साधुन शब्द मंझार । कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥ 27 ॥ शब्द सरोवर सुभर भव्या, हरि जल निर्मल नीर । दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अख्रिल शरीर ॥ 28 ॥ शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया । आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥ 29 ॥ गुरुमुख कसौटी कारज को सीझै नहीं, मीठा बोलै बीर । दादू साचे शब्द बिन, कटै न तन की पीर ॥ 30 ॥ शब्द दादू गुण तजि निर्गुण बोलिये, तेता बोल अबोल । गुण गहि आपा बोलिये, तेता कहिये बोल ॥ 31 ॥ साचा शब्द कबीर का, मीठा लागै मोहि । दादू सुनतां परम सुख, केता आनन्द होहि ॥ 32 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य बाईसवां शब्द काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 22 ॥ साखी 32 ॥

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जीवत मृतक का अंग www.dadooram.org अथ जीवित मृतक का अंग २३ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥ धरती मत आकाश का, चंद सूर का लेइ । दादू पानी पवन का, राम नाम कहि देइ ॥ 2 ॥ दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार। सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥ 3 ॥ जीवित माटी मिल रहै, सांई सन्मुख होइ। दादू पहली मर रहै, पीछे तो सब कोइ ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दीनता-गरीबी दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार । गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 5 ॥ मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान । सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥ 6 ॥ झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान । दादू दीन गरीब है, पाया पद निर्वाण ॥ 7 ॥ जीवित मृतक यही निशानी, दुर्बल देही निर्मल वाणी । दादू भाव भक्ति दीनता अंग, प्रेम प्रीति सदा तिहिं संग ॥ 8 ॥ तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार । यों दादू जीवित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 9 ॥ दादू राव रंक सब मरेंगे, जीवै नाहीं कोइ । सोई कहिये जीवता, जे मरजीवा होइ ॥ 10 ॥ दादू मेरा वैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोइ । मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होइ ॥ 11 ॥ वैरी मारे मरि गये, चित तैं बिसरे नाहिं । दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥ 12 ॥ उभै असमाव दादू तो तूं पावै पीव को, जे जीवित मृतक होइ । आप गँवाये पीव मिलै, जानत हैं सब कोइ ॥ 13 ॥ दादू तो तूं पावै पीव का, आपा कुछ न जान । आपा जिस तैं ऊपजै, सोई सहज पिछान ॥ 14 ॥ दादू तो तूं पावै पीव को, मैं मेरा सब खोइ । मैं मेरा सहजैं गया, तब निर्मल दर्शन होइ ॥ 15 ॥ मैं ही मेरे पोट सिर, मरिये ताके भार । दादू गुरु प्रसाद सौं, सिर तैं धरी उतार ॥ 16 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 मेरे आगे मैं खड़ा, ता तैं रह्या लुकाइ । दादू प्रकट पीव है, जे यहु आपा जाइ ॥ 17 ॥ सूक्ष्म-मार्ग दादू जीवित मृतक होइ कर, मारग मांही आव । पहली शीश उतार कर, पीछे धरिये पांव ॥ 18 ॥ दादू मारग साधु का, खरा दुहेला जान । जीवित मृतक ह्वै चलै, राम नाम नीशान ॥ 