देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० २६ ] तृतीय स्कन्ध ३७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुमारी पूजिता कुर्याद्दुःखदारिद्र्यनाशनम्।<br>शत्रुक्षयं धनायुष्यं बलवृद्धिं करोति वै॥ ४५ | 'कुमारी' नामकी कन्या पूजित होकर दुःख तथा दरिद्रताका नाश करती है; वह शत्रुओंका क्षय और धन, आयु तथा बलकी वृद्धि करती है॥ ४५॥ |
| त्रिमूर्तिपूजनादायुस्त्रिवर्गस्य फलं भवेत्।<br>धनधान्यागमश्चैव पुत्रपौत्रादिवृद्धयः॥ ४६ | 'त्रिमूर्ति' नामकी कन्याका पूजन करनेसे धर्म-अर्थ-कामकी पूर्ति होती है, धन-धान्यका आगम होता है और पुत्र-पौत्र आदिकी वृद्धि होती है॥ ४६॥ |
| विद्यार्थी विजयार्थी च राज्यार्थी यश्च पार्थिवः।<br>सुखार्थी पूजयेन्नित्यं कल्याणीं सर्वकामदाम्॥ ४७ | जो राजा विद्या, विजय, राज्य तथा सुखकी कामना करता हो, उसे सभी कामनाएँ प्रदान करने-वाली 'कल्याणी' नामक कन्याका नित्य पूजन करना चाहिये॥ ४७॥ |
| कालिकां शत्रुनाशार्थं पूजयेद्भक्तिपूर्वकम्।<br>ऐश्वर्यधनकामश्च चण्डिकां परिपूजयेत्॥ ४८ | शत्रुओंका नाश करनेके लिये भक्तिपूर्वक 'कालिका' कन्याका पूजन करना चाहिये। धन तथा ऐश्वर्यकी अभिलाषा रखनेवालेको 'चण्डिका' कन्याकी सम्यक् अर्चना करनी चाहिये॥ ४८॥ |
| पूजयेच्छाम्भवीं नित्यं नृप सम्मोहनाय च।<br>दुःखदारिद्र्यनाशाय संग्रामे विजयाय च॥ ४९ | हे राजन्! सम्मोहन, दुःख-दारिद्र्यके नाश तथा संग्राममें विजयके लिये 'शाम्भवी' कन्याकी नित्य पूजा करनी चाहिये॥ ४९॥ |
| क्रूरशत्रुविनाशार्थं तथोग्रकर्मसाधने।<br>दुर्गां च पूजयेद्भक्त्या परलोकसुखाय च॥ ५० | क्रूर शत्रुके विनाश एवं उग्र कर्मकी साधनाके निमित्त और परलोकमें सुख पानेके लिये 'दुर्गा' नामक कन्याकी भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिये॥ ५०॥ |
| वाञ्छितार्थस्य सिद्ध्यर्थं सुभद्रां पूजयेत्सदा।<br>रोहिणीं रोगनाशाय पूजयेद्विधिवन्नरः॥ ५१ | मनुष्य अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये 'सुभद्रा' की सदा पूजा करे और रोगनाशके निमित्त 'रोहिणी' की विधिवत् आराधना करे॥ ५१॥ |
| श्रीरस्त्विति च मन्त्रेण पूजयेद्भक्तितत्परः।<br>श्रीयुक्तमन्त्रैरथवा बीजमन्त्रैस्तथापि वा॥ ५२ | 'श्रीरस्तु' इस मन्त्रसे अथवा किन्हीं भी श्रीयुक्त देवीमन्त्रसे अथवा बीजमन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवतीकी पूजा करनी चाहिये॥ ५२॥ |
| कुमारस्य च तत्त्वानि या सृजत्यपि लीलया।<br>कादीनपि च देवांस्तां कुमारीं पूजयाम्यहम्॥ ५३ | जो भगवती कुमारके रहस्यमय तत्त्वों और ब्रह्मादि देवताओंकी भी लीलापूर्वक रचना करती हैं, उन 'कुमारी' का मैं पूजन करता हूँ॥ ५३॥ |
| सत्त्वादिभिस्त्रिमूर्तिर्या तैर्हि नानास्वरूपिणी।<br>त्रिकालव्यापिनी शक्तिस्त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम्॥ ५४ | जो सत्त्व आदि तीनों गुणोंसे तीन रूप धारण करती हैं, जिनके अनेक रूप हैं तथा जो तीनों कालोंमें सर्वत्र व्याप्त रहती हैं, उन भगवती 'त्रिमूर्ति' की मैं पूजा करता हूँ॥ ५४॥ |
| कल्याणकारिणी नित्यं भक्तानां पूजितानिशम्।<br>पूजयामि च तां भक्त्या कल्याणीं सर्वकामदाम्॥ ५५ | निरन्तर पूजित होनेपर जो भक्तोंका नित्य कल्याण करती हैं, सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन भगवती 'कल्याणी' का मैं भक्तिपूर्वक पूजन करता हूँ॥ ५५॥ |
| ३८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ |
|---|
| रोहयन्ती च बीजानि प्राग्जन्मसम्चितानि वै।<br>या देवी सर्वभूतानां रोहिणीं पूजयाम्यहम्॥ ५६ | जो देवी सम्पूर्ण जीवोंके पूर्वजन्मके संचित कर्मरूपी बीजोंका रोपण करती हैं, उन भगवती रोहिणीकी मैं उपासना करता हूँ॥ ५६॥ | | काली कालयते सर्वं ब्रह्माण्डं सचराचरम्।<br>कल्पान्तसमये या तां कालिकां पूजयाम्यहम्॥ ५७ | जो देवी काली कल्पान्तमें चराचरसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपनेमें विलीन कर लेती हैं, उन भगवती 'कालिका' की मैं पूजा करता हूँ॥ ५७॥ | | चण्डिकां चण्डरूपाञ्च चण्डमुण्डविनाशिनीम्।<br>तां चण्डपापहरिणीं चण्डिकां पूजयाम्यहम्। ५८ | अत्यन्त उग्र स्वभाववाली, उग्ररूप धारण करनेवाली, चण्ड-मुण्डका संहार करनेवाली तथा घोर पापोंका नाश करनेवाली उन भगवती 'चण्डिका' की मैं पूजा करता हूँ॥ ५८॥ | | अकारणात्समुत्पत्तिर्यन्मयैः परिकीर्तिता।<br>यस्यास्तां सुखदां देवीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम्॥ ५९ | वेद जिनके स्वरूप हैं, उन्हीं वेदोंके द्वारा जिनकी उत्पत्ति अकारण बतायी गयी है, उन सुखदायिनी भगवती 'शाम्भवी' का मैं पूजन करता हूँ॥ ५९॥ | | दुर्गात्त्रायति भक्तं या सदा दुर्गार्तिनाशिनी।<br>दुर्ज्ञेया सर्वदेवानां तां दुर्गां पूजयाम्यहम्॥ ६० | जो अपने भक्तको सर्वदा संकटसे बचाती हैं, बड़े-बड़े विघ्नों तथा दुःखोंका नाश करती हैं और सभी देवताओंके लिये दुर्ज्ञेय हैं, उन भगवती 'दुर्गा' की मैं पूजा करता हूँ॥ ६०॥ | | सुभद्राणि च भक्तानां कुरुते पूजिता सदा।<br>अभद्रनाशिनीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम्॥ ६१ | जो पूजित होनेपर भक्तोंका सदा कल्याण करती हैं, उन अमंगलनाशिनी भगवती 'सुभद्रा' की मैं पूजा करता हूँ॥ ६१॥ | | एभिर्मन्त्रैः पूजनीयाः कन्यकाः सर्वदा बुधैः।<br>वस्त्रालङ्करणैर्माल्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि ॥ ६२ | विद्वानोंको चाहिये कि वस्त्र, भूषण, माला, गन्ध आदि श्रेष्ठ उपचारोंसे इन मन्त्रोंके द्वारा सर्वदा कन्याओंका पूजन करें॥ ६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कुमारीपूजावर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥
अथ सप्तविंशोऽध्यायः
कुमारीपूजामें निषिद्ध कन्याओंका वर्णन, नवरात्रव्रतके माहात्म्यके प्रसंगमें सुशील नामक वणिक्की कथा
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| हीनाङ्गीं वर्जयेत्कन्यां कुष्ठयुक्तां व्रणाङ्किताम्।<br>गन्धस्फुरितहीनाङ्गीं विशालकुलसम्भवाम्॥ १ | [हे राजन्!] जो कन्या किसी अंगसे हीन हो, कोढ़ तथा घावयुक्त हो, जिसके शरीरके किसी अंगसे दुर्गन्ध आती हो और जो विशाल कुलमें उत्पन्न हुई हो—ऐसी कन्याका पूजामें परित्याग कर देना चाहिये॥ १॥ |
| जात्यन्धां केकरां काणीं कुरूपां बहुरोमशाम्।<br>सन्त्यजेद्रोगिणीं कन्यां रक्तपुष्पादिनाङ्किताम्॥ २ | जन्मसे अन्धी, तिरछी नजरसे देखनेवाली, कानी, कुरूप, बहुत रोमवाली, रोगी तथा रजस्वला कन्याका पूजामें परित्याग कर देना चाहिये॥ २॥ |
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८१
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| क्षामां गर्भसमुद्भूतां गोलकां कन्यकोद्भवाम्।<br>वर्जनीयाः सदा चैताः सर्वपूजादिकर्मसु॥ ३ | अत्यन्त दुर्बल, समयसे पूर्व ही गर्भसे उत्पन्न, विधवा स्त्रीसे उत्पन्न तथा कन्यासे उत्पन्न—ये सभी कन्याएँ पूजा आदि सभी कार्योंमें सर्वथा त्याज्य हैं॥ ३॥ |
| अरोगिणीं सुरूपाङ्गीं सुन्दरीं व्रणवर्जिताम्।<br>एकवंशसमुद्भूतां कन्यां सम्यक्प्रपूजयेत्॥ ४ | रोगसे रहित, रूपवान् अंगोंवाली, सौन्दर्यमयी, व्रणरहित तथा एक वंशमें (अपने माता-पितासे) उत्पन्न कन्याकी ही विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ४॥ |
| ब्राह्मणी सर्वकार्येषु जयार्थे नृपवंशजा।<br>लाभार्थे वैश्यवंशोत्था मता वा शूद्रवंशजा॥ ५ | समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्राह्मणकी कन्या, विजय-प्राप्तिके लिये राजवंशमें उत्पन्न कन्या तथा धन-लाभके लिये वैश्यवंश अथवा शूद्रवंशमें उत्पन्न कन्या पूजनके योग्य मानी गयी है॥ ५॥ |
