देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १७] षष्ठ स्कन्ध ८०३
अ० १७] षष्ठ स्कन्ध ८०३
| लोभ एव मनुष्याणां देहसंस्थो महारिपुः।<br>सर्वदुःखाकरः प्रोक्तो दुःखदः प्राणनाशकः॥ ४६ | लोभ मनुष्योंके देहमें रहनेवाला सबसे बड़ा शत्रु है। यह समस्त दुःखोंका आगार, दुःखदायी तथा प्राणोंका नाश करनेवाला कहा गया है॥ ४६॥ |
| सर्वपापस्य मूलं हि सर्वदा तृष्णायान्वितः।<br>विरोधकृत्त्रिवर्णानां सर्वार्तेः कारणं तथा॥ ४७ | यह लोभ सम्पूर्ण पापोंकी जड़ तथा सभी दुःखोंका कारण है। लोभसे युक्त प्राणी सदा तीनों वर्णोंके लोगोंसे विरोध रखनेवाला होता है॥ ४७॥ |
| लोभात्त्यजन्ति धर्मं वै कुलधर्मं तथैव हि।<br>मातरं भ्रातरं हन्ति पितरं बान्धवं तथा॥ ४८ | लोभके वशीभूत प्राणी अपने सदाचार तथा कुल-धर्मका भी परित्याग कर देते हैं। वे अपने माता, पिता, भाई, बान्धव, गुरु, मित्र, पत्नी, पुत्र तथा बहनतकका वध कर देते हैं। इस प्रकार लोभके वशीभूत मनुष्य पापसे विमोहित होकर कौन-सा दुष्कर्म नहीं कर डालता॥ ४८-४९॥ |
| गुरुं मित्रं तथा भार्यां पुत्रं च भगिनीं तथा।<br>लोभाविष्टो न किं कुर्यादकृत्यं पापमोहितः॥ ४९ | |
| क्रोधात्कामादहङ्कारालोभ एव महारिपुः।<br>प्राणांस्त्यजति लोभेन किं पुनः स्यादनावृतम्॥ ५० | क्रोध, काम तथा अहंकारसे भी बढ़कर लोभ महान् शत्रु है। लोभमें पड़कर मनुष्य अपने प्राणतक गँवा देता है; फिर इसके विषयमें और क्या कहा जाय !॥ ५०॥ |
| पूर्वजास्ते महाराज धर्मज्ञाः सत्पथे स्थिताः।<br>पाण्डवाः कौरवाश्चैव लोभेन निधनं गताः॥ ५१ | हे महाराज ! आपके पूर्वज धर्मज्ञ तथा सत्यपथपर चलनेवाले थे, किंतु वे पाण्डव तथा कौरव लोभके कारण ही मारे गये। जहाँ भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, बाह्रीक, भीमसेन, धर्मपुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन तथा श्रीकृष्ण थे, फिर भी लोभके वशीभूत उन्होंने आपसमें भीषण युद्ध किया और अपने कुटुम्बका महाविनाश कर डाला। उस युद्धमें द्रोण, भीष्म, पाण्डवोंके पुत्र, भाई, पिता, पुत्र सभी मारे गये॥ ५१-५४॥ |
| यत्र भीष्मश्च द्रोणश्च कृपः कर्णश्च बाह्लिकः।<br>भीमसेनो धर्मपुत्रस्तथैवार्जुनकेशवौ॥ ५२ | |
| तथापि युद्धमत्युग्रं कृतं तैश्च परस्परम्।<br>कुटुम्बकदनं भूरि कृतं लोभात्तैरैरिह॥ ५३ | |
| हतो द्रोणो हतो भीष्मस्तथैव पाण्डवात्मजाः।<br>भ्रातरः पितरः पुत्राः सर्वे वै निहता रणे॥ ५४ | |
| तस्माल्लोभाभिभूतस्तु किं न कुर्यान्नरः किल।<br>हैहयैर्निहताः सर्वे भृगवः पापबुद्धिभिः॥ ५५ | अतएव लोभपरायण मनुष्य क्या नहीं कर डालता? [लोभके कारण ही] पापबुद्धि हैहयवंशी क्षत्रियोंने भृगुकुलके समस्त ब्राह्मणोंको मार डाला था॥ ५५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयैर्धनाहरणेन सह भृगूणां वधवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः
भगवतीकी कृपासे भार्गव-ब्राह्मणीकी जंघासे तेजस्वी बालककी उत्पत्ति, हैहयवंशी क्षत्रियोंकी उत्पत्तिकी कथा
| जनमेजय उवाच<br>कथं ताश्च स्त्रियः सर्वा भृगूणां दुःखसागरात्।<br>मुक्ता वंशः पुनस्तेषां ब्राह्मणानां स्थिरोऽभवत्॥ १ | जनमेजय बोले— भृगुवंशकी स्त्रियोंका पुनः दुःखरूप समुद्रसे कैसे उद्धार हुआ और उन ब्राह्मणोंकी वंशपरम्परा किस प्रकार स्थिर रही?॥ १॥ |
| हैहयैः किं कृतं कार्यं हत्वा तान्ब्राह्मणानपि।<br>क्षत्रियैर्लोभसंयुक्तैः पापाचारैर्वदस्व तत्॥ २ | लोभके वशीभूत तथा पापाचारी हैहय क्षत्रियोंने उन ब्राह्मणोंको मारनेके पश्चात् कौन-सा कार्य किया? उसे आप बताइये॥ २॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 C
| ८०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न तृप्तिरस्ति मे ब्रह्मन् पिबतस्ते कथामृतम् ।<br>पावनं सुखदं नृणां परलोके फलप्रदम् ॥ ३ | हे ब्रह्मन्! आपके द्वारा कथित इस पवित्र, लोगोंके लिये सुखदायक तथा परलोकमें फल देनेवाले कथामृतका पान करते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ३ ॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् ।<br>यथा स्त्रियस्तु ता मुक्ता दुःखात्तस्माद्दुरत्ययात् ॥ ४ | व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, वे स्त्रियाँ उस भयावह दुःखसे जिस प्रकार मुक्त हुई, अब मैं उस पापनाशिनी कथाका वर्णन करूँगा ॥ ४ ॥ |
| भृगुपत्न्यो यदा राजन् हिमवन्तं गिरिं गताः ।<br>भयत्रस्ता विभग्नाशा हैहयैः पीडिता भृशम् ॥ ५ | हे राजन्! जब क्षत्रिय हैहय भृगुकुलकी नारियोंको बहुत पीड़ित करने लगे तब वे भयभीत तथा निराश होकर हिमालयपर्वतपर चली गयीं ॥ ५ ॥ |
| गौरीं तत्र तु संस्थाप्य मृण्मयीं सरितस्तटे ।<br>उपोषणपराश्चक्रुर्निश्चयं मरणं प्रति ॥ ६ | उन्होंने वहाँ नदीके तटपर गौरीकी मृण्मयी प्रतिमा स्थापित करके निराहार रहते हुए [उपासनामें लीन होकर] अपने मरणके प्रति पूरा निश्चय कर लिया ॥ ६ ॥ |
| स्वप्ने गत्वा तदा देवी प्राह ताः प्रमदोत्तमाः ।<br>युष्मासु मध्ये कस्याश्चिद्भविता चोरुजः पुमान् ॥ ७<br>मदंशशक्तिसम्भिन्नः स वः कार्यं विधास्यति ।<br>इत्यादिश्य पराम्बा सा पश्चादन्तर्हिताभवत् ॥ ८ | एक समय स्वप्नमें भगवती जगदम्बाने उन उत्तम स्त्रियोंके पास पहुँचकर कहा—तुमलोगोंमेंसे किसीकी जंघासे एक पुरुष उत्पन्न होगा। मेरा अंशभूत वही शक्तिमान् पुरुष तुमलोगोंका कार्य सिद्ध करेगा। ऐसा कहकर पराम्बा भगवती अन्तर्धान हो गयीं ॥ ७-८ ॥ |
| जागृतास्तु ततः सर्वा मुदमापुर्वराङ्गनाः ।<br>काचित्तासां भयोद्विग्ना कामिनी चतुरा भृशम् ॥ ९<br>दधार चोरुणैकेन गर्भं सा कुलवृद्धये । | जागनेपर वे सभी स्त्रियाँ बहुत प्रसन्न हुईं। उनमेंसे किसी चतुर, कामिनी स्त्रीने जो भयसे त्रस्त थी; वंशवृद्धिकेहेतु अपनी एक जंघामें गर्भ धारण किया ॥ ९ १/२ ॥ |
| पलायनपरा दृष्टा क्षत्रियैर्ब्राह्मणी यदा ॥ १०<br>विह्वला तेजसा युक्ता तदा ते दुद्रुवुर्भृशम् । | जब उन हैहय क्षत्रियोंने व्याकुल तथा तेजयुक्त उस स्त्रीको भागती हुई देखा तब वे उसके पीछे दौड़ पड़े ॥ १० १/२ ॥ |
| गृह्यतां वध्यतां नारी सगर्भा याति सत्वरा ॥ ११<br>इति ब्रुवन्तः सम्प्राप्ताः कामिनीं खड्गपाणयः । | 'यह गर्भ धारण करके वेगपूर्वक भागी जा रही है, इसे पकड़ लो और मार डालो'—इस प्रकार कहते हुए हाथमें तलवार लेकर वे उस स्त्रीके पास पहुँच गये ॥ ११ १/२ ॥ |
| सा भयार्ता तु तान्दृष्ट्वा रुरोद समुपागतान् ॥ १२<br>गर्भस्य रक्षणार्थं सा चुक्रोशातिभयातुरा । | भयसे घबरायी हुई वह स्त्री अपने समीप आये हुए उन क्षत्रियोंको देखकर रोने लगी और पुनः गर्भरक्षाके लिये भयसे विह्वल होकर जोर-जोरसे विलाप करने लगी ॥ १२ १/२ ॥ |
| रुदतीं मातरं श्रुत्वा दीनां प्राणविवर्जिताम् ॥ १३<br>निराधारां क्रन्दमानां क्षत्रियैर्भृशतापिताम् ।<br>गृहीतामिव सिंहेन सगर्भां हरिणीं यथा ॥ १४<br>साश्रुनेत्रां वेपमानां सङ्क्रुध्य बालकस्तदा ।<br>भित्त्वोरुं निर्जगामाशु गर्भः सूर्य इवापरः ॥ १५<br>मुष्णन्दृष्टीः क्षत्रियाणां तेजसा बालकः शुभः । | तब दयनीय दशावाली, प्राणहीन-सी प्रतीत हो रही, आश्रयहीन, क्षत्रियोंसे पीड़ित होनेके कारण क्रन्दन करती हुई, सिंहके द्वारा पकड़ी गयी गर्भवती हिरनीके समान प्रतीत होनेवाली, आँसूभरे नेत्रोंवाली तथा थर-थर काँपती हुई माताका रुदन सुनकर वह सुन्दर गर्भस्थ बालक कुपित होकर अपने तेजसे क्षत्रियोंकी नेत्र-ज्योतिका हरण करता हुआ जंघाका भेदन करके दूसरे सूर्यकी भाँति शीघ्र ही बाहर निकल आया ॥ १३-१५ १/२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 26 D
| अ० १७] | षष्ठ स्कन्ध | ८०५ |
