भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० १० ]चतुर्थ स्कन्ध४४५
संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
दृष्ट्वा तमागतं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः।<br>प्रणम्य परया भक्त्या प्राञ्जलिः प्रत्युवाच ह॥ ५१वहाँ उन्हें आये हुए देखकर हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लाद बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहने लगे॥ ५१॥
प्रह्लाद उवाच<br>देवदेव जगन्नाथ भक्तवत्सल माधव।<br>कथं न जितवानाजावहमेतौ तपस्विनौ।<br>संग्रामस्तु मया देव कृतः पूर्णं शतं समाः॥ ५२<br>सुराणां न जितौ कस्मादिति मे विस्मयो महान्।प्रह्लाद बोले— हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे भक्तवत्सल! हे माधव! मैं इन दोनों तपस्वियोंको युद्धमें क्यों नहीं जीत सका? हे देव! मैंने देवताओंके पूरे सौ वर्षतक इनके साथ युद्ध किया, फिर भी ये जीते न जा सके—मुझे यह महान् आश्चर्य है!॥ ५२ १/२ ॥
विष्णुरुवाच<br>सिद्धाविमौ मदंशौ च विस्मयः कोऽत्र मारिष॥ ५३<br>तापसौ न जितात्मानौ नरनारायणौ जितौ।<br>गच्छ त्वं वितलं राजन् कुरु भक्तिं ममाचलाम्॥ ५४<br>नाभ्यां कुरु विरोधं त्वं तापसाभ्यां महामते।विष्णु बोले— हे आर्य! ये दोनों सिद्ध पुरुष हैं और मेरे अंशसे आविर्भूत हैं; अतः [इन्हें न जीत पानेमें] आश्चर्य क्या! नर-नारायण नामसे प्रसिद्ध इन जितात्मा तपस्वियोंको तुम नहीं जीत सकते। अतः हे राजन्! तुम अपने वितललोकको चले जाओ और वहाँ मेरी अविचल भक्ति करो। हे महामते! तुम इन दोनों तपस्वियोंसे विरोध मत करो॥ ५३-५४ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इत्याज्ञप्तो दैत्यराजो निर्ययावसुरैः सह॥ ५५<br>नरनारायणौ भूयस्तपोयुक्तौ बभूवतुः॥ ५६व्यासजी बोले— भगवान् विष्णुसे ऐसी आज्ञा पाकर दैत्यपति प्रह्लाद असुरोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हो गये। तदनन्तर नर-नारायण पुनः तपस्यामें संलग्न हो गये॥ ५५-५६॥

iti श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादनारायणयोर्युद्धे विष्णोरागमनवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥


अथ दशमोऽध्यायः

राजा जनमेजयद्वारा प्रह्लादके साथ नर-नारायणके युद्धका कारण पूछना, व्यासजीद्वारा उत्तरमें संसारके मूल कारण अहंकारका निरूपण करना तथा महर्षि भृगुद्वारा भगवान् विष्णुको शाप देनेकी कथा

संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
जनमेजय उवाच<br>सन्देहोऽयं महानत्र पाराशर्य कथानके।<br>नरनारायणौ शान्तौ वैष्णवांशौ तपोधनौ॥ १<br><br>तीर्थाश्रयौ सत्त्वयुक्तौ वन्याशनपरौ सदा।<br>धर्मपुत्रौ महात्मानौ तापसौ सत्यसंस्थितौ॥ २<br><br>कथं रागसमायुक्तौ जातौ युद्धे परस्परम्।<br>संग्रामं चक्रतुः कस्मात्त्यक्त्वा तपमनुत्तमम्॥ ३जनमेजय बोले— हे व्यासजी! इस कथानकमें मुझे यह महान् संशय हो रहा है कि जब वे नर-नारायण शान्तस्वभाव, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, तपको ही अपना सर्वस्व माननेवाले, तीर्थमें निवास करनेवाले, सत्त्वगुणसम्पन्न, वनके फल-मूलका सदा आहार करनेवाले, धर्मपुत्र, महात्मा, तपस्वी तथा सत्यनिष्ठ थे; तब वे युद्धमें परस्पर राग-द्वेषसे ग्रस्त कैसे हो गये और उन्होंने उत्कृष्ट तपस्याका त्याग करके संग्राम क्यों किया?॥ १-३॥
४४६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १०
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रह्लादेन समं पूर्णं दिव्यवर्षशतं किल।<br>हित्वा शान्तिसुखं युद्धं कृतवन्तौ कथं मुनी॥ ४उन दोनों मुनियोंने शान्ति-सुखका त्याग करके प्रह्लादके साथ पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक युद्ध किसलिये किया?॥ ४॥
कथं तौ चक्रतुर्युद्धं प्रह्लादेन समं मुनी।<br>कथयस्व महाभाग कारणं विग्रहस्य वै॥ ५उन दोनों मुनियोंने प्रह्लादके साथ वह संग्राम क्यों किया? हे महाभाग! आप मुझे उस युद्धका कारण बताइये॥ ५॥
(कामिनी कनकं कार्यं कारणं विग्रहस्य वै)<br>युद्धबुद्धिः कथं जाता तयोश्च तद्विरक्तयोः।<br>तथाविधं तपस्तप्तं ताभ्याञ्च केन हेतुना॥ ६<br><br>मोहार्थं सुखभोगार्थं स्वर्गार्थं वा परन्तप।<br>कृतमत्युत्कटं ताभ्यां तपः सर्वफलप्रदम्॥ ७<br><br>मुनिभ्यां शान्तचित्ताभ्यां प्राप्तं किं फलमद्भुतम्।<br>तपसा पीडितो देहः संग्रामेण पुनः पुनः॥ ८<br><br>दिव्यवर्षशतं पूर्णं श्रमेण परिपीडितौ।<br>न राज्यार्थे धने वापि न दारेषु गृहेषु च॥ ९<br><br>किमर्थं तु कृतं युद्धं ताभ्यां तेन महात्मना।(स्त्री, धन तथा कोई कार्यविशेष ही प्रायः युद्धके कारण होते हैं।) उन विरक्त मुनियोंको युद्धका विचार क्यों उत्पन्न हुआ? हे परन्तप! उन्होंने उस प्रकारका तप किसीको प्रसन्न करनेके लिये, सुखभोगके लिये अथवा स्वर्गके लिये—किस उद्देश्यसे किया था? शान्त चित्तवाले उन मुनियोंने समस्त फल प्रदान करनेवाला कठोर तप तो किया था, किंतु उन्होंने कौन-सा अद्भुत फल प्राप्त किया? उन्होंने तपस्यासे शरीरको कष्ट दिया और पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक बार-बार संग्राम करके परिश्रमके द्वारा अपनेको संतप्त किया। उन मुनियोंने न राज्यके लिये, न धनके लिये, न स्त्रीके लिये और न तो गृहके लिये ही यह युद्ध किया तो फिर उन्होंने महात्मा प्रह्लादके साथ किसलिये युद्ध किया?॥ ६–९ १/२॥
निरीहः पुरुषः कस्मात्कुर्याद्युद्धमीदृशम्॥ १०<br><br>दुःखदं सर्वथा देहे जानन्धर्मं सनातनम्।<br>सुबुद्धिः सुखदानीह कर्माणि कुरुते सदा॥ ११<br><br>न दुःखदानि धर्मज्ञ स्थितिरेषा सनातनी।<br>धर्मपुत्रौ हरेरंशौ सर्वज्ञौ सर्वभूषितौ॥ १२<br><br>कृतवन्तौ कथं युद्धं दुःखं धर्मविनाशकम्।<br>त्यक्त्वा तपः समाधीतं सुखारामं महत्फलम्॥ १३<br><br>संयुगं दारुणं कृष्ण नैव मूर्खोऽपि वाञ्छति।युद्ध शरीरके लिये कष्टदायक होता है—इस सनातन बातको जानते हुए कोई तृणारहित पुरुष आखिर ऐसा युद्ध किसलिये करेगा? हे धर्मज्ञ! उत्तम बुद्धिवाला मनुष्य इस लोकमें सदा सुखदायी कर्म ही करता है, दुःखप्रद कर्म नहीं—यह सनातन सिद्धान्त है। तब धर्मपुत्र, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, सर्वज्ञ तथा सभी गुणोंसे विभूषित उन मुनियोंने वह दुःखदायक तथा धर्मविनाशक युद्ध क्यों किया? हे व्यासजी! कोई मूर्ख भी अच्छी प्रकार आचरित, सुख तथा आनन्द देनेवाले और महाफलदायी तपका त्याग करके दारुण युद्ध करना नहीं चाहता॥ १०–१३ १/२॥
श्रुतो मया ययातिस्तु च्युतः स्वर्गान्महीपतिः॥ १४<br><br>अहङ्कारभवात्पापात्पातितः पृथिवीतले।<br>यज्ञकृद्दानकर्ता च धार्मिकः पृथिवीपतिः॥ १५मैंने सुना है कि राजा ययाति स्वर्गसे च्युत हो गये थे। अहंकारजन्य पापके कारण वे पृथवीतलपर गिरा दिये गये थे। वे यज्ञकर्ता, दानी और धर्मनिष्ठ थे; किंतु केवल थोड़ेसे अहंकारभरे शब्दोंका उच्चारण करनेके कारण वज्रपाणि इन्द्रने उन्हें [स्वर्गसे पृथ्वीपर] गिरा दिया था। यह निश्चित है कि बिना अहंकारके