19 ॥ दादू मारग कठिन है, जीवित चलै न कोइ । सोई चलि है बापुरा, जो जीवित मृतक होइ ॥ 20 ॥ मृतक होवै सो चलै, निरंजन की बाट। दादू पावै पीव को, लंघै औघट घाट ॥ 21 ॥ जीवित मृतक दादू मृतक तब ही जानिये, जब गुण इंद्रिय नांहि । जब मन आपा मिट गया, तब ब्रह्म समाना मांहि ॥ 22 ॥ दादू जीवित ही मर जाइये, मर माँही मिल जाइ । सांई का संग छाड़ कर, कौन सहै दुख आइ ॥ 23 ॥ उभय निर्दोष दादू आपा कहा दिखाइये, जे कुछ आपा होइ । यहु तो जाता देखिये, रहता चीन्हों सोइ ॥ 24 ॥ दादू आप छिपाइये, जहाँ न देखै कोइ । पीव को देख दिखाइये, त्यों त्यों आनन्द होइ ॥ 25 ॥ आपा निर्दोष दादू अंतरगति आपा नहीं, मुख सौं मैं तैं होइ । दादू दोष न दीजिये, यों मिल खेलैं दोइ ॥ 26 ॥ जे जन आपा मेट कर, रहें राम ल्यौ लाइ । दादू सब ही देखतां, साहिब सौं मिल जाइ ॥ 27 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दीनता गरीबी गरीब गरीबी गह रह्या, मसकीनी मसकीन । दादू आपा मेट करि, होइ रह्या लै लीन ॥ 28 ॥ उभय असमाव मैं हूँ मेरी जब लगै, तब लग विलसै खाइ । मै नाहीं मेरी मिटै, तब दादू निकट न जाइ ॥ 29 ॥ दादू मना मनी सब ले रहे, मनी न मेटी जाइ । मना मनी जब मिट गई, तब ही मिले खुदाइ ॥ 30 ॥ दादू मैं मैं जाल दे, मेरे लागो आग । मैं मैं मेरा दूर कर, साहिब के संग लाग ॥ 31 ॥ दादू मैं नांहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ । मैं तैं पड़दा मिटि गया, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 32 ॥ मनमुखी मान दादू खोई आपणी, लज्जा कुल की कार । मान बड़ाई पति गई, तब सन्मुख सिरजनहार ॥ 33 ॥ परचै करुणा बिनती नूर सरीखा कर लिया, बंदों का बंदा । दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गंदा ॥ 34 ॥ जीवत मृतक दादू सीख्यों प्रेम न पाइये, सीख्यों प्रीति न होइ । सीख्यों दरद न ऊपजै, जब लग आप न खोइ ॥ 35 ॥ कहबा सुनबा गत भया, आपा पर का नाश । दादू मैं तैं मिट गया, पूर्ण ब्रह्म प्रकाश ॥ 36 ॥ दादू सांई कारण मांस का, लोही पानी होइ । सूखे आटा अस्थि का, दादू पावै सोइ ॥ 37 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 तन मन मैदा पीसकर, छांण छांण ल्यौ लाइ । यों बिन दादू जीव का, कबहुँ साल न जाइ ॥ 38 ॥ पीसे ऊपर पीसिये, छांणे ऊपर छांण । तो आत्म कण ऊबरै, दादू ऐसी जाण ॥ 39 ॥ पहली तन मन मारिये, इनका मर्दै मान । दादू काढै जंत्र में, पीछे सहज समान ॥ 40 ॥ काटे ऊपर काटिये, दाधे को दौं लाइ । दादू नीर न सींचिये, तो तरुवर बधता जाइ ॥ 41 ॥ दादू सबको संकट एक दिन, काल गहैगा आइ । जीवित मृतक ह्वै रहै, ताके निकट न जाइ ॥ 42 ॥ दादू जीवित मृतक ह्वै रहै, सबको विरक्त होइ । काढ़ो काढ़ो सब कहैं, नाम न लेवै कोइ ॥ 43 ॥ जरणा सारा गहिला ह्वै रहै, अन्तरयामी जाणि । तो छूटै संसार तैं, रस पीवै सारंगपाणि ॥ 44 ॥ गूँगा गहिला बावरा, सांई कारण होइ । दादू दीवाना ह्वै रहै, ताको लखै न कोइ ॥ 45 ॥ जीवत मृतक जीवित मृतक साधु की, वाणी का परकास । दादू मोहे रामजी, लीन भये सब दास ॥ 46 ॥ दादू जे तूं मोटा मीर है, सब जीवों में जीव । आपा देख न भूलिये, खरा दुहेला पीव ॥ 47 ॥ आपा मेट समाइ रहु, दूजा धंधा बाद । दादू काहे पच मरै, सहजैं सुमिरण साध ॥ 