देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| २३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनामां तां मुनिर्ज्ञात्वा जरत्कारुरुवाच तम्।<br>अप्रियं मे यदा कुर्यात्तदा तां सन्त्यजाम्यहम्॥ ३६ | जरत्कारुमुनिने उसे अपने ही समान नामवाली जानकर उनसे कहा—जब भी यह मेरा अप्रिय करेगी, तब मैं इसका परित्याग कर दूँगा॥ ३६॥ |
| वाग्बन्धं तादृशं कृत्वा मुनिर्जग्राह तां स्वयं।<br>दत्त्वा च वासुकिः कामं भवनं स्वं जगाम ह॥ ३७ | वैसी प्रतिज्ञा करके जरत्कारुमुनिने उस जरत्कारुको पत्नीरूपसे ग्रहण कर लिया। वासुकिनाग भी अपनी बहन उन्हें प्रदानकर आनन्दपूर्वक अपने घर लौट गये॥ ३७॥ |
| कृत्वा पर्णकुटीं शुभ्रां जरत्कारुर्महावने।<br>तया सह सुखं प्राप रममाणः परन्तप॥ ३८ | हे परन्तप! मुनि जरत्कारु उस महावनमें सुन्दर पर्णकुटी बनाकर उसके साथ रमण करते हुए सुख भोगने लगे॥ ३८॥ |
| एकदा भोजनं कृत्वा सुप्तोऽसौ मुनिसत्तमः।<br>भगिनी वासुकेस्तत्र संस्थिता वरवर्णिनी॥ ३९<br><br>न सम्बोधयितव्योऽहं त्वया कान्ते कथञ्चन।<br>इत्युक्त्वा तु गतो निद्रां मुनिस्तां सुदतीं तदा॥ ४० | एक समय मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु भोजन करके विश्राम कर रहे थे, वासुकिकी बहन सुन्दरी जरत्कारु भी वहीं बैठी हुई थी। [मुनिने उससे कहा] हे कान्ते! तुम मुझे किसी भी प्रकार जगाना मत—उस सुन्दर दाँतोंवालीसे ऐसा कहकर वे मुनि सो गये॥ ३९-४०॥ |
| रविरस्तगिरिं प्राप्तः सन्ध्याकाल उपस्थिते।<br>किं करोमि न मे शान्तिस्त्यजेन्मां बोधितः पुनः॥ ४१<br><br>धर्मलोपभयाद्भीता जरत्कारुरचिन्तयत्।<br>नोचेत्प्रबोधयाम्येनं सन्ध्याकालो वृथा व्रजेत्॥ ४२ | सूर्य अस्ताचलको प्राप्त हो गये थे। सन्ध्या-वन्दनका समय उपस्थित हो जानेपर धर्मलोपके भयसे डरी हुई जरत्कारु सोचने लगी—मैं क्या करूँ? मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। यदि मैं इन्हें जगाती हूँ तो ये मेरा परित्याग कर देंगे और यदि नहीं जगाती हूँ तो यह सन्ध्याकाल व्यर्थ ही चला जायगा॥ ४१-४२॥ |
| धर्मनाशाद्वरं त्यागस्तथापि मरणं ध्रुवम्।<br>धर्महानिर्नराणां हि नरकाय भवेत्पुनः॥ ४३<br><br>इति सञ्चिन्त्य सा बाला तं मुनिं प्रत्यबोधयत्।<br>सन्ध्याकालोऽपि सञ्जात उत्तिष्ठोत्तिष्ठ सुव्रत॥ ४४ | धर्मनाशकी अपेक्षा त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि मृत्यु तो निश्चित है ही। धर्मके नष्ट होनेपर मनुष्योंको निश्चित ही नरकमें जाना पड़ता है—ऐसा निश्चय करके उस स्त्रीने उन मुनिको जगाया और कहा—हे सुव्रत! उठिये, उठिये, अब सन्ध्याकाल भी उपस्थित हो गया है॥ ४३-४४॥ |
| उत्थितोऽसौ मुनिः कोपात्तामुवाच व्रजाम्यहम्।<br>त्वं तु भ्रातृगृहं याहि निद्राविच्छेदकारिणी॥ ४५ | जगनेपर मुनि जरत्कारुने क्रोधित होकर उससे कहा—अब मैं जा रहा हूँ और मेरी निद्रामें विघ्न डालनेवाली तुम अपने भाई वासुकिके घर चली जाओ॥ ४५॥ |
| अ० १२ ] | द्वितीय स्कन्ध | २३९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वेपमानाब्रवीद्वाक्यमित्युक्ता मुनिना तदा।<br>भ्रात्रा दत्ता यदर्थं तत्कथं स्यादमितप्रभ॥ ४६ | मुनिके ऐसा कहनेपर भयसे काँपती हुई उसने कहा—हे महातेजस्वी! मेरे भाईने जिस प्रयोजनसे मुझे आपको सौंपा था, वह प्रयोजन अब कैसे सिद्ध होगा?॥ ४६॥ |
| मुनिः प्राह जरत्कारुं तदस्तीति निराकुलः।<br>गता सा मुनिना त्यक्ता वासुकेः सदनं तदा॥ ४७ | तदनन्तर मुनिने शान्तचित्त होकर जरत्कारुसे कहा—‘वह तो है ही।’ इसके बाद मुनिके द्वारा परित्यक्त वह कन्या वासुकिके घर चली गयी॥ ४७॥ |
| पृष्टा भ्रात्राब्रवीद्वाक्यं यथोक्तं पतिना तदा।<br>अस्तीत्युक्त्वा च हित्वा मां गतोऽसौ मुनिसत्तमः॥ ४८ | भाई वासुकिके पूछनेपर उसने पतिद्वारा कही गयी बात उनसे यथावत् कह दी और [वह यह भी बोली कि] ‘अस्ति’—ऐसा कहकर वे मुनिश्रेष्ठ मुझको छोड़कर चले गये॥ ४८॥ |
| वासुकिस्तु तदाकर्ण्य सत्यावाङ्मुनिरित्युत।<br>विश्वासं च परं कृत्वा भगिनीं तां समाश्रयत्॥ ४९ | यह सुनकर वासुकिने सोचा कि मुनि सत्यवादी हैं; तत्पश्चात् पूर्ण विश्वास करके उन्होंने अपनी उस बहनको अपने यहाँ आश्रय प्रदान किया॥ ४९॥ |
| ततः कालेन कियता जातोऽसौ मुनिबालकः।<br>आस्तीक इति नामासौ विख्यातः कुरुसत्तम॥ ५० | हे कुरुश्रेष्ठ! कुछ समय बाद मुनिबालक उत्पन्न हुआ और वह आस्तीक नामसे विख्यात हुआ॥ ५०॥ |
| तेनायं रक्षितो यज्ञस्तव पार्थिवसत्तम।<br>मातृपक्षस्य रक्षार्थं मुनिना भावितात्मना॥ ५१ | हे नृपश्रेष्ठ! पवित्र आत्मावाले उन्हीं आस्तीक-मुनिने अपने मातृ-पक्षकी रक्षाके लिये आपका सर्पयज्ञ रुकवाया है॥ ५१॥ |
| भव्यं कृतं महाराज मानितोऽयं त्वया मुनिः।<br>यायावरकुलोत्पन्नो वासुकेर्भगिनीसुतः॥ ५२ | हे महाराज! यायावर वंशमें उत्पन्न और वासुकिकी बहनके पुत्र आस्तीकका आपने सम्मान किया, यह तो बड़ा ही उत्तम कार्य किया है॥ ५२॥ |
| स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो भारतं सकलं श्रुतम्।<br>दानानि बहु दत्तानि पूजिता मुनयस्तथा॥ ५३<br><br>कृतेन सुकृतेनापि न पिता स्वर्गतिं गतः।<br>पावितं न कुलं कृत्स्नं त्वया भूपतिसत्तम॥ ५४<br><br>देव्याश्चायतनं भूप विस्तीर्णं कुरु भक्तितः।<br>येन वै सकला सिद्धिस्तव स्याज्जनमेजय॥ ५५ | हे महाबाहो! आपका कल्याण हो। आपने सम्पूर्ण महाभारत सुना, नानाविध दान दिये और मुनिजनोंकी पूजा की। हे भूपश्रेष्ठ! आपके द्वारा इतना महान् पुण्यकार्य किये जानेपर भी आपके पिता स्वर्गको प्राप्त नहीं हुए और न आपका सम्पूर्ण कुल ही पवित्र हो सका। अतः हे महाराज जनमेजय! आप भक्तिभावसे युक्त होकर देवी भगवतीके एक विशाल मन्दिरका निर्माण कराइये, जिसके द्वारा आप समस्त सिद्धिको प्राप्त कर लेंगे॥ ५३—५५॥ |
| पूजिता परया भक्त्या शिवा सकलदा सदा।<br>कुलवृद्धिं करोत्येव राज्यं च सुस्थिरं सदा॥ ५६ | सर्वस्व प्रदान करनेवाली भगवती दुर्गा परम श्रद्धापूर्वक पूजित होनेपर सदा वंश-वृद्धि करती हैं तथा राज्यको सदा स्थिरता प्रदान करती हैं॥ ५६॥ |
| २४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
|---|
| देवीमखं विधानेन कृत्वा पार्थिवसत्तम।<br>श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं परमं शृणु॥ ५७ | हे भूपश्रेष्ठ! विधि-विधानके साथ देवीयज्ञ करके आप श्रीमद्देवीभागवत नामक महापुराणका श्रवण कीजिये॥ ५७॥ | | त्वामहं श्रावयिष्यामि कथां परमपावनीम्।<br>संसारतारिणीं दिव्यां नानारससमाहृताम्॥ ५८ | अत्यन्त पुनीत, भवसागरसे पार उतारनेवाली, अलौकिक तथा विविध रसोंसे सम्पृक्त उस कथाको मैं आपको सुनाऊँगा॥ ५८॥ | | न श्रोतव्यं परं चास्मात्पुराणाद्विद्यते भुवि।<br>नाराध्यं विद्यते राजन्देवीपादाम्बुजादृते॥ ५९ | हे राजन्! सम्पूर्ण संसारमें इस पुराणसे बढ़कर अन्य कुछ भी श्रवणीय नहीं है और भगवतीके चरणारविन्दके अतिरिक्त अन्य कुछ भी आराधनीय नहीं है॥ ५९॥ | | ते सभाग्याः कृतप्रज्ञा धन्यास्ते नृपसत्तम।<br>येषां चित्ते सदा देवी वसति प्रेमसंकुले॥ ६० | हे नृपश्रेष्ठ! जिनके प्रेमपूरित हृदयमें सदा भगवती विराजमान रहती हैं; वे ही सौभाग्यशाली, ज्ञानवान् एवं धन्य हैं॥ ६०॥ | | सुदुःखितास्ते दृश्यन्ते भुवि भारत भारते।<br>नाराधिता महामाया यैर्जनैश्च सदाम्बिका॥ ६१ | हे भारत! इस भारतभूमिपर वे ही लोग सदा दुःखी दिखायी देते हैं, जिन्होंने कभी भी महामाया अम्बिकाकी आराधना नहीं की है॥ ६१॥ | | ब्रह्मादयः सुराः सर्वे यदाराधनतत्पराः।<br>वर्तन्ते सर्वदा राजंस्तां न सेवेत को जनः॥ ६२ | हे राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता भी जिन भगवतीकी आराधनामें सर्वदा लीन रहते हैं, उनकी आराधना भला कौन मनुष्य नहीं करेगा?॥ ६२॥ | | य इदं शृणुयान्नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात्।<br>भगवत्या समाख्यातं विष्णवे यदनुत्तमम्॥ ६३ | जो मनुष्य इस पुराणका नित्य श्रवण करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। स्वयं भगवतीने भगवान् विष्णुके समक्ष इस अतिश्रेष्ठ पुराणका वर्णन किया था॥ ६३॥ | | तेन श्रुतेन ते राजंश्चित्ते शान्तिर्भविष्यति।<br>पितॄणां चाक्षयः स्वर्गः पुराणश्रवणाद्भवेत्॥ ६४ | हे राजन्! इस पुराणके श्रवणसे आपके चित्तको परम शान्ति प्राप्त होगी और आपके पितरोंको अक्षय स्वर्ग प्राप्त होगा॥ ६४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे श्रोतॄप्रवक्तृप्रसङ्गो नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