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| दर्शनाद् बालकस्याशु सर्वे जाता विलोचनाः ॥ १६ <br><br> बभ्रमुर्गिरिदुर्गेषु जन्मान्धा इव क्षत्रियाः । <br> चिन्तितं मनसा सर्वैः किमेतदिति साम्प्रतम् ॥ १७ <br><br> सर्वे चक्षुर्विहीना यज्जाताः स्म बालदर्शनात् । <br> ब्राह्मण्यास्तु प्रभावोऽयं सतीव्रतबलं महत् ॥ १८ <br><br> क्षणाद्दामोघसङ्कल्पाः किं करिष्यन्ति दुःखिताः । <br> इति सञ्चिन्त्य मनसा नेत्रहीना निराश्रयाः ॥ १९ <br><br> ब्राह्मणीं शरणं जग्मुर्हैहया गतचेतसः । <br> प्रणेमुस्तां भयत्रस्तां कृताञ्जलिपुटाश्च ते ॥ २० <br><br> ऊचुश्चैनां भयोद्विग्नां दृष्ट्यर्थं क्षत्रियर्षभाः । <br> प्रसीद सुभगे मातः सेवकास्ते वयं किल ॥ २१ <br><br> कृतापराधा रम्भोरु क्षत्रियाः पापबुद्धयः । <br> दर्शनात्तव तन्वङ्गि जाताः सर्वे विलोचनाः ॥ २२ <br><br> मुखं ते नैव पश्यामो जन्मान्धा इव भामिनि । <br> अद्भुतं ते तपो वीर्यं किं कुर्मः पापकारिणः ॥ २३ <br><br> शरणं ते प्रपन्नाः स्मो देहि चक्षूंषि मानदे । <br> अन्धत्वं मरणादुग्रं कृपां कर्तुं त्वमर्हसि ॥ २४ <br><br> पुनर्दृष्टिप्रदानेन सेवकांश्क्षत्रियान्कुरु । <br> उपरम्य च गच्छेम सहिताः पापकर्मणः ॥ २५ <br><br> अतः परं न कर्तव्यमीदृशं कर्म कर्हिचित् । <br> भार्गवाणां तु सर्वेषां सेवकाः स्मो वयं किल ॥ २६ <br><br> अज्ञानाद्यत्कृतं पापं क्षन्तव्यं तत्त्वयाधुना । <br> वैरं नातः परं क्वापि भृगुभिः क्षत्रियैः सह ॥ २७ <br><br> कर्तव्यं शपथैः सम्यग्वर्तितव्यं तु हैहयैः । <br> सपुत्रा भव सुश्रोणि प्रणताः स्मो वयं च ते ॥ २८ <br><br> प्रसादं कुरु कल्याणि न द्विष्यामः कदाचन । <br><br> व्यास उवाच <br> इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्राह्मणी विस्मयान्विता ॥ २९ | उस बालककी ओर देखते ही वे सभी दृष्टिहीन हो गये। तत्पश्चात् वे क्षत्रिय जन्मान्धकी भाँति पर्वतकी गुफाओंमें इधर-उधर भटकने लगे। सभी क्षत्रिय मनमें विचार करने लगे कि इस समय यह क्या हो गया है कि हम सभी लोग बालकको देखनेमात्रसे चक्षुहीन हो गये। ऐसा प्रतीत होता है कि इसी ब्राह्मणीका यह प्रभाव है; क्योंकि सतीव्रत एक महान् बल है। अमोघ संकल्पवाली दुःखित स्त्रियाँ क्षणभरमें न जाने क्या कर डालेंगी! ॥ १६-१८ १/२ ॥ <br><br> ऐसा मनमें सोचकर नेत्रहीन, निराश्रय तथा चेतना-रहित हैहयवंशी क्षत्रिय उस ब्राह्मणीकी शरणमें गये और उन्होंने भयसे त्रस्त उस स्त्रीको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। वे श्रेष्ठ क्षत्रिय अपनी नेत्रज्योतिके लिये इस भयाकुल ब्राह्मणीसे कहने लगे— ॥ १९-२० १/२ ॥ <br><br> हे सुभगे! हे माता! हम सब आपके सेवक हैं। अब आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइये। हे रम्भोरु! पाप बुद्धिवाले हम क्षत्रियोंने अपराध किया है। हे तन्वंगि! इसीलिये आपको देखते ही हम सब चक्षुविहीन हो गये। हे भामिनि! जन्मसे अन्धे व्यक्तिकी भाँति हम आपका मुखदर्शन कर पानेमें समर्थ नहीं हैं। आपका तप तथा पराक्रम अद्भुत है; हम पापपरायण कर ही क्या सकते हैं? हे मानदे! हम आपकी शरणमें हैं। हमें नेत्र दीजिये; क्योंकि नेत्रज्योतिसे विहीन हो जाना मृत्युसे भी कष्टकारक होता है। आप हमारे ऊपर कृपा कीजिये। फिरसे नेत्रज्योति देकर इन समस्त क्षत्रियोंको अपना सेवक बना लीजिये। इसके बाद पापकर्मसे रहित होकर हमलोग साथ-साथ चले जायेंगे। अब हमलोग इस प्रकारका कर्म कभी नहीं करेंगे। अब हम सभी भार्गव ब्राह्मणोंके सेवक हो गये। हमलोगोंने अज्ञानवश जो भी पाप किया है उसे आप क्षमा करें। हम हैहय क्षत्रिय शपथपूर्वक कहते हैं कि आजसे कभी भी भृगुवंशी ब्राह्मणोंके साथ हमें वैरभाव नहीं रखना चाहिये और यथोचित व्यवहार करना चाहिये। हे सुश्रोणि! आप पुत्रवती होवें। हम आपकी शरणमें हैं। हे कल्याणि! आप कृपा करें; हमलोग अब कभी भी द्वेषभाव नहीं रखेंगे ॥ २१-२८ १/२ ॥ <br><br> व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उन क्षत्रियोंकी यह बात सुनकर ब्राह्मणी विस्मयमें पड़ गयी और उसने शरणागत तथा दुर्गतिंको प्राप्त उन नेत्रहीन |
| ८०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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| तानाह प्रणतान्दुःखान्नाश्वास्य गतलोचनान्।<br>गृहीता न मया दृष्टिर्युष्माकं क्षत्रियाः किल॥ ३० | क्षत्रियोंको आश्वासन देकर कहा—हे क्षत्रियो! आपलोग निश्चितरूपसे जान लें कि मैंने आप सबकी दृष्टिका हरण नहीं किया है॥ २९-३०॥ | | नाहं रुषान्विता सत्यं कारणं शृणुताद्य यत्।<br>अयं च भार्गवो नूनमूरुजः कुपितोऽद्य वः॥ ३१ | मैं आपलोगोंपर कुपित नहीं हूँ। अब मैं वास्तविक कारण बता रही हूँ, आपलोग सुनिये। मेरी जंघासे उत्पन्न यह भृगुवंशी बालक आज आपलोगोंपर कुपित है। क्षत्रियोंके द्वारा अपने बान्धवों और यहाँतक कि गर्भस्थित बालकोंका वध किये जानेकी बात जानकर कोपाविष्ट इसी बालकने आपलोगोंके नेत्र स्तम्भित कर दिये हैं॥ ३१-३२॥ | | चक्षूंषि तेन युष्माकं स्तम्भितानि रुषावता।<br>स्वबन्धून्निहताञ्ज्ञात्वा गर्भस्थानपि क्षत्रियैः॥ ३२ | | | अनागसो धर्मपरांस्तापसान्धनकाम्यया।<br>गर्भानपि यदा यूयं भृगूनघ्नंस्तु पुत्रकाः॥ ३३ | हे वत्सगण! जब आपलोग निरपराध, धर्मनिष्ठ तथा तपस्वी भार्गव ब्राह्मणों और गर्भस्थ बालकोंको भी धन-लोलुपतामें पड़कर मार रहे थे तभी मैंने इसे अपनी जंघामें गर्भरूपसे एक सौ वर्षतक धारण किये रखा। भृगुवंशकी वृद्धिके लिये इस गर्भस्थ बालकने छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका बड़े सहजभावसे अध्ययन कर लिया है और अब यह अपने पितृजनोंके वधसे अत्यन्त कुपित होकर आपलोगोंका संहार करना चाहता है॥ ३३—३५॥ | | तदायमूरुणा गर्भो मया वर्षशतं धृतः।<br>षडङ्गश्चाखिलो वेदो गृहीतोऽनेन चाञ्जसा॥ ३४ | | | गर्भस्थेनापि बालेन भृगुवंशविवृद्धये।<br>सोऽपि पितृवधान्नूंनं क्रोधोद्धो हन्तुमिच्छति॥ ३५ | | | भगवत्याः प्रसादेन जातोऽयं मम बालकः।<br>तेजसा यस्य दिव्येन चक्षूंषि मुषितानि वः॥ ३६ | मेरा यह पुत्र भगवतीकी कृपासे उत्पन्न हुआ है, जिसके अलौकिक तेजने आपलोगोंके नेत्र हर लिये हैं॥ ३६॥ | | तस्मादौर्वं सुतं मेऽद्य याचध्वं विनयान्विताः।<br>प्रणिपातेन तुष्टोऽसौ दृष्टिं वः प्रतिमोक्ष्यति॥ ३७ | अतएव आपलोग इसी समय मेरी जंघासे उत्पन्न इस बालकसे विनम्रतापूर्वक याचना कीजिये। चरणोंमें गिरनेसे प्रसन्न होकर यह बालक आपलोगोंकी नेत्रज्योति मुक्त कर देगा॥ ३७॥ | | व्यास उवाच | व्यासजी बोले— | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या हैहयास्तुष्टुवुश्च तम्।<br>प्रणेमुर्विनयोपेता ऊरुजं मुनिसत्तमम्॥ ३८ | उस ब्राह्मणीका वचन सुनकर हैहयोंने जंघासे उत्पन्न बालकरूप मुनिश्रेष्ठको प्रणाम किया और वे विनयसे युक्त होकर उसकी स्तुति करने लगे॥ ३८॥ | | स सन्तुष्टो बभूवाथ तानुवाच विचक्षणः।<br>गच्छध्वं स्वगृहान्भूपा ममाख्यानकृतं वचः॥ ३९ | तत्पश्चात् प्रसन्न होकर उस बालकने उन नेत्रहीन क्षत्रियोंसे कहा—हे राजाओ! अब तुमलोग मेरी कही हुई बातपर विश्वास करके अपने घर लौट जाओ॥ ३९॥ | | अवश्यम्भाविभावास्ते भवन्ति देवनिर्मिताः।<br>नात्र शोकस्तु कर्तव्यः पुरुषेण विजानता॥ ४० | दैवने जो विधान सुनिश्चित कर दिये हैं, वे अवश्य होकर रहते हैं; ज्ञानी व्यक्तिको इस विषयमें चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥ ४०॥ | | पूर्ववदृषयः सर्वे प्राप्नुवन्तु यथासुखम्।<br>व्रजन्तु विगतक्रोधा भवनानि यथासुखम्॥ ४१ | सभी ऋषिगण पूर्वकी भाँति सुख प्राप्त करें तथा सभी क्षत्रिय भी अब क्रोधरहित होकर सुखपूर्वक अपने-अपने घरोंके लिये प्रस्थान करें॥ ४१॥ |
| अ० १७ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८०७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति तेन समादिष्टा हैहयाः प्राप्तलोचनाः।<br>और्वमामन्त्र्य जग्मुस्ते सदनानि यथारुचि ॥ ४२ | इस प्रकार उसके कहनेपर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंको दृष्टि प्राप्त हो गयी और वे और्व (ऊरुसे उत्पन्न) उस बालकसे आज्ञा लेकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने घर चले गये॥ ४२ ॥ |
| ब्राह्मणी तं सुतं दिव्यं गृहीत्वा स्वाश्रमं गता।<br>पालयामास भूपाल तेजस्विनमतन्द्रिता ॥ ४३ | हे राजन्! वह ब्राह्मणी भी उस तेजस्वी तथा अलौकिक बालकको लेकर अपने आश्रम चली गयी और बड़ी सावधानीपूर्वक उसका पालन-पोषण करने लगी ॥ ४३ ॥ |
| एवं ते कथितं राजन् भृगूणां तु विनाशनम्।<br>लोभाविष्टैः क्षत्रियैश्च यत्कृतं पातकं किल ॥ ४४ | हे राजन्! इस प्रकार भृगुवंशके विनाश तथा लोभके वशीभूत हैहय क्षत्रियोंने जो पापकर्म किया था; उसके विषयमें मैंने आपसे कहा ॥ ४४ ॥ |
| जनमेजय उवाच<br>श्रुतं मया महत्कर्म क्षत्रियाणाञ्च दारुणम्।<br>कारणं लोभ एवात्र दुःखदश्चोभयोस्तु सः ॥ ४५ | **जनमेजय बोले—**हे मुने! मैंने क्षत्रियोंके अत्यन्त दारुण कर्मके विषयमें सुन लिया। इहलोक तथा परलोकमें दुःख देनेवाला वह लोभ ही इसमें मूल कारण है॥ ४५ ॥ |
| किञ्चित्प्रष्टुमिहेच्छामि संशयं वासवीसूत।<br>हैहयास्ते कथं नाम्ना ख्याता भुवि नृपात्मजाः ॥ ४६ | हे सत्यवतीनन्दन! मैं संशयग्रस्त हूँ; [इस विषयमें] आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। ये क्षत्रिय राजकुमार इस जगत्में हैहय नामसे क्यों प्रसिद्ध हुए? ॥ ४६ ॥ |
| यदोस्तु यादवाः कामं भरताद्भारतास्तथा।<br>हैहयः कोऽपि राजाभूत्तेषां वंशे प्रतिष्ठितः ॥ ४७ | यदुसे यादव हुए तथा भरतसे भारत हुए। उसी प्रकार क्या उन क्षत्रियोंके वंशमें 'हैहय' नामधारी कोई प्रतिष्ठित राजा हुआ था ? ॥ ४७ ॥ |
| तदहं श्रोतुमिच्छामि कारणं करुणानिधे।<br>हैहयास्ते कथं जाताः क्षत्रियाः केन कर्मणा ॥ ४८ | हे करुणानिधान! उन हैहय क्षत्रियोंकी उत्पत्ति कैसे हुई तथा किस कर्मसे उनका यह नाम पड़ा ? वह कारण मैं सुनना चाहता हूँ॥ ४८ ॥ |
| व्यास उवाच<br>हैहयानां समुत्पत्तिं शृणु भूप सविस्तराम्।<br>पुरातनीं सुपुण्यां च कथां पापप्रणाशिनीम् ॥ ४९ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! अब मैं हैहयोंकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित अति प्राचीन, पुण्यदायिनी तथा पापनाशिनी कथाका विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ, आप इसे सुनिये ॥ ४९ ॥ |