| ब्राह्मणैर्ब्रह्मजाः पूज्या राजन्यैर्ब्रह्मवंशजाः।<br>वैश्यैस्त्रिवर्गजाः पूज्याश्चतस्रः पादसम्भवैः॥ ६<br><br>कारुभिश्चैव वंशोत्था यथायोग्यं प्रपूजयेत्।<br>नवरात्रविधानेन भक्तिपूर्वं सदैव हि॥ ७<br><br>अशक्तो नियतं पूजां कर्तुं चेन्नवरात्रके।<br>अष्टम्यां च विशेषेण कर्तव्यं पूजनं सदा॥ ८ | ब्राह्मणको ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न कन्याकी; क्षत्रियोंको भी ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न कन्याकी; वैश्योंको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—तीनों वर्णोंमें उत्पन्न कन्याकी तथा शूद्रको चारों वर्णोंमें उत्पन्न कन्याकी पूजा करनी चाहिये। शिल्पकर्ममें लगे हुए मनुष्योंको यथायोग्य अपने-अपने वंशमें उत्पन्न कन्याओंकी पूजा करनी चाहिये। नवरात्र-विधिसे भक्तिपूर्वक निरन्तर पूजाकी जानी चाहिये। यदि कोई व्यक्ति नवरात्रपर्यन्त प्रतिदिन पूजा करनेमें असमर्थ है, तो उसे अष्टमी तिथिको विशेषरूपसे अवश्य पूजन करना चाहिये॥ ६–८॥ |
| पुराष्टम्यां भद्रकाली दक्षयज्ञविनाशिनी।<br>प्रादुर्भूता महाघोरा योगिनीकोटिभिः सह॥ ९ | प्राचीन कालमें दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेवाली महाभयानक भगवती भद्रकाली करोड़ों योगिनियोंसहित अष्टमी तिथिको ही प्रकट हुई थीं॥ ९॥ |
| अतोऽष्टम्यां विशेषेण कर्तव्यं पूजनं सदा।<br>नानाविधोपहारैश्च गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ १०<br><br>पायसैरामिषैर्होमैर्ब्राह्मणानां च भोजनैः।<br>फलपुष्पोपहारैश्च तोषयेज्जगदम्बिकाम्॥ ११ | अतः अष्टमीको विशेष विधानसे सदा भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। उस दिन विविध प्रकारके उपहारों, गन्ध, माला, चन्दनके अनुलेप, पायस आदिके हवन, ब्राह्मण-भोजन तथा फल-पुष्पादि उपहारोंसे भगवतीको प्रसन्न करना चाहिये॥ १०-११॥ |
| उपवासे ह्यशक्तानां नवरात्रव्रते पुनः।<br>उपोषणात्रयं प्रोक्तं यथोक्तफलदं नृप॥ १२ | हे राजन्! पूरे नवरात्रभर उपवास करनेमें असमर्थ लोगोंके लिये तीन दिनका उपवास भी यथोक्त फल प्रदान करनेवाला बताया गया है॥ १२॥ |
| सप्तम्यां च तथाष्टम्यां नवम्यां भक्तिभावतः।<br>त्रिरात्रकरणात्सर्वं फलं भवति पूजनात्॥ १३ | भक्तिभावसे केवल सप्तमी, अष्टमी और नवमी—इन तीन रात्रियोंमें देवीकी पूजा करनेसे सभी फल सुलभ हो जाते हैं॥ १३॥ |
| पूजाभिश्चैव होमैश्च कुमारीपूजनैस्तथा।<br>सम्पूर्णं तद् व्रतं प्रोक्तं विप्राणां चैव भोजनैः॥ १४ | पूजन, हवन, कुमारी-पूजन तथा ब्राह्मण-भोजन—इनको सम्पन्न करनेसे वह नवरात्र-व्रत पूरा हो जाता है—ऐसा कहा गया है॥ १४॥ |
| ३८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| व्रतानि यानि चान्यानि दानानि विविधानि च।<br>नवरात्रव्रतस्यास्य नैव तुल्यानि भूतले॥ १५<br><br>धनधान्यप्रदं नित्यं सुखसन्तानवृद्धिदम्।<br>आयुरारोग्यदं चैव स्वर्गदं मोक्षदं तथा॥ १६ | इस पृथ्वीलोकमें जितने भी प्रकारके व्रत एवं दान हैं, वे इस नवरात्रव्रतके तुल्य नहीं हैं; क्योंकि यह व्रत सदा धन-धान्य प्रदान करनेवाला, सुख तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला, आयु तथा आरोग्य प्रदान करनेवाला और स्वर्ग तथा मोक्ष देनेवाला है॥ १५-१६॥ |
| विद्यार्थी वा धनार्थी वा पुत्रार्थी वा भवेन्नरः।<br>तेनेदं विधिवत्कार्यं व्रतं सौभाग्यदं शिवम्॥ १७ | अतएव विद्या, धन अथवा पुत्र—इनमेंसे मनुष्य किसीकी भी कामना करता हो, उसे इस सौभाग्यदायक तथा कल्याणकारी व्रतका विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये॥ १७॥ |
| विद्यार्थी सर्वविद्यां वै प्राप्नोति व्रतसाधनात्।<br>राज्यभ्रष्टो नृपो राज्यं समवाप्नोति सर्वदा॥ १८ | इस व्रतका अनुष्ठान करनेसे विद्या चाहनेवाला मनुष्य समस्त विद्या प्राप्त कर लेता है और अपने राज्यसे वंचित राजा फिरसे अपना राज्य प्राप्त कर लेता है॥ १८॥ |
| पूर्वजन्मनि यैर्नूनं न कृतं व्रतमुत्तमम्।<br>ते व्याधिनो दरिद्राश्च भवन्ति पुत्रवर्जिताः॥ १९ | पूर्वजन्ममें जिन लोगोंद्वारा यह उत्तम व्रत नहीं किया गया है, वे इस जन्ममें रोगग्रस्त, दरिद्र तथा सन्तानरहित होते हैं॥ १९॥ |
| वन्ध्या च या भवेन्नारी विधवा धनवर्जिता।<br>अनुमा तत्र कर्तव्या नेयं कृतवती व्रतम्॥ २० | जो स्त्री वन्ध्या, विधवा अथवा धनहीन है; उसके विषयमें यह अनुमान कर लेना चाहिये कि उसने [अवश्य ही पूर्वजन्ममें] यह व्रत नहीं किया था॥ २०॥ |
| नवरात्रव्रतं प्रोक्तं न कृतं येन भूतले।<br>स कथं विभवं प्राप्य मोदते च तथा दिवि॥ २१ | इस पृथ्वीलोकमें जिस प्राणीने उक्त नवरात्रव्रतका अनुष्ठान नहीं किया, वह इस लोकमें वैभव प्राप्त करके स्वर्गमें आनन्द कैसे प्राप्त कर सकता है? ॥ २१ ॥ |
| रक्तचन्दनसंमिश्रैः कोमलैर्बिल्वपत्रकैः।<br>भवानी पूजिता येन स भवेन्नृपतिः क्षितौ॥ २२ | जिसने लाल चन्दनमिश्रित कोमल बिल्वपत्रोंसे भवानी जगदम्बाकी पूजा की है, वह इस पृथ्वीपर राजा होता है॥ २२॥ |
| नाराधिता येन शिवा सनातनी<br>दुःखार्तिहा सिद्धिकरी जगद्वरा।<br>दुःखावृत्तः शत्रुयुतश्च भूतले<br>नूनं दरिद्रो भवतीह मानवः॥ २३ | जिस मनुष्यने दुःख तथा सन्तापका नाश करनेवाली, सिद्धियाँ देनेवाली, जगत्में सर्वश्रेष्ठ, शाश्वत तथा कल्याणस्वरूपिणी भगवतीकी उपासना नहीं की; वह इस पृथ्वीतलपर सदा ही अनेक प्रकारके कष्टोंसे ग्रस्त, दरिद्र तथा शत्रुओंसे पीड़ित रहता है॥ २३॥ |
| यां विष्णुरिन्द्रो हरपद्मजौ तथा<br>वह्निः कुबेरो वरुणो दिवाकरः।<br>ध्यायन्ति सर्वार्थसमाप्तिनन्दिता-<br>स्तां किं मनुष्या न भजन्ति चण्डिकाम्॥ २४ | विष्णु, इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, अग्नि, कुबेर, वरुण तथा सूर्य समस्त कामनाओंसे परिपूर्ण होकर हर्षके साथ जिन भगवतीका ध्यान करते हैं, उन देवी चण्डिकाका ध्यान मनुष्य क्यों नहीं करते? ॥ २४ ॥ |
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८३
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| स्वाहास्वधानाममनुप्रभावै-<br>स्तृप्यन्ति देवाः पितरस्तथैव।<br>यज्ञेषु सर्वेषु मुदा हरन्ति<br>यन्नामयुग्मं श्रुतिभिर्मुनीन्द्राः॥ २५ | देवगण इनके 'स्वाहा' नाममन्त्रके प्रभावसे तथा पितृगण 'स्वधा' नाममन्त्रके प्रभावसे तृप्त होते हैं। इसीलिये महान् मुनिजन प्रसन्नतापूर्वक सभी यज्ञों तथा श्राद्धकार्योंमें मन्त्रोंके साथ 'स्वाहा' एवं 'स्वधा' नामोंका उच्चारण करते हैं॥ २५॥ |
| यस्येच्छया सृजति विश्वमिदं प्रजेशो<br>नानावतारकलनं कुरुते हरिश्च।<br>नूनं करोति जगतः किल भस्म शम्भु-<br>स्तां शर्मदां न भजते नु कथं मनुष्यः॥ २६ | जिनकी इच्छासे ब्रह्मा इस विश्वका सृजन करते हैं, भगवान् विष्णु अनेकविध अवतार लेते हैं और शंकरजी जगत्को भस्मसात् करते हैं, उन कल्याणकारिणी भगवतीको मनुष्य क्यों नहीं भजता?॥ २६॥ |
| नैकोऽस्ति सर्वभुवनेषु तया विहीनो<br>देवो नरोऽथ विहगः किल पन्नगो वा।<br>गन्धर्वराक्षसपिशाचनगेषु नूनं<br>यः स्पन्दितुं भवति शक्तियुतो यथेच्छम्॥ २७ | सभी भुवनोंमें कोई भी ऐसा देवता, मनुष्य, पक्षी, सर्प, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच एवं पर्वत नहीं है; जो उन भगवतीकी शक्तिके बिना अपनी इच्छासे शक्तिसम्पन्न होकर स्पन्दित होनेमें समर्थ हो॥ २७॥ |
| तां न सेवेत कश्चण्डीं सर्वकामार्थदां शिवाम्।<br>व्रतं तस्या न कः कुर्याद्वाञ्छन्नर्थचतुष्टयम्॥ २८ | सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन कल्याणदायिनी चण्डिकाकी सेवा भला कौन नहीं करेगा? चारों प्रकारके पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष)-को चाहनेवाला कौन प्राणी उन भगवतीके नवरात्रव्रतका अनुष्ठान नहीं करेगा?॥ २८॥ |
| महापातकसंयुक्तो नवरात्रव्रतं चरेत्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा॥ २९ | यदि कोई महापापी भी नवरात्रव्रत करे तो वह समस्त पापोंसे मुक्ति पा लेता है, इसमें लेशमात्र भी विचार नहीं करना चाहिये॥ २९॥ |
| पुरा कश्चिद्वणिग्दीनो धनहीनः सुदुःखितः।<br>कुटुम्बी चाभवत्कश्चित् कोसले नृपसत्तम॥ ३० | हे नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालमें कोसलदेशमें दीन, धनहीन, अत्यन्त दुःखी एवं विशाल कुटुम्बवाला एक वैश्य रहता था॥ ३०॥ |