॥ द्वितीयः स्कन्धः समाप्तः ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
तृतीयः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
राजा जनमेजयका ब्रह्माण्डोत्पत्तिविषयक प्रश्न तथा इसके उत्तरमें व्यासजीका पूर्वकालमें नारदजीके साथ हुआ संवाद सुनाना
| जनमेजय उवाच<br>भगवन् भवता प्रोक्तं यज्ञमम्बाभिधं महत्।<br>सा का कथं समुत्पन्ना कुत्र कस्माच्च किंगुणा॥ १ | जनमेजय बोले—हे भगवन्! आपने महान् अम्बा-यज्ञके विषयमें कहा है। वे अम्बा कौन हैं, वे कैसे, कहाँ और किसलिये उत्पन्न हुई हैं और वे कौन-कौनसे गुणोंवाली हैं?॥ १॥ |
|---|---|
| कीदृशश्च मखस्तस्याः स्वरूपं कीदृशं तथा।<br>विधानं विधिवद् ब्रूहि सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ २ | उनका यह यज्ञ कैसा है और उसका क्या स्वरूप है? हे दयानिधान! आप सब कुछ जाननेवाले हैं; उस यज्ञका विधान सम्यक् रूपसे बताइये॥ २॥ |
| ब्रह्माण्डस्य तथोत्पत्तिं वद विस्तरतस्तथा।<br>यथोक्तं यादृशं ब्रह्मन्नखिलं वेत्सि भूसुर॥ ३ | हे ब्रह्मन्! आप विस्तारपूर्वक ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका भी वर्णन कीजिये। हे भूसुर! इस विषयमें अन्य ज्ञानियोंने जैसा कहा है, वह सब कुछ भी आप भलीभाँति जानते हैं॥ ३॥ |
| ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवा मया श्रुताः।<br>सृष्टिपालनसंहारकारकाः सगुणास्त्वमी॥ ४ | मैंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनों देवताओंके विषयमें सुना है कि ये सगुण रूपमें सम्पूर्ण जगत्का सृजन, पालन एवं संहार करते हैं॥ ४॥ |
| स्वतन्त्रास्ते महात्मानः पाराशर्य वदस्व मे।<br>आहोस्वित्परतन्त्रास्ते श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम्॥ ५ | हे पराशरसुत व्यासजी! वे तीनों देवश्रेष्ठ स्वाधीन हैं अथवा पराधीन; आप मुझे बताइये, मैं इस समय सुनना चाहता हूँ॥ ५॥ |
| मृत्युधर्मांश्च ते नो वा सच्चिदानन्दरूपिणः।<br>अधिभूतादिभिर्युक्ता न वा दुःखैस्त्रिधात्मकैः॥ ६ | वे सच्चिदानन्दस्वरूप देवगण मरणधर्मा हैं अथवा नहीं; और वे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक—इन तीन प्रकारके दुःखोंसे युक्त हैं अथवा नहीं?॥ ६॥ |
| कालस्य वशगा नो वा ते सुरेन्द्रा महाबलाः।<br>कथं ते वै समुत्पन्नाः कस्मादिति च संशयः॥ ७ | वे तीनों महाबली देवेश कालके वशवर्ती हैं अथवा नहीं; और वे कैसे तथा किससे आविर्भूत हुए, मेरी यह भी एक शंका है॥ ७॥ |
| २४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| हर्षशोकयुतास्ते वै निद्रालस्यसमन्विताः।<br>सप्तधातुमयास्तेषां देहाः किं वान्यथा मुने॥ ८ | हे मुने! क्या वे हर्ष, शोक आदि द्वन्द्वोंसे युक्त हैं, क्या वे निद्रा एवं प्रमाद आदिसे प्रभावित हैं तथा क्या उनके शरीर सप्त धातुओं (अन्नरस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य)-से निर्मित हैं अथवा नहीं?॥ ८॥ | | कैर्द्रव्यैर्निर्मितास्ते वै कैर्गुणैरिन्द्रियैस्तथा।<br>भोगश्च कीदृशस्तेषां प्रमाणमायुषस्तथा॥ ९ | वे किन द्रव्योंसे निर्मित हैं, वे किन-किन गुणोंको धारण करते हैं, उनमें कौन-कौन-सी इन्द्रियाँ अवस्थित हैं, उनका भोग कैसा होता है तथा उनकी आयुका परिमाण क्या है?॥ ९॥ | | निवासस्थानमप्येषां विभूतिं च वदस्व मे।<br>श्रोतुमिच्छाम्यहं ब्रह्मन् विस्तरेण कथामिमाम्॥ १० | इनके निवास-स्थान एवं विभूतियोंके भी विषयमें मुझको बतलाइये। हे ब्रह्मन्! इस कथाको विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी अभिलाषा है॥ १०॥ | | व्यास उवाच<br>दुर्गमः प्रश्नभारोऽयं कृतो राजंस्त्वयाधुना।<br>ब्रह्मादीनां समुत्पत्तिः कस्मादिति महामते॥ ११ | व्यासजी बोले—हे महामति राजन्! ब्रह्मादि देवोंकी उत्पत्ति किससे हुई, इस समय आपने यह बड़ा दुर्गम प्रश्न किया है॥ ११॥ | | एतदेव मया पूर्वं पृष्टोऽसौ नारदो मुनिः।<br>विस्मितः प्रत्युवाचेदमुत्थितः शृणु भूपते॥ १२ | हे राजन्! पूर्वमें मैंने यही प्रश्न देवर्षि नारदजीसे पूछा था। तब विस्मित होकर वे उठ खड़े हुए और उन्होंने जो उत्तर दिया था, उसे आप सुनें॥ १२॥ | | कस्मिंश्च समये चाहं गङ्गातीरे स्थितं मुनिम्।<br>अपश्यं नारदं शान्तं सर्वज्ञं वेदवित्तमम्॥ १३ | किसी समय मैंने शान्त, सर्ववेत्ता तथा वेद-विद्वानोंमें श्रेष्ठ नारदमुनिको गंगाके किनारे विद्यमान देखा॥ १३॥ | | दृष्ट्वाहं मुदितो भूत्वा पादयोरपतं मुनेः।<br>तेनाज्ञप्तः समीपेऽस्य संविष्टश्च वरासने॥ १४ | मुनिको देखकर तथा प्रसन्न होकर मैं उनके चरणोंपर गिर पड़ा। तदनन्तर उनके द्वारा आज्ञा देनेपर मैं उनके पासमें ही एक सुन्दर आसनपर बैठ गया॥ १४॥ | | श्रुत्वा कुशलवार्तां वै तमपृच्छं विधेः सुतम्।<br>निविष्टं जाह्नवीतीरे निर्जने सूक्ष्मवालुके॥ १५ | कुशल-क्षेमकी वार्ता सुन करके सूक्ष्म बालूवाले गंगा-तटके निर्जन स्थानपर बैठे हुए ब्रह्मापुत्र देवर्षि नारदसे मैंने पूछा—॥ १५॥ | | मुनेऽतिविततस्यास्य ब्रह्माण्डस्य महामते।<br>कः कर्ता परमः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि विधानतः॥ १६ | हे महामति मुनिदेव! इस अति विस्तीर्ण ब्रह्माण्डका प्रधान कर्ता कौन कहा गया है? उसे आप मुझे सम्यक् रूपसे बताइये॥ १६॥ | | कस्मादेतत्त्समुत्पन्नं ब्रह्माण्डं मुनिसत्तम।<br>अनित्यं वा तथा नित्यं तदाचक्ष्व द्विजोत्तम॥ १७ | हे मुनिश्रेष्ठ! इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति किससे हुई है? हे विप्रवर! आप मुझे यह भी बताइये कि यह ब्रह्माण्ड नित्य है अथवा अनित्य?॥ १७॥ | | एककर्तृकमेतद्वा बहुकर्तृकमन्यथा।<br>अकर्तृकं न कार्यं स्याद्विरोधोऽयं विभाति मे॥ १८ | यह ब्रह्माण्ड किसी एकके द्वारा विरचित है अथवा अनेक कर्ताओंद्वारा मिलकर इसका निर्माण किया गया है? किसी कर्ताके बिना कार्यकी सत्ता सम्भव नहीं है। इस विषयमें मुझे अत्यन्त सन्देह हो रहा है॥ १८॥ |
अ० १] तृतीय स्कन्ध २४३
अ० १] तृतीय स्कन्ध २४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति सन्देहसन्दोहे मग्नं मां तारयाधुना।<br>विकल्पकोटीः कुर्वाणं संसारेऽस्मिन् प्रविस्तरे॥ १९ | इस प्रकार इस विस्तृत ब्रह्माण्डके विषयमें विविध कल्पना करते हुए तथा सन्देहसागरमें डूबते हुए मुझ दुःखीका आप उद्धार कीजिये॥ १९॥ |
| ब्रुवन्ति शङ्करं केचिन्मत्वा कारणकारणम्।<br>सदाशिवं महादेवं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम्॥ २०<br>आत्मारामं सुरेशं च त्रिगुणं निर्मलं हरम्।<br>संसारतारकं नित्यं सृष्टिस्थित्यन्तकारणम्॥ २१ | कुछ लोग सदाशिव, महादेव, प्रलय तथा उत्पत्तिसे रहित, आत्माराम, देवेश, त्रिगुणात्मक, निर्मल, हर, संसारसे उद्धार करनेवाले, नित्य तथा सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले भगवान् शंकरको ही मूल कारण मानकर उन्हें ही इस ब्रह्माण्डका रचयिता कहते हैं॥ २०-२१॥ |
| अन्ये विष्णुं स्तुवन्त्येनं सर्वेषां प्रभुमीश्वरम्।<br>परमात्मानमव्यक्तं सर्वशक्तिसमन्वितम्॥ २२<br>भुक्तिदं मुक्तिदं शान्तं सर्वादिं सर्वतोमुखम्।<br>व्यापकं विश्वशरणमनादिनिधनं हरिम्॥ २३ | दूसरे लोग श्रीहरि विष्णुको सबका प्रभु, ईश्वर, परमात्मा, अव्यक्त, सर्वशक्तिसम्पन्न, भोग तथा मोक्षप्रदाता, शान्त, सबका आदि, सर्वतोमुख, व्यापक, समग्र संसारको शरण देनेवाला तथा आदि-अन्तसे रहित जानकर उन्हींका स्तवन करते हैं॥ २२-२३॥ |
