सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग मारू 7 आदैं अन्तैं तेज तुम्हारो, दादू देखे गाये रे ॥ 3 ॥ 154. (गुजराती भाषा) । शूल ताल तुम्ह सरसी रंग रमाड़ । आप अपरछन थई करी, मने मा भरमाड़ ॥ टेक ॥ मन भोलवे कांइ थई वेगलो, आपणपो देखाड़ । केम जीवूं हौं एकली, बिरहणिया नार ॥ 1 ॥ मने बाहिश मा अलगो थई, आत्मा उद्धार । दादू सूं रमिये सदा, येणे परें तार ॥ 2 ॥ 155. काल चेतावनी । तुरंग लील ताल जाग रे, किस नींदड़ी सूता, रैण बिहाई सब गई, दिन आइ पहूँता ॥ टेक ॥ सो क्यों सोवे नींदड़ी, जिस मरणा होवे रे । जोरा वैरी जागणा, जीव तूँ क्यों सोवे रे ॥ 1 ॥ जाके सिर पर जम खड़ा, शर सांधे मारे रे । सो क्यों सोवे नींदड़ी, कहि क्यूं न पुकारे रे ॥ 2 ॥ दिन प्रति निशि काल झंपै, जीव न जागे रे । दादू सूता नींदड़ी, उस अंग न लागे रे ॥ 3 ॥ 156. तुरंग । लील ताल जाग रे सब रैण बिहाणी, जाइ जन्म अंजलि को पाणी ॥ टेक ॥ घड़ी घड़ी घड़ियाल बजावै, जे दिन जाइ सो बहुरि न आवै ॥ 1 ॥ सूरज चंद कहैं समझाइ, दिन दिन आयु घटती जाइ ॥ 2 ॥ सरवर पाणी तरवर छाया, निशिदिन काल गिरासै काया ॥ 3 ॥ हंस बटाऊ प्राण पयाना, दादू आतम राम न जाना ॥ 4 ॥
- 367 -
श्री दादूवाणी-राग मारू 7
- चौताल आदि काल अंत काल, मध्य काल भाई। जन्म काल जुरा काल, काल संग सदाई ॥ टेक ॥ जागत काल सोवत काल, काल झंपै आई। काल चलत काल फिरत, कबहूँ ले जाई ॥ 1 ॥ आवत काल जावत काल, काल कठिन खाई। लेत काल देत काल, काल ग्रसै धाई ॥ 2 ॥ कहत काल सुनत काल, करत काल सगाई। काम काल क्रोध काल, काल जाल छाई ॥ 3 ॥ काल आगै काल पीछैं, काल संग समाई। काल रहित राम गहित, दादू ल्यौ लाई ॥ 4 ॥
- हित उपदेश । त्रिताल तो को केता कह्या मन मेरे । क्षण इक मांही जाइ अनेरे, प्राण उधारी ले रे ॥ टेक ॥ आगे है मन खरी विमासणि, लेखा मांगै दे रे। काहे सोवे नींद भरी रे, कृत विचारे तेरे ॥ 1 ॥ ते परि कीजे मन विचारे, राखै चरणहु नेरे। रती इक जीवन मोहि न सूझै, दादू चेत सवेरे ॥ 2 ॥
- (गुजराती) । त्रिताल मन वाहला रे, कछू विचारी खेल, पड़सी रे गढ़ भेल ॥ टेक ॥ बहु भाँति दुख देइगा वाहला, ज्यों तिल माँ लीजे तेल। करणी ताहरी सोधसी रे, होसी रे सिर हेल ॥ 1 ॥ अब ही तैं कर लीजिये रे वाहला, सांई सेती मेल। दादू संग न छाड़ि पीव का, पाई है गुण की बेल ॥ 2 ॥
- 368 -
श्री दादूवाणी-राग मारू 7 160. उदीक्षण । ताल मन बावरे हो, अनत जनि जाइ, तो तूँ जीवै अमीरस पीवै, अमर फल काहे न खाइ ॥ टेक ॥ रहु चरण शरण सुख पावै, देखहु नैन अघाइ। भाग तेरे पीव नेरे, थीर थान बताइ ॥ 1 ॥ संग तेरे रहै घेरे, सहजैं अंग समाइ। शरीर मांही शोध सांई, अनहद ध्यान लगाइ ॥ 2 ॥ पीव पास आवै सुख पावै, तन की तप्त बुझाइ। दादू रे जहाँ नाद ऊपजै, पीव पास दिखाइ ॥ 3 ॥ 161. भ्रम विध्वंसन । उदीक्षण ताल निरंजन अंजन कीन्हा रे, सब आतम लीन्हा रे ॥ टेक ॥ अंजन माया अंजन काया, अंजन छाया रे । अंजन राते अंजन माते, अंजन पाया रे ॥ 1 ॥ अंजन मेरा अंजन तेरा, अंजन मेला रे । अंजन लीया अंजन दीया, अंजन खेला रे ॥ 2 ॥ अंजन देवा अंजन सेवा, अंजन पूजा रे । अंजन ज्ञाना अंजन ध्याना, अंजन दूजा रे ॥ 3 ॥ अंजन वक्ता अंजन श्रोता, अंजन भावै रे । अंजन राम निरंजन कीन्हा, दादू गावै रे ॥ 4 ॥ 162. निज वचन । महिमा चौताल ध्रुपद में ऐन बैन चैन होवै, सुणतां सुख लागै रे । तीन गुण त्रिविधि तिमिर, भरम करम भागै रे ॥ टेक ॥ होइ प्रकास अति उजास, परम तत्व सूझै । परम सार निर्विकार, विरला कोई बूझै ॥ 1 ॥
