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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग मारू 7 165. परिचय उत्साह मंगल । दीपचन्दी अम्ह घर पाहुणां ये, आव्या आतम राम ॥ टेक ॥ चहुँ दिशि मंगलाचार, आनन्द अति घणा ये। वरत्या जै जैकार, विरुद वधावणां ये ॥ 1 ॥ कनक कलश रस मांहिं, सखी भर ल्यावज्यो ये। आनन्द अंग न माइ, अम्हारे आवज्यो ये ॥ 2 ॥ भावै भक्ति अपार, सेवा कीजिये ये। सन्मुख सिरजनहार, सदा सुख लीजिये ये ॥ 3 ॥ धन्य अम्हारा भाग, आव्या अम्ह भणी ये। दादू सेज सुहाग, तूँ त्रिभुवन धणी ये ॥ 4 ॥ 166. फरोदस्त ताल गावहु मंगलाचार, आज बधावणां ये। सुपनों देख्यो साँच, पीव घर आवणां ये ॥ टेक ॥ भाव कलश जल प्रेम का, सब सखियन के शीश। गावत चली बधावणां, जै जै जै जगदीश ॥ 1 ॥ पदम कोटि रवि झिलमिलै, अंग अंग तेज अनन्त। विगसि वदन विरहनी मिली, घर आये हरि कंत ॥ 2 ॥ सुन्दरि सुरति सिंगार कर, सन्मुख परसे पीव। मो मंदिर मोहन आविया, वारूं तन मन जीव ॥ 3 ॥ कवल निरन्तर नरहरी, प्रकट भये भगवंत। जहाँ विरहनी गुण वीनवे, खेले फाग बसन्त ॥ 4 ॥ वर आयो विरहनी मिली, अरस परस सब अंग। दादू सुन्दरी सुख भया, जुगि जुगि यहु रस रंग ॥ 5 ॥ इति राग मारू सम्पूर्ण ॥ 7 ॥ पद 24 ॥

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अथ राग रामकली ४ (गायन समय प्रभात 3 से 6 ) 167. सद्गुरु शब्द महिमा । दादरा शब्द समाना जो रहै, गुरु बाइक बीधा । उनही लागा एक सौं, सोई जन सीधा ॥ टेक ॥ ऐसी लागी मर्म की, तन मन सब भूला । जीवत-मृतक है रहै, गह आत्म मूला ॥ 1 ॥ चेतन चितहि न बीसरे, महारस मीठा । शब्द निरंजन गह रह्या, उन साहिब दीठा ॥ 2 ॥ एक शब्द जन ऊधरे, सुनि सहजैं जागे । अंतर राते एक सौं, सर सन्मुख लागे ॥ 3 ॥ शब्द समाना सन्मुख रहै, पर आतम आगे । दादू सीझै देखतां, अविनाशी लागे ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 168. नाम महिमा । त्रिताल अहो नर नीका है हरि नाम । दूजा नहीं राम बिन नीका, कहले केवल राम ॥ टेक ॥ निर्मल सदा एक अविनाशी, अजर अकल रस ऐसा । दिढ़ गहि राख मूल मन मांहीं, निरख देख निज कैसा ॥ 1 ॥ यहु रस मीठा महा अमीरस, अमर अनूपम पीवे । राता रहै प्रेम सौं माता, ऐसे जुग-जुग जीवे ॥ 2 ॥ दूजा नहीं और को ऐसा, गुरु अंजन कर सूझे । दादू मोटे भाग हमारे, दास विवेकी बूझे ॥ 3 ॥ 169. अत्यन्त विरह । त्रिताल कब आवेगा कब आवेगा ? पीव प्रकट आप दिखावेगा, मिठड़ा मुझको भावेगा ॥ टेक ॥ कंठड़े लाग रहूँ रे, नैनों में बाहि धरूं रे, पीव तुझ बिन झूर मरूं रे ॥ 1 ॥ पावों मस्तक मेरा रे, तन मन पीवजी तेरा रे, हौं राखूं नैनहुं नेरा रे ॥ 2 ॥ हियड़े हेत लगाऊँ रे, अब कै जे पीव पाऊँ रे, तो बेर बेर बलि जाऊँ रे ॥ 3 ॥ सेजड़िये पीव आवे रे, तब आनन्द अंग न मावे रे, दादू दरस दिखावे रे ॥ 4 ॥ 170. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल पिरी तूं पाण पसाइड़े, मूं तनि लागी भाहिड़े ॥ टेक ॥ पांधी वींदो निकरीला, असां साण गल्हाइड़े । सांई सिकां सड़केला, गुझी गालि सुनाइड़े ॥ 1 ॥ पसां पाक दीदार केला, सिक असां जी लाहिड़े । दादू मंझि कलूब मेला, तोड़े बीयां न काइड़े ॥ 2 ॥ 171. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल को मेड़ीदो सज्जणा,