| अ० १० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४४७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शब्दोच्चारणमात्रेण पातितो वज्रपाणिना।<br>अहङ्कारमृते युद्धं न भवत्येव निश्चयः॥ १६युद्ध हो ही नहीं सकता। अन्ततः मुनिको उस युद्धका क्या फल मिला, उससे तो केवल उनका पुण्य ही नष्ट हुआ॥ १४—१६ १/२ ॥
किं फलं तस्य युद्धस्य मुनेः पुण्यविनाशनम्।<br><br>व्यास उवाच<br>राजन् संसारमूलं हि त्रिविधः परिकीर्तितः॥ १७<br><br>अहङ्कारस्तु सर्वज्ञैर्मुनिभिर्धर्मनिश्चये।<br>स कथं मुनिना त्यक्तुं योग्यो देहभृता किल॥ १८<br><br>कारणेन विना कार्यं न भवत्येव निश्चयः।**व्यासजी बोले—**हे राजन्! धर्मका निर्णय करते समय सर्वज्ञ मुनियोंने अहंकारको ही संसारका मूल कारण कहा है और इसे [सत्त्वादि भेदसे] तीन प्रकारका बतलाया है। [ऐसी स्थितिमें] शरीरधारी होकर मुनि नारायण उस अहंकारका त्याग करनेमें कैसे समर्थ हो सकते थे? यह निश्चित है कि बिना कारणके कार्य नहीं होता॥ १७–१८ १/२ ॥
तपो दानं तथा यज्ञाः सात्त्विकात्प्रभवन्ति ते॥ १९<br><br>राजसाद्वा महाभाग तामसात्कलहस्तथा।<br>क्रिया स्वल्पापि राजेन्द्र नाहङ्कारं विना क्वचित्॥ २०<br><br>शुभा वाप्यशुभा वापि प्रभवत्यपि निश्चयः।<br>अहङ्काराद् बन्धकारी नान्योऽस्ति जगतीतले॥ २१<br><br>येनेदं रचितं विश्वं कथं तद्रहितं भवेत्।तप, दान तथा यज्ञ सात्त्विक अहंकारसे होते हैं। हे महाभाग! राजस और तामस अहंकारसे कलह उत्पन्न होता है। हे राजेन्द्र! यह निश्चय है कि छोटी-सी भी क्रिया चाहे वह शुभ हो अथवा अशुभ—बिना अहंकारके कभी नहीं हो सकती। जगत्में अहंकारसे बढ़कर बन्धनमें डालनेवाला दूसरा कोई पदार्थ नहीं है। अतः जिस अहंकारसे ही यह विश्व निर्मित है, उसके बिना यह संसार कैसे रह सकता है?॥ १९—२१ १/२ ॥
ब्रह्मा रुद्रस्तथा विष्णुरहङ्कारयुतास्त्वमी॥ २२<br><br>अन्येषां चैव का वार्ता मुनीनां वसुधाधिप।<br>अहङ्कारावृतं विश्वं भ्रमतीदं चराचरम्॥ २३<br><br>पुनर्जन्म पुनर्मृत्युः सर्वं कर्मवशानुगम्।<br>देवतिर्यङ्मनुष्याणां संसारेऽस्मिन्महीपते॥ २४<br><br>रथाङ्गवदसर्वार्थं भ्रमणं सर्वदा स्मृतम्।हे पृथिवीपते! जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी अहंकारयुक्त रहते हैं, तब अन्य प्राणियों और मुनियोंकी बात ही क्या? यह चराचर जगत् अहंकारके वशीभूत होकर भ्रमण करता रहता है। सभी जीव कर्मके अधीन हैं और उसीके अनुसार बार-बार उनका जन्म तथा मरण होता रहता है। हे महीपते! देवता, मनुष्य और पशु-पक्षियोंका इस संसारमें बराबर चक्कर काटना रथके पहियेके भ्रमणके समान बताया गया है॥ २२—२४ १/२ ॥
विष्णोरप्यवताराणां संख्यां जानाति कः पुमान्॥ २५<br><br>विततेऽस्मिंस्तु संसारे उत्तमाधमयोनिषु।<br>नारायणो हरिः साक्षान्मात्स्यं वपुराश्रितः॥ २६<br><br>कामठं सौकरं चैव नारसिंहञ्च वामनम्।<br>युगे युगे जगन्नाथो वासुदेवो जनार्दनः॥ २७<br><br>अवतारानासंख्यातान्करोति विधियन्त्रितः।इस विस्तृत संसारमें उत्तम–अधम सभी योनियोंमें भगवान् विष्णुके अवतारोंकी संख्या कौन मनुष्य जान सकता है? साक्षात् नारायण श्रीहरिको मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह और वामनतकका शरीर धारण करना पड़ा। वे जगत्प्रभु, वासुदेव, भगवान् जनार्दन भी विधिके अधीन होकर विभिन्न युगोंमें असंख्य अवतार धारण करते रहते हैं॥ २५—२७ १/२ ॥

| ४४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वैवस्वते महाराज सप्तमे भगवान्हरिः ॥ २८<br>मन्वन्तरेऽवताराग्वै चक्रे ताञ्छृणु तत्त्वतः।<br>भृगुशापान्महाराज विष्णुर्देववरः प्रभुः ॥ २९<br>अवताराननेकांस्तु कृतवानखिलेश्वरः।हे महाराज! सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें भगवान् श्रीहरिने जो-जो अवतार लिये थे, उन्हें आप ध्यानपूर्वक सुनें। हे महाराज! देवश्रेष्ठ और सबके स्वामी भगवान् विष्णुको महर्षि भृगुके शापके कारण अनेक अवतार धारण करने पड़े थे॥ २८-२९ १/२॥
राजोवाच<br>सन्देहोऽयं महाभाग हृदये मम जायते ॥ ३०<br>भृगुणा भगवान्विष्णुः कथं शप्तः पितामह।<br>हरिणा च मुनेस्तस्य विप्रियं किं कृतं मुने ॥ ३१<br>यद्रोषाद् भृगुणा शप्तो विष्णुर्देवनमस्कृतः।राजा बोले—हे महाभाग! हे पितामह! मेरे मनमें यह संदेह हो रहा है कि भृगुने भगवान्‌को शाप क्यों दे दिया? हे मुने! भगवान् विष्णुने उन भृगुमुनिका कौन-सा अप्रिय कार्य कर दिया था, जिससे रुष्ट होकर महर्षि भृगुने सभी देवताओं‌द्वारा नमस्कार किये जानेवाले भगवान् विष्णुको शाप दे दिया॥ ३०-३१ १/२॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजनप्रवक्ष्यामि भृगोः शापस्य कारणम् ॥ ३२<br>पुरा कश्यपदायादो हिरण्यकशिपुर्नृपः।<br>यदा तदा सुरैः सार्धं कृतं संख्यं परस्परम् ॥ ३३व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, मैं आपको भृगुके शापका कारण बताता हूँ। पूर्वकालमें कश्यपतनय हिरण्यकशिपु नामक एक राजा था। उस समय जब भी वह देवताओंके साथ परस्पर संघर्ष करने लगता था, तब युद्ध आरम्भ हो जानेपर सारा संसार व्याकुल हो उठता था॥ ३२-३३ १/२॥
कृते संख्ये जगत्सर्वं व्याकुलं समजायत।<br>हते तस्मिन्नृपे राजा प्रह्लादः समजायत ॥ ३४<br>देवान्स पीडयामास प्रह्लादः शत्रुकर्षणः।<br>संग्रामो ह्यभवद् घोरः शक्रप्रह्लादयोस्तदा ॥ ३५<br>पूर्णं वर्षशतं राजँल्लोकविस्मयकारकम्।<br>देवैर्युद्धं कृतं चोग्रं प्रह्लादस्तु पराजितः ॥ ३६<br>निर्वेदं परमं प्राप्तो ज्ञात्वा धर्मं सनातनम्।<br>विरोचनसुतं राज्ये प्रतिष्ठाप्य बलिं नृप ॥ ३७बादमें हिरण्यकशिपुका वध हो जानेपर प्रह्लाद राजा बने। शत्रुओंको कष्ट पहुँचानेवाले वे प्रह्लाद भी देवताओंको पीड़ित करने लगे। अतः इन्द्र और प्रह्लादमें भयानक संग्राम आरम्भ हो गया। हे राजन्! पूरे सौ वर्षतक देवताओंने लोगोंको अचम्भेमें डाल देनेवाला भीषण युद्ध किया और प्रह्लादको पराजित कर दिया। हे राजन्! तब शाश्वत धर्मको समझकर वे महान् विरक्तिको प्राप्त हुए और विरोचनपुत्र बलिको राज्यपर प्रतिष्ठित करके तप करनेके लिये गन्धमादनपर्वतपर चले गये॥ ३४-३७ १/२॥
जगाम स तपस्तप्तुं पर्वते गन्धमादने।<br>प्राप्य राज्यं बलिः श्रीमान्सुरैर्वैरं चकार ह ॥ ३८<br>यतः परस्परं युद्धं जातं परमदारुणम्।<br>ततः सुरैर्जिता दैत्या इन्द्रेणामिततेजसा ॥ ३९<br>विष्णुना च सहायेन राज्यभ्रष्टाः कृता नृप।राज्य प्राप्त करके ऐश्वर्यशाली राजा बलिने देवताओंसे शत्रुता कर ली, जिससे [देवताओं और दैत्योंमें] पुनः परस्पर अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा। उसमें देवताओं तथा अमित तेजस्वी इन्द्रने दैत्योंको जीत लिया। हे राजन्! उस समय इन्द्रके सहायक बनकर भगवान् विष्णुने दैत्योंको राज्यसे च्युत कर दिया॥ ३८-३९ १/२॥

अ० १०] चतुर्थ स्कन्ध ४४९

अ० १०] चतुर्थ स्कन्ध ४४९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः पराजिता दैत्याः काव्यस्य शरणं गताः ॥ ४०<br><br>किं त्वं न कुरुषे ब्रह्मन् साहाय्यं नः प्रतापवान् ।<br>स्थातुं न शक्नुमो ह्यत्र प्रविशामो रसात लम् ॥ ४१<br><br>यदि त्वं न सहायोऽसि त्रातुं मन्त्रविदुत्तम ।<br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तः सोऽब्रवीद्दैत्यान्काव्यः कारुणिको मुनिः ॥ ४२तदनन्तर हारे हुए दैत्य [अपने गुरु] शुक्राचार्यकी शरणमें गये। [सभी दैत्य उनसे कहने लगे—] हे ब्रह्मन्! आप प्रतापशाली होते हुए भी हमारी सहायता क्यों नहीं कर रहे हैं? हे मन्त्रज्ञोंमें श्रेष्ठ! यदि हमारी रक्षाहेतु आप सहायक न हुए तो हमलोग यहाँ नहीं रह पायेंगे और निश्चय ही हमें पातालमें जाना पड़ेगा ॥ ४०-४१ १/२ ॥<br>व्यासजी बोले— दैत्योंके ऐसा कहनेपर दयालु शुक्राचार्यमुनिने उनसे कहा—हे असुरो! डरो मत। मैं अपने तेजसे [तुमलोगोंको धरातलपर] स्थापित करूँगा और मन्त्रों तथा औषधियोंसे सर्वदा तुमलोगोंकी सहायता करूँगा। तुमलोग चिन्तामुक्त होकर उत्साह बनाये रखो ॥ ४२-४३ १/२ ॥
मा भैष्ट धारयिष्यामि तेजसा स्वेन भोऽसुराः ।<br>मन्त्रैस्तथौषधीभिश्च साहाय्यं वः सदैव हि ॥ ४३<br><br>करिष्यामि कृतोत्साहा भवन्तु विगतज्वराः ।<br>व्यास उवाच<br>ततस्ते निर्भया जाता दैत्याः काव्यस्य संश्रयात् ॥ ४४<br><br>देवैः श्रुतस्तु वृत्तान्तः सर्वैश्चारमुखात्किल ।<br>तत्र संमन्त्र्य ते देवाः शक्रेण च परस्परम् ॥ ४५<br><br>मन्त्रं चक्रुः सुसंविग्नाः काव्यमन्त्रप्रभावतः ।<br>योद्धुं गच्छामहे तूर्णं यावन्न च्यावयन्ति वै ॥ ४६व्यासजी बोले— इस प्रकार शुक्राचार्यका आश्रय पाकर वे दैत्य निर्भय हो गये। उधर देवताओंने गुप्तचरोंसे यह समाचार सुन लिया। तत्पश्चात् शुक्राचार्यके मन्त्रके प्रभावको समझकर अत्यन्त घबराये हुए देवताओंने इन्द्रके साथ परस्पर मन्त्रणा करके यह योजना बनायी कि जबतक शुक्राचार्यके मन्त्रके प्रभावसे दैत्य हमें राज्यच्युत करें, उसके पहले ही हमलोग युद्ध करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर दें और बलपूर्वक उनका वध करके बचे हुए दैत्योंको पाताल भेज दें ॥ ४४-४६ १/२ ॥
प्रसह्य हत्वा शिष्टांस्तु पातालं प्रापयामहे ।<br>दैत्याञ्जग्मुस्ततो देवाः संरुष्टाः शस्त्रपाणयः ॥ ४७<br><br>जग्मुस्तान्विष्णुसहिता दानवान् हरिणोदिताः ।<br>वध्यमानास्तु ते दैत्याः सन्त्रस्ता भयपीडिताः ॥ ४८<br><br>काव्यस्य शरणं जग्मू रक्ष रक्षेति चाब्रुवन् ।<br>ताञ्छुक्रः पीडितान्दृष्ट्वा देवैर्दैत्यान्महाबलान् ॥ ४९तदनन्तर अत्यधिक रोषमें भरे देवताओंने हाथोंमें शस्त्र धारणकर दैत्योंपर चढ़ाई कर दी। इन्द्रकी प्रेरणासे भगवान् विष्णुसहित सभी देवता उनपर टूट पड़े। तब देवताओंके द्वारा मारे जा रहे वे दैत्य आतंकित तथा भयभीत होकर शुक्राचार्यकी शरणमें गये और 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'—ऐसा बार-बार कहने लगे ॥ ४७-४८ १/२ ॥
मा भैष्टेति वचः प्राह मन्त्रौषधिबलाद्विभुः ।<br>दृष्ट्वा काव्यं सुराः सर्वे त्यक्त्वा तान्प्रययुः किल ॥ ५०देवताओंके द्वारा पीड़ित किये गये उन महाबली दैत्योंको देखकर मन्त्र और औषधिके प्रभावसे शक्तिशाली बने शुक्राचार्यने उनसे 'डरो मत'—ऐसा वचन कहा। तब शुक्राचार्यको देखते ही सभी देवता उन दैत्योंको छोड़कर चले गये ॥ ४९-५० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
भृगुशापकारणवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 A