| कस्मिश्चित्समये भूप सूर्यपुत्रः सुशोभनः।<br>रेवन्तेति च विख्यातो रूपवानमितप्रभः ॥ ५०<br><br>उच्चैःश्रवसमारुह्य हयरत्नं मनोहरम्।<br>जगाम विष्णुसदनं वैकुण्ठं भास्करात्मजः ॥ ५१ | हे महाराज! किसी समय अत्यन्त सुन्दर, रूपवान् तथा अपरिमित तेजवाले सूर्यपुत्र जो 'रेवन्त' नामसे विख्यात थे, अपने मनोहर अश्वरत्न उच्चैःश्रवापर आरूढ़ होकर भगवान् विष्णुके निवासस्थान वैकुण्ठलोक गये ॥ ५०-५१ ॥ |
| भगवद्दर्शनाकांक्षी हयारूढो यदागतः।<br>हयस्थस्तु तदा दृष्टो लक्ष्म्यासौ रविनन्दनः ॥ ५२ | विष्णुके दर्शनके आकांक्षी वे भास्करनन्दन घोड़ेपर सवार होकर जब वहाँ पहुँचे तब लक्ष्मीजीकी दृष्टि अश्वपर विराजमान रेवन्तपर पड़ गयी ॥ ५२ ॥ |
| रमा वीक्ष्य हयं दिव्यं भ्रातरं सागरोद्भवम्।<br>रूपेण विस्मिता तस्य तस्थौ स्तम्भितलोचना ॥ ५३ | समुद्रसे प्रादुर्भूत अपने भाई अलौकिक उच्चैःश्रवा घोड़ेको देखकर वे महान् विस्मयमें पड़ गयीं और उसके रूपको स्थिर नेत्रोंसे देखती रह गयीं ॥ ५३ ॥ |
| ८०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १७] | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भगवानपि तं दृष्ट्वा हयारूढं मनोहरम्।<br>आगच्छन्तं रमां विष्णुः पप्रच्छ प्रणयात्प्रभुः ॥ ५४<br><br>कोऽयमायाति चार्वङ्गि हयारूढ इवापरः।<br>स्मरतेजस्तनुः कान्ते मोहयन्भुवनत्रयम् ॥ ५५ | भगवान् विष्णुने उस मनोहर रेवन्तको घोड़ेपर बैठकर आता हुआ देखकर लक्ष्मीजीसे प्रेमपूर्वक पूछा—हे सुन्दर अंगोंवाली! हे प्रिये! दूसरे कामदेवके समान तेजोमय शरीरवाला यह कौन है जो घोड़ेपर सवार होकर तीनों लोकोंको मोहित करता हुआ इधर चला आ रहा है॥ ५४-५५॥ |
| प्रेक्षमाणा तदा लक्ष्मीस्तच्चित्ता दैवयोगतः।<br>नोवाच वचनं किञ्चित्पृष्टापि च पुनः पुनः ॥ ५६ | उस समय घोड़ेको एकटक देखते रहनेसे दैववशात् उसीमें चित्तयोग हो जानेके कारण भगवान् विष्णुके बार-बार पूछनेपर भी लक्ष्मीजीने कुछ नहीं कहा॥ ५६॥ |
| व्यास उवाच<br>अश्वासक्तमतिं वीक्ष्य कामिनीमतिमोहिताम्।<br>पश्यन्तीं परमप्रेम्णा चञ्चलाक्षीं च चञ्चलाम्॥ ५७<br><br>तामाह भगवान्क्रुद्धः किं पश्यसि सुलोचने।<br>मोहिता च हरिं दृष्ट्वा पृष्टा नैवाभिभाषसे ॥ ५८ | व्यासजी बोले—भगवान् विष्णु कामिनी, चपल नेत्रोंवाली तथा चंचला लक्ष्मीको अत्यन्त मोहित होकर अत्यधिक प्रेमके साथ निहारती हुई तथा उस अश्वमें अनुरक्त बुद्धिवाली देखकर क्रोधित हो उठे और उनसे बोले—हे सुलोचने! तुम क्या देख रही हो? इस घोड़ेको देखकर मोहित हुई तुम मेरे पूछनेपर भी उत्तर नहीं दे रही हो॥ ५७-५८॥ |
| सर्वत्र रमसे यस्माद्रमा तस्माद् भविष्यसि।<br>चञ्चलत्वाच्चलेत्येवं सर्वथैव न संशयः ॥ ५९ | क्योंकि तुम्हारा चित्त सभी ओर रमण करता है अतएव ‘रमा’ और तुम्हारी चंचल होके कारण तुम ‘चला’ कही जाओगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५९॥ |
| प्राकृता च यथा नारी नूनं भवति चञ्चला।<br>तथा त्वमपि कल्याणि स्थिरा नैव कदाचन ॥ ६० | जिस प्रकार सामान्य नारी चंचल होती है, उसी प्रकार हे कल्याणि! तुम भी कभी स्थिर स्वभाववाली नहीं रहोगी॥ ६०॥ |
| त्वं हयं मत्समीपस्था समीक्ष्य यदि मोहिता।<br>वडवा भव वामोरु मर्त्यलोकेऽतिदारुणे ॥ ६१ | मेरे पास रहनेपर भी तुम यदि एक अश्वको देखकर मोहित हो गयी हो तो हे वामोरु! तुम अत्यन्त दारुण मर्त्यलोकमें घोड़ीके रूपमें जन्म ग्रहण करो॥ ६१॥ |
| इति शप्ता रमा देवी हरिणा दैवयोगतः।<br>रुरोद वेपमाना सा भयभीतातिदुःखिता ॥ ६२ | दैवयोगसे भगवान् विष्णुने जब देवी लक्ष्मीको ऐसा शाप दे दिया तब वे अत्यन्त भयभीत तथा दुःखी होकर काँपती हुई रोने लगीं॥ ६२॥ |
| तमुवाच रमानाथं शङ्किता चारुहासिनी।<br>प्रणम्य शिरसा देवं स्वपतिं विनयान्विता ॥ ६३ | सुन्दर मुसकानवाली लक्ष्मीजी दुविधामें पड़ गयीं और अपने पति भगवान् विष्णुको विनयसे युक्त होकर मस्तक झुकाकर प्रणाम करके उनसे कहने लगीं— ॥ ६३॥ |
| देवदेव जगन्नाथ करुणाकर केशव।<br>स्वल्पेऽपराधे गोविन्द कस्माच्छापं ददासि मे ॥ ६४ | हे देवदेव! हे जगदीश्वर! हे करुणानिधान! हे केशव! हे गोविन्द! एक छोटेसे अपराधके लिये आपने मुझे ऐसा शाप क्यों दे दिया?॥ ६४॥ |
| न कदाचिन्मया दृष्टः क्रोधस्ते हीदृशः प्रभो।<br>क्व गतस्ते मयि स्नेहः सहजो न तु नश्वरः ॥ ६५ | हे प्रभो! मैंने आपका ऐसा क्रोध पहले कभी नहीं देखा। मेरे प्रति आपका वह सहज तथा शाश्वत प्रेम कहाँ चला गया?॥ ६५॥ |
| अ० १८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८०९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वज्रपातस्तु शत्रौ वै कर्तव्यो न सुहृज्जने।<br>सदाहं वरयोग्या ते शापयोग्या कथं कृता॥ ६६ | आपको वज्रपात शत्रुपर करना चाहिये न कि अपने स्नेहीजनपर। आपसे सदा वर पानेयोग्य मैं आज शापके योग्य कैसे हो गयी?॥ ६६॥ |
| प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द पश्यतोऽद्य तवाग्रतः।<br>कथं जीवे त्वया हीना विरहानलतापिता॥ ६७ | हे गोविन्द! मैं इसी समय आपके देखते-देखते आपके सामने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि आपसे वियुक्त होकर विरहाग्निमें जलती हुई मैं कैसे जीवित रह सकूँगी?॥ ६७॥ |
| प्रसादं कुरु देवेश शापादस्मात्सुदारुणात्।<br>कदा मुक्ता समीपं ते प्राप्नोमि सुखदं विभो॥ ६८ | हे देवेश! मेरे ऊपर कृपा कीजिये। हे विभो! अब मैं इस दारुण शापसे मुक्त होकर आपका सुखदायी सांनिध्य कब प्राप्त करूँगी?॥ ६८॥ |
| हरिरुवाच<br>यदा ते भविता पुत्रः पृथिव्यां मत्समः प्रिये।<br>तदा मां प्राप्य तन्वङ्गि सुखिता त्वं भविष्यसि॥ ६९ | हरि बोले— हे प्रिये! हे तन्वंगि! जब पृथ्वीलोकमें तुम्हें मेरे समान एक पुत्रकी प्राप्ति हो जायगी तब पुनः मुझे प्राप्त करके तुम सुखी हो जाओगी॥ ६९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयानामुत्पत्ति-प्रसङ्गे रमाविष्णुसंवादवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः
भगवती लक्ष्मीद्वारा घोड़ीका रूप धारणकर तपस्या करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जनमेजय उवाच<br>इति शप्ता भगवता सिन्धुजा कोपयोगतः।<br>कथं सा वडवा जाता रेवन्तेन च किं कृतम्॥ १ | जनमेजय बोले— [हे मुने!] इस प्रकार कोप करके भगवान्के द्वारा शापित लक्ष्मीजीने घोड़ीके रूपमें किस प्रकार जन्म लिया और इसके बाद रेवन्तने क्या किया?॥ १॥ |
| कस्मिन्देशेऽब्धिजा देवी वडवारूपधारिणी।<br>संस्थितैकाकिनी बाला परोषितपतिका यथा॥ २ | अपने पतिके प्रवासमें रहनेके कारण उसके वियोगमें एकाकिनी समय व्यतीत करनेवाली नारीकी भाँति लक्ष्मीजीने घोड़ीका रूप धारण करके किस देशमें समय व्यतीत किया?॥ २॥ |
| कालं कियन्तमायुष्मन् वियुक्ता पतिना रमा।<br>संस्थिता विजनेऽरण्ये किं कृतं च तया पुनः॥ ३ | हे आयुष्मन्! पतिसे वियुक्त रहते हुए लक्ष्मीजीने कितना समय बिताया और पुनः उस निर्जन वनमें रहती हुई उन्होंने क्या किया?॥ ३॥ |
| समागमं कदा प्राप्ता वासुदेवस्य सिन्धुजा।<br>पुत्रः कथं तया प्राप्तो नारायणवियुक्तया॥ ४ | समुद्रतनया लक्ष्मीको पुनः भगवान् विष्णुका समागम कब प्राप्त हुआ तथा विष्णुसे अलग रहते हुए उन्होंने किस प्रकार पुत्र प्राप्त किया?॥ ४॥ |
| एतद्वृत्तान्तमार्येश कथयस्व सविस्तरम्।<br>श्रोतुकामोऽस्मि विप्रेन्द्र कथाख्यानमनुत्तमम्॥ ५ | हे आर्येश! इस वृत्तान्तका वर्णन विस्तारके साथ कीजिये। हे विप्रवर! मैं इस अत्युत्तम पौराणिक आख्यानको सुनना चाहता हूँ॥ ५॥ |
| सूत उवाच<br>इति पृष्टस्तदा व्यासः परीक्षित्तनयेन वै।<br>कथयामास भो विप्राः कथामेतां सुविस्तराम्॥ ६ | सूतजी बोले— हे विप्रो! परीक्षित्पुत्र जनमेजयके ऐसा पूछनेपर व्यासजी इस अति विस्तृत कथाका वर्णन करने लगे॥ ६॥ |
८१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
८१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
| व्यास उवाच | |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>पावनीं सुखदां कर्णे विशदाक्षरसंयुताम्॥ ७ | व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये मैं अब वह शुभ, पवित्र, स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त तथा कानोंको प्रिय लगनेवाली पौराणिक कथा कहूँगा॥ ७॥ |
| रेवन्तस्तु रमां दृष्ट्वा शप्तां देवेन कामिनीम्।<br>भयार्तः प्रययौ दूरात्प्रणम्य जगतां पतिम्॥ ८ | कामिनी रमाको विष्णुद्वारा शापित की गयी देखकर रेवन्त भयके कारण जगत्पति वासुदेवको दूरसे ही प्रणाम करके चले गये॥ ८॥ |
| पितुः सकाशं त्वरितो वीक्ष्य कोपं जगत्पतेः।<br>निवेदयामास कथां भास्कराय स शापजाम्॥ ९ | जगन्नाथ विष्णुका यह क्रोध देखकर वे तत्काल अपने पिताके पास गये और उन सूर्यसे शापसे सम्बन्धित कथा बतायी॥ ९॥ |
