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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० २६ ]तृतीय स्कन्ध३७५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुबाहुरपि काश्यां तु दुर्गायाः प्रतिमां शुभाम् ।<br>कारयित्वा च प्रासादं स्थापयामास भक्तितः ॥ ४१महाराज सुबाहुने भी काशीमें मन्दिरका निर्माण कराकर भक्तिपूर्वक दुर्गादेवीकी दिव्य प्रतिमा स्थापित की ॥ ४१ ॥
तत्र तस्या जनाः सर्वे प्रेमभक्तिपरायणाः ।<br>पूजां चक्रुर्विधानेन यथा विश्वेश्वरस्य ह ॥ ४२काशीके सभी लोग प्रेम और भक्तिमें तत्पर होकर विधिवत् दुर्गादेवीकी उसी प्रकार पूजा करने लगे, जैसे भगवान् विश्वनाथजीकी करते थे ॥ ४२ ॥
विख्याता सा बभूवाथ दुर्गा देवी धरातले ।<br>देशे देशे महाराज तस्या भक्तिर्व्यवर्धत ॥ ४३हे महाराज! तबसे इस धरातलपर देश-देशमें भगवती दुर्गा विख्यात हो गयीं और लोगोंमें उनकी भक्ति बढ़ने लगी। उस समय भारतवर्षमें सब जगह सभी वर्णोंमें भवानी ही सबकी पूजनीया हो गयीं ॥ ४३-४४ ॥
सर्वत्र भारते लोके सर्ववर्णेषु सर्वथा ।<br>भजनीया भवानी तु सर्वेषामभवत्तदा ॥ ४४
शक्तिभक्तिरताः सर्वे मानिनश्चाभवन्नृप ।<br>आगमोक्तैरथ स्तोत्रैर्जपध्यानपरायणाः ॥ ४५हे नृप! सभी लोग भगवती शक्तिको मानने लगे, उनकी भक्तिमें निरत रहने लगे और वेद-वर्णित स्तोत्रोंके द्वारा उनके जप तथा ध्यानमें तत्पर हो गये। इस प्रकार भक्तिपरायण लोग सभी नवरात्रोंमें विधानपूर्वक भगवतीका पूजन, हवन तथा यज्ञ करने लगे ॥ ४५-४६ ॥
नवरात्रेषु सर्वेषु चक्रुः सर्वे विधानतः ।<br>अर्चनं हवनं यागं देव्या भक्तिपरा जनाः ॥ ४६

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे देवीस्थापनवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥


अथ षड्विंशोऽध्यायः

नवरात्रव्रत-विधान, कुमारीपूजामें प्रशस्त कन्याओंका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>नवरात्रे तु सम्प्राप्ते किं कर्तव्यं द्विजोत्तम ।<br>विधानं विधिवद् ब्रूहि शरत्काले विशेषतः ॥ १**जनमेजय बोले—**हे द्विजश्रेष्ठ! नवरात्रके आनेपर और विशेष करके शारदीय नवरात्रमें क्या करना चाहिये? उसका विधान आप मुझे भलीभाँति बताइये ॥ १ ॥
किं फलं खलु कस्तत्र विधिः कार्यो महामते ।<br>एतद्विस्तरतो ब्रूहि कृपया द्विजसत्तम ॥ २हे महामते! उस पूजनका क्या फल है और उसमें किस विधिका पालन करना चाहिये। हे द्विजवर! कृपया विस्तारके साथ मुझे यह सब बताइये ॥ २ ॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि नवरात्रव्रतं शुभम् ।<br>शरत्काले विशेषेण कर्तव्यं विधिपूर्वकम् ॥ ३**व्यासजी बोले—**हे राजन्! अब मैं पवित्र नवरात्रव्रतके विषयमें बता रहा हूँ, सुनिये। शरत्कालके नवरात्रमें विशेष करके यह व्रत करना चाहिये ॥ ३ ॥
वसन्ते च प्रकर्तव्यं तथैव प्रेमपूर्वकम् ।<br>द्वावृतू यमदंष्ट्राख्यौ नूनं सर्वजनेषु वै ॥ ४उसी प्रकार प्रेमपूर्वक वसन्त ऋतुके नवरात्रमें भी इस व्रतको करे। ये दोनों ऋतुएँ सब प्राणियोंके लिये यमदंष्ट्रा कही गयी हैं ॥ ४ ॥

| ३७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरद्वसन्तनामानौ दुर्गमौ प्राणिनामिह।<br>तस्माद्यत्नादिदं कार्यं सर्वत्र शुभमिच्छता॥ ५शरत् तथा वसन्त नामक ये दोनों ऋतुएँ संसारमें प्राणियोंके लिये दुर्गम हैं। अतएव आत्मकल्याणके इच्छुक व्यक्तिको बड़े यत्नके साथ यह नवरात्रव्रत करना चाहिये॥ ५॥
द्वावेव सुमहाघोरावृतू रोगकरौ नृणाम्।<br>वसन्तशरदावेव सर्वनाशकरावुभौ॥ ६<br><br>तस्मात्तत्र प्रकर्तव्यं चण्डिकापूजनं बुधैः।<br>चैत्राश्विने शुभे मासे भक्तिपूर्वं नराधिप॥ ७ये वसन्त तथा शरद्—दोनों ही ऋतुएँ बड़ी भयानक हैं और मनुष्योंके लिये रोग उत्पन्न करनेवाली हैं। ये सबका विनाश कर देनेवाली हैं। अतएव हे राजन्! बुद्धिमान् लोगोंको शुभ चैत्र तथा आश्विनमासमें भक्तिपूर्वक चण्डिकादेवीका पूजन करना चाहिये॥ ६-७॥
अमावास्यां च सम्प्राप्य सम्भारं कल्पयेच्छुभम्।<br>हविष्यं चाशनं कार्यमेकभुक्तं तु तद्दिने॥ ८अमावस्या आनेपर व्रतकी सभी शुभ सामग्री एकत्रित कर ले और उस दिन एकभुक्त व्रत करे और हविष्य ग्रहण करे॥ ८॥
मण्डपस्तु प्रकर्तव्यः समे देशे शुभे स्थले।<br>हस्तषोडशमानेन स्तम्भध्वजसमन्वितः॥ ९किसी समतल तथा पवित्र स्थानमें सोलह हाथ लम्बे-चौड़े और स्तम्भ तथा ध्वजाओंसे सुसज्जित मण्डपका निर्माण करना चाहिये॥ ९॥
गौरमृद्गोमयाभ्याञ्च लेपनं कारयेत्ततः।<br>तन्मध्ये वेदिका शुभ्रा कर्तव्या च समा स्थिरा॥ १०उसको सफेद मिट्टी और गोबरसे लिपवा दे। तत्पश्चात् उस मण्डपके बीचमें सुन्दर, चौरस और स्थिर वेदी बनाये॥ १०॥
चतुर्हस्ता च हस्तोच्छा पीठार्थं स्थानमुत्तमम्।<br>तोरणानि विचित्राणि वितानञ्च प्रकल्पयेत्॥ ११वह वेदी चार हाथ लम्बी-चौड़ी और हाथभर ऊँची होनी चाहिये। पीठके लिये उत्तम स्थानका निर्माण करे तथा विविध रंगोंके तोरण लटकाये और ऊपर चाँदनी लगा दे॥ ११॥
रात्रौ द्विजानथामन्त्र्य देवीतत्त्वविशारदान्।<br>आचारनिरतान्दान्तान्वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ १२<br><br>प्रतिपद्दिवसे कार्यं प्रातःस्नानं विधानतः।<br>नद्यां नदे तडागे वा वाप्यां कूपे गृहेऽथवा॥ १३रात्रिमें देवीका तत्त्व जाननेवाले, सदाचारी, संयमी और वेद-वेदांगके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके प्रतिपदाके दिन प्रातःकाल नदी, नद, तड़ाग, बावली, कुआँ अथवा घरपर ही विधिवत् स्नान करे॥ १२-१३॥
प्रातर्नित्यं पुरः कृत्वा द्विजानां वरणं ततः।<br>अर्घ्यपाद्यादिकं सर्वं कर्तव्यं मधुपूर्वकम्॥ १४प्रातःकालके समय नित्यकर्म करके ब्राह्मणोंका वरण-कर उन्हें मधुपर्क तथा अर्घ्य-पाद्य आदि अर्पण करे॥ १४॥
वस्त्रालङ्करणादीनि देयानि च स्वशक्तितः।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं विभवे सति कर्हिचित्॥ १५अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें वस्त्र, अलंकार आदि प्रदान करे। धन रहते हुए इस काममें कभी कृपणता न करे॥ १५॥
विप्रैः सन्तोषिताैः कार्यं सम्पूर्णं सर्वथा भवेत्।<br>नव पञ्च त्रयश्चैको देव्याः पाठे द्विजाः स्मृताः॥ १६सन्तुष्ट ब्राह्मणोंके द्वारा किया हुआ कर्म सम्यक् प्रकारसे परिपूर्ण होता है। देवीका पाठ करनेके लिये नौ, पाँच, तीन अथवा एक ब्राह्मण बताये गये हैं॥ १६॥

