सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 मीत हमारा सोइ, आदैं जे पीया । मुझे मिलावै कोइ, वै जीवन जीया ॥ 1 ॥ तेरे नैन दिखाइ, जीऊँ जिस आस रे । सो धन जीवै क्यों, नहीं जिस पास रे ॥ 2 ॥ पिंजर मांहैं प्राण, तुझ बिन जाइसी । जन दादू माँगे मान, कब घर आइसी ॥ 3 ॥ ३14. (गुजराती) सुरफाख्ता ताल हौं जोइ रही रे बाट, तूँ घर आवनें । तारा दर्शन थी सुख होइ, ते तूँ ल्यावनें ॥ टेक ॥ चरण जोवा नें खांत, ते तूँ देखाड़नें । तुझ बिना जीव देइ, दुहेली कामिनी ॥ 1 ॥ नैणें निहारूं बाट, ऊभी चावनी । तूँ अंतर थी ऊरो आव, देही जावनी ॥ 2 ॥ तूँ दया करी घर आव, दासी गाँवनी । जन दादू राम संभाल, बैन सुहाँवनी ॥ 3 ॥ ३15. झपताल पीव देखे बिन क्यों रहूँ, जिय तलफै मेरा । सब सुख आनन्द पाइये, मुख देखूं तेरा ॥ टेक ॥ पीव बिन कैसा जीवना, मोहि चैन न आवै । निर्धन ज्यों धन पाइये, जब दरस दिखावै ॥ 1 ॥ तुम बिन क्यों धीरज धरूं, जो लौं तोहि न पाऊँ । सन्मुख ह्वै सुख दीजिये, बलिहारी जाऊँ ॥ 2 ॥ विरह वियोग न सह सकूँ, कायर घट काचा । पावन परस न पाइये, सुनि साहिब साँचा ॥ 3 ॥
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सुनिये मेरी विनती, इब दर्शन दीजे। दादू देखन पावही, तैसैं कुछ कीजे ॥ 4 ॥ 316. प्रीति अखंडित । दादरा इहि विधि वेध्यो मोर मना, ज्यों लै भृंगी कीट तना ॥ टेक॥ चातक रटतैं रैन बिहाई, पिंड परै पै बान न जाई ॥ 1 ॥ मरै मीन बिसरै नहि पानी, प्राण तजे उन और न जानी ॥ 2 ॥ जलै शरीर न मोड़े अंगा, ज्योति न छाड़ै पड़ै पतंगा ॥ 3 ॥ दादू अब तै ऐसैं होहि, पिंड परै, नहीं छाडूं तोहि ॥ 4 ॥ 317. विरह । त्रिताल आओ राम दया कर मेरे, बार बार बलिहारी तेरे ॥ टेक॥ विरहनी आतुर पंथ निहारै, राम नाम कह पीव पुकारै ॥ 1 ॥ पंथी बूझै मारग जोवै, नैन नीर जल भर भर रोवै ॥ 2 ॥ निशदिन तलफै रहै उदास, आतम राम तुम्हारे पास ॥ 3 ॥ वपु विसरे तन की सुधि नांही, दादू विरहनी मृतक मांही ॥ 4 ॥ 318. केवल विनती । रूपक ताल निरंजन क्यों रहै, मौन गहे वैराग, केते जुग गये ॥ टेक॥ जागै जगपति राइ, हँस बोलै नहीं। परगट घूंघट मांहि, पट खोलै नहीं ॥ 1 ॥ सदके करूं संसार, सब जग वारणै। छाडूं सब परिवार, तेरे कारणै ॥ 2 ॥ वारूं पिंड पराण, पावों सिर धरूं। ज्यों ज्यों भावै राम, सो सेवा करूं ॥ 3 ॥ दीनानाथ दयाल ! विलंब न कीजिये।
दादू बलि बलि जाय, सेज सुख दीजिये ॥ 4 ॥ 319. निरंजन स्वरूप । त्रिताल निरंजन यूं रहै, काहू लिप्त न होइ । जल थल थावर जंगमा, गुण नहीं लागै कोइ ॥ टेक ॥ धर अंबर लागै नहिं, नहिं लागै शशिहर सूर । पाणी पवन लागै नहीं, जहाँ तहाँ भरपूर ॥ 1 ॥ निश वासर लागै नहीं, नहिं लागै शीतल घाम । क्षुधा तृषा लागै नहीं, घट-घट आतम राम ॥ 2 ॥ माया मोह लागै नहीं, नहिं लागै काया जीव । काल कर्म लागै नहीं, प्रगट मेरा पीव ॥ 