| दुःखिता सा रमा देवी प्रणम्य जगदीश्वरम्।<br>आज्ञप्ता मानुषं लोकं प्राप्ता कमलोचना॥ १०<br>सूर्यपत्न्या तपस्तप्तं यत्र पूर्वं सुदारुणम्।<br>तत्रैव सा ययावाशु वडवारूपधारिणी॥ ११<br>कालिन्दीतमसास्सङ्गे सुपर्णाक्षस्य चोत्तरे।<br>सर्वकामप्रदे स्थाने सुरम्यवनमण्डिते॥ १२ | इसके बाद कमलके समान नेत्रोंवाली वे दुःखित लक्ष्मीजी जगदीश्वर विष्णुजीसे आज्ञा लेकर उन्हें प्रणाम करके मृत्युलोकमें आ गयीं। सूर्यकी पत्नीने पूर्वकालमें सुपर्णाक्षकी उत्तरदिशामें यमुना—तमसा नदीके संगमपर सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा सुन्दर वनोंसे सुशोभित जिस स्थानपर कठोर तपस्या की थी, वहीं वडवारूपधारिणी वे लक्ष्मीजी शीघ्र पहुँच गयीं॥ १०—१२॥ |
| तत्र स्थिता महादेवं शङ्करं वाञ्छितप्रदम्।<br>दध्यौ चैकेन मनसा शूलिनं चन्द्रशेखरम्॥ १३<br>पञ्चाननं दशभुजं गौरीदेहार्धधारिणम्।<br>कर्पूरगौरदेहाभं नीलकण्ठं त्रिलोचनम्॥ १४<br>व्याघ्राजिनधरं देवं गजचर्मोत्तरीयकम्।<br>कपालमालाकलितं नागयज्ञोपवीतिनम्॥ १५ | वहाँ रहकर वे लक्ष्मीजी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले, त्रिशूलधारी, चन्द्रशेखर, पाँच मुखोंवाले, दस भुजाओंवाले, गौरीके शरीरका अर्ध भाग धारण करनेवाले, कर्पूरके समान गौर शरीरवाले, नीले कण्ठसे सुशोभित, तीन नेत्रोंवाले, व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले, हाथीके चर्मका उत्तरीय धारण करनेवाले, गलेमें नरमुण्डकी मालासे मण्डित तथा सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले महादेव शंकरका एकाग्रमनसे ध्यान करने लगीं॥ १३—१५॥ |
| सागरस्य सुता कृत्वा हयीरूपं मनोहरम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे रमादेवी चकार दुश्चरं तपः॥ १६ | सागरपुत्री लक्ष्मीजीने सुन्दर घोड़ीका रूप धारण करके उस तीर्थमें अत्यन्त कठोर तपस्या की॥ १६॥ |
| ध्यायमाना परं देवं वैराग्यं समुपाश्रिता।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु गतं तत्र महीपते॥ १७ | हे राजन्! महादेव शंकरका ध्यान करते-करते लक्ष्मीजीके मनमें वैराग्यका प्रादुर्भाव हो गया। इस प्रकार [उनको तप करते हुए] एक हजार दिव्य वर्ष बीत गये॥ १७॥ |
| ततस्तुष्टो महादेवो वृषारूढस्त्रिलोचनः।<br>प्रत्यक्षोऽभून्महेशानः पार्वतीसहितः प्रभुः॥ १८ | तदनन्तर प्रसन्न होकर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने वृषभपर सवार होकर पार्वतीजीके साथ उन्हें साक्षात् दर्शन दिया॥ १८॥ |
| तत्रैत्य सगणः शम्भुस्तामाह हरिवल्लभाम्।<br>तपस्यन्तीं महाभागामश्विनीरूपधारिणीम्॥ १९ | भगवान् शंकरने अपने गणोंसहित वहाँ आकर तप करती हुई वडवारूपधारिणी महाभागा विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीसे कहा—॥ १९॥ |
| किं तपस्यसि कल्याणि जगन्मातर्वदस्व मे।<br>सर्वार्थदः पतिस्तेऽस्ति सर्वलोकविधायकः॥ २० | हे कल्याणि! हे जगज्जननि! आप तपस्या क्यों कर रही हैं? मुझे इसका कारण बतायें। आपके पति विष्णु तो स्वयं सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा सभी लोकोंका विधान करनेवाले हैं॥ २०॥ |
अ० १८] षष्ठ स्कन्ध ८११
| हरिं त्यक्त्वाद्य मां कस्मात्स्तौषि देवि जगत्पतिम्।<br>वासुदेवं जगन्नाथं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्॥ २१ | हे देवि! भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले जगत्पति वासुदेव जगन्नाथ विष्णुको छोड़कर इस समय आप मेरी आराधना किसलिये कर रही हैं?॥ २१॥ |
| वेदोक्तं वचनं कार्यं नारीणां देवता पतिः।<br>नान्यस्मिन्सर्वथा भावः कर्तव्यः कर्हिचित्क्वचित्॥ २२ | स्त्रियोंके लिये पति ही उनका देवता होता है—इस वेदोक्त वचनका उन्हें पालन करना चाहिये। किसी दूसरेमें कभी कहीं भी भावना नहीं करनी चाहिये॥ २२॥ |
| पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां धर्म एव सनातनः।<br>यादृशस्तादृशः सेव्यः सर्वथा शुभकाम्यया॥ २३ | पतिकी सेवा-शुश्रूषा ही स्त्रियोंका सनातन धर्म है। पति चाहे जैसा भी हो, कल्याणकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको निरन्तर उसकी सेवा करनी चाहिये॥ २३॥ |
| नारायणस्तु सर्वेषां सेव्यो योग्यः सदैव हि।<br>तं त्यक्त्वा देवदेवेशं किं मां ध्यायसि सिन्धुजे॥ २४ | भगवान् विष्णु तो सर्वदा सभी प्राणियोंकी आराधनाके योग्य हैं। अतएव हे सिन्धुजे! उन देवाधिदेवको छोड़कर आप मेरा ध्यान क्यों कर रही हैं?॥ २४॥ |
| लक्ष्मीरुवाच<br>आशुतोष महेशान शप्ताहं पतिना शिव।<br>मां समुद्धर देवेश शापादस्माद्दयानिधे॥ २५ | लक्ष्मी बोलीं—हे आशुतोष! हे महेशान! हे शिव! हे देवेश! हे दयानिधान! मेरे पतिने मुझे शाप दे दिया है; अतएव इस शापसे आप मेरा उद्धार कीजिये॥ २५॥ |
| तदोक्तं हरिणा शम्भो शापानुग्रहकारणम्।<br>विज्ञप्तेन मया कामं दयायुक्तेन विष्णुना॥ २६<br><br>यदा ते भविता पुत्रस्तदा शापस्य मोक्षणम्।<br>भविष्यति च वैकुण्ठवासस्ते कमलालये॥ २७ | हे शम्भो! उस समय मेरे बहुत पूछनेपर दयालु भगवान् विष्णुने शापसे मुक्तिका यह उपाय भी बतला दिया था—'हे कमलालये! जब तुम्हें एक पुत्र उत्पन्न हो जायगा तब तुम शापसे मुक्त हो जाओगी और वैकुण्ठधाममें पुनः तुम्हारा वास होगा'॥ २६-२७॥ |
| इत्युक्ताहं तपस्तप्तुमागतास्मि तपोवने।<br>आराधितो मया देव त्वं सर्वार्थप्रदायकः॥ २८ | हे देव! श्रीविष्णुके इस प्रकार कहनेपर मैं तपस्या करनेके लिये इस तपोवनमें आ गयी और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले आप परमेश्वरकी आराधना करने लगी॥ २८॥ |
| पतिसङ्गं विना पुत्रं देवदेव लभे कथम्।<br>स तु तिष्ठति वैकुण्ठे त्यक्त्वा वामामनागसम्॥ २९ | हे देवदेव! मुझ निरपराध पत्नीको छोड़कर वे विष्णु तो वैकुण्ठमें विराजमान हैं; अतएव पतिके सांनिध्यके बिना मैं पुत्र कैसे प्राप्त कर सकती हूँ?॥ २९॥ |
| वरं मे देहि देवेश यदि तुष्टोऽसि शङ्कर।<br>तव तस्य द्विधा भावो नास्ति नूनं कदाचन॥ ३० | हे देवेश! हे शंकर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे वर दीजिये। आप तथा श्रीहरिमें निश्चितरूपसे कोई भेद नहीं है॥ ३०॥ |
| मयैतद् गिरिजाकान्त ज्ञातं पत्युः पुरो हर।<br>यस्त्वं योऽसौ पुनर्योऽसौ स त्वं नास्त्यत्र संशयः॥ ३१ | हे गिरिजाकान्त! हे हर! जब मैं पतिदेवके पास थी तभीसे मुझे यह ज्ञात है कि जो आप हैं, वही वे हैं तथा जो वे हैं, वही आप हैं; इसमें संशय नहीं है॥ ३१॥ |
| एकत्वं च मया ज्ञात्वा मया ते स्मरणं कृतम्।<br>अन्यथा मम दोषस्त्वामाश्रयन्त्या भवेच्छिव॥ ३२ | [आप तथा श्रीविष्णुमें] एकत्व जानकर ही मैंने आपका स्मरण किया है, अन्यथा हे शिव! आपका आश्रय लेनेसे मुझे दोष ही लगता॥ ३२॥ |
| ८१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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| शिव उवाच<br>कथं ज्ञातस्त्वया देवि मम तस्य च सुन्दरि।<br>ऐक्यभावो हरेर्नूनं सत्यं मे वद सिन्धुजे॥ ३३<br>एकत्वं च न जानन्ति देवाश्च मुनयस्तथा।<br>ज्ञानिनो वेदतत्त्वज्ञाः कुतर्कोपहताः किल॥ ३४<br>मद्भक्ता वासुदेवस्य निन्दका बहवस्तथा।<br>विष्णुभक्तास्तु बहवो मम निन्दापरायणाः॥ ३५<br>भवन्ति कालभेदेन कलौ देवि विशेषतः।<br>कथं ज्ञातस्त्वया भद्रे दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः॥ ३६<br>सर्वथा त्वैक्यभावस्तु हरेर्मम च दुर्लभः। | शिव बोले— हे देवि! हे सुन्दरि! मेरे तथा उन विष्णुके एकत्वका ज्ञान तुम्हें किस प्रकार हुआ? हे सिन्धुजे! मुझे सच-सच बताओ॥ ३३॥<br>देवता, मुनि, ज्ञानी तथा वेदोंके तत्त्वदर्शी विद्वान् भी तरह-तरहके कुतर्कोंसे ग्रस्त पड़े रहनेके कारण इस ऐक्यभावको नहीं जानते॥ ३४॥<br>मेरे बहुत-से भक्त वासुदेव श्रीविष्णुके निन्दक हैं तथा श्रीविष्णुके बहुत-से भक्त मेरी निन्दामें लगे रहते हैं। हे देवि! कालभेदके कारण कलियुगमें ऐसे लोग विशेषरूपसे होंगे। हे भद्रे! दूषित आत्मावाले लोगोंद्वारा दुर्ज्ञेय इस एकत्वको आप कैसे जान गयीं? मेरे तथा श्रीविष्णुका ऐक्यभाव जान पाना सर्वथा दुर्लभ है॥ ३५-३६ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>इति सा शम्भुना पृष्टा तुष्टेन हरिवल्लभा॥ ३७<br>वृत्तान्तं तस्य विज्ञातं प्रवक्तुमुपचक्रमे।<br>शिवं प्रति रमा तत्र प्रसन्नवदना भृशम्॥ ३८ | व्यासजी बोले— प्रसन्न हुए भगवान् शंकरके इस प्रकार पूछनेपर अत्यन्त प्रसन्नमुखवाली हरिप्रिया लक्ष्मीजीने [उस एकत्वसे सम्बन्धित] ज्ञात प्रसंगको शिवजीसे कहना प्रारम्भ किया॥ ३७-३८॥ | | लक्ष्मीरुवाच<br>एकदा देवदेवेश विष्णुर्ध्यानपरो रहः।<br>दृष्टो मया तपः कुर्वन्पद्मासनगतो यदा॥ ३९<br>तदाहं विस्मिता देवं तमपृच्छं पतिं किल।<br>प्रबुद्धं सुप्रसन्नं च ज्ञात्वा विनयपूर्वकम्॥ ४०<br>देवदेव जगन्नाथ यदाहं निर्गतार्णवात्।<br>मथ्यमानात्सुरैर्दैत्यैः सर्वैर्ब्रह्मादिभिः प्रभो॥ ४१<br>वीक्षिताश्च मया सर्वे पतिकामनया तदा।<br>वृतस्त्वं सर्वदेवेभ्यः श्रेष्ठोऽसीति विनिश्चयात्॥ ४२<br>त्वं कं ध्यायसि सर्वेश संशयोऽयं महान्मम।<br>प्रियोऽसि कैटभारे मे कथयस्व मनोगतम्॥ ४३ | लक्ष्मीजी बोलीं— हे देवदेवेश! एक बार भगवान् विष्णुको एकान्तमें पद्मासन लगाकर ध्यानस्थ हो तपस्या करते हुए जब मैंने देखा तब मुझे महान् विस्मय हुआ; और पुनः समाधिसे जगनेपर उन्हें अति प्रसन्न जानकर मैंने पतिदेवसे विनयपूर्वक पूछा—॥ ३९-४०॥<br>हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे प्रभो! जिस समय ब्रह्मा आदि सभी देवताओं तथा दैत्योंके द्वारा मथे जा रहे समुद्रसे मैं निकली, उस समय पतिकी इच्छासे मैंने सभीकी ओर देखा, सभी देवताओंकी अपेक्षा आप ही श्रेष्ठ हैं—ऐसा निश्चय करके मैंने आपका ही वरण किया था। अतः हे सर्वेश! आप किसका ध्यान कर रहे हैं? मुझे यह महान् सन्देह है। हे कैटभारे! आप मेरे प्रिय हैं। अतः अपने मनकी बात मुझे बतायें॥ ४१—४३॥ | | विष्णुरुवाच<br>शृणु कान्ते प्रवक्ष्यामि यं ध्यायामि सुरोत्तमम्।<br>आशुतोषं महेशानं गिरिजावल्लभं हृदि॥ ४४<br>कदाचिद्देवदेवो मां ध्यायत्यमितविक्रमः।<br>ध्यायाम्यहं च देवेशं शङ्करं त्रिपुरान्तकम्॥ ४५<br>शिवस्याहं प्रियः प्राणः शङ्करस्तु तथा मम।<br>उभयोरन्तरं नास्ति मिथः संसक्तचेतसोः॥ ४६ | विष्णु बोले— हे प्रिये! मैं जिन सुरश्रेष्ठ, आशुतोष, महेश्वर तथा पार्वतीपति शंकरका ध्यान [अपने] हृदयमें कर रहा हूँ, उनके विषयमें बताऊँगा; सुनो॥ ४४॥<br>असीम पराक्रमसम्पन्न देवाधिदेव भगवान् शंकर कभी मेरा ध्यान करते हैं और कभी मैं त्रिपुरासुरके संहारक देवेश शंकरका ध्यान करने लगता हूँ॥ ४५॥<br>शिवका प्रिय प्राण मैं हूँ तथा मेरे प्रिय प्राण वे हैं। इस प्रकार परस्पर अनुरक्त चित्तवाले हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है॥ ४६॥ |
| अ० १८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८१३ | | :--- | :--- |
| नरकं यान्ति ते नूनं ये द्विषन्ति महेश्वरम्।<br>भक्ता मम विशालाक्षि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ ४७ | हे विशालनयने! मेरे जो भक्त भगवान् शंकरसे द्वेष करते हैं वे निश्चितरूपसे नरकमें पड़ते हैं; मैं यह सत्य कह रहा हूँ॥ ४७॥ |
| इत्युक्तं देवदेवेन विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>एकान्ते किल पृष्टेन मया शैलसुताप्रिय॥ ४८<br>तस्मात्त्वां वल्लभं विष्णोर्ज्ञात्वा ध्यातवती ह्यहम्।<br>तथा कुरु महेशान यथा मे प्रियसङ्गमः॥ ४९ | हे गिरिजावल्लभ! एकान्तमें मेरे पूछनेपर सर्वसमर्थ देवदेव भगवान् विष्णुने ऐसा बताया था। अतएव आपको विष्णुका परम प्रिय जानकर मैंने आपका ध्यान किया। हे महेशान! अब जैसे मुझे पतिसान्निध्य प्राप्त हो जाय, वैसा आप कीजिये॥ ४८-४९॥ |
| व्यास उवाच<br>इति श्रियो वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच महेश्वरः।<br>तामाश्वास्य प्रियैर्वाक्यैरथार्थं वाक्यकोविदः॥ ५० | व्यासजी बोले— लक्ष्मीजीका यह वचन सुनकर वाणीविशारद भगवान् शंकरने मधुर वचनोंसे उन्हें आश्वासन देकर कहा—हे पृथुश्रोणि! धैर्य रखो। मैं तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न हूँ। पतिसे तुम्हारा मिलन अवश्य होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५०-५१॥ |
| स्वस्था भव पृथुश्रोणि तुष्टोऽहं तपसा तव।<br>समागमस्ते पतिना भविष्यति न संशयः॥ ५१ | |
| अत्रैव हयरूपेण भगवाञ्जगदीश्वरः।<br>आगमिष्यति ते कामं पूर्णं कर्तुं मयेरितः॥ ५२ | वे भगवान् जगदीश्वर मुझसे प्रेरित होकर तुम्हारी कामना पूर्ण करनेके लिये अश्वका रूप धारण करके यहींपर आयेंगे॥ ५२॥ |
| तथाहं प्रेरयिष्यामि तं देवं मधुसूदनम्।<br>यथासौ हयरूपेण त्वामेष्यति मदातुरः॥ ५३ | मैं उन मधुसूदनको इस प्रकार प्रेरित करूँगा, जिससे वे मदातुर होकर अश्वरूपमें तुम्हारे पास आयेंगे॥ ५३॥ |
| पुत्रस्ते भविता सुभ्रु नारायणसमः क्षितौ।<br>भविष्यति स भूपालः सर्वलोकनमस्र्कृतः॥ ५४ | हे सुभ्रु! उन्हीं नारायणके समान तुम्हें पुत्र उत्पन्न होगा। वह पृथ्वीपर राजाके रूपमें प्रतिष्ठित तथा सभी लोगोंसे नमस्कृत होगा॥ ५४॥ |
| सुतं प्राप्य महाभागे त्वं तेन पतिना सह।<br>गन्तासि देवि वैकुण्ठं प्रिया तस्य भविष्यसि॥ ५५ | हे महाभागे! इस प्रकार पुत्र प्राप्त करके तुम उन्हींके साथ वैकुण्ठलोक चली जाओगी और हे देवि! वहाँ उनकी प्रिया हो जाओगी॥ ५५॥ |
| एकवीरेति नाम्नासौ ख्यातिं यास्यति ते सुतः।<br>तस्मात्तु हैहयो वंशो भुवि विस्तारमेष्यति॥ ५६ | आपका वह पुत्र एकवीर—इस नामसे लोकमें ख्याति प्राप्त करेगा। उसीसे पृथ्वीपर हैहयवंश विस्तारको प्राप्त होगा॥ ५६॥ |
| परं तु विस्मृतासि त्वं हृदिस्थां परमेश्वरीम्।<br>मदान्धा मत्तचित्ता च तेन ते फलमीदृशम्॥ ५७<br>अतस्तद्दोषशान्त्यर्थं हृदिस्थां परदेवताम्।<br>शरणं याहि सर्वात्मभावेन जलधेः सुते॥ ५८<br>अन्यथा तव चित्तं तु कथं गच्छेद्वयोत्तमे। | किंतु मदान्ध एवं मदचित्त होकर तुमने हृदयमें सदा विराजमान रहनेवाली परमेश्वरी जगदम्बाका विस्मरण कर दिया है, उसीसे तुम्हें ऐसा फल मिला है। अतः हे सिन्धुपुत्रि! उस दोषके शमनके लिये तुम हृदयमें विराजमान रहनेवाली परम देवीकी शरणमें सर्वात्मभावसे जाओ; यदि तुम्हारा मन भगवतीमें लगा होता तो उत्तम घोड़ेपर क्यों जाता?॥ ५७-५८ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति दत्त्वा वरं देव्यै भगवाञ्छैलजापतिः॥ ५९<br>अन्तर्धानं गतः साक्षादुमया सहितः शिवः। | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवी लक्ष्मीको वरदान देकर गिरिजापति भगवान् शंकर पार्वतीसहित अन्तर्धान हो गये॥ ५९ १/२॥ |
८१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९
| सापि तत्रैव चार्वङ्गी संस्थिता कमलासना॥ ६०<br><br>ध्यायन्ती चरणाम्भोजं देव्याः परमशोभनम्।<br>देवासुरशिरोरत्ननिघृष्टनखमण्डलम् ॥ ६१<br><br>प्रेमगद्गदया वाचा तुष्टाव च मुहुर्मुहुः।<br>प्रतीक्षमाणा भर्तारं हयरूपधरं हरिम्॥ ६२ | सुन्दर अंगोंवाली वे लक्ष्मीजी वहीं स्थित रहकर भगवती जगदम्बाके देवासुरोंके शिरोरत्न (मुकुट)-से घर्षित नखमण्डलवाले परम सुन्दर चरणकमलका ध्यान करने लगीं और अपने पति श्रीहरिके अश्वरूप धारण करके आनेकी प्रतीक्षा करती हुई प्रेमयुक्त गद्गद वाणीसे बार-बार उनकी स्तुति करती रहीं॥ ६०-६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे शिवप्रसादेन लक्ष्मीद्वारा भगवत्याः समाराधनवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः
भगवती लक्ष्मीको अश्वरूपधारी भगवान् विष्णुके दर्शन और उनका वैकुण्ठगमन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>तस्यै दत्त्वा वरं शम्भुः कैलासं त्वरितो ययौ।<br>रम्यं देवगणैर्जुष्टमप्सरोभिश्च मण्डितम्॥ १ | व्यासजी बोले—उन लक्ष्मीजीको वरदान देकर भगवान् शंकर देवगणोंसे सेवित तथा अप्सराओंसे सुशोभित रमणीक कैलासपर शीघ्र चले गये॥ १॥ |
| तत्र गत्वा चित्ररूपं गणं कार्यविशारदम्।<br>प्रेषयामास वैकुण्ठे लक्ष्मीकार्यार्थसिद्धये ॥ २ | वहाँ पहुँचते ही शंकरजीने लक्ष्मीका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे अपने कार्यकुशल गण चित्ररूपको वैकुण्ठ भेजा॥ २॥ |
| शिव उवाच<br>चित्ररूप हरिं गत्वा ब्रूहि त्वं वचनान्मम।<br>यथासौ दुःखितां पत्नीं विशोकां च करिष्यति॥ ३ | शिवजी बोले—हे चित्ररूप! तुम विष्णुके पास जाकर मेरे शब्दोंमें यह बात कहो और इस प्रकार यत्न करना, जिससे वे अपनी दुःखी पत्नीको शोकमुक्त कर दें॥ ३॥ |
| इत्युक्तश्चित्ररूपोऽथ निर्जगाम त्वरान्वितः।<br>वैकुण्ठं परमं स्थानं वैष्णवैश्च गणैर्वृतम्॥ ४<br><br>नानाद्रुमगणाकीर्णं वापीशतविराजितम्।<br>संजुष्टं हंसकारण्डमयूरशुककोकिलैः ॥ ५<br><br>उच्चप्रासादसंयुक्तं पताकाभिरलंकृतम्।<br>नृत्यगीतकलापूर्णं मन्दारद्रुमसंयुतम्॥ ६<br><br>बकुलाशोकतिलकचम्पकालीविमण्डितम् ।<br>कूजितैर्विहगानां तु कर्णाह्लादकरैर्युतम्॥ ७<br><br>संवीक्ष्य भवनं विष्णोर्द्वारस्थौ प्राह प्रणम्य च।<br>जयविजयनामानौ वेत्रपाणी स्थितावुभौ ॥ ८ | भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर वह चित्ररूप वैष्णवगणोंसे घिरे, अनेक प्रकारके वृक्षसमूहोंसे युक्त, सैकड़ों बावलियोंसे सुशोभित, हंस-सारस-मोर, शुक तथा कोकिलोंसे सुसेवित, पताकाओंसे सुशोभित ऊँचे-ऊँचे भवनोंवाले, नृत्य तथा गायनकलामें प्रवीण जनोंसे युक्त, मन्दारवृक्षोंसे परिपूर्ण, बकुल-अशोक-तिलक-चम्पक आदि वृक्षोंकी पंक्तियोंसे मण्डित तथा पक्षियोंके कर्णप्रिय कलरवोंसे गुंजित परम धाम वैकुण्ठके लिये शीघ्र ही निकल पड़ा। वहाँ भगवान् विष्णुका भवन देखकर हाथमें दण्ड (छड़ी) धारण किये हुए द्वारपर स्थित जय-विजय नामक दो द्वारपालोंको प्रणाम करके चित्ररूपने उनसे कहा—॥ ४-८॥ |