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सुहारी सुरति केला, लगे डीहु घणां ॥ टेक॥ पीरीयां संदी गाल्हड़ीला, पांधीड़ा पूछं । कड़ी ईंदो मूं गरेला, डीडों बांह असां ॥ 1 ॥ आहे सिक दीदार जीला, पिरी पूर पसां । इयें दादू जे ज्यंद येला, सजण सांण रहां ॥ 2 ॥ 172. विनती पंजाबी । त्रिताल हरि हाँ दिखाओ नैना, सुन्दर मूरति मोहना, बोलि सुनाओ बैना ॥ टेक॥ प्रकट पुरातन खंडना, महीमान सुख मंडना ॥ 1 ॥ अविनाशी अपरम्परा, दीनदयाल गगन धरा ॥ 2 ॥ पारब्रह्म परिपूरणां, दर्श देहु दुख दूरणां ॥ 3 ॥ कर कृपा करुणामई, तब दादू देखे तुम दई ॥ 4 ॥ 173. निस्पृहता पंजाबी । त्रिताल राम सुख सेवक जानै रे, दूजा दुख कर माने रे ॥ टेक॥ और अग्नि की झाला, फंद रोपे हैं जम जाला । सम काल कठिन शर पेखें, यह सिंह रूप सब देखें ॥ 1 ॥ विष सागर लहर तरंगा, यहु ऐसा कूप भुवंगा । भयभीत भयानक भारी, रिपु करवत मीच विचारी ॥ 2 ॥ यहु ऐसा रूप छलावा, ठग पासीहारा आवा । सब ऐसा देख विचारे, ये प्राण घात बटपारे ॥ 3 ॥ ऐसा जन सेवक सोई, मन और न भावै कोई । हरि प्रेम मगन रंग राता, दादू राम रमै रस माता ॥ 4 ॥ 174. साधु महिमा । जय मंगल ताल आप निरंजन यों कहै, कीरति करतार ।

श्री दादूवाणी-राग रामकली 8

मैं जन सेवक द्वै नहीं, एकै अंग सार ॥ टेक ॥ मम कारण सब परिहरै, आपा अभिमान । सदा अखंडित उर धरै, बोले भगवान ॥ 1 ॥ अन्तर पट जीवै नहीं, तब ही मर जाइ । बिछुरे तलफै मीन ज्यूं, जीवै जल आइ ॥ 2 ॥ क्षीर नीर ज्यूं मिल रहै, जल जलहि समान । आतम पाणी लौण ज्यों, दूजा नांही आन ॥ 3 ॥ मैं जन सेवक द्वै नहीं, मेरा विश्राम । मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहै राम ॥ 4 ॥ 175. परिचय विनती । जय मंगल ताल शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया । भाग बड़े तूं भेटिया, हौं चरणौं आया ॥ टेक ॥ मेरी तप्त मिटी तुम्ह देखतां, शीतल भयो भारी । भव बंधन मुक्ता भया, जब मिल्या मुरारी ॥ 1 ॥ भरम भेद सब भूलिया, चेतन चित लाया । पारस सौं परचा भया, उन सहज लखाया ॥ 2 ॥ मेरा चंचल चित निश्चल भया, अब अनत न जाई । मगन भया सर बेधिया, रस पीया अघाई ॥ 3 ॥ सन्मुख ह्वै तैं सुख दिया, यहु दया तुम्हारी । दादू दरसन पावई, पीव प्राण अधारी ॥ 4 ॥ 176. परस्पर गोष्टी परिचय विनती । तिलवाड़ा ताल गोविन्द राखो अपणी ओट । काम क्रोध भये बटपारे, तकि मारैं उर चोट ॥ टेक ॥ बैरी पंच सबल संग मेरे, मारग रोक रहे ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 काल अहेडी बधिक है लागे, ज्यूं जीव बाज गहे ॥ 1 ॥ ग्यान ध्यान हिरदै हरि लीना, संग ही घेर रहे। समझि न परई बाप रमैया, तुम्ह बिन शूल सहे ॥ 2 ॥ शरण तुम्हारी राखो गोविन्द, इन सौं संग न दीजे। इनके संग बहुत दुख पाया, दादू को गहि लीजे ॥ 3 ॥ 177. भयमान विनती । रंगताल राम कृपा कर होहु दयाला, दर्शन देहु करहु प्रतिपाला ॥ टेक ॥ बालक दूध न देइ माता, तो वह क्यों कर जीवै विधाता ॥ 1 ॥ गुण औगुण हरि कुछ न विचारै, अंतर हेत प्रीति कर पालै ॥ 2 ॥ अपणो जान करै प्रतिपाला, नैन निकट उर धरै गोपाला ॥ 3 ॥ दादू कहै नहीं वश मेरा, तूं माता मैं बालक तेरा ॥ 4 ॥ 178 (गुजराती) विनती । त्रिताल भक्ति मांगूं बाप भक्ति मांगूं, मूने ताहरा नांऊं नों प्रेम लाग्यो। शिवपुर ब्रह्मपुर सर्व सौं कीजिये, अमर थावा नहींलोक मांगूं ॥ टेक ॥ आप अवलंबन ताहरा अंगनों, भक्ति संजीवनी रंग राचूं। देहनें गेहनौं बास बैकुंठ तणौं, इन्द्र आसण नहीं मुक्ति जाचूं ॥ 1 ॥ भक्ति वाहली खरी आप अविचल हरि, निर्मलो नाउं रस पान भावे। सिद्धि नें रिद्धि नें राज रूड़ो नहीं, देव पद माहरे काज न आवे ॥ 2 ॥ आत्मा अंतर सदा निरंतर, ताहरी बापजी भक्ति दीजे। कहै दादू हिवे कौड़ी दत आपे, तुम्ह बिना ते म्हें नहीं लीजे ॥ 3 ॥ 179. (गुजराती) राज विद्याधर ताल एह्वो एक तूँ राम जी नाम रूड़ो। ताहरा नाम बिना बीजो सबै ही कूड़ो ॥ टेक ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 तुम्ह बिन अवर कोई कलि मां नहीं, सुमरतां संत नें साद आपे । कर्म कीधा कोटि छोड़वे बाँधो, नाम लेतां ख्रिणत ही ये कापे ॥ 1 ॥ संत नें सांकड़ो दुष्ट पीड़ा करे, वाहरे वाहलो वेगि आवे । पापनां पुंज पह्वां करी लीधो, भाजिया भै भर्म जोनि न आवे ॥ 2 ॥ साधनें दुहेलो तहाँ तूँ आकुलो, माहरो माहरो करीनें धाए । दुष्ट नें मारिबा संत नें तारिबा, प्रकट थावा तहाँ आप जाए ॥ 3 ॥ नाम लेतां ख्रिण नाथ तें एकले, कोटिनां कर्मनां छेद कीधा । कहै दादू हिवें तुम्ह बिना को नहीं, साखी बोलें जे शरण लीधा ॥ 4 ॥ 180. परिचय विनती राज । विद्याधर ताल हरि नाम देहु निरंजन तेरा, हरि हर्ष जपै जिय मेरा ॥ टेक ॥ भाव भक्ति हेत हरि दीजे, प्रेम उमंग मन आवे । कोमल वचन दीनता दीजे, राम रसायन भावे ॥ 1 ॥ विरह बैराग्य प्रीति मोहि दीजे, हृदय सांच सत भाखूं । चित चरणों चिंतामणि दीजे, अंतर दिढ़ कर राखूं ॥ 2 ॥ सहज संतोष सील सब दीजे, मन निश्चल तुम्ह लागे । चेतन चिंतन सदा निवासी, संग तुम्हारे जागे ॥ 3 ॥ ज्ञान ध्यान मोहन मोहि दीजे, सुरति सदा सँग तेरे । दीन दयाल दादू को दीजे, परम ज्योति घट मेरे ॥ 4 ॥ 181. आशीर्वाद मंगल । झपताल जय जय जय जगदीश तूँ, तूँ समर्थ सांई । सकल भुवन भानैं घड़ै, दूजा को नांहीं ॥ टेक ॥ काल मीच करुणा करै, जम किंकर माया । महा जोध बलवंत बली, भय कंपै राया ॥ 1 ॥ जरा मरण तुम तैं डरै, मन को भय भारी ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 काम दलन करुणामयी, तूँ देव मुरारी ॥ 2 ॥ सब कंपैं करतार तैं, भव-बंधन पाशा। अरि रिपु भंजन भय गता, सब विघ्न विनाशा ॥ 3 ॥ सिर ऊपर सांई खड़ा, सोई हम माहीं। दादू सेवक राम का निर्भय, न डराहीं ॥ 4 ॥ 182. हितोपदेश । त्रिताल हरि के चरण पकर मन मेरा, यहु अविनाशी घर तेरा ॥ टेक ॥ जब चरण कमल रज पावै, तब काल व्याल बौरावै। तब त्रिविध ताप तन नाशौ, तब सुख की राशि विलासै ॥ 1 ॥ जब चरण क मल चित लागै, तब माथै मीच न जागै। तब जनम जरा सब क्षीना, तब पद पावन उर लीना ॥ 2 ॥ जब चरण कमल रस पीवै, तब माया न व्यापै जीवै। तब भरम करम भय भाजै, तब तीनों लोक विराजै ॥ 3 ॥ जब चरण कमल रुचि तेरी, तब चार पदारथ चेरी। तब दादू और न बांछै, जब मन लागै सांचै ॥ 4 ॥ 183. संत उपदेश । राज मृगांक ताल संतों ! और कहो क्या कहिये । हम तुम्ह सीख इहै सतगुरु की, निकट राम के रहिये ॥ टेक ॥ हम तुम मांहि बसै सो स्वामी, सांचे सौं सचु लहिये। दर्शन परसन जुग जुग कीजे, काहे को दुख सहिये ॥ 1 ॥ हम तुम संग निकट रहैं नेरे, हरि केवल कर गहिये। चरण कमल छाड़ि कर ऐसे, अनत काहे को बहिये ॥ 2 ॥ हम तुम तारन तेज घन सुन्दर, नीके सौं निरबहिये। दादू देख और दुख सब ही, तामें तन क्यों दहिये ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 184. मन प्रति उपदेश । राज मृगांक ताल मन रे, बहुरि न ऐसे होई । पीछे फिर पछतावेगा रे, नींद भरे जनि सोई ॥ टेक ॥ आगम सारे संचु करीले, तो सुख होवै तोही । प्रीति करि पीव पाइये, चरणों राखो मोही ॥ 1 ॥ संसार सागर विषम अति भारी, जनि राखै मन मोही । दादू रे जन राम नाम सौं, कश्मल देही धोई ॥ 2 ॥ 185. काल चेतावनी । भंगताल साथी ! सावधान है रहिये । पलक मांहि परमेश्वर जाणै, कहा होइ कहा कहिये ॥ टेक ॥ बाबा, बाट घाट कुछ समझ न आवै, दूर गवन हम जाना । परदेशी पंथी चलै अकेला, औघट घाट पयाना ॥ 1 ॥ बाबा, संग न साथी कोई नहीं तेरा, यहु सब हाट पसारा । तरवर पंखी सबै सिधाये, तेरा कौण गँवारा ॥ 2 ॥ बाबा, सबै बटाऊ पंथ सिरानैं, सुस्थिर नांहीं कोई । अंति काल को आगे पीछे, बिछुरत बार न होई ॥ 3 ॥ बाबा, काची काया कौण भरोसा, रैन गई क्या सोवे । दादू संबल सुकृत लीजे, सावधान किन होवे ॥ 4 ॥ 186. (गुजराती) तर्क चेतावनी । शूलताल मेरा मेरा काहे को कीजे रे, जे कुछ संग न आवे । अनत करी नें धन धरीला रे, तेंऊ तो रीता जावे ॥ टेक ॥ माया बंधन अंध न चेते रे, मेर मांहिं लपटाया । ते जाणै हूँ यह बिलासौं, अनत विरोधे खाया ॥ 1 ॥ आप स्वारथ यह विलूधा रे, आगम मरम न जाणे ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 जम कर माथे बाण धरीला, ते तो मन ना आणे ॥ 2 ॥ मन विचारि सारी ते लीजे, तिल मांहीं तन पड़िबा। दादू रे तहँ तन ताड़ीजे, जेणें मारग चढ़िबा ॥ 3 ॥ 187. हितोपदेश । शूलताल सन्मुख भइला रे, तब दुख गइला रे, ते मेरे प्राण अधारी। निराकार निरंजन देवा रे, लेवा तेह विचारी ॥ टेक ॥ अपरम्पार परम निज सोई, अलख तोर विस्तारं। अंकुर बीजे सहज समाना रे, ऐसा समर्थ सारं ॥ 1 ॥ जे तैं किन्हा किन्हि इक चीन्हा रे, भइला ते परिमाणं। अविगत तोरी विगति न जाणूं, मैं मूरख अयानं ॥ 2 ॥ सहजें तोरा ए मन मोरा, साधन सौं रंग आई। दादू तोरी गति नहिं जानैं, निर्बाहो कर लाई ॥ 3 ॥ 188. मन प्रति सूरतन । त्रिताल हरि मारग मस्तक दीजिये, तब निकट परम पद लीजिये ॥ टेक ॥ इस मारग मांहीं मरणा, तिल पीछे पाँव न धरणा। अब आगे होई सो होई, पीछे सोच न करणा कोई ॥ 1 ॥ ज्यों शूरा रण झूझै, तब आपा पर नहिं बूझै। सिर साहिब काज संवारै, घण घावां आपा डारै ॥ 2 ॥ सती सत गहि साचा बोलै, मन निश्चल कदे न डोलै। वाके सोच पोच जिय ना आवै, जग देखत आप जलावै ॥ 3 ॥ इस सिर सौं साटा कीजे, तब अविनाशी पद लीजे। ताका सब सिर साबित होवे, जब दादू आपा खोवे ॥ 4 ॥ 189. कलियुगी । त्रिताल

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 झूठा कलियुग कह्या न जाइ, अमृत को विष कहै बनाइ ॥ टेक ॥ धन को निर्धन, निर्धन को धन, नीति अनीति पुकारै । निर्मल मैला, मैला निर्मल, साध चोर कर मारै ॥ 1 ॥ कंचन काच, काच को कंचन, हीरा कंकर भाखै । माणिक मणियाँ, मणियाँ माणिक, साँच झूठ कर नाखै ॥ 2 ॥ पारस पत्थर, पत्थर पारस, कामधेनु पशु गावै । चन्दन काठ, काठ को चन्दन, ऐसी बहुत बनावै ॥ 3 ॥ रस को अणरस, अणरस को रस, मीठा खारा होई । दादू कलिजुग ऐसा बरतै, साचा बिरला कोई ॥ 4 ॥ 190. भगवंत भरोसा । ललित ताल दादू मोहि भरोसा मोटा, तारण तिरण सोई संग मेरे, कहा करै कलि खोटा ॥ टेक ॥ दौं लागी दरिया तै न्यारी, दरिया मंझ न जाई । मच्छ कच्छ रहैं जल जेते, तिन को काल न खाई ॥ 