- 369 -
परम थान सुख निधान, परम शून्य खेलै । सहज भाइ सुख समाइ, जीव ब्रह्म मेलै ॥ 2 ॥ अगम निगम होइ सुगम, दुस्तर तिर आवै । आदि पुरुष दरस परस, दादू सो पावै ॥ 3 ॥ 163. साधु साँई हेरे त्रिताल कोई राम का राता रे, कोई प्रेम का माता रे ॥ टेक ॥ कोई मन को मारे रे, कोई तन को तारे रे, कोई आप उबारे रे ॥ 1 ॥ कोई जोग जुगंता रे, कोई मोक्ष मुकंता रे, कोई है भगवंता रे ॥ 2 ॥ कोई सद्गति सारा रे, कोई तारणहारा रे, कोई पीव का प्यारा रे ॥ 3 ॥ कोई पार को पाया रे, कोई मिलकरआया रे, कोई मन को भाया रे ॥ 4 ॥ कोई है बड़भागी रे, कोई सेज सुहागी रे, कोई है अनुरागी रे ॥ 5 ॥ कोई सब सुख दाता रे, कोई रूप विधाता रे, कोई अमृत खाता रे ॥ 6 ॥ कोई नूर पिछाणैं रे, कोई तेज कों जाणैं रे, कोई ज्योति बखाणैं रे ॥ 7 ॥ कोई साहिब जैसा रे, कोई सांई तैसा रे, कोई दादू ऐसा रे ॥ 8 ॥ 164. साधु लक्षण । दीपचन्दी सद्गति साधवा रे, सन्मुख सिरजनहार । भौजल आप तिरैं ते तारैं, प्राण उधारनहार ॥ टेक ॥ पूरण ब्रह्म राम रंग राते, निर्मल नाम अधार । सुख संतोष सदा सत संजम, मति गति वार न पार ॥ 1 ॥ जुग जुग राते, जुग जुग माते, जुग जुग संगति सार । जुग जुग मेला, जुग जुग जीवन, जुग जुग ज्ञान विचार ॥ 2 ॥ सकल शिरोमणि सब सुख दाता, दुर्लभ इहि संसार । दादू हंस रहैं सुख सागर, आये पर उपकार ॥ 3 ॥
श्री दादूवाणी-राग मारू 7 165. परिचय उत्साह मंगल । दीपचन्दी अम्ह घर पाहुणां ये, आव्या आतम राम ॥ टेक ॥ चहुँ दिशि मंगलाचार, आनन्द अति घणा ये। वरत्या जै जैकार, विरुद वधावणां ये ॥ 1 ॥ कनक कलश रस मांहिं, सखी भर ल्यावज्यो ये। आनन्द अंग न माइ, अम्हारे आवज्यो ये ॥ 2 ॥ भावै भक्ति अपार, सेवा कीजिये ये। सन्मुख सिरजनहार, सदा सुख लीजिये ये ॥ 3 ॥ धन्य अम्हारा भाग, आव्या अम्ह भणी ये। दादू सेज सुहाग, तूँ त्रिभुवन धणी ये ॥ 4 ॥ 166. फरोदस्त ताल गावहु मंगलाचार, आज बधावणां ये। सुपनों देख्यो साँच, पीव घर आवणां ये ॥ टेक ॥ भाव कलश जल प्रेम का, सब सखियन के शीश। गावत चली बधावणां, जै जै जै जगदीश ॥ 1 ॥ पदम कोटि रवि झिलमिलै, अंग अंग तेज अनन्त। विगसि वदन विरहनी मिली, घर आये हरि कंत ॥ 2 ॥ सुन्दरि सुरति सिंगार कर, सन्मुख परसे पीव। मो मंदिर मोहन आविया, वारूं तन मन जीव ॥ 3 ॥ कवल निरन्तर नरहरी, प्रकट भये भगवंत। जहाँ विरहनी गुण वीनवे, खेले फाग बसन्त ॥ 4 ॥ वर आयो विरहनी मिली, अरस परस सब अंग। दादू सुन्दरी सुख भया, जुगि जुगि यहु रस रंग ॥ 5 ॥ इति राग मारू सम्पूर्ण ॥ 7 ॥ पद 24 ॥
- 371 -