| अ० २६ ] | तृतीय स्कन्ध | ३७७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वरयेद् ब्राह्मणं शान्तं पारायणकृते तदा।<br>स्वस्तिवाचनकं कार्यं वेदमन्त्रविधानतः॥ १७देवीभागवतका पारायण करनेके कार्यमें किसी शान्त ब्राह्मणका वरण करे और वैदिक मन्त्रोंसे स्वस्तिवाचन कराये॥ १७॥
वेद्यां सिंहासनं स्थाप्यं क्षौमवस्त्रसमन्वितम्।<br>तत्र स्थाप्याम्बिका देवी चतुर्हस्तायुधान्विता॥ १८<br><br>रत्नभूषणसंयुक्ता मुक्ताहारविराजिता।<br>दिव्याम्बरधरा सौम्या सर्वलक्षणसंयुता॥ १९<br><br>शङ्खचक्रगदापद्मधरा सिंहे स्थिता शिवा।<br>अष्टादशभुजा वापि प्रतिष्ठाप्या सनातनी॥ २०वेदीपर रेशमी वस्त्रसे आच्छादित सिंहासन स्थापित करे। उसके ऊपर चार भुजाओं तथा उनमें आयुधोंसे युक्त देवीकी प्रतिमा स्थापित करे। भगवतीकी प्रतिमा रत्नमय भूषणोंसे युक्त, मोतियोंके हारसे अलंकृत, दिव्य वस्त्रोंसे सुसज्जित, शुभलक्षणसम्पन्न और सौम्य आकृतिकी हो। वे कल्याणमयी भगवती शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये हुए हों और सिंहपर सवार हों; अथवा अठारह भुजाओंसे सुशोभित सनातनी देवीको प्रतिष्ठित करे॥ १८-२०॥
अर्चाभावे तथा यन्त्रं नवार्णमन्त्रसंयुतम्।<br>स्थापयेत्पीठपूजार्थं कलशं तत्र पार्श्वतः॥ २१भगवतीकी प्रतिमाके अभावमें नवार्णमन्त्रयुक्त यन्त्रको पीठपर स्थापित करे और पीठपूजाके लिये पासमें कलश भी स्थापित कर ले॥ २१॥
पञ्चपल्लवसंयुक्तं वेदमन्त्रैः सुसंस्कृतम्।<br>सुतीर्थजलसम्पूर्णं हेमरत्नैः समन्वितम्॥ २२वह कलश पंचपल्लवयुक्त, वैदिक मन्त्रोंसे भलीभाँति संस्कृत, उत्तम तीर्थके जलसे पूर्ण और सुवर्ण तथा पंचरत्नमय होना चाहिये॥ २२॥
पार्श्वे पूजार्थसम्भारान्परिकल्प्य समन्ततः।<br>गीतवादित्रनिर्घोषान्कारयेन्मङ्गलाय वै॥ २३पासमें पूजाकी सब सामग्रियाँ रखकर उत्सवके निमित्त गीत तथा वाद्योंकी ध्वनि भी करानी चाहिये॥ २३॥
तिथौ हस्तान्वितायां च नन्दायां पूजनं वरम्।<br>प्रथमे दिवसे राजन् विधिवत्कामदं नृणाम्॥ २४हस्तनक्षत्रयुक्त नन्दा (प्रतिपदा) तिथिमें पूजन श्रेष्ठ माना जाता है। हे राजन्! पहले दिन विधिवत् किया हुआ पूजन मनुष्योंका मनोरथ पूर्ण करनेवाला होता है॥ २४॥
नियमं प्रथमं कृत्वा पश्चात्पूजां समाचरेत्।<br>उपवासेन नक्तेन चैकभुक्तेन वा पुनः॥ २५सबसे पहले उपवासव्रत, एकभुक्तव्रत अथवा नक्तव्रत—इनमेंसे किसी एक व्रतके द्वारा नियम करनेके पश्चात् ही पूजा करनी चाहिये॥ २५॥
करिष्यामि व्रतं मातर्नवरात्रमनुत्तमम्।<br>साहाय्यं कुरु मे देवि जगदम्ब ममाखिलम्॥ २६[पूजनके पहले प्रार्थना करते हुए कहे—] हे माता! मैं सर्वश्रेष्ठ नवरात्रव्रत करूँगा। हे देवि! हे जगदम्बे! [इस पवित्र कार्यमें] आप मेरी सम्पूर्ण सहायता करें॥ २६॥
यथाशक्ति प्रकर्तव्यो नियमो व्रतहेतवे।<br>पश्चात्पूजा प्रकर्तव्या विधिवन्मन्त्रपूर्वकम्॥ २७इस व्रतके लिये यथाशक्ति नियम रखे। उसके बाद मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधिवत् भगवतीका पूजन करे॥ २७॥
चन्दनागुरुकर्पूरैः कुसुमैश्च सुगन्धिभिः।<br>मन्दारकरजाशोकचम्पकैः करवीरकैः॥ २८<br><br>मालतीब्रह्मकापुष्पैस्तथा बिल्वदलैः शुभैः।<br>पूजयेज्जगतां धात्रीं धूपैर्दीपैर्विधानतः॥ २९चन्दन, अगरु, कपूर तथा मन्दार, करंज, अशोक, चम्पा, कText (कनैल), मालती, ब्राह्मी आदि सुगन्धित पुष्पों, सुन्दर बिल्वपत्रों और धूप-दीपसे विधिवत् भगवती जगदम्बाका पूजन करना चाहिये॥ २८-२९॥

३७८ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २६]

३७८ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २६]

फलैर्नानाविधैरर्घ्यं प्रदातव्यं च तत्र वै।<br>नारिकेलैर्मातुलुङ्गैर्दाडिमीकदलीफलैः ॥ ३०<br>नारंगैः पनसैश्चैव तथा पूर्णफलैः शुभैः।<br>अन्नदानं प्रकर्तव्यं भक्तिपूर्वं नराधिप॥ ३१उस अवसरपर अर्घ्य भी प्रदान करे। हे राजन्! नारियल, बिजौरा नीबू, दाडिम, केला, नारंगी, कटहल तथा बिल्वफल आदि अनेक प्रकारके सुन्दर फलोंके साथ भक्तिपूर्वक अन्नका नैवेद्य एवं पवित्र बलि अर्पित करे॥ ३०-३४॥
मांसाशनं ये कुर्वन्ति तैः कार्यं पशुहिंसनम्।<br>महिषाजवराहाणां बलिदानं विशिष्यते॥ ३२होमके लिये त्रिकोण कुण्ड बनाना चाहिये अथवा त्रिकोणके मानके अनुरूप उत्तम वेदी बनानी चाहिये॥ ३५॥
देव्यग्रे निहता यान्ति पशवः स्वर्गमव्ययम्।<br>न हिंसा पशुजा तत्र निघ्नतां तत्कृतेऽनघ॥ ३३विविध प्रकारके सुन्दर द्रव्योंसे प्रतिदिन भगवतीका त्रिकाल (प्रातः-सायं-मध्याह्न) पूजन करना चाहिये और गायन, वादन तथा नृत्यके द्वारा महान् उत्सव मनाना चाहिये॥ ३६॥
अहिंसा याज्ञिकी प्रोक्ता सर्वशास्त्रविनिर्णये।<br>देवदार्थे विसृष्टानां पशूनां स्वर्गतिर्ध्रुवा॥ ३४[व्रती] नित्य भूमिपर सोये और वस्त्र, आभूषण तथा अमृतके सदृश दिव्य भोजन आदिसे कुमारी कन्याओंका पूजन करे॥ ३७॥
होमार्थं चैव कर्तव्यं कुण्डं चैव त्रिकोणकम्।<br>स्थण्डिलं वा प्रकर्तव्यं त्रिकोणं मानतः शुभम्॥ ३५नित्य एक ही कुमारीका पूजन करे अथवा प्रतिदिन एक-एक कुमारीकी संख्याके वृद्धिक्रमसे पूजन करे अथवा प्रतिदिन दुगुने-तिगुनेके वृद्धिक्रमसे और या तो प्रत्येक दिन नौ कुमारी कन्याओंका पूजन करे॥ ३८॥
त्रिकालं पूजनं नित्यं नानाद्रव्यैर्मनोहरैः।<br>गीतवादित्रनृत्यैश्च कर्तव्यश्च महोत्सवः॥ ३६अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार भगवतीकी पूजा करे, किंतु हे राजन्! देवीके यज्ञमें धनकी कृपणता न करे॥ ३९॥
नित्यं भूमौ च शयनं कुमारीणां च पूजनम्।<br>वस्त्रालङ्करणैर्दिव्यैर्भोजनैश्च सुधामयैः॥ ३७हे राजन्! पूजाविधिमें एक वर्षकी अवस्थावाली कन्या नहीं लेनी चाहिये; क्योंकि वह कन्या गन्ध और भोग आदि पदार्थोंके स्वादसे बिलकुल अनभिज्ञ रहती है। कुमारी कन्या वह कही गयी है, जो दो वर्षकी हो चुकी हो। तीन वर्षकी कन्या त्रिमूर्ति, चार वर्षकी कन्या कल्याणी, पाँच वर्षकी रोहिणी, छः वर्षकी कालिका, सात वर्षकी चण्डिका, आठ वर्षकी शाम्भवी, नौ वर्षकी दुर्गा और दस वर्षकी कन्या सुभद्रा कहलाती है। इससे ऊपरकी अवस्थावाली कन्याका पूजन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह सभी कार्योंमें निन्द्य मानी जाती है। इन नामोंसे कुमारीका विधिवत् पूजन सदा करना चाहिये। अब मैं इन नौ कन्याओंके पूजनसे प्राप्त होनेवाले फलोंको कहूँगा॥ ४०-४४॥
एकैकां पूजयेन्नित्यमेकवृद्ध्या तथा पुनः।<br>द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्रत्येकं नवकं च वा॥ ३८
विभवस्यानुसारेण कर्तव्यं पूजनं किल।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं राजञ्छक्तिमखे सदा॥ ३९
एकवर्षा न कर्तव्या कन्या पूजाविधौ नृप।<br>परमज्ञा तु भोगानां गन्धादीनां च बालिका॥ ४०
कुमारिका तु सा प्रोक्ता द्विवर्षा या भवेदिह।<br>त्रिमूर्तिश्च त्रिवर्षा च कल्याणी चतुरब्दिका॥ ४१
रोहिणी पञ्चवर्षा च षड्वर्षा कालिका स्मृता।<br>चण्डिका सप्तवर्षा स्यादष्टवर्षा च शाम्भवी॥ ४२
नववर्षा भवेद् दुर्गा सुभद्रा दशवार्षिकी।<br>अत ऊर्ध्वं न कर्तव्या सर्वकार्यविगर्हिता॥ ४३
एभिश्च नामभिः पूजा कर्तव्या विधिसंयुता।<br>तासां फलानि वक्ष्यामि नवानां पूजने सदा॥ ४४

अ० २६ ] तृतीय स्कन्ध ३७९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुमारी पूजिता कुर्याद्दुःखदारिद्र्यनाशनम्।<br>शत्रुक्षयं धनायुष्यं बलवृद्धिं करोति वै॥ ४५'कुमारी' नामकी कन्या पूजित होकर दुःख तथा दरिद्रताका नाश करती है; वह शत्रुओंका क्षय और धन, आयु तथा बलकी वृद्धि करती है॥ ४५॥
त्रिमूर्तिपूजनादायुस्त्रिवर्गस्य फलं भवेत्।<br>धनधान्यागमश्चैव पुत्रपौत्रादिवृद्धयः॥ ४६'त्रिमूर्ति' नामकी कन्याका पूजन करनेसे धर्म-अर्थ-कामकी पूर्ति होती है, धन-धान्यका आगम होता है और पुत्र-पौत्र आदिकी वृद्धि होती है॥ ४६॥
विद्यार्थी विजयार्थी च राज्यार्थी यश्च पार्थिवः।<br>सुखार्थी पूजयेन्नित्यं कल्याणीं सर्वकामदाम्॥ ४७जो राजा विद्या, विजय, राज्य तथा सुखकी कामना करता हो, उसे सभी कामनाएँ प्रदान करने-वाली 'कल्याणी' नामक कन्याका नित्य पूजन करना चाहिये॥ ४७॥
कालिकां शत्रुनाशार्थं पूजयेद्भक्तिपूर्वकम्।<br>ऐश्वर्यधनकामश्च चण्डिकां परिपूजयेत्॥ ४८शत्रुओंका नाश करनेके लिये भक्तिपूर्वक 'कालिका' कन्याका पूजन करना चाहिये। धन तथा ऐश्वर्यकी अभिलाषा रखनेवालेको 'चण्डिका' कन्याकी सम्यक् अर्चना करनी चाहिये॥ ४८॥
पूजयेच्छाम्भवीं नित्यं नृप सम्मोहनाय च।<br>दुःखदारिद्र्यनाशाय संग्रामे विजयाय च॥ ४९हे राजन्! सम्मोहन, दुःख-दारिद्र्यके नाश तथा संग्राममें विजयके लिये 'शाम्भवी' कन्याकी नित्य पूजा करनी चाहिये॥ ४९॥
क्रूरशत्रुविनाशार्थं तथोग्रकर्मसाधने।<br>दुर्गां च पूजयेद्भक्त्या परलोकसुखाय च॥ ५०क्रूर शत्रुके विनाश एवं उग्र कर्मकी साधनाके निमित्त और परलोकमें सुख पानेके लिये 'दुर्गा' नामक कन्याकी भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिये॥ ५०॥
वाञ्छितार्थस्य सिद्ध्यर्थं सुभद्रां पूजयेत्सदा।<br>रोहिणीं रोगनाशाय पूजयेद्विधिवन्नरः॥ ५१मनुष्य अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये 'सुभद्रा' की सदा पूजा करे और रोगनाशके निमित्त 'रोहिणी' की विधिवत् आराधना करे॥ ५१॥
श्रीरस्त्विति च मन्त्रेण पूजयेद्भक्तितत्परः।<br>श्रीयुक्तमन्त्रैरथवा बीजमन्त्रैस्तथापि वा॥ ५२'श्रीरस्तु' इस मन्त्रसे अथवा किन्हीं भी श्रीयुक्त देवीमन्त्रसे अथवा बीजमन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवतीकी पूजा करनी चाहिये॥ ५२॥
कुमारस्य च तत्त्वानि या सृजत्यपि लीलया।<br>कादीनपि च देवांस्तां कुमारीं पूजयाम्यहम्॥ ५३जो भगवती कुमारके रहस्यमय तत्त्वों और ब्रह्मादि देवताओंकी भी लीलापूर्वक रचना करती हैं, उन 'कुमारी' का मैं पूजन करता हूँ॥ ५३॥
सत्त्वादिभिस्त्रिमूर्तिर्या तैर्हि नानास्वरूपिणी।<br>त्रिकालव्यापिनी शक्तिस्त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम्॥ ५४जो सत्त्व आदि तीनों गुणोंसे तीन रूप धारण करती हैं, जिनके अनेक रूप हैं तथा जो तीनों कालोंमें सर्वत्र व्याप्त रहती हैं, उन भगवती 'त्रिमूर्ति' की मैं पूजा करता हूँ॥ ५४॥
कल्याणकारिणी नित्यं भक्तानां पूजितानिशम्।<br>पूजयामि च तां भक्त्या कल्याणीं सर्वकामदाम्॥ ५५निरन्तर पूजित होनेपर जो भक्तोंका नित्य कल्याण करती हैं, सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन भगवती 'कल्याणी' का मैं भक्तिपूर्वक पूजन करता हूँ॥ ५५॥
३८०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २७