४५०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

अथैकादशोऽध्यायः

मन्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये शुक्राचार्यका तपस्यारत होना, देवताओं द्वारा दैत्योंपर आक्रमण, शुक्राचार्यकी माताद्वारा दैत्योंकी रक्षा और इन्द्र तथा विष्णुको संज्ञाशून्य कर देना, विष्णुद्वारा शुक्रमाताका वध

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
तथा गतेषु देवेषु काव्यस्तान्प्रत्युवाच ह।<br>ब्रह्मणा पूर्वमुक्तं यच्छृणुध्वं दानवोत्तमाः॥ १तत्पश्चात् देवताओंके चले जानेपर शुक्राचार्यने उन दैत्योंसे कहा—हे श्रेष्ठ दानवो! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मुझसे जो कहा था, उसे तुमलोग सुनो। दैत्योंके वधके लिये भगवान् विष्णु सदा प्रत्यनरत रहते हैं, वे दैत्योंका वध अवश्य करेंगे। जैसे वाराहका रूप धारण करके उन्होंने हिरण्याक्षका वध किया और नृसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको मारा, उसी प्रकार उत्साहसम्पन्न होकर वे सब दैत्योंका संहार करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है॥ १-३॥
विष्णुर्दैत्यवधे युक्तो हनिष्यति जनार्दनः।<br>वाराहरूपं संस्थाय हिरण्याक्षो यथा हतः॥ २
यथा नृसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>तथा सर्वान्कृतोत्साहो हनिष्यति न चान्यथा॥ ३
न मे मन्त्रबलं सम्यक्प्रतिभाति यथा हरिम्।<br>जेतुं यूयं समर्थाः स्थ मया त्राताः सुरानथ॥ ४मुझे जान पड़ता है कि वैसा समुचित मन्त्रबल अभी मेरे पास नहीं है, जिससे मेरे द्वारा सुरक्षित होकर तुमलोग इन्द्र तथा देवताओंको जीतनेमें समर्थ हो सको। अतः हे श्रेष्ठ दानवगण! तुमलोग कुछ समयतक प्रतीक्षा करो। मैं मन्त्रसिद्धिके लिये आज ही भगवान् शिवके पास जा रहा हूँ। हे श्रेष्ठ दानवो! महादेवजीसे मन्त्र लेकर मैं तत्काल आऊँगा और यथावत् रूपमें तुमलोगोंको सिखा दूँगा॥ ४-६॥
तस्मात्कालं प्रतीक्षध्वं कियन्तं दानवोत्तमाः।<br>अहमद्य महादेवं मन्त्रार्थं प्रव्रजामि वै॥ ५
प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि साम्प्रतम्।<br>युष्मभ्यं तान्प्रदास्यामि यथार्थं दानवोत्तमाः॥ ६
दैत्या ऊचुःदैत्यों ने कहा—
पराजिताः कथं स्थातुं पृथिव्यां मुनिसत्तम।<br>शक्ता भवामोऽप्यबलास्तावत्कालं प्रतीक्षितुम्॥ ७हे मुनिश्रेष्ठ! देवताओंसे पराजित होकर हमलोग अत्यन्त निर्बल हो गये हैं, अतः उतने समयतक प्रतीक्षा करनेके लिये हम पृथ्वीपर रहनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं? सभी पराक्रमी दानव मारे जा चुके हैं और जो शेष बचे हुए हैं, सुखकी इच्छा करनेवाले वे अब युद्धमें ठहरनेमें समर्थ नहीं हैं॥ ७-८॥
निहता बलिनः सर्वे केचिच्छिष्टाश्च दानवाः।<br>नाद्य युक्ताश्च संग्रामे स्थातुमेवं सुखावहाः॥ ८
शुक्र उवाचशुक्राचार्य बोले—
यावदहं मन्त्रविद्यामानयिष्यामि शङ्करात्।<br>तावद्भवद्भिः स्थातव्यं तपोयुक्तैः शमान्वितैः॥ ९जबतक मैं शिवजीसे मन्त्रविद्या लेकर नहीं आता हूँ, तबतक तुमलोग शान्ति और तपस्यासे युक्त होकर यहीं रुके रहो॥ ९॥
सामदानादयः प्रोक्ता विद्वद्भिः समयोचिताः।<br>देशं कालं बलं वीरैर्ज्ञात्वा शक्तिं बलं बुधैः॥ १०विद्वानोंने कहा है कि समयानुसार साम, दान आदिका प्रयोग करना चाहिये। बुद्धिमान् तथा वीर पुरुष देश, काल, बल, शक्ति और सेनाकी जानकारी करके ही अपना सामर्थ्य दिखाते हैं॥ १०॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 15 B

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५१

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५१


सेवाथ समये कार्या शत्रूणां शुभकाम्यया ।<br>स्वशक्त्युपचये काले हन्तव्यास्ते मनीषिभिः ॥ ११बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अपने कल्याणकी इच्छासे समयपर शत्रुओंकी भी सेवा करे और अपनी शक्तिका संचय हो जानेपर उन्हें मार डाले ॥ ११ ॥
तदद्य विनयं कृत्वा सामपूर्वं छलेन वै।<br>तिष्ठध्वं स्वनिकेतेषु मदागमनकाङ्क्षया ॥ १२अतः देवताओंकी विनती करके छलपूर्वक सामनीतिका प्रयोग करते हुए मेरे लौटनेकी प्रतीक्षाके साथ अपने-अपने घरोंमें रहो ॥ १२ ॥
प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि दानवाः ।<br>युध्यामहे पुनर्दैवान्मन्त्रमास्थाय वै बलम् ॥ १३हे दानवो! महादेवजीसे मन्त्र प्राप्त करके मैं आऊँगा और तब उसी मन्त्रबलका आश्रय लेकर हमलोग देवताओंसे युद्ध करेंगे ॥ १३ ॥
इत्युक्त्वाथ भृगुस्तेभ्यो जगाम कृतनिश्चयः ।<br>महादेवं महाराज मन्त्रार्थं मुनिसत्तमः ॥ १४हे महाराज! उन दानवोंसे ऐसा कहकर दृढ़ संकल्पवाले मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्य मन्त्रप्राप्तिके लिये शिवजीके पास चले गये ॥ १४ ॥
दानवाः प्रेषयामासुः प्रह्लादं सुरसन्निधौ ।<br>सत्यवादिनमव्यग्रं सुराणां प्रत्ययप्रदम् ॥ १५तदनन्तर दैत्योंने सत्यवादी, धैर्यवान् तथा देवताओंके विश्वासपात्र प्रह्लादको देवताओंके पास भेजा ॥ १५ ॥
प्रह्लादस्तु सुरान्प्राह प्रश्रयावनतो नृपः ।<br>असुरैः सहितस्तत्र वचनं नम्रतायुतम् ॥ १६<br><br>न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निःसन्नाहास्तथैव च ।<br>देवास्तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैर्युताः ॥ १७असुरोंके साथ वहाँ जाकर राजा प्रह्लाद विनय-सम्पन्न होकर देवताओंसे नम्रतायुक्त वचन बोले। हे देवताओ! हम सभी लोगोंने शस्त्र रख दिये हैं और कवचका त्याग कर दिया है। अब हम वल्कल धारण करके तपस्या करेंगे ॥ १६-१७ ॥
प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं तु तत् ।<br>ततो देवा न्यवर्तन्त विज्वरा मुदिताश्च ते ॥ १८प्रह्लादका वचन सुनकर देवताओंने उसे सत्य मान लिया और इसके बाद वे निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे लौट गये ॥ १८ ॥
न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः ।<br>विश्रब्धाः स्वगृहान्गत्वा क्रीडासक्ताः सुसंस्थिताः ॥ १९तब दैत्योंके शस्त्र त्याग देनेपर देवता युद्धसे विरत हो गये और चिन्तारहित होकर अपने-अपने घर जाकर स्वस्थचित्त हो क्रीड़ाविलासमें संलग्न हो गये ॥ १९ ॥
दैत्या दम्भं समालम्ब्य तापसास्तपिसंयुताः ।<br>कश्यपस्याश्रमे वासं चक्रुः काव्यागमेच्छया ॥ २०उस समय दैत्यगण पाखण्डका सहारा लेकर तपस्वीके रूपमें तपस्यारत होकर शुक्राचार्यके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए कश्यपमुनिके आश्रममें रहने लगे ॥ २० ॥
काव्यो गत्वाथ कैलासं महादेवं प्रणम्य च।<br>उवाच विभुना पृष्टः किं ते कार्यमिति प्रभुः ॥ २१<br><br>मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ ।<br>पराजयाय देवानामसुरणां जयाय च ॥ २२उधर, मुनि शुक्राचार्यने कैलासपर्वतपर पहुँचकर शंकरजीको प्रणाम किया। भगवान् शिवके पूछनेपर कि 'आपका क्या कार्य है?'—उन्होंने कहा—हे देव! मैं देवताओंकी पराजय और असुरोंकी विजयके लिये उन मन्त्रोंको चाहता हूँ, जो बृहस्पतिके भी पास न हों ॥ २१-२२ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 C