3 ॥ इकलस एकै नूर है, इकलस एकै तेज । इकलस एकै ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥ 4 ॥ 320. विनय । त्रिताल जग जीवन प्राण आधार, वाचा पालना । हौं कहाँ पुकारूं जाइ, मेरे लालना ॥ टेक ॥ मेरे वेदन अंग अपार, सो दुख टालना । सागर यह निस्तार, गहरा अति घणा ॥ 1 ॥ अंतर है सो टाल, कीजै आपणा । मेरे तुम बिन और न कोइ, इहै विचारणा ॥ 2 ॥ तातैं करूं पुकार, यहु तन चालणा । दादू को दर्शन देहु, जाय दुख सालणा ॥ 3 ॥ 321. मन की नीकी विनती । मल्लिका मोद ताल मेरे तुम ही राखणहार, दूजा को नहीं ।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 ये चंचल चहुँ दिशि जाय, काल तहीं तहीं ॥ टेक ॥ मैं केते किये उपाय, निश्चल ना रहै । जहाँ बरजूं तहँ जाय, मद मातो बहै ॥ 1 ॥ जहाँ जाणा तहँ जाय, तुम्ह तैं ना डरै । तासौं कहा बसाइ, भावै त्यों करै ॥ 2 ॥ सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या । गुरु अंकुश मानै नाहिं, निर्भय है रह्या ॥ 3 ॥ तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै । तूँ राखै राखणहार, दादू तो रहै ॥ 4 ॥ ३२२. संसार की नीकी विनती । दीपचन्दी ताल निरंजन, कायर कंपै प्राणिया, देखि यहु दरिया । वार पार सूझै नहीं, मन मेरा डरिया ॥ टेक ॥ अति अथाह यह भौजला, आसंघ नहिं आवै । देख देख डरपै घणा, प्राणी दुख पावै ॥ 1 ॥ विष जल भरिया सागरा, सब थके सयाना । तुम बिन कहु कैसे तिरूं, मैं मूढ़ अयाना ॥ 2 ॥ आगे ही डरपै घणा, मेरी का कहिये । कर गहि काढो केशवा, पार तो लहिये ॥ 3 ॥ एक भरोसा तोर है, जे तुम होहु दयाला । दादू कहु कैसे तिरै ! तूँ तार गोपाला ॥ 4 ॥ ३२३. समर्थ उपदेश । दादरा ताल समर्थ मेरा सांइयां, सकल अघ जारै, सुख दाता मेरे प्राण का, संकोच निवारै ॥ टेक ॥ त्रिविध ताप तन की हरै, चौथे जन राखै ।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 आप समागम सेवका, साधू यूं भाखै ॥ 1 ॥ आप करै प्रतिपालना, दारुण दुख टारै। इच्छा जन की पूरवै, सब कारज सारै ॥ 2 ॥ कर्म कोटि भय भंजना, सुख मंडन सोई। मन मनोरथ पूरणा, ऐसा और न कोई ॥ 3 ॥ ऐसा और न देखिहौं, सब पूरण कामा। दादू साधु संगी किये, उन आतम रामा ॥ 4 ॥ 324. (गुजराती) मन स्थिरार्थ विनती । त्रिताल तुम बिन राम कवन कलि मांही, विषिया थैं कोइ वारे रे। मुनियर मोटा मनवैं बाह्या, येन्हा कौन मनोरथ मारे रे ॥ टेक ॥ छिन एकैं मनवो मर्कट माहरो, घर घरबार नचावे रे। छिन एकैं मनवो चंचल माहरो, छिन एकैं घरमां आवे रे ॥ 1 ॥ छिन एकैं मनवो मीन अम्हारो, सचराचर मां धाये रे। छिन एकैं मनवो उदमद मातो, स्वादैं लागो खाये रे ॥ 2 ॥ छिन एकैं मनवो ज्योति पतंगा, भ्रम भ्रम स्वादैं दाझे रे। छिन एकैं मनवो लोभैं लागो, आपा पर में बाझे रे ॥ 3 ॥ छिन एकैं मनवो कुंजर माहरो, वन वन मांहिं भ्रमाड़े रे। छिन एकैं मनवो कामी माहरो, विषिया रंग रमाड़े रे ॥ 