48 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दादू आपा मेटे एक रस, मन हि स्थिर लै लीन। अरस परस आनन्द कर, सदा सुखी सो दीन ॥ 49 ॥ स्मरण नाम निस्संशय हम्हीं हमारा कर लिया, जीवित करणी सार। पीछे संशय को नहीं, दादू अगम अपार ॥ 50 ॥ मध्य निरपक्ष माटी मांहि ठौर कर, माटी माटी मांहि। दादू सम कर राखिये, द्वै पख दुविधा नांहि ॥ 51 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तेईसवां जीवत मृतक काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 23 ॥ साखी 51 ॥

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शूरातन का अंग www.dadooram.org अथ शूरातन का अंग २४ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।। शूर सती साधु निर्णय साचा सिर सौं खेलहै, यह साधुजन का काम । दादू मरणा आसँधै, सोई कहैगा राम ।। 2 ।। राम कहैं ते मर कहैं, जीवित कह्या न जाइ । दादू ऐसैं राम कहि, सती शूर सम भाइ ।। 3 ।।

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 जब दादू मरबा गहै, तब लोगों की क्या लाज ? सती राम साचा कहै, सब तज पति सौं काज ॥ 4 ॥ शूरवीर कायर दादू हम काइर कड़बा कर रहे, शूर निराला होइ। निकस खड़ा मैदान में, ता सम और न कोइ ॥ 5 ॥ शूर सती साधु निर्णय मड़ा न जीवै तो संग जलै, जीवै तो घर आण। जीवन मरणा राम सौं, सोई सती करि जाण ॥ 6 ॥ जन्म लगै व्यभिचारणी, नख शिख भरी कलंक। पलक एक सन्मुख जली, दादू धोये अंक ॥ 7 ॥ स्वांग सती का पहर कर, करै कुटुम्ब का सोच। बाहर शूरा देखिये, दादू भीतर पोच ॥ 8 ॥ दादू सती तो सिरजनहार सौं, जलै विरह की झाल। ना वह मरै न जलि बुझै, ऐसे संगि दयाल ॥ 9 ॥ जे मुझ होते लाख सिर, तो लाखों देती वारि। सह मुझ दिया एक सिर, सोई सौंपै नारि ॥ 10 ॥ सती जल कोइला भई, मुये मड़े की लार। यों जे जलती राम सौं, साचे संग भर्तार ॥ 11 ॥ मुये मड़े सौं हेत क्या, जे जीव की जाणै नांहि। हेत हरि सौं कीजिये, जे अन्तरजामी मांहि ॥ 12 ॥ शूरवीर कायर शूरा चढ़ संग्राम को, पाछा पग क्यों देहि ? साहिब लाजै भाजतां, धृग् जीवन दादू तेहि ॥ 13 ॥ सेवक शूरा राम का, सोई कहेगा राम। दादू सूर सन्मुख रहै, नहिं कायर का काम ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 कायर काम न आवही, यहु शूरे का खेत। तन मन सौंपै राम को, दादू शीश सहेत ॥ 15 ॥ जब लग लालच जीव का, तब लग निर्भय हुआ न जाइ। काया माया मन तजै, तब चौड़े रहै बजाइ ॥ 16 ॥ दादू चौड़े में आनन्द है, नाम धज्या रणजीत। साहिब अपना कर लिया, अन्तरगत की प्रीति ॥ 17 ॥ दादू जे तुझ काम करीम सौं, तो चौहट चढ़ कर नाच। झूठा है सो जाइगा, निहचै रहसी साच ॥ 18 ॥ जीवत मृतक राम कहेगा एक को, जे जीवित-मृतक होइ। दादू ढूंढे पाइये, कोटि मध्ये कोइ ॥ 19 ॥ शूर सती साध निर्णय शूरा पूरा संत जन, सांई को सेवै। दादू साहिब कारणै, सिर अपना देवै ॥ 20 ॥ शूरा जूझै खेत में, सांई सन्मुख आइ। शूरे को सांई मिले, तब दादू काल न खाइ ॥ 21 ॥ मरबे ऊपरि एक पग, कर्ता करै सो होहि। दादू साहिब कारणै, तालाबेली मोहि ॥ 22 ॥ हरि भरोसा दादू अंग न खैंचिये, कहि समझाऊँ तोहि। मोहि भरोसा राम का, बंका बाल न होहि ॥ 23 ॥ बहुत गया थोड़ा रह्या, अब जीव सोच निवार। दादू मरणा मांड रहु, साहिब के दरबार ॥ 24 ॥ शूरवीर कायर जीवों का संशय पड़या, को काको तारै। दादू सोई शूरमा, जे आप उबारै ॥ 