| अपत्यानि बहून्यस्याभवन्क्षुत्पीडितानि च।<br>भक्ष्यं किञ्चित्तु सायाह्ने प्राप्तस्तस्य च बालकाः॥ ३१<br><br>भुंक्ते स्म कार्यकर्त्तासौ परस्याथ बुभुक्षितः।<br>कुटुम्बभरणं तत्र चकारातिनिराकुलः॥ ३२ | उसकी अनेक सन्तानें थीं, जो धनाभावके कारण क्षुधासे पीड़ित रहा करती थीं; सायंकालमें उसके लड़कोंको खानेके लिये कुछ मिल जाता था तथा वह भी कुछ खा लेता था। इस प्रकार वह वणिक् भूखा रहते हुए सर्वदा दूसरोंका काम करके धैर्यपूर्वक परिवारका पालन-पोषण कर रहा था॥ ३१-३२॥ |
| सदा धर्मरतः शान्तः सदाचारश्च सत्यवाक्।<br>अक्रोधनश्च धृतिमान्निर्मदश्चानसूयकः॥ ३३ | वह सर्वदा धर्मपरायण, शान्त, सदाचारी, सत्यवादी, क्रोध न करनेवाला, धैर्यवान्, अभिमानरहित तथा ईर्ष्याहीन था॥ ३३॥ |
| सम्पूज्य देवता नित्यं पितॄनप्यतिथींस्तदा।<br>भुञ्जाने पोष्यवर्गेऽथ कृतवान्भोजनं वणिक्॥ ३४ | प्रतिदिन देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंकी पूजा करके वह अपने परिवारजनोंके भोजन कर लेनेके उपरान्त स्वयं भोजन करता था॥ ३४॥ |
३८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं गच्छति काले वै सुशीलो नामतो गुणैः।<br>दारिद्र्यार्तो द्विजं शान्तं पप्रच्छातिबुभुक्षितः॥ ३५ | इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गुणोंके कारण सुशील नामसे ख्यातिप्राप्त उस वणिक्ने दरिद्रता तथा क्षुधा-पीड़ासे अत्यन्त व्याकुल होकर एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणसे पूछा॥ ३५॥ |
| सुशील उवाच<br>भो भूदेव कृपां कृत्वा वदस्वाद्य महामते।<br>कथं दारिद्र्यनाशः स्यादिति मे निश्चयेन वै॥ ३६ | **सुशील बोला—**हे महाबुद्धिसम्पन्न ब्राह्मण-देवता! आज मुझपर कृपा करके यह बताइये कि मेरी दरिद्रताका नाश निश्चितरूपसे कैसे हो सकता है?॥ ३६॥ |
| धनैषणा मे नैवास्ति धनी स्यामिति मानद।<br>कुटुम्बभरणार्थं वै पृच्छामि त्वां द्विजोत्तम॥ ३७ | हे मानद! मुझे धनकी अभिलाषा तो नहीं है; किंतु हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे कोई ऐसा उपाय पूछ रहा हूँ, जिससे मैं कुटुम्बके भरण-पोषणमात्रके लिये धनसम्पन्न हो जाऊँ॥ ३७॥ |
| पुत्री सुतस्तु मे बालो भक्षार्थी रोदते भृशम्।<br>तावन्मात्रं गृहे नान्नं मुष्टिमेकां ददाम्यहम्॥ ३८ | मेरी पुत्री और पुत्र [क्षुधासे पीड़ित होकर] भोजनके लिये बहुत रोते हैं और मेरे घरमें इतना भी अन्न नहीं रहता कि मैं उन्हें एक मुट्ठीभर अन्न दे सकूँ॥ ३८॥ |
| विसर्जितो यतो गेहाद् गतो बालो रुदन्मया।<br>अतो मे दह्यतेऽत्यर्थं किं करोमि धनं विना॥ ३९ | रोते हुए बालकको मैंने घरसे निकाल दिया और वह चला गया। इसलिये मेरा हृदय शोकाग्निमें जल रहा है। धनके अभावमें मैं क्या करूँ?॥ ३९॥ |
| विवाहोऽस्ति सुताया मे नास्ति वित्तं करोमि किम्।<br>दशवर्षाधिकायास्तु दानकालोऽपि यात्यलम्॥ ४० | मेरी पुत्री विवाहके योग्य हो चुकी है, किंतु मेरे पास धन नहीं है। अब मैं क्या करूँ? वह दस वर्षसे अधिककी हो गयी है; इस प्रकार कन्यादानका समय बीता जा रहा है॥ ४०॥ |
| तेन शोचामि विप्रेन्द्र सर्वज्ञोऽसि दयानिधे।<br>तपो दानं व्रतं किञ्चिद् ब्रूहि मन्त्रं जपं तथा॥ ४१<br><br>येनाहं पोष्यवर्गस्य करोमि द्विज पोषणम्।<br>तावन्मे स्याद्धनप्राप्तिर्नाधिकं प्रार्थये किल॥ ४२ | हे विप्रेन्द्र! इसीलिये मैं अत्यधिक चिन्तित हूँ। हे दयानिधान! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतएव मुझे कोई ऐसा तप, दान, व्रत, मन्त्र तथा जप बताइये, जिससे मैं अपने आश्रितजनोंका भरण-पोषण करनेमें समर्थ हो जाऊँ। हे द्विज! बस मुझे उतना ही धन मिल जाय और मैं उससे अधिक धनके लिये प्रार्थना नहीं करता॥ ४१-४२॥ |
| त्वत्प्रसादात्कुटुम्बं मे सुखितं प्रभवेदिह।<br>तत्कुरुष्व महाभाग ज्ञानेन परिचिन्त्य च॥ ४३ | हे महाभाग! आपकी कृपासे मेरा परिवार अवश्य सुखी हो सकता है। अतएव आप अपने ज्ञानबलसे भलीभाँति विचार करके वह उपाय बताइये॥ ४३॥ |
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८५
अ० २७] तृतीय स्कन्ध ३८५
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तथा तेन ब्राह्मणः संशितव्रतः।<br>उवाच परमप्रीतस्तं वैश्यं नृपसत्तम॥ ४४ | व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! उसके इस प्रकार पूछनेपर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उस ब्राह्मणने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उस वैश्यसे कहा—॥ ४४॥ |
| वैश्यवर्य कुरुष्वाद्य नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>पूजनं भगवत्याश्च हवनं भोजनं तथा॥ ४५<br><br>वेदपारायणं शक्तिजपहोमादिकं तथा।<br>कुरुष्वाद्य यथाशक्ति तव कार्यं भविष्यति॥ ४६ | हे वैश्यवर्य! अब तुम पवित्र नवरात्रव्रतका अनुष्ठान करो। इसमें तुम भगवतीकी पूजा, हवन, ब्राह्मणभोजन, वेदपाठ, उनके मन्त्रका जप और होम आदि यथाशक्ति सम्पन्न करो। इससे तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा॥ ४५-४६॥ |
| एतस्मादपरं किञ्चिद् व्रतं नास्ति धरातले।<br>नवरात्राभिधं वैश्य पावनं सुखदं तथा॥ ४७ | हे वैश्य! नवरात्र नामक इस पवित्र तथा सुखदायक व्रतसे बढ़कर इस पृथ्वीतलपर अन्य कोई भी व्रत नहीं है॥ ४७॥ |
| ज्ञानदं मोक्षदं चैव सुखसन्तानवर्धनम्।<br>शत्रुनाशनकरं कामं नवरात्रव्रतं सदा॥ ४८ | यह नवरात्रव्रत सर्वदा ज्ञान तथा मोक्षको देनेवाला, सुख तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला एवं शत्रुओंका पूर्णरूपसे विनाश करनेवाला है॥ ४८॥ |
| राज्यभ्रष्टेन रामेण सीताविरहितेन च।<br>किष्किन्धायां व्रतं चैतत्कृतं दुःखातुरेण वै॥ ४९<br><br>प्रतप्तेनापि रामेण सीताविरहवह्निना।<br>विधिवत्पूजिता देवी नवरात्रव्रतेन वै॥ ५० | राज्यसे च्युत तथा सीताके वियोगसे अत्यन्त दुःखित श्रीरामने किष्किन्धापर्वतपर इस व्रतको किया था। सीताकी विरहाग्निसे अत्यधिक सन्तप्त श्रीरामने उस समय नवरात्रव्रतके विधानसे भगवती जगदम्बाकी भलीभाँति पूजा की थी॥ ४९-५०॥ |
| तेन प्राप्ताथ वैदेही कृत्वा सेतुं महार्णवे।<br>हत्वा मन्दोदरीनाथं कुम्भकर्णं महाबलम्॥ ५१<br><br>मेघनादं सुतं हत्वा कृत्वा भूपं विभीषणम्।<br>पश्चादयोध्यामागत्य प्राप्तं राज्यमकण्टकम्॥ ५२ | इसी व्रतके प्रभावसे उन्होंने महासागरपर सेतुकी रचनाकर महाबली मन्दोदरीपति रावण, कुम्भकर्ण तथा रावणपुत्र मेघनादका संहार करके सीताको प्राप्त किया। विभीषणको लंकाका राजा बनाकर पुनः अयोध्या लौटकर उन्होंने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया था॥ ५१-५२॥ |
| नवरात्रव्रतस्यास्य प्रभावेण विशांवर।<br>सुखं भूमितले प्राप्तं रामेणामिततेजसा॥ ५३ | हे वैश्यवर! इस प्रकार अमित तेजवाले श्रीरामजीने इस नवरात्रव्रतके प्रभावसे पृथ्वीतलपर महान् सुख प्राप्त किया॥ ५३॥ |
| व्यास उवाच<br>इति विप्रवचः श्रुत्वा स वैश्यस्तं द्विजं गुरुम्।<br>कृत्वा जग्राह सन्मन्त्रं मायाबीजाभिधं नृप॥ ५४ | व्यासजी बोले—हे राजन्! ब्राह्मणका यह वचन सुनकर उस वैश्यने उन्हें अपना गुरु मान लिया और उनसे मायाबीज नामक उत्तम मन्त्रकी दीक्षा प्राप्त की॥ ५४॥ |
| जजाप परया भक्त्या नवरात्रमतन्द्रितः।<br>नानाविधोपहारैश्च पूजयामास सादरम्॥ ५५<br>नवसंवत्सरं चैव मायाबीजपरायणः। | तत्पश्चात् आलस्यहीन होकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूरे नवरात्रभर उसने उस मन्त्रका जप किया और अनेकविध उपहारोंसे आदरपूर्वक भगवतीका पूजन किया। इस प्रकार मायाबीजपरायण उस वैश्यने नौ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 A
| ३८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ |
|---|
| नवमे वत्सरान्ते तु महाष्टम्यां महेश्वरी ॥ ५६<br><br>अर्धरात्रे तु सञ्जाते प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।<br>नानावरप्रदानैश्च कृतकृत्यं चकार तम् ॥ ५७ | वर्षोंतक यह अनुष्ठान किया। नौवें वर्षके अन्तमें महाष्टमी तिथिको अर्धरात्रि आनेपर महेश्वरीने उसे अपना प्रत्यक्ष दर्शन दिया और अनेक प्रकारके वरदानोंसे कृतकृत्य कर दिया॥ ५५-५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे देवीपूजामहत्त्ववर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अथाष्टाविंशोऽध्यायः
श्रीरामचरित्रवर्णन