अथ राग रामकली ४ (गायन समय प्रभात 3 से 6 ) 167. सद्गुरु शब्द महिमा । दादरा शब्द समाना जो रहै, गुरु बाइक बीधा । उनही लागा एक सौं, सोई जन सीधा ॥ टेक ॥ ऐसी लागी मर्म की, तन मन सब भूला । जीवत-मृतक है रहै, गह आत्म मूला ॥ 1 ॥ चेतन चितहि न बीसरे, महारस मीठा । शब्द निरंजन गह रह्या, उन साहिब दीठा ॥ 2 ॥ एक शब्द जन ऊधरे, सुनि सहजैं जागे । अंतर राते एक सौं, सर सन्मुख लागे ॥ 3 ॥ शब्द समाना सन्मुख रहै, पर आतम आगे । दादू सीझै देखतां, अविनाशी लागे ॥ 4 ॥
- 372 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 168. नाम महिमा । त्रिताल अहो नर नीका है हरि नाम । दूजा नहीं राम बिन नीका, कहले केवल राम ॥ टेक ॥ निर्मल सदा एक अविनाशी, अजर अकल रस ऐसा । दिढ़ गहि राख मूल मन मांहीं, निरख देख निज कैसा ॥ 1 ॥ यहु रस मीठा महा अमीरस, अमर अनूपम पीवे । राता रहै प्रेम सौं माता, ऐसे जुग-जुग जीवे ॥ 2 ॥ दूजा नहीं और को ऐसा, गुरु अंजन कर सूझे । दादू मोटे भाग हमारे, दास विवेकी बूझे ॥ 3 ॥ 169. अत्यन्त विरह । त्रिताल कब आवेगा कब आवेगा ? पीव प्रकट आप दिखावेगा, मिठड़ा मुझको भावेगा ॥ टेक ॥ कंठड़े लाग रहूँ रे, नैनों में बाहि धरूं रे, पीव तुझ बिन झूर मरूं रे ॥ 1 ॥ पावों मस्तक मेरा रे, तन मन पीवजी तेरा रे, हौं राखूं नैनहुं नेरा रे ॥ 2 ॥ हियड़े हेत लगाऊँ रे, अब कै जे पीव पाऊँ रे, तो बेर बेर बलि जाऊँ रे ॥ 3 ॥ सेजड़िये पीव आवे रे, तब आनन्द अंग न मावे रे, दादू दरस दिखावे रे ॥ 4 ॥ 170. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल पिरी तूं पाण पसाइड़े, मूं तनि लागी भाहिड़े ॥ टेक ॥ पांधी वींदो निकरीला, असां साण गल्हाइड़े । सांई सिकां सड़केला, गुझी गालि सुनाइड़े ॥ 1 ॥ पसां पाक दीदार केला, सिक असां जी लाहिड़े । दादू मंझि कलूब मेला, तोड़े बीयां न काइड़े ॥ 2 ॥ 171. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल को मेड़ीदो सज्जणा,
- 373 -
सुहारी सुरति केला, लगे डीहु घणां ॥ टेक॥ पीरीयां संदी गाल्हड़ीला, पांधीड़ा पूछं । कड़ी ईंदो मूं गरेला, डीडों बांह असां ॥ 1 ॥ आहे सिक दीदार जीला, पिरी पूर पसां । इयें दादू जे ज्यंद येला, सजण सांण रहां ॥ 2 ॥ 172. विनती पंजाबी । त्रिताल हरि हाँ दिखाओ नैना, सुन्दर मूरति मोहना, बोलि सुनाओ बैना ॥ टेक॥ प्रकट पुरातन खंडना, महीमान सुख मंडना ॥ 1 ॥ अविनाशी अपरम्परा, दीनदयाल गगन धरा ॥ 2 ॥ पारब्रह्म परिपूरणां, दर्श देहु दुख दूरणां ॥ 3 ॥ कर कृपा करुणामई, तब दादू देखे तुम दई ॥ 4 ॥ 173. निस्पृहता पंजाबी । त्रिताल राम सुख सेवक जानै रे, दूजा दुख कर माने रे ॥ टेक॥ और अग्नि की झाला, फंद रोपे हैं जम जाला । सम काल कठिन शर पेखें, यह सिंह रूप सब देखें ॥ 1 ॥ विष सागर लहर तरंगा, यहु ऐसा कूप भुवंगा । भयभीत भयानक भारी, रिपु करवत मीच विचारी ॥ 2 ॥ यहु ऐसा रूप छलावा, ठग पासीहारा आवा । सब ऐसा देख विचारे, ये प्राण घात बटपारे ॥ 3 ॥ ऐसा जन सेवक सोई, मन और न भावै कोई । हरि प्रेम मगन रंग राता, दादू राम रमै रस माता ॥ 4 ॥ 174. साधु महिमा । जय मंगल ताल आप निरंजन यों कहै, कीरति करतार ।