| धातारं च तथा चान्ये ब्रुवन्ति सृष्टिकारणम्।<br>तमेव सर्ववेत्तारं सर्वभूतप्रवर्तकम्॥ २४<br>चतुर्मुखं सुरेशानं नाभिपद्मभवं विभुम्।<br>स्रष्टारं सर्वलोकानां सत्यलोकनिवासिनम्॥ २५ | अन्य लोग ब्रह्माजीको सृष्टिका कारण, सर्वज्ञ, सभी प्राणियोंका प्रवर्तक, चार मुखोंवाला, सुरपति, विष्णुके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत, सर्वव्यापी, सभी लोकोंकी रचना करनेवाला तथा सत्यलोकमें निवास करनेवाला बताते हैं॥ २४-२५॥ |
| दिनेशं प्रवदन्त्यन्ये सर्वेशं वेदवादिनः।<br>स्तुवन्ति चैव गायन्ति सायं प्रातरतन्द्रिताः॥ २६ | कुछ वेदवेत्ता विद्वान् सर्वेश्वर भगवान् सूर्यको ब्रह्माण्डकर्ता मानते हैं और सावधान होकर सायं-प्रातः उन्हींकी स्तुति करते हैं तथा उन्हींका यशोगान करते हैं॥ २६॥ |
| यजन्ति च तथा यज्ञे वासवं च शतक्रतुम्।<br>सहस्राक्षं देवदेवं सर्वेषां प्रभुमुल्बणम्॥ २७<br>यज्ञाधीशं सुराधीशं त्रिलोकेशं शचीपतिम्।<br>यज्ञानां चैव भोक्तारं सोमपं सोमपप्रियम्॥ २८ | यज्ञमें निष्ठाभाव रखनेवाले लोग धनप्रदाता, शतक्रतु, सहस्राक्ष, देवाधिदेव, सबके स्वामी, बलशाली, यज्ञाधीश, सुरपति, त्रिलोकेश, यज्ञोंका भोग करनेवाले, सोमपान करनेवाले तथा सोमपायी लोगोंके प्रिय शचीपति इन्द्रको [सर्वश्रेष्ठ मानकर] यज्ञोंमें उन्हींका यजन करते हैं॥ २७-२८॥ |
| वरुणं च तथा सोमं पावकं पवनं तथा।<br>यमं कुबेरं धनदं गणाधीशं तथापरे॥ २९<br>हेरम्बं गजवक्त्रं च सर्वकार्यप्रसाधकम्।<br>स्मरणात्सिद्धिदं कामं कामदं कामगं परम्॥ ३० | कुछ लोग वरुण, सोम, अग्नि, पवन, यमराज, धनपति कुबेरकी तथा कुछ लोग हेरम्ब, गजमुख, सर्वकार्यसाधक, स्मरणमात्रसे सिद्धि प्रदान करनेवाले, कामस्वरूप, कामनाओंको प्रदान करनेवाले, स्वेच्छ विचरण करनेवाले, परम देव गणाधीश गणेशकी स्तुति करते हैं॥ २९-३०॥ |
| २४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
|---|
| भवानीं केचनाचार्याः प्रवदन्त्यखिलार्थदाम्।<br>आदिमायां महाशक्तिं प्रकृतिं पुरुषानुगाम्॥ ३१<br>ब्रह्मैकतासमापन्नां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्।<br>मातरं सर्वभूतानां देवतानां तथैव च॥ ३२<br>अनादिनिधनां पूर्णां व्यापिकां सर्वजन्तुषु।<br>ईश्वरीं सर्वलोकानां निर्गुणां सगुणां शिवाम्॥ ३३ | कुछ आचार्य भवानीको ही सब कुछ देनेवाली, आदिमाया, महाशक्ति तथा पुरुषानुगामिनी परा प्रकृति कहते हैं। वे उनको ब्रह्मस्वरूपा, सृजन-पालन-संहार करनेवाली, सभी प्राणियों एवं देवताओंकी जननी, आदि-अन्तरहित, पूर्णा, सभी जीवोंमें व्याप्त, सभी लोकोंकी स्वामिनी, निर्गुणा, सगुणा तथा कल्याणस्वरूपा मानते हैं॥ ३१—३३॥ | | वैष्णवीं शाङ्करीं ब्राह्मीं वासवीं वारुणीं तथा।<br>वाराहीं नारसिंहीं च महालक्ष्मीं तथाद्भुताम्॥ ३४<br>वेदमातरमेकां च विद्यां भवतरोः स्थिराम्।<br>सर्वदुःखनिहन्त्रीं च स्मरणात्सर्वकामदाम्॥ ३५<br>मोक्षदां च मुमुक्षूणां कामदां च फलार्थिनाम्।<br>त्रिगुणातीतरूपां च गुणविस्तारकारकाम्॥ ३६<br>निर्गुणां सगुणां तस्मात्तां ध्यायन्ति फलार्थिनः। | फलकी आकांक्षा रखनेवाले उन भवानीका वैष्णवी, शांकरी, ब्राह्मी, वासवी, वारुणी, वाराही, नारसिंही, महालक्ष्मी, विचित्ररूपा, वेदमाता, एकेश्वरी, विद्यास्वरूपा, संसाररूपी वृक्षकी स्थिरताकी कारणरूपा, सभी कष्टोंका नाश करनेवाली और स्मरण करते ही सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली, मुक्ति चाहनेवालोंके लिये मोक्षदायिनी, फलकी अभिलाषा रखनेवालोंके लिये कामप्रदायिनी, त्रिगुणातीतस्वरूपा, गुणोंका विस्तार करनेवाली, निर्गुणा-सगुणा-रूपमें ध्यान करते हैं॥ ३४—३६ १/२॥ | | निरञ्जनं निराकारं निर्लेपं निर्गुणं किल॥ ३७<br>अरूपं व्यापकं ब्रह्म प्रवदन्ति मुनीश्वराः।<br>वेदोपनिषदि प्रोक्तस्तेजोमय इति क्वचित्॥ ३८<br>सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्रनयनस्तथा।<br>सहस्रकरकर्णश्च सहस्रास्यः सहस्रपात्॥ ३९ | कुछ मुनीश्वर निरंजन, निराकार, निर्लिप्त, गुणरहित, रूपरहित तथा सर्वव्यापक ब्रह्मको जगत्का कर्ता बतलाते हैं। वेदों तथा उपनिषदोंमें कहीं-कहीं उसे अनन्त सिर, नेत्र, हाथ, कान, मुख और चरणसे युक्त तेजोमय विराट् पुरुष कहा गया है॥ ३७—३९॥ | | विष्णोः पादमथाकाशं परमं समुदाहृतम्।<br>विराजं विरजं शान्तं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ४० | कुछ मनीषीगण आकाशको विष्णुके परम पादके रूपमें मानते हैं और उन्हें विराट्, निरंजन तथा शान्तस्वरूप कहते हैं॥ ४०॥ | | पुरुषोत्तमं तथा चान्ये प्रवदन्ति पुराविदः।<br>नैकोऽपीति वदन्त्यन्ये प्रभुरीशः कदाचन॥ ४१ | कुछ तत्त्वज्ञानी पुराणवेत्ता पुरुषोत्तमको सृष्टिका निर्माता कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इस अनन्त ब्रह्माण्डकी रचनामें केवल एक ईश्वर कदापि समर्थ नहीं हो सकता है॥ ४१॥ | | अनीश्वरमिदं सर्वं ब्रह्माण्डमिति केचन।<br>न कदापीशजन्यं यज्जगदेतदचिन्तितम्॥ ४२<br>सदैवेदमनीशं च स्वभावोत्थं सदेदृशम्।<br>अकर्तासौ पुमान्प्रोक्तः प्रकृतिस्तु तथा च सा॥ ४३<br>एवं वदन्ति सांख्याश्च मुनयः कपिलादयः। | कुछ लोग कहते हैं कि यह जगत् अचिन्त्य है, अतः यह ईश्वररचित कदापि नहीं हो सकता; उनके मतमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ईश्वररहित है। 'यह जगत् सदासे ही ईश्वरीय सत्तासे रहित रहा है और यह स्वभावसे उत्पन्न होता है तथा सदासे ऐसा ही है। यह पुरुष तो कर्तृत्वभावसे रहित कहा गया है और वह प्रकृति ही सर्वसंचालिका है'—कपिल आदि सांख्यशास्त्रके आचार्य ऐसा ही कहते हैं॥ ४२—४३ १/२॥ |
| अ० २ ] | तृतीय स्कन्ध | २४५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एते सन्देहसन्दोहाः प्रभवन्ति तथापरे ॥ ४४<br><br>विकल्पोपहतं चेतः किं करोमि मुनीश्वर।<br>धर्माधर्मविवक्षायां न मनो मे स्थिरं भवेत् ॥ ४५ | हे मुनिनाथ! मेरे मनमें ये तथा अन्य प्रकारके और भी सन्देहपुंज उत्पन्न होते रहते हैं। नाना प्रकारकी कल्पनाओंसे उद्विग्न मनवाला मैं क्या करूँ ? धर्म तथा अधर्मके विषयमें मेरा मन स्थिर नहीं हो पाता है ॥ ४४-४५ ॥ |
| को धर्मः कीदृशोऽधर्मश्चिह्नं नैवोपलभ्यते।<br>देवाः सत्त्वगुणोत्पन्नाः सत्यधर्मव्यवस्थिताः ॥ ४६<br><br>पीड्यन्ते दानवैः पापैः कुत्र धर्मव्यवस्थितिः।<br>धर्मस्थिताः सदाचाराः पाण्डवा मम वंशजाः ॥ ४७<br><br>दुःखं बहुविधं प्राप्तास्तत्र धर्मस्य का स्थितिः।<br>अतो मे हृदयं तात वेपतेऽतीव संशये ॥ ४८ | क्या धर्म है और क्या अधर्म है; इसका कोई स्पष्ट लक्षण प्राप्त नहीं होता है। लोग कहते हैं कि देवता सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए हैं और वे सत्यधर्ममें स्थित रहते हैं फिर भी वे देवगण पापाचारी दानवोंद्वारा प्रताड़ित किये जाते हैं, तो फिर धर्मकी व्यवस्था कहाँ रह गयी ? धर्मनिष्ठ और सदाचारी मेरे वंशज पाण्डव भी नाना प्रकारके कष्ट सहनेको विवश हुए, ऐसी स्थितिमें धर्मकी क्या मर्यादा रह गयी ? अतः हे तात! इस संशयमें पड़ा हुआ मेरा मन अतीव चंचल रहता है ॥ ४६–४८ ॥ |
| कुरु मेऽसंशयं चेतः समर्थोऽसि महामुने।<br>त्राहि संसारवार्धेस्त्वं ज्ञानपोतेन मां मुने ॥ ४९<br><br>मज्जन्तं चोत्पतन्तं च मग्नं मोहजलाविले ॥ ५० | हे महामुने! आप सर्वसमर्थ हैं, अतः मेरे हृदयको संशयमुक्त कीजिये। हे मुने! संसार-सागरके मोहसे दूषित जलमें गिरे हुए तथा बार-बार डूबते-उतराते मुझ अज्ञानीकी अपने ज्ञानरूपी जहाजसे रक्षा कीजिये ॥ ४९-५० ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे भुवनेश्वरीवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः
भगवती आद्याशक्तिके प्रभावका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>यत्त्वया च महाबाहो पृष्टोऽहं कुरुसत्तम।<br>तान्प्रश्नान्नारदः प्राह मया पृष्टो मुनीश्वरः ॥ १ | व्यासजी बोले— हे महाबाहो! हे कुरुश्रेष्ठ! आपने मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उन्हीं प्रश्नोंको मेरेद्वारा मुनिराज नारदजीसे पूछे जानेपर उन्होंने इस विषयमें ऐसा कहा था ॥ १ ॥ |
| नारद उवाच<br>व्यास किं ते ब्रवीम्यद्य पुरायं संशयो मम।<br>उत्पन्नो हृदयेऽत्यर्थं सन्देहासारपीडितः ॥ २ | नारदजी बोले— हे व्यासजी! मैं आपसे इस समय क्या कहूँ? प्राचीन कालमें यही शंका मेरे भी मनमें उत्पन्न हुई थी और सन्देहकी बहुलतासे मेरा मन उद्वेलित हो गया था ॥ २ ॥ |