| जनमेजय उवाच<br>कथं रामेण तच्चीर्णं व्रतं देव्याः सुखप्रदम्।<br>राज्यभ्रष्टः कथं सोऽथ कथं सीता हृता पुनः॥ १ | जनमेजय बोले— श्रीरामाने भगवती जगदम्बाके इस सुखप्रदायक व्रतका अनुष्ठान किस प्रकार किया, वे राज्यच्युत कैसे हुए और फिर सीता-हरण किस प्रकार हुआ ? ॥ १ ॥ |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>राजा दशरथः श्रीमानयोध्याधिपतिः पुरा।<br>सूर्यवंशधरश्चासीद्देवब्राह्मणपूजकः ॥ २ | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्यापुरीमें राज्य करते थे। वे सूर्यवंशमें श्रेष्ठ राजाके रूपमें प्रतिष्ठित थे और वे देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया करते थे॥ २॥ |
| चत्वारो जज्ञिरे तस्य पुत्रा लोकेषु विश्रुताः।<br>रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्चेति नामतः॥ ३<br><br>राज्ञः प्रियकराः सर्वे सदृशा गुणरूपतः।<br>कौसल्यायाः सुतो रामः कैकेय्या भरतः स्मृतः॥ ४<br><br>सुमित्रातनयौ जातौ यमलौ द्वौ मनोहरौ।<br>ते जाता वै किशोराश्च धनुर्बाणधराः किल॥ ५ | उनके चार पुत्र उत्पन्न हुए; जो लोकमें राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामसे विख्यात हुए। गुण तथा रूपमें पूर्ण समानता रखनेवाले वे सभी महाराज दशरथको अत्यन्त प्रिय थे। उनमें राम महारानी कौसल्याके तथा भरत महारानी कैकेयीके पुत्र कहे गये। रानी सुमित्राके लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न नामवाले जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न हुए। वे चारों किशोरावस्थामें ही धनुष-बाणधारी हो गये॥ ३–५॥ |
| सूनवः कृतसंस्कारा भूपतेः सुखवर्धकाः।<br>कौशिकेन तदागत्य प्रार्थितो रघुनन्दनः॥ ६ | महाराज दशरथने सुख बढ़ानेवाले अपने चारों पुत्रोंके संस्कार भी सम्पन्न कर दिये। तब एक समय महर्षि विश्वामित्र ने दशरथके यहाँ आकर उनसे रघुनन्दन रामको माँगा॥ ६॥ |
| राघवं मखरक्षार्थं सूनुं षोडशवार्षिकम्।<br>तस्मै सोऽयं ददौ रामं कौशिकाय सलक्ष्मणम्॥ ७ | महाराज दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये लक्ष्मण-सहित सोलहवर्षीय पुत्र रामको विश्वामित्रको समर्पित कर दिया॥ ७॥ |
| तौ समेत्य मुनिं मार्गे जग्मतुश्चारुदर्शनौ।<br>ताटका निहता मार्गे राक्षसी घोरदर्शना॥ ८ | प्रियदर्शन वे दोनों भाई मुनिके साथ मार्गमें चल दिये। रामचन्द्रजीने मुनियोंको सदा पीड़ित करनेवाली तथा अत्यन्त भयानक रूपवाली ताटकाको |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 B
| अ० २८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३८७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रामेणैकेन बाणेन मुनीनां दुःखदा सदा।<br>यज्ञरक्षा कृता तत्र सुबाहुर्निहतः शठः॥ ९<br><br>मारीचोऽथ मृतप्रायो निक्षिप्तो बाणवेगतः।<br>एवं कृत्वा महत्कर्म यज्ञस्य परिरक्षणम्॥ १०<br><br>गतास्ते मिथिलां सर्वे रामलक्ष्मणकौशिकाः।<br>अहल्या मोचिता शापान्निष्पापा सा कृताबला॥ ११ | रास्तेमें ही मात्र एक बाणसे मार डाला। उन्होंने दुष्ट सुबाहुका वध किया तथा मारीचको अपने बाणसे दूर फेंककर उसे मृतप्राय कर दिया और यज्ञ-रक्षा की। इस प्रकार यज्ञ-रक्षाका महान् कृत्य सम्पन्न करके राम, लक्ष्मण तथा विश्वामित्रने मिथिलापुरीके लिये प्रस्थान किया। जाते समय मार्गमें रामने अबला अहल्याको शापसे मुक्ति प्रदान करके उसे पापरहित कर दिया॥ ८—११॥ |
| विदेहनगरे तौ तु जग्मतुर्मुनिना सह।<br>बभञ्ज शिवचापञ्च जनकेन पणीकृतम्॥ १२<br><br>उपयेमे ततः सीतां जानकीञ्च रंमांशजाम्।<br>लक्ष्मणाय ददौ राजा पुत्रीमेकां तथोर्मिलाम्॥ १३ | इसके बाद वे दोनों भाई मुनि विश्वामित्रके साथ जनकपुर पहुँच गये और वहाँ श्रीरामने जनकजीद्वारा प्रतिज्ञाके रूपमें रखे शिव-धनुषको तोड़ दिया और लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न जनकनन्दिनी सीताके साथ विवाह किया। राजा जनकने दूसरी पुत्री उर्मिलाका विवाह लक्ष्मणके साथ कर दिया॥ १२-१३॥ |
| कुशध्वजसुते कन्ये प्राप्तुर्भ्रातरावुभौ।<br>तथा भरतशत्रुघ्नौ सुशीलौ शुभलक्षणौ॥ १४ | शीलसम्पन्न तथा शुभलक्षणोंसे युक्त दोनों भाई भरत तथा शत्रुघ्नने कुशध्वजकी दो पुत्रियों [माण्डवी तथा श्रुतकीर्ति]-को पत्नीरूपमें प्राप्त किया॥ १४॥ |
| एवं दारक्रियास्तेषां भ्रातॄणां चाभवन्नृप।<br>चतुर्णां मिथिलायां तु यथाविधि विधानतः॥ १५ | हे राजन्! इस प्रकार उन चारों भाइयोंका विवाह मिथिलापुरीमें ही विधि-विधानसे सम्पन्न हुआ॥ १५॥ |
| राज्ययोग्यं सुतं दृष्ट्वा राजा दशरथस्तदा।<br>राघवाय धुरं दातुं मनश्चक्रे निजाय वै॥ १६ | तत्पश्चात् महाराज दशरथने अपने बड़े पुत्र रामको राज्य करनेयोग्य देखकर उन्हें राज्य-भार सौंपनेका मनमें निश्चय किया॥ १६॥ |
| सम्भारं विहितं दृष्ट्वा कैकेयी पूर्वकल्पितौ।<br>वरौ संप्रार्थयामास भर्तारं वशवर्तिनम्॥ १७ | राजतिलक-सम्बन्धी सामग्रियोंका प्रबन्ध हुआ देखकर रानी कैकेयीने अपने वशीभूत महाराज दशरथसे पूर्वकल्पित दो वरदान माँगे॥ १७॥ |
| राज्यं सुताय चैकेन भरताय महात्मने।<br>रामाय वनवासञ्च चतुर्दशसमास्तथा॥ १८ | उसने पहले वरदानके रूपमें अपने पुत्र भरतके लिये राज्य तथा दूसरे वरदानके रूपमें महात्मा रामको चौदह वर्षोंका वनवास माँगा॥ १८॥ |
| रामस्तु वचनात्तस्याः सीतालक्ष्मणसंयुतः।<br>जगाम दण्डकारण्यं राक्षसै रुपसेवितम्॥ १९ | कैकेयीका वचन मानकर श्रीरामचन्द्रजी सीता तथा लक्ष्मणके साथ दण्डकवन चले गये, जहाँ राक्षस रहते थे॥ १९॥ |
| राजा दशरथः पुत्रविरहेण प्रपीडितः।<br>जहौ प्राणानमेयात्मा पूर्वशापमनुस्मरन्॥ २० | तदनन्तर पुत्रके वियोगजनित शोकसे सन्तप्त पुण्यात्मा दशरथने पूर्वकालमें एक ऋषिद्वारा प्रदत्त शापका स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिये॥ २०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 C
३८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २८
३८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २८
| भरतः पितरं दृष्ट्वा मृतं मातृकृतेन वै।<br>राज्यमृद्धं न जग्राह भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥ २१ | माता कैकेयीके कृत्यके कारण पिताजीकी मृत्यु देखकर भरतजीने भाई श्रीरामका हित करनेकी इच्छासे अयोध्याका समृद्ध राज्य स्वीकार नहीं किया॥ २१॥ |
| पञ्चवट्यां वसन् रामो रावणावरजां वने।<br>शूर्पणखां विरूपां वै चकारातिस्मरातुराम्॥ २२ | उधर पंचवटीमें निवास करते हुए श्रीरामने रावणकी छोटी बहन अतिशय कामातुर शूर्पणखाको कुरूप बना दिया॥ २२॥ |
| खरादयस्तु तां दृष्ट्वा छिन्ननासां निशाचराः।<br>चक्रुः संग्राममतुलं रामेणामिततेजसा॥ २३ | तब खर-दूषण आदि राक्षसोंने उसे कटी हुई नासिकावाली देखकर अमित तेजस्वी रामके साथ घोर संग्राम किया॥ २३॥ |
| स जघान खरादींश्च दैत्यानतिबलान्वितान्।<br>मुनीनां हितमन्विच्छन् रामः सत्यपराक्रमः॥ २४ | उस संग्राममें सत्यपराक्रमी श्रीरामने मुनियोंका कल्याण करनेकी इच्छासे अत्यन्त बलशाली खर आदि राक्षसोंका संहार कर दिया॥ २४॥ |
| गत्वा शूर्पणखा लङ्कां खरदूषणघातनम्।<br>दूषिता कथयामास रावणाय च राघवात्॥ २५ | तत्पश्चात् लंका जाकर उस दुष्ट शूर्पणखाने रामके द्वारा खर-दूषणके संहारका समाचार रावणसे बताया॥ २५॥ |
| सोऽपि श्रुत्वा विनाशं तं जातः क्रोधवशः खलः।<br>जगाम रथमारुह्य मारीचस्याश्रमं तदा॥ २६ | वह दुष्ट रावण भी संहारके विषयमें सुनकर अत्यन्त क्रोधित हो उठा और तब रथपर सवार होकर वह मारीचके आश्रममें पहुँच गया॥ २६॥ |
| कृत्वा हेममृगं नेतुं प्रेषयामास रावणः।<br>सीताप्रलोभनार्थाय मायाविनमसम्भवम्॥ २७ | सीता-हरणके उद्देश्यसे रावणने मायावी मारीचको असम्भव स्वर्ण-मृग बनाकर सीताको प्रलोभित करनेके लिये भेजा॥ २७॥ |
| सोऽथ हेममृगो भूत्वा सीतादृष्टिपथं गतः।<br>मायावी चातिचित्राङ्गश्चरन्प्रबलमन्तिके॥ २८ | तत्पश्चात् वह मायावी मारीच अत्यन्त अद्भुत अंगोंवाला स्वर्ण-मृग बनकर चरते-चरते सीताजीके सन्निकट पहुँच गया और उन्होंने उसे देख लिया॥ २८॥ |
| तं दृष्ट्वा जानकी प्राह राघवं दैवनोदिता।<br>चर्मानयस्व कान्तेति स्वाधीनपतिका यथा॥ २९ | उसे देखकर दैवी प्रेरणासे स्वाधीनपतिका स्त्रीकी भाँति सीताने श्रीरामसे कहा—हे कान्त! आप इस मृगका चर्म ले आइये॥ २९॥ |