25 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 जे निकसे संसार तैं, सांई की दिशि धाइ। जे कबहुँ दादू बाहुड़े, तो पीछे माऱ्या जाइ ॥ 26 ॥ दादू कोई पीछे हेला जनि करै, आगे हेला आव। आगे एक अनूप है, नहिं पीछे का भाव ॥ 27 ॥ पीछे को पग ना भरै, आगे को पग देइ। दादू यहु मत शूर का, अगम ठौर को लेइ ॥ 28 ॥ आगा चल पीछा फिरै, ताका मुँह मा दीठ। दादू देखे दोइ दल, भागे देकर पीठ ॥ 29 ॥ दादू मरणां माँड कर, रहै नहिं ल्यौ लाइ। कायर भाजै जीव ले, आ-रण छाड़ै जाइ ॥ 30 ॥ शूरा होइ सु मेर उलंधै, सब गुण बँध्या छूटै। दादू निर्भय ह्वै रहे, कायर तिणा न टूटै ॥ 31 ॥ शूर सती साधु निर्णय सर्प केसरी काल कुंजर, बहु जोध मारग मांहि। कोटि में कोई एक ऐसा, मरण आसंघ जाहि ॥ 32 ॥ दादू जब जागै तब मारिये, वैरी जिय के साल। मनसा डायनि, काम रिपु, क्रोध महाबली काल ॥ 33 ॥ पंच चोर चितवत रहैं, माया मोह विष झाल। चेतन पहरै आपने, कर गह खड़ग संभाल ॥ 34 ॥ काया कबज कमान कर, सार शब्द कर तीर। दादू यहु सर सांध कर, मारै मोटे मीर ॥ 35 ॥ काया कठिन कमान है, खांचै विरला कोइ। मारै पंचों मृगला, दादू शूरा सोइ ॥ 36 ॥ जे हरि कोप करै इन ऊपर, तो काम कटक दल जांहि कहाँ। लालच लोभ क्रोध कत भाजैं, प्रगट रहे हरि जहाँ तहाँ ॥ 37 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 जीवित मृतक तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार । यों दादू जीव्वित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 38 ॥ शूरातन दादू तन मन काम करीम के, आवै तो नीका । जिसका तिसको सौंपिये, सोच क्या जी का ॥ 39 ॥ जे शिर सौंप्या राम को, सो शिर भया सनाथ । दादू दे ऊरण भया, जिसका तिसके हाथ ॥ 40 ॥ जिसका है तिसको चढै, दादू ऊरण होइ । पहली देवै सो भला, पीछे तो सब कोइ ॥ 41 ॥ सांई तेरे नाम पर, शिर जीव करूं कुर्बान । तन मन तुम पर वारणै, दादू पिंड पराण ॥ 42 ॥ अपने सांई कारणै, क्या क्या नहिं कीजे ? दादू सब आरम्भ तज, अपणा शिर दीजे ॥ 43 ॥ शिर के साटै लीजिये, साहिब जी का नांव । खेलै शीश उतार कर, दादू मैं बलि जांव ॥ 44 ॥ खेलै शीश उतार कर, अधर एक सौं आइ । दादू पावै प्रेम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 45 ॥ मरण भय निवारण दादू मरणे थीं तूं मत डरै, सब जग मरता जोइ । मिल कर मरणा राम सौं, तो कलि अजरावर होइ ॥ 46 ॥ दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा अंत निदान । रे मन मरणा सिरजिया, कहले केवल राम ॥ 47 ॥ दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा पहुँचा आइ । रे मन मेरा राम कह, बेगा बार न लाइ ॥ 48 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा आज कि काल । मरणा मरणा क्या करै, बेगा राम सँभाल ॥ 49 ॥ दादू मरणा खूब है,निपट बुरा व्यभिचार । दादू पति को छाड़ कर, आन भजै भरतार ॥ 50 ॥ दादू तन तैं कहाँ डराइये, जे विनश जाइ पल बार । कायर हुआ न छूटिये, रे मन हो हुसियार ॥ 51 ॥ दादू मरणा खूब है, मर माहीं मिल जाइ । साहिब का संग छाड़ कर, कौन सहै दुख आइ ॥ 52 ॥ दादू माहीं मन सौं जूझ कर, ऐसा शूरा वीर । इंद्रिय अरि दल भान सब, यों कलि हुआ कबीर ॥ 53 ॥ सांई कारण शीश दे, तन मन सकल शरीर । दादू प्राणी पंच दे, यों हरि मिल्या कबीर ॥ 54 ॥ सबै कसौटी शिर सहै, सेवक सांई काज । दादू जीवन क्यों तजै, भाजे हरि को लाज ॥ 