ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
१७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अर्थान्तरे सङ्क्रमितमत्यन्तं वा तिरस्कृतम् । अविवक्षितवाच्यस्य ध्वनेर्वाच्यं द्विधा मतम् ॥ १ ॥ तथाविधाभ्यां च ताभ्यां व्यङ्ग्यस्यैव विशेषः । अर्थान्तर में सङ्क्रमित और अत्यन्त तिरस्कृत, इस रूप से अविवक्षितवाच्य ध्वनि का वाच्य दो प्रकार का माना गया है ॥ १ ॥ क्योंकि उन (दोनों प्रकार के वाच्यों) से व्यङ्ग्य का ही विशेष (उत्कर्ष) है। लोचनम् मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति भावः । सङ्क्रमितमिति णिचा व्यञ्जना व्यापारे यः सहकारिवर्गस्तस्यायं प्रभाव इत्युक्तं तिरस्कृतशब्देन च । येन वाच्येनाविवक्षितेन सताऽविवक्षितावाच्यो ध्वनिर्व्यपदिश्यते तद्वाच्यं द्विधेति सम्बन्धः । योऽर्थ उपपद्यमानोऽपि तावतैवानुपयोगाद्धर्मान्तरसंवलन- यान्यतामिव गतो लक्ष्यमाणोऽनुगतधर्मी सूत्रन्यायेनास्ते स रूपान्तरपरिणत उक्तः । यस्त्वनुपपद्यमान उपायतामात्रेणार्थान्तरप्रतिपत्तिं कृत्वा पलायत इव स तिरस्कृत इति । ननु व्यङ्ग्यात्मनो यदा ध्वनेर्भेदो निरूप्यते तदा वाच्यस्य द्विधेति भेदकथनं न सङ्गतमित्याशङ्क्याह—तथाविधाभ्यां चेति । चो यस्मा- कारिकाकार को भी सम्मत ही है। 'सङ्क्रमित' इस 'णिच्' प्रत्यय से और 'तिरस्कृत' शब्द से व्यञ्जना व्यापार में जो सहकारी वर्ग है उसका प्रभाव है, यह कहा¹ है। सम्बन्ध यह है कि जिस वाच्य के अविवक्षित होने से अविवक्षितवाच्य ध्वनि कहा जाता है वह वाच्य दो प्रकार का है। जो अर्थ उपपन्न होता हुआ भी, उतने ही अंश में उपयोग के न होने से धर्मान्तर के मिल जाने के कारण, दूसरा बना—जैसा मालूम पड़ता हुआ, धर्मी के अनुगत होने की स्थिति में सूत्र की भाँति, होता है, वह रूपान्तर-परिणत (अर्थान्तरसङ्क्रमित) कहा गया है। परन्तु जो कि अनुपपन्न होता हुआ, उपायमात्र होने के कारण (क्योंकि मुख्यार्थ का सम्बन्ध भी लक्षण का निमित्त है) दूसरे अर्थ की प्रतीति उत्पन्न करके जैसे पलायन कर जाता है, वह तिरस्कृत कहा जाता है। (शंका) जब कि व्यङ्ग्य रूप ध्वनि का भेद-निरूपण करते हैं, तब वाच्य का 'द्विधा' यह भेदकथन सङ्गत नहीं होता है, यह आशङ्का करके कहते हैं—उन दोनों प्रकार के—। 'च' 'और' का प्रयोग ('यस्मात्') य! १. वाच्य अर्थान्तर में सङ्क्रान्त नहीं होता, प्रत्युत सङ्क्रान्त कराया जाता है अर्थात् 'सङ्क्रमित' होता हैं, इस प्रकार यहाँ 'णिच्' प्रत्यय के प्रयोग से प्रयोजक कर्ता की अपेक्षा है, यहाँ प्रयोजक कर्ता है व्यञ्जना-व्यापार में सहकारिवर्ग, अर्थात् लक्षणा और वक्ता की विवक्षा आदि। बिना इनकी सहायता से वाच्य अर्थान्तर में सङ्क्रान्त नहीं होता। यही स्थिति 'तिरस्कृत' शब्द की भी है। प्रस्तुत अविवक्षित वाच्य ध्वनि को इसी कारण 'लक्षणामूल ध्वनि' भी कहते हैं। लक्षणा के आधार पर ही अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ये दो भेद
द्वितीय उद्योतः १७५ ध्वन्यालोकः तत्रार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यो यथा— स्निग्धश्यामलकान्तिलिप्तवियतो वेल्लद्बलाका घना वाताः शीकरिणः पयोदसुहृदामानन्दकेकाः कलाः। अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य, जैसे— स्निग्ध एवं श्यामल कान्ति से आकाश को लिप्त कर देने वाले और वेल्लित होती हुई बकपङ्क्तियों वाले मेघ, फुहारों वाले वायु और मेघ के साथ मयूरों की अव्यक्त- लोचनम् दर्थे। व्यञ्जकवैचित्र्याद्धि युक्तं व्यङ्ग्यवैचित्र्यमिति भावः। व्यञ्जके त्वर्थे यदि ध्वनिशब्दस्तदा न कश्चिद्दोष इति भावः। भेदप्रतिपादकेनैवान्वर्थनाम्ना लक्षणमपि सिद्धमित्यभिप्रायेणोदाहरणमे- वाह—अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यो यथेति। अत्र श्लोके रामशब्द इति सङ्गतिः। स्निग्धया जलसम्बन्धसरसया श्यामलया द्रविडवनितोचितासितवर्णया कान्त्या चाकचक्येन लिप्तमाच्छुरितं वियन्नभो यैः। वेल्लन्त्यो विजृम्भमाणास्तथा चलन्त्यः परभागवशात्प्रहर्षवशाच्च बलाकाः सितपक्षिविशेषा येषु त एवंविधा 'क्योंकि' के अर्थ में है। भाव यह कि व्यञ्जक के वैचित्र्य से व्यङ्ग्य का वैचित्र्य बनता है। परन्तु यदि व्यञ्जक के अर्थ में 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग हो, तब कोई दोष नहीं। भेद का प्रतिपादन करने वाले यथार्थ नाम से लक्षण भी सिद्ध हो गया है, इस अभिप्राय से उदाहरण को ही कहते हैं—अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य, जैसे—। इस श्लोक में 'राम' 'शब्द' है, यह सङ्गति है। स्निग्ध अर्थात् जल के सम्बन्ध के कारण सरस, श्यामल अर्थात् द्रविड़ देश की स्त्रियों के समान वर्ण वाली कान्ति अर्थात् चाकचिक्य या चमक उससे लिप्त अर्थात् आच्छुरित आकाश है जिन मेघों से। वेल्लित होती हुई अर्थात् विजृम्भमाण तथा परभाग के कारण (मेघों के श्याम वर्ण होने और अपने सित वर्ण होने के कारण) और प्रहर्ष के कारण चलती हुई बलाकायें होते हैं। इसे स्पष्ट समझने के लिए प्रस्तुत में 'लक्षणा' के सम्बन्ध में कुछ और भी विदित करना आवश्यक है। कहा जा चुका है कि 'लक्षणा' शब्द की वह आरोपित शक्ति है जिससे मुख्यार्थ के बाध, मुख्यार्थ के योग एवं रूढ़ि अथवा प्रयोजन में अन्यतर के होने पर अन्य अर्थ लक्षित होता है। यह लक्षणा दो प्रकार की है—उपादान लक्षणा और लक्षणलक्षणा। जहाँ अपनी सिद्धि के लिए दूसरे का आक्षेप होता है वह उपादान लक्षणा और जहाँ दूसरे अर्थ की सिद्धि के लिए अपने अर्थ का त्याग (समर्पण) होता है वह लक्षणलक्षणा है। 'कुन्ताः प्रविशन्ति' यह उपादानलक्षणा है, क्योंकि कुन्त अपने प्रवेश की सिद्धि के लिये कुन्तधारी पुरुषों का आक्षेप करते हैं। 'गङ्गायां घोषः' यह उदाहरण लक्षणलक्षणा का है, क्योंकि आधाराधेयभाव की सिद्धि के लिए यहाँ 'गङ्गा' शब्द अपने अर्थ का त्याग कर देता है। इस प्रकार पहले में कुन्तधारियों के आक्षेप से एवं दूसरे में 'गङ्गा' के प्रवाह रूप अर्थ के त्याग से अन्वयानुपपत्ति दूर होती है। ये दोनों लक्षणा के भेद क्रमशः