| अविचार्यथ रामोऽपि तत्र संस्थाप्य लक्ष्मणम्।<br>सशरं धनुरादाय ययौ मृगपदानुगः॥ ३० | राम भी बिना कुछ सोचे-समझे लक्ष्मणको सीताके रक्षार्थ वहीं छोड़कर धनुष तथा बाण लेकर उस मृगके पीछे-पीछे दौड़ पड़े॥ ३०॥ |
| सारङ्गोऽपि हरिं दृष्ट्वा मायाकोटिविशारदः।<br>दृश्यादृश्यो बभूवाथ जगाम च वनान्तरम्॥ ३१ | करोड़ों प्रकारकी माया रचनेका ज्ञान रखनेवाला मृगरूपधारी वह मारीच भी रामको अपने पीछे दौड़ता देखकर कभी दिखायी पड़ते हुए तथा कभी आँखोंसे ओझल होते हुए एक वनसे दूसरे वनमें बहुत दूर चला गया॥ ३१॥ |
| मत्वा हस्तगतं रामः क्रोधाकृष्टधनुः पुनः।<br>जघान चातितीक्ष्णेन शरेण कृत्रिमं मृगम्॥ ३२ | रामने अब उसे हस्तगत समझकर क्रोधपूर्वक धनुष खींचकर अत्यन्त तीक्ष्ण बाणसे उस कृत्रिम मृगको मार डाला॥ ३२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—13 D
| अ० २८] | तृतीय स्कन्ध | ३८९ |
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| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स हतोऽतिबलात्तेन चुक्रोश भृशदुःखितः।<br>हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति मायावी नश्वरः खलः॥ ३३ | रामके प्रबल प्रहारसे आहत होकर वह मरणोन्मुख मायावी तथा नीच मृग चीख-चीखकर चिल्लाने लगा—हा लक्ष्मण! अब मैं मारा गया॥ ३३॥ |
| स शब्दस्तुमुलस्तावज्जानक्या संश्रुतस्तदा।<br>राघवस्येति सा मत्वा दीना देवरमब्रवीत्॥ ३४<br><br>गच्छ लक्ष्मण तूर्णं त्वं हतोऽसौ रघुनन्दनः।<br>त्वामाह्वयति सौमित्रे साहाय्यं कुरु सत्वरम्॥ ३५ | उसके गगन-भेदी चीत्कारकी ध्वनिको सीताने सुन लिया। 'यह तो रामकी पुकार है'—ऐसा मानकर उन्होंने दुःखी होकर देवर लक्ष्मणसे कहा—हे लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि वे रघुनन्दन राम आहत हो गये हैं। अतः तुम शीघ्र जाओ। हे सुमित्रानन्दन! वे तुम्हें पुकार रहे हैं; वहाँ शीघ्र ही पहुँचकर उनकी सहायता करो॥ ३४-३५॥ |
| तत्राह लक्ष्मणः सीतामम्ब रामवधादपि।<br>नाहं गच्छेऽद्य मुक्त्वा त्वामसहायामिहाश्रमे॥ ३६<br><br>आज्ञा मे राघवस्यात्र तिष्ठेति जनकात्मजे।<br>तदतिक्रमभीतोऽहं न त्यजामि तवान्तिकम्॥ ३७<br><br>दूरं वै राघवं दृष्ट्वा वने मायाविना किल।<br>त्यक्त्वा त्वां नाधिगच्छामि पदमेकं शुचिस्मिते॥ ३८<br><br>कुरु धैर्यं न मन्येऽद्य रामं हन्तुं क्षमं क्षितौ।<br>नाहं त्यक्त्वा गमिष्यामि विलंघ्य रामभाषितम्॥ ३९ | तब लक्ष्मणजीने सीतासे कहा—हे माता! रामका वध ही क्यों न हो; मैं आपको इस आश्रममें इस समय असहाय छोड़कर वहाँ नहीं जा सकता। हे जनकनन्दिनि! मुझे रामकी आज्ञा है कि तुम इसी आश्रममें रहना। उनकी आज्ञाका उल्लंघन करनेमें मैं डरता हूँ। अतः आपका सामीप्य नहीं छोड़ सकता। हे शुचिस्मिते! वह मायावी भगवान् श्रीरामको बहुत दूर दौड़ा ले गया है—यह जान करके मैं आपको छोड़कर यहाँसे एक पग भी नहीं जा सकता। आप धैर्य धारण कीजिये। मैं तो ऐसा मानता हूँ कि इस समय सम्पूर्ण पृथ्वीलोकमें श्रीरामको मारनेमें कोई समर्थ नहीं है। रामके आदेशका उल्लंघन करके तथा आपको यहाँ छोड़कर मैं नहीं जाऊँगा॥ ३६—३९॥ |
| व्यास उवाच<br><br>रुदती सुदती प्राह तं तदा विधिनोदिता।<br>अक्रूरा वचनं क्रूरं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥ ४० | **व्यासजी बोले—**तत्पश्चात् सुन्दर दाँतोंवाली तथा सौम्य स्वभाववाली सीताने दैवसे प्रेरित होकर शुभ लक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे रोते हुए यह कठोर वचन कहा—॥ ४०॥ |
| अहं जानामि सौमित्रे सानुरागं च मां प्रति।<br>प्रेरितं भरतेनैव मदर्थमिह सङ्गतम्॥ ४१ | हे सुमित्रातनय! अब मैं जान गयी कि तुम मेरे प्रति अनुरागयुक्त हो और भरतकी प्रेरणासे मेरे प्रयोजनसे यहाँ आये हो॥ ४१॥ |
| नाहं तथाविधा नारी स्वैरिणी कुहकाधम।<br>मृते रामे पतिं त्वां न कर्तुमिच्छामि कामतः॥ ४२ | हे कुहकाधम! मैं उस तरहकी स्वच्छन्द स्त्री नहीं हूँ। मैं रामके मृत हो जानेपर भी सुखके लिये तुम्हें अपना पति कभी नहीं बना सकती॥ ४२॥ |
| नागमिष्यति चेद्रामो जीवितं सन्त्यजाम्यहम्।<br>विना तेन न जीवामि विधुरा दुःखिता भृशम्॥ ४३ | यदि राम नहीं लौटेंगे तो मैं अपना प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि उनके बिना मैं विधवा होकर अत्यधिक दुःखी जीवन नहीं जी सकती॥ ४३॥ |
| ३९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गच्छ वा तिष्ठ सौमित्रे न जानेऽहं तवेप्सितम्।<br>क्व गतं तेऽत्र सौहार्दं ज्येष्ठे धर्मरते किल॥ ४४ | हे लक्ष्मण! तुम जाओ या रहो। मुझे तुम्हारी वास्तविक इच्छाका पता नहीं है। धर्मपरायण ज्येष्ठ भाईके प्रति आपका प्रेम अब कहाँ चला गया ?॥ ४४॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या लक्ष्मणो दीनमानसः।<br>प्रोवाच रुद्धकण्ठस्तु तां तदा जनकात्मजाम्॥ ४५ | सीताका वह वचन सुनकर लक्ष्मणके मनमें अत्यधिक कष्ट हुआ। रुदनके कारण रुँधे कण्ठसे उन्होंने जनकनन्दिनी सीतासे कहा— ॥ ४५॥ |
| किमात्थ क्षितिजे वाक्यं मयि क्रूरतरं किल।<br>किं वदस्यत्यनिष्टं ते भावि जाने धिया ह्यहम्॥ ४६ | हे भूमिकन्ये! आप इस प्रकारके अति कठोर वचन मेरे लिये क्यों कह रही हैं? मेरा मन तो यह कह रहा है कि आपके समक्ष कोई अनिष्टकर परिस्थिति उत्पन्न होनेवाली है॥ ४६॥ |
| इत्युक्त्वा निर्ययौ वीरस्तां त्यक्त्वा प्ररुदन्भृशम्।<br>अग्रजस्य ययौ पश्यञ्छोकार्तः पृथिवीपते॥ ४७ | [व्यासजीने कहा—] हे महाराज जनमेजय! ऐसा कहकर अत्यधिक विलाप करते हुए वीर लक्ष्मण सीताको वहीं छोड़कर चल दिये और अत्यधिक शोकाकुल होकर बड़े भाई रामको चारों ओर देखते हुए आगेकी ओर बढ़ते गये॥ ४७॥ |
| गतेऽथ लक्ष्मणे तत्र रावणः कपटाकृतिः।<br>भिक्षुवेषं ततः कृत्वा प्रविवेश तदाश्रमे॥ ४८ | इस प्रकार लक्ष्मणके वहाँसे चले जानेपर कपट स्वभाववाले रावणने साधु-वेष धारणकर उस आश्रममें प्रवेश किया॥ ४८॥ |
| जानकी तं यतिं मत्वा दत्त्वार्घ्यं वन्यमादरात्।<br>भैक्ष्यं समर्पयामास रावणाय दुरात्मने॥ ४९ | जानकी उस दुष्टात्मा रावणको संन्यासी समझकर आदरपूर्वक वन्य सामग्रियोंका अर्घ्य प्रदान करके भिक्षा देने लगीं॥ ४९॥ |
| तां पप्रच्छ स दुष्टात्मा नम्रपूर्वं मृदुस्वरम्।<br>कासि पद्मपलाशाक्षि वने चैकाकिनी प्रिये॥ ५० | तब उस दुरात्माने अत्यन्त विनम्र भावसे मधुर वाणीमें सीताजीसे पूछा—हे पद्मपत्रके समान नेत्रोंवाली प्रिये! तुम कौन हो और इस वनमें अकेली क्यों रह रही हो?॥ ५०॥ |
| पिता कस्तेऽथ वामोरु भ्राता कः कः पतिस्तव।<br>मूढेवैकाकिनी चात्र स्थितासि वरवर्णिनि॥ ५१ | हे वामोरु! तुम्हारे पिता कौन हैं और तुम्हारे भाई तथा पति कौन हैं? हे सुन्दरि! तुम एक मूढ़ स्त्रीकी भाँति यहाँ अकेली क्यों रह रही हो?॥ ५१॥ |
| निर्जने विपिने किं त्वं सौधार्हा त्वमसि प्रिये।<br>उटजे मुनिपत्नीवद्देवकन्यासप्रभा॥ ५२ | हे प्रिये! इस निर्जन वनमें क्यों रह रही हो? तुम तो महलोंमें निवास करनेयोग्य हो। देवकन्याके समान कान्तिवाली तुम एक मुनिपत्नीकी भाँति इस कुटियामें क्यों रह रही हो?॥ ५२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच विदेहजा।<br>दिव्यं दिष्ट्या यतिं ज्ञात्वा मन्दोदर्याः पतिं तदा॥ ५३ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उसका यह वचन सुनकर विदेहतनया सीताजीने मन्दोदरीके पति रावणको दैववश एक दिव्य संन्यासी समझकर उत्तर दिया॥ ५३॥ |
| अ० २८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३९१ |
|---|