| अ० १९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८१५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| चित्ररूप उवाच<br>भो निवेद्यतं शीघ्रं हरये परमात्मने।<br>दूतं प्राप्तं हरस्यात्र प्रेरितं शूलपाणिना॥ ९ | चित्ररूप बोला— [हे द्वारपालो!] तुमलोग शीघ्र ही भगवान् विष्णुको सूचित कर दो कि शूलपाणि शिवद्वारा भेजा गया उनका दूत यहाँ आया है॥ ९॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य जयः परमबुद्धिमान्।<br>गत्वा हरिं प्रणम्याह कृताञ्जलिपुटः पुरः॥ १०<br><br>देवदेव रमाकान्त करुणाकर केशव।<br>द्वारि तिष्ठति दूतोऽत्र शङ्करस्य समागतः॥ ११<br><br>आज्ञापय प्रवेष्टव्यो न वेति गरुडध्वज।<br>चित्ररूपधरोऽप्यस्ति न जाने कार्यगौरवम्॥ १२ | उसकी बात सुनकर परम बुद्धिमान् जय श्रीहरिके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर बोला—हे देवदेव! हे रमाकान्त! हे करुणाकर! हे केशव! भगवान् शंकरका दूत आया हुआ है; वह द्वारपर खड़ा है। हे गरुडध्वज! आप आदेश दीजिये कि उसे प्रवेश कराया जाय अथवा नहीं। उसका नाम चित्ररूप है। मैं उसके आनेका प्रयोजन नहीं जानता॥ १०—१२॥ |
| इत्याकर्ण्य हरिः प्राह जयं प्रज्ञातकारणः।<br>प्रवेशयात्र रुद्रस्य भृत्यं समयसंस्थितम्॥ १३ | ऐसा सुनकर दूतके आनेका कारण पहलेसे ही जाननेवाले भगवान् विष्णुने जयसे कहा—द्वारपर रुके हुए शंकरके भृत्यको यहाँ ले आओ॥ १३॥ |
| इत्याकर्ण्य जयस्तूर्णं गत्वा तं परमाद्भुतम्।<br>एहीत्याकारयामास जयः शङ्करसेवकम्॥ १४ | यह सुनकर शीघ्रतापूर्वक जाकर ‘अंदर आइये’—ऐसा उस शंकरसेवक परम अद्भुत चित्ररूपसे जयने कहा॥ १४॥ |
| प्रवेशितो जयेनाथ चित्ररूपस्तथाकृतिः।<br>प्रणम्य दण्डवद्विष्णुं कृताञ्जलिपुटः स्थितः॥ १५ | अपने चित्ररूप नामके समान ही आकृतिवाले उसको जयने प्रवेश कराया। तब विष्णुको साष्टांग प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर वहाँ उनके समक्ष वह खड़ा हो गया॥ १५॥ |
| दृष्ट्वा तं विस्मयं प्राप भगवान् गरुडध्वजः।<br>चित्ररूपधरं शम्भोः सेवकं विनयान्वितम्॥ १६ | विनयसे युक्त तथा विचित्र रूप धारण करनेवाले उस शम्भुसेवकको देखकर गरुडध्वज भगवान् विष्णु विस्मयमें पड़ गये॥ १६॥ |
| पप्रच्छ तं स्मितं कृत्वा चित्ररूपं रमापतिः।<br>कुशलं देवदेवस्य सकुद्रुम्बस्य चानघ॥ १७ | तत्पश्चात् रमापति विष्णुने मुसकराकर उस चित्ररूपसे पूछा—हे पुण्यात्मन्! सपरिवार देवाधिदेव शंकरजीका कुशल तो है॥ १७॥ |
| कस्मात्त्वं प्रेषितोऽस्यत्र ब्रूहि कार्यं हरस्य किम्।<br>अथवा देवतानां च किञ्चित्कार्यं समुत्थितम्॥ १८ | तुम यहाँ किसलिये भेजे गये हो, शंकरजीका कौन-सा कार्य है अथवा देवताओंका कोई काम तो नहीं आ पड़ा, मुझे बताओ॥ १८॥ |
| दूत उवाच<br>किमज्ञातं तवास्तीह संसारे गरुडध्वज।<br>वर्तमानं त्रिकालज्ञ यदहं प्रब्रवीमि वै॥ १९ | दूत बोला— हे गरुडध्वज! हे त्रिकालज्ञ! इस संसारकी कौन-सी बात आपको विदित नहीं है; तथापि इस समय जो बात है, उसे मैं आपसे कह रहा हूँ॥ १९॥ |
| प्रेषितोऽस्मि भवेनात्र विज्ञप्तुं त्वां जनार्दन।<br>हरस्य वचनाद्वाक्यं प्रब्रवीमि त्वयि प्रभो॥ २० | हे जनार्दन! उस बातको बतानेके लिये मैं शंकरजीके द्वारा यहाँ भेजा गया हूँ। हे प्रभो! शिवजीके कहे गये शब्दोंमें मैं आपसे कह रहा हूँ॥ २०॥ |
| ८१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
|---|
| तेनोक्तमेतद्देवेश भार्या ते कमलालया।<br>तपस्तपति कालिन्दीतमसासङ्गमे विभो॥ २१ | हे देवेश! उन्होंने कहा है कि 'हे विभो! आपकी भार्या लक्ष्मीजी यमुना और तमसा नदीके संगमपर तपस्या कर रही हैं॥ २१॥ | | हयीरूपधरा देवी सर्वार्थसिद्धिदायिनी।<br>ध्यातुं योग्यामरगणैर्मानवैर्यक्षकिन्नरैः॥ २२ | देवगण, मानव, यक्ष तथा किन्नरोंके द्वारा आराधनाके योग्य एवं समस्त मनोरथ पूर्ण करनेवाली वे देवी घोड़ीका रूप धारण किये हैं॥ २२॥ | | विना तया नरः कोऽपि सुखभागी भवेन्न हि।<br>तां त्यक्त्वा पुण्डरीकाक्ष प्राप्नोषि किं सुखं हरे॥ २३ | उन देवीके बिना इस जगत्का कोई भी प्राणी सुखी नहीं रह सकता। हे पुण्डरीकाक्ष! हे हरे! उनका परित्याग करके आप कौन-सा सुख प्राप्त कर रहे हैं?॥ २३॥ | | दुर्बलोऽपि स्त्रियं पाति निर्धनोऽपि जगत्यते।<br>विनापराधं च विभो किं त्यक्ता जगदीश्वरी॥ २४ | हे जगत्पते! दुर्बल तथा निर्धन व्यक्ति भी अपनी भार्याकी रक्षा करता है। तब हे विभो! आपने बिना अपराधके ही उन जगदीश्वरीका त्याग क्यों कर दिया है?॥ २४॥ | | दुःखं प्राप्नोति संसारे यस्य भार्या जगद्गुरो।<br>धिक्त्तस्य जीवितं लोके निन्दितं त्वरिमण्डले॥ २५ | हे जगद्गुरो! जिसकी भार्या संसारमें दुःख प्राप्त करती है, उसके जीवनको धिक्कार है। ऐसा व्यक्ति शत्रुसमुदायमें निन्दित होता है॥ २५॥ | | सकामा रिपवस्तेऽद्य दृष्ट्वा तां दुःखितां भृशम्।<br>त्वां वियुक्तं च रमया हसिष्यन्ति दिवानिशम्॥ २६ | आपके स्वार्थी शत्रु इस समय लक्ष्मीजीको अत्यन्त दुःखित तथा आपको उनसे विलग देखकर दिन-रात हँसते होंगे॥ २६॥ | | रमां रमय देवेश त्वदुत्सङ्गगतां कुरु।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नां सुशीलां च सुरूपिणीम्॥ २७<br><br>सुखितो भव तां प्राप्य वल्लभां चारुहासिनीम्।<br>कान्ताविरहजं दुःखं स्मराम्यहमनातुरः॥ २८<br><br>मम भार्या मृता विष्णो दक्षयज्ञे सती यदा।<br>तदाहं दुःसहं दुःखं भुक्तवानम्बुजेक्षण॥ २९<br><br>संसारेऽस्मिन्नरः कोऽपि माभून्मत्सदृशोऽपरः।<br>मनसाकरवं शोकं तस्या विरहपीडितः॥ ३०<br><br>कालेन महता प्राप्ता मया गिरिसुता पुनः।<br>तपस्तप्त्वातिदुःसाध्यं या दग्धा तु रुषाध्वरे॥ ३१ | हे देवेश! आप सभी लक्षणोंसे सम्पन्न, सुशीला तथा सुन्दर रूपवाली लक्ष्मीजीको अपने अंकमें विराजमान कीजिये और उनके साथ आनन्द प्राप्त कीजिये। सुन्दर मुसकानवाली प्रिया लक्ष्मीको प्राप्तकर आप सुखी हो जाइये॥ २७\frac{१}{२}॥<br><br>उदास रहता हुआ मैं ही स्त्रीवियोगसे उत्पन्न दुःखको समझता हूँ। हे विष्णो! हे कमलनयन! जब मेरी भार्या सती दक्षके यज्ञमें मृत हो गयी थी तब मुझे असहनीय दुःख भोगना पड़ा था। उसके विरहसे पीड़ित होकर मैं मनमें यह शोक करता था कि इस संसारमें मेरे-जैसा कोई अन्य व्यक्ति न हो। जो सती क्रोधवश दक्षके यज्ञमें जलकर भस्म हो गयी थी, उसे मैंने बहुत समयतक कठोर तपस्या करके गिरिजाके रूपमें पुनः प्राप्त किया था॥ २८-३१॥ | | हरे किं सुखमापन्नं त्वया सन्त्यज्य कामिनीम्।<br>एकाकी तिष्ठता कालं सहस्रवत्सरात्मकम्॥ ३२ | हे हरे! आपने अपनी भार्याको छोड़कर एक हजार वर्षकी अवधितक अकेले रहते हुए कौन-सा सुख प्राप्त कर लिया?॥ ३२॥ |
| अ० १९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८१७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गत्वाश्वास्य महाभागां समानय निजालयम्।<br>माभूत्कोऽपीह संसारे विमुक्तो रमया तया॥ ३३ | अतः आप महाभागा लक्ष्मीके पास जायें और उन्हें आश्वासन देकर अपने घर ले आयें। इस संसारमें कोई भी प्राणी उन रमा (लक्ष्मी)-से विमुक्त न होने पाये॥ ३३॥ |
| कृत्वा तुरगरूपं त्वं भज तां कमलालयाम्।<br>उत्पाद्य पुत्रमायुष्मंस्तामानय शुचिस्मिताम्॥ ३४ | हे आयुष्मन्! आप अभी अश्वरूप धारण करके पवित्र मुस्कानवाली लक्ष्मीके पास जाइये और पुत्र उत्पन्न करके उन्हें [वैकुण्ठ] ले आइये॥ ३४॥ |
| व्यास उवाच<br>हरिराकर्ण्य तद्वाक्यं चित्ररूपस्य भारत।<br>तथेत्युक्त्वा तु तं दूतं प्रेषयामास शङ्करम्॥ ३५ | व्यासजी बोले— हे भारत! चित्ररूपकी वह बात सुनकर भगवान् विष्णुने 'ठीक है'—ऐसा कहकर उस दूतको शंकरजीके पास भेज दिया॥ ३५॥ |
| गते दूतेऽथ भगवान्वैकुण्ठात्कामसंयुतः।<br>जगाम धृत्वा तत्राशु वाजिरूपं मनोहरम्॥ ३६<br><br>यत्र सा वडवारूपं कृत्वा तपति सिन्धुजा।<br>विष्णुस्तं देशमासाद्य तामपश्यद्धयीं स्थिताम्॥ ३७<br><br>सापि तं वीक्ष्य गोविन्दं हयरूपधरं पतिम्।<br>ज्ञात्वा वीक्ष्य स्थिता साध्वी विस्मिता साश्रुलोचना॥ ३८ | तत्पश्चात् दूतके चले जानेपर भगवान् विष्णु मनोहर अश्वरूप धारणकर कामयुक्त होकर शीघ्र ही वैकुण्ठसे वहींपर पहुँचे जहाँ घोड़ीका रूप धारणकर सिन्धुतनया लक्ष्मीजी तपस्या कर रही थीं। विष्णुजीने उस स्थानपर पहुँचकर हयरूपधारिणी लक्ष्मीजीको विराजमान देखा। अश्वका रूप धारण किये हुए अपने पति गोविन्दको देखते ही लक्ष्मीजीने भी उन्हें पहचान लिया और वे साध्वी विस्मयमें पड़कर अश्रुपूरित नेत्रोंसे देखती हुई वहीं खड़ी रहीं॥ ३६–३८॥ |
| तयोस्तु सङ्गमस्तत्र प्रवृत्तो मन्मथार्तयोः।<br>कालिन्दीतमसासङ्गे पावने लोकविश्रुते॥ ३९ | यमुना और तमसाके लोकप्रसिद्ध पवित्र संगमपर कामार्त उन दोनोंका समागम हुआ॥ ३९॥ |
| सगर्भा सा तदा जाता वडवा हरिवल्लभा।<br>सुषुवे सुन्दरं बालं तत्रैव सुगुणोत्तरम्॥ ४० | इस प्रकार वडवारूपधारिणी वे विष्णुप्रिया गर्भवती हो गयीं और वहींपर उन्होंने सद्गुणोंसे सम्पन्न तथा सुन्दर पुत्रको जन्म दिया॥ ४०॥ |
| तामाह भगवान्वाक्यं प्रहस्य समयाश्रितम्।<br>त्यजाद्य वाडवं देहं पूर्वदेहा भवाधुना॥ ४१ | भगवान् विष्णुने हँसकर उनसे यह समयोचित बात कही—तुम अब अपना यह अश्वीरूप छोड़ दो और पहले जैसा शरीर धारण कर लो॥ ४१॥ |