1 ॥ जब सूवै पिंजर घर पाया, बाज रह्या वन मांहीं । जिनका समर्थ राखणहारा, तिनको को डर नांहीं ॥ 2 ॥ साचे झूठ न पूजै कबहुँ, सत्य न लागै काई । दादू साचा सहज समाना, फिर वै झूठ विलाई ॥ 3 ॥ 191. सांच झूठ निर्णय प्रतिपाल सांई को साच पियारा । साचै साच सुहावै देखो, साचा सिरजनहारा ॥ टेक ॥ ज्यों घण घावां सार घड़ीजे, झूठ सबै झड़ जाई । घण के घाऊँ सार रहेगा, झूठ न मांहि समाई ॥ 1 ॥ कनक कसौटी अग्नि-मुख दीजे, पंक सबै जल जाई ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 यों तो कसणी सांच सहेगा, झूठ सहै नहिं भाई ॥ 2 ॥ ज्यों घृत को ले ताता कीजे, ताइ ताइ तत्त कीन्हा। तत्तैं तत्त रहेगा भाई, झूठ सबै जल खीना ॥ 3 ॥ यों तो कसणी साच सहेगा, साचा कस कस लेवै । दादू दर्शन सांचा पावै, झूठे दरस न देवै ॥ 4 ॥ 192. करणी बिना कथनी । प्रतिपाल बातैं बाद जाहिंगी भइये, तुम जनि जानों बातनि पइये ॥ टेक ॥ जब लग अपना आप न जानै, तब लग कथनी काची । आपा जान सांई को जानै, तब कथनी सब साची ॥ 1 ॥ करनी बिना कंत नहीं पावै, कहे सुने का होई । जैसी कहै करै जे तैसी, पावैगा जन सोई ॥ 2 ॥ बातनि हीं जे निर्मल होवे, तो काहे को कस लीजे । सोना अग्नि दहै दस बारा, तब यहु प्रान पतीजे ॥ 3 ॥ यौं हम जाना मन पतियाना, करनी कठिन अपारा। दादू तन का आपा जारे, तो तिरत न लागे बारा ॥ 4 ॥ 193. उपदेश । पंजाबी-त्रिताल पंडित, राम मिलै सो कीजे । पढ़ पढ़ वेद पुराण बखानैं, सोई तत्त्व कह दीजे ॥ टेक॥ आतम रोगी विषम बियाधी, सोई कर औषधि सारा। परसत प्राणी होइ परम सुख, छूटै सब संसारा ॥ 1 ॥ ए गुण इन्द्री अग्नि अपारा, ता सन जलै शरीरा। तन मन शीतल होइ सदा सुख, सो जल नहाओ नीरा ॥ 2 ॥ सोई मार्ग हमहिं बताओ, जेहि पंथ पहुँचे पारा। भूलि न परै उलट नहीं आवै, सो कुछ करहु विचारा ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 गुरु उपदेश देहु कर दीपक, तिमिर मिटे सब सूझे। दादू सोई पंडित ज्ञाता, राम मिलन की बूझे ॥ 4 ॥ 194. उपदेश । प्रतिताल हरि राम बिना सब भर्मि गये, कोई जन तेरा साच गहै ॥ टेक ॥ पीवै नीर तृषा तन भाजै, ज्ञान गुरु बिन कोइ न लहै। प्रकट पूरा समझ न आवै, तातैं सो जन दूर रहै ॥ 1 ॥ हर्ष शोक दोउ सम कर राखै, एक एक के संग न बहै। अनतहि जाइ तहाँदुख पावै, आपहि आपा आप दहै ॥ 2 ॥ आपा पर भरम सब छाड़ै, तोनि लोक पर ताहि धरै। सो जन सही साच कौं परसे, अमर मिले नहिं कबहूँ मरै ॥ 3 ॥ पारब्रह्म सूं प्रीति निरन्तर, राम रसायन भर पीवै। सदा आनन्द सुखी साचे सौं, कहै दादू सो जन जीवै ॥ 4 ॥ 195. भ्रम विध्वंसण । प्रतिताल जग अंधा नैन न सूझै, जिन सिरजे, ताहि न बूझै ॥ टेक ॥ पाहण की पूजा करै, करै आतम घाता। निर्मल नैन न आवई, दोजख दिशि जाता ॥ 1 ॥ पूजै देव दिहाड़ियां, महा-माई मानैं। प्रकट देव निरंजना, ताकी सेव न जानैं ॥ 2 ॥ भैरुं भूत सब भ्रम के, पशु प्राणी ध्यावैं। सिरजनहारा सबन का, ताको नहिं पावैं ॥ 3 ॥ आप स्वारथ मेदनी, का का नहिं करही । दादू सांचे राम बिन, मर मर दुख भरही ॥ 4 ॥ 196. अन्य उपासक विस्मयवादी भ्रम । रंग ताल

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 ........................................................................................................................