| राजा दशरथः श्रीमांश्चत्वारस्तस्य वै सुताः।<br>तेषु ज्येष्ठः पतिर्मेऽस्ति रामनामेति विश्रुतः॥ ५४ | दशरथ नामक लक्ष्मीसम्पन्न एक राजा हैं, उनके चार पुत्र हैं। उनमें सबसे बड़े पुत्र जो ‘राम’ नामसे विख्यात हैं, वे ही मेरे पति हैं॥ ५४॥ | | विवासितोऽथ कैकेय्या कृते भूपतिना वरे।<br>चतुर्दश समा रामो वसतेऽत्र सलक्ष्मणः॥ ५५ | कैकेयीने महाराज दशरथसे वरदान माँगकर रामको चौदह वर्षके लिये वनवास दिला दिया। वे अपने भाई लक्ष्मणके साथ अब यहींपर रह रहे हैं॥ ५५॥ | | जनकस्य सुता चाहं सीतानाम्नीति विश्रुता।<br>भङ्क्त्वा शैवं धनुः कामं रामेणाहं विवाहिता॥ ५६ | मैं राजा जनककी पुत्री हूँ तथा ‘सीता’ नामसे विख्यात हूँ। शिवजीका धनुष तोड़कर श्रीरामने मेरा पाणिग्रहण किया है॥ ५६॥ | | रामबाहुबलेनात्र वसामो निर्भया वने।<br>काञ्चनं मृगमालोक्य हन्तुं मे निर्गतः पतिः॥ ५७ | उन्हीं रामके बाहुबलका आश्रय लेकर मैं निर्भीक होकर इस वनमें रहती हूँ। एक स्वर्ण-मृग देखकर उसे मारनेके लिये मेरे पति गये हुए हैं॥ ५७॥ | | लक्ष्मणोऽपि पुनः श्रुत्वा रवं भ्रातुर्गतोऽधुना।<br>तयोर्बाहुबलादत्र निर्भयाहं वसामि वै॥ ५८ | अपने भाईका शब्द सुनकर लक्ष्मण भी इस समय उधर ही गये हुए हैं। उन्हीं दोनोंके बाहुबलसे मैं यहाँ निडर होकर रहती हूँ॥ ५८॥ | | मयेदं कथितं सर्वं वृत्तान्तं वनवासके।<br>तेऽत्रागत्यार्हणां ते वै करिष्यन्ति यथाविधि॥ ५९ | मैंने आपको वनवास-सम्बन्धी अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त बता दिया। अब वे लोग यहाँ आकर आपका विधिपूर्वक सत्कार करेंगे॥ ५९॥ | | यतिर्विष्णुस्वरूपोऽसि तस्मात्त्वं पूजितो मया।<br>आश्रमो विपिने घोरे कृतोऽस्ति रक्षसां कुले॥ ६०<br><br>तस्मात्त्वां परिपृच्छामि सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः।<br>कोऽसि त्रिदण्डिरूपेण विपिने त्वं समागतः॥ ६१ | संन्यासी विष्णुस्वरूप होता है, इसीलिये मैंने आपकी पूजा की है। राक्षसोंके समुदायद्वारा सेवित इस भयंकर जंगलमें यह आश्रम बना हुआ है। इसलिये मैं आपसे यह पूछती हूँ कि त्रिदण्डीके रूपमें इस वनमें पधारे हुए आप कौन हैं? आप मेरे समक्ष सत्य कहिये॥ ६०-६१॥ | | रावण उवाच<br>लङ्केशोऽहं मरालाक्षि श्रीमान्मन्दोदरीपतिः।<br>त्वत्कृते तु कृतं रूपं मयेत्थं शोभनाकृते॥ ६२ | रावण बोला—हे हंसनयने! मैं मन्दोदरीका पति तथा लंकाका नरेश श्रीमान् रावण हूँ। हे सुन्दर आकृतिवाली! तुम्हारे लिये ही मैंने इस प्रकारका वेष बनाया है॥ ६२॥ | | आगतोऽहं वरारोहे भगिन्या प्रेरितोऽत्र वै।<br>जनस्थाने हतौ श्रुत्वा भ्रातरौ खरदूषणौ॥ ६३ | हे सुन्दरि! जनस्थानमें अपने भाई खर-दूषणके मारे जानेका समाचार सुनकर तथा अपनी बहन शूर्पणखाद्वारा प्रेरित किये जानेपर मैं यहाँ आया हूँ॥ ६३॥ | | अङ्गीकुरु नृपं मां त्वं त्यक्त्वा तं मानुषं पतिम्।<br>हृतराज्यं गतश्रीकं निर्बलं वनवासिनम्॥ ६४ | अब तुम उस राज्यच्युत, लक्ष्मीहीन, निर्बल, वनवासी तथा मानवयोनिवाले पतिको छोड़कर मुझ राजाको स्वीकार कर लो॥ ६४॥ |
| ३९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ | | :--- | :--- |
| पट्टराज्ञी भव त्वं मे मन्दोदर्युपरि स्फुटम्।<br>दासोऽस्मि तव तन्वङ्गि स्वामिनी भव भामिनि॥ ६५ | तुम मेरी बात मानकर मन्दोदरीसे भी बड़ी पटरानी बन जाओ, मैं सत्य कहता हूँ। हे तन्वंगि! मैं तुम्हारा दास हूँ। हे भामिनि! तुम मेरी स्वामिनी हो जाओ॥ ६५॥ |
| जेताहं लोकपालानां पतामि तव पादयोः।<br>करं गृहाण मेऽद्य त्वं सनाथं कुरु जानकि॥ ६६ | समस्त लोकपालोंपर विजय प्राप्त करनेवाला मैं तुम्हारे चरणोंपर पड़ता हूँ। हे जनकनन्दिनि! तुम इस समय मेरा हाथ पकड़ लो और मुझे सनाथ कर दो॥ ६६॥ |
| पिता ते याचितः पूर्वं मया वै त्वत्कृतेऽबले।<br>जनको मामुवाचेत्थं पणबन्धो मया कृतः॥ ६७ | हे अबले! मैंने पहले भी तुम्हारे पिता जनकसे तुम्हें प्राप्त करनेके लिये याचना की थी, किंतु उस समय उन्होंने मुझसे यह कहा था कि मैं [धनुषभंगकी] शर्त रख चुका हूँ॥ ६७॥ |
| रुद्रचापभयान्नाहं सम्प्राप्तस्तु स्वयंवरे।<br>मनो मे संस्थितं तावन्निमग्नं विरहातुरम्॥ ६८ | शंकरजीके धनुषके भयके कारण मैं उस समय स्वयंवरमें सम्मिलित नहीं हुआ था। उसी समयसे विरह-वेदनासे पीड़ित मेरा मन तुममें ही लगा हुआ है॥ ६८॥ |
| वनेऽत्र संस्थितां श्रुत्वा पूर्वानुरागमोहितः।<br>आगतोऽस्म्यसितापाङ्गि सफलं कुरु मे श्रमम्॥ ६९ | हे श्याम नयनोंवाली! तुम इस वनमें रह रही हो—यह सुनकर तुम्हारे प्रति पूर्व प्रेमके अधीन हुआ मैं यहाँ आया हूँ; अब तुम मेरा परिश्रम सार्थक कर दो॥ ६९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे रामचरित्रवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥
अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः
सीताहरण, रामका शोक और लक्ष्मणद्वारा उन्हें सान्त्वना देना
| व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचो दुष्टं जानकी भयविह्वला।<br>वेपमाना स्थिरं कृत्वा मनो वाचमुवाच ह॥ १<br><br>पौलस्त्य किमसद्वाक्यं त्वमात्थ स्मरमोहितः।<br>नाहं वै स्वैरिणी किन्तु जनकस्य कुलोद्भवा॥ २ | व्यासजी बोले—रावणका कुविचारपूर्ण वचन सुनकर सीता भयसे व्याकुल होकर काँप उठीं। पुनः मनको स्थिर करके उन्होंने कहा—हे पुलस्त्यके वंशज! कामके वशीभूत होकर तुम ऐसा अनर्गल वचन क्यों कह रहे हो? मैं स्वैरिणी नारी नहीं हूँ, बल्कि महाराज जनकके कुलमें उत्पन्न हुई हूँ॥ १-२॥ |
| गच्छ लङ्कां दशास्य त्वं रामस्त्वां वै हनिष्यति।<br>मत्कृते मरणं तत्र भविष्यति न संशयः॥ ३ | हे दशकन्धर! तुम लंका चले जाओ, नहीं तो श्रीराम निश्चय ही तुम्हें मार डालेंगे। मेरे लिये ही तुम्हारी मृत्यु होगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३॥ |
अ० २९] तृतीय स्कन्ध ३१३
अ० २९] तृतीय स्कन्ध ३१३
| इत्युक्त्वा पर्णशालायां गता सा वह्निसन्निधौ।<br>गच्छ गच्छेति वदती रावणं लोकरावणम्॥ ४ | ऐसा कह करके वे सीताजी जगत्को रुलानेवाले रावणके प्रति ‘चले जाओ, चले जाओ’ इस प्रकार बोलती हुई पर्णशालामें अग्निकुण्डके पास चली गयीं॥ ४॥ |
| सोऽथ कृत्वा निजं रूपं जगामोटजमन्तिकम्।<br>बलाज्जग्राह तां बालां रुदतीं भयविह्वलाम्॥ ५ | इतनेमें वह रावण अपना वास्तविक रूप धारण करके तुरन्त पर्णशालामें उनके पास जा पहुँचा और उसने भयसे व्याकुल होकर रोती हुई उस बाला सीताको बलपूर्वक पकड़ लिया॥ ५॥ |
| रामरामेति क्रन्दन्तीं लक्ष्मणेति मुहुर्मुहुः।<br>गृहीत्वा निर्गतः पापो रथमारोप्य सत्वरः॥ ६<br><br>गच्छन्नरुणपुत्रेण मार्गे रुद्धो जटायुषा।<br>संग्रामोऽभून्महोरौद्रस्तयोस्तत्र वनान्तरे॥ ७ | हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण!—ऐसा बार-बार कहकर विलाप करती हुई सीताको पकड़कर और उन्हें अपने रथपर बैठाकर रावण शीघ्रतापूर्वक निकल गया। तब अरुणपुत्र जटायुने जाते हुए उस रावणको मार्गमें रोक दिया। उस वनमें दोनोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा॥ ६-७॥ |
| हत्वा तं तां गृहीत्वा च गतोऽसौ राक्षसाधिपः।<br>लङ्कायां क्रन्दती तात कुररीव दुरात्मना॥ ८<br><br>अशोकवनिकायां सा स्थापिता राक्षसीयुता।<br>स्ववृत्तान्नैव चलिता सामदानादिभिः किल॥ ९ | हे तात! अन्तमें वह राक्षसराज रावण जटायुको मारकर और सीताको साथ लेकर चला गया। तदनन्तर उस दुष्टात्माने कुररी पक्षीकी भाँति क्रन्दन करती हुई सीताको लंकामें अशोकवाटिका में रख दिया और उसकी रखवालीके लिये राक्षसियोंको नियुक्त कर दिया। उस राक्षसके साम-दान आदि उपायोंसे भी सीताजी अपने सतीत्वसे विचलित नहीं हुईं॥ ८-९॥ |
| रामोऽपि तं मृगं हत्वा जगामादाय निर्वृतः।<br>आयान्तं लक्ष्मणं वीक्ष्य किं कृतं तेऽनुजासमम्॥ १०<br><br>एकाकिनीं प्रियां हित्वा किमर्थं त्वमिहागतः।<br>श्रुत्वा स्वनं तु पापस्य राघवस्त्वब्रवीदिदम्॥ ११ | उधर श्रीराम भी स्वर्ण-मृगको शीघ्र मारकर उसे लिये हुए प्रसन्नतापूर्वक [आश्रमकी ओर] चल पड़े। मार्गमें आते हुए लक्ष्मणको देखकर वे बोले—भाई! यह तुमने कैसा विषम कार्य कर दिया? वहाँ प्रिया सीताको अकेली छोड़कर तथा इस पापीकी पुकार सुनकर तुम इधर क्यों चले आये?॥ १०-११॥ |
| सौमित्रिस्त्वब्रवीद्वाक्यं सीतावाग्बाणपीडितः।<br>प्रभोऽत्राहं समायातः कालयोगान्न संशयः॥ १२ | तब सीताके वचनरूपी बाणसे आहत लक्ष्मणने कहा—प्रभो! मैं कालकी प्रेरणासे यहाँ चला आया हूँ; इसमें सन्देह नहीं है॥ १२॥ |
| तदा तौ पर्णशालायां गत्वा वीक्ष्यातिदुःखितौ।<br>जानक्यन्वेषणे यत्नमुभौ कर्तुं समुद्यतौ॥ १३ | तदनन्तर वे दोनों पर्णशालामें जाकर वहाँकी स्थिति देखकर अत्यन्त दुःखित हुए और जानकीको खोजनेका प्रयत्न करने लगे॥ १३॥ |