४५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सर्वज्ञः शङ्करः शिवः।<br>चिन्तयामास मनसा किं कर्तव्यमतः परम्॥ २३<br><br>सुरेषु द्रोहबुद्ध्यासौ मन्त्रार्थमिह साम्प्रतम्।<br>प्राप्तः काव्यो गुरुस्तेषां दैत्यानां विजयाय च॥ २४<br><br>रक्षणीया मया देवा इति सञ्चिन्त्य शङ्करः।<br>दुष्करं व्रतमत्युग्रं तमुवाच महेश्वरः॥ २५<br><br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु कणधूममवाक्शिराः।<br>यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मन्त्रानवाप्स्यसि॥ २६ | व्यासजी बोले—उनका वचन सुनकर सर्वज्ञ और कल्याणकारी भगवान् शिव मनमें सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? ये दैत्यगुरु शुक्राचार्य देवताओंके प्रति द्रोह-बुद्धिसे युक्त होकर उन दैत्योंकी विजयके लिये मन्त्रहेतु इस समय यहाँ आये हैं, अतः मुझे देवताओंकी रक्षा करनी चाहिये—ऐसा सोचकर शिवजीने उन्हें यह अत्यन्त कठोर और दुष्कर व्रत करनेको कहा—पूरे एक हजार वर्षोंतक यदि आप सिर नीचे करके कणधूम (भूसीके धुएँ)-का पान करेंगे, तभी आपका कल्याण होगा और आप मन्त्र प्राप्त कर सकेंगे॥ २३—२६॥ | | इत्युक्तोऽसौ प्रणम्येशं बाढमित्यब्रवीद्वचः।<br>व्रतं चराम्यहं देव त्वयाज्ञप्तः सुरेश्वर॥ २७ | शिवजीके ऐसा कहनेपर उन्होंने महेश्वरको प्रणाम करके यह वचन कहा—'बहुत अच्छा', हे देव! हे सुरेश्वर! आपने मुझे जो आदेश दिया है, मैं उस व्रतका पालन करूँगा॥ २७॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा शङ्करं काव्यश्चकार व्रतमुत्तमम्।<br>धूमपानरतः शान्तो मन्त्रार्थं कृतनिश्चयः॥ २८ | व्यासजी बोले—शिवजीसे ऐसा कहकर मन्त्रप्राप्तिके लिये दृढ़संकल्प शुक्राचार्यजी शान्त होकर धुएँका सेवन करते हुए कठोर व्रत करने लगे॥ २८॥ | | ततो देवाः परिज्ञाय काव्यं व्रतरतं तदा।<br>दैत्यान्दम्भरतांश्चैव बभूवुर्मन्त्रतत्पराः॥ २९ | तब उस समय शुक्राचार्यको व्रतमें संलग्न तथा दैत्योंको [तपस्वी बनकर] पाखण्डमें निरत देखकर देवता लोग आपसमें मन्त्रणा करने लगे॥ २९॥ | | विचार्य मनसा सर्वे संग्रामायोद्यता नृप।<br>ययुर्धृतायुधास्तत्र यत्र ते दानवोत्तमाः॥ ३० | हे राजन्! भलीभाँति विचार करके सभी देवता संग्रामके लिये उद्यत हो गये और शस्त्रास्त्र धारणकर वहाँ पहुँच गये, जहाँ वे बड़े-बड़े दानव विद्यमान थे॥ ३०॥ | | तानागतानसमीक्ष्याथ सायुधान्दंशितांस्तथा।<br>आसंस्ते भयसंविग्ना दैत्या देवान्समन्ततः॥ ३१ | तदनन्तर दैत्यगण उन आये हुए देवताओंको आयुधोंसे सज्जित और कवच धारण किये तथा अपनेको उनसे सब ओरसे घिरा देखकर भयसे व्याकुल हो उठे॥ ३१॥ | | उत्पेतुः सहसा ते वै सन्नद्धान्भयकर्शिताः।<br>अब्रुवन्वचनं तथ्यं ते देवान्बलदर्पितान्॥ ३२ | वे भयातुर दानव तुरंत उठकर खड़े हो गये और युद्धके लिये उद्यत बलाभिमानी देवताओंसे सारगर्भित वचन कहने लगे—हमने शस्त्र रख दिये हैं, हम भयभीत हैं और हमारे आचार्य इस समय व्रतमें संलग्न हैं। हे देवताओ! पहले अभयदान देकर भी आप लोग हमें मारनेकी इच्छासे आ गये। हे | | न्यस्तशस्त्रे भयवति आचार्ये व्रतमास्थिते।<br>दत्त्वाभयं पुरा देवाः सम्प्राप्ता नो जिघांसया॥ ३३ | |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 D

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५३

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सत्यं वः क्व गतं देवा धर्मश्च श्रुतिनोदितः ।<br>न्यस्तशस्त्रा न हन्तव्या भीताश्च शरणं गताः ॥ ३४देवगण! आप लोगोंका सत्य और श्रुतिसम्मत वह धर्म कहाँ चला गया कि ‘जो शस्त्र रख चुके हों, भयभीत हों और शरणागत हो गये हों, उन्हें नहीं मारना चाहिये’॥ ३२–३४॥
देवा ऊचुः<br>भवद्भिः प्रेषितः काव्यो मन्त्रार्थं कुहकेन च ।<br>तपो ज्ञातं हि युष्माकं तेन युध्याम एव हि ॥ ३५देवता बोले—आप लोगोंने छलसे शुक्राचार्यको मन्त्र प्राप्त करनेके लिये भेजा है। हम आपलोगोंके तपको जान गये हैं, इसीलिये हमलोग युद्ध करनेके लिये उद्यत हुए हैं॥ ३५॥
सज्जा भवन्तु युद्धाय संरब्धाः शस्त्रपाणयः ।<br>शत्रुश्छिद्रेण हन्तव्य एष धर्मः सनातनः ॥ ३६अब क्षुब्ध हुए आपलोग भी हाथोंमें शस्त्र धारणकर युद्धके लिये तैयार हो जाइये। यह सनातन सिद्धान्त है कि जब शत्रु दुर्बल हो, तभी उसे मार डालना चाहिये॥ ३६॥
व्यास उवाच<br>

४५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११


संस्कृतहिन्दी
इत्युक्त्वा प्रेरिता निद्रा तानागत्य पपात च।<br>सेन्द्रा निद्रावशं याता देवा मूकवदास्थिताः॥ ४४ऐसा कहकर उन्होंने निद्राको प्रेरित किया। उस निद्राने देवताओंके पास आकर उनपर अपना प्रभाव डाल दिया, जिससे इन्द्रसहित सभी देवता निद्राके वशीभूत हो गये और गूँगेकी भाँति पड़े रहे॥ ४४॥
इन्द्रं निद्राजितं दृष्ट्वा दीनं विष्णुिरभाषत।<br>मां त्वं प्रविश भद्रं ते नये त्वां च सुरोत्तम॥ ४५इन्द्रको निद्राके द्वारा नियन्त्रित तथा दीन देखकर भगवान् विष्णुने कहा—हे देवश्रेष्ठ! तुम मुझमें प्रविष्ट हो जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हें अन्यत्र पहुँचाता हूँ॥ ४५॥
एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरन्दरः।<br>निर्भयो गतनिद्रश्च बभूव हरिरक्षितः॥ ४६विष्णुके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र उनमें प्रवेश कर गये और उन श्रीहरिसे रक्षित होकर वे निर्भय तथा निद्रारहित हो गये॥ ४६॥
रक्षितं हरिणा दृष्ट्वा शक्रं तत्र गतव्यथम्।<br>काव्यमाता ततः क्रुद्धा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ४७<br><br>मघवंस्त्वां भक्षयामि सविष्णुं वै तपोबलात्।<br>पश्यतां सर्वदेवानामीदृशं मे तपोबलम्॥ ४८तब भगवान् विष्णुके द्वारा रक्षित इन्द्रको व्यथाशून्य देखकर शुक्राचार्यकी माता कुपित हो उठीं और यह वचन बोलीं—हे इन्द्र! सभी देवताओंके देखते-देखते मैं अपने तपोबलसे विष्णुसहित तुम्हें खा जाऊँगी; ऐसा मेरा तपोबल है॥ ४७-४८॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्तौ तु तया देवौ विष्ण्विन्द्रौ योगविद्यया।<br>अभिभूतौ महात्मानौ स्तब्धौ तौ सम्बभूवतुः॥ ४९व्यासजी बोले—ऐसा कहकर उन्होंने अपनी योगविद्याके द्वारा इन्द्र तथा विष्णुको आक्रान्त कर दिया और वे दोनों महात्मा स्तब्ध हो गये॥ ४९॥
विस्मितास्तु तदा देवा दृष्ट्वा तावतिबाधितौ।<br>चक्रुः किलकिलाशब्दं ततस्ते दीनमानसाः॥ ५०उन दोनोंको बहुत बड़े संकटमें पड़ा देखकर देवताओंको महान् आश्चर्य हुआ और वे दुःखित्त हो जोर-जोरसे चीखने-चिल्लाने लगे॥ ५०॥
क्रोशमानान्सुरान्दृष्ट्वा विष्णुं प्राह शचीपतिः।<br>विशेषेणाभिभूतोऽस्मि त्वत्तोऽहं मधुसूदन॥ ५१<br><br>जह्येनां तरसा विष्णो यावन्नौ न दहेत्प्रभो।<br>तपसा दर्पितां दुष्टां मा विचारय माधव॥ ५२देवताओंको चीखते-चिल्लाते देखकर इन्द्रने विष्णुसे कहा—हे मधुसूदन! मैं [इस समय] आपकी अपेक्षा अधिक आक्रान्त हूँ। अतः हे विष्णो! हे प्रभो! यह हमें जबतक भस्म न कर दे, आप तपस्याके अभिमानमें चूर इस दुष्टाको शीघ्रतापूर्वक मार डालिये। हे माधव! अब आप सोच-विचार न करें॥ ५१-५२॥
इत्युक्तो भगवान्विष्णुः शक्रण प्रथितेन च।<br>चक्रं सस्मार तरसा घृणां त्यक्त्वाथ माधवः॥ ५३<br><br>स्मृतमात्रं तु सम्प्राप्तं चक्रं विष्णुवशानुगम्।<br>दधार च करे क्रुद्धो वधार्थं शक्रनोदितः॥ ५४कीर्तिमान् इन्द्रके ऐसा कहनेपर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने दया छोड़कर तत्काल सुदर्शन चक्रका स्मरण किया। विष्णुके वशमें रहनेवाला वह चक्र उनके स्मरण करते ही आ पहुँचा और इन्द्रसे प्रेरित होकर उन्होंने कुपित हो उसके वधके लिये चक्रको अपने हाथमें ले लिया॥ ५३-५४॥

अ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५५

अ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५५


संस्कृतहिन्दी
गृहीत्वा तत्करे चक्रं शिरश्चिच्छेद रंहसा।<br>हतां दृष्ट्वा तु तां शक्रो मुदितश्चाभवत्तदा॥ ५५<br><br>देवाश्चातीव सन्तुष्टा हरिं जय जयेति च।<br>तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे सञ्जाता विगतज्वराः॥ ५६उस चक्रको हाथमें लेकर भगवान् विष्णुने बड़े वेगसे उसका सिर काट दिया। तब उसे मृत देखकर इन्द्र हर्षित हो उठे। सभी देवता भी अत्यन्त सन्तुष्ट होकर विष्णुकी जयकार करने लगे। वे प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे और सन्तापरहित हो गये॥ ५५-५६॥
इन्द्रविष्णू तु सञ्जातौ तत्क्षणाद्धृदयव्यथौ।<br>स्त्रीवधाच्छंकमानौ तु भृगोः शापं दुरत्ययम्॥ ५७स्त्रीवधसे [होनेवाले पाप] तथा भृगुमुनिके भीषण शापकी शंका करते हुए वे भगवान् विष्णु तथा इन्द्र उसी समयसे दुःखितचित्त रहने लगे॥ ५७॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे<br>शुक्रमातृवधवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥

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अथ द्वादशोऽध्यायः

महात्मा भृगुद्वारा विष्णुको मानवयोनिमें जन्म लेनेका शाप देना, इन्द्रद्वारा अपनी पुत्री जयन्तीको शुक्राचार्यके लिये अर्पित करना, देवगुरु बृहस्पतिद्वारा शुक्राचार्यका रूप धारणकर दैत्योंका पुरोहित बनना