साचा राम न जाणै रे, सब झूठ बखाणै रे ॥ टेक ॥ झूठे देवा झूठी सेवा, झूठा करे पसारा। झूठी पूजा झूठी पाती, झूठा पूजणहारा ॥ 1 ॥ झूठा पाक करै रे प्राणी, झूठा भोग लगावै। झूठा आड़ा पड़दा देवै, झूठा थाल बजावै ॥ 2 ॥ झूठे वक्ता झूठे श्रोता, झूठी कथा सुणावै। झूठा कलियुग सब को मानै, झूठा भ्रम दिढ़ावै ॥ 3 ॥ स्थावर जंगम जल थल महियल, घट घट तेज समाना। दादू आतम राम हमारा, आदि पुरुष पहिचाना ॥ 4 ॥

  1. निज मार्ग निर्णय । चौताल मैं पंथी एक अपार का, मन और न भावै। सोई पंथ पावै पीव का, जिसे आप लखावै ॥ टेक ॥ को पंथी हिंदू तुरक के, को काहू राता। को पंथी सोफी सेवड़े, को सन्यासी माता ॥ 1 ॥ को पंथी जोगी जंगमा, को शक्ति पंथ ध्यावै। को पंथी कमड़े कापड़ी, को बहुत मनावै ॥ 2 ॥ को पंथी काहू के चलै, मैं और न जानूं। दादू जिन जग सिरजिया, ताही को मानूं ॥ 3 ॥

  2. साधु मिलाप मंगल । चौताल आज हमारे रामजी साधु घर आये, मंगलाचार चहुँ दिशि भये, आनन्द बधाये ॥ टेक ॥ चौक पुराऊँ मोतियां, घिस चंदन लाऊँ। पंच पदारथ पोइ के , यहु माल चढ़ाऊँ ॥ 1 ॥ तन मन धन करूँ वारनैं, प्रदक्षिणा दीजे।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8

शीश हमारा जीव ले, नौछावर कीजे ॥ 2 ॥ भाव भक्ति कर प्रीति सौं, प्रेम रस पीजे । सेवा वंदन आरती, यहु लाहा लीजे ॥ 3 ॥ भाग हमारा हे सखी, सुख सागर पाया । दादू को दर्शन भया, मिले त्रिभुवन राया ॥ 4 ॥ 199. संत समागम प्रार्थना । दादरा निरंजन नाम के रस माते, कोई पूरे प्राणी राते ॥ टेक ॥ सदा सनेही राम के, सोई जन साचे । तुम बिन और न जानहीं, रंग तेरे ही राचे ॥ 1 ॥ आन न भावै एक तूं, सति साधु सोई । प्रेम पियासे पीव के, ऐसा जन कोई ॥ 2 ॥ तुम हीं जीवन उर रहे, आनन्द अनुरागी । प्रेम मगन पीव प्रितड़ी, लै तुम सौं लागी ॥ 3 ॥ जे जन तेरे रंग रंगे, दूजा रंग नांही । जन्म सुफल कर लीजिये, दादू उन मांहीं ॥ 4 ॥ 200. अत्यन्त निर्मल उपदेश । दादरा चलु रे मन ! जहाँ अमृत वना, निर्मल नीके संत जना ॥ टेक ॥ निर्गुण नांव फल अगम अपार, संतन जीवन प्राण अधार ॥ 1 ॥ सीतल छाया सुखी शरीर, चरण सरोवर निर्मल नीर ॥ 2 ॥ सुफल सदा फल बारह मास, नाना वाणी धुनि प्रकाश ॥ 3 ॥ तहाँ वास बसि अमर अनेक, तहँ चलि दादू इहै विवेक ॥ 4 ॥ 201. चौताल चलो मन माहरा, जहाँ मित्र अम्हारा ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 तहँ जामण मरण नहिं जाणिये, नहिं जाणिये ॥ टेक ॥ मोह न माया, मेरा न तेरा, आवागमन नहीं जम फेरा ॥ 1 ॥ पिंड पड़े नहीं प्राण न छूटै, काल न लागै आयु न खूटै ॥ 2 ॥ अमर लोक तहँ अखिल शरीरा, व्याधि विकार न व्यापै पीरा ॥ 3 ॥ राम राज कोई भिड़े न भाजै, सुस्थिर रहणा बैठा छाजै ॥ 4 ॥ अलख निरंजन और न कोई, मित्र अम्हारा दादू सोई ॥ 5 ॥ 202. बेली । त्रिताल बेली आनन्द प्रेम समाइ । सहजैं मगन राम रस सींचै, दिन दिन बधती जाइ ॥ टेक ॥ सतगुरु सहजैं बाही बेली, सहज गगन घर छाया । सहजैं सहजैं कोंपल मेल्है, जाणै अवधू राया ॥ 1 ॥ आतम बेली सहजैं फूलै, सदा फूल फल होई । काया बाड़ी सहजैं निपजै, जानैं विरला कोई ॥ 2 ॥ मन हठ बेली सूखण लागी, सहजैं जुग जुग जीवै । दादू बेली अमर फल लागै, सहज सदा रस पीवै ॥ 3 ॥ 203. शब्द बाण । त्रिताल संतों ! राम बाण मोहि लागे । मारत मृग मर्म तब पायो, सब संगी मिल जागे ॥ टेक ॥ चित चेतन चिंतामणि चीन्हा, उलट अपूठा आया । मंदिर पैसि बहुरि नहिं निकसै, परम तत्त घर पाया ॥ 1 ॥ आवै न जाइ, जाइ नहिं आवै, तिहिं रस मनवा माता । पान करत परमानन्द पायो, थकित भयो चलि जाता ॥ 2 ॥ भयो अपंग पंक नहि लागै, निर्मल संग सहाई । पूर्ण ब्रह्म अखिल अविनाशी, तिहिं तज अनत न जाई ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 सो शर लागि प्रेम प्रकाशा, प्रकटी प्रीतम वाणी। दादू दीन दयाल ही जानै, सुख में सुरति समानी ॥ 4 ॥ 204. निज स्थान निर्णय । झपताल मध्य नैन निरखूं सदा, सो सहज स्वरूप । देखत ही मन मोहिया, है तो तत्त्व अनूप ॥ टेक॥ त्रिवेणी तट पाइया, मूरति अविनाशी। जुग जुग मेरा भावता, सोई सुख राशी ॥ 1 ॥ तारुणी तट देखि हूँ, तहाँ सुस्थाना। सेवक स्वामी संग रहें, बैठे भगवाना ॥ 2 ॥ निर्भय थान सुहात सो, तहँ सेवक स्वामी। अनेक जतन कर पाइया, मैं अन्तरजामी ॥ 3 ॥ तेज तार परिमित नहीं, ऐसा उजियारा। दादू पार न पाइये, सो स्वरूप संभारा ॥ 4 ॥ 205. झपताल निकट निरंजन देखि हौं, छिन दूर न जाई । बाहर भीतर एक सा, सहजैं रह्या समाई ॥ टेक॥ सतगुरु भेद लखाइया, तब पूरा पाया। नैनन ही निरखूं सदा, घर सहजैं आया ॥ 1 ॥ पूरे सौं परचा भया, पूरी मति जागी। जीव जान जीवन मिल्या, ऐसे बड़ भागी ॥ 2 ॥ रोम रोम में रम रह्या, सो जीवन मेरा। जीव पीव न्यारा नहीं, सब संग बसेरा ॥ 3 ॥ सुन्दर सो सहजैं रहै, घट अंतरजामी। दादू सोई देखि हौं, सारों संग स्वामी ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली ४ २०६. परिचय उपदेश । त्रिताल सहज सहेलड़ी हे, तूँ निर्मल नैन निहारि । रूप अरूप निर्गुण आगुण में, त्रिभुवन देव मुरारि ॥ टेक ॥ बारम्बार निरख जग जीवन, इहि घर हरि अविनाशी । सुन्दरी जाइ सेज सुख विलसे, पूरण परम निवासी ॥ 1 ॥ सहजैं संग परस जगजीवन, आसण अमर अकेला । सुन्दरी जाइ सेज सुख सोवै, जीव ब्रह्म का मेला ॥ 2 ॥ मिलि आनन्द प्रीति करि पावन, अगम निगम जहाँ राजा । जाइ तहाँ परस पावन को, सुन्दरी सारे काजा ॥ 3 ॥ मंगलाचार चहुँ दिशि रोपै, जब सुन्दरी पिव पावै । परम ज्योति पूरे सौं मिल कर, दादू रंग लगावै ॥ 4 ॥ २०७. वस्तु निर्देश । त्रिताल तहँ आपै आप निरंजना, तहँ निसवासर नहि संजमा ॥ टेक ॥ तहँ धरती अम्बर नाहीं, तहँ धूप न दीसै छांहीं । तहँ पवन न चालै पानी, तहँ आपै एक बिनानी ॥ 1 ॥ तहँ चंद न ऊगै सूरा, मुख काल न बाजै तूरा । तहँ सुख दुख का गम नाहीं, ओ तो अगम अगोचर माहीं ॥ 2 ॥ तहँ काल काया नहिं लागै, तहँ को सोवै को जागै । तहँ पाप पुण्य नहिं कोई, तहँ अलख निरंजन सोई ॥ 