| मार्गमाणौ तु सम्प्राप्तौ यत्रासौ पतितः खगः।<br>जटायुः प्राणशेषस्तु पतितः पृथिवीतले॥ १४<br><br>तेनोक्तं रावणेनाद्य हृतासौ जनकात्मजा।<br>मया निरुद्धः पापात्मा पातितोऽहं मृधे पुनः॥ १५ | खोजते हुए वे उस स्थानपर पहुँचे जहाँ पक्षिराज ‘जटायु’ गिरा पड़ा था। वह पृथिवीपर मृतप्राय पड़ा हुआ था। उसने बताया कि रावण जानकीको अभी हर ले गया है। मैंने उस पापीको रोका, किंतु उसने युद्धमें मुझे मारकर गिरा दिया॥ १४-१५॥ |
| ३९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ | | :--- | :--- |
| इत्युक्त्वासौ गतप्राणः संस्कृतो राघवेण वै।<br>कृत्वौर्ध्वदैहिकं रामलक्ष्मणौ निर्गतौ ततः॥ १६ | ऐसा कहकर वह जटायु मर गया। तब श्रीरामने उसका दाह-संस्कार किया। उसकी समस्त और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करके श्रीराम और लक्ष्मण वहाँसे आगे बढ़े॥ १६॥ | | कबन्धं घातयित्वासौ शापाच्चामोचयत्प्रभुः।<br>वचनात्तस्य हरिणा सख्यं चक्रेऽथ राघवः॥ १७ | मार्गमें कबन्धका वध करके भगवान् श्रीरामने उसे शापसे छुड़ाया और उसीके कथनानुसार उन्होंने सुग्रीवसे मित्रता की॥ १७॥ | | हत्वा च वालिनं वीरं किष्किन्धाराज्यमुत्तमम्।<br>सुग्रीवाय ददौ रामः कृतसख्याय कार्यतः॥ १८ | तदनन्तर पराक्रमी वालीका वध करके श्रीरामने कार्यसाधनहेतु किष्किन्धाका उत्तम राज्य अपने सखा सुग्रीवको दे दिया॥ १८॥ | | तत्रैव वार्षिकान्मासांस्तस्थौ लक्ष्मणसंयुतः।<br>चिन्तयञ्जानकीं चित्ते दशाननहृतां प्रियाम्॥ १९ | वहींपर लक्ष्मणसहित श्रीरामने रावणके द्वारा अपहृत अपनी प्रिया जानकीके विषयमें मनमें सोचते हुए वर्षाके चार मास व्यतीत किये॥ १९॥ | | लक्ष्मणां प्राह रामस्तु सीताविरहपीडितः।<br>सौमित्रे कैकयसुता जाता पूर्णमनोरथा॥ २०<br><br>न प्राप्ता जानकी नूनं नाहं जीवामि तां विना।<br>नागमिष्याम्ययोध्यायामृते जनकनन्दिनीम्॥ २१ | सीताके विरहमें अत्यन्त दुःखित श्रीरामने एक दिन लक्ष्मणसे कहा—हे सौमित्रे! कैकेयीकी कामना पूरी हो गयी। अभीतक जानकी नहीं मिली, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकता। जनकतनया सीताके बिना मैं अयोध्या नहीं जाऊँगा॥ २०-२१॥ | | गतं राज्यं वने वासो मृतस्तातो हृता प्रिया।<br>पीडयन्मां स दुष्टात्मा दैवोग्रे किं करिष्यति॥ २२ | राज्य चला गया, वनवास करना पड़ा, पिताजी मृत हो गये और प्रिया सीता भी हर ली गयी। इस प्रकार मुझे पीड़ित करता हुआ दुर्देव आगे न जाने क्या करेगा?॥ २२॥ | | दुर्ज्ञेयं भवितव्यं हि प्राणिनां भरतानुज।<br>आवयोः का गतिस्तात भविष्यति सुदुःखदा॥ २३ | हे भरतानुज! प्राणियोंके प्रारब्धको जान पाना अत्यन्त कठिन है। हे तात! अब हम दोनोंकी न जाने कौन-सी दुःखद गति होगी?॥ २३॥ | | प्राप्य जन्म मनोर्वंशे राजपुत्रावुभौ किल।<br>वनेऽतिदुःखभोक्तारौ जातौ पूर्वकृतेन च॥ २४ | मनुके कुलमें जन्म पाकर हम राजकुमार हुए; फिर भी हमलोग पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके कारण वनमें अत्यधिक दुःख भोग रहे हैं॥ २४॥ | | त्यक्त्वा त्वमपि भोगांस्तु मया सह विनिर्गतः।<br>दैवयोगाच्च सौमित्रे भुंक्ष्व दुःखं दुरत्ययम्॥ २५ | हे सौमित्रे! तुम भी भोगोंका परित्याग करके दैवयोगसे मेरे साथ निकल पड़े; तो फिर अब यह कठिन कष्ट भोगो॥ २५॥ | | न कोऽप्यस्मत्कुले पूर्वं मत्Count मत्समो दुःखभाङ्नरः।<br>अकिञ्चनोऽक्षमः क्लिष्टो न भूतो न भविष्यति॥ २६ | हमारे कुलमें मेरे समान दुःख भोगनेवाला, अकिंचन, असमर्थ तथा क्लेशयुक्त व्यक्ति न हुआ है और न होगा॥ २६॥ | | किं करोम्यद्य सौमित्रे मग्नोऽस्मि दुःखसागरे।<br>न चास्ति तरणोपायो ह्यसहायस्य मे किल॥ २७ | हे लक्ष्मण! अब मैं क्या करूँ? मैं शोकसागरमें डूब रहा हूँ, मुझ असहायको इससे पार होनेका कोई |
| अ० २९ ] | तृतीय स्कन्ध | ३९५ | | :--- | :--- |
| न वित्तं न बलं वीर त्वमेकः सहचारकः।<br>कोपं कस्मिन्करोम्यद्य भोगेऽस्मिन्स्वकृतेऽनुज॥ २८ | उपाय नहीं सूझता। हे वीर! मेरे पास न धन है, न बल; एकमात्र तुम ही मेरा साथ देनेवाले हो। हे अनुज! अपने ही द्वारा किये इस कर्मभोगके विषयमें अब मैं किसपर क्रोध करूँ?॥ २७-२८॥ | | गतं हस्तगतं राज्यं क्षणादिन्द्रसमोपमम्।<br>वने वासस्तु सम्प्राप्तः को वेद विधिनिर्मितम्॥ २९ | इन्द्र और यमके राज्यकी तरह हाथमें आया हुआ राज्य क्षणभरमें चला गया और वनवास प्राप्त हुआ; विधिकी रचनाको कौन जान सकता है?॥ २९॥ | | बालभावाच्च वैदेही चलिता चावयोः सह।<br>नीता दैवेन दुष्टेन श्यामा दुःखतरां दशाम्॥ ३० | बाल-स्वभावके कारण सीता भी हम दोनोंके साथ चली आयी। दुष्ट दैवने उस सुन्दरीको अत्यधिक दुःखपूर्ण स्थितिमें पहुँचा दिया॥ ३०॥ | | लङ्केशस्य गृहे श्यामा कथं दुःखे भविष्यति।<br>पतिव्रता सुशीला च मयि प्रीतियुता भृशम्॥ ३१ | वह सुन्दरी जानकी लंकापति रावणके घरमें किस प्रकार दुःखित जीवन व्यतीत करती होगी? वह पतिव्रता है, शीलवती है और मुझसे अत्यधिक अनुराग रखती है॥ ३१॥ | | न च लक्ष्मण वैदेही सा तस्य वशगा भवेत्।<br>स्वैरिणीव वरारोहा कथं स्याज्जनकात्मजा॥ ३२ | हे लक्ष्मण! वह जनकनन्दिनी उस रावणके वशमें कभी नहीं हो सकती, सुन्दर शरीरवाली वह विदेहतनया सीता स्वैरिणीकी भाँति भला किस प्रकार आचरण करेगी?॥ ३२॥ | | त्यजेत्प्राणान्नियंतृत्वे मैथिली भरतानुज।<br>न रावणस्य वशगा भवेदिति सुनिश्चितम्॥ ३३ | हे भरतानुज! वह मैथिली अधिक नियन्त्रण किये जानेपर अपने प्राण त्याग देगी, किंतु यह सुनिश्चित है कि वह रावणकी वशवर्तिनी नहीं होगी॥ ३३॥ | | मृता चेज्जानकी वीर प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम्।<br>मृता चेदसितापाङ्गी किं मे देहेन लक्ष्मण॥ ३४ | हे वीर! यदि जानकी मर गयी तो मैं भी निस्सन्देह अपने प्राण त्याग दूँगा; क्योंकि हे लक्ष्मण! श्यामनयना सीताके मृत हो जानेपर मुझे अपने देहसे क्या लाभ?॥ ३४॥ | | एवं विलपमानं तं रामं कमललोचनम्।<br>लक्ष्मणः प्राह धर्मात्मा सान्त्वयन्नृतया गिरा॥ ३५ | इस प्रकार विलाप करते हुए उन कमलनयन रामको सत्यपूर्ण वाणीसे सान्त्वना प्रदान करते हुए धर्मात्मा लक्ष्मणने कहा—॥ ३५॥ | | धैर्यं कुरु महाबाहो त्यक्त्वा कातरतामिह।<br>आनयिष्यामि वैदेहीं हत्वा तं राक्षसाधमम्॥ ३६ | हे महाबाहो! आप इस समय दैन्यभाव छोड़कर धैर्य धारण कीजिये। मैं उस अधम राक्षसको मारकर जानकीको वापस ले आऊँगा॥ ३६॥ | | आपदि सम्पदि तुल्या धैर्याद्भवन्ति ते धीराः।<br>अल्पधियस्तु निमग्नाः कष्टे भवन्ति विभवेऽपि॥ ३७ | विपत्ति तथा सम्पत्ति—इन दोनों ही स्थितियोंमें धैर्य धारण करते हुए जो एक समान रहते हैं, वे ही धीर होते हैं, किंतु अल्प बुद्धिवाले लोग तो सम्पत्तिकी दशामें भी कष्टमें पड़े रहते हैं॥ ३७॥ | | संयोगो विप्रयोगश्च दैवाधीनावुभावपि।<br>शोकस्तु कीदृशस्तत्र देहेऽनात्मनि च क्वचित्॥ ३८ | संयोग तथा वियोग—ये दोनों ही दैवके अधीन होते हैं। शरीर तो आत्मासे भिन्न है, अतः उसके लिये शोक कैसा?॥ ३८॥ |
| ३९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राज्याद्यथा वने वासो वैदेह्या हरणं यथा।<br>तथा काले समीचीने संयोगोऽपि भविष्यति॥ ३९ | जिस प्रकार [प्रतिकूल समय आनेपर] राज्यसे निर्वासित होकर हमें वनवास भोगना पड़ा तथा सीताहरण हुआ, उसी प्रकार अनुकूल समय आनेपर संयोग भी हो जायगा॥ ३९॥ |
| प्राप्तव्यं सुखदुःखानां भोगान्निर्वर्तनं क्वचित्।<br>नान्यथा जानकीजाने तस्माच्छोकं त्यजाधुना॥ ४० | हे सीतापते! सुखों तथा दुःखोंके भोगसे छुटकारा कहाँ? वह तो निःसन्देह भोगना ही पड़ता है। अतः आप इस समय शोकका त्याग कर दीजिये॥ ४०॥ |
| वानराः सन्ति भूयांसो गमिष्यन्ति चतुर्दिशम्।<br>शुद्धिं जनकनन्दिन्या आनयिष्यन्ति ते किल॥ ४१<br><br>ज्ञात्वा मार्गस्थितिं तत्र गत्वा कृत्वा पराक्रमम्।<br>हत्वा तं पापकर्माणमानयिष्यामि मैथिलीम्॥ ४२ | बहुतसे वानर हैं; वे चारों दिशाओंमें जायँगे और जानकीकी खोज-खबर ले आयेंगे। [पता लग जानेपर] मार्गकी जानकारी करके मैं स्वयं वहाँ जाऊँगा और आक्रमण करके उस पापकर्मवाले रावणका वध करके जानकीजीको अवश्य ले आऊँगा॥ ४१-४२॥ |