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
मैं जन सेवक द्वै नहीं, एकै अंग सार ॥ टेक ॥ मम कारण सब परिहरै, आपा अभिमान । सदा अखंडित उर धरै, बोले भगवान ॥ 1 ॥ अन्तर पट जीवै नहीं, तब ही मर जाइ । बिछुरे तलफै मीन ज्यूं, जीवै जल आइ ॥ 2 ॥ क्षीर नीर ज्यूं मिल रहै, जल जलहि समान । आतम पाणी लौण ज्यों, दूजा नांही आन ॥ 3 ॥ मैं जन सेवक द्वै नहीं, मेरा विश्राम । मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहै राम ॥ 4 ॥ 175. परिचय विनती । जय मंगल ताल शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया । भाग बड़े तूं भेटिया, हौं चरणौं आया ॥ टेक ॥ मेरी तप्त मिटी तुम्ह देखतां, शीतल भयो भारी । भव बंधन मुक्ता भया, जब मिल्या मुरारी ॥ 1 ॥ भरम भेद सब भूलिया, चेतन चित लाया । पारस सौं परचा भया, उन सहज लखाया ॥ 2 ॥ मेरा चंचल चित निश्चल भया, अब अनत न जाई । मगन भया सर बेधिया, रस पीया अघाई ॥ 3 ॥ सन्मुख ह्वै तैं सुख दिया, यहु दया तुम्हारी । दादू दरसन पावई, पीव प्राण अधारी ॥ 4 ॥ 176. परस्पर गोष्टी परिचय विनती । तिलवाड़ा ताल गोविन्द राखो अपणी ओट । काम क्रोध भये बटपारे, तकि मारैं उर चोट ॥ टेक ॥ बैरी पंच सबल संग मेरे, मारग रोक रहे ।
- 375 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 काल अहेडी बधिक है लागे, ज्यूं जीव बाज गहे ॥ 1 ॥ ग्यान ध्यान हिरदै हरि लीना, संग ही घेर रहे। समझि न परई बाप रमैया, तुम्ह बिन शूल सहे ॥ 2 ॥ शरण तुम्हारी राखो गोविन्द, इन सौं संग न दीजे। इनके संग बहुत दुख पाया, दादू को गहि लीजे ॥ 3 ॥ 177. भयमान विनती । रंगताल राम कृपा कर होहु दयाला, दर्शन देहु करहु प्रतिपाला ॥ टेक ॥ बालक दूध न देइ माता, तो वह क्यों कर जीवै विधाता ॥ 1 ॥ गुण औगुण हरि कुछ न विचारै, अंतर हेत प्रीति कर पालै ॥ 2 ॥ अपणो जान करै प्रतिपाला, नैन निकट उर धरै गोपाला ॥ 3 ॥ दादू कहै नहीं वश मेरा, तूं माता मैं बालक तेरा ॥ 4 ॥ 178 (गुजराती) विनती । त्रिताल भक्ति मांगूं बाप भक्ति मांगूं, मूने ताहरा नांऊं नों प्रेम लाग्यो। शिवपुर ब्रह्मपुर सर्व सौं कीजिये, अमर थावा नहींलोक मांगूं ॥ टेक ॥ आप अवलंबन ताहरा अंगनों, भक्ति संजीवनी रंग राचूं। देहनें गेहनौं बास बैकुंठ तणौं, इन्द्र आसण नहीं मुक्ति जाचूं ॥ 1 ॥ भक्ति वाहली खरी आप अविचल हरि, निर्मलो नाउं रस पान भावे। सिद्धि नें रिद्धि नें राज रूड़ो नहीं, देव पद माहरे काज न आवे ॥ 2 ॥ आत्मा अंतर सदा निरंतर, ताहरी बापजी भक्ति दीजे। कहै दादू हिवे कौड़ी दत आपे, तुम्ह बिना ते म्हें नहीं लीजे ॥ 3 ॥ 179. (गुजराती) राज विद्याधर ताल एह्वो एक तूँ राम जी नाम रूड़ो। ताहरा नाम बिना बीजो सबै ही कूड़ो ॥ टेक ॥