55 ॥ सांई कारण सब तजै, जन का ऐसा भाव । दादू राम न छाड़िये, भावै तन मन जाव ॥ 56 ॥ पतिव्रत निष्काम दादू सेवक सो भला, सेवै तन मन लाइ । दादू साहिब छाड़ कर, काहू संग न जाइ ॥ 57 ॥ पतिव्रता निज पीव को, सेवै दिन अरु रात । दादू पति को छाड़ कर, काहू संग न जात ॥ 58 ॥ शूरातन दादू मरबो एक जु बार, अमर झुकेड़े मारिये । तो तिरिये संसार, आतम कारज सारिये ॥ 59 ॥ दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो जीवन की क्या आस । शिर के साटे पाइये, तो भर भर पीवै दास ॥ 60 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 कायर मन मनसा जीते नहीं, पंच न जीते प्राण। दादू रिपु जीते नहीं, कहैं हम शूर सुजान ॥ 61 ॥ मन मनसा मारे नहीं, काया मारण जांहि। दादू बांबी मारिये, सर्प मरै क्यों मांहि ॥ 62 ॥ शूरातन दादू पाखर पहर कर, सब को झूझण जाइ। अंग उघाड़ै शूरवां, चोट मुँहैं मुँह खाइ ॥ 63 ॥ जब झूझै तब जाणिये, काछ खड़े क्या होइ। चोट मुँहैं मुँह खाइगा, दादू शूरा सोइ ॥ 64 ॥ शूरातन सहजैं सदा, साच सेल हथियार। साहिब के बल झूझतां, केते लिये सु मार ॥ 65 ॥ दादू जब लग जिय लागैं नहीं, प्रेम प्रीति के सेल। तब लग पिव क्यों पाइये, नहिं बाजीगर का खेल ॥ 66 ॥ दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो किसको सेतैं जीव। शिर के साटै लीजिये, जे तुझ प्यारा पीव ॥ 67 ॥ दादू महा जोध मोटा बली, सो सदा हमारी भीर। सब जग रूठा क्या करै, जहाँ तहाँ रणधीर ॥ 68 ॥ दादू रहते पहते राम जन, तिन भी माँड्या झूझ। साचा मुँह मोड़ै नहीं, अर्थ इता ही बूझ ॥ 69 ॥ हरि भरोसा दादू काँधे सबल के, निर्बाहेगा और। आसन अपने ले चल्या, दादू निश्चल ठौर ॥ 70 ॥ दादू क्या बल कहा पतंग का, जलत न लागै बार। बल तो हरि बलवंत का, जीवै जिहिं आधार ॥ 71 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24

राखणहारा राम है, शिर ऊपर मेरे। दादू केते पच गये, बैरी बहुतेरे ॥ 72 ॥ शूरातन विनती दादू बल तुम्हारे बापजी, गिनत न राणा राव। मीर मलिक प्रधान पति, तुम बिन सब ही बाव ॥ 73 ॥ दादू राखी राम पर, अपणी आप संवाह। दूजा को देखूं नहीं, ज्यों जाणें त्यों निर्वाह ॥ 74 ॥ तुम बिन मेरे को नहीं, हमको राखणहार। जे तूं राखै सांइयां, तो कोइ न सकै मार ॥ 75 ॥ सब जग छाड़ै हाथ तैं, तो तुम जनि छाड़हु राम। नहिं कुछ कारज जगत सौं, तुमहीं सेती काम ॥ 76 ॥ शूरातन दादू जाते जीव तैं तो डरूं, जे जीव मेरा होइ। जिन यहु जीव उपाइया, सार करेगा सोइ ॥ 77 ॥ दादू जिन को सांई पाधरा, तिन बंका नांही कोइ। सब जग रूठा क्या करै, राखणहारा सोइ ॥ 78 ॥ दादू साचा साहिब शिर ऊपरै, तती न लागै बाव। चरण कमल की छाया रहै, किया बहुत पसाव ॥ 79 ॥ विनती दादू कहै-जे तूं राखै सांइयां, तो मार सकै ना कोइ। बाल न बांका कर सकै, जे जग बैरी होइ ॥ 80 ॥ दादू राखणहारा राखै, तिसे कौन मारै। उसे कौन डुबोवे, जिसे सांई तारै ॥ बाकी कौन बिगारै, जाकी आप सुधारै। कहै दादू सो कबहूँ न हारै, जे जन सांई संभारै ॥ 81 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 निर्भय बैठा राम जप, कबहुँ काल न खाइ । जब दादू कुंजर चढै, तब सुनहाँ झख जाइ ॥ 82 ॥ कायर कूकर कोटि मिलि, भौंके अरु भागैं । दादू गरवा गुरुमुखी, हस्ति नहीं लागैं ॥ 83 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चौबीसवां शूरातन कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 24 ॥ साखी 83 ॥ दादूराम सत्यराम