| गमिष्यावः स्ववैकुण्ठमावां कृत्वा निजं वपुः।<br>तिष्ठत्वत्र कुमारोऽयं त्वया जातः सुलोचने॥ ४२ | हे सुलोचने! हम दोनों अपनी दिव्य देह धारण करके अपने वैकुण्ठधाम चलेंगे और तुमसे उत्पन्न यह कुमार अब यहीं रहे॥ ४२॥ |
| लक्ष्मीरुवाच<br>स्वदेहसम्भवं पुत्रं कथं हित्वा व्रजाम्यहम्।<br>स्नेहः सुदुस्त्यजः कामं स्वात्मजस्य सुरर्षभ॥ ४३ | लक्ष्मीजी बोलीं— हे देवश्रेष्ठ! अपने शरीरसे उत्पन्न पुत्रको छोड़कर मैं कैसे जाऊँ? अपने पुत्रके प्रति स्नेहका त्याग अत्यन्त ही कठिन है॥ ४३॥ |
| का गतिः स्यादमेयात्मन् बालस्यास्य नदीतटे।<br>अनाथस्यासमर्थस्य विजनेऽल्पतनोरिह॥ ४४ | हे अमेयात्मन्! इस निर्जन नदीतटपर इस लघुकाय, अनाथ तथा असमर्थ बालककी क्या गति होगी?॥ ४४॥ |
| ८१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
|---|
| अनाश्रयं सुतं त्यक्त्वा कथं गन्तुं मनो मम।<br>समर्थं सदयं स्वामिन् भवेदम्बुजलोचन ॥ ४५ | हे कमलनयन! हे स्वामिन्! इस आश्रयहीन पुत्रको छोड़कर मेरा दयालु मन यहाँसे जानेके लिये भला कैसे तैयार हो सकता है ? ॥ ४५ ॥ | | दिव्यदेहौ ततो जातौ लक्ष्मीनारायणावुभौ।<br>विमानवरसंविष्टौ स्तूयमानौ सुरैर्दिवि ॥ ४६ | तत्पश्चात् लक्ष्मीजी तथा भगवान् विष्णु दोनों दिव्य शरीर धारणकर उत्तम विमानपर विराजमान हुए; देवगण अन्तरिक्षमें उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४६ ॥ | | गन्तुकामं पतिं प्राह कमला कमलापतिम्।<br>गृहाणेमं सुतं नाथ नाहं शक्तास्मि हापितुम् ॥ ४७<br><br>प्राणप्रियोऽस्ति मे पुत्रः कान्त्या त्वत्सदृशः प्रभो।<br>गृहीत्वैनं गमिष्यावो वैकुण्ठं मधुसूदन ॥ ४८ | वैकुण्ठके लिये प्रस्थान करनेके इच्छुक भगवान् विष्णुसे लक्ष्मीजीने कहा—हे नाथ! मैं इस पुत्रका त्याग नहीं कर सकती, अतएव इसे भी साथ ले लीजिये। हे प्रभो! मेरा यह प्राणके समान प्रिय पुत्र कान्तिमें आपके सदृश है। हे मधुसूदन! इसे लेकर हम दोनों वैकुण्ठ चलेंगे ॥ ४७-४८ ॥ | | हरिरुवाच<br>मा विषादं प्रिये कर्तुं त्वमर्हसि वरानने।<br>तिष्ठत्वयं सुखेनात्र रक्षा मे विहिता त्विह ॥ ४९ | **हरि बोले—**हे प्रिये! हे वरानने! इस पुत्रके विषयमें शोक करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। यह सुखपूर्वक यहीं रहे; मैंने इसकी रक्षाका उपाय कर दिया है ॥ ४९ ॥ | | कार्यं किमपि वामोरु वर्तते महदद्भुतम्।<br>निबोध कथयाम्यद्य सुतस्यात्र विमोचने ॥ ५० | हे वामोरु! इस पुत्रके यहाँ छोड़नेके पीछे कोई महान् तथा आश्चर्यजनक कारण छिपा है। मैं उसे बता रहा हूँ; तुम जान लो ॥ ५० ॥ | | तुर्वसुर्नाम विख्यातो ययातितनूजो भुवि।<br>हरिवर्मेति पित्रास्य कृतं नाम सुविश्रुतम् ॥ ५१<br><br>स राजा पुत्रकामोऽद्य तपस्तपति पावने।<br>तीर्थे वर्षशतं जातं तस्य वै कुर्वतस्तपः ॥ ५२<br><br>तस्यार्थे निर्मितः पुत्रो मयायं कमलालये।<br>तत्र गत्वा नृपं सुभ्रु प्रेषयिष्यामि साम्प्रतम् ॥ ५३<br><br>तस्मै दास्याम्यहं पुत्रं पुत्रकामाय कामिनि।<br>गृहीत्वा स्वगृहं राजा प्रापयिष्यति बालकम् ॥ ५४ | इस पृथ्वीपर ययातिके पुत्र तुर्वसु नामक एक प्रसिद्ध राजा हैं। उनके पिताने उनका लोक-प्रसिद्ध हरिवर्मा—यह नाम रखा था। इस समय पुत्रकी कामनावाले वे नरेश एक पवित्र तीर्थमें तपस्या कर रहे हैं। उन्हें तप करते हुए पूरे एक सौ वर्ष बीत चुके हैं। हे कमलालये! उन्हींके लिये मैंने यह पुत्र उत्पन्न किया है। हे सुभ्रु! वहाँ राजाके पास जाकर मैं उन्हें इसी समय भेज दूँगा। हे प्रिये! पुत्रके अभिलाषी उन्हीं राजाको मैं यह पुत्र दे दूँगा और वे इस बालकको लेकर अपने घर चले जायँगे ॥ ५१—५४ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्याश्वास्य प्रियां पद्मां कृत्वा रक्षां च बालके।<br>विमानवरमारुह्य प्रययौ प्रियया सह ॥ ५५ | **व्यासजी बोले—**इस प्रकार अपनी प्रिय भार्याको आश्वासन देकर तथा बालककी रक्षाका प्रबन्ध करके भगवान् विष्णु उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर अपनी प्रियाके साथ चले गये ॥ ५५ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे पुत्रजन्मानन्तरं स्वस्वरूपेण वैकुण्ठगमनवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
$\sim\sim\circ\sim\sim$
अ० २०] षष्ठ स्कन्ध ८१९
अ० २०] षष्ठ स्कन्ध ८१९
अथ विंशोऽध्यायः
राजा हरिवर्माको भगवान् विष्णुद्वारा अपना हैहयसंज्ञक पुत्र देना, राजाद्वारा उसका 'एकवीर' नाम रखना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जनमेजय उवाच<br>संशयोऽयं महानत्र जातमात्रः शिशुस्तथा।<br>मुक्तः केन गृहीतोऽसावेकाकी विजने वने॥ १<br><br>का गतिस्तस्य बालस्य जाता सत्यवतीसुत।<br>व्याघ्रसिंहादिभिर्हिंस्रैर्गृहीतो नातिबालकः॥ २ | जनमेजय बोले—[हे मुनिवर!] मुझे इस विषयमें यह महान् संशय हो रहा है कि भगवान्ने उत्पन्न होते ही उस बालकका त्याग कर दिया। निर्जन वनमें उस असहाय बालककी देखभाल किसने की?॥ १॥<br><br>हे सत्यवतीनन्दन! उस बालककी क्या गति हुई? बाघ, सिंह आदि हिंसक जानवर उस छोटे-से बालकको उठा तो नहीं ले गये॥ २॥ |
| व्यास उवाच<br>लक्ष्मीनारायणौ तस्मात्स्थानाच्च चलितौ यदा।<br>तदैव तत्र चम्पाख्यः प्राप्तो विद्याधरः किल॥ ३<br><br>विमानवरमारूढः कामिन्या सहितो नृप।<br>मदनालसया कामं क्रीडमानो यदृच्छया॥ ४ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! जब भगवान् विष्णु तथा लक्ष्मीजी उस स्थानसे चले गये, उसी समय चम्पक नामक विद्याधर उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर अपनी प्रेयसी मदनालसाके साथ इच्छापूर्वक विहार करते हुए संयोगवश वहाँ आ पहुँचा॥ ३-४॥ |
| विलोक्य तं शिशुं भूमावेकाकिनमनुत्तमम्।<br>देवपुत्रप्रतीकाशं रममाणं यथासुखम्॥ ५<br><br>विमानात्तरसोत्तीर्य चम्पकस्तं शिशुं जवात्।<br>जग्राह च मुदं प्राप निधिं प्राप्य यथाधनः॥ ६ | देवपुत्र-तुल्य उस उत्तम शिशुको पृथ्वीपर सुखपूर्वक अकेले खेलते हुए देखकर चम्पकने शीघ्रतापूर्वक विमानसे उतरकर झटसे उस बालकको उठा लिया और वह उसी प्रकार आनन्दित हो गया, जिस प्रकार कोई धनहीन व्यक्ति धनका खजाना पाकर आनन्दित हो जाता है॥ ५-६॥ |
| गृहीत्वा चम्पकः प्रादाद्देव्यै तं मदनोपमम्।<br>मदनालसायै तं बालं जातमात्रं मनोहरम्॥ ७ | कामदेवके समान अत्यन्त सुन्दर उस नवजात शिशुको उठाकर चम्पकने (अपनी पत्नी) मदनालसाको सौंप दिया॥ ७॥ |
| सा गृहीत्वा शिशुं प्रेम्णा सरोमाञ्चा सविस्मया।<br>मुखं चुचुम्ब बालस्य कृत्वा तु हृदये भृशम्॥ ८ | उस बालकको लेते ही प्रेमसे रोमांचित तथा विस्मित मदनालसा हृदयसे लगाकर उस बालकका मुख चूमने लगी॥ ८॥ |
| आलिङ्गितश्चुम्बितश्च तयाऽसौ प्रीतिपूर्वकम्।<br>उत्सङ्गे च कृतस्तन्व्या पुत्रभावेन भारत॥ ९ | हे भारत! प्रीतिपूर्वक हृदयसे लगाने तथा चूमनेके पश्चात् उस तन्वंगी मदनालसाने उसे अपना पुत्र समझकर गोदमें ले लिया॥ ९॥ |
| कृत्वाङ्के तौ समारूढौ विमानं दम्पती मुदा।<br>पतिं पप्रच्छ चार्वङ्गी प्रहस्य मदनालसा॥ १०<br><br>कस्यायं बालकः कान्त त्यक्तः केन च कानने।<br>पुत्रोऽयं मम देवेन दत्तस्त्र्यम्बकपाणिना॥ ११ | उसे गोदमें लेकर पति-पत्नी प्रसन्नतापूर्वक विमानपर आरूढ़ हो गये। तब कमनीय अंगोंवाली मदनालसाने हँसकर अपने पतिसे पूछा—हे कान्त! बालक किसका है तथा किसने इसे निर्जन वनमें छोड़ दिया है? त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने इसे मुझे पुत्ररूपमें दिया है॥ १०-११॥ |
| ८२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| चम्पक उवाच<br>प्रिये गत्वाद्य पृच्छेयं शक्रं सर्वज्ञमाशु वै।<br>देवो वा दानवो वापि गन्धर्वो वा शिशुः किल॥ १२<br><br>तेनाज्ञप्तः करिष्यामि पुत्रं प्राप्तं वनादमुम्।<br>अपृष्ट्वा नैव कर्तव्यं कार्यं किञ्चिन्मया ध्रुवम्॥ १३ | चम्पक बोला— हे प्रिये ! मैं आज ही सब कुछ जाननेवाले इन्द्रके पास जाकर पूछूँगा कि यह बालक देवता है, दानव है अथवा गन्धर्व है। उनसे आदेश प्राप्त करनेके बाद ही मैं वनमें प्राप्त इस बालकको अपना पुत्र बनाऊँगा; बिना उनसे पूछे मुझे कोई भी कार्य निश्चितरूपसे नहीं करना चाहिये ॥ १२-१३॥ | | इत्युक्त्वा तां गृहीत्वा तं विमानेनाथ चम्पकः।<br>ययौ शक्रपुरं तूर्णं हर्षेणोत्फुल्ललोचनः॥ १४<br><br>प्रणम्य पादयोः प्रीत्या चम्पकस्तु शचीपतिम्।<br>निवेद्य बालकं प्राह कृताञ्जलिपुटः स्थितः॥ १५ | ऐसा कहकर उस मदनालसा तथा पुत्रको लेकर हर्षातिरेकके कारण उत्फुल्ल नेत्रोंवाले उस चम्पकने तुरंत विमानसे इन्द्रपुरीके लिये प्रस्थान किया। [वहाँ पहुँचकर] प्रेमपूर्वक इन्द्रके चरणोंमें प्रणामकर उस बालकको उन्हें समर्पित करके दोनों हाथ जोड़कर चम्पक खड़ा हो गया और बोला— ॥ १४-१५॥ | | देवदेव मया लब्धस्तीर्थे परमपावने।<br>कालिन्दीतमसासङ्गे बालकोऽयं स्मरप्रभः॥ १६ | हे देवदेव ! कामदेवके समान प्रभावाला यह बालक मुझे परम पवित्र तीर्थ यमुना तथा तमसा नदीके संगम-स्थलपर प्राप्त हुआ था ॥ १६ ॥ | | कस्यायं बालकः कान्तः कथं त्यक्तः शचीपते।<br>आज्ञा चेत्तव देवेश कुर्वेऽहं बालकं सुतम्॥ १७ | हे शचीपते ! कान्तिसे सम्पन्न यह बालक किसका है; इसका त्याग क्यों कर दिया गया है ? हे देवेश ! यदि आपका आदेश हो तो मैं इस बालकको अपना पुत्र बना लूँ ॥ १७ ॥ | | अतीव सुन्दरो बालः प्रियाया वल्लभः सुतः।<br>कृत्रिमस्तु सुतः प्रोक्तो धर्मशास्त्रेषु सर्वथा ॥ १८ | यह अत्यन्त सुन्दर बालक मेरी पत्नीका प्रिय पुत्र बन गया है। धर्मशास्त्रोंमें कृत्रिम पुत्र भी कहा गया है ॥ १८ ॥ | | इन्द्र उवाच<br>पुत्रोऽयं वासुदेवस्य वाजिरूपधरस्य ह।<br>हैहयोऽयं महाभाग लक्ष्म्यां जातः परन्तपः॥ १९ | इन्द्र बोले— यह अश्वरूपधारी भगवान् विष्णुका पुत्र है। हे महाभाग ! हैहयसंज्ञक यह परम तपस्वी बालक लक्ष्मीजीसे उत्पन्न हुआ है ॥ १९॥ | | उत्पादितो भगवता कार्यार्थं किल बालकः।<br>दातुं नृपतये नूनं ययातितनयाय च॥ २० | भगवान् विष्णुने ययातिके पुत्र राजा हरिवर्माको अर्पित करनेके उद्देश्यसे इस बालकको उत्पन्न किया है ॥ २० ॥ | | हरिणा प्रेरितः सोऽद्य राजा परमधार्मिकः।<br>आगमिष्यति पुत्रार्थं तीर्थे तस्मिन्मनोरमे ॥ २१<br><br>तावत् त्वं गच्छ तत्रैव गृहीत्वा बालकं शुभम्।<br>यावन्न याति नृपतिर्ग्रहीतुं हरिणेरितः॥ २२ | परम धार्मिक राजा हरिवर्मा भगवान् विष्णुसे प्रेरणा प्राप्तकर पुत्रके लिये आज ही उस पावन तीर्थमें पहुँचेंगे। अतएव जबतक भगवान् विष्णुके द्वारा प्रेरित होकर वे राजा उसे लेनेहेतु वहाँ पहुँच नहीं जाते, उससे पूर्व तुम इस सुन्दर बालकको लेकर वहींपर पहुँच जाओ ॥ २१-२२ ॥ | | गत्वा तत्र विमुञ्चैनं विलम्बं मा कृथा वर।<br>अदृष्ट्वा बालकं राजा दुःखितश्च भविष्यति ॥ २३ | हे श्रेष्ठ ! वहाँ जाकर इस बालकको छोड़ दो, विलम्ब मत करो; क्योंकि राजा हरिवर्मा [तुमसे पहले पहुँच गये तो] बालकको वहाँ न देखकर अत्यन्त दुःखी होंगे ॥ २३ ॥ |
| अ० २० ] | षष्ठ स्कन्ध | ८२१ |
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| तस्माच्चम्पक मुञ्चैनं राजा प्राप्नोतु पुत्रकम्।<br>एकवीरेति नाम्नायं ख्यातः स्यात् पृथिवीतले॥ २४ | अतएव हे चम्पक! इस बालकको छोड़ आओ, जिससे राजा पुत्र प्राप्त कर लें। यह पृथ्वीलोकमें 'एकवीर'—इस नामसे प्रसिद्ध होगा॥ २४॥ | | व्यास उवाच | व्यासजी बोले— | | इति तस्य वचः श्रुत्वा चम्पकस्त्वरयान्वितः।<br>जगाम पुत्रमादाय स्थले तस्मिन्महीपते॥ २५<br>मुमोच बालकं तत्र यत्र पूर्वं स्थितो ह्यभूत्।<br>आरुह्य स्वविमानं तु ययौ स्वाश्रममण्डलम्॥ २६ | हे राजन्! इन्द्रकी यह बात सुनकर चम्पक शीघ्रतापूर्वक उस बालकको लेकर उस स्थानपर पहुँच गया। बालक पहले जहाँ पड़ा हुआ था, वहींपर उसने बालकको रख दिया और अपने विमानपर चढ़कर अपने स्थानको लौट गया॥ २५-२६॥ | | तदैव कमलाकान्तो लक्ष्म्या सह जगद्गुरुः।<br>विमानवरमारूढो जगाम नृपतिं प्रति॥ २७ | इसके तुरंत बाद कमलाकान्त जगद्गुरु भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर राजाके यहाँ पहुँचे॥ २७॥ | | दृष्टस्तदा तेन नृपेण विष्णुः<br>समुत्तरंस्तत्र विमानमुख्यात्।<br>जहर्ष राजा हरिदर्शनेन<br>पपात भूमौ खलु दण्डवच्च॥ २८ | उस समय राजा हरिवर्माने भगवान् विष्णुको उत्तम विमानसे उतरते हुए देखा। भगवान्के दर्शनसे राजा अत्यन्त हर्षित हुए और दण्डकी भाँति उनके समक्ष पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २८॥ | | उत्तिष्ठ वत्सेति हरिः पतन्त-<br>माश्वासयद्भूमिगतं स्वभक्तम्।<br>सोऽप्युत्सुको वासुदेवं पुरःस्थं<br>तुष्टाव भक्त्या मुखरीकृतोऽथ॥ २९ | 'हे वत्स! उठो'—ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने भूमिपर पड़े हुए अपने भक्तको आश्वासन दिया। इसके बाद राजा हरिवर्मा भी उल्लसित होकर अपने सामने खड़े वासुदेवकी भक्तिपूर्वक स्पष्ट वाणीमें स्तुति करने लगे—॥ २९॥ | | देवाधिदेवाखिललोकनाथ<br>कृपानिधे लोकगुरो रमेश।<br>मन्दस्य मे ते किल दर्शनं य-<br>त्सुदुर्लभं योगिजनैरलभ्यम्॥ ३० | हे देवाधिदेव! हे अखिललोकनाथ! हे कृपानिधे! हे लोकगुरो! हे रमेश! आपका जो दर्शन योगिजनोंके लिये भी अलभ्य है, वह मुझ अज्ञानीके लिये तो अत्यन्त ही दुर्लभ था॥ ३०॥ | | ये निःस्पृहास्ते विषयैरपेता-<br>स्तेषां त्वदीयं खलु दर्शनं स्यात्।<br>आशापरोऽहं भगवन्ननन्त<br>योग्यो न ते दर्शने देवदेव॥ ३१ | जो लोग कामनारहित तथा विषयोंसे मुक्त हैं, उन्हें ही आपका दर्शन हो सकता है। हे भगवन्! हे अनन्त! हे देवदेव! केवल आशापरायण मैं वास्तवमें आपके दर्शनके योग्य नहीं था॥ ३१॥ | | इति स्तुतस्तेन नृपेण विष्णु-<br>स्तमाह वाक्येन सुधामयेन।<br>वृणीष्व राजन् मनसेप्सितं ते<br>ददामि तुष्टस्तपसा तवेति॥ ३२ | इस प्रकार उन राजाके स्तुति करनेपर भगवान् विष्णुने अमृतमयी वाणीमें उनसे कहा—हे राजन्! मैं तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न हूँ। अतः मैं तुम्हें मनोवांछित वरदान दूँगा; तुम माँग लो॥ ३२॥ | | ततो नृपस्तं प्रणिपत्य पादयोः<br>प्रोवाच विष्णुं पुरतः स्थितं च।<br>तपस्तु तप्तं हि मया सुतार्थे<br>पुत्रं ददस्वात्मसमं मुरारे॥ ३३ | तत्पश्चात् राजाने अपने सामने स्थित विष्णुके चरणोंमें सिर झुकाकर उनसे कहा—हे मुरारे! मैंने पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या की है। अतएव आप मुझे अपने ही सदृश पुत्र दीजिये॥ ३३॥ |
८२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०
८२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रुत्वा नृपप्रार्थितमादिदेव-<br>स्तमाह राजानममोघवाक्यम्।<br>ययातिसूनो व्रज तत्र तीर्थे<br>कलिन्दकन्यातमसाप्रसङ्गे ॥ ३४<br>मयाद्य पुत्रस्तु यथेप्सितस्ते<br>तत्रैव मुक्तोऽस्त्यमितप्रभावः।<br>लक्ष्म्याः प्रसूतो मम वीर्यजश्च<br>कृतस्तवार्थेऽथ गृहाण राजन्॥ ३५ | राजाकी प्रार्थना सुनकर आदिदेव भगवान् विष्णुने राजासे सार्थक वचन कहा—हे ययातिनन्दन! तुम इसी समय यमुना तथा तमसा नदीके उस पावन संगम तीर्थपर चले जाओ। हे राजन्! आप जैसा पुत्र चाहते हैं, वैसा ही पुत्र मैंने वहाँ रख दिया है। मेरे तेजसे प्रादुर्भूत वह पुत्र अमित प्रभाववाला है तथा लक्ष्मीजीने उसे उत्पन्न किया है। तुम्हारे लिये ही उसकी उत्पत्ति की गयी है, अतः तुम उसे ग्रहण करो॥ ३४-३५॥ |
| श्रुत्वा हरेर्वाक्यमतीव मृष्टं<br>सन्तुष्टचित्तः प्रबभूव राजा।<br>हरिस्तु दत्त्वेति वरं जगाम<br>वैकुण्ठलोकं रमया युतश्च॥ ३६ | भगवान् विष्णुकी अत्यन्त मधुर वाणी सुनकर राजाके मनमें प्रसन्नता हुई। राजाको यह वरदान देकर भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ वैकुण्ठ चले गये॥ ३६॥ |
| गते हरौ सोऽथ ययातिसूनु-<br>र्ययावनुद्घातरथेन राजा।<br>प्रेमान्वितस्तत्र सुतोऽस्ति यत्र<br>वचो निशम्येति जनार्दनस्य॥ ३७ | भगवान् विष्णुके चले जानेपर उन जनार्दनकी बात सुनकर आनन्दविभोर ययातिनन्दन राजा हरिवर्मा एक अप्रतिहत गति वाले रथपर आरूढ़ होकर उस स्थानपर गये, जहाँ बालक स्थित था॥ ३७॥ |
| स तत्र गत्वातिमनोहरं तं<br>ददर्श बालं भुवि खेलमानम्।<br>मुखे निवेश्यैककरेण कृत्वा<br>श्लक्ष्णं पदाङ्गुष्ठमनन्यसत्त्वः॥ ३८ | वहाँ पहुँचनेपर परम तेजस्वी राजाने उस अति मनोहर बालकको एक हाथसे पैरका कोमल अँगूठा मुखमें डालकर भूमिपर खेलता हुआ देखा॥ ३८॥ |
| तं वीक्ष्य पुत्रं मदनस्वरूपं<br>नारायणांशं कमलाप्रसूतम्।<br>हरिप्रभावं हरिवर्मनामा<br>हर्षप्रफुल्लाननपङ्कजोऽभूत् ॥ ३९<br>गृह्णन् सुवेगात् करपङ्कजाभ्यां<br>बभूव प्रेमार्णवमग्नदेहः।<br>मूर्ध्न्युपाघ्राय मुदान्वितोऽसौ<br>ननन्द राजा सुतमालिङ्ग ॥ ४० | लक्ष्मीजीसे उत्पन्न भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप तथा उन्हींके समान प्रभावशाली एवं कामदेवके सदृश रूपवान् उस पुत्रको देखकर राजा हरिवर्माका मुखारविन्द हर्षसे खिल उठा। उस बालकको अपने करकमलोंसे बड़ी तेजीसे उठाते हुए राजा हरिवर्मा प्रेमसागरमें मग्न हो गये। प्रसन्नतापूर्वक उसका मस्तक सूँघकर उन राजाने पुत्रका आलिंगन किया और अत्यन्त आनन्द प्राप्त किया॥ ३९-४०॥ |
| मुखं समीक्ष्यातिमनोहरं त-<br>मुवाच नेत्राम्बुनिरुद्धकण्ठः।<br>दत्तोऽसि देवेन जनार्दनेन<br>मात्रा हि पुत्रावमदुःखभीतेः॥ ४१<br>तप्तं मया पुत्र तपस्त्वदर्थे<br>सुदुष्करं वर्षशतं च पूर्णम्।<br>तेनैव तुष्टेन रमाप्रियेण<br>दत्तोऽसि संसारसुखोदयाय॥ ४२ | उस बालकका अत्यन्त मनोहर मुख देखकर प्रेमके अश्रुसे रुँधे कण्ठवाले राजाने उससे कहा—हे पुत्र! भगवान् विष्णु तथा माता लक्ष्मीके द्वारा तुम मेरे लिये प्रदान किये गये हो। हे पुत्र! नरकभोगके दुःखसे भयभीत होकर मैंने तुम्हारे लिये पूरे सौ वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या की है। उसी तपसे प्रसन्न होकर रमाकान्त विष्णुने सांसारिक सुख भोगनेके लिये तुम्हें पुत्ररूपमें मुझे प्रदान किया है॥ ४१-४२॥ |