4 ॥ छिन एकैं मनवो मिरग अम्हारो, नादैं मोह्यो जाये रे। छिन एकैं मनवो माया रातो, छिन एकैं हमनें बाहे रे ॥ 5 ॥ छिन एकैं मनवो भँवर अम्हारो, बासैं कंवल बँधाणें रे। छिन एकैं मनवो चहुँ दिशि जाये, मनवा नें कोई आणें रे ॥ 6 ॥ तुम बिन राखै कौन विधाता, मुनिवर साखी आणें रे। दादू मृतक छिन में जीवे, मनवा चरित न जाणें रे ॥ 7 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 325. बेखर्च व्यसनी । ब्रह्म ताल करणी पोच, सोच सुख करई, लौह की नाव कैसे भौजल तिरई ॥ टेक ॥ दक्षिण जात पश्चिम कैसे आवै, नैन बिन भूल बाट कित पावै ॥ 1 ॥ विष वन बेलि, अमृत फल चाहै, खाइ हलाहल, अमर उमाहै ॥ 2 ॥ अग्नि गृह पैसि कर सुख क्यों सोवै, जलन लागी घणी, सीत क्यों होवै ॥ 3 ॥ पाप पाखंड कीये, पुण्य क्यों पाइये, कूप खन पड़िबा, गगन क्यों जाइये ॥ 4 ॥ कहै दादू मोहि अचरज भारी, हिरदै कपट क्यों मिलै मुरारी ॥ 5 ॥ 326. परिचय प्राप्ति । खेमटा ताल मेरा मन के मन सौं मन लागा, शब्द के शब्द सौं नाद बागा ॥ टेक ॥ श्रवण के श्रवण सुन सुख पाया, नैन के नैन सौं निरख राया ॥ 1 ॥ प्राण के प्राण सौं खेल प्राणी, मुख के मुख सौं बोल वाणी ॥ 2 ॥ जीव के जीव सौं रंग राता, चित्त के चित्त सौं प्रेम माता ॥ 3 ॥ शीश के शीश सौं शीश मेरा, देखि रे दादू वा भाग तेरा ॥ 4 ॥ 327. मन को उपदेश । त्रिताल मल्हार में मेरे शिखर चढ़ बोल मन मोरा, राम जल वर्षे शब्द सुण तोरा ॥ टेक ॥ आरत आतुर पीव पुकारै, सोवत जागत पंथ निहारै ॥ 1 ॥ निशवासर कह अमृत वाणी, राम नाम ल्यौ लाइ ले प्राणी ॥ 2 ॥ टेर मन भाई, जब लग जीवे, प्रीति कर गाढ़ी प्रेम रस पीवे ॥ 3 ॥ दादू अवसर जे जन जागे, राम घटा-जल वरषण लागे ॥ 4 ॥ 328. वैराग्य उपदेश त्रिताल नारी नेह न कीजिये, जे तुझ राम पियारा, माया मोह न बंधिये, तजिये संसारा ॥ टेक ॥ विषिया रंग राचै नहीं, नहीं करै पसारा।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 देह गेह परिवार में, सब तैं रहै नियारा ॥ 1 ॥ आपा पर उरझै नहीं, नाहीं मैं मेरा। मनसा वाचा कर्मना, सांई सब तेरा ॥ 2 ॥ मन इन्द्रिय स्थिर करे, कतहूं नहिं डोले। जग विकार सब परिहरे, मिथ्या नहिं बोले ॥ 3 ॥ रहे निरंतर राम सौं, अंतरगति राता। गावे गुण गोविन्द का, दादू रस माता ॥ 4 ॥ 329. आज्ञाकारी । झपताल तूं राखै त्यों ही रहैं, तेई जन तेरा। तुम्ह बिन और न जानहीं, सो सेवक नेरा ॥ टेक ॥ अम्बर आपै ही धन्या, अजहूँ उपकारी। धरती धारी आप तैं, सबही सुखकारी ॥ 1 ॥ पवन पास सब के चलै, जैसे तुम कीन्हा। पानी परकट देखिहूँ, सब सौं रहै भीना ॥ 2 ॥ चंद चिराकी चहुँ दिशा, सब शीतल जानै। सूरज भी सेवा करै, जैसे भल मानै ॥ 3 ॥ ये निज सेवक तेरड़े, सब आज्ञाकारी। मोको ऐसे कीजिये, दादू बलिहारी ॥ 4 ॥ 