१७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कामं सन्तु दृढं कठोरहृदयो रामोऽस्मि सर्वं सहे वैदेही तु कथं भविष्यति हहा हा देवि धीरा भव ॥ मधुर केका, ये सब जितना चाहें खूब हों, मैं तो राम हूँ, सब कुछ सहन करता हूँ, परन्तु विदेहपुत्री सीता कैसे होगी ? हा हा, देवि, तुम धैर्य धारण करो । लोचनम् मेघाः । एवं नभस्तावद् दुरालोकं वर्तते । दिशोऽपि दुःसहाः । यतः सूक्ष्मजल- कणोद्गारिणो वाता इति मन्दमन्दत्वमेषामनियतदिगागमनं च बहुवचनेन सूचितम् । तर्हि गुहासु क्वचित्प्रविश्यास्यतामित्यत आह—पयोदानां ये सुहृद- स्तेषु च सत्सु ये शोभनहृदया मयूरास्तेषामानन्देन हर्षेण कलाः षड्जसंवा- दिन्यो मधुराः केकाः शब्दविशेषाः ताश्च सर्वं पयोदवृत्तान्तं दुस्सहं स्मारयन्ति; स्वयं च दुस्सहा इति भावः । एवमुद्दीपनविभावोद्बोधितविप्रलम्भः परस्पराधि- ष्ठानत्वादृतेः विभावानां साधारणतामभिमन्यमानः इत एव प्रभृति प्रियतमां हृदये विधायैव स्वात्मवृत्तान्तं तावदाह—कामं सन्विति । दृढमिति सातिश- यम् । कठोरहृदय इति । रामशब्दार्थध्वनिविशेषावकाशदानाय कठोरहृदयपदम् । अर्थात् उज्ज्वल पांखों वाली बकपंकतियां जिनमें हैं वे, इस प्रकार के मेघ । इस प्रकार आकाश बिलकुल दिखाई नहीं देता है और दिशाएं भी दुःसह हो रही हैं । क्योंकि जब जल में फुहारों को फैलाने वाले वायु हैं, यह कह कर उनका मन्द-मन्द और अनियत दिशा से आगमन को 'बहुवचन' द्वारा सूचित किया । ऐसी स्थिति में कहीं कन्दराओं में घुस कर बैठना चाहिए, इस कारण से कहते हैं—मेघों के जो मित्र हैं, उनके विद्यमान होने पर जो शोभनहृदय वाले मयूर हैं उनके आनन्द या हर्ष से षड्ज- कायें स्वर से मेल खाती हुई अव्यक्त-मधुर के मांस ( शब्द-विशेष ), वे मेघ के समस्त दुःसह वृत्तान्त को याद दिलाती हैं और स्वयं दुःसह हैं, यह भाव है । इस प्रकार उद्दीपन विभाव के कारण विप्रलम्भ के उद्बोधित हो जाने पर एक-दूसरे नायक-नायिका में अधिष्ठित रति के होने से विभावों के साधारण्य को मानते हुए ( नायक ) यहाँ से ही लेकर प्रियतमा को हृदय में रखकर ही अपना वृतान्त कहता है—जो चाहे हो—। दृढ अर्थात् बहुत कुछ । कठोर हृदय वाला— । 'राम' शब्द के अर्थ को ध्वनि-विशेष के अवकाश देने के लिए 'कठोर हृदय' पद को रखा है । जैसे 'तद्गेहम्' यह कहकर भी
अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्य और अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनियों के मूल में होते हैं । पहले में आक्षेप अर्थात् अर्थान्तर में सङ्क्रमण और दूसरे में अपना त्याग ( तिरस्कार ) होता है । इस प्रकार 'सङ्क्रमित' इस णिजन्त प्रयोग से व्यञ्जना की सहकारिणी लक्षणा के प्रभाव को ग्रन्थकार ने सूचित किया है, यह लोचनकार के कथन का तात्पर्य है । आगे दोनों ध्वनियों के उदाहरणों से यह विषय और भी स्पष्ट हो जायगा । स्वयं लोचनकार ने दोनों ध्वनियों के स्वरूप को कण्ठोक्त कर दिया है ।
द्वितीय उद्योतः १७७ ध्वन्यालोकः इत्यत्र रामशब्दः । अनेन हि व्यङ्ग्यधर्मान्तरपरिणतः सञ्ज्ञी प्रत्याय्यते, न संज्ञिमात्रम् । यह 'राम' शब्द । इस ( 'राम' शब्द ) से व्यञ्जित होते हुए दूसरे धर्म से परिणत व्यक्ति प्रतीत कराया जाता है, केवल व्यक्ति नहीं । लोचनम् यथा 'तद्गेहम्' इत्युक्तेऽपि 'नतभित्ति' इति । अन्यथा रामपदं दशरथकुलोद्भव- त्वकौसल्यास्नेहपात्रत्वबाल्यचरितजानकीलाभादिधर्मान्तरपरिणतमर्थं कथं न ध्वनेदिति । अस्मीति । स एवाहं भवामीत्यर्थः । भविष्यतीति क्रियासामान्यम् । तेन किं करिष्यतीत्यर्थः । अथ च भवनमेवास्या असम्भाव्यमिति । उक्तप्रका- रेण हृदयनिहितां प्रियां स्मरणशब्दाविकल्पपरस्परया प्रत्यक्षीभावितां हृदयस्फो- टनोन्मुखीं ससंभ्रममाह—हहा हेति । देवीति । युक्तं तव धैर्यमित्यर्थः । अनेनेति । रामशब्देनानुपयुज्यमानार्थेनेति भावः । व्यङ्ग्यं धर्मान्तरं प्रयोजन- रूपं राज्यनिर्वासनाद्यसङ्ख्येयम् । तच्चासङ्ख्यत्वादभिधाव्यापारेणाशक्यसम- र्पणम् । क्रमेणार्प्यमाणमप्येकधीविषयभावाभावान्न चित्रचर्वणापदमिति न चारुत्वातिशयकृत् । प्रतीयमानं तु तदसङ्ख्यमनुद्भिन्नविशेषत्वेनैव किं किं रूपं न सहत इति चित्रपानकरसापूपगुडमोदकस्थानीयविचित्रचर्वणापदं भवति । यथोक्तम्—'उक्त्यन्तरेणाशक्यं यत्' इति । एष एव सर्वत्र प्रयोजनस्य प्रतीय- 'नतभित्ति' कहा है । अन्यथा 'राम' पद दशरथ के कुल में उत्पन्न होना, कौसल्या के स्नेह का पात्र होना, बाल्यचरित और जानकीलाभ आदि धर्मान्तर में परिणत अर्थ को कैसे नहीं ध्वनित करता ! 'हूँ' अर्थात् वही मैं हूँ । 'होगी' यह क्रिया सामान्य है, इससे अर्थ है कि फिर क्या करेगी ? और ऐसी स्थिति में उसका होना ( अस्तित्व ) ही असम्भव हो जायगा । कहे प्रकार के अनुसार ( मेघ आदि उद्दीपकों का प्रियतमा के पास भी होने का ) स्मरण, ( 'वैदेही' यह ) शब्द ओर 'कैसे होगी' यह विकल्प या वितर्क, इन सबों की परम्परा से प्रत्यक्ष हुई एवं हृदय के स्फोटनार्थ उन्मुख प्रियतमा से सम्भ्रम-सहित कहते हैं—हा हा देवि— । अर्थात् तुम्हें धैर्य धारण करना ठीक है । इससे— । भाव यह कि जिसका अर्थ उपयोग में नहीं आ रहा है ऐसे 'राम' शब्द से । व्यङ्ग्य धर्मान्तर अर्थात् राज्य से निर्वासन आदि असङ्ख्येय प्रयोजन रूप धर्मान्तर । और वह असंख्य होने के कारण अभिधाव्यापार से समर्पित ( अवगत ) होना सम्भव नहीं । क्रम से अर्प्यमाण ( अवगत ) होने पर भी, एक बुद्धि की विषयता के अभाव में चित्र ( विलक्षण ) चर्वणा के स्थान ( विषय ) को नहीं पहुँच सकता, ऐसी स्थिति में अतिशय चारुत्व को नहीं करता है । परन्तु वह असङ्ख्य प्रतीयमान अनुद्भिन्न होने की विशेषता के कारण ही क्या-क्या रूप नहीं सहन ( धारण ) करता ? इस प्रकार वह चित्रपानकरस, अपूप, गुड़ और मोदक की भाँति विचित्र चर्वणा का पद ( अधिष्ठान ) १२ ध्व०
१७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा च ममैव विषमबाणलीलायाम्— ताला जाअन्ति गुणा जाला दे सहिअएहिं घेप्पन्ति । रइकिरणानुग्गहिआइँ होन्ति कमलाइँ कमलाइँ ॥ ( तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहृदयैर्गृह्यन्ते । रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ॥ इति च्छाया) इत्यत्र द्वितीयः कमलशब्दः । और जैसे, मेरा ही ( उदाहरण श्लोक ) 'विषमबाणलीला' में— तब गुण होते हैं जब सहृदय लोग ग्रहण करते हैं, सूर्य की किरणों से अनुगृहीत होकर ही कमल कमल होते हैं । यहाँ दूसरा 'कमल' शब्द । लोचनम् मानत्वेनोत्कर्षहेतुर्मन्तव्यः । मात्रग्रहणेन संज्ञी नात्र तिरस्कृत इत्याह । यथा चेत्यादि । ताला तदा । जाला यदा । घेप्पन्ति गृह्यन्ते । अर्थान्तरन्यासमाह— रविकिरणेति । कमलशब्द इति । लक्ष्मीपात्रत्वादिधर्मान्तरशतचित्रतापरिणतं संज्ञिनमाहेत्यर्थः । तेन शुद्धेऽर्थे मुख्ये बाधानिमित्तं तत्रार्थे तद्धर्मसमवायः । तेन निमित्तेन रामशब्दो धर्मान्तरपरिणतमर्थं लक्षयति । व्यङ्ग्यान्यसाधारणा- न्यशब्दवाच्यानि धर्मान्तराणि । एवं कमलशब्दः । गुणशब्दस्तु संज्ञिमात्रमा- हेति । तत्र यद्बलात्कैश्चिदारोपितं तदप्रातीतिकम् । अनुप्रयोगबाधितो ह्यर्थोऽस्य ध्वनेर्विषयो लक्षणा मूलं ह्यस्य । होता है । जैसा कि कहा है—दूसरी उक्ति से अशक्य जिस चारुत्व को०— । प्रयोजन के प्रतीयमान होने के कारण उत्कर्ष का हेतु इसे ( अर्थात् विचित्र चर्वणा विषयत्व ) ही मानना चाहिए । 