संस्कृतहिन्दी
व्यास उवाच<br>तं दृष्ट्वा तु वधं घोरं चुक्रोध भगवान्भृगुः।<br>वेपमानोऽतिदुःखार्तः प्रोवाच मधुसूदनम्॥ १व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उस भयानक वधको देखकर भगवान् भृगु अत्यन्त कुपित हुए और दुःखसे व्याकुल होकर काँपते हुए वे मधुसूदन विष्णुसे कहने लगे॥ १॥
भृगुरुवाच<br>अकृत्यं ते कृतं विष्णो जानन्पापं महामते।<br>वधोऽयं विप्रजाताया मनसा कर्तुमक्षमः॥ २**भृगु बोले—**हे महाबुद्धिमान् विष्णो! जो नहीं करना चाहिये वह पाप आपने जान-बूझकर कर डाला। विप्र-स्त्रीके इस वधकी तो मनसे कल्पना करना भी अनुचित है॥ २॥
आख्यातस्त्वं सत्त्वगुणः स्मृतो ब्रह्मा च राजसः।<br>तथासौ तामसः शम्भुर्विपरीतं कथं स्मृतम्॥ ३<br><br>तामसस्त्वं कथं जातः कृतं कर्मातिनिन्दितम्।<br>अवध्या स्त्री त्वया विष्णो हता कस्मान्निरागसा॥ ४आप तो सत्त्वगुणसे सम्पन्न कहे गये हैं, ब्रह्मा रजोगुणी और शिव तमोगुणी बताये गये हैं; तब आपने अपने गुणके विपरीत कार्य क्यों किया? आप तामसी कैसे हो गये, जिससे आपने यह घोर निन्दनीय कर्म कर डाला? हे विष्णो! आपने उस अवध्य तथा निरपराध स्त्रीको क्यों मार डाला?॥ ३-४॥
शपामि त्वां दुराचारं किमन्यत्प्रकरोमि ते।<br>विधुरोऽहं कृतः पाप त्वयाहं शुक्रकारणात्॥ ५[उन्होंने क्रोधपूर्वक कहा कि] अब मैं तुझ दुराचारीको शाप दे रहा हूँ, इसके अतिरिक्त तुम्हारा क्या प्रतीकार करूँ? अरे पापी! तुमने इन्द्रके हितके लिये मुझे विधुर बना दिया। हे मधुसूदन! मैं इन्द्रको शाप नहीं दूँगा, बल्कि तुम्हें ही शाप दूँगा।
न शपेऽहं तथा शक्रं शपे त्वां मधुसूदन।<br>सदा छलपरोऽसि त्वं कीटयोनिर्दुराशयः॥ ६कृष्ण सर्पसदृश दुरभिप्रायवाले तुम सदा छल करनेमें ही तत्पर रहते हो॥ ५-६॥
४५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ये च त्वां सात्त्विकं प्राहुस्ते मूर्खा मुनयः किल।<br>तामसस्त्वं दुराचारः प्रत्यक्षं मे जनार्दन॥ ७<br><br>अवतारा मृत्युलोके सन्तु मच्छापसम्भवाः।<br>प्रायो गर्भभवं दुःखं भुंक्ष्व पापाज्जनार्दन॥ ८हे जनार्दन! जो मुनि तुम्हें सात्त्विक कहते हैं, वे निश्चय ही मूर्ख हैं। मैंने तो प्रत्यक्ष जान लिया कि तुम तमोगुणी तथा दुराचारी हो। अतः हे जनार्दन! मेरे शापसे मृत्युलोकमें तुम्हारे अनेक अवतार हों और [इस स्त्री-वधजन्य] पापके कारण बार-बार गर्भवाससे होनेवाले दुःखको भोगो॥ ७-८॥
व्यास उवाच<br>ततस्तेनाथ शापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः।<br>लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह॥ ९व्यासजी बोले—उसी शापके कारण भगवान् विष्णु धर्मका ह्रास होनेपर संसारके कल्याणके लिये बार-बार मानवरूपोंमें प्रकट होते हैं॥ ९॥
राजोवाच<br>भृगुभार्या हता तत्र चक्रेणामिततेजसा।<br>गार्हस्थ्यञ्च पुनस्तस्य कथं जातं महात्मनः॥ १०राजा बोले—[हे व्यासजी!] जब अमित तेजस्वी चक्रके द्वारा भृगुपत्नीका वध हो गया, उसके बाद महात्मा भृगुका गार्हस्थ्य-जीवन कैसे व्यतीत हुआ?॥ १०॥
व्यास उवाच<br>इति शप्त्वा हरिं रोषात्तदादाय शिरस्त्वरन्।<br>काये संयोज्य तरसा भृगुः प्रोवाच कार्यवित्॥ ११<br><br>अद्य त्वां विष्णुना देवि हतां सञ्जीवयाम्यहम्।<br>यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोऽपि वा॥ १२<br><br>तेन सत्येन जीवेत यदि सत्यं ब्रवीम्यहम्।<br>पश्यन्तु देवताः सर्वा मम तेजोबलं महत्॥ १३<br><br>अद्भिस्त्वां प्रोक्ष्य शीताभिर्जीवयामि तपोबलात्।<br>सत्यं शौचं तथा वेदा यदि मे तपसो बलम्॥ १४व्यासजी बोले—इस प्रकार रोषपूर्वक भगवान् विष्णुको शाप देकर कार्यकुशल महर्षि भृगु तत्काल उस [कटे] सिरको लेकर शीघ्रतापूर्वक [अपनी पत्नीके] धड़में जोड़ करके बोले—हे देवि! विष्णुके द्वारा तुम मारी जा चुकी हो, किंतु अब मैं तुम्हें फिरसे जीवित कर रहा हूँ। यदि मैं सम्पूर्ण धर्म जानता हूँ तथा उसका सम्यक् आचरण करता हूँ और सदा सत्य भाषण करता हूँ तो उसी सत्यके प्रभावसे तुम जीवित हो जाओ। सभी देवता मेरे महान् तेज-बलको देख लें। यदि मुझमें सत्य, पवित्रता, वेदाध्ययन तथा तपस्याका बल होगा तो मैं उन्हींके प्रभावसे शीतल जलसे तुम्हारा प्रोक्षण करके तुम्हें जीवित कर दूँगा॥ ११-१४॥
व्यास उवाच<br>अद्भिः सम्प्रोक्षिता देवी सद्यः सञ्जीविता तदा।<br>उत्थिता परमप्रीता भृगोर्भार्या शुचिस्मिता॥ १५व्यासजी बोले—तब जलसे प्रोक्षित करते ही मधुर मुसकानवाली वे भृगुपत्नी शीघ्र ही जीवित हो गयीं और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उठकर खड़ी हो गयीं॥ १५॥
ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव।<br>साधु साध्विति तं तां तु तुष्टुवुः सर्वतो दिशम्॥ १६तब सोकर उठी हुईके समान उसे देखकर सब ओरसे लोग 'साधु-साधु'—ऐसा कहकर भृगुमुनि तथा उनकी भार्या दोनोंकी स्तुति करने लगे॥ १६॥
एवं सञ्जीविता तेन भृगुणा वरवर्णिनी।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवाः सेन्द्रा विलोक्य तत्॥ १७इस प्रकार उन महर्षि भृगुने उस सुन्दरीको जीवित कर दिया। यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवता अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे॥ १७॥
अ० १२ ]चतुर्थ स्कन्ध४५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इन्द्रः सुरानथोवाच मुनिना जीविता सती।<br>काव्यस्तप्त्वा तपो घोरं किं करिष्यति मन्त्रवित्॥ १८तत्पश्चात् इन्द्रने देवताओंसे कहा—भृगुमुनिने अपनी साध्वी भार्याको जीवित कर दिया। साथ ही मन्त्रज्ञानी शुक्राचार्य कठोर तपस्या करके [शिवसे मन्त्र प्राप्तकर] पता नहीं क्या कर डालेंगे!॥ १८॥
व्यास उवाच<br>गता निद्रा सुरेन्द्रस्य देहेऽक्षेममभून्नृप।<br>स्मृत्वा काव्यस्य वृत्तान्तं मन्त्रार्थमतिदारुणम्॥ १९**व्यासजी बोले—**हे राजन्! मन्त्रप्राप्तिके लिये शुक्राचार्यके अत्यन्त कठोर तपका स्मरण करके इन्द्रकी नींद समाप्त हो गयी और उनके शरीरमें व्याकुलता होने लगी॥ १९॥
विमृश्य मनसा शक्रो जयन्तीं स्वसुतां तदा।<br>उवाच कन्यां चार्वङ्गीं स्मितपूर्वमिदं वचः॥ २०<br><br>गच्छ पुत्रि मया दत्ता काव्याय त्वं तपस्विने।<br>समाराधय तन्वङ्गि मत्कृते तं वशं कुरु॥ २१<br><br>उपचारैर्मुनिं तैस्तैः समाराध्य मनःप्रियैः।<br>भयं मे तरसा गत्वा हर तत्र वराश्रमे॥ २२तब मनमें भली-भाँति विचार करके इन्द्रने सुन्दर स्वरूपवाली अपनी पुत्री जयन्तीसे मुसकराते हुए कहा—हे पुत्रि! मैंने तुम्हें तपस्वी शुक्राचार्यको सौंप दिया। अतः हे तन्वंगि! अब तुम जाओ और मेरे कल्याणके लिये उनकी सेवा करो और उन्हें वशमें कर लो। उस उत्तम आश्रममें शीघ्र जाकर उनके मनको प्रिय लगनेवाले विविध उपचारोंसे उन्हें प्रसन्न करके मेरा भय दूर करो॥ २०—२२॥
सा पितुर्वचनं श्रुत्वा तत्रागच्छन्मनोरमा।<br>तमपश्यद्विशालाक्षी पिबन्तं धूममाश्रमे॥ २३विशाल नयनोंवाली वह सुन्दर कन्या पिताकी बात सुनकर [शुक्राचार्यके] आश्रममें गयी और वहाँपर उसने मुनिको [नीचेकी ओर सिर करके] धुएँका सेवन करते हुए देखा॥ २३॥
तस्य देहं समालोक्य स्मृत्वा वाक्यं पितुस्तदा।<br>कदलीदलमादाय वीजयामास तं मुनिम्॥ २४तब उनके [तपोरत] शरीरको देखकर और पिताकी बात याद करके वह केलेका एक पत्ता लेकर मुनिको पंखा झलने लगी॥ २४॥
निर्मलं शीतलं वारि समानीय सुवासितम्।<br>पानाय कल्पयामास भक्त्या परमया लघु॥ २५<br><br>छायां वस्त्रातपत्रेण भास्करे मध्यगे सति।<br>रचयामास तन्वङ्गी स्वयं धर्मे स्थिता सती॥ २६तबसे वह उनके पीनेके लिये अत्यन्त स्वच्छ, शीतल, सुगन्धित तथा रुचिकर जल ले आकर [उनके समक्ष] श्रद्धापूर्वक उपस्थित किया करती। सूर्यके मध्य आकाशमें होते ही वह सुन्दरी उनके ऊपर वस्त्रसे छतरी बनाकर छाया कर देती थी। वह साध्वी सदा पातिव्रत्य धर्मका पालन करती थी॥ २५—२६॥
फलान्यानीय दिव्यानि पक्वानि मधुराणि च।<br>मुमोचाग्रे मुनेस्तस्य भक्षार्थं विहितानि च॥ २७<br><br>कुशाः प्रादेशमात्रा हि हरिताः शुकसन्निभाः।<br>दधाराग्रेऽथ पुष्पाणि नित्यकर्मसमृद्धये॥ २८<br><br>निद्रार्थं कल्पयामास संस्तरं पल्लवान्वितम्।<br>तस्मिन्मुनौ चादरस्था चकार व्यजनं शनैः॥ २९वह शास्त्रविहित दिव्य, पके तथा मीठे फल लाकर खानेके लिये उन मुनिके समक्ष रख देती थी। वह कन्या उनके नित्यकर्मके सम्पादनार्थ पुष्प और तोतेके वर्णके समान प्रादेशमात्र मापवाले हरे-हरे कुश उनके आगे प्रस्तुत कर देती थी। उनके शयनके लिये वह कोमल-कोमल पत्तोंका बिछौना तैयार करती थी और फिर उन मुनिके प्रति आदरभाव रखकर धीरे-धीरे पंखा झलने लगती थी॥ २७—२९॥
४५८श्रीमद्देवीभागवत[अ० १२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हावभावादिकं किञ्चिद्विकारजननं च तत्।<br>न चकार जयन्ती सा शापभीता मुनेस्तदा॥ ३०मुनिके शापसे भयभीत होकर वह जयन्ती उनके मनमें विकार उत्पन्न करनेवाला कोई हाव-भाव प्रदर्शित नहीं करती थी॥ ३०॥
स्तुतिं चकार तन्वङ्गी गीर्भिस्तस्य महात्मनः।<br>सुभाषिण्यनुकूलाभिः प्रीतिकर्त्रीभिरप्युत॥ ३१<br>प्रबुद्धे जलमादाय दधाराचमनाय च।<br>मनोऽनुकूलं सततं कुर्वन्ती व्यचरत्तदा॥ ३२सुकुमार अंगोंवाली तथा मृदुभाषण करनेवाली वह कन्या उन महात्माके मनके अनुकूल तथा प्रीति उत्पन्न करनेवाले शब्दोंसे उनकी स्तुति करती थी। तत्पश्चात् उनके जाग जानेपर आचमनके लिये जल लाकर रख देती थी। इस प्रकार सदा उनके मनके अनुकूल कार्य करती हुई उनके साथ व्यवहार करती थी॥ ३१-३२॥
इन्द्रोऽपि सेवकांस्तत्र प्रेषयामास चतुरः।<br>प्रवृत्तिं ज्ञातुकामो वै मुनेस्तस्य जितात्मनः॥ ३३चिन्तासे व्याकुल इन्द्र भी उन जितेन्द्रिय मुनिकी प्रवृत्ति जाननेकी इच्छासे अपने सेवक भेजते रहते थे॥ ३३॥
एवं बहूनि वर्षाणि परिचर्यापरावभूत्।<br>निर्विकारा जितक्रोधा ब्रह्मचर्यपरा सती॥ ३४इस प्रकार वह साध्वी कन्या क्रोधपर विजय प्राप्त करके, निर्विकार होकर तथा ब्रह्मचर्यपरायण रहती हुई बहुत वर्षोंतक मुनिकी सेवामें संलग्न रही॥ ३४॥
पूर्णे वर्षसहस्रे तु परितुष्टो महेश्वरः।<br>वरेण छन्दयामास काव्यं प्रीतमना हरः॥ ३५तदनन्तर हजार वर्ष पूर्ण होनेपर महेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और प्रसन्नतापूर्वक वे शुक्राचार्यसे वर माँगनेके लिये कहने लगे॥ ३५॥
ईश्वर उवाच<br>यच्च किञ्चिदपि ब्रह्मान्विद्यते भृगुनन्दन।<br>प्रतिपश्यसि यत्सर्वं यच्च वाच्यं न कस्यचित्॥ ३६<br>सर्वाभिभावकत्वेन भविष्यसि न संशयः।<br>अवध्यः सर्वभूतानां प्रजेशश्च द्विजोत्तमः॥ ३७ईश्वर बोले— हे ब्रह्मन्! हे भृगुनन्दन! जगत्में जो कुछ भी विद्यमान है, आप जो सब देख रहे हैं तथा जो किसीकी भी वाणीका विषय नहीं है—उन सबके स्वामित्वसे आप युक्त हो जायेंगे; इसमें कोई सन्देह नहीं है। आप सभी प्राणियोंसे अवध्य होंगे। आप प्रजाओंके स्वामी तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे॥ ३६-३७॥
व्यास उवाच<br>एवं दत्त्वा वराञ्छम्भुस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>काव्यस्तामथ संवीक्ष्य जयन्तीं वाक्यमब्रवीत्॥ ३८<br>कासि कस्यासि सुश्रोणि ब्रूहि किं ते चिकीर्षितम्।<br>किमर्थमिह सम्प्राप्ता कार्यं वद वरोरु मे॥ ३९<br>किं वाञ्छसि करोम्यद्य दुष्करं चेत्सुलोचने।<br>प्रीतोऽस्मि त्वत्कृतेनाद्य वरं वरय सुव्रते॥ ४०व्यासजी बोले— इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् जयन्तीको देखकर शुक्राचार्यने उससे कहा—हे सुश्रोणि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो; मुझे अपनी अभिलाषा बताओ। हे सुन्दरि! तुम यहाँ किसलिये आयी हो, अपना कार्य बताओ। हे सुनयने! तुम क्या चाहती हो; यदि वह कार्य दुष्कर भी हो तो भी मैं उसे अभी कर दूँगा। हे सुव्रते! आज मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ, अतः वर माँग लो॥ ३८-४०॥