| रोहयन्ती च बीजानि प्राग्जन्मसम्चितानि वै।<br>या देवी सर्वभूतानां रोहिणीं पूजयाम्यहम्॥ ५६ | जो देवी सम्पूर्ण जीवोंके पूर्वजन्मके संचित कर्मरूपी बीजोंका रोपण करती हैं, उन भगवती रोहिणीकी मैं उपासना करता हूँ॥ ५६॥ | | काली कालयते सर्वं ब्रह्माण्डं सचराचरम्।<br>कल्पान्तसमये या तां कालिकां पूजयाम्यहम्॥ ५७ | जो देवी काली कल्पान्तमें चराचरसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपनेमें विलीन कर लेती हैं, उन भगवती 'कालिका' की मैं पूजा करता हूँ॥ ५७॥ | | चण्डिकां चण्डरूपाञ्च चण्डमुण्डविनाशिनीम्।<br>तां चण्डपापहरिणीं चण्डिकां पूजयाम्यहम्। ५८ | अत्यन्त उग्र स्वभाववाली, उग्ररूप धारण करनेवाली, चण्ड-मुण्डका संहार करनेवाली तथा घोर पापोंका नाश करनेवाली उन भगवती 'चण्डिका' की मैं पूजा करता हूँ॥ ५८॥ | | अकारणात्समुत्पत्तिर्यन्मयैः परिकीर्तिता।<br>यस्यास्तां सुखदां देवीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम्॥ ५९ | वेद जिनके स्वरूप हैं, उन्हीं वेदोंके द्वारा जिनकी उत्पत्ति अकारण बतायी गयी है, उन सुखदायिनी भगवती 'शाम्भवी' का मैं पूजन करता हूँ॥ ५९॥ | | दुर्गात्त्रायति भक्तं या सदा दुर्गार्तिनाशिनी।<br>दुर्ज्ञेया सर्वदेवानां तां दुर्गां पूजयाम्यहम्॥ ६० | जो अपने भक्तको सर्वदा संकटसे बचाती हैं, बड़े-बड़े विघ्नों तथा दुःखोंका नाश करती हैं और सभी देवताओंके लिये दुर्ज्ञेय हैं, उन भगवती 'दुर्गा' की मैं पूजा करता हूँ॥ ६०॥ | | सुभद्राणि च भक्तानां कुरुते पूजिता सदा।<br>अभद्रनाशिनीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम्॥ ६१ | जो पूजित होनेपर भक्तोंका सदा कल्याण करती हैं, उन अमंगलनाशिनी भगवती 'सुभद्रा' की मैं पूजा करता हूँ॥ ६१॥ | | एभिर्मन्त्रैः पूजनीयाः कन्यकाः सर्वदा बुधैः।<br>वस्त्रालङ्करणैर्माल्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि ॥ ६२ | विद्वानोंको चाहिये कि वस्त्र, भूषण, माला, गन्ध आदि श्रेष्ठ उपचारोंसे इन मन्त्रोंके द्वारा सर्वदा कन्याओंका पूजन करें॥ ६२॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कुमारीपूजावर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥


अथ सप्तविंशोऽध्यायः

कुमारीपूजामें निषिद्ध कन्याओंका वर्णन, नवरात्रव्रतके माहात्म्यके प्रसंगमें सुशील नामक वणिक्‌की कथा

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
हीनाङ्गीं वर्जयेत्कन्यां कुष्ठयुक्तां व्रणाङ्किताम्।<br>गन्धस्फुरितहीनाङ्गीं विशालकुलसम्भवाम्॥ १[हे राजन्!] जो कन्या किसी अंगसे हीन हो, कोढ़ तथा घावयुक्त हो, जिसके शरीरके किसी अंगसे दुर्गन्ध आती हो और जो विशाल कुलमें उत्पन्न हुई हो—ऐसी कन्याका पूजामें परित्याग कर देना चाहिये॥ १॥
जात्यन्धां केकरां काणीं कुरूपां बहुरोमशाम्।<br>सन्त्यजेद्रोगिणीं कन्यां रक्तपुष्पादिनाङ्किताम्॥ २जन्मसे अन्धी, तिरछी नजरसे देखनेवाली, कानी, कुरूप, बहुत रोमवाली, रोगी तथा रजस्वला कन्याका पूजामें परित्याग कर देना चाहिये॥ २॥

अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८१

अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्षामां गर्भसमुद्भूतां गोलकां कन्यकोद्भवाम्।<br>वर्जनीयाः सदा चैताः सर्वपूजादिकर्मसु॥ ३अत्यन्त दुर्बल, समयसे पूर्व ही गर्भसे उत्पन्न, विधवा स्त्रीसे उत्पन्न तथा कन्यासे उत्पन्न—ये सभी कन्याएँ पूजा आदि सभी कार्योंमें सर्वथा त्याज्य हैं॥ ३॥
अरोगिणीं सुरूपाङ्गीं सुन्दरीं व्रणवर्जिताम्।<br>एकवंशसमुद्भूतां कन्यां सम्यक्प्रपूजयेत्॥ ४रोगसे रहित, रूपवान् अंगोंवाली, सौन्दर्यमयी, व्रणरहित तथा एक वंशमें (अपने माता-पितासे) उत्पन्न कन्याकी ही विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ४॥
ब्राह्मणी सर्वकार्येषु जयार्थे नृपवंशजा।<br>लाभार्थे वैश्यवंशोत्था मता वा शूद्रवंशजा॥ ५समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्राह्मणकी कन्या, विजय-प्राप्तिके लिये राजवंशमें उत्पन्न कन्या तथा धन-लाभके लिये वैश्यवंश अथवा शूद्रवंशमें उत्पन्न कन्या पूजनके योग्य मानी गयी है॥ ५॥
ब्राह्मणैर्ब्रह्मजाः पूज्या राजन्यैर्ब्रह्मवंशजाः।<br>वैश्यैस्त्रिवर्गजाः पूज्याश्चतस्रः पादसम्भवैः॥ ६<br><br>कारुभिश्चैव वंशोत्था यथायोग्यं प्रपूजयेत्।<br>नवरात्रविधानेन भक्तिपूर्वं सदैव हि॥ ७<br><br>अशक्तो नियतं पूजां कर्तुं चेन्नवरात्रके।<br>अष्टम्यां च विशेषेण कर्तव्यं पूजनं सदा॥ ८ब्राह्मणको ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न कन्याकी; क्षत्रियोंको भी ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न कन्याकी; वैश्योंको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—तीनों वर्णोंमें उत्पन्न कन्याकी तथा शूद्रको चारों वर्णोंमें उत्पन्न कन्याकी पूजा करनी चाहिये। शिल्पकर्ममें लगे हुए मनुष्योंको यथायोग्य अपने-अपने वंशमें उत्पन्न कन्याओंकी पूजा करनी चाहिये। नवरात्र-विधिसे भक्तिपूर्वक निरन्तर पूजाकी जानी चाहिये। यदि कोई व्यक्ति नवरात्रपर्यन्त प्रतिदिन पूजा करनेमें असमर्थ है, तो उसे अष्टमी तिथिको विशेषरूपसे अवश्य पूजन करना चाहिये॥ ६–८॥
पुराष्टम्यां भद्रकाली दक्षयज्ञविनाशिनी।<br>प्रादुर्भूता महाघोरा योगिनीकोटिभिः सह॥ ९प्राचीन कालमें दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेवाली महाभयानक भगवती भद्रकाली करोड़ों योगिनियोंसहित अष्टमी तिथिको ही प्रकट हुई थीं॥ ९॥
अतोऽष्टम्यां विशेषेण कर्तव्यं पूजनं सदा।<br>नानाविधोपहारैश्च गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ १०<br><br>पायसैरामिषैर्होमैर्ब्राह्मणानां च भोजनैः।<br>फलपुष्पोपहारैश्च तोषयेज्जगदम्बिकाम्॥ ११अतः अष्टमीको विशेष विधानसे सदा भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। उस दिन विविध प्रकारके उपहारों, गन्ध, माला, चन्दनके अनुलेप, पायस आदिके हवन, ब्राह्मण-भोजन तथा फल-पुष्पादि उपहारोंसे भगवतीको प्रसन्न करना चाहिये॥ १०-११॥
उपवासे ह्यशक्तानां नवरात्रव्रते पुनः।<br>उपोषणात्रयं प्रोक्तं यथोक्तफलदं नृप॥ १२हे राजन्! पूरे नवरात्रभर उपवास करनेमें असमर्थ लोगोंके लिये तीन दिनका उपवास भी यथोक्त फल प्रदान करनेवाला बताया गया है॥ १२॥
सप्तम्यां च तथाष्टम्यां नवम्यां भक्तिभावतः।<br>त्रिरात्रकरणात्सर्वं फलं भवति पूजनात्॥ १३भक्तिभावसे केवल सप्तमी, अष्टमी और नवमी—इन तीन रात्रियोंमें देवीकी पूजा करनेसे सभी फल सुलभ हो जाते हैं॥ १३॥
पूजाभिश्चैव होमैश्च कुमारीपूजनैस्तथा।<br>सम्पूर्णं तद् व्रतं प्रोक्तं विप्राणां चैव भोजनैः॥ १४पूजन, हवन, कुमारी-पूजन तथा ब्राह्मण-भोजन—इनको सम्पन्न करनेसे वह नवरात्र-व्रत पूरा हो जाता है—ऐसा कहा गया है॥ १४॥