- 376 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 तुम्ह बिन अवर कोई कलि मां नहीं, सुमरतां संत नें साद आपे । कर्म कीधा कोटि छोड़वे बाँधो, नाम लेतां ख्रिणत ही ये कापे ॥ 1 ॥ संत नें सांकड़ो दुष्ट पीड़ा करे, वाहरे वाहलो वेगि आवे । पापनां पुंज पह्वां करी लीधो, भाजिया भै भर्म जोनि न आवे ॥ 2 ॥ साधनें दुहेलो तहाँ तूँ आकुलो, माहरो माहरो करीनें धाए । दुष्ट नें मारिबा संत नें तारिबा, प्रकट थावा तहाँ आप जाए ॥ 3 ॥ नाम लेतां ख्रिण नाथ तें एकले, कोटिनां कर्मनां छेद कीधा । कहै दादू हिवें तुम्ह बिना को नहीं, साखी बोलें जे शरण लीधा ॥ 4 ॥ 180. परिचय विनती राज । विद्याधर ताल हरि नाम देहु निरंजन तेरा, हरि हर्ष जपै जिय मेरा ॥ टेक ॥ भाव भक्ति हेत हरि दीजे, प्रेम उमंग मन आवे । कोमल वचन दीनता दीजे, राम रसायन भावे ॥ 1 ॥ विरह बैराग्य प्रीति मोहि दीजे, हृदय सांच सत भाखूं । चित चरणों चिंतामणि दीजे, अंतर दिढ़ कर राखूं ॥ 2 ॥ सहज संतोष सील सब दीजे, मन निश्चल तुम्ह लागे । चेतन चिंतन सदा निवासी, संग तुम्हारे जागे ॥ 3 ॥ ज्ञान ध्यान मोहन मोहि दीजे, सुरति सदा सँग तेरे । दीन दयाल दादू को दीजे, परम ज्योति घट मेरे ॥ 4 ॥ 181. आशीर्वाद मंगल । झपताल जय जय जय जगदीश तूँ, तूँ समर्थ सांई । सकल भुवन भानैं घड़ै, दूजा को नांहीं ॥ टेक ॥ काल मीच करुणा करै, जम किंकर माया । महा जोध बलवंत बली, भय कंपै राया ॥ 1 ॥ जरा मरण तुम तैं डरै, मन को भय भारी ।
- 377 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 काम दलन करुणामयी, तूँ देव मुरारी ॥ 2 ॥ सब कंपैं करतार तैं, भव-बंधन पाशा। अरि रिपु भंजन भय गता, सब विघ्न विनाशा ॥ 3 ॥ सिर ऊपर सांई खड़ा, सोई हम माहीं। दादू सेवक राम का निर्भय, न डराहीं ॥ 4 ॥ 182. हितोपदेश । त्रिताल हरि के चरण पकर मन मेरा, यहु अविनाशी घर तेरा ॥ टेक ॥ जब चरण कमल रज पावै, तब काल व्याल बौरावै। तब त्रिविध ताप तन नाशौ, तब सुख की राशि विलासै ॥ 1 ॥ जब चरण क मल चित लागै, तब माथै मीच न जागै। तब जनम जरा सब क्षीना, तब पद पावन उर लीना ॥ 2 ॥ जब चरण कमल रस पीवै, तब माया न व्यापै जीवै। तब भरम करम भय भाजै, तब तीनों लोक विराजै ॥ 3 ॥ जब चरण कमल रुचि तेरी, तब चार पदारथ चेरी। तब दादू और न बांछै, जब मन लागै सांचै ॥ 4 ॥ 183. संत उपदेश । राज मृगांक ताल संतों ! और कहो क्या कहिये । हम तुम्ह सीख इहै सतगुरु की, निकट राम के रहिये ॥ टेक ॥ हम तुम मांहि बसै सो स्वामी, सांचे सौं सचु लहिये। दर्शन परसन जुग जुग कीजे, काहे को दुख सहिये ॥ 1 ॥ हम तुम संग निकट रहैं नेरे, हरि केवल कर गहिये। चरण कमल छाड़ि कर ऐसे, अनत काहे को बहिये ॥ 2 ॥ हम तुम तारन तेज घन सुन्दर, नीके सौं निरबहिये। दादू देख और दुख सब ही, तामें तन क्यों दहिये ॥ 3 ॥
- 378 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 184. मन प्रति उपदेश । राज मृगांक ताल मन रे, बहुरि न ऐसे होई । पीछे फिर पछतावेगा रे, नींद भरे जनि सोई ॥ टेक ॥ आगम सारे संचु करीले, तो सुख होवै तोही । प्रीति करि पीव पाइये, चरणों राखो मोही ॥ 1 ॥ संसार सागर विषम अति भारी, जनि राखै मन मोही । दादू रे जन राम नाम सौं, कश्मल देही धोई ॥ 2 ॥ 185. काल चेतावनी । भंगताल साथी ! सावधान है रहिये । पलक मांहि परमेश्वर जाणै, कहा होइ कहा कहिये ॥ टेक ॥ बाबा, बाट घाट कुछ समझ न आवै, दूर गवन हम जाना । परदेशी पंथी चलै अकेला, औघट घाट पयाना ॥ 