| गत्वाहं पितरं स्थाने ब्रह्माणममितौजसम्।<br>अपृच्छं यत्त्वया पृष्टं व्यासाद्य प्रश्नमुत्तमम् ॥ ३ | हे व्यासजी! तदनन्तर मैंने ब्रह्मलोकमें अपने अमित तेजस्वी पिता ब्रह्माजीके पास पहुँचकर यही प्रश्न पूछा था, जो उत्तम प्रश्न आपने आज मुझसे पूछा है ॥ ३ ॥ |
| २४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| पितः कुतः समुत्पन्नं ब्रह्माण्डमखिलं विभो।<br>भवत्कृतेन वा सम्यक् किं वा विष्णुकृतं त्विदम्॥ ४<br><br>रुद्रकृतं वा विश्वात्मन् ब्रूहि सत्यं जगत्पते।<br>आराधनीयः कः कामं सर्वोत्कृष्टश्च कः प्रभुः॥ ५ | [मैंने पूछा—] हे पिताजी! इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका आविर्भाव कैसे हुआ? हे विभो! इसका निर्माण आपने किया है अथवा विष्णुने अथवा शिवने इसकी रचना की है? हे विश्वात्मन्! मुझे सही-सही बताइये। हे जगत्पते! सर्वश्रेष्ठ ईश्वर कौन है और किसकी आराधना की जानी चाहिये?॥ ४-५॥ | | तत्सर्वं वद मे ब्रह्मन्सन्देहांश्छिन्धि चानघ।<br>निमग्नो ह्यस्मि संसारे दुःखरूपेऽनृतोपमे॥ ६ | हे ब्रह्मन्! वह सब कुछ बताइए और मेरे सन्देहोंको दूर कीजिये। हे निष्पाप! मैं असत्य तथा दुःखरूप संसारमें डूबा हुआ हूँ॥ ६॥ | | सन्देहान्दोलितं चेतो न प्रशाम्यति कुत्रचित्।<br>न तीर्थेषु न देवेषु साधनेष्वितरेषु च॥ ७ | सन्देहोंसे दोलायमान मेरा मन तीर्थोंमें, देवताओंमें तथा अन्य साधनोंमें—कहीं भी शान्त नहीं हो पा रहा है॥ ७॥ | | अविज्ञाय परं तत्त्वं कुतः शान्तिः परन्तप।<br>विकीर्णं बहुधा चित्तं नैकत्र स्थिरतां व्रजेत्॥ ८ | हे परन्तप! परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त किये बिना शान्ति मिल भी कैसे सकती है? अनेक प्रकारसे उलझा हुआ मेरा मन एक जगह स्थिर नहीं हो पा रहा है॥ ८॥ | | कं स्मरामि यजे कं वा कं व्रजाम्यर्चयामि कम्।<br>स्तौमि कं नाभिजानामि देवं सर्वेश्वरेश्वरम्॥ ९ | मैं किसका स्मरण करूँ, किसका यजन करूँ, कहाँ जाऊँ, किसकी अर्चना करूँ और किसकी स्तुति करूँ? हे देव! मैं तो उस सर्वेश्वर परमात्माको जानता भी नहीं हूँ॥ ९॥ | | ततो तां प्रत्युवाचेदं ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>मया सत्यवतीसूनो कृते प्रश्ने सुदुस्तरे॥ १० | हे सत्यवतीतनय व्यासजी! मेरे द्वारा किये गये दुरूह प्रश्नोंको सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने तब मुझसे ऐसा कहा—॥ १०॥ | | ब्रह्मोवाच<br>किं ब्रवीमि सुताद्याहं दुर्बोधं प्रश्नमुत्तमम्।<br>त्वयाशक्यं महाभाग विष्णोरपि सुनिश्चयात्॥ ११ | ब्रह्माजी बोले—हे पुत्र! तुमने आज एक दुरूह तथा उत्तम प्रश्न किया है, उसके विषयमें मैं क्या कहूँ? हे महाभाग! साक्षात् विष्णुद्वारा भी इन प्रश्नोंका निश्चित उत्तर दिया जाना सम्भव नहीं है॥ ११॥ | | रागी कोऽपि न जानाति संसारेऽस्मिन्महामते।<br>विरक्तश्च विजानाति निरीहो यो विमत्सरः॥ १२ | हे महामते! इस संसारके क्रियाकलापोंमें आसक्त कोई भी ऐसा नहीं है, जो इस तत्त्वका ज्ञान रखता हो। कोई विरक्त, निःस्पृह तथा विद्वेषरहित ही इसे जान सकता है॥ १२॥ | | एकार्णवे पुरा जाते नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>भूतमात्रे समुत्पन्ने सञ्जज्ञे कमलादहम्॥ १३ | प्राचीन कालमें जल-प्रलयके होनेपर स्थावर-जंगमादिक प्राणियोंके नष्ट हो जाने तथा मात्र पंचमहाभूतोंकी उत्पत्ति होनेपर मैं कमलसे आविर्भूत हुआ॥ १३॥ | | नापश्यं तरणिं सोमं न वृक्षान्न च पर्वतान्।<br>कर्णिकायां समाविष्टश्चिन्तामकरवं तदा॥ १४ | उस समय मैंने सूर्य, चन्द्र, वृक्षों तथा पर्वतोंको नहीं देखा और कमलकर्णिकापर बैठा हुआ मैं विचार करने लगा—॥ १४॥ |
अ० २ ] तृतीय स्कन्ध २४७
अ० २ ] तृतीय स्कन्ध २४७
| कस्मादहं समुद्भूतः सलिलेऽस्मिन्महार्णवे।<br>को मे त्राता प्रभुः कर्ता संहर्ता वा युगान्तये॥ १५ | इस महासागरके जलमें मेरा प्रादुर्भाव किससे हुआ? मेरा निर्माण करनेवाला, रक्षा करनेवाला तथा युगान्तके समय संहार करनेवाला प्रभु कौन है? ॥ १५ ॥ |
| न च भूर्विद्यते स्पष्टा यदाधारं जलं त्विदम्।<br>पङ्कजं कथमुत्पन्नं प्रसिद्धं रूढियोगयोः॥ १६ | कहीं भूमि भी स्पष्ट दिखायी नहीं दे रही है, जिसके आधारपर यह जल टिका है तो फिर यह कमल कैसे उत्पन्न हुआ, जिसकी उत्पत्ति जल और पृथ्वीके संयोगसे ही प्रसिद्ध है? ॥ १६ ॥ |
| पश्याम्यद्यास्य पङ्कं तं मूलं वै पङ्कजस्य च।<br>भविष्यति धरा तत्र मूलं नास्त्यत्र संशयः॥ १७ | आज मैं इस कमलका मूल आधार पंक अवश्य देखूँगा; और फिर उस पंककी आधारस्वरूपा भूमि भी अवश्य मिल जायगी, इसमें सन्देह नहीं है॥ १७॥ |
| उत्तरन्सलिले तत्र यावद्वर्षसहस्रकम्।<br>अन्वेषमाणो धरणीं नावाप तां यदा तदा॥ १८<br><br>तपस्तपेति चाकाशे वाग्भूदशरीरिणी।<br>ततो मया तपस्तप्तं पद्मे वर्षसहस्रकम्॥ १९ | तदनन्तर मैं जलमें नीचे उतरकर हजार वर्षोंतक पृथ्वीको खोजता रहा, किंतु जब उसे नहीं पाया तब आकाशवाणी हुई कि 'तपस्या करो'। तत्पश्चात् मैं उसी कमलपर आसीन होकर हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करता रहा॥ १८-१९॥ |
| सृजेति पुनरुद्भूता वाणी तत्र श्रुता मया।<br>विमूढोऽहं तदाकर्ण्य कं सृजामि करोमि किम्॥ २० | इसके बाद पुनः एक अन्य वाणी उत्पन्न हुई—'सृष्टि करो', इसे मैंने साफ-साफ सुना। उसे सुनकर व्याकुल चित्तवाला मैं सोचने लगा, किसका सृजन करूँ और किस प्रकार करूँ?॥ २०॥ |
| तदा दैत्यावपि प्राप्तौ दारुणौ मधुकैटभौ।<br>ताभ्यां विभीषितश्चाहं युद्धाय मकरालये॥ २१ | उसी समय मधु-कैटभ नामवाले दो भयानक दैत्य मेरे सम्मुख आ गये। उस महासागरमें युद्धके लिये तत्पर उन दोनों दैत्योंसे मैं अत्यधिक भयभीत हो गया ॥ २१ ॥ |
| ततोऽहं नालमालम्ब्य वारिमध्यमवातरम्।<br>तदा तत्र मया दृष्टः पुरुषः परमाद्भुतः॥ २२ | तत्पश्चात् मैं उसी कमलकी नालका आश्रय लेकर जलके भीतर उतरा और वहाँ एक अत्यन्त अद्भुत पुरुषको मैंने देखा ॥ २२॥ |
| मेघश्यामशरीरस्तु पीतवासाश्चतुर्भुजः।<br>शेषशायी जगन्नाथो वनमालाविभूषितः॥ २३ | उनका शरीर मेघके समान श्याम वर्णवाला था। वे पीत वस्त्र धारण किये हुए थे और उनकी चार भुजाएँ थीं। वे जगत्पति वनमालासे अलंकृत थे तथा शेषशय्यापर सो रहे थे ॥ २३॥ |
| शङ्खचक्रगदापद्माद्यायुधैः सुविराजितः।<br>तमद्राक्षं महाविष्णुं शेषपर्यङ्कशायिनम्॥ २४ | वे शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुध धारण किये हुए थे। इस प्रकार मैंने शेषनागकी शय्यापर शयन करते हुए उन महाविष्णुको देखा ॥ २४॥ |
| योगनिद्रासमाक्रान्तमविस्पन्दिनमच्युतम् ।<br>शयानं तं समालोक्य भोगिभोगोपरि स्थितम् ॥ २५<br><br>चिन्ता ममाद्भुता जाता किं करोमीति नारद।<br>मया स्मृता तदा देवी स्तुता निद्रास्वरूपिणी ॥ २६ | हे नारदजी! योगनिद्राके वशीभूत होनेके कारण निष्पन्द पड़े उन भगवान् अच्युतको शेषनागके ऊपर सोया हुआ देखकर मुझे अद्भुत चिन्ता हुई और मैं सोचने लगा कि अब क्या करूँ? तब मैंने निद्रास्वरूपा भगवतीका स्मरण किया और मैं उनकी स्तुति करने लगा॥ २५-२६॥ |
| २४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देहान्निर्गत्य सा देवी गगने संस्थिता शिवा।<br>अवितर्क्यशरीरा सा दिव्याभरणमण्डिता॥ २७ | [मेरी स्तुतिसे] वे कल्याणी भगवती विष्णु-भगवान्के शरीरसे निकलकर आकाशमें विराजमान हुईं। उस समय दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत वे भगवती कल्पनाओंसे परे विग्रहवाली प्रतीत हो रही थीं॥ २७॥ |
| विष्णोर्देहं विहायाशु विरराज नभःस्थिता।<br>उदतिष्ठदमेयात्मा तया मुक्तो जनार्दनः॥ २८ | इस प्रकार विष्णुका शरीर तत्काल छोड़कर जब वे आकाशमें विराजित हो गयीं, तब उनके द्वारा मुक्त किये गये अनन्तात्मा वे जनार्दन उठ गये॥ २८॥ |