'मात्र' ग्रहण से कहते हैं कि संज्ञी (राम) यहाँ तिरस्कृत नहीं है । और जैसे— । ताला तब । जाला जब । घेप्पन्ति ग्रहण किए जाते हैं ( सामान्य के समर्थन रूप ) 'अर्थान्तरन्यास' को कहते हैं—सूर्य की किरणों से— । 'कमल' शब्द— । अर्थात् लक्ष्मी या शोभा का पात्रत्व—आश्रय होना आदि धर्मान्तरों की सैकड़ों विचित्रताओं में परिणत संज्ञावान् ( कमल ) को कहता है । इस लिए शुद्ध मुख्य अर्थ में बाधा का कारण उस अर्थ में (अर्थात् 'राम' पद के मुख्यार्थ के धर्मी राम में ) उन धर्मों का समवाय (सम्बन्ध) है । उस निमित्त से 'राम' शब्द धर्मान्तर में परिणत अर्थ को लक्षित करता है । असाधारण एवं अशब्दवाच्य धर्मान्तर ( निर्वेद, ग्लानि आदि )—व्यङ्ग्य हैं । इसी प्रकार 'कमल' शब्द है । ( दूसरे श्लोक में ) 'गुण' शब्द केवल संज्ञी को अभिहित करता है । उक्त उदाहरणों में जो बल-पूर्वक कुछ
द्वितीय उद्योतः १७९ लोचनम् यत्तु हृदयदर्पण उक्तम्—‘हहा हेति संरम्भार्थोऽयं चमत्कारः’ इति । तत्रापि संरम्भः आवेगो विप्रलम्भव्यभिचारीति रसध्वनिस्तावदुपगतः । न च राम- शब्दाभिव्यक्तार्थसाहायकेन विना संरम्भोल्लासोऽपि । अहं सहे तस्याः किं वर्तत इत्येवमात्मा हि संरम्भः । कमलपदे च कः संरम्भ इत्यास्तां तावत् । अनुपयोगात्मिका च मुख्यार्थबाधात्रास्तीति लक्षणामूलत्वादविवक्षितवाच्यभेद- लोगों ने आरोप करके कहा है', वह प्रतीतिसिद्ध नहीं । क्योंकि अनुपयोग रूप बाधा के कारण अर्थ रस ध्वनि का विषय होता है, उसका मूल लक्षणा है । जो कि ‘हृदयदर्पण' में कहा है—‘हहा हा' यह ‘संरम्भ’२ के अर्थ में यह चमत्कार व्यक्त किया है ।’ वहाँ भी संरम्भ या आवेग विप्रलम्भ का व्यभिचारी है इस प्रकार ‘रसध्वनि' स्वीकार किया है । ‘राम’ शब्द से अभिव्यक्त अर्थों की सहायता के बिना संरम्भ का उल्लास भी नहीं होगा । ‘मैं तो सह लेता हूँ' परन्तु उसका क्या होगा ? इस प्रकार का संरम्भ है । ‘कमल’ पद में कौन ‘संरम्भ’ है ? अतः इसे रहने दीजिए ! अनुपयोगरूप मुख्यार्थ बाधा यहाँ है, इस लिए लक्षणामूल होने के कारण इसका अविवक्षितवाच्य ध्वनि का भेद होना उपपन्न ही है क्योंकि शुद्ध ( मुख्य अर्थ ) की १. जैसा कि प्रस्तुत उदाहरणों में ‘राम' शब्द और ‘कमल’ शब्द अनुपयुक्त होने के कारण बाधितार्थ होकर लक्षणा के द्वारा धर्मान्तर में परिणत अर्थ को लक्षित करते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि व्यञ्जित होते-होते सभी धर्मान्तरों को लक्षणा के द्वारा ही प्रतीत किया जाय । कुछ लोगों ने बलात् लक्षणा द्वारा ही प्रतीत करने की कोशिश की थी । किन्तु यह प्रकार सहृदय जनों की प्रतीति के विरुद्ध है । कारण यह है कि लक्षणा से एक ही धर्म से अन्वित की प्रतीति हो सकती है, क्योंकि लक्षणा की इसी अंश में सार्थकता है कि वह शब्द के ‘अनुपयोग’ को हटा दे और उपयुक्त अर्थ को प्रस्तुत कर दे । किन्तु लक्षणा द्वारा उपयुक्त अर्थ के प्रतीत होने के पश्चात् भी जब अनेक धर्मान्तर प्रतीत होने लगते हैं तब उन्हें भी विरत-व्यापार लक्षणा का विषय किसी प्रकार नहीं माना जा सकता । अतः यहाँ अनेक धर्मान्तरों को प्रस्तुत अविवक्षितवाच्यध्वनि का विषय मानते हैं, जिसका मूल लक्षणा है । इस प्रकार लक्षणा यहाँ सहकारिणी शक्ति है । २. ‘हहा हा’ इस चमत्कार के प्रयोग से संरम्भ या आवेग व्यक्त होता है । यही श्लोक का विशेष लक्ष्य है । यह बात ‘हृदयदर्पण’ में कही गई है । इसका यह अभिप्राय है कि जो यहाँ ‘राम’ शब्द की व्यञ्जकता की चर्चा है वह अनावश्यक है । इस पर लोचनकार का कहना है कि जो यहाँ ‘संरम्भ’ या आवेग का आप अनुभव करते हैं, वह भी तो विप्रलम्भ-शृङ्गार का व्यभिचारी है ! अतः आप ने स्वयं ‘रसध्वनि' को स्वीकार कर लिया है । और साथ ही, यह संरम्भ भी ‘राम’ शब्द से अभिव्यक्त अर्थों की सहायता के बिना उल्लसित नहीं होगा । क्योंकि राम में आवेग तभी आ सकता है जब वह अपनी समर्थता को और सीता की असमर्थता को अनुभव करेंगे । अतः ‘राम’ पद की व्यञ्जना यह ‘संरम्भ’ के उल्लास की सहायिका है । और, माना कि यह यहाँ ‘संरम्भ’ है किन्तु दूसरे उदाहरण के ‘कमल’ पद में कौन सा ‘संरम्भ’ है ? अन्ततः यह मानना ही पड़ेगा । कि इन उदाहरणों में अनुपयोगात्मक मुख्यार्थ बाधा है, अतः लक्षणामूलक अविवक्षितवाच्य ध्वनि का यह अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य रूप एक भेद है । यहाँ ‘राम’ और ‘कमल’ शब्द के केवल शुद्ध या वाच्य अर्थ की विवक्षा ही नहीं ।
१८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यो यथादिकवेर्वाल्मीकेः— रविसंक्रान्तसौभाग्यस्तुषारावृतमण्डलः । निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते ॥ इति । अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य, जैसे आदिकवि वाल्मीकि का— सूर्य में जिसका सौभाग्य संक्रान्त हो गया है, एवं तुषार से जिसका मण्डल ढँक गया है, ऐसा चन्द्रमा निःश्वास से अन्ध आइने की भांति प्रकाशवान् नहीं है। लोचनम् तास्योपपन्नैव, शुद्धार्थस्याविवक्षणात् । न च तिरस्कृतत्वं धर्मिरूपेण, तस्यापि तावत्यनुगमात् । अत एव च परिणतवाचोयुक्त्या व्यवहृतम्–आदिकवेरिति । ध्वनेर्लक्ष्यप्रसिद्धतामाह–रवीति । हेमन्तवर्णने पञ्चवट्यां रामस्योक्तिरियम् । अन्ध इति चोपहतदृष्टिः । जात्यन्धस्यापि गर्भे दृष्ट्युपघातात् । अन्धोऽयं पुरोऽपि न पश्यतीत्यत्र तिरस्कारोऽन्धार्थस्य न त्वत्यन्तम् । इह त्वादृशस्यान्ध- त्वमारोप्यमाणमपि न सह्यमिति । अन्धशब्दोऽत्र पदार्थस्फुटीकरणाशक्तत्वं नष्टदृष्टिगतं निमित्तीकृत्यादर्शं लक्षणया प्रतिपादयति । असाधारणविच्छायत्वा- नुपयोगित्वादिधर्मजातमसंख्यं प्रयोजनं व्यनक्ति । भट्टनायकेन तु यदुक्तम्— विवक्षा यहाँ नहीं है। (अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनि में) धर्मी (व्यक्ति) रूप से तिरस्कार नहीं है, क्योंकि उस धर्मी (व्यक्ति) का भी अनुगम (ज्ञान) होता है। इसीलिए 'परिणत' इस वाचोयुक्ति से व्यवहार किया है। आदिकवि— । 'ध्वनि' की लक्ष्य में प्रसिद्धि को कहते हैं—सूर्य— । हेमन्तवर्णन के प्रसङ्ग में पञ्चवटी में राम की यह उक्ति है। 'अन्ध' अर्थात् जिसकी दृष्टि नष्ट हो गई हो। क्योंकि जो जात्यन्ध होता है, उसकी भी दृष्टि का गर्भ में उपघात (नाश) हो जाता है। 