1 ॥ बाबा, संग न साथी कोई नहीं तेरा, यहु सब हाट पसारा । तरवर पंखी सबै सिधाये, तेरा कौण गँवारा ॥ 2 ॥ बाबा, सबै बटाऊ पंथ सिरानैं, सुस्थिर नांहीं कोई । अंति काल को आगे पीछे, बिछुरत बार न होई ॥ 3 ॥ बाबा, काची काया कौण भरोसा, रैन गई क्या सोवे । दादू संबल सुकृत लीजे, सावधान किन होवे ॥ 4 ॥ 186. (गुजराती) तर्क चेतावनी । शूलताल मेरा मेरा काहे को कीजे रे, जे कुछ संग न आवे । अनत करी नें धन धरीला रे, तेंऊ तो रीता जावे ॥ टेक ॥ माया बंधन अंध न चेते रे, मेर मांहिं लपटाया । ते जाणै हूँ यह बिलासौं, अनत विरोधे खाया ॥ 1 ॥ आप स्वारथ यह विलूधा रे, आगम मरम न जाणे ।
- 379 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 जम कर माथे बाण धरीला, ते तो मन ना आणे ॥ 2 ॥ मन विचारि सारी ते लीजे, तिल मांहीं तन पड़िबा। दादू रे तहँ तन ताड़ीजे, जेणें मारग चढ़िबा ॥ 3 ॥ 187. हितोपदेश । शूलताल सन्मुख भइला रे, तब दुख गइला रे, ते मेरे प्राण अधारी। निराकार निरंजन देवा रे, लेवा तेह विचारी ॥ टेक ॥ अपरम्पार परम निज सोई, अलख तोर विस्तारं। अंकुर बीजे सहज समाना रे, ऐसा समर्थ सारं ॥ 1 ॥ जे तैं किन्हा किन्हि इक चीन्हा रे, भइला ते परिमाणं। अविगत तोरी विगति न जाणूं, मैं मूरख अयानं ॥ 2 ॥ सहजें तोरा ए मन मोरा, साधन सौं रंग आई। दादू तोरी गति नहिं जानैं, निर्बाहो कर लाई ॥ 3 ॥ 188. मन प्रति सूरतन । त्रिताल हरि मारग मस्तक दीजिये, तब निकट परम पद लीजिये ॥ टेक ॥ इस मारग मांहीं मरणा, तिल पीछे पाँव न धरणा। अब आगे होई सो होई, पीछे सोच न करणा कोई ॥ 1 ॥ ज्यों शूरा रण झूझै, तब आपा पर नहिं बूझै। सिर साहिब काज संवारै, घण घावां आपा डारै ॥ 2 ॥ सती सत गहि साचा बोलै, मन निश्चल कदे न डोलै। वाके सोच पोच जिय ना आवै, जग देखत आप जलावै ॥ 3 ॥ इस सिर सौं साटा कीजे, तब अविनाशी पद लीजे। ताका सब सिर साबित होवे, जब दादू आपा खोवे ॥ 4 ॥ 189. कलियुगी । त्रिताल
- 380 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 झूठा कलियुग कह्या न जाइ, अमृत को विष कहै बनाइ ॥ टेक ॥ धन को निर्धन, निर्धन को धन, नीति अनीति पुकारै । निर्मल मैला, मैला निर्मल, साध चोर कर मारै ॥ 1 ॥ कंचन काच, काच को कंचन, हीरा कंकर भाखै । माणिक मणियाँ, मणियाँ माणिक, साँच झूठ कर नाखै ॥ 2 ॥ पारस पत्थर, पत्थर पारस, कामधेनु पशु गावै । चन्दन काठ, काठ को चन्दन, ऐसी बहुत बनावै ॥ 3 ॥ रस को अणरस, अणरस को रस, मीठा खारा होई । दादू कलिजुग ऐसा बरतै, साचा बिरला कोई ॥ 4 ॥ 190. भगवंत भरोसा । ललित ताल दादू मोहि भरोसा मोटा, तारण तिरण सोई संग मेरे, कहा करै कलि खोटा ॥ टेक ॥ दौं लागी दरिया तै न्यारी, दरिया मंझ न जाई । मच्छ कच्छ रहैं जल जेते, तिन को काल न खाई ॥ 1 ॥ जब सूवै पिंजर घर पाया, बाज रह्या वन मांहीं । जिनका समर्थ राखणहारा, तिनको को डर नांहीं ॥ 2 ॥ साचे झूठ न पूजै कबहुँ, सत्य न लागै काई । दादू साचा सहज समाना, फिर वै झूठ विलाई ॥ 3 ॥ 191. सांच झूठ निर्णय प्रतिपाल सांई को साच पियारा । साचै साच सुहावै देखो, साचा सिरजनहारा ॥ टेक ॥ ज्यों घण घावां सार घड़ीजे, झूठ सबै झड़ जाई । घण के घाऊँ सार रहेगा, झूठ न मांहि समाई ॥ 1 ॥ कनक कसौटी अग्नि-मुख दीजे, पंक सबै जल जाई ।