| ससैन्यं भरतं वापि समाहूय सहानुजम्।<br>हनिष्यामो वयं शत्रुं किं शोचसि वृथाग्रज॥ ४३ | अथवा हे अग्रज! यदि इससे कार्य न चलेगा, तो मैं भरत तथा शत्रुघ्नको भी सेनासमेत बुला लूँगा और हमलोग उस शत्रुको मार डालेंगे; आप वृथा क्यों चिन्ता कर रहे हैं?॥ ४३॥ |
| रघुणैकरथेनैव जिताः सर्वा दिशः पुरा।<br>तद्वंशजः कथं शोकं कर्तुमर्हसि राघव॥ ४४ | पूर्वकालमें राजा रघुने केवल एक रथसे ही चारों दिशाओंको जीत लिया था। हे राघवेन्द्र! आप उसी वंशके होकर शोक क्यों कर रहे हैं?॥ ४४॥ |
| एकोऽहं सकलाञ्जेतुं समर्थोऽस्मि सुरासुरान्।<br>किं पुनः ससहायो वै रावणं कुलपांसनम्॥ ४५ | अकेला मैं सभी देवताओं तथा दानवोंको जीतनेमें समर्थ हूँ, तब फिर आप-जैसे सहायकके रहते उस कुलकलंकी रावणका वध करनेमें क्या कठिनाई है?॥ ४५॥ |
| जनकं वा समानीय साहाय्ये रघुनन्दन।<br>हनिष्यामि दुराचारं रावणं सुरकण्टकम्॥ ४६ | अथवा हे रघुनन्दन! मैं महाराज जनकको सहायताके लिये बुलाकर देवताओंके कण्टकस्वरूप उस दुराचारी रावणका वध कर डालूँगा॥ ४६॥ |
| सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम्।<br>चक्रनेमिरिवैकं तन्न भवेद्रघुनन्दन॥ ४७<br><br>मनोऽतिकातारं यस्य सुखदुःखसमुद्भवे।<br>स शोकसागरे मग्नो न सुखी स्यात्कदाचन॥ ४८ | हे रघुनन्दन! सुखके बाद दुःख तथा दुःखके बाद सुख पहियेकी धुरीकी तरह आया-जाया करते हैं। सदा एक स्थिति नहीं रहती। सुख-दुःखके आनेपर जिसका मन कातर हो जाता है, वह शोकसागरमें निमग्न रहता है और कभी सुखी नहीं रह सकता॥ ४७-४८॥ |
| इन्द्रेण व्यसनं प्राप्तं पुरा वै रघुनन्दन।<br>नहुषः स्थापितो देवैः सर्वैर्मघवतः पदे॥ ४९<br><br>स्थितः पङ्कजमध्ये च बहुवर्षगणानपि।<br>अज्ञातवासं मघवा भीतस्त्यक्त्वा निजं पदम्॥ ५० | हे राघव! पूर्वकालमें इन्द्रके ऊपर भी विपत्ति आयी थी, तब सभी देवताओंने उनके स्थानपर राजा नहुषको स्थापित कर दिया था। उस समय इन्द्रने भयवश अपना पद त्यागकर बहुत दिनोंतक कमलवनमें छिपकर अज्ञातवास किया था। समय बदलनेपर |
| अ० ३० ] | तृतीय स्कन्ध | ३९७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुनः प्राप्तं निजं स्थानं काले विपरिवर्तिते।<br>नहुषः पतितो भूमौ शापादजगराकृतिः॥ ५१<br><br>इन्द्राणीं कामयानस्तु ब्राह्मणानवमन्य च।<br>अगस्तिकोपात्सञ्जातः सर्पदेहो महीपतिः॥ ५२ | उन्होंने पुनः अपना पद प्राप्त कर लिया और नहुषको शापवश अजगरके रूपमें होकर पृथ्वीपर गिरना पड़ा। ब्राह्मणोंका अपमान करके इन्द्राणीको पानेकी इच्छाके कारण ही अगस्त्यमुनिके कोपपूर्वक शाप देनेसे राजा नहुष सर्पदेहवाले हो गये थे॥ ४९–५२॥ |
| तस्माच्छोको न कर्तव्यो व्यसने सति राघव।<br>उद्यमे चित्तमास्थाय स्थातव्यं वै विपश्चिता॥ ५३ | अतः हे राघव! दुःख आनेपर शोक नहीं करना चाहिये। विज्ञ पुरुषको चाहिये कि ऐसी परिस्थितिमें मनको उद्यमशील बनाकर समयकी प्रतीक्षा करता रहे॥ ५३॥ |
| सर्वज्ञोऽसि महाभाग समर्थोऽसि जगत्पते।<br>किं प्राकृत इवात्यर्थं कुरुषे शोकमात्मनि॥ ५४ | हे महाभाग! आप सर्वज्ञ हैं। हे जगत्पते! आप सर्वसमर्थ हैं; तब एक प्राकृत पुरुषकी भाँति आप अपने मनमें अत्यन्त शोक क्यों कर रहे हैं?॥ ५४॥ |
| व्यास उवाच<br>इति लक्ष्मणवाक्येन बोधितो रघुनन्दनः।<br>त्यक्त्वा शोकं तथात्यर्थं बभूव विगतज्वरः॥ ५५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार लक्ष्मणकी बातोंसे रघुनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको सान्त्वना मिली और वे शोक त्यागकर बिलकुल निश्चिन्त हो गये॥ ५५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे लक्ष्मणकृतरामशोकसान्त्वनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
अथ त्रिंशोऽध्यायः
श्रीराम और लक्ष्मणके पास नारदजीका आना और उन्हें नवरात्रव्रत करनेका परामर्श देना, श्रीरामके पूछनेपर नारदजीका उनसे देवीकी महिमा और नवरात्रव्रतकी विधि बतलाना, श्रीरामद्वारा देवीका पूजन और देवीद्वारा उन्हें विजयका वरदान देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| एवं तौ संविदं कृत्वा यावत्तूष्णीं बभूवतुः।<br>आजगाम तदाकाशान्नारदो भगवानृषिः॥ १ | इस प्रकार राम और लक्ष्मण परस्परमें परामर्श करके ज्यों ही चुप हुए, त्यों ही आकाशमार्गसे देवर्षि नारद वहाँ आ गये॥ १॥ |
| रणयन्महतीं वीणां स्वरग्रामविभूषिताम्।<br>गायन्बृहद्रथं साम तदा तमुपतस्थिवान्॥ २ | उस समय वे स्वर तथा ग्रामसे विभूषित अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए तथा बृहद्रथन्तर सामका गायन करते हुए उनके समीप पहुँचे॥ २॥ |
| दृष्ट्वा तं राम उत्थाय ददावथ वृषं शुभम्।<br>आसनं चार्घपाद्यञ्च कृतवानमितद्युतिः॥ ३ | उन्हें देखते ही अमित तेजवाले श्रीरामने उठकर उन्हें श्रेष्ठ पवित्र आसन प्रदान किया और तत्पश्चात् अर्घ्य तथा पाद्यसे उनकी पूजा की॥ ३॥ |
| पूजां परमिकां कृत्वा कृताञ्जलिरुपस्थितः।<br>उपविष्टः समीपे तु कृताज्ञो मुनिना हरिः॥ ४ | भलीभाँति पूजा करनेके बाद भगवान् श्रीराम हाथ जोड़कर खड़े हो गये और फिर मुनिके आज्ञा देनेपर उनके पास ही बैठ गये॥ ४॥ |
३१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० ---|--- उपविष्टं तदा रामं सानुजं दुःखमानसम्।<br>पप्रच्छ नारदः प्रीत्या कुशलं मुनिसत्तमः॥ ५ | तब अपने अनुज लक्ष्मणके साथ बैठे हुए खिन्न-मनस्क रामसे मुनीन्द्र नारदजी प्रेमपूर्वक कुशलक्षेम पूछने लगे॥ ५॥ कथं राघव शोकार्तो यथा वै प्राकृतो नरः।<br>हृतां सीतां च जानामि रावणेन दुरात्मना॥ ६<br><br>सुरसद्मगतश्चाहं श्रुत्वाञ्जनकात्मजाम्।<br>पौलस्त्येन हृतां मोहान्मरणं स्वमजानता॥ ७ | नारदजी बोले—हे राघव! आप इस समय साधारण मनुष्यके समान शोकाकुल क्यों हैं? मैं यह जानता हूँ कि दुष्ट रावण सीताको हर ले गया है। जब मैं देवलोकमें गया था, तभी मैंने वहाँ सुना कि अपनी मृत्युको न जाननेसे ही मोहके वशीभूत होकर रावणने जनकनन्दिनीका हरण कर लिया है॥ ६-७॥ तव जन्म च काकुत्स्थ पौलस्त्यनिधनाय वै।<br>मैथिलीहरणं जातमेतदर्थं नराधिप॥ ८ | हे काकुत्स्थ! आपका जन्म ही रावणके निधनके लिये हुआ है। हे नराधिप! इसी कार्यसिद्धिके लिये सीताका हरण हुआ है॥ ८॥ पूर्वजन्मनि वैदेही मुनिपुत्री तपस्विनी।<br>रावणेन वने दृष्टा तपस्यन्ती शुचिस्मिता॥ ९<br><br>प्रार्थिता रावणेनासौ भव भार्येति राघव।<br>तिरस्कृतस्तयासौ वै जग्राह कबरं बलात्॥ १० | पूर्वजन्ममें ये वैदेही एक मुनिकी तपस्विनी कन्या थीं। उस पवित्र मुसकानवाली कन्याको रावणने वनमें तप करते हुए देखा। हे राघव! तब रावणने उससे प्रार्थना की कि तुम मेरी पत्नी बन जाओ। इसपर उसके द्वारा तिरस्कृत किये गये रावणने बलपूर्वक उसके केश पकड़ लिये॥ ९-१०॥ शशाप तत्क्षणं राम रावणं तापसी भृशम्।<br>कुपिता त्यक्तुमिच्छन्ती देहं संस्पर्शदूषितम्॥ ११<br><br>दुरात्मंस्तव नाशार्थं भविष्यामि धरातले।<br>अयोनिजा वरा नारी त्यक्त्वा देहं जहावपि॥ १२ | हे राम! रावणके स्पर्शसे दूषित अपनी देहको त्यागनेकी आकांक्षा रखती हुई उस तापसी मुनिकन्याने अत्यन्त कुपित होकर उसे तत्काल यह घोर शाप दे दिया कि हे दुरात्मन्! तुम्हारे विनाशके लिये मैं भूतलपर गर्भसे जन्म न लेकर एक श्रेष्ठ स्त्रीके रूपमें प्रकट होऊँगी—ऐसा कहकर उस तापसीने अपना शरीर त्याग दिया॥ ११-१२॥ सेयं रंमांशसम्भूता गृहीता तेन रक्षसा।<br>विनाशार्थं कुलस्यैव व्याली स्रगिव सम्भ्रमात्॥ १३ | लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न यह सीता वही है; जिसे भ्रमवश माला समझकर नागिनको धारण करनेवाले व्यक्तिकी भाँति रावणने अपने ही वंशका नाश करनेके लिये हर लिया है॥ १३॥ तव जन्म च काकुत्स्थ तस्य नाशाय चामरैः।<br>प्रार्थितस्य हरेरंशादजवंशेऽप्यजन्मनः॥ १४ | हे काकुत्स्थ! आपका भी जन्म उसी रावणके नाशके लिये देवताओंके प्रार्थना करनेपर अनादि भगवान् विष्णुके अंशसे अजवंशमें हुआ है॥ १४॥ कुरु धैर्यं महाबाहो तत्र सा वर्ततेऽवशा।<br>सतीधर्मरता सीता त्वां ध्यायन्ती दिवानिशम्॥ १५ | हे महाबाहो! आप धैर्य धारण करें; वे किसी दूसरेके वशमें नहीं हो सकतीं! वे सतीधर्मपरायण सीता लंकामें दिन-रात आपका ध्यान करती हुई रह रही हैं॥ १५॥