'यह अन्धा आगे भी नहीं देखता है' इस कथन में 'अन्ध' शब्द के अर्थ का तिरस्कार है, किन्तु अत्यन्त रूप से (तिरस्कार) नहीं है। किन्तु यहाँ आइने का अन्धत्व आरोप्यमाण होकर भी सह्य नहीं। यहाँ 'अन्ध' शब्द नष्टदृष्टि पुरुष में रहने वाले किसी पदार्थ के स्फुटीकरण में अशक्यत्वरूप धर्म को निमित्त करके, आदर्श की लक्षणा से प्रतिपादन करता है; इस प्रकार असाधारण छायाहीनत्व और अनुपयोगित्व आदि असङ्ख्य धर्म-समूह रूप प्रयोजन को (वह) व्यक्त करता है। परन्तु भट्टनायक ने जो कहा है—'इव' शब्द के योग के कारण गौणता' (गौणी १. 'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' का यह अर्थ नहीं है कि धर्मी का तिरस्कार होता है, बल्कि लक्ष्य और व्यङ्ग्य अर्थों के ज्ञान में धर्मी का भी ज्ञान अनुप्रविष्ट होता है, अतः 'तिरस्कार' धर्म का ही अभीष्ट है, न कि धर्मी का। इसी लिए 'परिणतः' शब्द का प्रयोग आचार्य ने किया है, अर्थात् धर्मी स्वयं स्थित रहता हुआ अनेक व्यङ्ग्य धर्मान्तरों से परिणत रूप में प्रतीत होता है। २. अन्धा वह होता है जिसकी दोनों आँखें फूट गई हों और जो जन्मान्ध होता है उसकी
द्वितीय उद्योतः १८१
ध्वन्यालोकः
अत्रान्धशब्दः ।
गअणं च मत्तमेहं धाराळुलिअज्जणाईं अ वणाईं ।
णिरहङ्कारमिअङ्का हरन्ति नीलाओ वि णिसाओ ॥
अत्र मत्तणिरहङ्कारशब्दौ ॥ १ ॥
यहाँ 'अन्ध' शब्द ।
मत्त मेघों से भरा आकाश भी, धारावृष्टि से कम्पित अर्जुन वृक्षों वाले वन भी
और निरहङ्कार चन्द्रवाली काली रातें भी मन को हर लेती हैं ॥
यहाँ 'मत्त' और 'निरहङ्कार' शब्द ।
लोचनम्
‘इवशब्दाप्रयोगाद् गौणताप्यत्र न काचित्’ इति, तच्छ्लोकार्थमपरामृश्य । आद-
र्शचन्द्रमसोर्हि सादृश्यमिवशब्दो द्योतयति । निःश्वासान्ध इति चादर्शविशेष-
णम् । इवशब्दान्धार्थेन योजने आदर्शश्चन्द्रमा इत्युदाहरणं भवेत् । योजनं
चैतदिवशब्दस्य क्लिष्टम् । न च निःश्वासेनान्ध इवादर्शः स इव चन्द्र इति
कल्पना युक्ता । जैमिनीये सूत्रे ह्येवं योज्यते न काव्येऽपीत्यलम् । गअणमिति ।
लक्षणा) भी यहाँ नहीं सम्भव है', वह श्लोकार्थ को विचार करके नहीं (कहा है)।
आदर्श (आइना) और चन्द्रमा इन दोनों का सादृश्य 'इव' शब्द द्योतित करता है।
और 'निःश्वासान्ध' यह आदर्श (आइना) का विशेषण है। 'इव' शब्द को 'अन्ध'
अर्थ के साथ जोड़ने में 'आदर्श रूप चन्द्रमा' यह उदाहरण होगा। लेकिन 'इव' शब्द का
यह योजना क्लिष्ट है। 'निःश्वास से अन्ध के समान आदर्श और उसके समान चन्द्रमा'
यह कल्पना भी ठीक नहीं । 'जैमिनीयसूत्र' में इस प्रकार योजना होती है, न कि
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आँखें गर्भ में ही फूट गई होती हैं। किन्तु आदर्श का अन्धत्व कदापि सम्भव नहीं, यदि आदर्श
पर अन्धत्व का आरोप भी किया जाय तब भी सह्य नहीं। अतः इस अर्थ का तिरस्कार कर देते हैं
और जिसके पास आँखें नहीं होती हैं वह किसी भी पदार्थ को नहीं स्पष्ट कर सकता इस पदार्थ-
स्फुटीकरणाशक्यत्व रूप अर्थ को निमित्त करके वही 'अन्ध' शब्द आदर्श को लक्षणा से बोधन
करता है। इस प्रकार यहाँ छायाहीनत्व, अनुपयोगित्व आदि अनेक धर्मसमूह प्रयोजन के रूप
में प्रतीयमान हैं। यहाँ 'अन्ध' शब्द के अर्थ के तिरस्कृत हो जाने के कारण प्रस्तुत ध्वनि को
'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' कहा है।
भट्टनायक ने 'अन्ध' अर्थ के से 'इव' शब्द को जोड़ कर यहाँ गौणी लक्षणा का भी निषेध
किया है। क्योंकि आदर्श अन्धा के समान हो ही सकता है, ऐसी स्थिति में मुख्यार्थ-बाध न होने
के कारण लक्षणा का प्रसंग नहीं होगा। किन्तु उन्होंने श्लोक के अर्थ का विचार नहीं किया है।
यहाँ 'निःश्वासान्ध' शब्द आदर्श का विशेषण है, ऐसी स्थिति में 'इव' का योग उसके साथ नहीं
होगा, यदि करते हैं तो यह योजना क्लिष्ट एवं अनुपयुक्त है। ऐसी कल्पना तो भट्टनायक अपने
'मीमांसा शास्त्र' में ही करें तो अच्छा है, काव्य में इसे अच्छा नहीं समझा जाता। अतः यहाँ
१८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् गगनं च मत्तमेघं धारालुलितार्जुनानि च वनानि । निरहङ्कारमृगाङ्का हरन्ति नीला अपि निशाः ॥ इति च्छाया । चशब्दोऽपिशब्दार्थे । गगनं मत्तमेघमपि न केवलं तार- कितम् । धारालुलितार्जुनवृक्षाण्यपि वनानि न केवलं मलयमारुतान्दोलितसह- काराणि । निरहङ्कारमृगाङ्का नीला अपि निशा न केवलं सितकरकरधवलिताः । हरन्ति उत्सुकयन्तीत्यर्थः । मत्तशब्देन सर्वथैवेहासम्भवत्स्वार्थेन बाधितमद्यो- पयोगक्षीबात्मकमुख्यार्थेन सादृश्यान्मेघाँल्लक्षयताऽसमञ्जसकारित्वदुर्निवारत्वा- दिधर्मसहस्रं ध्वन्यते । निरहङ्कारशब्देनापि चन्द्रं लक्षयता तत्पारतन्त्र्यविच्छा- यत्वोज्जिगमिषारूपजिगीषात्यागप्रभृतिः ॥ १ ॥ अविवक्षितवाच्यस्य प्रभिन्नत्वमिति यदुक्तं तत्कृतः ? न हि स्वरूपादेव भेदो भवतीत्याशङ्क्य विवक्षितवाच्यादेवाश्य भेदो भवति, विवक्षा तदभावयो- काव्य में भी— । अलम् । आकाश— । 'और' ( च ) शब्द 'भी' ( अपि ) शब्द के अर्थ में है । मतवाले मेघों वाला भी आकाश, न केवल तारों भरा । धारावृष्टि से कम्पित अर्जुन वृक्षों वाले वन, न केवल मलयमारुत से कम्पित सहकार वृक्षों वाले । अहङ्कार- हीन चन्द्रवाली काली भी रातें, न केवल चन्द्र की किरणों से धवलित । हर लेती हैं अर्थात् उत्सुक करती हैं । यहाँ 'मत्त'१ शब्द, जिसका अर्थ सर्वथा ही सम्भव नहीं हो रहा है और जिसका मुख्य अर्थ मद्य ( मदिरा ) के उपयोग से क्षीब ( पागल ) रूप होने के कारण बाधित है, सादृश्य सम्बन्ध से मेघों को लक्षित कर रहा है, जिससे असमञ्जसकारित्व दुर्निवारत्व आदि हजारों धर्म ध्वनित होते हैं । चन्द्र को लक्षित करता हुआ 'निरहङ्कार' शब्द भी उसमें पारतन्त्र्य, छायाहीनत्व, उदय लेने की इच्छा रूप जिगमिषा का त्याग प्रभृति को ध्वनित करता है ॥ १ ॥ जो कि ( आरम्भ के वृत्तिग्रन्थ में ) 'अविवक्षितवाच्य का प्रभेद' यह कहा है वह कैसे ? क्योंकि स्वरूप से ही ( स्वयं अपने से ही अपना ) भेद नहीं होता, ऐसी आशङ्का करके इस अभिप्राय से, कि विवक्षितवाच्य से ही इस ( अविवक्षितवाच्य ) का भेद है, क्योंकि विवक्षा के भाव और अभाव दोनों का विरोध है, कहते हैं— लक्षणा सर्वथा उपपन्न है । तात्पर्य यह कि 'इव' शब्द 'चन्द्रमा' के साथ अन्वित होगा । यहाँ चन्द्रमा आदर्श के समान है, न कि अन्ध के समान आदर्श है । इस प्रकार 'अन्ध' शब्द अपने वाच्यार्थ के बाधित होने पर लक्षणा से आदर्श का बोधन करता है और प्रयोजन रूप छायाहीनत्व आदि अनेक धर्म प्रतीयमान होते हैं । १. 'मत्त' और 'अहङ्कार' के मुख्य अर्थ प्रस्तुत में अनुपपन्न हैं, क्योंकि मेघ तो जड़ है मत्त कैसे होगा और चन्द्रमा भी अहङ्कार कैसे करेगा ? इस प्रकार ये शब्द सादृश्य से लक्षणा द्वारा क्रमशः मेघ और चन्द्र को लक्षित करते हैं और तब उनसे अनेक निर्दिष्ट धर्म प्रतीयमान होते हैं । यहाँ भी मुख्यार्थ का तिरस्कार है ।