| अ० १२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४५९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः सा तु मुनिं प्राह जयन्ती मुदितानना।<br>चिकीर्षितं मे भगवंस्तपसा ज्ञातुमर्हसि॥ ४१तदनन्तर प्रसन्न मुखमण्डलवाली जयन्तीने मुनिसे कहा—हे भगवन्! आप तो अपनी तपस्यासे मेरा अभिलषित जान लेनेमें समर्थ हैं॥ ४१॥
शुक्र उवाच<br>ज्ञातं मया तथापि त्वं ब्रूहि यन्मनसेप्सितम्।<br>करोमि सर्वथा भद्रं प्रीतोऽस्मि परिचर्यया॥ ४२**शुक्राचार्य बोले—**वह तो मैंने जान लिया, फिर भी जो तुम्हारा मनोभिलषित है, उसे तुम मुझे बताओ। मैं हर तरहसे तुम्हारा कल्याण करूँगा; क्योंकि मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ॥ ४२॥
जयन्त्युवाच<br>शक्रस्याहं सुता ब्रह्मन् पित्रा तुभ्यं समर्पिता।<br>जयन्ती नामतश्चाहं जयन्तावरजा मुने॥ ४३**जयन्ती बोली—**हे ब्रह्मन्! मैं इन्द्रकी पुत्री हूँ और पिताजीने मुझे आपको सौंप दिया है। हे मुने! मेरा नाम जयन्ती है और मैं जयन्तकी छोटी बहन हूँ॥ ४३॥
सकामास्मि त्वयि विभो वाञ्छितं कुरु मेऽधुना।<br>रंस्ये त्वया महाभाग धर्मतः प्रीतिपूर्वकम्॥ ४४हे विभो! मैं आपपर आसक्त हूँ, अतः मेरी अभिलाषा पूर्ण कीजिये। हे महाभाग! मैं पातिव्रत-धर्मके अनुसार प्रेमपूर्वक आपके साथ विहार करूँगी॥ ४४॥
शुक्र उवाच<br>मया सह त्वं सुश्रोणि दशवर्षाणि भामिनि।<br>सर्वैर्भूतैरदृश्या च रमस्वेह यदृच्छया॥ ४५**शुक्राचार्य बोले—**हे सुश्रोणि! हे भामिनि! तुम सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहती हुई दस वर्षोंतक इच्छानुसार मेरे साथ यहाँ विहार करो॥ ४५॥
व्यास उवाच<br>एवमुक्त्वा गृहं गत्वा जयन्त्याः पाणिमुद्वहन्।<br>तया सहावसद्देव्या दशवर्षाणि भार्गवः॥ ४६**व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर शुक्राचार्यने घर जाकर जयन्तीके साथ विवाह किया। तत्पश्चात् मायासे आच्छादित होकर सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहते हुए वे ऐश्वर्यसम्पन्न मुनि शुक्राचार्य देवी जयन्तीके साथ दस वर्षोंतक वहाँ रहे॥ ४६ ½॥
अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः।<br>दैत्यास्तमागतं श्रुत्वा कृतार्थं मन्त्रसंयुक्तम्॥ ४७<br><br>अभिजग्मुर्गृहे तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः।<br>नापश्यन् रममाणं ते जयन्त्या सह संयुक्तम्॥ ४८गुरु शुक्राचार्यको अपने उद्देश्यमें सफल हो मन्त्रसे युक्त होकर आया हुआ सुनकर सभी दैत्य उनके दर्शनकी इच्छासे प्रसन्नतापूर्वक उनके घर गये, किंतु वे उन्हें देख न सके; क्योंकि उस समय वे जयन्तीके साथ विहार कर रहे थे॥ ४७-४८॥
तदा विमनसः सर्वे जाता भग्नोद्यमाश्च ते।<br>चिन्तापरातिदीनाश्च वीक्षमाणाः पुनः पुनः॥ ४९<br><br>अदृष्ट्वा तं तु संवृतं प्रतिजग्मुर्यथागतम्।<br>स्वगृहान्दैत्यवर्यास्ते चिन्ताविष्टा भयातुराः॥ ५०इससे उन सभी दैत्योंका मन उदास हो गया और उनके सभी उद्योग व्यर्थ हो गये। वे बहुत चिन्तित और दुःखी होकर उन्हें बार-बार खोजते रहे। अन्तमें [मायासे] आच्छादित उन मुनिको न देखकर वे चिन्तित तथा भयभीत दैत्य जैसे आये थे वैसे ही अपने घर लौट गये॥ ४९-५०॥
रममाणं तथा ज्ञात्वा शक्रः प्रोवाच तं गुरुम्।<br>बृहस्पतिं महाभागं किं कर्तव्यमितः परम्॥ ५१तत्पश्चात् शुक्राचार्यको विहार करता हुआ जानकर इन्द्रने अपने गुरु महाभाग बृहस्पतिसे कहा—अब क्या किया जाय?॥ ५१॥
४६०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
गच्छाद्य दानवान्ब्रह्मन्मायया त्वं प्रलोभय।<br>अस्माकं कुरु कार्यं त्वं बुद्ध्या सञ्चिन्त्य मानद॥ ५२हे ब्रह्मन्! आप दानवोंके पास जाइये और मायाके द्वारा उन्हें मोहमें डाल दीजिये। हे मानद! बुद्धिसे भलीभाँति विचार करके आप हमारा कार्य सिद्ध कर दीजिये॥ ५२॥
तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यं रममाणं सुसंवृतम्।<br>ज्ञात्वा तद्रूपमास्थाय दैत्यान्प्रति ययौ गुरुः॥ ५३इन्द्रकी बात सुनकर देवगुरु बृहस्पति शुक्राचार्यको मायाच्छादित होनेके कारण [अदृश्य हो जयन्तीके साथ] क्रीडा करते जानकर उन्हींका रूप धारण करके दैत्योंके पास गये॥ ५३॥
गत्वा तत्रातिभक्त्यासौ दानवान्समुपाह्वयत्।<br>आगतास्तेऽसुराः सर्वे ददृशुः काव्यमग्रतः॥ ५४वहाँ पहुँचकर उन्होंने बड़े आदरके साथ दानवोंको बुलवाया। तब सभी दानव आ गये और उन्होंने शुक्राचार्यको अपने सम्मुख देखा॥ ५४॥
प्रणम्य संस्थिताः सर्वे काव्यं मत्वातिमोहिताः।<br>न विदुस्ते गुरोर्मायां काव्यरूपविभाविनीम्॥ ५५मायासे विमोहित सभी दैत्य [उन छद्मवेषधारी देवगुरु बृहस्पतिको ही] शुक्राचार्य समझकर उन्हें प्रणाम करके उनके समक्ष खड़े हो गये। वे शुक्राचार्यका कृत्रिम रूप प्रकट करनेवाली देवगुरु बृहस्पतिकी मायाको नहीं जान सके॥ ५५॥
तानुवाच गुरुः काव्यरूपः प्रच्छन्नमायया।<br>स्वागतं मम याज्यानां प्राप्तोऽहं वो हिताय वै॥ ५६<br><br>अहं वो बोधयिष्यामि विद्यां प्राप्ताममायया।<br>तपसा तोषितः शम्भुर्युष्मत्कल्याणहेतवे॥ ५७तत्पश्चात् छद्म मायासे शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले गुरु बृहस्पतिने उनसे कहा—मेरे यजमानोंका स्वागत है। मैं आपलोगोंके हितके लिये अब आ गया हूँ। मैंने आप सबके कल्याणके लिये तपस्याके द्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न कर लिया और अब मैं उनसे प्राप्त विद्याको निष्कपट भावसे आपलोगोंको बता दूँगा॥ ५६-५७॥
तच्छ्रुत्वा प्रीतिमनसो जातास्ते दानवोत्तमाः।<br>कृतकार्यं गुरुं मत्वा जहृषुस्ते विमोहिताः॥ ५८<br><br>प्रणेमुस्ते मुदा युक्ता निरातङ्का गतव्यथाः।<br>देवेभ्यश्च भयं त्यक्त्वा तस्थुः सर्वे निरामयाः॥ ५९यह सुनकर वे श्रेष्ठ दानव प्रसन्नचित्त हो गये। गुरु शुक्राचार्यको अपने उद्देश्यमें सफल समझकर वे मोहग्रस्त दानव बहुत हर्षित हुए और उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया। वे भयमुक्त तथा सन्तापरहित हो गये। अब देवताओंका भय छोड़कर वे सभी दैत्य स्वस्थचित्त होकर रहने लगे॥ ५८-५९॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे जयन्त्या शुक्रसहवासवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