| ३८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
व्रतानि यानि चान्यानि दानानि विविधानि च।<br>नवरात्रव्रतस्यास्य नैव तुल्यानि भूतले॥ १५<br><br>धनधान्यप्रदं नित्यं सुखसन्तानवृद्धिदम्।<br>आयुरारोग्यदं चैव स्वर्गदं मोक्षदं तथा॥ १६इस पृथ्वीलोकमें जितने भी प्रकारके व्रत एवं दान हैं, वे इस नवरात्रव्रतके तुल्य नहीं हैं; क्योंकि यह व्रत सदा धन-धान्य प्रदान करनेवाला, सुख तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला, आयु तथा आरोग्य प्रदान करनेवाला और स्वर्ग तथा मोक्ष देनेवाला है॥ १५-१६॥
विद्यार्थी वा धनार्थी वा पुत्रार्थी वा भवेन्नरः।<br>तेनेदं विधिवत्कार्यं व्रतं सौभाग्यदं शिवम्॥ १७अतएव विद्या, धन अथवा पुत्र—इनमेंसे मनुष्य किसीकी भी कामना करता हो, उसे इस सौभाग्यदायक तथा कल्याणकारी व्रतका विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये॥ १७॥
विद्यार्थी सर्वविद्यां वै प्राप्नोति व्रतसाधनात्।<br>राज्यभ्रष्टो नृपो राज्यं समवाप्नोति सर्वदा॥ १८इस व्रतका अनुष्ठान करनेसे विद्या चाहनेवाला मनुष्य समस्त विद्या प्राप्त कर लेता है और अपने राज्यसे वंचित राजा फिरसे अपना राज्य प्राप्त कर लेता है॥ १८॥
पूर्वजन्मनि यैर्नूनं न कृतं व्रतमुत्तमम्।<br>ते व्याधिनो दरिद्राश्च भवन्ति पुत्रवर्जिताः॥ १९पूर्वजन्ममें जिन लोगोंद्वारा यह उत्तम व्रत नहीं किया गया है, वे इस जन्ममें रोगग्रस्त, दरिद्र तथा सन्तानरहित होते हैं॥ १९॥
वन्ध्या च या भवेन्नारी विधवा धनवर्जिता।<br>अनुमा तत्र कर्तव्या नेयं कृतवती व्रतम्॥ २०जो स्त्री वन्ध्या, विधवा अथवा धनहीन है; उसके विषयमें यह अनुमान कर लेना चाहिये कि उसने [अवश्य ही पूर्वजन्ममें] यह व्रत नहीं किया था॥ २०॥
नवरात्रव्रतं प्रोक्तं न कृतं येन भूतले।<br>स कथं विभवं प्राप्य मोदते च तथा दिवि॥ २१इस पृथ्वीलोकमें जिस प्राणीने उक्त नवरात्रव्रतका अनुष्ठान नहीं किया, वह इस लोकमें वैभव प्राप्त करके स्वर्गमें आनन्द कैसे प्राप्त कर सकता है? ॥ २१ ॥
रक्तचन्दनसंमिश्रैः कोमलैर्बिल्वपत्रकैः।<br>भवानी पूजिता येन स भवेन्नृपतिः क्षितौ॥ २२जिसने लाल चन्दनमिश्रित कोमल बिल्वपत्रोंसे भवानी जगदम्बाकी पूजा की है, वह इस पृथ्वीपर राजा होता है॥ २२॥
नाराधिता येन शिवा सनातनी<br>दुःखार्तिहा सिद्धिकरी जगद्वरा।<br>दुःखावृत्तः शत्रुयुतश्च भूतले<br>नूनं दरिद्रो भवतीह मानवः॥ २३जिस मनुष्यने दुःख तथा सन्तापका नाश करनेवाली, सिद्धियाँ देनेवाली, जगत्में सर्वश्रेष्ठ, शाश्वत तथा कल्याणस्वरूपिणी भगवतीकी उपासना नहीं की; वह इस पृथ्वीतलपर सदा ही अनेक प्रकारके कष्टोंसे ग्रस्त, दरिद्र तथा शत्रुओंसे पीड़ित रहता है॥ २३॥
यां विष्णुरिन्द्रो हरपद्मजौ तथा<br>वह्निः कुबेरो वरुणो दिवाकरः।<br>ध्यायन्ति सर्वार्थसमाप्तिनन्दिता-<br>स्तां किं मनुष्या न भजन्ति चण्डिकाम्॥ २४विष्णु, इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, अग्नि, कुबेर, वरुण तथा सूर्य समस्त कामनाओंसे परिपूर्ण होकर हर्षके साथ जिन भगवतीका ध्यान करते हैं, उन देवी चण्डिकाका ध्यान मनुष्य क्यों नहीं करते? ॥ २४ ॥

अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८३

अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८३

श्लोकअर्थ
स्वाहास्वधानाममनुप्रभावै-<br>स्तृप्यन्ति देवाः पितरस्तथैव।<br>यज्ञेषु सर्वेषु मुदा हरन्ति<br>यन्नामयुग्मं श्रुतिभिर्मुनीन्द्राः॥ २५देवगण इनके 'स्वाहा' नाममन्त्रके प्रभावसे तथा पितृगण 'स्वधा' नाममन्त्रके प्रभावसे तृप्त होते हैं। इसीलिये महान् मुनिजन प्रसन्नतापूर्वक सभी यज्ञों तथा श्राद्धकार्योंमें मन्त्रोंके साथ 'स्वाहा' एवं 'स्वधा' नामोंका उच्चारण करते हैं॥ २५॥
यस्येच्छया सृजति विश्वमिदं प्रजेशो<br>नानावतारकलनं कुरुते हरिश्च।<br>नूनं करोति जगतः किल भस्म शम्भु-<br>स्तां शर्मदां न भजते नु कथं मनुष्यः॥ २६जिनकी इच्छासे ब्रह्मा इस विश्वका सृजन करते हैं, भगवान् विष्णु अनेकविध अवतार लेते हैं और शंकरजी जगत्‌को भस्मसात् करते हैं, उन कल्याणकारिणी भगवतीको मनुष्य क्यों नहीं भजता?॥ २६॥
नैकोऽस्ति सर्वभुवनेषु तया विहीनो<br>देवो नरोऽथ विहगः किल पन्नगो वा।<br>गन्धर्वराक्षसपिशाचनगेषु नूनं<br>यः स्पन्दितुं भवति शक्तियुतो यथेच्छम्॥ २७सभी भुवनोंमें कोई भी ऐसा देवता, मनुष्य, पक्षी, सर्प, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच एवं पर्वत नहीं है; जो उन भगवतीकी शक्तिके बिना अपनी इच्छासे शक्तिसम्पन्न होकर स्पन्दित होनेमें समर्थ हो॥ २७॥
तां न सेवेत कश्चण्डीं सर्वकामार्थदां शिवाम्।<br>व्रतं तस्या न कः कुर्याद्वाञ्छन्नर्थचतुष्टयम्॥ २८सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन कल्याणदायिनी चण्डिकाकी सेवा भला कौन नहीं करेगा? चारों प्रकारके पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष)-को चाहनेवाला कौन प्राणी उन भगवतीके नवरात्रव्रतका अनुष्ठान नहीं करेगा?॥ २८॥
महापातकसंयुक्तो नवरात्रव्रतं चरेत्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा॥ २९यदि कोई महापापी भी नवरात्रव्रत करे तो वह समस्त पापोंसे मुक्ति पा लेता है, इसमें लेशमात्र भी विचार नहीं करना चाहिये॥ २९॥
पुरा कश्चिद्वणिग्दीनो धनहीनः सुदुःखितः।<br>कुटुम्बी चाभवत्कश्चित् कोसले नृपसत्तम॥ ३०हे नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालमें कोसलदेशमें दीन, धनहीन, अत्यन्त दुःखी एवं विशाल कुटुम्बवाला एक वैश्य रहता था॥ ३०॥
अपत्यानि बहून्यस्याभवन्क्षुत्पीडितानि च।<br>भक्ष्यं किञ्चित्तु सायाह्ने प्राप्तस्तस्य च बालकाः॥ ३१<br><br>भुंक्ते स्म कार्यकर्त्तासौ परस्याथ बुभुक्षितः।<br>कुटुम्बभरणं तत्र चकारातिनिराकुलः॥ ३२उसकी अनेक सन्तानें थीं, जो धनाभावके कारण क्षुधासे पीड़ित रहा करती थीं; सायंकालमें उसके लड़कोंको खानेके लिये कुछ मिल जाता था तथा वह भी कुछ खा लेता था। इस प्रकार वह वणिक् भूखा रहते हुए सर्वदा दूसरोंका काम करके धैर्यपूर्वक परिवारका पालन-पोषण कर रहा था॥ ३१-३२॥
सदा धर्मरतः शान्तः सदाचारश्च सत्यवाक्।<br>अक्रोधनश्च धृतिमान्निर्मदश्चानसूयकः॥ ३३वह सर्वदा धर्मपरायण, शान्त, सदाचारी, सत्यवादी, क्रोध न करनेवाला, धैर्यवान्, अभिमानरहित तथा ईर्ष्याहीन था॥ ३३॥
सम्पूज्य देवता नित्यं पितॄनप्यतिथींस्तदा।<br>भुञ्जाने पोष्यवर्गेऽथ कृतवान्भोजनं वणिक्॥ ३४प्रतिदिन देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंकी पूजा करके वह अपने परिवारजनोंके भोजन कर लेनेके उपरान्त स्वयं भोजन करता था॥ ३४॥

३८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं गच्छति काले वै सुशीलो नामतो गुणैः।<br>दारिद्र्यार्तो द्विजं शान्तं पप्रच्छातिबुभुक्षितः॥ ३५इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गुणोंके कारण सुशील नामसे ख्यातिप्राप्त उस वणिक्ने दरिद्रता तथा क्षुधा-पीड़ासे अत्यन्त व्याकुल होकर एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणसे पूछा॥ ३५॥
सुशील उवाच<br>भो भूदेव कृपां कृत्वा वदस्वाद्य महामते।<br>कथं दारिद्र्यनाशः स्यादिति मे निश्चयेन वै॥ ३६**सुशील बोला—**हे महाबुद्धिसम्पन्न ब्राह्मण-देवता! आज मुझपर कृपा करके यह बताइये कि मेरी दरिद्रताका नाश निश्चितरूपसे कैसे हो सकता है?॥ ३६॥
धनैषणा मे नैवास्ति धनी स्यामिति मानद।<br>कुटुम्बभरणार्थं वै पृच्छामि त्वां द्विजोत्तम॥ ३७हे मानद! मुझे धनकी अभिलाषा तो नहीं है; किंतु हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे कोई ऐसा उपाय पूछ रहा हूँ, जिससे मैं कुटुम्बके भरण-पोषणमात्रके लिये धनसम्पन्न हो जाऊँ॥ ३७॥
पुत्री सुतस्तु मे बालो भक्षार्थी रोदते भृशम्।<br>तावन्मात्रं गृहे नान्नं मुष्टिमेकां ददाम्यहम्॥ ३८मेरी पुत्री और पुत्र [क्षुधासे पीड़ित होकर] भोजनके लिये बहुत रोते हैं और मेरे घरमें इतना भी अन्न नहीं रहता कि मैं उन्हें एक मुट्ठीभर अन्न दे सकूँ॥ ३८॥
विसर्जितो यतो गेहाद् गतो बालो रुदन्मया।<br>अतो मे दह्यतेऽत्यर्थं किं करोमि धनं विना॥ ३९रोते हुए बालकको मैंने घरसे निकाल दिया और वह चला गया। इसलिये मेरा हृदय शोकाग्निमें जल रहा है। धनके अभावमें मैं क्या करूँ?॥ ३९॥
विवाहोऽस्ति सुताया मे नास्ति वित्तं करोमि किम्।<br>दशवर्षाधिकायास्तु दानकालोऽपि यात्यलम्॥ ४०मेरी पुत्री विवाहके योग्य हो चुकी है, किंतु मेरे पास धन नहीं है। अब मैं क्या करूँ? वह दस वर्षसे अधिककी हो गयी है; इस प्रकार कन्यादानका समय बीता जा रहा है॥ ४०॥
तेन शोचामि विप्रेन्द्र सर्वज्ञोऽसि दयानिधे।<br>तपो दानं व्रतं किञ्चिद् ब्रूहि मन्त्रं जपं तथा॥ ४१<br><br>येनाहं पोष्यवर्गस्य करोमि द्विज पोषणम्।<br>तावन्मे स्याद्धनप्राप्तिर्नाधिकं प्रार्थये किल॥ ४२हे विप्रेन्द्र! इसीलिये मैं अत्यधिक चिन्तित हूँ। हे दयानिधान! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतएव मुझे कोई ऐसा तप, दान, व्रत, मन्त्र तथा जप बताइये, जिससे मैं अपने आश्रितजनोंका भरण-पोषण करनेमें समर्थ हो जाऊँ। हे द्विज! बस मुझे उतना ही धन मिल जाय और मैं उससे अधिक धनके लिये प्रार्थना नहीं करता॥ ४१-४२॥
त्वत्प्रसादात्कुटुम्बं मे सुखितं प्रभवेदिह।<br>तत्कुरुष्व महाभाग ज्ञानेन परिचिन्त्य च॥ ४३हे महाभाग! आपकी कृपासे मेरा परिवार अवश्य सुखी हो सकता है। अतएव आप अपने ज्ञानबलसे भलीभाँति विचार करके वह उपाय बताइये॥ ४३॥

अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८५

अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८५

व्यास उवाचव्यासजी बोले
व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तथा तेन ब्राह्मणः संशितव्रतः।<br>उवाच परमप्रीतस्तं वैश्यं नृपसत्तम॥ ४४व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! उसके इस प्रकार पूछनेपर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उस ब्राह्मणने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उस वैश्यसे कहा—॥ ४४॥
वैश्यवर्य कुरुष्वाद्य नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>पूजनं भगवत्याश्च हवनं भोजनं तथा॥ ४५<br><br>वेदपारायणं शक्तिजपहोमादिकं तथा।<br>कुरुष्वाद्य यथाशक्ति तव कार्यं भविष्यति॥ ४६हे वैश्यवर्य! अब तुम पवित्र नवरात्रव्रतका अनुष्ठान करो। इसमें तुम भगवतीकी पूजा, हवन, ब्राह्मणभोजन, वेदपाठ, उनके मन्त्रका जप और होम आदि यथाशक्ति सम्पन्न करो। इससे तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा॥ ४५-४६॥
एतस्मादपरं किञ्चिद् व्रतं नास्ति धरातले।<br>नवरात्राभिधं वैश्य पावनं सुखदं तथा॥ ४७हे वैश्य! नवरात्र नामक इस पवित्र तथा सुखदायक व्रतसे बढ़कर इस पृथ्वीतलपर अन्य कोई भी व्रत नहीं है॥ ४७॥
ज्ञानदं मोक्षदं चैव सुखसन्तानवर्धनम्।<br>शत्रुनाशनकरं कामं नवरात्रव्रतं सदा॥ ४८यह नवरात्रव्रत सर्वदा ज्ञान तथा मोक्षको देनेवाला, सुख तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला एवं शत्रुओंका पूर्णरूपसे विनाश करनेवाला है॥ ४८॥
राज्यभ्रष्टेन रामेण सीताविरहितेन च।<br>किष्किन्धायां व्रतं चैतत्कृतं दुःखातुरेण वै॥ ४९<br><br>प्रतप्तेनापि रामेण सीताविरहवह्निना।<br>विधिवत्पूजिता देवी नवरात्रव्रतेन वै॥ ५०राज्यसे च्युत तथा सीताके वियोगसे अत्यन्त दुःखित श्रीरामने किष्किन्धापर्वतपर इस व्रतको किया था। सीताकी विरहाग्निसे अत्यधिक सन्तप्त श्रीरामने उस समय नवरात्रव्रतके विधानसे भगवती जगदम्बाकी भलीभाँति पूजा की थी॥ ४९-५०॥
तेन प्राप्ताथ वैदेही कृत्वा सेतुं महार्णवे।<br>हत्वा मन्दोदरीनाथं कुम्भकर्णं महाबलम्॥ ५१<br><br>मेघनादं सुतं हत्वा कृत्वा भूपं विभीषणम्।<br>पश्चादयोध्यामागत्य प्राप्तं राज्यमकण्टकम्॥ ५२इसी व्रतके प्रभावसे उन्होंने महासागरपर सेतुकी रचनाकर महाबली मन्दोदरीपति रावण, कुम्भकर्ण तथा रावणपुत्र मेघनादका संहार करके सीताको प्राप्त किया। विभीषणको लंकाका राजा बनाकर पुनः अयोध्या लौटकर उन्होंने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया था॥ ५१-५२॥
नवरात्रव्रतस्यास्य प्रभावेण विशांवर।<br>सुखं भूमितले प्राप्तं रामेणामिततेजसा॥ ५३हे वैश्यवर! इस प्रकार अमित तेजवाले श्रीरामजीने इस नवरात्रव्रतके प्रभावसे पृथ्वीतलपर महान् सुख प्राप्त किया॥ ५३॥
व्यास उवाच<br>इति विप्रवचः श्रुत्वा स वैश्यस्तं द्विजं गुरुम्।<br>कृत्वा जग्राह सन्मन्त्रं मायाबीजाभिधं नृप॥ ५४व्यासजी बोले—हे राजन्! ब्राह्मणका यह वचन सुनकर उस वैश्यने उन्हें अपना गुरु मान लिया और उनसे मायाबीज नामक उत्तम मन्त्रकी दीक्षा प्राप्त की॥ ५४॥
जजाप परया भक्त्या नवरात्रमतन्द्रितः।<br>नानाविधोपहारैश्च पूजयामास सादरम्॥ ५५<br>नवसंवत्सरं चैव मायाबीजपरायणः।तत्पश्चात् आलस्यहीन होकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूरे नवरात्रभर उसने उस मन्त्रका जप किया और अनेकविध उपहारोंसे आदरपूर्वक भगवतीका पूजन किया। इस प्रकार मायाबीजपरायण उस वैश्यने नौ

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 A

३८६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २८

| नवमे वत्सरान्ते तु महाष्टम्यां महेश्वरी ॥ ५६<br><br>अर्धरात्रे तु सञ्जाते प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।<br>नानावरप्रदानैश्च कृतकृत्यं चकार तम् ॥ ५७ | वर्षोंतक यह अनुष्ठान किया। नौवें वर्षके अन्तमें महाष्टमी तिथिको अर्धरात्रि आनेपर महेश्वरीने उसे अपना प्रत्यक्ष दर्शन दिया और अनेक प्रकारके वरदानोंसे कृतकृत्य कर दिया॥ ५५-५७॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे देवीपूजामहत्त्ववर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥


अथाष्टाविंशोऽध्यायः

श्रीरामचरित्रवर्णन

जनमेजय उवाच<br>कथं रामेण तच्चीर्णं व्रतं देव्याः सुखप्रदम्।<br>राज्यभ्रष्टः कथं सोऽथ कथं सीता हृता पुनः॥ १जनमेजय बोले— श्रीरामाने भगवती जगदम्बाके इस सुखप्रदायक व्रतका अनुष्ठान किस प्रकार किया, वे राज्यच्युत कैसे हुए और फिर सीता-हरण किस प्रकार हुआ ? ॥ १ ॥
व्यास उवाच<br>राजा दशरथः श्रीमानयोध्याधिपतिः पुरा।<br>सूर्यवंशधरश्चासीद्देवब्राह्मणपूजकः ॥ २व्यासजी बोले— पूर्वकालमें श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्यापुरीमें राज्य करते थे। वे सूर्यवंशमें श्रेष्ठ राजाके रूपमें प्रतिष्ठित थे और वे देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया करते थे॥ २॥
चत्वारो जज्ञिरे तस्य पुत्रा लोकेषु विश्रुताः।<br>रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्चेति नामतः॥ ३<br><br>राज्ञः प्रियकराः सर्वे सदृशा गुणरूपतः।<br>कौसल्यायाः सुतो रामः कैकेय्या भरतः स्मृतः॥ ४<br><br>सुमित्रातनयौ जातौ यमलौ द्वौ मनोहरौ।<br>ते जाता वै किशोराश्च धनुर्बाणधराः किल॥ ५उनके चार पुत्र उत्पन्न हुए; जो लोकमें राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामसे विख्यात हुए। गुण तथा रूपमें पूर्ण समानता रखनेवाले वे सभी महाराज दशरथको अत्यन्त प्रिय थे। उनमें राम महारानी कौसल्याके तथा भरत महारानी कैकेयीके पुत्र कहे गये। रानी सुमित्राके लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न नामवाले जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न हुए। वे चारों किशोरावस्थामें ही धनुष-बाणधारी हो गये॥ ३–५॥
सूनवः कृतसंस्कारा भूपतेः सुखवर्धकाः।<br>कौशिकेन तदागत्य प्रार्थितो रघुनन्दनः॥ ६महाराज दशरथने सुख बढ़ानेवाले अपने चारों पुत्रोंके संस्कार भी सम्पन्न कर दिये। तब एक समय महर्षि विश्वामित्र ने दशरथके यहाँ आकर उनसे रघुनन्दन रामको माँगा॥ ६॥
राघवं मखरक्षार्थं सूनुं षोडशवार्षिकम्।<br>तस्मै सोऽयं ददौ रामं कौशिकाय सलक्ष्मणम्॥ ७महाराज दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये लक्ष्मण-सहित सोलहवर्षीय पुत्र रामको विश्वामित्रको समर्पित कर दिया॥ ७॥
तौ समेत्य मुनिं मार्गे जग्मतुश्चारुदर्शनौ।<br>ताटका निहता मार्गे राक्षसी घोरदर्शना॥ ८प्रियदर्शन वे दोनों भाई मुनिके साथ मार्गमें चल दिये। रामचन्द्रजीने मुनियोंको सदा पीड़ित करनेवाली तथा अत्यन्त भयानक रूपवाली ताटकाको