द्वितीय उद्योतः १८३
ध्वन्यालोकः
असंलक्ष्यक्रमोद्द्योतः क्रमेण द्योतितः परः ।
विवक्षिताभिधेयस्य ध्वनेरात्मा द्विधा मतः ॥ २ ॥
मुख्यतया प्रकाशमानो व्यङ्ग्योऽर्थो ध्वनेरात्मा । स च वाच्यार्था-
पेक्षया कश्चिदलक्ष्यक्रमतया प्रकाशते, कश्चित्क्रमेणेति द्विधा मतः ॥२॥
तत्र
रसभावतदाभासतत्प्रशान्त्यादिरक्रमः ।
ध्वनेरात्माङ्गिभावेन भासमानो व्यवस्थितः ॥ ३ ॥
जिसका अभिधेय विवक्षित है, ऐसा ध्वनि दो प्रकार का होता है, एक वह जिसके
व्यङ्ग्य का क्रम संलक्षित नहीं होता है, दूसरी वह जिसके व्यङ्ग्य का क्रम संलक्षित
होता है ॥ २ ॥
मुख्य रूप से प्रकाशमान व्यङ्ग्य अर्थ ध्वनि का आत्मा है । वह कोई वाच्य अर्थ
की अपेक्षा अलक्ष्यक्रम रूप से प्रकाशित होता है और कोई क्रम से, इस प्रकार दो
प्रकार भी माना गया है । वहाँ—
अङ्गी रूप से भासमान ध्वनि का आत्मा ( स्वरूप ) रस, भाव, रसाभास, भावा-
भास, भावप्रशम, भावशान्ति, आदि अक्रम ( असंलक्ष्यक्रम ) रूप से व्यवस्थित है ।
लोचनम्
विरोधादित्यभिप्रायेणाह—असंलक्ष्येति । सम्यङ् न लक्षयितुं शक्यः क्रमो यस्य
तादृश उद्द्योत उद्द्योतनव्यापारोऽस्येति बहुव्रीहिः । ध्वनिशब्दसान्निध्याद्विव-
क्षिताभिधेयत्वेनान्यपरत्वमत्राक्षिप्तमिति स्वकण्ठेन नोक्तम् । ध्वनेरिति । व्यङ्ग्य-
स्येत्यर्थः । आत्मेति । पूर्वश्लोकेन व्यङ्ग्यस्य वाच्यमुखेन भेद उक्तः । इदानीं तु
द्योतनव्यापारमुखेन द्योत्यस्य स्वात्मनिष्ठ एवेत्यर्थः । व्यङ्ग्यस्य ध्वनेर्द्योतने
स्वात्मनि कः क्रम इत्याशङ्क्याह—वाच्यार्थापेक्षयेति । वाच्योऽर्थो विभावादिः ॥
तत्रेति । तयोर्मध्यादित्यर्थः । यो रसादिरर्थः स एवाक्रमो ध्वनेरात्मा न
असंलक्ष्य— । सम्यक् प्रकार से लक्षित न किया जा सके क्रम जिसका उस प्रकार का
उद्योत अर्थात् उद्योतनव्यापार वाला, यह ‘बहुव्रीहि’ समास है । ‘ध्वनि’ शब्द के
सान्निध्य से, अभिधेय के विवक्षित होने के कारण ‘अन्यपरत्व’ आक्षेपतः यहाँ आ
जाता है, अतः उसे कण्ठतः नहीं कहा है । ध्वनि का— । अर्थात् व्यङ्ग्य का ।
आत्मा— । पहले श्लोक से व्यङ्ग्य का वाच्य के प्रकार से भेद कहा है । किन्तु अब
द्योतन व्यापार के प्रकार से द्योत्य अर्थात् व्यङ्ग्य का स्वात्मनिष्ठ भेद ही कहते हैं,
यह अर्थ है । व्यङ्ग्य ध्वनि के द्योतन में, स्वयं में कौन—सा क्रम है ? यह आशङ्का
करके कहते हैं—वाच्य अर्थ की अपेक्षा से । वाच्य अर्थ विभाव आदि ।
वहाँ— । अर्थात् उन दोनों में से । जो रसादिरूप अर्थ है वही अक्रम होकर
१८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्वक्रम एव सः । क्रमत्वमपि हि तस्य कदाचिद्भवति । तदा चार्थशक्त्युद्द्भवा- नुस्वानरूपभेदेतेति वक्ष्यते । आत्मशब्दः स्वभाववचनः प्रकारमाह । तेन रसादिर्योऽर्थः स ध्वनेरक्रमो नाम भेदः । असंलक्ष्यक्रम इति यावत् । ननु किं सर्वदैव रसादिरर्थो ध्वनेः प्रकारः ? नेत्याह; किं तु यदाङ्गित्वेन प्रधानत्वे- नावभासमानः । एतच्च सामान्यलक्षणे 'गुणीकृतस्वार्थावि'त्यत्र यद्यपि निरू- पितम्, तथापि रसवदाद्यलङ्कारप्रकाशनावकाशदानायानूदितम् । स च रसा- दिर्ध्वनिर्व्यवस्थित एव; न हि तच्छून्यं काव्यं किञ्चिदस्ति । यद्यपि च रसेनेव सर्वं जीवति काव्यम्, तथापि तस्य रसस्यैकघनचमत्कारात्मकस्यापि कुतश्चिदं- शात्प्रयोजकीभूतादधिकोऽसौ चमत्कारो भवति । तत्र यदा कश्चिदुद्रिक्तावस्थां प्रतिपन्नो व्यभिचारी चमत्कारातिशयप्रयोजको भवति, तदा भावध्वनिः । यथा- तिष्ठेत्कोपवशात्प्रभावपिहिता दीर्घं न सा कुप्यति स्वर्गायोत्पतिता भवेन्मयि पुनर्भावार्द्रमस्या मनः । तां हर्तुं विबुधद्विषोऽपि न च मे शक्ताः पुरोवर्तिनीं सा चात्यन्तमगोचरं नयनयोर्यातेति कोऽयं विधिः ॥ अत्र हि विप्रलम्भरससद्भावेऽपीति वितर्काख्यव्यभिचारिचमत्क्रियाप्रयुक्त आस्वादातिशयः । व्यभिचारिण उदयस्थित्यपायत्रिधर्मकाः । यदाह—'विविध- ध्वनि का आत्मा है, न कि वह अक्रम ही है, क्योंकि उसका कभी क्रमत्व भी होता है । तब अर्थ रूप शक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप भेद होता है, यह कहेंगे । स्वभाव के अर्थ में 'आत्मा' शब्द प्रकार बताता है । उससे, रसादि रूप जो अर्थ है वह ध्वनि का अक्रम नामक भेद है, अर्थात् असंलक्ष्यक्रम है । शङ्का है कि क्या रसादि अर्थ हमेशा ही ध्वनि का प्रकार है ? उत्तर में कहते हैं कि, नहीं । किन्तु जब अङ्गी या प्रधान रूप से प्रतीत होता है, ( तब ध्वनि का प्रकार है) । इस बात को यद्यपि ( ध्वनि के ) सामान्य लक्षण में 'गुणीकृतस्वार्थों०' इस स्थल पर निरूपण कर दिया है, तथापि रसवत् आदि अलङ्कारों के प्रकाशन का अवकाश देने के लिए अनुवाद किया है। वह रस आदि ध्वनि के रूप में व्यवस्थित ही है, क्योंकि उससे शून्य काव्य कोई चीज नहीं है । यद्यपि रस से ही सारा काव्य जीवित रहता है, तथापि एकघन चमत्कार रूप भी उस रस के कहीं प्रयोजक अंश से अधिक चमत्कार होता है । वहाँ जब कोई व्यभिचारी भाव उद्रिक्त या निष्पन्न अवस्था को प्राप्त करके अतिशय चमत्कार का प्रयोजक होता है, तब भावध्वनि होता है । जैसे— वह ( उर्वशी ) भले ही कुछ कोप से अन्तर्हित हो जाय पर वह अधिक कुपित नहीं होती, भले ही वह स्वर्ग चली गई हो, फिर भी उसका मन मेरे प्रति भावार्द्र है, मेरे सामने स्थित उसे असुर भी हरण नहीं कर सकते, और वह आँखों के अत्यन्त अविषय हो गई है, यह कैसा प्रकार है ? यहाँ विप्रलम्भ रस के होने पर भी वितर्क नामक व्यभिचारी भाव के चमत्कार से प्रयुक्त अतिशय आस्वाद हो रहा है । व्यभिचारी भावों के तीन धर्म हैं—उदय,