| पञ्चवर्षसहस्राणि कृतवान्युद्धमुत्तमम्।<br>तदा विलोकितौ दैत्यौ हरिणा विनिपातितौ॥ २९<br><br>उत्सङ्गं विपुलं कृत्वा तत्रैव निहतौ च तौ।<br>रुद्रस्तत्रैव सम्प्राप्तो यत्रावां संस्थितावुभौ॥ ३० | पश्चात् उन्होंने पाँच हजार वर्षोंतक उन दैत्योंके साथ घोर युद्ध किया। पुनः उन महामाया भगवतीके दृष्टिपातसे मोहित किये गये उन दोनों दैत्योंको भगवान् विष्णुने मार दिया। अपनी जाँघोंको विस्तृत करके भगवान् विष्णुने उसीपर उन दोनोंका वध किया। उसी समय जहाँ हम दोनों थे, वहींपर शंकरजी भी आ गये॥ २९-३०॥ |
| त्रिभिः संवीक्षितास्माभिः स्वस्था देवी मनोहरा।<br>संस्तुता परमा शक्तिरुवाचास्मानवस्थितान्॥ ३१<br><br>कृपावलोकनैः कृत्वा पावनैर्मुदितानथ। | तब हम तीनोंने गगन-मण्डलमें विराजमान उन मनोहर देवीको देखा। हमलोगोंके द्वारा उन परम शक्तिकी स्तुति किये जानेपर अपनी पवित्र कृपादृष्टिसे हमलोगोंको प्रसन्न करके उन्होंने वहाँ स्थित हमलोगोंसे कहा— ॥ ३१ ½ ॥ |
| देव्युवाच<br>काजेशाः स्वानि कार्याणि कुरुध्वं समतन्द्रिताः॥ ३२<br><br>सृष्टिस्थितिविशिष्टानि हतावेतौ महासुरौ।<br>कृत्वा स्वानि निकेतानि वसध्वं विगतज्वराः॥ ३३<br><br>प्रजाश्चतुर्विधाः सर्वाः सृजध्वं स्वविभूतिभिः। | देवी बोलीं— हे ब्रह्मा, विष्णु, महेश! अब आपलोग सृष्टि, पालन एवं संहारके अपने-अपने कार्य प्रमादरहित होकर कीजिये। अब आपलोग अपना-अपना निवास बनाकर निर्भीकतापूर्वक रहिये; क्योंकि उन दोनों महादैत्योंका संहार हो गया है। अतः आपलोग अपनी विभूतियोंसे अण्डज, पिण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज—चारों प्रकारकी सभी प्रजाओंका सृजन कीजिये॥ ३२-३३ ½ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः पेशलं सुखदं मृदु॥ ३४<br><br>अब्रूम तामशक्ताः स्मः कथं कुर्मस्त्विमाः प्रजाः।<br>न मही वितता मातः सर्वत्र विततं जलम्॥ ३५<br><br>न भूतानि गुणाश्चापि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च।<br>तदाकर्ण्य वचोऽस्माकं शिवा जाता स्मितानना॥ ३६ | ब्रह्माजी बोले— उन भगवतीका वह मनोहर, सुखकर तथा मधुर वचन सुनकर हमलोगोंने उनसे कहा— हे माता! हमलोग शक्तिहीन हैं, अतः इन प्रजाओंका सृजन कैसे करें? अभी विस्तृत पृथ्वी ही नहीं है और सभी ओर जल-ही-जल फैला हुआ है। सृष्टिकार्यके लिये आवश्यक पंचतत्त्व, गुण, तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ—ये कुछ भी नहीं हैं। हमलोगोंके ये वचन सुनकर भगवतीका मुखमण्डल मुसकानसे भर उठा॥ ३४—३६॥ |
अ० ३ ] तृतीय स्कन्ध २४९
अ० ३ ] तृतीय स्कन्ध २४९
| झटित्येवागतं तत्र विमानं गगनाच्छुभम्।<br>सोवाचास्मिन्सुराः कामं विशध्वं गतसाध्वसाः॥ ३७ | उसी समय वहाँ आकाशसे एक रमणीक विमान आ पहुँचा। तत्पश्चात् उन भगवतीने कहा—हे देवताओ! आप लोग निर्भीक होकर इस विमानमें इच्छानुसार बैठ जायँ॥ ३७॥ | | विमाने ब्रह्मविष्ण्वीशा दर्शयाम्यद्य चाद्भुतम्।<br>तन्निशम्य वचस्तस्या ओमित्युक्त्वा पुनर्वयम्॥ ३८<br><br>समारुह्योपविष्टाः स्मो विमाने रत्नमण्डिते।<br>मुक्तादामसुसंवीते किंकिणीजालशब्दिते॥ ३९<br><br>सुरसद्मनिभे रम्ये त्रयस्तत्राविशंकिताः।<br>सोपविष्टांस्ततो दृष्ट्वा देव्यस्मान्विजितेन्द्रियान्॥ ४०<br><br>स्वशक्त्या तद्विमानं वै नोदयामास चाम्बरे॥ ४१ | हे ब्रह्मा, विष्णु और शिव! मैं आपलोगोंको आज इस विमानमें एक अद्भुत दृश्य दिखाऊँगी। उनका यह वचन सुनकर हम तीनों उनकी बात स्वीकार करके रत्नजटित, मोतियोंकी झालरोंसे शोभायमान, घंटियोंकी ध्वनिसे गुंजित तथा देव-भवनके तुल्य उस रमणीक विमानपर संशयरहित भावसे चढ़कर बैठ गये। तब भगवतीने हम जितेन्द्रिय देवताओंको बैठा हुआ देखकर उस विमानको अपनी शक्तिसे आकाशमण्डलमें उड़ाया॥ ३८—४१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विमानेन ब्रह्मादीनाङ्गतिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
ब्रह्मा, विष्णु और महेशका विभिन्न लोकोंमें जाना तथा अपने ही सदृश अन्य ब्रह्मा, विष्णु और महेशको देखकर आश्चर्यचकित होना, देवीलोकका दर्शन
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजी बोले— |
|---|---|
| विमानं तन्मनोवेगं यत्र स्थानान्तरे गतम्।<br>न जलं तत्र पश्यामो विस्मिताः स्मो वयं तदा॥ १ | मनके समान वेगसे उड़नेवाला वह विमान जिस स्थानपर पहुँचा, वहाँ जब हमने जल नहीं देखा तब हमलोगोंको महान् आश्चर्य हुआ॥ १॥ |
| वृक्षाः सर्वफला रम्याः कोकिलारावमण्डिताः।<br>मही महीधराः कामं वनान्युपवनानि च॥ २ | उस स्थानके वृक्ष सभी प्रकारके फलोंसे लदे हुए और कोकिलोंकी मधुर ध्वनिसे गुंजायमान थे। वहाँकी भूमि, पर्वत, वन और उपवन—ये सभी सुरम्य दृष्टिगोचर हो रहे थे॥ २॥ |
| नार्यश्च पुरुषाश्चैव पशवश्च सरिद्वराः।<br>वाप्यः कूपास्तडागाश्च पल्वलानि च निर्झराः॥ ३ | उस स्थानपर स्त्रियाँ, पुरुष, पशु, बड़ी नदियाँ, बावलियाँ, कुएँ, तालाब, पोखरे तथा झरने इत्यादि विद्यमान थे॥ ३॥ |
| पुरतो नगरं रम्यं दिव्यप्राकारमण्डितम्।<br>यज्ञशालासमायुक्तं नानाहर्म्यविराजितम्॥ ४ | वहाँ भव्य चहारदीवारीसे घिरा हुआ एक मनोहर नगर था, जो यज्ञशालाओं तथा अनेक प्रकारके दिव्य महलोंसे सुशोभित था॥ ४॥ |
| प्रत्यभिज्ञा तदा जाताप्यस्माकं प्रेक्ष्य तत्पुरम्।<br>स्वर्गोऽयमिति केनासौ निर्मितोऽस्ति तदाद्भुतम्॥ ५ | तब उस नगरको देखकर हमलोगोंको ऐसी प्रतीति हुई, मानो यही स्वर्ग है और फिर हम लोगोंकी यह जिज्ञासा हुई कि इस अद्भुत नगरका निर्माण किसने किया है, उस समय हमलोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ!॥ ५॥ |
२५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजानं देवसङ्काशं व्रजन्तं मृगयां वने।<br>अस्माभिः संस्थिता दृष्टा विमानोपरि चाम्बिका॥ ६ | हमलोगों ने आखेटके उद्देश्यसे वनमें जाते हुए एक देवतुल्य राजाको देखा। उसी समय हमलोगोंको जगदम्बा भगवती भी विमानपर स्थित दिखायी पड़ीं॥ ६॥ |
| क्षणाच्चचाल गगने विमानं पवनेरितम्।<br>मुहूर्ताद्वा ततः प्राप्तं देशे चान्ये मनोहरे॥ ७ | थोड़ी ही देर बाद हमारा विमान वायुसे प्रेरित होकर आकाशमें पुनः उड़ने लगा और मुहूर्तभरमें वह पुनः एक अन्य सुरम्य देशमें पहुँच गया॥ ७॥ |
| नन्दनं च वनं तत्र दृष्टमस्माभिरुत्तमम्।<br>पारिजाततरुच्छायासंश्रिता सुरभिः स्थिता॥ ८ | वहाँपर हमलोगोंको अत्यन्त रमणीक नन्दनवन दृष्टिगत हुआ, जिसमें पारिजातवृक्षकी छायाका आश्रय लिये हुए कामधेनु स्थित थी॥ ८॥ |
| चतुर्दन्तो गजस्तस्याः समीपे समवस्थितः।<br>अप्सरसां तत्र वृन्दानि मेनकाप्रभृतीनि च॥ ९<br>क्रीडन्ति विविधैर्भावैर्गाननृत्यसमन्वितैः।<br>गन्धर्वाः शतशस्तत्र यक्षा विद्याधरास्तथा॥ १०<br>मन्दारवाटिकांमध्ये गायन्ति च रमन्ति च।<br>दृष्टः शतक्रतुस्तत्र पौलोम्या सहितः प्रभुः॥ ११ | कामधेनुके समीप ही चार दाँतोंवाला ऐरावत हाथी विद्यमान था और वहाँ मेनका आदि अप्सराओंके समूह अपने नृत्यों तथा गानोंमें विविध भाव-भंगिमाओंका प्रदर्शन करते हुए अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ कर रहे थे। वहाँ मन्दार-वृक्षकी वाटिकाओंमें सैकड़ों गन्धर्व, यक्ष और विद्याधर गा रहे थे और रमण कर रहे थे। वहाँपर इन्द्रभगवान् भी इन्द्राणीके साथ दृष्टिगोचर हुए॥ ९-११॥ |
| वयं तु विस्मिताश्चास्म दृष्ट्वा त्रैविष्टपं तदा।<br>यादःपतिं कुबेरं च यमं सूर्य विभावसुम्॥ १२<br>विलोक्य विस्मिताश्चास्म वयं तत्र सुरान्स्थितान्।<br>तदा विनिर्गतो राजा पुरात्तस्मात्सुमण्डितात्॥ १३ | स्वर्गमें निवास करनेवाले देवताओंको देखकर हमें परम विस्मय हुआ। वहाँपर वरुण, कुबेर, यम, सूर्य, अग्नि तथा अन्य देवताओंको स्थित देखकर हम आश्चर्यचकित हुए। उसी समय उस सुसज्जित नगरसे वह राजा निकला॥ १२-१३॥ |
| देवराज इवाक्षोभ्यो नरवाह्यावनौ स्थितः।<br>विमानस्था वयं तच्च चचाल तरसागतम्॥ १४ | देवताओंके राजा इन्द्रकी भाँति पराक्रमी वह राजा धरातलपर पालकीमें बैठा था। वह विमान हमलोगोंको लेकर द्रुत गतिसे आगे बढ़ा॥ १४॥ |
| ब्रह्मलोकं तदा दिव्यं सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>तत्र ब्रह्माणमालोक्य विस्मितौ हरकेशवौ॥ १५ | तदनन्तर हमलोग अलौकिक ब्रह्मलोकमें पहुँच गये। वहाँपर सभी देवताओंसे नमस्कृत ब्रह्माजीको विद्यमान देखकर भगवान् शंकर एवं विष्णु विस्मयमें पड़ गये॥ १५॥ |