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 B

अ० २८ ]तृतीय स्कन्ध३८७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रामेणैकेन बाणेन मुनीनां दुःखदा सदा।<br>यज्ञरक्षा कृता तत्र सुबाहुर्निहतः शठः॥ ९<br><br>मारीचोऽथ मृतप्रायो निक्षिप्तो बाणवेगतः।<br>एवं कृत्वा महत्कर्म यज्ञस्य परिरक्षणम्॥ १०<br><br>गतास्ते मिथिलां सर्वे रामलक्ष्मणकौशिकाः।<br>अहल्या मोचिता शापान्निष्पापा सा कृताबला॥ ११रास्तेमें ही मात्र एक बाणसे मार डाला। उन्होंने दुष्ट सुबाहुका वध किया तथा मारीचको अपने बाणसे दूर फेंककर उसे मृतप्राय कर दिया और यज्ञ-रक्षा की। इस प्रकार यज्ञ-रक्षाका महान् कृत्य सम्पन्न करके राम, लक्ष्मण तथा विश्वामित्रने मिथिलापुरीके लिये प्रस्थान किया। जाते समय मार्गमें रामने अबला अहल्याको शापसे मुक्ति प्रदान करके उसे पापरहित कर दिया॥ ८—११॥
विदेहनगरे तौ तु जग्मतुर्मुनिना सह।<br>बभञ्ज शिवचापञ्च जनकेन पणीकृतम्॥ १२<br><br>उपयेमे ततः सीतां जानकीञ्च रंमांशजाम्।<br>लक्ष्मणाय ददौ राजा पुत्रीमेकां तथोर्मिलाम्॥ १३इसके बाद वे दोनों भाई मुनि विश्वामित्रके साथ जनकपुर पहुँच गये और वहाँ श्रीरामने जनकजीद्वारा प्रतिज्ञाके रूपमें रखे शिव-धनुषको तोड़ दिया और लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न जनकनन्दिनी सीताके साथ विवाह किया। राजा जनकने दूसरी पुत्री उर्मिलाका विवाह लक्ष्मणके साथ कर दिया॥ १२-१३॥
कुशध्वजसुते कन्ये प्राप्तुर्भ्रातरावुभौ।<br>तथा भरतशत्रुघ्नौ सुशीलौ शुभलक्षणौ॥ १४शीलसम्पन्न तथा शुभलक्षणोंसे युक्त दोनों भाई भरत तथा शत्रुघ्नने कुशध्वजकी दो पुत्रियों [माण्डवी तथा श्रुतकीर्ति]-को पत्नीरूपमें प्राप्त किया॥ १४॥
एवं दारक्रियास्तेषां भ्रातॄणां चाभवन्नृप।<br>चतुर्णां मिथिलायां तु यथाविधि विधानतः॥ १५हे राजन्! इस प्रकार उन चारों भाइयोंका विवाह मिथिलापुरीमें ही विधि-विधानसे सम्पन्न हुआ॥ १५॥
राज्ययोग्यं सुतं दृष्ट्वा राजा दशरथस्तदा।<br>राघवाय धुरं दातुं मनश्चक्रे निजाय वै॥ १६तत्पश्चात् महाराज दशरथने अपने बड़े पुत्र रामको राज्य करनेयोग्य देखकर उन्हें राज्य-भार सौंपनेका मनमें निश्चय किया॥ १६॥
सम्भारं विहितं दृष्ट्वा कैकेयी पूर्वकल्पितौ।<br>वरौ संप्रार्थयामास भर्तारं वशवर्तिनम्॥ १७राजतिलक-सम्बन्धी सामग्रियोंका प्रबन्ध हुआ देखकर रानी कैकेयीने अपने वशीभूत महाराज दशरथसे पूर्वकल्पित दो वरदान माँगे॥ १७॥
राज्यं सुताय चैकेन भरताय महात्मने।<br>रामाय वनवासञ्च चतुर्दशसमास्तथा॥ १८उसने पहले वरदानके रूपमें अपने पुत्र भरतके लिये राज्य तथा दूसरे वरदानके रूपमें महात्मा रामको चौदह वर्षोंका वनवास माँगा॥ १८॥
रामस्तु वचनात्तस्याः सीतालक्ष्मणसंयुतः।<br>जगाम दण्डकारण्यं राक्षसै रुपसेवितम्॥ १९कैकेयीका वचन मानकर श्रीरामचन्द्रजी सीता तथा लक्ष्मणके साथ दण्डकवन चले गये, जहाँ राक्षस रहते थे॥ १९॥
राजा दशरथः पुत्रविरहेण प्रपीडितः।<br>जहौ प्राणानमेयात्मा पूर्वशापमनुस्मरन्॥ २०तदनन्तर पुत्रके वियोगजनित शोकसे सन्तप्त पुण्यात्मा दशरथने पूर्वकालमें एक ऋषिद्वारा प्रदत्त शापका स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिये॥ २०॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 C

३८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २८

३८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २८

भरतः पितरं दृष्ट्वा मृतं मातृकृतेन वै।<br>राज्यमृद्धं न जग्राह भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥ २१माता कैकेयीके कृत्यके कारण पिताजीकी मृत्यु देखकर भरतजीने भाई श्रीरामका हित करनेकी इच्छासे अयोध्याका समृद्ध राज्य स्वीकार नहीं किया॥ २१॥
पञ्चवट्यां वसन् रामो रावणावरजां वने।<br>शूर्पणखां विरूपां वै चकारातिस्मरातुराम्॥ २२उधर पंचवटीमें निवास करते हुए श्रीरामने रावणकी छोटी बहन अतिशय कामातुर शूर्पणखाको कुरूप बना दिया॥ २२॥
खरादयस्तु तां दृष्ट्वा छिन्ननासां निशाचराः।<br>चक्रुः संग्राममतुलं रामेणामिततेजसा॥ २३तब खर-दूषण आदि राक्षसोंने उसे कटी हुई नासिकावाली देखकर अमित तेजस्वी रामके साथ घोर संग्राम किया॥ २३॥
स जघान खरादींश्च दैत्यानतिबलान्वितान्।<br>मुनीनां हितमन्विच्छन् रामः सत्यपराक्रमः॥ २४उस संग्राममें सत्यपराक्रमी श्रीरामने मुनियोंका कल्याण करनेकी इच्छासे अत्यन्त बलशाली खर आदि राक्षसोंका संहार कर दिया॥ २४॥
गत्वा शूर्पणखा लङ्कां खरदूषणघातनम्।<br>दूषिता कथयामास रावणाय च राघवात्॥ २५तत्पश्चात् लंका जाकर उस दुष्ट शूर्पणखाने रामके द्वारा खर-दूषणके संहारका समाचार रावणसे बताया॥ २५॥
सोऽपि श्रुत्वा विनाशं तं जातः क्रोधवशः खलः।<br>जगाम रथमारुह्य मारीचस्याश्रमं तदा॥ २६वह दुष्ट रावण भी संहारके विषयमें सुनकर अत्यन्त क्रोधित हो उठा और तब रथपर सवार होकर वह मारीचके आश्रममें पहुँच गया॥ २६॥
कृत्वा हेममृगं नेतुं प्रेषयामास रावणः।<br>सीताप्रलोभनार्थाय मायाविनमसम्भवम्॥ २७सीता-हरणके उद्देश्यसे रावणने मायावी मारीचको असम्भव स्वर्ण-मृग बनाकर सीताको प्रलोभित करनेके लिये भेजा॥ २७॥
सोऽथ हेममृगो भूत्वा सीतादृष्टिपथं गतः।<br>मायावी चातिचित्राङ्गश्चरन्प्रबलमन्तिके॥ २८तत्पश्चात् वह मायावी मारीच अत्यन्त अद्भुत अंगोंवाला स्वर्ण-मृग बनकर चरते-चरते सीताजीके सन्निकट पहुँच गया और उन्होंने उसे देख लिया॥ २८॥
तं दृष्ट्वा जानकी प्राह राघवं दैवनोदिता।<br>चर्मानयस्व कान्तेति स्वाधीनपतिका यथा॥ २९उसे देखकर दैवी प्रेरणासे स्वाधीनपतिका स्त्रीकी भाँति सीताने श्रीरामसे कहा—हे कान्त! आप इस मृगका चर्म ले आइये॥ २९॥
अविचार्यथ रामोऽपि तत्र संस्थाप्य लक्ष्मणम्।<br>सशरं धनुरादाय ययौ मृगपदानुगः॥ ३०राम भी बिना कुछ सोचे-समझे लक्ष्मणको सीताके रक्षार्थ वहीं छोड़कर धनुष तथा बाण लेकर उस मृगके पीछे-पीछे दौड़ पड़े॥ ३०॥
सारङ्गोऽपि हरिं दृष्ट्वा मायाकोटिविशारदः।<br>दृश्यादृश्यो बभूवाथ जगाम च वनान्तरम्॥ ३१करोड़ों प्रकारकी माया रचनेका ज्ञान रखनेवाला मृगरूपधारी वह मारीच भी रामको अपने पीछे दौड़ता देखकर कभी दिखायी पड़ते हुए तथा कभी आँखोंसे ओझल होते हुए एक वनसे दूसरे वनमें बहुत दूर चला गया॥ ३१॥
मत्वा हस्तगतं रामः क्रोधाकृष्टधनुः पुनः।<br>जघान चातितीक्ष्णेन शरेण कृत्रिमं मृगम्॥ ३२रामने अब उसे हस्तगत समझकर क्रोधपूर्वक धनुष खींचकर अत्यन्त तीक्ष्ण बाणसे उस कृत्रिम मृगको मार डाला॥ ३२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 D

अ० २८]तृतीय स्कन्ध३८९
मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
स हतोऽतिबलात्तेन चुक्रोश भृशदुःखितः।<br>हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति मायावी नश्वरः खलः॥ ३३रामके प्रबल प्रहारसे आहत होकर वह मरणोन्मुख मायावी तथा नीच मृग चीख-चीखकर चिल्लाने लगा—हा लक्ष्मण! अब मैं मारा गया॥ ३३॥
स शब्दस्तुमुलस्तावज्जानक्या संश्रुतस्तदा।<br>राघवस्येति सा मत्वा दीना देवरमब्रवीत्॥ ३४<br><br>गच्छ लक्ष्मण तूर्णं त्वं हतोऽसौ रघुनन्दनः।<br>त्वामाह्वयति सौमित्रे साहाय्यं कुरु सत्वरम्॥ ३५उसके गगन-भेदी चीत्कारकी ध्वनिको सीताने सुन लिया। 'यह तो रामकी पुकार है'—ऐसा मानकर उन्होंने दुःखी होकर देवर लक्ष्मणसे कहा—हे लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि वे रघुनन्दन राम आहत हो गये हैं। अतः तुम शीघ्र जाओ। हे सुमित्रानन्दन! वे तुम्हें पुकार रहे हैं; वहाँ शीघ्र ही पहुँचकर उनकी सहायता करो॥ ३४-३५॥
तत्राह लक्ष्मणः सीतामम्ब रामवधादपि।<br>नाहं गच्छेऽद्य मुक्त्वा त्वामसहायामिहाश्रमे॥ ३६<br><br>आज्ञा मे राघवस्यात्र तिष्ठेति जनकात्मजे।<br>तदतिक्रमभीतोऽहं न त्यजामि तवान्तिकम्॥ ३७<br><br>दूरं वै राघवं दृष्ट्वा वने मायाविना किल।<br>त्यक्त्वा त्वां नाधिगच्छामि पदमेकं शुचिस्मिते॥ ३८<br><br>कुरु धैर्यं न मन्येऽद्य रामं हन्तुं क्षमं क्षितौ।<br>नाहं त्यक्त्वा गमिष्यामि विलंघ्य रामभाषितम्॥ ३९तब लक्ष्मणजीने सीतासे कहा—हे माता! रामका वध ही क्यों न हो; मैं आपको इस आश्रममें इस समय असहाय छोड़कर वहाँ नहीं जा सकता। हे जनकनन्दिनि! मुझे रामकी आज्ञा है कि तुम इसी आश्रममें रहना। उनकी आज्ञाका उल्लंघन करनेमें मैं डरता हूँ। अतः आपका सामीप्य नहीं छोड़ सकता। हे शुचिस्मिते! वह मायावी भगवान् श्रीरामको बहुत दूर दौड़ा ले गया है—यह जान करके मैं आपको छोड़कर यहाँसे एक पग भी नहीं जा सकता। आप धैर्य धारण कीजिये। मैं तो ऐसा मानता हूँ कि इस समय सम्पूर्ण पृथ्वीलोकमें श्रीरामको मारनेमें कोई समर्थ नहीं है। रामके आदेशका उल्लंघन करके तथा आपको यहाँ छोड़कर मैं नहीं जाऊँगा॥ ३६—३९॥
व्यास उवाच<br><br>रुदती सुदती प्राह तं तदा विधिनोदिता।<br>अक्रूरा वचनं क्रूरं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥ ४०**व्यासजी बोले—**तत्पश्चात् सुन्दर दाँतोंवाली तथा सौम्य स्वभाववाली सीताने दैवसे प्रेरित होकर शुभ लक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे रोते हुए यह कठोर वचन कहा—॥ ४०॥
अहं जानामि सौमित्रे सानुरागं च मां प्रति।<br>प्रेरितं भरतेनैव मदर्थमिह सङ्गतम्॥ ४१हे सुमित्रातनय! अब मैं जान गयी कि तुम मेरे प्रति अनुरागयुक्त हो और भरतकी प्रेरणासे मेरे प्रयोजनसे यहाँ आये हो॥ ४१॥
नाहं तथाविधा नारी स्वैरिणी कुहकाधम।<br>मृते रामे पतिं त्वां न कर्तुमिच्छामि कामतः॥ ४२हे कुहकाधम! मैं उस तरहकी स्वच्छन्द स्त्री नहीं हूँ। मैं रामके मृत हो जानेपर भी सुखके लिये तुम्हें अपना पति कभी नहीं बना सकती॥ ४२॥
नागमिष्यति चेद्रामो जीवितं सन्त्यजाम्यहम्।<br>विना तेन न जीवामि विधुरा दुःखिता भृशम्॥ ४३यदि राम नहीं लौटेंगे तो मैं अपना प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि उनके बिना मैं विधवा होकर अत्यधिक दुःखी जीवन नहीं जी सकती॥ ४३॥