330. निन्दक । झपताल निदंक बाबा बीर हमारा, बिनही कौड़े बहै बिचारा ॥ टेक ॥ कर्म कोटि के कश्मल काटे, काज सँवारै बिन ही साटे ॥ 1 ॥ आपण डूबै और को तारे, ऐसा प्रीतम पार उतारे ॥ 2 ॥ जुग जुग जीवो निन्दक मोरा, राम देव तुम करो निहोरा ॥ 3 ॥ निदंक बपुरा पर उपकारी, दादू निंदा करै हमारी ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 ३३१. विरह विनती । शूलताल देहुजी, देहुजी, प्रेम पियाला देहुजी, देकर बहुरि न लेहुजी ॥ टेक ॥ ज्यों-ज्यों नूर न देखूं तेरा, त्यों-त्यों जियरा तलफै मेरा ॥ 1 ॥ अमी महारस नाम न आवै, त्यों-त्यों प्राण बहुत दुख पावै ॥ 2 ॥ प्रेम भक्ति रस पावै नाँहीं, त्यों-त्यों सालै मन ही मांहीं ॥ 3 ॥ सेज सुहाग सदा सुख दीजे, दादू दुखिया विलम्ब न कीजे ॥ 4 ॥ ३३२. परिचय विनती । त्रिताल वर्षहु राम अमृतधारा, झिलमिल झिलमिल सींचनहारा ॥ टेक ॥ प्राण बेलि निज नीर न पावै, जलहर बिना कमल कुम्हलावै ॥ 1 ॥ सूखे बेली सकल बनराय, राम देव जल वर्षहु आय ॥ 2 ॥ आतम बेली मरै पियास, नीर न पावै दादूदास ॥ 3 ॥ इति राग गुंड सम्पूर्ण: ॥ 20 ॥ पद 20 ॥
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राग बिलावल www.dadooram.org अथ राग बिलावल २१ (गायन समय प्रातः 6 से 9) ३३३. परिचय विनती । त्रिताल दया तुम्हारी दर्शन पड्ये । जानत हो तुम अंतरजामी, जानराय तुम सौं कहा कहिये ॥ टेक ॥ तुम सौं कहा चतुराई कीजै, कौण कर्म कर तुम पाये । को नहीं मिले प्राण बल अपने, दया तुम्हारी तुम आये ॥ 1 ॥ कहा हमारो आन तुम आगे, कौन कला कर वश किये । जीते कौन बुद्धि बल पौरुष, रुचि अपनी तैं सरण लिये ॥ 2 ॥ तुम ही आदि अंत पुनि तुम ही, तुम कर्ता त्रय लोक मंझार । कुछ नांही तैं कहा होत है, दादू बलि पावे दीदार ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
३३४. (फारसी) विनती । उदीक्षण ताल मालिक महरबान करीम । गुनहगार हररोज हरदम, पन्ह राख रहीम ॥ टेक ॥ अव्वल आखिर बंदा गुनही, अमल बद विसियार । गरक दुनिया सत्तार साहिब, दरदवंद पुकार ॥ 1 ॥ फरामोश नेकी बदी करद, बुराई बद फैल । बख्शिन्दः तूँ अजीब आखिर, हुक्म हाजिर सैल ॥ 2 ॥ नाम नेक रहीम राजिक, पाक परवरदिगार । गुनह फिल कर देहु दादू, तलब दर दीदार ॥ 3 ॥ ३३५. उदीक्षण ताल कौण आदमी कमीण विचारा, किसको पूजे गरीब पियारा ॥ टेक ॥ मैं जन एक, अनेक पसारा, भौजल भरिया अधिक अपारा ॥ 1 ॥ एक होइ तो कहि समझाऊँ, अनेक अरूझे क्यों सुरझाऊँ ॥ 2 ॥ मैं हौं निबल, सबल ये सारे, क्यों कर पूजूं बहुत पसारे ॥ 3 ॥ पीव पुकारूं समझत नाहीं, दादू देखु दशों दिशि जाहीं ॥ 4 ॥ ३३६. उपदेश चेतावनी । भंगताल जागहु जियरा काहे सोवे, सेव करीमा तो सुख होवै ॥ टेक ॥ जातैं जीवन सो तैं विसारा, पच्छिम जाना पथ न संवारा । मैं मेरी कर बहुत भुलाना, अजहुँ न चेतै दूर पयाना ॥ 1 ॥ सांई केरी सेवा नाँहीं, फिर फिर डूबै दरिया मांहीं । ओर न आवा, पार न पावा, झूठा जीवन बहुत भुलावा ॥ 2 ॥ मूल न राख्या लाह न लीया, कौड़ी बदले हीरा दीया । फिर पछताना संबल नाहीं, हार चल्या क्यों पावै सांई ॥ 3 ॥ इब सुख कारण फिर दुख पावै, अजहुँ न चेतै क्यों दहकावै ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 दादू कहै सीख सुन मेरी, कहु करीम संभाल सबेरी ॥ 4 ॥ 337. भंगताल बार बार तन नहीं वावरे, काहे को बाद गँवावै रे । बिनसत बार कछू नहिं लागै, बहुरि कहाँ को पावै रे ॥ टेक ॥ तेरे भाग बड़े भाव धर कीन्हाँ, क्यों कर चित्र बनावै रे । सो तूँ लेइ विषय में डारे, कंचन छार मिलावै रे ॥ 1 ॥ तूँ मत जानै बहुरि पाइये, अब कै जनि डहिकावै रे । तीनि लोक की पूँजी तेरे, बनिज बेगि सो आवै रे ॥ 2 ॥ जब लग घट मैं श्वास वास है, तब लग काहे न ध्यावै रे । दादू तन धर नाम न लीन्हा, सो प्राणी पछतावै रे ॥ 3 ॥ 338. ललित ताल राम विसार्यो रे जगनाथ । हीरा हार्यो देखत ही रे, कौड़ी कीन्ही हाथ ॥ टेक ॥ काचहुता कंचन कर जानै, भूल्यो रे भ्रम पास । साचे सौं पल परिचय नाहीं, कर काचे की आस ॥ 1 ॥ विष ताको अमृत कर जानै, सो संग न आवै साथ । सेमल के फूलन पर फूल्यो, चूक्यो अब की घात ॥ 2 ॥ हरि भज रे मन सहज पिछानै, ये सुन साची बात । दादू रे अब तैं कर लीजै, आयु घटै दिन जात ॥ 3 ॥ 339. मन । ललित ताल मन चंचल मेरो कह्यो न मानै, दसों दिशा दौरावै रे । आवत जात बार नहि लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥ टेक ॥ बेर बेर बरजत या मन को, किंचित सीख न मानै रे ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 ऐसे निकस जाइ या तन तैं, जैसे जीव न जानै रे ॥ 1 ॥ कोटिक जतन करत या मन को, निश्चल निमष न होई रे । चंचल चपल चहुँ दिशि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥ 2 ॥ सदा सोच रहत घट भीतर, मन थिर कैसे कीजे रे । सहजैं सहज साधु की संगति, दादू हरि भजि लीजे रे ॥ 3 ॥ ३४०. माया । उत्सव ताल इन कामिनी घर घाले रे । प्रीति लगाइ प्राण सब सोषै, बिन पावक जिय जाले रे ॥ टेक ॥ अंग लगाइ सार सब लेवै, इनतैं कोई न बाचै रे । यहु संसार जीत सब लीया, मिलन न देई साचै रे ॥ 1 ॥ हेत लगाइ सबै धन लेवै, बाकी कछु न राखै रे । माखन मांहि सोध सब लेवै, छाछ छिया कर नाखै रे ॥ 2 ॥ जे जन जानि जुगति सौं त्यागैं, तिन को निज पद परसै रे । काल न खाइ, मरै नहिं कबहुँ, दादू तिनको दरशै रे ॥ 3 ॥ ३४१. विश्वास । उत्सव ताल जनि सत छाड़ै बावरे, पूरक है पूरा । सिरजे की सब चिन्त है, देबे को सूरा ॥ टेक ॥ गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा । युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥ 1 ॥ कुंज कहाँ धर संचरै, तहाँ को रखवारा । हिमहर तैं जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥ 2 ॥ जल थल जीव जिते रहैं, सो सब को पूरै । संपट सिला में देत है, काहे नर झूरै ॥ 3 ॥ जिन यहु भार उठाइया, निर्वाहै सोई ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