| सभायां तत्र वेदाश्च सर्वे साङ्गाः स्वरूपिणः।<br>सागराः सरितश्चैव पर्वताः पन्नगोरगाः॥ १६ | वहाँ ब्रह्माजीकी सभामें सभी वेद अपने-अपने अंगोंसहित मूर्तरूपमें विराजमान थे। साथ ही समुद्र, नदियाँ, पर्वत, सर्प एवं नाग भी उपस्थित थे॥ १६॥ |
| मामूचतुश्चतुर्वक्त्र कोऽयं ब्रह्मा सनातनः।<br>ताववोचमहं नैव जाने सृष्टिपतिं पतिम्॥ १७ | तत्पश्चात् भगवान् विष्णु और शंकरने मुझसे पूछा—हे चतुर्मुख! ये दूसरे सनातन ब्रह्मा कौन हैं? तब मैंने उनसे कहा कि मैं सबके स्वामी तथा सृष्टिकर्ता इन ब्रह्माको नहीं जानता॥ १७॥ |
| अ० ३ ] | तृतीय स्कन्ध | २५१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कोऽहं कोऽयं किमर्थं वा भ्रमोऽयं मम चेश्वरौ।<br>क्षणादथ विमानं तच्चाचालाशु मनोजवम् ॥ १८ | हे ईश्वरो! मैं कौन हूँ, ये कौन हैं और हम दोनोंका क्या प्रयोजन है? इसमें मैं भ्रमित हूँ। थोड़ी ही देरमें वह विमान पुनः मनके सदृश वेगसे आगेकी ओर बढ़ा॥ १८॥ |
| कैलासशिखरे प्राप्तं रम्ये यक्षगणान्विते।<br>मन्दारवाटिकारम्ये कीरकोकिलकूजिते ॥ १९<br><br>वीणामुरजवाद्यैश्च नादिते सुखदे शिवे।<br>यदा प्राप्तं विमानं तत्तदैव सदनाच्छुभात् ॥ २०<br><br>निर्गतो भगवान्छम्भुर्वृषारूढस्त्रिलोचनः।<br>पञ्चाननो दशभुजः कृतसोमार्थशेखरः ॥ २१ | तत्पश्चात् वह विमान यक्षगणोंसे सुशोभित, मन्दार-वृक्षकी वाटिकाओंके कारण अति सुरम्य, शुक और कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे गुंजित, वीणा और मृदंग आदि वाद्य-यन्त्रोंकी मधुर ध्वनिसे निनादित, सुखदायक तथा मंगलकारी कैलास-शिखरपर पहुँचा॥ १९ १/२ ॥<br><br>उस शिखरपर जब वह विमान पहुँचा; उसी समय वृषभपर आरूढ, पंचमुख, दस भुजाओंवाले, मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये हुए भगवान् शंकर अपने दिव्य भवनसे बाहर निकले॥ २०-२१॥ |
| व्याघ्रचर्मपरीधानो गजचर्मोत्तरीयकः।<br>पार्ष्णिरक्षौ महावीरो गजाननषडाननौ ॥ २२ | उस समय वे व्याघ्रचर्म पहने हुए तथा गजचर्म ओढ़े हुए थे। महाबली गजानन (श्रीगणेश) तथा षडानन (कार्तिकेय) उनके अंगरक्षकके रूपमें विद्यमान थे॥ २२॥ |
| शिवेन सह पुत्रौ द्वौ व्रजमानौ विरेजतुः।<br>नन्दिप्रभृतयः सर्वे गणपाश्च वराश्च ते ॥ २३<br><br>जयशब्दं प्रयुञ्जाना व्रजन्ति शिवपृष्ठगाः।<br>तं वीक्ष्य शङ्करं चान्यं विस्मितास्तत्र नारद ॥ २४<br><br>मातृभिः संशयाविष्टस्तत्राहं न्यवसं मुने।<br>क्षणात्तस्माद् गिरेः शृङ्गाद्विमानं वातरंहसा ॥ २५<br><br>वैकुण्ठसदनं प्राप्तं रमारमणमन्दिरम्।<br>असम्भाव्या विभूतिश्च तत्र दृष्टा मया सुत ॥ २६ | भगवान् शंकरके साथ चल रहे उनके दोनों पुत्र अतीव सुशोभित हो रहे थे। नन्दी आदि सभी प्रधान शिवगण जयघोष करते हुए भगवान् शिवके पीछे-पीछे चल रहे थे। हे नारद! वहाँ अन्य लोगों तथा शंकरको मातृकाओंसहित देखकर हमलोग विस्मयमें पड़ गये और हे मुने! मैं संशयग्रस्त हो गया। थोड़ी ही देरमें वह विमान उस कैलास-शिखरसे वायुगतिसे लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुके वैकुण्ठलोकमें जा पहुँचा। हे पुत्र! मैंने वहाँ अद्भुत विभूतियाँ देखीं॥ २३-२६॥ |
| विसिष्मिये तदा विष्णुर्दृष्ट्वा तत्पुरमुत्तमम्।<br>सदनाग्रे ययौ तावद्धरिः कमलोचनः ॥ २७ | उस अति रमणीक नगरको देखकर भगवान् विष्णु विस्मयमें पड़ गये। उसी समय कमलोचन भगवान् विष्णु अपने भवनसे बाहर निकले॥ २७॥ |
| अतसीकुसुमाभासः पीतवासाश्चतुर्भुजः।<br>द्विजराजाधिरूढश्च दिव्याभरणभूषितः ॥ २८<br><br>वीज्यमानस्तदा लक्ष्म्या कामिन्या चामरैः शुभैः।<br>तं वीक्ष्य विस्मिताः सर्वे वयं विष्णुं सनातनम् ॥ २९ | उनका वर्ण अलसीके पुष्पकी भाँति श्याम था, वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, उनकी चार भुजाएँ थीं, वे पक्षिराज गरुडपर आरूढ़ थे और दिव्य अलंकारोंसे विभूषित थे। भगवती लक्ष्मी उन्हें शुभ चँवर डुला रही थीं। उन सनातन भगवान् विष्णुजीको देखकर हम सभीको महान् आश्चर्य हुआ॥ २८-२९॥ |
| २५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
|---|
| परस्परं निरीक्षन्तः स्थितास्तस्मिन् वरासने।<br>ततश्चचाल तरसा विमानं वातरंहसा ॥ ३०<br><br>सुधासमुद्रः सम्प्राप्तो मिष्टवारिमहोर्मिमान्।<br>यादोगणसमाकीर्णश्चलद्वीचिविराजितः ॥ ३१ | तदनन्तर परस्पर एक-दूसरेको देखते हुए हमलोग अपने-अपने श्रेष्ठ आसनोंपर बैठे रहे। इसके बाद वह विमान वायुसदृश द्रुत गतिसे पुनः चल पड़ा। कुछ ही क्षणोंमें वह विमान मधुर जलवाले, ऊँची-ऊँची लहरोंवाले, नानाविध जल-जन्तुओंसे युक्त तथा चंचल तरंगोंसे शोभायमान अमृत-सागरके तटपर पहुँच गया॥ ३०-३१॥ | | मन्दारपारिजाताद्यैः पादपैरतिशोभितः।<br>नानास्तरणसंयुक्तो नानाचित्रविचित्रितः ॥ ३२<br><br>मुक्तादामपरिक्लिष्टो नानादामविराजितः।<br>अशोकबकुलाख्यैश्च वृक्षैः कुरुबकादिभिः॥ ३३<br><br>संवृतः सर्वतः सौम्यैः केतकीचम्पकैर्वृतः।<br>कोकिलारावसंघुष्टो दिव्यगन्धसमन्वितः ॥ ३४ | उस सागरके तटपर विभिन्न पंक्तियोंमें नाना प्रकारके विचित्र रंगोंवाले मन्दार एवं पारिजात आदि वृक्ष शोभायमान थे। वहाँ मोतियोंकी झालरें तथा अनेक प्रकारके पुष्पहार शोभामें वृद्धि कर रहे थे। समुद्रके सभी ओर अशोक, मौलसिरी, कुरबक आदि वृक्ष विद्यमान थे। उसके चारों ओर चित्ताकर्षक केतकी तथा चम्पक पुष्पोंकी वाटिकाएँ थीं, जो कोयलोंकी मधुर ध्वनियोंसे गुंजित तथा नाना प्रकारकी दिव्य सुगन्धिसे परिपूर्ण थीं॥ ३२-३४॥ | | द्विरेफातिररणत्कारैरञ्जितः परमाद्भुतः।<br>तस्मिन्द्वीपे शिवाकारः पर्यङ्कः सुमनोहरः ॥ ३५<br><br>रत्नालिखितोऽत्यर्थं नानारत्नविराजितः।<br>दृष्टोऽस्माभिर्विमानस्थैर्दूरतः परिमण्डितः॥ ३६ | उस स्थलपर भौंरे गुंजार कर रहे थे। इस प्रकार वहाँका दृश्य परम अद्भुत था। उस द्वीपमें हमलोगोंनें दूरसे ही विमानपर बैठे-बैठे शिवजीके आकारवाला एक मनोहर तथा अत्यन्त अद्भुत पलंग देखा, जो रत्नमालाओंसे जड़ा हुआ था और नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित था॥ ३५-३६॥ | | नानास्तरणसंछन्न इन्द्रचापसमन्वितः।<br>पर्यङ्कप्रवरे तस्मिन्नुपविष्टा वराङ्गना ॥ ३७ | उस पलंगपर अनेक प्रकारके रंगोंवाली आकर्षक चादरें बिछी थीं, जिससे वह पलंग इन्द्रधनुषके समान सुशोभित हो रहा था। उस भव्य पलंगपर एक दिव्यांगना बैठी हुई थी॥ ३७॥ | | रक्तमाल्याम्बरधरा रक्तगन्धानुलेपना।<br>सुरक्तनयना कान्ता 'विद्युत्कोटिसमप्रभा ॥ ३८<br><br>सुचारुवदना रक्तदन्तच्छदविराजिता।<br>रमाकोट्यधिका कान्त्या सूर्यबिम्बनिभाखिला ॥ ३९ | उस देवीने रक्तपुष्पोंकी माला तथा रक्ताम्बर धारण किया था। उसने अपने शरीरमें लाल चन्दनका लेप कर रखा था। लालिमापूर्ण नेत्रोंवाली वह देवी असंख्य विद्युत्की कान्तिसे सुशोभित हो रही थी। सुन्दर मुखवाली, रक्तिम अधरसे सुशोभित, लक्ष्मीसे करोड़ोंगुना अधिक सौन्दर्यशालिनी वह स्त्री अपनी कान्तिसे सूर्यमण्डलकी दीप्तिको भी मानो तिरस्कृत कर रही थी॥ ३८-३९॥ | | वरपाशाङ्कुशाभीष्टधरा श्रीभुवनेश्वरी।<br>अदृष्टपूर्वा दृष्टा सा सुन्दरी स्मितभूषणा ॥ ४० | वर, पाश, अंकुश और अभय मुद्राको धारण करनेवाली तथा मधुर मुसकानयुक्त वे भगवती भुवनेश्वरी हमें दृष्टिगोचर हुईं; जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया था॥ ४०॥ |
| अ० ३ ] | तृतीय स्कन्ध | २५३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ह्रींकारजपनिष्ठैस्तु पक्षिवृन्दैर्निषेविता।<br>अरुणा करुणामूर्तिः कुमारी नवयौवना॥ ४१ | ह्रींकार बीजमन्त्रका जप करनेवाले पक्षियोंका समुदाय उनकी सेवामें निरन्तर रत था। नवयौवनसे सम्पन्न तथा अरुण आभावाली वे कुमारी साक्षात् करुणाकी मूर्ति थीं॥ ४१॥ |