अथ त्रयोदशोऽध्यायः

शुक्राचार्यरूपधारी बृहस्पतिका दैत्योंको उपदेश देना

राजोवाच<br>किं कृतं गुरुणा पश्चाद् भृगुरूपेण वर्तता।<br>छलेनैव हि दैत्यानां पौरोहित्येन धीमता॥ १राजा बोले—[हे व्यासजी!] तत्पश्चात् शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले बुद्धिमान् गुरु बृहस्पतिने छलपूर्वक दैत्योंका पुरोहित बनकर क्या किया?॥ १॥

| अ० १३ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४६१ | | :--- | :--- |

| गुरुः सुराणामनिशं सर्वविद्यानिधिस्तथा।<br>सुतोऽङ्गिरस एवासौ स कथं छलकृन्मुनिः॥ २ | वे तो देवताओंके गुरु हैं, सदासे सभी विद्याओंके निधान हैं और महर्षि अंगिराके पुत्र हैं; तब उन मुनिने छल क्यों किया?॥ २॥ | | धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु सत्यं धर्मस्य कारणम्।<br>कथितं मुनिभिर्येन परमात्मापि लभ्यते॥ ३ | मुनियोंने समस्त धर्मशास्त्रोंमें सत्यको ही धर्मका मूल बताया है, जिससे परमात्मातक प्राप्त किये जा सकते हैं॥ ३॥ | | वाचस्पतिस्तथा मिथ्यावक्ता चेद्दानवान्प्रति।<br>कः सत्यवक्ता संसारे भविष्यति गृहाश्रमी॥ ४ | जब बृहस्पति भी दानवोंसे झूठ बोले, तब संसारमें कौन गृहस्थ सत्य बोलनेवाला हो सकेगा?॥ ४॥ | | आहारादधिकं भोज्यं ब्रह्माण्डविभवेऽपि न।<br>तदर्थं मुनयो मिथ्या प्रवर्तन्ते कथं मुने॥ ५ | हे मुने! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका वैभव पासमें हो जानेपर भी [कोई व्यक्ति अपने] आहारसे अधिक नहीं खा सकता, तब उसीके निमित्त मुनिलोग भी मिथ्या-भाषणमें किसलिये प्रवृत्त हो जाते हैं?॥ ५॥ | | शब्दप्रमाणमुच्छेदं शिष्टाभावे गतं न किम्।<br>छलकर्मप्रवृत्ते वाविगीतत्वं गुरौ कथम्॥ ६ | इस प्रकारके अशिष्ट आचरणसे देवगुरु बृहस्पतिके वचनोंकी प्रामाणिकता क्या नष्ट नहीं हो गयी और इस छलकर्ममें लिप्त होनेसे उन्हें निष्कलंक कैसे कहा जा सकता है?॥ ६॥ | | देवाः सत्त्वसमुद्भूता राजसा मानवाः स्मृताः।<br>तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ता उत्पत्तौ मुनिभिः किल॥ ७ | मुनियोंने देवताओंको सत्त्वगुणसे, मनुष्योंको रजोगुणसे तथा पशु-पक्षियोंको तमोगुणसे उत्पन्न बतलाया है॥ ७॥ | | अमराणां गुरुः साक्षान्मिथ्यावादी स्वयं यदि।<br>तदा कः सत्यवक्ता स्याद्राजसस्तामसः पुनः॥ ८ | यदि स्वयं देवगुरु बृहस्पति ही साक्षात् मिथ्या-भाषणमें प्रवृत्त हो गये, तब रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त कौन प्राणी सत्यवादी हो सकेगा?॥ ८॥ | | क्व स्थितिस्तस्य धर्मस्य सन्देहोऽयं ममात्मनः।<br>का गतिः सर्वजन्तूनां मिथ्याभूते जगत्त्रये॥ ९ | इस प्रकार तीनों लोकोंके मिथ्यापरायण हो जानेपर धर्मकी स्थिति कहाँ होगी और सभी प्राणियोंकी क्या दशा होगी? यही मेरा संदेह है॥ ९॥ | | हरिर्ब्रह्मा शचीकान्तस्तथान्ये सुरसत्तमाः।<br>सर्वे छलविधौ दक्षा मनुष्याणाञ्च का कथा॥ १० | भगवान् विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र तथा और भी दूसरे महान् देवतागण—सब छलकार्यमें निपुण हैं, तब मनुष्योंकी बात ही क्या?॥ १०॥ | | कामक्रोधाभिसन्तप्ता लोभोपहतचेतसः।<br>छले दक्षाः सुराः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः॥ ११ | सभी देवता और तपोधन मुनिगण भी काम तथा क्रोधसे सन्तप्त और लोभसे व्याकुलचित्त होकर छल-प्रपंचमें तत्पर रहते हैं॥ ११॥ | | वसिष्ठो वामदेवश्च विश्वामित्रो गुरुस्तथा।<br>एते पापरताः कात्र गतिर्धर्मस्य मानद॥ १२ | हे मानद! जब वसिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र और गुरु बृहस्पति—ये लोग भी पाप-कर्ममें संलग्न हो गये, तब धर्मकी क्या दशा होगी?॥ १२॥ | | इन्द्रोऽग्निश्चन्द्रमा वेधाः परदाराभिलम्पटाः।<br>आर्यत्वं भुवनेष्वेषु स्थितं कुत्र मुने वद॥ १३ | इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा और ब्रह्मातक कामके वशीभूत हो गये, तब हे मुने! आप ही बतायें कि इन भुवनोंमें शिष्टता कहाँ रह गयी?॥ १३॥ |

४६२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३

| वचनं कस्य मन्तव्यमुपदेशधियानघ।<br>सर्वे लोभाभिभूतास्ते देवाश्च मुनयस्तदा ॥ १४ | हे पुण्यात्मन् ! जब वे सब देवता और मुनिलोग भी लोभके वशीभूत हैं, तब उपदेश ग्रहण करनेके विचारसे किसका वचन प्रमाण माना जाय ? ॥ १४ ॥ | | व्यास उवाच<br>किं विष्णुः किं शिवो ब्रह्मा मघवा किं बृहस्पतिः।<br>देहवान् प्रभवत्येव विकारैः संयुतस्तदा ॥ १५ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] चाहे विष्णु, ब्रह्मा, शिव, इन्द्र और बृहस्पति ही क्यों न हों—देहधारी तो विकारोंसे युक्त रहता ही है ॥ १५ ॥ | | रागी विष्णुः शिवो रागी ब्रह्मापि रागसंयुतः।<br>(रागवान्किमकृत्यं वै न करोति नराधिप)<br>रागवानपि चातुर्याद्विदेह इव लक्ष्यते ॥ १६<br><br>सम्प्राप्ते संकटे सोऽपि गुणैः सम्बाध्यते किल।<br>कारणाद्रहितं कार्यं कथं भवितुमर्हति ॥ १७<br><br>ब्रह्मादीनां च सर्वेषां गुणा एव हि कारणम्।<br>पञ्चविंशत्समुद्भूता देहास्तेषां न चान्यथा ॥ १८<br><br>काले मरणधर्म्मोऽस्ते सन्देहः कोऽत्र ते नृप। | ब्रह्मा, विष्णु और महेशतक आसक्तिसे ग्रस्त हैं। (हे राजन्! आसक्त प्राणी कौन-सा अनर्थ नहीं कर बैठता) आसक्तिसे युक्त प्राणी भी चतुराईके कारण विरक्तकी भाँति दिखायी पड़ता है, किंतु संकट उपस्थित होनेपर वह [सत्त्व, रज, तम] गुणोंसे आबद्ध हो जाता है। कोई भी कार्य बिना कारणके कैसे हो सकता है? ब्रह्मा आदि समस्त देवताओंके भी मूल कारण गुण ही हैं। उनके भी शरीर पचीस तत्त्वोंसे बने हैं, इसमें सन्देह नहीं है। हे राजन्! समय आ जानेपर वे भी मृत्युको प्राप्त होते हैं, इसमें आपको संशय कैसा? ॥ १६—१८ ½ ॥ | | परोपदेशे विस्पष्टं शिष्टाः सर्वे भवन्ति च ॥ १९<br><br>विप्लुतिर्ह्यविशेषेण स्वकार्ये समुपस्थिते।<br>कामः क्रोधस्तथा लोभद्रोहोहङ्कारमत्सराः ॥ २०<br><br>देहवान्कः परित्यक्तुमीशो भवति तान्युनः।<br>संसारोऽयं महाराज सदैवैवंविधः स्मृतः ॥ २१<br><br>नान्यथा प्रभवत्येव शुभाशुभमयः किल। | यह पूर्णरूपसे स्पष्ट है कि दूसरोंको उपदेश देनेमें सभी लोग शिष्ट बन जाते हैं, किंतु अपना कार्य पड़नेपर उस उपदेशका पूर्णतः लोप हो जाता है। जो काम, क्रोध, लोभ, द्रोह, अहंकार और डाह आदि विकार हैं; उन्हें छोड़नेमें कौन-सा देहधारी प्राणी समर्थ हो सकता है? हे महाराज! यह संसार सदासे ही इसी प्रकार शुभाशुभसे युक्त कहा गया है, इसमें सन्देह नहीं है॥ १९—२१ ½ ॥ | | कदाचिद्भगवान्विष्णुस्तपश्चरति दारुणम् ॥ २२<br><br>कदाचिद्विविधान्यज्ञान्वितनोति सुराधिपः।<br>कदाचित्तु रमारङ्गरञ्जितः परमेश्वरः ॥ २३<br><br>रमते किल वैकुण्ठे तद्वशस्तरुणो विभुः।<br>कदाचिद्दानवैः सार्धं युद्धं परमदारुणम् ॥ २४<br><br>करोति करुणासिन्धुस्तद्बाणापीडितो भृशम्।<br>कदाचिज्जयमाप्नोति दैवात्सोऽपि पराजयम् ॥ २५<br><br>सुखदुःखाभिभूतोऽसौ भवत्येव न संशयः।<br>शेषे शेते कदाचिद्वै योगनिद्रासमावृतः ॥ २६<br><br>काले जागर्ति विश्वात्मा स्वभावप्रतिबोधितः। | कभी भगवान् विष्णु घोर तपस्या करते हैं, कभी वे ही सुरेश्वर अनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं, कभी वे परमेश्वर विष्णु लक्ष्मीके प्रेम-रसमें सिक्त होकर उनके वशीभूत हो वैकुण्ठमें विहार करते हैं। वे करुणासागर विष्णु कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण युद्ध करते हैं और उनके बाणोंसे आहत हो जाते हैं। [उस युद्धमें] वे कभी विजयी होते हैं और कभी दैववश पराजित भी हो जाते हैं। इस प्रकार वे भी सुख तथा दुःखसे प्रभावित होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। वे विश्वात्मा कभी योगनिद्राके वशवर्ती होकर शेषशय्यापर शयन करते हैं और कभी सृष्टिकाल आनेपर योगमायासे प्रेरित होकर जाग भी जाते हैं॥ २२—२६ ½ ॥ |