दादू छिन न बिसारिये, तातैं जीवन होई ॥ 4 ॥ 342. गजताल सोई राम सँभाल जियरा, प्राण पिंड जिन दीन्हा रे । अम्बर आप उपावनहारा, मांहि चित्र जिन कीन्हा रे ।। टेक ।। चंद सूर जिन किये चिराका, चरणों बिना चलावै रे । इक शीतल इक तारा डोलै, अनन्त कला दिखलावै रे ।। 1 ।। धरती धरनि वरन बहु वाणी, रचिले सप्त समंदा रे । जल थल जीव सँभालनहारा, पूर रह्या सब संगा रे ।। 2 ।। प्रकट पवन पानी जिन कीन्हा, वरषावै बहु धारा रे । अठारह भार वृक्ष बहु विधि के, सबका सींचनहारा रे ।। 3 ।। पाँच तत्त्व जिन किये पसारा, सब करि देखन लागा रे । निश्चल राम जपो मेरे जियरा, दादू तातैं जागा रे ।। 4 ।। 343. परिचय । गज ताल जब मैं रहते की रह जानी । क ाल काया के निकट न आवै, पावत है सुख प्राणी ।। टेक ।। शोक संताप नैन नहिं देखूं, राग द्वेष नहिं आवै । जागत है जासों रुचि मेरी, स्वप्नै सोइ दिखावै ।। 1 ।। भरम कर्म मोह नहिं ममता, वाद विवाद न जानूं । मोहन सौं मेरी बन आई, रसना सोई बखानूं ।। 2 ।। निशिवासर मोहन तन मेरे, चरण कँवल मन जानै । निधि निरख देख सचु पाऊँ, दादू और न जानै ।। 3 ।। 344. राज मृगांक ताल जब मैं साँचे की सुधि पाई ।
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तब तैं अंग और नहीं आवै, देखत हूँ सुखदाई ॥ टेक ॥ ता दिन तैं तन ताप न व्यापै, सुख दुख संग न जाऊँ । पावन पीव परस पद लीन्हा, आनंद भर गुन गाऊँ ॥ 1 ॥ सब सौं संग नहीं पुनि मेरे, अरस परस कुछ नाँहीं । एक अनंत सोई संग मेरे, निरखत हूँ निज मांहीं ॥ 2 ॥ तन मन मांहिं शोध सो लीन्हा, निरखत हूँ निज सारा । सोई संग सबै सुखदाई, दादू भाग्य हमारा ॥ 3 ॥ 345. सच निदान । राज मृगांक ताल हरि बिन निहचल कहीं न देखूं, तीन लोक फिरि सोधा रे । जे दीसै सो विनश जायगा, ऐसा गुरु परमोधा रे ॥ टेक ॥ धरती गगन पवन अरु पानी, चंद सूर थिर नाँहीं रे । रैनि दिवस रहत नहिं दीसै, एक रहै कलि मांहीं रे ॥ 1 ॥ पीर पैगम्बर शेख मुशायख, शिव विरंचि सब देवा रे । कलि आया सो कोई न रहसी, रहसी अलख अभेवा रे ॥ 2 ॥ सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, समंद न रहसी थीरा रे । नदी निवान कछू नहिं दीसै, रहसी अकल शरीरा रे ॥ 3 ॥ अविनाशी वह एक रहेगा, जिन यहु सब कुछ कीन्हा रे । दादू जाता सब जग देखूं, एक रहत सो चीन्हा रे ॥ 4 ॥ 346. पतिव्रत । राज विद्याधर ताल मूल सींच बधै ज्यों बेला, सो तत तरुवर रहै अकेला ॥ टेक ॥ देवी देखत फिरै ज्यों भूलै, खाइ हलाहल विष को फूलै । सुख को चाहे पड़ै गल फाँसी, देखत हीरा हाथ तैं जासी ॥ 1 ॥ केई पूजा रच ध्यान लगावैं, देवल देखें खबर न पावैं । तोरैं पाती जुगति न जानी, इहि भ्रम भूल रहै अभिमानी ॥ 2 ॥