| सर्वशृङ्गारवेषाढ्या मन्दस्मितमुखाम्बुजा।<br>उद्यत्पीनकुचद्वन्द्वनिर्जिताम्भोजकुङ्मला ॥ ४२<br><br>नानामणिगणाकीर्णभूषणैरुपशोभिता ।<br>कनकाङ्गदकेयूरकिरीटपरिशोभिता ॥ ४३<br><br>कनकच्छ्रीचक्रताटङ्कविटङ्कवदनाम्बुजा ।<br>हृल्लेखा भुवनेशीति नामजापपरायणैः॥ ४४<br><br>सखीवृन्दैः स्तुता नित्यं भुवनेशी महेश्वरी।<br>हृल्लेखाद्याभिरमरकन्याभिः परिवेष्टिता॥ ४५<br><br>अनङ्गकुसुमाद्याभिर्देवीभिः परिवेष्टिता।<br>देवी षट्कोणमध्यस्था यन्त्रराजोपरि स्थिता॥ ४६ | वे सभी प्रकारके शृंगार एवं परिधानोंसे सुसज्जित थीं और उनके मुखारविन्दपर मन्द मुसकान विराजमान थी। उनके उन्नत वक्षःस्थल कमलकी कलियोंसे भी बढ़कर शोभायमान हो रहे थे। नानाविध मणियोंसे जटिल आभूषणोंसे वे अलंकृत थीं। स्वर्णनिर्मित कंकण, केयूर और मुकुट आदिसे वे सुशोभित थीं। स्वर्णनिर्मित श्रीचक्राकार कर्णफूलसे सुशोभित उनका मुखारविन्द अतीव दीप्तिमान् था। उनकी सखियोंका समुदाय 'हृल्लेखा' तथा 'भुवनेशी' नामोंका सतत जप कर रहा था और अन्य सखियाँ उन भुवनेशी महेश्वरीकी अनवरत स्तुति कर रही थीं। 'हृल्लेखा' आदि देवकन्याओं तथा 'अनंगकुसुमा' आदि देवियोंसे वे घिरी हुई थीं। वे षट्कोणके मध्यमें यन्त्रराजके ऊपर विराजमान थीं॥ ४२-४६॥ |
| दृष्ट्वा तां विस्मिताः सर्वे वयं तत्र स्थिताभवन्।<br>केयं कान्ता च किं नाम न जानीमोऽत्र संस्थिताः॥ ४७ | उन भगवतीको देखकर वहाँ स्थित हम सभी आश्चर्यचकित हो गये और कुछ देरतक वहीं ठहरे रहे। हमलोग यह नहीं जान पाये कि वे सुन्दरी कौन हैं और उनका क्या नाम है?॥ ४७॥ |
| सहस्रनयना रामा सहस्रकरसंयुता।<br>सहस्रवदना रम्या भाति दूरादसंशयम्॥ ४८ | दूरसे देखनेपर वे भगवती हजार नेत्र, हजार मुख और हजार हाथोंसे युक्त अति सुन्दर लग रही थीं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है॥ ४८॥ |
| नाप्सरा नापि गन्धर्वी नेयं देवाङ्गना किल।<br>इति संशयमापन्नास्तत्र नारद संस्थिताः॥ ४९ | हे नारद! हम सोचने लगे कि ये न तो अप्सरा, न गन्धर्वी और न देवांगना ही दीखती हैं, तो फिर ये कौन हो सकती हैं? हम इसी संशयमें पड़कर वहाँ खड़े रहे॥ ४९॥ |
| तदासौ भगवान्विष्णुर्दृष्ट्वा तां चारुहासिनीम्।<br>उवाचाम्बां स्वविज्ञानात्कृत्वा मनसि निश्चयम्॥ ५०<br><br>एषा भगवती देवी सर्वेषां कारणं हि नः।<br>महाविद्या महामाया पूर्णा प्रकृतिरव्यया॥ ५१ | तब उन सुन्दर हासवाली देवीको देखकर भगवान् विष्णुने अपने अनुभवसे मनमें निश्चित करके हमसे कहा—ये साक्षात् भगवती जगदम्बा हम सबकी कारणस्वरूपा हैं। ये ही महाविद्या, महामाया, पूर्णा तथा शाश्वत प्रकृतिरूपा हैं॥ ५०-५१॥ |
| दुर्ज्ञेयाल्पधियां देवी योगगम्या दुराशया।<br>इच्छा परात्मनः कामं नित्यानित्यस्वरूपिणी॥ ५२ | अल्प बुद्धिवाले गम्भीर आशयवाली इन भगवतीको सम्यक् रूपसे नहीं जान सकते, केवल योगमार्गसे ही ये ज्ञेय हैं। ये देवी परमात्माकी इच्छास्वरूपा तथा नित्यानित्य-स्वरूपिणी हैं॥ ५२॥ |
| २५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
|---|
| दुराराध्याल्पभाग्यैश्च देवी विश्वेश्वरी शिवा।<br>वेदगर्भा विशालाक्षी सर्वेषामादिरीश्वरी॥ ५३ | ये विश्वेश्वरी कल्याणी भगवती अल्पभाग्यवाले प्राणियोंके लिये दुराराध्य हैं। ये वेदजननी विशालनयना जगदम्बा सबकी आदिरूपा ईश्वरी हैं॥ ५३॥ | | एषा संहृत्य सकलं विश्वं क्रीडति संक्षये।<br>लिङ्गानि सर्वजीवानां स्वशरीरे निवेश्य च॥ ५४ | ये भगवती प्रलयावस्थामें समग्र विश्वका संहार करके सभी प्राणियोंके लिंगरूप शरीरको अपने शरीरमें समाविष्ट करके विहार करती हैं॥ ५४॥ | | सर्वबीजमयी ह्येषा राजते साम्प्रतं सुरौ।<br>विभूतयः स्थिताः पार्श्वे पश्यतां कोटिशः क्रमात्॥ ५५ | हे देवो! ये भगवती इस समय सर्वबीजमयी देवीके रूपमें विराजमान हैं। देखिये, इनके समीप करोड़ों विभूतियाँ क्रमसे स्थित हैं॥ ५५॥ | | दिव्याभरणभूषाढ्या दिव्यगन्धानुलेपनाः।<br>परिचर्यापराः सर्वाः पश्यतां ब्रह्मशङ्करौ॥ ५६ | हे ब्रह्मा एवं शंकरजी! देखिये, दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत तथा दिव्य गन्धानुलेपसे युक्त ये सभी विभूतियाँ इन भगवतीकी सेवामें मनोयोगसे संलग्न हैं॥ ५६॥ | | धन्या वयं महाभागाः कृतकृत्याः स्म साम्प्रतम्।<br>यदत्र दर्शनं प्राप्तं भगवत्याः स्वयं त्विदम्॥ ५७ | हमलोग धन्य, सौभाग्यशाली तथा कृतकृत्य हैं, जो कि हमें इस समय यहाँ भगवतीका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ॥ ५७॥ | | तपस्तप्तं पुरा यत्नात्तस्येदं फलमुत्तमम्।<br>अन्यथा दर्शनं कुत्र भवेदस्माकमादरात्॥ ५८ | पूर्वकालमें हमलोगोंने बड़े प्रयत्नसे जो तपस्या की थी, उसीका यह उत्तम परिणाम है; अन्यथा भगवती हमलोगोंको स्नेहपूर्वक दर्शन कैसे देतीं?॥ ५८॥ | | पश्यन्ति पुण्यपुञ्जा ये ये वदान्यास्तपस्विनः।<br>रागिणो नैव पश्यन्ति देवीं भगवतीं शिवाम्॥ ५९ | जो उदार हृदयवाले पुण्यात्मा तथा तपस्वीलोग हैं, वे ही इनके दर्शन प्राप्त करते हैं, किंतु विषयासक्तलोग इन कल्याणमयी भगवतीके दर्शनसे सर्वथा वंचित रहते हैं॥ ५९॥ | | मूलप्रकृतिरेवैषा सदा पुरुषसङ्गता।<br>ब्रह्माण्डं दर्शयत्येषा कृत्वा वै परमात्मने॥ ६० | ये ही मूलप्रकृतिस्वरूपा भगवती परमपुरुषके सहयोगसे ब्रह्माण्डकी रचना करके परमात्माके समक्ष उसे उपस्थित करती हैं॥ ६०॥ | | द्रष्टासौ दृश्यमखिलं ब्रह्माण्डं देवताः सुरौ।<br>तस्यैषा कारणं सर्वा माया सर्वेश्वरी शिवा॥ ६१ | हे देवो! यह पुरुष द्रष्टामात्र है और समस्त ब्रह्माण्ड तथा देवतागण दृश्यस्वरूप हैं। महामाया, कल्याणमयी, सर्वव्यापिनी सर्वेश्वरी ये भगवती ही इन सबका मूल कारण हैं॥ ६१॥ | | क्वाहं वा क्व सुराः सर्वे रम्भाद्याः सुरयोषितः।<br>लक्षांशेन तुलामस्या न भवामः कथञ्चन॥ ६२ | कहाँ मैं, कहाँ सभी देवता और कहाँ रम्भा आदि देवांगनाएँ! हम सभी इन भगवतीकी तुलनामें उनके लक्षांशके बराबर भी नहीं हैं॥ ६२॥ | | सैषा वराङ्गना नाम वै दृष्टा या महार्णवे।<br>बालभावे महादेवी दोलयन्तीव मां मुदा॥ ६३ | ये वे ही महादेवी जगदम्बा हैं, जिन्हें हमलोगोंने प्रलयसागरमें देखा था और जो बाल्यावस्थामें मुझे प्रसन्नतापूर्वक पालनेमें झुला रही थीं॥ ६३॥ |
अ० ४ ] तृतीय स्कन्ध २५५
अ० ४ ] तृतीय स्कन्ध २५५
| शयानं वटपत्रे च पर्यङ्के सुस्थिरे दृढे।<br>पादाङ्गुष्ठं करे कृत्वा निवेश्य मुखपङ्कजे ॥ ६४<br><br>लेलिहन्तञ्च क्रीडन्तमनैकैर्बालचेष्टितैः।<br>रममाणं कोमलाङ्गं वटपत्रपुटे स्थितम् ॥ ६५ | उस समय मैं एक सुस्थिर तथा दृढ़ वटपत्ररूपी पलंगपर सोया हुआ था और अपने पैरका अँगूठा अपने मुखारविन्दमें डालकर चूस रहा था। अत्यन्त कोमल अंगोंवाला मैं उस समय अनेक बालसुलभ चेष्टाएँ करता हुआ उसी वटपत्रके दोनेमें पड़े-पड़े खेल रहा था॥ ६४-६५॥ |
| गायन्ती दोलयन्ती च बालभावान्मयि स्थिते।<br>सेयं सुनिश्चितं ज्ञानं जातं मे दर्शनादिव ॥ ६६ | उस समय गाती हुई ये भगवती बालभावमें स्थित मुझे झूला झुलाती थीं। इन्हें देखकर मुझे यह सुनिश्चित ज्ञान हो गया है कि वे ही यहाँ विराजमान हैं॥ ६६॥ |
| कामं नो जननी सैषा शृणु तं प्रवदाम्यहम्।<br>अनुभूतं मया पूर्वं प्रत्यभिज्ञा समुत्थिता ॥ ६७ | निश्चितरूपसे ये भगवती मेरी जननी हैं। आप सुनें, मुझे पूर्व अनुभवकी स्मृति जग गयी है, जो मैं आपसे कहता हूँ॥ ६७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विमानस्थैर्हरादिभिर्देवीदर्शनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
भगवतीके चरणनखमें त्रिदेवोंको सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन होना, भगवान् विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति करना