- 381 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 यों तो कसणी सांच सहेगा, झूठ सहै नहिं भाई ॥ 2 ॥ ज्यों घृत को ले ताता कीजे, ताइ ताइ तत्त कीन्हा। तत्तैं तत्त रहेगा भाई, झूठ सबै जल खीना ॥ 3 ॥ यों तो कसणी साच सहेगा, साचा कस कस लेवै । दादू दर्शन सांचा पावै, झूठे दरस न देवै ॥ 4 ॥ 192. करणी बिना कथनी । प्रतिपाल बातैं बाद जाहिंगी भइये, तुम जनि जानों बातनि पइये ॥ टेक ॥ जब लग अपना आप न जानै, तब लग कथनी काची । आपा जान सांई को जानै, तब कथनी सब साची ॥ 1 ॥ करनी बिना कंत नहीं पावै, कहे सुने का होई । जैसी कहै करै जे तैसी, पावैगा जन सोई ॥ 2 ॥ बातनि हीं जे निर्मल होवे, तो काहे को कस लीजे । सोना अग्नि दहै दस बारा, तब यहु प्रान पतीजे ॥ 3 ॥ यौं हम जाना मन पतियाना, करनी कठिन अपारा। दादू तन का आपा जारे, तो तिरत न लागे बारा ॥ 4 ॥ 193. उपदेश । पंजाबी-त्रिताल पंडित, राम मिलै सो कीजे । पढ़ पढ़ वेद पुराण बखानैं, सोई तत्त्व कह दीजे ॥ टेक॥ आतम रोगी विषम बियाधी, सोई कर औषधि सारा। परसत प्राणी होइ परम सुख, छूटै सब संसारा ॥ 1 ॥ ए गुण इन्द्री अग्नि अपारा, ता सन जलै शरीरा। तन मन शीतल होइ सदा सुख, सो जल नहाओ नीरा ॥ 2 ॥ सोई मार्ग हमहिं बताओ, जेहि पंथ पहुँचे पारा। भूलि न परै उलट नहीं आवै, सो कुछ करहु विचारा ॥ 3 ॥
- 382 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 गुरु उपदेश देहु कर दीपक, तिमिर मिटे सब सूझे। दादू सोई पंडित ज्ञाता, राम मिलन की बूझे ॥ 4 ॥ 194. उपदेश । प्रतिताल हरि राम बिना सब भर्मि गये, कोई जन तेरा साच गहै ॥ टेक ॥ पीवै नीर तृषा तन भाजै, ज्ञान गुरु बिन कोइ न लहै। प्रकट पूरा समझ न आवै, तातैं सो जन दूर रहै ॥ 1 ॥ हर्ष शोक दोउ सम कर राखै, एक एक के संग न बहै। अनतहि जाइ तहाँदुख पावै, आपहि आपा आप दहै ॥ 2 ॥ आपा पर भरम सब छाड़ै, तोनि लोक पर ताहि धरै। सो जन सही साच कौं परसे, अमर मिले नहिं कबहूँ मरै ॥ 3 ॥ पारब्रह्म सूं प्रीति निरन्तर, राम रसायन भर पीवै। सदा आनन्द सुखी साचे सौं, कहै दादू सो जन जीवै ॥ 4 ॥ 195. भ्रम विध्वंसण । प्रतिताल जग अंधा नैन न सूझै, जिन सिरजे, ताहि न बूझै ॥ टेक ॥ पाहण की पूजा करै, करै आतम घाता। निर्मल नैन न आवई, दोजख दिशि जाता ॥ 1 ॥ पूजै देव दिहाड़ियां, महा-माई मानैं। प्रकट देव निरंजना, ताकी सेव न जानैं ॥ 2 ॥ भैरुं भूत सब भ्रम के, पशु प्राणी ध्यावैं। सिरजनहारा सबन का, ताको नहिं पावैं ॥ 3 ॥ आप स्वारथ मेदनी, का का नहिं करही । दादू सांचे राम बिन, मर मर दुख भरही ॥ 4 ॥ 196. अन्य उपासक विस्मयवादी भ्रम । रंग ताल
- 383 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 ........................................................................................................................