श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 तीर्थ व्रत न पूजै आसा, वन खंड जाहिं रहैं उदासा । यूं तप कर-कर देह जलावैं, भरमत डोलैं जन्म गवावैं ॥ ३ ॥ सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई । तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥ 4 ॥ 347. साधु परीक्षा । दादरा सोई साधु शिरोमणि, गोविंद गुण गावै । राम भजै विषिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक॥ मिथ्या मुख बोलै नहीं, पर निंदा नाँहीं । औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद माहीं ॥ 1 ॥ निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै । सुखदाई समता गहै, आपा नहीं आनै ॥ 2 ॥ आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा । सतवादी साचा कहै, लै लीन विचारा ॥ 3 ॥ निर्भय भज न्यारा रहै, काहू लिप्त न होई । दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ 4 ॥ 348. परिचय परीक्षा । पतिताल राम मिल्या यूँ जानिये, जाको काल न व्यापै । जरा मरण ताको नहीं, अरु मेटै आपै ॥ टेक ॥ सुख दुख कबहूँ न ऊपजै, अरु सब जग सूझै । क रम को बाँधै नहीं, सब आगम बूझै ॥ 1 ॥ जागत है सो जन रहै, अरु जुग जुग जागै । अंतरजामी सौं रहै, कछु काई न लागै ॥ 2 ॥ काम दहै सहजैं रहै, अरु शून्य विचारै । दादू सो सब की लहै, अरु कबहूं न हारै ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 ३४९. समता ज्ञान । त्रिताल इन बातनि मेरा मन मानै । दुतिया दोइ नहीं उर अंतर, एक एक कर पीव कौं जानै ॥ टेक ॥ पूर्ण ब्रह्म देखै सबहिन में, भ्रम न जीव काहू तैं आनै । होइ दयालु दीनता सब सौं, अरि पाँचनि को करै किसानै ॥ 1 ॥ आपा पर सम सब तत चीन्हैं, हरि भजै केवल जस गानै । दादू सोई सहज घर आनै, संकट सबै जीव के भानै ॥ 2 ॥ ३५०. परिचय । एक ताल ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं । पीव बिन पलहि न जीव सौं, यह उपजै मांहीं ॥ टेक ॥ देख देख सुख जीव सौं, तहँ धूप न छाहीं । अजरावर मन बंधिया, तातैं अनत न जाहीं ॥ 1 ॥ तेज पुंज फल पाइया, तहाँ रस खाहीं । अमर बेलि अमृत झरै, पीव पीव अघाहीं ॥ 2 ॥ प्राणपति तहँ पाइया, जहाँ उलट समाई । दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥ 3 ॥ ३५१. त्रिताल आज प्रभात मिले हरि लाल । दिल की व्यथा पीड़ सब भागी, मिट्यो जीव को साल ॥ टेक ॥ देखत नैन संतोष भयो है, इहै तुम्हारो ख्याल ॥ 1 ॥ दादू जन सौं हिल-मिल रहिबो, तुम हो दीन दयाल ॥ 2 ॥ ३५२. (सिंधी) निज स्थान निर्णय । उपदेश एकताल अर्श इलाही रब्बदा, इथांई रहमान वे ।