| ३९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गच्छ वा तिष्ठ सौमित्रे न जानेऽहं तवेप्सितम्।<br>क्व गतं तेऽत्र सौहार्दं ज्येष्ठे धर्मरते किल॥ ४४हे लक्ष्मण! तुम जाओ या रहो। मुझे तुम्हारी वास्तविक इच्छाका पता नहीं है। धर्मपरायण ज्येष्ठ भाईके प्रति आपका प्रेम अब कहाँ चला गया ?॥ ४४॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या लक्ष्मणो दीनमानसः।<br>प्रोवाच रुद्धकण्ठस्तु तां तदा जनकात्मजाम्॥ ४५सीताका वह वचन सुनकर लक्ष्मणके मनमें अत्यधिक कष्ट हुआ। रुदनके कारण रुँधे कण्ठसे उन्होंने जनकनन्दिनी सीतासे कहा— ॥ ४५॥
किमात्थ क्षितिजे वाक्यं मयि क्रूरतरं किल।<br>किं वदस्यत्यनिष्टं ते भावि जाने धिया ह्यहम्॥ ४६हे भूमिकन्ये! आप इस प्रकारके अति कठोर वचन मेरे लिये क्यों कह रही हैं? मेरा मन तो यह कह रहा है कि आपके समक्ष कोई अनिष्टकर परिस्थिति उत्पन्न होनेवाली है॥ ४६॥
इत्युक्त्वा निर्ययौ वीरस्तां त्यक्त्वा प्ररुदन्भृशम्।<br>अग्रजस्य ययौ पश्यञ्छोकार्तः पृथिवीपते॥ ४७[व्यासजीने कहा—] हे महाराज जनमेजय! ऐसा कहकर अत्यधिक विलाप करते हुए वीर लक्ष्मण सीताको वहीं छोड़कर चल दिये और अत्यधिक शोकाकुल होकर बड़े भाई रामको चारों ओर देखते हुए आगेकी ओर बढ़ते गये॥ ४७॥
गतेऽथ लक्ष्मणे तत्र रावणः कपटाकृतिः।<br>भिक्षुवेषं ततः कृत्वा प्रविवेश तदाश्रमे॥ ४८इस प्रकार लक्ष्मणके वहाँसे चले जानेपर कपट स्वभाववाले रावणने साधु-वेष धारणकर उस आश्रममें प्रवेश किया॥ ४८॥
जानकी तं यतिं मत्वा दत्त्वार्घ्यं वन्यमादरात्।<br>भैक्ष्यं समर्पयामास रावणाय दुरात्मने॥ ४९जानकी उस दुष्टात्मा रावणको संन्यासी समझकर आदरपूर्वक वन्य सामग्रियोंका अर्घ्य प्रदान करके भिक्षा देने लगीं॥ ४९॥
तां पप्रच्छ स दुष्टात्मा नम्रपूर्वं मृदुस्वरम्।<br>कासि पद्मपलाशाक्षि वने चैकाकिनी प्रिये॥ ५०तब उस दुरात्माने अत्यन्त विनम्र भावसे मधुर वाणीमें सीताजीसे पूछा—हे पद्मपत्रके समान नेत्रोंवाली प्रिये! तुम कौन हो और इस वनमें अकेली क्यों रह रही हो?॥ ५०॥
पिता कस्तेऽथ वामोरु भ्राता कः कः पतिस्तव।<br>मूढेवैकाकिनी चात्र स्थितासि वरवर्णिनि॥ ५१हे वामोरु! तुम्हारे पिता कौन हैं और तुम्हारे भाई तथा पति कौन हैं? हे सुन्दरि! तुम एक मूढ़ स्त्रीकी भाँति यहाँ अकेली क्यों रह रही हो?॥ ५१॥
निर्जने विपिने किं त्वं सौधार्हा त्वमसि प्रिये।<br>उटजे मुनिपत्नीवद्देवकन्यासप्रभा॥ ५२हे प्रिये! इस निर्जन वनमें क्यों रह रही हो? तुम तो महलोंमें निवास करनेयोग्य हो। देवकन्याके समान कान्तिवाली तुम एक मुनिपत्नीकी भाँति इस कुटियामें क्यों रह रही हो?॥ ५२॥
व्यास उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच विदेहजा।<br>दिव्यं दिष्ट्या यतिं ज्ञात्वा मन्दोदर्याः पतिं तदा॥ ५३व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उसका यह वचन सुनकर विदेहतनया सीताजीने मन्दोदरीके पति रावणको दैववश एक दिव्य संन्यासी समझकर उत्तर दिया॥ ५३॥
अ० २८ ]तृतीय स्कन्ध३९१

| राजा दशरथः श्रीमांश्चत्वारस्तस्य वै सुताः।<br>तेषु ज्येष्ठः पतिर्मेऽस्ति रामनामेति विश्रुतः॥ ५४ | दशरथ नामक लक्ष्मीसम्पन्न एक राजा हैं, उनके चार पुत्र हैं। उनमें सबसे बड़े पुत्र जो ‘राम’ नामसे विख्यात हैं, वे ही मेरे पति हैं॥ ५४॥ | | विवासितोऽथ कैकेय्या कृते भूपतिना वरे।<br>चतुर्दश समा रामो वसतेऽत्र सलक्ष्मणः॥ ५५ | कैकेयीने महाराज दशरथसे वरदान माँगकर रामको चौदह वर्षके लिये वनवास दिला दिया। वे अपने भाई लक्ष्मणके साथ अब यहींपर रह रहे हैं॥ ५५॥ | | जनकस्य सुता चाहं सीतानाम्नीति विश्रुता।<br>भङ्क्त्वा शैवं धनुः कामं रामेणाहं विवाहिता॥ ५६ | मैं राजा जनककी पुत्री हूँ तथा ‘सीता’ नामसे विख्यात हूँ। शिवजीका धनुष तोड़कर श्रीरामने मेरा पाणिग्रहण किया है॥ ५६॥ | | रामबाहुबलेनात्र वसामो निर्भया वने।<br>काञ्चनं मृगमालोक्य हन्तुं मे निर्गतः पतिः॥ ५७ | उन्हीं रामके बाहुबलका आश्रय लेकर मैं निर्भीक होकर इस वनमें रहती हूँ। एक स्वर्ण-मृग देखकर उसे मारनेके लिये मेरे पति गये हुए हैं॥ ५७॥ | | लक्ष्मणोऽपि पुनः श्रुत्वा रवं भ्रातुर्गतोऽधुना।<br>तयोर्बाहुबलादत्र निर्भयाहं वसामि वै॥ ५८ | अपने भाईका शब्द सुनकर लक्ष्मण भी इस समय उधर ही गये हुए हैं। उन्हीं दोनोंके बाहुबलसे मैं यहाँ निडर होकर रहती हूँ॥ ५८॥ | | मयेदं कथितं सर्वं वृत्तान्तं वनवासके।<br>तेऽत्रागत्यार्हणां ते वै करिष्यन्ति यथाविधि॥ ५९ | मैंने आपको वनवास-सम्बन्धी अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त बता दिया। अब वे लोग यहाँ आकर आपका विधिपूर्वक सत्कार करेंगे॥ ५९॥ | | यतिर्विष्णुस्वरूपोऽसि तस्मात्त्वं पूजितो मया।<br>आश्रमो विपिने घोरे कृतोऽस्ति रक्षसां कुले॥ ६०<br><br>तस्मात्त्वां परिपृच्छामि सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः।<br>कोऽसि त्रिदण्डिरूपेण विपिने त्वं समागतः॥ ६१ | संन्यासी विष्णुस्वरूप होता है, इसीलिये मैंने आपकी पूजा की है। राक्षसोंके समुदायद्वारा सेवित इस भयंकर जंगलमें यह आश्रम बना हुआ है। इसलिये मैं आपसे यह पूछती हूँ कि त्रिदण्डीके रूपमें इस वनमें पधारे हुए आप कौन हैं? आप मेरे समक्ष सत्य कहिये॥ ६०-६१॥ | | रावण उवाच<br>लङ्केशोऽहं मरालाक्षि श्रीमान्मन्दोदरीपतिः।<br>त्वत्कृते तु कृतं रूपं मयेत्थं शोभनाकृते॥ ६२ | रावण बोला—हे हंसनयने! मैं मन्दोदरीका पति तथा लंकाका नरेश श्रीमान् रावण हूँ। हे सुन्दर आकृतिवाली! तुम्हारे लिये ही मैंने इस प्रकारका वेष बनाया है॥ ६२॥ | | आगतोऽहं वरारोहे भगिन्या प्रेरितोऽत्र वै।<br>जनस्थाने हतौ श्रुत्वा भ्रातरौ खरदूषणौ॥ ६३ | हे सुन्दरि! जनस्थानमें अपने भाई खर-दूषणके मारे जानेका समाचार सुनकर तथा अपनी बहन शूर्पणखाद्वारा प्रेरित किये जानेपर मैं यहाँ आया हूँ॥ ६३॥ | | अङ्गीकुरु नृपं मां त्वं त्यक्त्वा तं मानुषं पतिम्।<br>हृतराज्यं गतश्रीकं निर्बलं वनवासिनम्॥ ६४ | अब तुम उस राज्यच्युत, लक्ष्मीहीन, निर्बल, वनवासी तथा मानवयोनिवाले पतिको छोड़कर मुझ राजाको स्वीकार कर लो॥ ६४॥ |

| ३९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ | | :--- | :--- |

पट्टराज्ञी भव त्वं मे मन्दोदर्युपरि स्फुटम्।<br>दासोऽस्मि तव तन्वङ्गि स्वामिनी भव भामिनि॥ ६५तुम मेरी बात मानकर मन्दोदरीसे भी बड़ी पटरानी बन जाओ, मैं सत्य कहता हूँ। हे तन्वंगि! मैं तुम्हारा दास हूँ। हे भामिनि! तुम मेरी स्वामिनी हो जाओ॥ ६५॥
जेताहं लोकपालानां पतामि तव पादयोः।<br>करं गृहाण मेऽद्य त्वं सनाथं कुरु जानकि॥ ६६समस्त लोकपालोंपर विजय प्राप्त करनेवाला मैं तुम्हारे चरणोंपर पड़ता हूँ। हे जनकनन्दिनि! तुम इस समय मेरा हाथ पकड़ लो और मुझे सनाथ कर दो॥ ६६॥
पिता ते याचितः पूर्वं मया वै त्वत्कृतेऽबले।<br>जनको मामुवाचेत्थं पणबन्धो मया कृतः॥ ६७हे अबले! मैंने पहले भी तुम्हारे पिता जनकसे तुम्हें प्राप्त करनेके लिये याचना की थी, किंतु उस समय उन्होंने मुझसे यह कहा था कि मैं [धनुषभंगकी] शर्त रख चुका हूँ॥ ६७॥
रुद्रचापभयान्नाहं सम्प्राप्तस्तु स्वयंवरे।<br>मनो मे संस्थितं तावन्निमग्नं विरहातुरम्॥ ६८शंकरजीके धनुषके भयके कारण मैं उस समय स्वयंवरमें सम्मिलित नहीं हुआ था। उसी समयसे विरह-वेदनासे पीड़ित मेरा मन तुममें ही लगा हुआ है॥ ६८॥
वनेऽत्र संस्थितां श्रुत्वा पूर्वानुरागमोहितः।<br>आगतोऽस्म्यसितापाङ्गि सफलं कुरु मे श्रमम्॥ ६९हे श्याम नयनोंवाली! तुम इस वनमें रह रही हो—यह सुनकर तुम्हारे प्रति पूर्व प्रेमके अधीन हुआ मैं यहाँ आया हूँ; अब तुम मेरा परिश्रम सार्थक कर दो॥ ६९॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे रामचरित्रवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥


अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

सीताहरण, रामका शोक और लक्ष्मणद्वारा उन्हें सान्त्वना देना

व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचो दुष्टं जानकी भयविह्वला।<br>वेपमाना स्थिरं कृत्वा मनो वाचमुवाच ह॥ १<br><br>पौलस्त्य किमसद्वाक्यं त्वमात्थ स्मरमोहितः।<br>नाहं वै स्वैरिणी किन्तु जनकस्य कुलोद्भवा॥ २व्यासजी बोले—रावणका कुविचारपूर्ण वचन सुनकर सीता भयसे व्याकुल होकर काँप उठीं। पुनः मनको स्थिर करके उन्होंने कहा—हे पुलस्त्यके वंशज! कामके वशीभूत होकर तुम ऐसा अनर्गल वचन क्यों कह रहे हो? मैं स्वैरिणी नारी नहीं हूँ, बल्कि महाराज जनकके कुलमें उत्पन्न हुई हूँ॥ १-२॥
गच्छ लङ्कां दशास्य त्वं रामस्त्वां वै हनिष्यति।<br>मत्कृते मरणं तत्र भविष्यति न संशयः॥ ३हे दशकन्धर! तुम लंका चले जाओ, नहीं तो श्रीराम निश्चय ही तुम्हें मार डालेंगे। मेरे लिये ही तुम्हारी मृत्यु होगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३॥

अ० २९] तृतीय स्कन्ध ३१३

अ० २९] तृतीय स्कन्ध ३१३

इत्युक्त्वा पर्णशालायां गता सा वह्निसन्निधौ।<br>गच्छ गच्छेति वदती रावणं लोकरावणम्॥ ४ऐसा कह करके वे सीताजी जगत्को रुलानेवाले रावणके प्रति ‘चले जाओ, चले जाओ’ इस प्रकार बोलती हुई पर्णशालामें अग्निकुण्डके पास चली गयीं॥ ४॥
सोऽथ कृत्वा निजं रूपं जगामोटजमन्तिकम्।<br>बलाज्जग्राह तां बालां रुदतीं भयविह्वलाम्॥ ५इतनेमें वह रावण अपना वास्तविक रूप धारण करके तुरन्त पर्णशालामें उनके पास जा पहुँचा और उसने भयसे व्याकुल होकर रोती हुई उस बाला सीताको बलपूर्वक पकड़ लिया॥ ५॥
रामरामेति क्रन्दन्तीं लक्ष्मणेति मुहुर्मुहुः।<br>गृहीत्वा निर्गतः पापो रथमारोप्य सत्वरः॥ ६<br><br>गच्छन्नरुणपुत्रेण मार्गे रुद्धो जटायुषा।<br>संग्रामोऽभून्महोरौद्रस्तयोस्तत्र वनान्तरे॥ ७हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण!—ऐसा बार-बार कहकर विलाप करती हुई सीताको पकड़कर और उन्हें अपने रथपर बैठाकर रावण शीघ्रतापूर्वक निकल गया। तब अरुणपुत्र जटायुने जाते हुए उस रावणको मार्गमें रोक दिया। उस वनमें दोनोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा॥ ६-७॥
हत्वा तं तां गृहीत्वा च गतोऽसौ राक्षसाधिपः।<br>लङ्कायां क्रन्दती तात कुररीव दुरात्मना॥ ८<br><br>अशोकवनिकायां सा स्थापिता राक्षसीयुता।<br>स्ववृत्तान्नैव चलिता सामदानादिभिः किल॥ ९हे तात! अन्तमें वह राक्षसराज रावण जटायुको मारकर और सीताको साथ लेकर चला गया। तदनन्तर उस दुष्टात्माने कुररी पक्षीकी भाँति क्रन्दन करती हुई सीताको लंकामें अशोकवाटिका में रख दिया और उसकी रखवालीके लिये राक्षसियोंको नियुक्त कर दिया। उस राक्षसके साम-दान आदि उपायोंसे भी सीताजी अपने सतीत्वसे विचलित नहीं हुईं॥ ८-९॥
रामोऽपि तं मृगं हत्वा जगामादाय निर्वृतः।<br>आयान्तं लक्ष्मणं वीक्ष्य किं कृतं तेऽनुजासमम्॥ १०<br><br>एकाकिनीं प्रियां हित्वा किमर्थं त्वमिहागतः।<br>श्रुत्वा स्वनं तु पापस्य राघवस्त्वब्रवीदिदम्॥ ११उधर श्रीराम भी स्वर्ण-मृगको शीघ्र मारकर उसे लिये हुए प्रसन्नतापूर्वक [आश्रमकी ओर] चल पड़े। मार्गमें आते हुए लक्ष्मणको देखकर वे बोले—भाई! यह तुमने कैसा विषम कार्य कर दिया? वहाँ प्रिया सीताको अकेली छोड़कर तथा इस पापीकी पुकार सुनकर तुम इधर क्यों चले आये?॥ १०-११॥
सौमित्रिस्त्वब्रवीद्वाक्यं सीतावाग्बाणपीडितः।<br>प्रभोऽत्राहं समायातः कालयोगान्न संशयः॥ १२तब सीताके वचनरूपी बाणसे आहत लक्ष्मणने कहा—प्रभो! मैं कालकी प्रेरणासे यहाँ चला आया हूँ; इसमें सन्देह नहीं है॥ १२॥
तदा तौ पर्णशालायां गत्वा वीक्ष्यातिदुःखितौ।<br>जानक्यन्वेषणे यत्नमुभौ कर्तुं समुद्यतौ॥ १३तदनन्तर वे दोनों पर्णशालामें जाकर वहाँकी स्थिति देखकर अत्यन्त दुःखित हुए और जानकीको खोजनेका प्रयत्न करने लगे॥ १३॥
मार्गमाणौ तु सम्प्राप्तौ यत्रासौ पतितः खगः।<br>जटायुः प्राणशेषस्तु पतितः पृथिवीतले॥ १४<br><br>तेनोक्तं रावणेनाद्य हृतासौ जनकात्मजा।<br>मया निरुद्धः पापात्मा पातितोऽहं मृधे पुनः॥ १५खोजते हुए वे उस स्थानपर पहुँचे जहाँ पक्षिराज ‘जटायु’ गिरा पड़ा था। वह पृथिवीपर मृतप्राय पड़ा हुआ था। उसने बताया कि रावण जानकीको अभी हर ले गया है। मैंने उस पापीको रोका, किंतु उसने युद्धमें मुझे मारकर गिरा दिया॥ १४-१५॥

| ३९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ | | :--- | :--- |

| इत्युक्त्वासौ गतप्राणः संस्कृतो राघवेण वै।<br>कृत्वौर्ध्वदैहिकं रामलक्ष्मणौ निर्गतौ ततः॥ १६ | ऐसा कहकर वह जटायु मर गया। तब श्रीरामने उसका दाह-संस्कार किया। उसकी समस्त और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करके श्रीराम और लक्ष्मण वहाँसे आगे बढ़े॥ १६॥ | | कबन्धं घातयित्वासौ शापाच्चामोचयत्प्रभुः।<br>वचनात्तस्य हरिणा सख्यं चक्रेऽथ राघवः॥ १७ | मार्गमें कबन्धका वध करके भगवान् श्रीरामने उसे शापसे छुड़ाया और उसीके कथनानुसार उन्होंने सुग्रीवसे मित्रता की॥ १७॥ | | हत्वा च वालिनं वीरं किष्किन्धाराज्यमुत्तमम्।<br>सुग्रीवाय ददौ रामः कृतसख्याय कार्यतः॥ १८ | तदनन्तर पराक्रमी वालीका वध करके श्रीरामने कार्यसाधनहेतु किष्किन्धाका उत्तम राज्य अपने सखा सुग्रीवको दे दिया॥ १८॥ | | तत्रैव वार्षिकान्मासांस्तस्थौ लक्ष्मणसंयुतः।<br>चिन्तयञ्जानकीं चित्ते दशाननहृतां प्रियाम्॥ १९ | वहींपर लक्ष्मणसहित श्रीरामने रावणके द्वारा अपहृत अपनी प्रिया जानकीके विषयमें मनमें सोचते हुए वर्षाके चार मास व्यतीत किये॥ १९॥ | | लक्ष्मणां प्राह रामस्तु सीताविरहपीडितः।<br>सौमित्रे कैकयसुता जाता पूर्णमनोरथा॥ २०<br><br>न प्राप्ता जानकी नूनं नाहं जीवामि तां विना।<br>नागमिष्याम्ययोध्यायामृते जनकनन्दिनीम्॥ २१ | सीताके विरहमें अत्यन्त दुःखित श्रीरामने एक दिन लक्ष्मणसे कहा—हे सौमित्रे! कैकेयीकी कामना पूरी हो गयी। अभीतक जानकी नहीं मिली, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकता। जनकतनया सीताके बिना मैं अयोध्या नहीं जाऊँगा॥ २०-२१॥ | | गतं राज्यं वने वासो मृतस्तातो हृता प्रिया।<br>पीडयन्मां स दुष्टात्मा दैवोग्रे किं करिष्यति॥ २२ | राज्य चला गया, वनवास करना पड़ा, पिताजी मृत हो गये और प्रिया सीता भी हर ली गयी। इस प्रकार मुझे पीड़ित करता हुआ दुर्देव आगे न जाने क्या करेगा?॥ २२॥ | | दुर्ज्ञेयं भवितव्यं हि प्राणिनां भरतानुज।<br>आवयोः का गतिस्तात भविष्यति सुदुःखदा॥ २३ | हे भरतानुज! प्राणियोंके प्रारब्धको जान पाना अत्यन्त कठिन है। हे तात! अब हम दोनोंकी न जाने कौन-सी दुःखद गति होगी?॥ २३॥ | | प्राप्य जन्म मनोर्वंशे राजपुत्रावुभौ किल।<br>वनेऽतिदुःखभोक्तारौ जातौ पूर्वकृतेन च॥ २४ | मनुके कुलमें जन्म पाकर हम राजकुमार हुए; फिर भी हमलोग पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके कारण वनमें अत्यधिक दुःख भोग रहे हैं॥ २४॥ | | त्यक्त्वा त्वमपि भोगांस्तु मया सह विनिर्गतः।<br>दैवयोगाच्च सौमित्रे भुंक्ष्व दुःखं दुरत्ययम्॥ २५ | हे सौमित्रे! तुम भी भोगोंका परित्याग करके दैवयोगसे मेरे साथ निकल पड़े; तो फिर अब यह कठिन कष्ट भोगो॥ २५॥ | | न कोऽप्यस्मत्कुले पूर्वं मत्Count मत्समो दुःखभाङ्नरः।<br>अकिञ्चनोऽक्षमः क्लिष्टो न भूतो न भविष्यति॥ २६ | हमारे कुलमें मेरे समान दुःख भोगनेवाला, अकिंचन, असमर्थ तथा क्लेशयुक्त व्यक्ति न हुआ है और न होगा॥ २६॥ | | किं करोम्यद्य सौमित्रे मग्नोऽस्मि दुःखसागरे।<br>न चास्ति तरणोपायो ह्यसहायस्य मे किल॥ २७ | हे लक्ष्मण! अब मैं क्या करूँ? मैं शोकसागरमें डूब रहा हूँ, मुझ असहायको इससे पार होनेका कोई |