3 ॥ तहँ सहज रहै सो स्वामी, सब घट अंतरजामी । सकल निरन्तर वासा, रट दादू संगम पासा ॥ 4 ॥ २०८. त्रिताल अवधू ! बोल निरंजन बाणी, तहँ एकै अनहद जाणी ॥ टेक ॥ तहँ वसुधा का बल नाहीं, तहँ गगन घाम नहिं छाहीं ।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 तहँ चंद सूर नहिं जाई, तहँ काल काया नहिं भाई ॥ 1 ॥ तहँ रैणि दिवस नहिं छाया, तहँ बाव वर्ण नहिं माया। तहँ उदय अस्त नहिं होई, तहँ मरै न जीवै कोई ॥ 2 ॥ तहँ नाहीं पाठ पुराना, तहँ आगम निगम नहिं जाना। तहँ विद्या वाद न जाना, नहिं तहाँ जोग अरु ध्याना ॥ 3 ॥ तहँ निराकार निज ऐसा, तहँ जाण्या जाइ न जैसा। तहँ सब गुण रहिता गहिये, तहँ दादू अनहद कहिये ॥ 4 ॥ २०९. प्रसिद्ध साधु प्रतिपाल बाबा! को ऐसा जन जोगी । अंजन छाड़ै रहै निरंजन, सहज सदा रस भोगी ॥ टेक ॥ छाया माया रहै विवर्जित, पिंड ब्रह्माण्ड नियारे। चंद सूर तैं अगम अगोचर, सो कह तत्त्व विचारे ॥ 1 ॥ पाप पुण्य लिपै नहीं कबहूँ, द्वै पख रहिता सोई। धरणि आकाश ताहि तैं ऊपरि, तहाँ जाइ रत होई ॥ 2 ॥ जीवण मरण न बांछै कबहूँ, आवागमन न फेरा। पानी पवन परस नहिं लागै, तिहिं संग करै बसेरा ॥ 3 ॥ गुण आकार जहाँ गम नाहीं, आपै आप अकेला। दादू जाइ तहाँ जन जोगी, परम पुरुष सौं मेला ॥ 4 ॥ २१०. परिचय पराभक्ति । राज विद्याधर ताल जोगी जान जान जन जीवै । बिन ही मनसा मन हि विचारै, बिन रसना रस पीवै ॥ टेक ॥ बिनही लोचन निरख नैन बिन, श्रवण रहित सुन सोई। ऐसे आतम रहै एक रस, तो दूसर नाम न होई ॥ 1 ॥ बिन ही मार्ग चलै चरण बिन, निहचल बैठा जाई।

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 बिन ही काया मिलै परस्पर, ज्यों जल जलहि समाई ॥ 2 ॥ बिन ही ठाहर आसण पूरे, बिन कर बैन बजावै । बिन ही पावों नाचै निशिदिन, बिन जिभ्या गुण गावै ॥ 3 ॥ सब गुण रहिता सकल बियापी, बिन इंद्री रस भोगी । दादू ऐसा गुरु हमारा, आप निरंजन जोगी ॥ 4 ॥ २11. रूपक ताल इहै परम गरु योगं, अमी महारस भोगं ॥ टेक॥ मन पवना स्थिर साधं, अविगत नाथ अराधं, तहँ शब्द अनाहद नादं ॥ १ ॥ पंच सखी परमोधं, अगम ज्ञान गुरु बोधं, तहँ नाथ निरंजन शोधं ॥ २ ॥ सद्गुरु मांहि बतावा, निराधार घर छावा, तहँ ज्योति स्वरूपी पावा ॥ ३ ॥ सहजैं सदा प्रकाशं, पूरण ब्रह्म विलासं, तहँ सेवक दादू दासं ॥ ४ ॥ २12. (गुजराती) अनभई । त्रिताल मूने येह अचंभो थाये । कीड़ीये हस्ती विडान्यो, तेन्नें बैठी खाये ॥ टेक ॥ जाण हु तो ते बैठो हारे, अजाण तेन्नें ता वाहे । पांगुलोउ जाबा लाग्यो, तेन्नें कर को साहे ॥ १ ॥ नान्हो हुतो ते मोटो थायो, गगन मण्डल नहिं माये । मोटे रो विस्तार भणीजे, ते तो केन्नें जाये ॥ २ ॥ ते जाणे जे निरखी जोवे, खोजी नें वलीमांहे । दादू तेन्नों मर्म न जाणें, जे जिह्वा विहूणों गाये ॥ ३ ॥ इति राग रामकली सम्पूर्ण ॥ 8 ॥ पद 46 ॥

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