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काल का अंग www.dadooram.org अथ काल का अंग २५ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।। काल न सूझै कंध पर, मन चितवै बहु आश । दादू जीव जाणै नहीं, कठिन काल की पाश ॥ 2 ॥ दादू काल हमारे कंध चढ, सदा बजावै तूर । कालहरण कर्त्ता पुरुष, क्यों न सँभाले शूर ॥ 3 ॥ जहाँ जहाँ दादू पग धरै, तहाँ काल का फंध । सर ऊपर सांधे खड़ा, अजहुँ न चेते अंध ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 दादू काल गिरासन का कहै, काल रहित कह सोइ। काल रहित सुमिरण सदा, बिना गिरासन होइ ॥ 5 ॥ दादू मरिये राम बिन, जीजे राम सँभाल। अमृत पीवै आत्मा, यों साधू बंचै काल ॥ 6 ॥ दादू यहु घट काचा जल भरा, बिनशत्त नाहीं बार। यहु घट फूटा जल गया, समझत नहीं गँवार ॥ 7 ॥ फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी। तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥ 8 ॥ बाव भरी इस खाल का, झूठा गर्व गुमान। दादू विनशै देखतां, तिसका क्या अभिमान ॥ 9 ॥ दादू हम तो मूये मांहि हैं, जीवण का रू भरम। झूठे का क्या गर्वबा, पाया मुझे मरम ॥ 10 ॥ यहु वन हरिया देखकर, फूल्यो फिरै गँवार। दादू यहु मन मृगला, काल अहेड़ी लार ॥ 11 ॥ सब ही दीसैं काल मुख, आपा गह कर दीन्ह। विनशै घट आकार का, दादू जे कुछ कीन्ह ॥ 12 ॥ काल कीट तन काठ को, जरा जन्म को खाइ। दादू दिन दिन जीव की, आयु घटंती जाइ ॥ 13 ॥ काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास। पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥ 14 ॥ पाव पलक की सुधि नहीं, श्वास शब्द क्या होइ। कर मुख मांहि मेलतां, दादू लखै न कोइ ॥ 15 ॥ दादू काया कारवीं, देखत ही चल जाइ। जब लग श्वास शरीर में, राम नाम ल्यौ लाइ ॥ 16 ॥

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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 दादू काया कारवीं, मोहि भरोसा नांहि। आसन कुंजर शिर छत्र, विनश जाहिं क्षण मांहि ॥ 17 ॥ दादू काया कारवीं, पड़त न लागै बार। बोलणहारा महल में, सो भी चालणहार ॥ 18 ॥ दादू काया कारवीं, कदे न चालै संग। कोटि वर्ष जे जीवना, तऊ होइला भंग ॥ 19 ॥ कहतां, सुनतां, देखतां, लेतां, देतां प्राण। दादू सो कतहूँ गया, माटी धरी मसाण ॥ 20 ॥ सींगी नाद न बाजहि, कत गये सो जोगी। दादू रहते मढी में, करते रस भोगी ॥ 21 ॥ दादू जियरा जायगा, यहु तन माटी होइ। जे उपज्या सो विनश है, अमर नहीं कलि कोइ ॥ 22 ॥ दादू देही देखतां, सब किसही की जाइ। जब लग श्वास शरीर में, गोविन्द के गुण गाइ ॥ 23 ॥ दादू देही पाहुणी, हंस बटाऊ मांहि। का जाणूं कब चालसी, मोहि भरोसा नांहि ॥ 24 ॥ दादू सबको पाहुणा, दिवस चार संसार। औसर औसर सब चले, हम भी इहै विचार ॥ 25 ॥ भयमय पंथ बिख्रमता सबको बैठे पंथ सिर, रहे बटाऊ होइ। जे आये ते जाहिंगे, इस मारग सब कोइ ॥ 26 ॥ बेग बटाऊ पंथ सिर, अब विलम्ब न कीजे। दादू बैठा क्या करे, राम जप लीजे ॥ 27 ॥ संझ्या चलै उतावला, बटाऊ वन-खंड मांहि। बरियाँ नांहीं ढील की, दादू बेगि घर जांहि ॥ 28 ॥

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