द्वितीय उद्योतः १८५ लोचनम् माभिमुख्येन चरन्तीति व्यभिचारिणः' इति। तत्रोदयावस्थाप्रयुक्तः कदा- चित्। यथा— याते गोत्रविपर्यये श्रुतिपथं शय्यामनुप्राप्तया निर्ध्यांतं परिवर्तनं पुनरपि प्रारब्धुमङ्गीकृतम्। भूयस्तत्प्रकृतं कृतं च शिथिलक्षिप्तैकदोर्लेखया तन्वङ्ग्या न तु पारितः स्तनभरः क्रष्टुं प्रियस्योरसः॥ अत्र हि प्रणयकोपस्योज्जिगमिषतैव यदवस्थानं न तु पारित इत्युदयाव- काशनिराकरणात्तदेवास्वादजीवितम्। स्थितिः पुनरुदाहृता—'तिष्ठेत्कोपवशात्' इत्यादिना। क्वचित्तु व्यभिचारिणः प्रशमावस्थया प्रयुक्तश्चमत्कारः। यथोदा- हृतं प्राक् 'एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया' इति। अयं तत्प्रशम इत्युक्तः। अत्र चेर्ष्याविप्रलम्भस्य रसस्यापि प्रशम इति शक्यं योजयितुम्। क्वचित्तु व्यभिचा- रिणः सन्धिरेव चर्वणास्पदम्। यथा— ओसुरु सुम्ठि आइं मुहु चुम्बिअं जेण। अमिअरसघोण्टाणं पडिजाणिअं तेण॥ इत्यत्र श्रुत्युक्ते तु कोपे कोपकषायगद्गदमन्दरुदिताया येन मुखं चुम्बितं स्थिति और अपाय। जो कि कहते हैं—'विविध प्रकार (अर्थात् तीन प्रकार से) अभिमुख रूप से चरण करते हैं, अतः व्यभिचारी कहे जाते हैं'। उनमें कभी उदयावस्था से प्रयुक्त व्यभिचारी भाव होता है, जैसे— सेज पर आई कृश अङ्गों वाली (नायिका) ने गोत्रविपर्यय (प्रिय द्वारा दूसरी नायिका के नामोच्चारण) कर दिए जाने पर सोचा कि करवट बदल ले और फिर करवट बदलना आरम्भ किया, फिर करवट बदलने का प्रयत्न किया, लेकिन एक हाथ को शिथिल करके अलग हटाया, किन्तु प्रिय के वक्ष से अपने स्तन के भार को खींच न पाई। यहाँ नायिका का प्रणय-कोप उदय लेना ही चाहता है, ऐसी स्थिति को प्राप्त है 'नहीं वह खींच पाई' इस कथन द्वारा उसके हृदय के अवकाश का निराकरण कर देने से वही (उदय लेने की स्थिति में अवस्थान) आस्वाद का प्राण है। 'स्थिति' का उदाहरण दे चुके हैं—'तिष्ठेत् कोपवशात्०' इत्यादि से। कहीं पर व्यभिचारी भाव की प्रशम अवस्था से प्रयुक्त चमत्कार होता है। जैसा कि पहले उदाहरण दे चुके हैं—'एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया०।' यह व्यभिचारी भाव का प्रशम कहा गया है। यहाँ ईर्ष्याविप्रलम्भ रस का प्रशम है, ऐसी योजना कर सकते हैं। कहीं पर तो व्यभिचारी भाव की सन्धि ही चर्वणा (आस्वाद) प्रतिष्ठान होती है। जैसे— ईर्ष्याजनित अश्रु से शोभित नायिका के मुख को जिसने चुम्बन किया है, उसने अमृत-रस के निगलने (रुक-रुक कर पीने) की तृप्ति को जान लिया। (?) यहाँ 'ईर्ष्या' शब्द से अभिहित कोप में 'कोप के मिश्रण से गद्गद एवं मंद-मंद रोती हुई नायिका के मुख को जिसने चुम्बन किया उसने अमृतरस के निगलने की
१८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तेनामृतरसनिगरणविश्रान्तिपरम्पराणां तृप्तिर्ज्ञातेति कोपप्रसादसन्धिश्चमत्कार- स्थानम् । क्वचिद्व्यभिचार्यन्तरशबलतैव विश्रान्तिपदम् । यथा— काकार्यं शशलक्ष्मणः क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् । किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ॥ अत्र हि वितर्कौत्सुक्ये मतिस्मरणे शङ्कादैन्ये धृतिचिन्तने परस्परं बाध्य- बाधकभावेन द्वन्द्वशो भवन्ती, पर्यन्ते तु चिन्ताया एव प्रधानतां ददती परमास्वादस्थानम् । एवमन्यदप्युत्प्रेक्ष्यम् । एतानि चोदयसन्धिशबलत्वादि- कानि कारिकायामादिग्रहणेन गृहीतानि । नन्वेवं विभावानुभावमुखेनाप्यधिकश्चमत्कारो दृश्यत इति विभावध्वनिरनु- भावध्वनिश्च वक्तव्यः । मैवम्; विभावानुभावौ तावत्स्वशब्दवाच्यावेव । तच्च- र्वणापि चित्तवृत्तिष्वेव पर्यवस्यतीति रसभावेभ्यो नाधिकं चर्वणीयम् । यदा तु विभावानुभावावपि व्यङ्ग्यौ भवतस्तदा वस्तुध्वनिरपि किं न सह्यते । यदा तु विभावाभासाद्रत्याभासोदयस्तदा विभावानुभासाच्चर्वणाभास इति रसाभासस्य विश्रान्ति अर्थात् आनन्द की परम्पराओं की तृप्ति को जान लिया’ इस प्रकार कोप और प्रसाद की सन्धि चमत्कार का स्थान है । कहीं पर व्यभिचारी का एक-दूसरे व्यभिचारी में मिल जाना (शबलता) ही विश्रान्ति (आनन्द) का पद (प्रतिष्ठान) होता है । जैसे— (यह ब्राह्मण-कन्या में आसक्ति रूप) अकार्य (गलत कार्य) कहाँ और चन्द्र का वंश कहाँ ? काश, वह फिर और भी दिख जाती ! मैंने दोषों के शमन करने के लिए शास्त्र पढ़ा है, अहो ! उसका मुख कोप की अवस्था में भी सुन्दर लगता है; मालिन्य से रहित एवं सुन्दर आचरण वाले लोग क्या कहेंगे ? वह स्वप्न में भी दुर्लभ है; हे चित्त, तू धीरज धारण कर, कौन धन्य युवक होगा जो उसके अधर का पान करेगा ? यहाँ, वितर्क और औत्सुक्य, मति और स्मरण, शङ्का और दैन्य, धृति और चिन्तन भाव परस्पर बाध्य-बाधक रूप में रहते हुए पर्यन्त में चिन्ता को प्रधान करते हुए परम आस्वाद के प्रतिष्ठान हैं । इसी प्रकार और की भी उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिए । ये उदय, सन्धि, शबलता आदि कारिका में ‘आदि’ शब्द से ग्रहण किए गए हैं । शङ्का है कि इस प्रकार विभाव और अनुभाव के प्रकार से भी अधिक चमत्कार देखा जाता है, ऐसी स्थिति में विभावध्वनि और अनुभावध्वनि को कहना चाहिए ! उत्तर है कि, ऐसा नहीं; विभाव और अनुभाव अपने शब्द से ही वाच्य होते हैं, उनकी चर्वणा भी चित्तवृत्तियों में ही पर्यवसित होती है, इस लिए रस और भावों से अधिक (दूसरा) चर्वणा के योग्य नहीं है । जब कि विभाव और अनुभाव व्यङ्ग्य होते हैं, तब वस्तुध्वनि को क्यों नहीं मान लेते हैं ? जब कि विभावाभाव से रत्याभास का उदय होगा तब विभाव के भी साथ भासित होने के कारण चर्वणाभास होगा;
द्वितीय उद्योतः १८७ लोचनम् विषयः । यथा रावणकाव्याकर्णने शृङ्गाराभासः । यद्यपि ‘शृङ्गारानुकृतिर्या तु स हास्यः’ इति मुनिना निरूपितं तथाप्यौत्तरकालिकं तत्र हास्यरसत्वम् । दूराकर्षणमोहमन्त्र इव मे तन्नाम्नि याते श्रुतिं चेतः कालकलामपि प्रकुरुते नावस्थितिं तां विना । इत्यत्र तु न हास्यचर्वणावसरः । ननु नात्र रतिः स्थायिभावोऽस्ति । परस्परास्थाबन्धाभावात् केनैतदुक्तं रतिरिति । रत्याभासो हि सः । अतश्चा- भासता येनास्य सीता मय्युपेक्षिका द्विष्ठा वेति प्रतिपत्तिर्हृदयं न स्पृशत्येव । तत्स्पर्शे हि तस्याप्यभिलाषो विलीयेत । न च मयीयमनुरक्तेत्यपि निश्चयेन कृतं, कामकृतान्मोहात् । अत एव तदाभासत्वं वस्तुतस्तत्र स्थाप्यते शुक्तौ रजता- भासवत् । एतच्च शृङ्गारानुकृतिशब्दं प्रयुञ्जानो मुनिरपि सूचितवान् । अनुकृ- तिरमुख्यता आभास इति ह्येकोऽर्थः । अत एवाभिलाषे एकतरनिष्ठेऽपि शृङ्गा- रशब्देन तत्र तत्र व्यवहारस्तदाभासतया मन्तव्यः । शृङ्गारेण वीरादीनामप्या- भासरूपतोपलक्षितैव । एवं रसध्वनेरेवामी भावध्वनिप्रभृतयो निष्यन्दाः । आस्वादे प्रधानं प्रयोजकमेवमंशं विभज्य पृथग्व्यवस्थाप्यते । यथा गन्धयुक्ति- इस प्रकार रसाभास का विषय होगा । जैसे रावणकाव्य के श्रवण करने में शृङ्गाराभास होगा । यद्यपि भरत मुनि ने निरूपण किया है कि ‘जो शृङ्गार का अनुकरण हो उसे हास्य कहना चाहिए’, तथापि हास्यरस की स्थिति ( शृङ्गार के ) उत्तर काल में होती है । ‘दूर ही से आकर्षण कर लेने वाले मोहमन्त्र की भाँति उसके नाम के कान में प्रवेश करते ही चित्त थोड़ी देर भी उसके बिना नहीं ठहर पाता है ।’ यहाँ हास्यरस की चर्वणा का अवसर नहीं है । जब कि रति स्थायिभाव यहाँ नहीं है क्योंकि एक-दूसरे के प्रति ( परस्पर ) आस्था बन्ध का अभाव है फिर किसने कहा कि यह रति है ? क्योंकि वह रत्याभास है । इस कारण से भी रति की आभासता जाहिर होती है कि रावण के हृदय को यह ज्ञान छू तक नहीं सका है, कि सीता मेरे प्रति उपेक्षा का भाव रखती है या द्वेष का । यदि उसे ऐसा ज्ञान होता तो उसका अभिलाष विलीन हो जाता । ‘मुझ में यह अनुरक्त है’ यह निश्चय भी नहीं है, क्योंकि कामजनित मोह हो चुका है । इसलिए रति की आभासता को वस्तुतः वहाँ स्थापित करते हैं, जैसे शुक्ति में रजत का आभास होता है । इसे ‘शृङ्गार की अनुकृति’ इस शब्द का प्रयोग करते हुए मुनि ने भी सूचित कर दिया है । अनुकृति, अमुख्यता और आभास एक ही अर्थ है । इस लिए अभिलाष जब किसी एक ( पक्ष ) में ही रहे, तब ‘शृङ्गार’ शब्द से व्यवहार उसके आभास के रूप में मानना चाहिए । एक शृङ्गार के कहने से वीर आदि रसों की भी आभासरूपता उपलक्षित ही है । इस प्रकार ये भावध्वनि प्रभृति रसध्वनि के ही निष्यन्द हैं । आस्वाद के इस प्रकार प्रधान अंश को विभक्त करके अलग व्यवस्थापित करते हैं । जिस प्रकार गन्ध योजना की कला के जानकार लोग एक रस के आस्वाद से व्याप्त आमोद ( गन्ध ) के
१८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः रसादिरर्थो हि सहेव वाच्येनावभासते । स चाङ्गित्वेनावभासमानो ध्वनेरात्मा । रसादि रूप अर्थ वाच्य के साथ हीसा प्रतीत होता है । और वह अङ्गी (प्रधान) रूप से प्रतीत होता हुआ ध्वनि का आत्मा (स्वरूप) है । लोचनम् नैरेकरससम्मूर्च्छितामोदोपभोगेऽपि शुद्धमास्यादिप्रयुक्तमिदं सौरभमिति । रसध्वनिस्तु स एव योऽत्र मुख्यतया विभावानुभावव्यभिचारिसंयोजनोदित- स्थायिप्रतिपत्तिकस्य प्रतिपत्तुः स्थाय्यंशचर्वणाप्रयुक्त एवास्वादप्रकर्षः । यथा— कृच्छ्रेणोरुयुगं व्यतीत्य सुचिरं भ्रान्त्वा नितम्बस्थले मध्येऽस्यास्त्रिवलीतरङ्गविषमे निःष्पन्दतामागता । मद्दृष्टिस्तृषितेव सम्प्रति शनैरारुह्य तुङ्गौ स्तनौ साकाङ्क्षं मुहुरीक्षते जललवप्रस्यन्दिनी लोचने ॥ अत्र हि नायिकाकारानुवर्ण्यमानस्वात्मप्रतिकृतिपवित्रितचित्रफलकावलो- कनाद्वत्सराजस्य परस्परास्थाबन्धरूपो रतिस्थायिभावो विभावानुभावसंयोज- नवशेन चर्वणारूढ इति । तदलं बहुना१! स्थितमेतत्-रसादिरर्थोऽङ्गित्त्वेन भास- मानोऽसंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः प्रकार इति । सहेवेति । इवशब्देनासंलक्ष्यता विद्यमानत्वेऽपि क्रमस्य व्याख्याता । वाच्येनेति । विभावानुभावादिना । उपभोग में भी कहते हैं कि यह गन्ध शुद्ध मांसी (एक प्रकार का गन्ध द्रव्य) आदि से तैयार है । रसध्वनि तो वही है जो यहाँ मुख्य रूप से विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी के संयोग से उत्पन्न स्थायी भाव की प्रतिपत्ति या ज्ञान वाले ज्ञाता या सहृदय का स्थायी के अंश की चर्वणा के कारण ही प्रकृष्ट आस्वाद है । जैसे— ‘प्यासी हुई सी मेरी दृष्टि कठिनाई से प्रिया के ऊरुयुगल को पार कर, नितम्ब के स्थल में देर तक भ्रमण कर, इसके त्रिवली की तरङ्गों से विषम मध्यभाग में निश्चलभाव को प्राप्त कर गई, अब इन उन्नत स्तनों पर धीरे से चढ़ कर हसरत के साथ अश्रुजल को बरसने वाली आँखों को बार-बार देख रही है ।’ यहाँ, नायिका (रत्नावली) के आकार रूप चित्र से देखी गई अपनी प्रतिकृति (चित्र) से पवित्र हुए फलक को देखने के कारण वत्सराज (उदयन) का परस्पर आस्थारूप रति-स्थायिभाव विभाव और अनुभाव के संयोजन के कारण चर्वणा की स्थिति तक आरूढ हो गया है । बहुत कहने से फायदा नहीं ! बात यह हुई—रसादि अर्थ अङ्गी या प्रधान रूप से भासमान होकर असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य ध्वनि का प्रकार है । साथ१ जैसा— । ‘जैसा’ या ‘सा’ (इव) शब्द से क्रम के रहते हुए भी उसका संलक्ष्यता व्याख्यान की गई है । वाच्य के साथ— । अर्थात् विभाव, अनुभाव आदि के साथ । १. वृत्तिग्रन्थ के ‘सहेव’ का ‘निर्णयसागर’ के संस्करण का पाठ ‘सहैव’ है। इसके अनुसार
द्वितीय उद्योतः १८९ ध्वन्यालोकः इदानीं रसवदलङ्कारादलक्ष्यक्रमद्योतनात्मकनो ध्वनेर्विभक्तो विषय इति प्रदर्श्यते— वाच्यवाचकचारुत्वहेतूनां विविधात्मनाम् । रसादिपरता यत्र स ध्वनेर्विषयो मतः ॥ ४ ॥ अब रसवद् अलङ्कार से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रूप ध्वनि का विषय अलग है, यह दिखाते हैं— नाना प्रकार के वाच्य, वाचक और उनके चारुत्व-हेतुओं का जहाँ रस आदि में तात्पर्य हो, वह ‘ध्वनि’ का विषय माना गया है ॥ ४ ॥ लोचनम् नन्वङ्गित्वेनावभासमान इत्युच्यते; तत्राङ्गित्वमपि किमस्ति रसादेर्येन तन्निराकरणायतद्विशेषणमित्यभिप्रायेणोपक्रमते—इदानीमित्यादिना । अङ्गत्व- मस्ति रसादीनां रसवत्प्रेयऊर्जस्विसमाहितालङ्काररूपतायामिति भावः । अनया च भङ्ग्या रसवदादिष्वलङ्कारेषु रसादिध्वनेर्नान्तर्भाव इति सूचयति । शङ्का है कि जब ‘अङ्गी या प्रधान रूप से अवभासमान’ (ध्वनि को) कहते हैं तो वहाँ रसादि का अङ्गत्व भी क्या है ? जिससे उसके (अङ्गत्व) के निराकरण के लिए यह विशेषण है, इस अभिप्राय से उपक्रम करते हैं—‘अत्र’इत्यादि द्वारा । भाव यह कि रसवत् , प्रेयस्, ऊर्जस्वि, समाहित अलङ्कार के रूपों में रसादि का अङ्गत्व है । इस अङ्गी के द्वारा सूचित करते हैं कि रसवद् आदि अलङ्कारों में रसादि१ ध्वनि का ‘रसादि अर्थ वाच्य के साथ ही प्रतीत होता है’ यह अर्थ होता है । किन्तु यह पाठ भ्रमपूर्ण ही है । क्योंकि वाच्य विभावादि और रसादि अर्थ की प्रतीति में क्रम अवश्य होता है किन्तु वह व्यङ्ग्य रसादि की प्रतीति इतनी शीघ्रता से होती है कि वह क्रम संलक्षित नहीं हो पाता । जैसे कमल के सैकड़ों पत्तों को एक बार सूचिका से छेदने पर क्रम की प्रतीति नहीं होती । इस प्रकार वाच्य के साथ ही रसादि की प्रतीति न होकर वाच्य के साथ जैसी ही प्रतीति होती है, अतः ‘एव’ (ही) के स्थान पर ‘इव’ (जैसा) पाठ ही उचित है । दूसरे यह भी कि वाच्य के साथ ही व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतीति कैसे सम्भव है ? क्योंकि दो अर्थों का एक ही समय में ज्ञान मन की सामर्थ्य से बाहर है । लोचनकार ने ‘सहैव’ पाठ को ही निर्दिष्ट किया है । १. जब रस प्रधान होता है अर्थात् अङ्गी होता है तब रसादि ध्वनि होती है, किन्तु जब रस की स्थिति अप्रधान या अङ्ग की होती है तब वह रसवत् आदि अलङ्कार की कोटि में आता है । अलङ्कारों में ध्वनि के अन्तर्भाव का सम्भव न होने की बात पहले कह चुके हैं । समासोक्ति आदि अलङ्कारों में ध्वनि का सामान्यतः अन्तर्भाव तो है ही नहीं, इसी प्रकार रसवद् अलङ्कार में भी रसादि ध्वनि का अन्तर्भाव नहीं है । यह भी बात पहले कही गई है कि वस्तुध्वनि का समासोक्ति आदि अलङ्कारों में अन्तर्भाव नहीं । कहने का तात्पर्य यह कि ध्वनि तत्त्व सर्वथा एक अलग अस्तित्व रखता है ।