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः पुनराह जनार्दनः।<br>वयं गच्छेम पार्श्वेऽस्याः प्रणमन्तः पुनः पुनः॥ १<br><br>सेयं वरा महामाया दास्यत्येषा वरान् हि नः।<br>स्तुवामः सन्निधिं प्राप्य निर्भयाश्चरणान्तिके॥ २<br><br>यदि नो वारयिष्यन्ति द्वारस्थाः परिचारकाः।<br>पठिष्यामश्च तत्रस्थाः स्तुतिं देव्याः समाहिताः ॥ ३ | ब्रह्माजी बोले—हे नारद! ऐसा कहकर जनार्दन भगवान् विष्णुने पुनः कहा—हमलोग बार-बार प्रणाम करते हुए उनके पास चलें। वे वरदायिनी महामाया हमें अवश्य वरदान देंगी। अतः निर्भय होकर हमें उनके चरणोंके निकट चलकर उनकी स्तुति करनी चाहिये। यदि उनके द्वारपाल हमें वहाँ रोकेंगे तो हमलोग ध्यानपूर्वक वहीं बैठकर देवीकी स्तुति करने लगेंगे॥ १—३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्ते हरिणा वाक्ये सुप्रहृष्टौ सुसंस्थितौ।<br>जातौ प्रमुदितौ कामं निकटे गमनाय च ॥ ४<br><br>ओमित्युक्त्वा हरिं सर्वे विमानात्त्वरितास्त्रयः।<br>उत्तीर्य निर्गता द्वारि शङ्कमाना मनस्यलम् ॥ ५<br><br>द्वारस्थान् वीक्ष्य तान्सर्वान्देवी भगवती तदा।<br>स्मितं कृत्वा चकाराशु तांस्त्रीन्स्त्रीरूपधारिणः ॥ ६ | ब्रह्माजी बोले—भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर मैं तथा शिव—हम दोनों प्रसन्नतासे गद्गद होकर शीघ्र उनके निकट जानेको उत्सुक हो गये। विष्णुसे ‘ठीक है’—ऐसा कहकर हम तीनों शीघ्रतापूर्वक विमानसे उतरकर मन-ही-मन अनेक तर्क-वितर्क करते हुए भगवतीके द्वारपर ज्यों ही पहुँचे, त्यों ही द्वारपर स्थित हम सभीको देखकर मन्द मुसकान करके उन भगवतीने हम तीनोंको स्त्रीरूपमें परिणत कर दिया॥ ४—६॥ |
| २५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वयं युवतयो जाताः सुरूपाश्चारुभूषणाः।<br>विस्मयं परमं प्राप्ता गतास्तत्सन्निधिं पुनः॥ ७ | हमलोग नाना प्रकारके भूषणोंसे अलंकृत रूपवती युवती बन गये और अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर उन महामाया भगवतीके पास पुनः गये॥ ७॥ |
| सा दृष्ट्वा नः स्थितांस्तत्र स्त्रीरूपांश्चरणान्तिके।<br>व्यलोकयत चार्वङ्गी प्रेमसम्पूर्णया दृशा॥ ८ | स्त्रीके वेषमें हमलोगोंको अपने चरणोंके निकट देखकर अत्यन्त मनोहर रूपवाली उन देवीने हमलोगोंके ऊपर कृपादृष्टि डाली॥ ८॥ |
| प्रणम्य तां महादेवीं पुरतः संस्थिता वयम्।<br>परस्परं लोकयन्तः स्त्रीरूपाश्चारुभूषणाः॥ ९ | उस समय महामाया भगवतीको प्रणाम करके स्त्री-वेषधारी तथा दिव्य वस्त्राभरण धारण किये हम तीनों परस्पर एक दूसरेको देखते हुए उनके सामने खड़े रहे॥ ९॥ |
| पादपीठं प्रेक्षमाणा नानामणिविभूषितम्।<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशं स्थितास्तत्र वयं त्रयः॥ १० | विविध प्रकारके मणिजटित एवं करोड़ों सूर्यके समान देदीप्यमान देवीके पादपीठको देखते हुए हम तीनों वहीं स्थित रहे॥ १०॥ |
| काश्चिद्रक्ताम्बरास्तत्र सहचर्यः सहस्रशः।<br>काश्चिन्नीलाम्बरा नार्यस्तथा पीताम्बराः शुभाः॥ ११ | उन महादेवीकी हजारों सेविकाओंमेंसे कुछने रक्त वस्त्र, कुछने नीले वस्त्र और कुछने सुन्दर पीत वस्त्र धारण कर रखे थे॥ ११॥ |
| देव्यः सर्वाः शुभाकारा विचित्राम्बरभूषणाः।<br>विरेजुः पार्श्वतस्तस्याः परिचर्यापराः किल॥ १२ | वहाँ उपस्थित सभी देवियाँ सुन्दर स्वरूपकी थीं और विचित्र वस्त्र एवं आभूषणोंसे सुसज्जित थीं। वे सब जगदम्बाकी विभिन्न सेवाओंमें तत्पर थीं॥ १२॥ |
| जगुश्च ननृतुश्चान्याः पर्युपासन्त ताः स्त्रियः।<br>वीणामारुतवाद्यानि वादयन्त्यो मुदान्विताः॥ १३ | उनमेंसे कुछ गा रही थीं, कुछ नाच रही थीं और कुछ स्त्रियाँ हर्षके साथ वीणा तथा मुखवाद्य बजाती हुई अन्य सेवाओंमें संलग्न थीं॥ १३॥ |
| शृणु नारद वक्ष्यामि यद् दृष्टं तत्र चाद्भुतम्।<br>नखदर्पणमध्ये वै देव्याश्चरणपङ्कजे॥ १४<br><br>ब्रह्माण्डमखिलं सर्वं तत्र स्थावरजङ्गमम्।<br>अहं विष्णुश्च रुद्रश्च वायुरग्निर्यमो रविः॥ १५<br><br>वरुणः शीतगुस्त्वष्टा कुबेरः पाकशासनः।<br>पर्वताः सागरा नद्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥ १६<br><br>विश्वावसुश्चित्रकेतुः श्वेतश्चित्राङ्गदस्तथा।<br>नारदस्तुम्बुरुश्चैव हाहाहूहूस्तथैव च॥ १७<br><br>अश्विनौ वसवः साध्याः सिद्धाश्च पितरस्तथा।<br>नागाः शेषादयः सर्वे किन्नरोरगराक्षसाः॥ १८ | हे नारदजी! वहाँ मैंने भगवतीके चरणकमलके नखरूपी दर्पणमें जो अद्भुत दृश्य देखा, उसे बताता हूँ, आप सुनें। वहाँ मुझे समस्त स्थावर-जंगमात्मक ब्रह्माण्ड, मैं (ब्रह्मा), विष्णु, शिव, वायु, अग्नि, यम, सूर्य, वरुण, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, कुबेर, इन्द्र, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, गन्धर्व, अप्सराएँ, विश्वावसु, चित्रकेतु, श्वेत, चित्रांगद, नारद, तुम्बुरु, हाहा-हूहू, दोनों अश्विनीकुमार, अष्टवसु, साध्य, सिद्धगण, पितर, शेष आदि नाग, सभी किन्नर, उरग और राक्षसगण दिखायी दे रहे थे॥ १४-१८॥ |
| वैकुण्ठो ब्रह्मलोकश्च कैलासः पर्वतोत्तमः।<br>सर्वं तदखिलं दृष्टं नखमध्यस्थितं च नः॥ १९<br><br>मज्जन्मपङ्कजं तत्र स्थितोऽहं चतुराननः।<br>शेषशायी जगन्नाथस्तथा च मधुकैटभौ॥ २० | वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक तथा पर्वतश्रेष्ठ कैलास—इन सबको हमने उनके पद-नखमें विराजमान देखा। उसीमें मेरा जन्मस्थान कमल भी था और मैं चतुरानन उस कमलकोशमें बैठा हुआ था। मधु-कैटभ नामके दोनों दानव तथा शेषशायी महाविष्णु भी उसीमें विराजमान थे॥ १९-२०॥ |
| अ० ४ ] | तृतीय स्कन्ध | २५७ | | :--- | :--- |
| ब्रह्मोवाच | **ब्रह्माजी बोले—**इस प्रकार परमेश्वरीके चरण- | | एवं दृष्टं मया तत्र पादपद्मनखे स्थितम्।<br>विस्मितोऽहं ततो वीक्ष्य किमेतदिति शङ्कितः॥ २१ | कमलके नखमें स्थित यह सारा दृश्य मुझे दिखायी दिया, जिसे देखकर मैं चकित रह गया और मन-ही-मन सोचने लगा—‘यह क्या है?’॥ २१॥ | | विष्णुश्च विस्मयाविष्टः शङ्करश्च तथा स्थितः।<br>तां तदा मेनिरे देवीं वयं विश्वस्य मातरम्॥ २२ | मेरे ही समान विष्णु और शिव भी वहाँ आश्चर्य-चकित होकर खड़े थे। उस समय हम तीनोंने समझ लिया कि समस्त जगत्की जननी ये ही महादेवी हैं॥ २२॥ | | ततो वर्षशतं पूर्णं व्यतिक्रान्तं प्रपश्यतः।<br>सुधामये शिवे द्वीपे विहारं विविधं तदा॥ २३ | इस प्रकार अमृतमय एवं कल्याणमय उस द्वीपमें अनेक प्रकारके अद्भुत दृश्य देखते हुए हमारे सौ वर्ष व्यतीत हो गये॥ २३॥ | | सख्य इव तदा तत्र मेनिरेऽस्मानवस्थितान्।<br>देव्यः प्रमुदिताकारा नानाभरणमण्डिताः॥ २४<br><br>वयमप्यतिरम्यत्वाद् बभूविम विमोहिताः।<br>प्रहृष्टमनसः सर्वे पश्यन्भावान्मनोरमान्॥ २५ | वहाँकी प्रसन्नवदना एवं विचित्र अलंकारोंसे अलंकृत देवियाँ हम तीनोंको अपनी सखियाँ समझती थीं और हमलोग भी उनके स्नेहपूर्ण सद्व्यवहारसे मुग्ध थे तथा उनके मनोरम भावोंको देखकर अतीव प्रसन्न थे॥ २४-२५॥ | | एकदा तां महादेवीं देवीं श्रीभुवनेश्वरीम्।<br>तुष्टाव भगवान्विष्णुर्युवतीभावसंस्थितः॥ २६ | एक बार नारीरूपमें स्थित भगवान् विष्णु महादेवी भगवती श्रीभुवनेश्वरीकी स्तुति करने लगे—॥ २६॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नमः।<br>कल्याण्यै कामदायै च वृद्ध्यै सिद्ध्यै नमो नमः॥ २७<br><br>सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणये नमः।<br>पञ्चकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नमः॥ २८ | **श्रीभगवान् बोले—**प्रकृति एवं विधात्रीदेवीको मेरा निरन्तर नमस्कार है। कल्याणी, कामप्रदा, वृद्धि तथा सिद्धिदेवीको बार-बार नमस्कार है। सच्चिदानन्द-रूपिणी तथा संसारकी योनिसस्वरूपा देवीको नमस्कार है। आप पंचकृत्य* विधात्री तथा श्रीभुवनेश्वरीदेवीको बार-बार नमस्कार है॥ २७-२८॥ | | सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नमः।<br>अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नमः॥ २९ | समस्त संसारकी एकमात्र अधिष्ठात्री तथा कूटस्थरूपा देवीको बार-बार नमस्कार है। अर्धमात्राकी अर्थभूता एवं हृल्लेखादेवीको बार-बार नमस्कार है॥ २९॥ | | ज्ञातं मयाखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं<br>त्वत्तोऽस्य सम्भवलयावपि मातरद्य।<br>शक्तिश्च तेऽस्य करणे विततप्रभावा<br>ज्ञाताधुना सकललोकमयीति नूनम्॥ ३० | हे जननि! आज मैंने जान लिया कि यह समस्त विश्व आपमें समाहित है तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी सृष्टि एवं संहार भी आप ही करती हैं। इस ब्रह्माण्डके निर्माणमें आपकी विस्तृत प्रभाववाली शक्ति ही मुख्य हेतु है, अतः मुझे यह ज्ञात हो गया कि आप ही सम्पूर्ण लोकमें व्याप्त हैं। इस सत् एवं |
* सृष्टि, स्थिति, संहार, निग्रह, अनुग्रह।
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—9 A