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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 मक्का बीचि मुसाफरीला, मदीना मुलतान वे ॥ टेक ॥ नबी नाल पैगम्बरे, पीरों हंदा थान वे । जन तहुँ ले हिकसा ला, इथां बहिश्त मुकाम वे ॥ 1 ॥ इथां आब जमजमा, इथांई सुबहान वे । तख्त रबानी कंगुरेला, इथांई सुलतान वे ॥ 2 ॥ सब इथां अंदर आव वे, इथांई ईमान वे । दादू आप वंजाइ बेला, इथांई आसान वे ॥ 3 ॥ 353. (पंजाबी) क्रीड़ा ताल खंडनि आसण रमदा रामदा, हरि इथां अविगत आप वे । काया काशी वंजणां, हरि इथैं पूजा जाप वे ॥ टेक ॥ महादेव मुनि देवते, सिद्धैंदा विश्राम वे । स्वर्ग सुखासण हुलणैं, हरि इथैं आत्माराम वे ॥ 1 ॥ अमी सरोवर आतमा, इथांई आधार वे । अमर थान अविगत रहै, हरि इथैं सिरजनहार वे ॥ 2 ॥ सब कुछ इथैं आव वे, इथां परमानन्द वे । दादू आपा दूर कर, इथांई आनंद वे ॥ 3 ॥ इति राग बिलावल सम्पूर्णः ॥ 21 ॥ पद 20 ॥ दादूराम सत्यराम
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राग सूहा अथ राग सूहा २२ (गायन समय दिन 9 से 12) 354. विनती । एक ताल तुम बिच अंतर जनि परै, माधव ! भावै तन धन लेहु । भावै स्वर्ग नरक रसातल, भावै करवत देहु ॥ टेक ॥ भावै विपति देहु दुख संकट, भावै संपति सुख शरीर । भावै घर वन राव रंक कर, भावै सागर तीर, माधव ॥ 1 ॥ भावै बँध मुक्त कर, माधव ! भावै त्रिभुवन सार । भावै सकल दोष धर माधव, भावै सकल निवार, माधव ॥ 2 ॥ भावै धरणि गगन धर, माधव ! भावै शीतल सूर । दादू निकटि सदा संग, माधव ! तूँ जनि होवै दूर, माधव ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सूहा 22 ३55. परिचय । पंजाबी त्रिताल अब हम राम सनेही पाया, अगम अनहद सौं चित लाया ॥ टेक ॥ तन मन आतम ताकों दीन्हा, तब हरि हम अपना कर लीन्हा। वाणी विमल पाँच परानां, पहिली शीश मिले भगवानां ॥ 1 ॥ जीवत जन्म सुफल कर लीन्हा, पहली चेते तिन भल कीन्हा। अवसर आपा ठौर लगावा, दादू जीवित ले पहुँचावा ॥ 2 ॥ इति राग सूहा सम्पूर्णः ॥ 22 ॥ पद 2 ॥ दादूराम सत्यराम
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कायाबेली ग्रंथ www.dadooram.org अथ काया बेली ग्रन्थ २३ ३५६. पिंड ब्रह्माण्ड शोधन । पंजाबी त्रिताल साचा सतगुरु राम मिलावे, सब कुछ काया मांहि दिखावे ॥ टेक ॥ काया माँही सिरजनहार, काया माँही ओंकार। काया माँही है आकाश, काया माँही धरती पास ॥ १ ॥ काया माँही पवन प्रकाश, काया माँही नीर निवास । काया माँही शशिहर सूर, काया माँही बाजे तूर ॥ २ ॥ काया माँही तीनों देव, काया माँही अलख अभेव । काया माँही चारों वेद, काया माँही पाया भेद ॥ ३ ॥ काया माँही चारों खानी, काया माँही चारों वाणी । काया माँही उपजै आइ, काया माँही मर मर जाइ ॥ ४ ॥ काया माँही जामै मरै, काया माँही चौरासी फिरै । काया माँही ले अवतार, काया माँही बारम्बार ॥ ५ ॥
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