साचा राम न जाणै रे, सब झूठ बखाणै रे ॥ टेक ॥ झूठे देवा झूठी सेवा, झूठा करे पसारा। झूठी पूजा झूठी पाती, झूठा पूजणहारा ॥ 1 ॥ झूठा पाक करै रे प्राणी, झूठा भोग लगावै। झूठा आड़ा पड़दा देवै, झूठा थाल बजावै ॥ 2 ॥ झूठे वक्ता झूठे श्रोता, झूठी कथा सुणावै। झूठा कलियुग सब को मानै, झूठा भ्रम दिढ़ावै ॥ 3 ॥ स्थावर जंगम जल थल महियल, घट घट तेज समाना। दादू आतम राम हमारा, आदि पुरुष पहिचाना ॥ 4 ॥
-
निज मार्ग निर्णय । चौताल मैं पंथी एक अपार का, मन और न भावै। सोई पंथ पावै पीव का, जिसे आप लखावै ॥ टेक ॥ को पंथी हिंदू तुरक के, को काहू राता। को पंथी सोफी सेवड़े, को सन्यासी माता ॥ 1 ॥ को पंथी जोगी जंगमा, को शक्ति पंथ ध्यावै। को पंथी कमड़े कापड़ी, को बहुत मनावै ॥ 2 ॥ को पंथी काहू के चलै, मैं और न जानूं। दादू जिन जग सिरजिया, ताही को मानूं ॥ 3 ॥
-
साधु मिलाप मंगल । चौताल आज हमारे रामजी साधु घर आये, मंगलाचार चहुँ दिशि भये, आनन्द बधाये ॥ टेक ॥ चौक पुराऊँ मोतियां, घिस चंदन लाऊँ। पंच पदारथ पोइ के , यहु माल चढ़ाऊँ ॥ 1 ॥ तन मन धन करूँ वारनैं, प्रदक्षिणा दीजे।
- 384 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
शीश हमारा जीव ले, नौछावर कीजे ॥ 2 ॥ भाव भक्ति कर प्रीति सौं, प्रेम रस पीजे । सेवा वंदन आरती, यहु लाहा लीजे ॥ 3 ॥ भाग हमारा हे सखी, सुख सागर पाया । दादू को दर्शन भया, मिले त्रिभुवन राया ॥ 4 ॥ 199. संत समागम प्रार्थना । दादरा निरंजन नाम के रस माते, कोई पूरे प्राणी राते ॥ टेक ॥ सदा सनेही राम के, सोई जन साचे । तुम बिन और न जानहीं, रंग तेरे ही राचे ॥ 1 ॥ आन न भावै एक तूं, सति साधु सोई । प्रेम पियासे पीव के, ऐसा जन कोई ॥ 2 ॥ तुम हीं जीवन उर रहे, आनन्द अनुरागी । प्रेम मगन पीव प्रितड़ी, लै तुम सौं लागी ॥ 3 ॥ जे जन तेरे रंग रंगे, दूजा रंग नांही । जन्म सुफल कर लीजिये, दादू उन मांहीं ॥ 4 ॥ 200. अत्यन्त निर्मल उपदेश । दादरा चलु रे मन ! जहाँ अमृत वना, निर्मल नीके संत जना ॥ टेक ॥ निर्गुण नांव फल अगम अपार, संतन जीवन प्राण अधार ॥ 1 ॥ सीतल छाया सुखी शरीर, चरण सरोवर निर्मल नीर ॥ 2 ॥ सुफल सदा फल बारह मास, नाना वाणी धुनि प्रकाश ॥ 3 ॥ तहाँ वास बसि अमर अनेक, तहँ चलि दादू इहै विवेक ॥ 4 ॥ 201. चौताल चलो मन माहरा, जहाँ मित्र अम्हारा ।
- 385 -
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 तहँ जामण मरण नहिं जाणिये, नहिं जाणिये ॥ टेक ॥ मोह न माया, मेरा न तेरा, आवागमन नहीं जम फेरा ॥ 1 ॥ पिंड पड़े नहीं प्राण न छूटै, काल न लागै आयु न खूटै ॥ 2 ॥ अमर लोक तहँ अखिल शरीरा, व्याधि विकार न व्यापै पीरा ॥ 3 ॥ राम राज कोई भिड़े न भाजै, सुस्थिर रहणा बैठा छाजै ॥ 4 ॥ अलख निरंजन और न कोई, मित्र अम्हारा दादू सोई ॥ 5 ॥ 202. बेली । त्रिताल बेली आनन्द प्रेम समाइ । सहजैं मगन राम रस सींचै, दिन दिन बधती जाइ ॥ टेक ॥ सतगुरु सहजैं बाही बेली, सहज गगन घर छाया । सहजैं सहजैं कोंपल मेल्है, जाणै अवधू राया ॥ 1 ॥ आतम बेली सहजैं फूलै, सदा फूल फल होई । काया बाड़ी सहजैं निपजै, जानैं विरला कोई ॥ 2 ॥ मन हठ बेली सूखण लागी, सहजैं जुग जुग जीवै । दादू बेली अमर फल लागै, सहज सदा रस पीवै ॥ 3 ॥ 203. शब्द बाण । त्रिताल संतों ! राम बाण मोहि लागे । मारत मृग मर्म तब पायो, सब संगी मिल जागे ॥ टेक ॥ चित चेतन चिंतामणि चीन्हा, उलट अपूठा आया । मंदिर पैसि बहुरि नहिं निकसै, परम तत्त घर पाया ॥ 1 ॥ आवै न जाइ, जाइ नहिं आवै, तिहिं रस मनवा माता । पान करत परमानन्द पायो, थकित भयो चलि जाता ॥ 2 ॥ भयो अपंग पंक नहि लागै, निर्मल संग सहाई । पूर्ण ब्रह्म अखिल अविनाशी, तिहिं तज अनत न जाई ॥ 3 ॥
- 386 -