अ० १३] चतुर्थ स्कन्ध ४६३

अ० १३] चतुर्थ स्कन्ध ४६३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शर्वो ब्रह्मा हरिश्चेति इन्द्राद्या ये सुरास्तथा ॥ २७<br><br>मुनयश्च विनिर्मायैः स्वायुषो विचरन्ति हि।<br>निशावसाने सञ्जाते जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २८<br><br>म्रियते नात्र सन्देहो नृप किञ्चित्कदापि च।<br>स्वायुषोऽन्ते पद्माद्याः क्षयमृच्छन्ति पार्थिव ॥ २९<br><br>प्रभवन्ति पुनर्विष्णुहरशक्रादयः सुराः।ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र आदि जो देवता तथा मुनिगण हैं—वे भी अपनी आयुके परिमाणकालतक ही जीवित रहते हैं। हे राजन्! अन्तकाल आनेपर स्थावर-जंगमात्मक यह जगत् भी विनष्ट हो जाता है, इसमें कभी भी कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिये। हे भूपाल! अपनी आयुका अन्त हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र आदि देवता भी विनष्ट हो जाते हैं और [सृष्टिकाल आनेपर] पुनः ये उत्पन्न भी हो जाते हैं॥ २७—२९ १/२॥
तस्मात्कामादिकान्भावान्देहवान्प्रतिपद्यते ॥ ३०<br><br>नात्र ते विस्मयः कार्यः कदाचिदपि पार्थिव।<br>संसारोऽयं तु सन्दिग्धः कामक्रोधादिभिर्नृप ॥ ३१<br><br>दुर्लभस्तद्विनिर्मुक्तः पुरुषः परमार्थवित्।अतएव देहधारी प्राणी काम आदि भावोंसे ग्रस्त हो ही जाता है; हे राजन्! इस विषयमें आपको कभी भी विस्मय नहीं करना चाहिये। हे राजन्! यह संसार तो काम, क्रोध आदिसे ओतप्रोत है। इनसे पूर्णतः मुक्त तथा परम तत्त्वको जाननेवाला पुरुष दुर्लभ है॥ ३०—३१ १/२॥
यो बिभेतीह संसारे स दारान्न करोत्यपि ॥ ३२<br><br>विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो विचरत्यविशङ्कितः।<br>तस्माद् बृहस्पतेर्भार्या शशिना लम्भिता पुनः ॥ ३३<br><br>गुरुणा लम्भिता भार्या तथा भ्रातुर्यवीयसः।<br>एवं संसारचक्रेऽस्मिन् रागलोभादिभिर्वृतः ॥ ३४<br><br>गार्हस्थ्यञ्च समास्थाय कथं मुक्तो भवेन्नरः।जो इस संसारमें [काम, क्रोध आदि विकारोंसे] डरता है, वह विवाह नहीं करता। वह समस्त प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त होकर निर्भीकतापूर्वक विचरता है। इसके विपरीत संसारसे आबद्ध रहनेके कारण ही बृहस्पतिकी पत्नीको चन्द्रमाने रख लिया था और देवगुरु बृहस्पतिने अपने छोटे भाईकी पत्नीको अपना लिया था। इस प्रकार इस संसार-चक्रमें राग, लोभ आदिसे जकड़ा हुआ मनुष्य गृहस्थीमें आसक्त रहकर भला मुक्त कैसे हो सकता है?॥ ३२—३४ १/२॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन हित्वा संसारसारताम् ॥ ३५<br><br>आराधयेन्महेशानीं सच्चिदानन्दरूपिणीम्।<br>तन्मायागुणतश्छन्नं जगदेतच्चराचरम् ॥ ३६<br><br>भ्रमत्युन्मत्तवत्सर्वं मदिरामत्तवन्नृप।अतः पूर्ण प्रयत्नके साथ संसारमें आसक्तिका त्याग करके सच्चिदानन्दस्वरूपिणी भगवती महेश्वरीकी आराधना करनी चाहिये। हे राजन्! यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उन्हींके मायारूपी गुणसे आच्छादित होकर उन्मत्त तथा मदिरापान करके मतवाले मनुष्यकी भाँति चक्कर काटता रहता है॥ ३५—३६ १/२॥
तस्या आराधनैनैव गुणान्सर्वान्विमृद्य च ॥ ३७<br><br>मुक्तिं भजेत मतिमान्नान्यः पन्थास्त्वितः परः।<br>आराधिता महेशानी न यावत्कुरुते कृपाम् ॥ ३८<br><br>तावद्द्रवेत्सुखं कस्मात्कोऽन्योऽस्ति दयया युतः।<br>करुणासागरामेतां भजेत्तस्मादमायया ॥ ३९<br><br>यस्यास्तु भजनेनैव जीवन्मुक्तत्वमश्नुते।उन्हींकी आराधनाके द्वारा [सत्त्व आदि] सभी गुणोंको पराभूत करके बुद्धिमान् मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकता है, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है। आराधित होकर महेश्वरी जबतक कृपा नहीं करतीं, तबतक सुख कैसे हो सकता है? उनके सदृश दयावान् दूसरा कौन है? अतः निष्कपट भावसे करुणासागर भगवतीकी आराधना करनी चाहिये, जिनके भजनसे मनुष्य जीते-जी मुक्ति प्राप्त कर सकता है॥ ३७—३९ १/२॥
४६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य सेविता न महेश्वरी ॥ ४०<br><br>निःश्रेणिकाग्रात्पतिता अध इत्येव विद्महे ।<br>अहङ्कारावृतं विश्वं गुणत्रयसमन्वितम् ॥ ४१<br><br>असत्येनापि सम्बद्धं मुच्यते कथमन्यथा ।<br>हित्वा सर्वं ततः सर्वैः संसेव्या भुवनेश्वरी ॥ ४२दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर जिसने उन महेश्वरीकी उपासना नहीं की, वह मानो अन्तिम सीढ़ीसे फिसलकर गिर गया—मैं तो यही धारणा रखता हूँ। सम्पूर्ण विश्व अहंकारसे आच्छादित है, तीनों गुणोंसे युक्त है तथा असत्यसे बँधा हुआ है, तब प्राणी मुक्त कैसे हो सकता है? अतः सब कुछ छोड़कर सभी लोगोंको भगवती भुवनेश्वरीकी उपासना करनी चाहिये॥ ४०—४२॥
राजोवाच<br>किं कृतं गुरुणा तत्र काव्यरूपधरेण च ।<br>कदा शुक्रः समायातस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ४३राजा बोले—हे पितामह! शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिने वहाँ दैत्योंके पास पहुँचकर क्या किया और शुक्राचार्य पुनः कब लौटे? वह हमें बताइये॥ ४३॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यत्कृतं गुरुणा तदा ।<br>कृत्वा काव्यस्वरूपञ्च प्रच्छन्नेन महात्मना ॥ ४४व्यासजी बोले—हे राजन्! तब गोपनीय ढंगसे शुक्राचार्यका स्वरूप बनाकर देवगुरुने जो कुछ किया, वह मैं बताता हूँ, आप सुनिये॥ ४४॥
गुरुणा बोधिता दैत्या मत्वा काव्यं स्वकं गुरुम् ।<br>विश्वासं परमं कृत्वा बभूवुस्तन्मयास्तदा ॥ ४५देवगुरु बृहस्पतिने दैत्योंको बोध प्रदान किया। तब शुक्राचार्यको अपना गुरु समझकर और उनपर पूर्ण विश्वास करके सभी दैत्य उन्हींके कथनानुसार व्यवहार करने लगे॥ ४५॥
विद्यार्थं शरणं प्राप्ता भृगुं मत्वातिमौहिताः ।<br>गुरुणा विप्रलब्धास्ते लोभात्को वा न मुह्यति ॥ ४६अत्यधिक मोहितचित्त वे दैत्य बृहस्पतिको शुक्राचार्य समझकर विद्याप्राप्तिके लिये उनके शरणागत हुए। देवगुरु बृहस्पतिने भी उन्हें बहुत ठगा। [यह सत्य है कि] लोभसे कौन-सा प्राणी मोहमें नहीं पड़ जाता॥ ४६॥
दशवर्षात्मके काले सम्पूर्णसमये तदा ।<br>जयन्त्या सह क्रीडित्वा काव्यो याज्यानचिन्तयत् ॥ ४७<br><br>आशया मम मार्गं ते पश्यन्तः संस्थिताः किल ।<br>गत्वा तान्वै प्रपश्येऽहं याज्यानतिभयातुरान् ॥ ४८<br><br>मा देवेभ्यो भयं तेषां मद्भक्तानां भवेदिति ।<br>सञ्चिन्त्य बुद्धिमास्थाय जयन्तीं प्रत्युवाच ह ॥ ४९<br><br>देवानेवोपसंयान्ति पुत्रा मे चारुलोचने ।<br>समयस्तेऽद्य सम्पूर्णो जातोऽयं दशवार्षिकः ॥ ५०<br><br>तस्माद् गच्छाम्यहं देवि द्रष्टुं याज्यान्सुमध्यमे ।<br>पुनरेवागमिष्यामि तवान्तिकमनुद्रुतः ॥ ५१तब जयन्तीके साथ क्रीडा करते-करते निर्धारित प्रतिज्ञासम्बन्धी दस वर्षकी अवधि पूर्ण हो जानेपर शुक्राचार्य अपने यजमानोंके विषयमें विचार करने लगे कि मेरी राह देखते हुए वे आशान्वित हो बैठे होंगे। अतः अब मैं चलकर अपने उन अत्यन्त भयभीत यजमानोंको देखूँ। कहीं ऐसा न हो कि मेरे उन भक्तोंके सम्मुख देवताओंसे कोई भय उत्पन्न हो गया हो॥ ४७-४८ ½॥<br><br>यह सोचकर अपनी बुद्धि स्थिर करके उन्होंने जयन्तीसे कहा—हे सुनयने! मेरे पुत्रसदृश दैत्यगण देवताओंके पास कालक्षेप कर रहे हैं। प्रतिज्ञानुसार तुम्हारे साथ रहनेका दस वर्षका समय पूरा हो चुका है, अतः हे देवि! अब मैं अपने यजमानोंसे मिलने जा रहा हूँ। हे सुमध्यमे! मैं पुनः तुम्हारे पास शीघ्र ही लौट आऊँगा॥ ४९—५१॥