१९० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् पूर्वं हि समासोक्त्यादिषु वस्तुध्वनेर्नान्तर्भाव इति दर्शितम् । वाच्यं च वाचकं च तच्चारुत्वहेतवश्चेति द्वन्द्वः । वृत्तावपि शब्दाश्चालङ्काराश्चार्थाश्चालङ्काराश्चेति द्वन्द्वः। मत इति। पूर्वमेवैतदुक्तमित्यर्थः । ननूक्तं भट्टनायकेन—'रसो यद्वा अन्तर्भाव नहीं है। पहले दिखा चुके हैं कि समासोक्ति आदि अलङ्कारों में वस्तुध्वनि का अन्तर्भाव नहीं है। 'वाच्य और वाचक और उनके चारुत्वहेतु' यह द्वन्द्व समास है। वृत्ति में भी 'शब्द, अलङ्कार और अर्थालङ्कार' यह द्वन्द्व समास है। माना गया है।— अर्थात् पहले ही यह कहा जा चुका है। शङ्का—भट्टनायक' ने कहा है 'रस यदि परगत १. इसके सम्बन्ध में विभिन्न आचार्यों के सैद्धान्तिक विचारों के जानने के पूर्व सामान्यतः यहाँ भरत मुनि के 'रससूत्र' से परिचित होना आवश्यक है, क्योंकि प्राचीन सभी व्याख्याएँ उन्हीं के रस-सूत्र पर आधारित हैं। भरतमुनि कहते हैं—'विभावानुभावसञ्चारिसंयोगाद्रस- निष्पत्तिः।' अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा सञ्चारी या व्यभिचारी भाव के संयोग से (स्थायीभाव) रस रूप में निष्पन्न होता है। इसके पूर्व कि हमें इस सूत्र की विभिन्न व्याख्याएँ विदित हों, विभाव आदि को समझ लेना आवश्यक है। स्थायीभाव—वासना के रूप में बहुत काल तक प्राणियों के, विशेष रूप से मनुष्य के भीतर स्थिर रहने वाली चित्तवृत्तियाँ 'स्थायीभाव' कहलाती हैं। साहित्य-शास्त्र में आठ स्थायीभावों का निर्देश है— रतिर्हासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा। जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीर्तिताः॥ कुछ लोगों ने 'निर्वेद' (वैराग्य) को भी एक स्थायीभाव माना है। विभाव—वे पदार्थ, जिनसे स्थायीभाव उद्बुद्ध होते हैं 'विभाव' कहलाते हैं। वे दो प्रकार के हैं—आलम्बन और उद्दीपन। नायक-नायिका आलम्बन-विभाव हैं और उद्यान, चन्द्रोदय आदि उद्दीपन-विभाव हैं। आलम्बन-विभाव से स्थायीभाव उद्बुद्ध हो जाता है और उद्दीपन-विभाव से अङ्कुरित हो जाता है। अङ्कुरण भी उद्बोधन का ही एक रूप है। अनुभाव—बाह्य कटाक्ष आदि चेष्टाएँ 'अनुभाव' कहलाती हैं। इनसे स्थायीभाव प्रतीत होने लगता है। विभाव स्थायीभाव के कारण माने जाते हैं अनुभाव कार्य। चेष्टाएँ स्थायीभाव या उद्बुद्ध वासना के अनुसार होती हैं अतः पश्चात् होने के कारण उन्हें 'अनुभाव' कहते हैं (अनु पश्चाद् भवन्तीत्यनुभावाः)। इन कार्य रूप अनुभावों अर्थात् कटाक्षादि चेष्टाओं से रत्यादि स्थायीभाव शीघ्र अवगत हो जाते हैं। सञ्चारी भाव या व्यभिचारी भाव—ये स्थिर न रहनेवाली चित्तवृत्तियाँ हैं। जब कि स्थायीभाव स्थायी होते हैं तो ये व्यभिचारीभाव अस्थायी होते हैं। इस प्रकार आलम्बन और उद्दीपन विभावों से स्थायीभाव उद्बुद्ध होता है, अनुभावों से प्रतीति के योग्य होता है और व्यभिचारियों से परिपोष प्राप्त कर आस्वाद्यमान हो 'रस' हो जाता है। इस प्रकार साहित्यिक आचार्यों ने रस आठ माने हैं— शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः। बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्य रसाः स्मृताः॥ जिन्होंने 'निर्वेद' को भी स्थायीभाव माना है, वे 'शान्त' को नवम रस मानते हैं।
द्वितीय उद्योतः १९१ लोचनम् परगततया प्रतीयते तर्हि ताटस्थ्यमेव स्यात् । न च स्वगतत्वेन रामादिच- रितमयात्काव्यादसौ प्रतीयते । स्वात्मगतत्वेन च प्रतीतौ स्वात्मनि रसस्यो- रूप से (अर्थात् सहृदय से अतिरिक्त में) प्रतीत होता है, तब ताटस्थ्य (सहृदय से असम्बन्ध) ही होगा (अर्थात् स्वयं सहृदय को ऐसी स्थिति में रसप्रतीति नहीं होगी)। भट्टनायक का रस-विचार—भरत के रस-सूत्र के अनुसार विभाव आदि के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इस पर भट्टनायक पहले 'प्रतीति' की दृष्टि से विचार करते हैं और तत्पश्चात् उसकी प्रक्रिया का अपने अनुसार निरूपण करते हैं। पहले यह विचार करते हैं कि रस की प्रतीति 'परगत' रूप से होती है या 'स्वगत' रूप से। अर्थात् सहृदय को रस का बोध अनुकार्य राम या अनुकर्ता नट में होता है अथवा अपने में। भट्टनायक के विचार में दोनों पक्षों में किसी को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि रस को अनुकार्य या अनुकर्ता में मानते हैं तो सहृदय एक तटस्थ व्यक्ति हो जाता है, ऐसी स्थिति में, उसे क्या आ पड़ी है कि वह भिन्न के रस से स्वयं आनन्द का अनुभव करे। और यदि 'स्वगत' रूप से अर्थात् सहृदय में रस को मानते हैं तब यह स्वीकार करना पड़ता है कि रस सहृदय में उत्पन्न होता है। किन्तु यह ठीक इसलिए नहीं है कि सीता तो सहृदय या सामाजिक का 'विभाव' नहीं है और रस जब भी उत्पन्न होगा तब विभाव से ही उत्पन्न होगा। सहृदय या सामाजिक को जब तक यह भावना है कि सीता राम की पत्नी है तब तक सीता की रामविषयक रति की चर्वणा कैसे कर सकता है ? यदि साधारण कान्तात्व की भावना यहाँ मानते हैं तब भी जो कि सीता आदि में पूज्य-बुद्धि है वह किसी प्रकार सहृदय की रति का उद्बोध नहीं होने देगी। दूसरे यह भी नहीं कि सहृदय तत्काल अपनी पत्नी को स्मरण करने लगता है। पुनश्च राम आदि अलौकिक पात्रों के समुद्रबन्धन आदि विभावों का साधारण्य कैसे बन सकता है ? इस प्रकार साधारणीकरण के सम्भव न होने के कारण स्वगतरूप से भी रस की प्रतीति नहीं होगी। राम के उत्साह आदि के स्मरण यदि साधारणीकरण में सहायक मानते हैं तब भी पूर्व अनुभव के न होने के कारण स्मरण भी नहीं बनता है और काव्यरूप शब्द से यदि प्रतीति करते हैं तब तो लोक में प्रत्यक्ष नायिका-नायक को देखकर भी द्रष्टा को रस उत्पन्न होना चाहिए। सामाजिकों में रस की उत्पत्ति मानने में यह एक और कठिनाई है कि करुण रस के उत्पन्न होने पर दुःखी होने के कारण किसी प्रकार पुनः वे करुण-रस की प्रेक्षा में प्रवृत्त न होंगे। इन अनेक कारणों से सहृदयों में रस की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। इसी प्रकार उनमें रस की अभिव्यक्ति भी नहीं होगी। क्योंकि शृङ्गार जो वासना या शक्ति के रूप में सहृदयों के अन्तःकरण में विद्यमान रहता है उसकी अभिव्यक्ति स्वीकार करने पर कान्ता आदि उपायों के तारतम्य की स्थिति में भी अभिव्यक्ति में भी तारतम्य होगा। जिस प्रकार अन्धकार में पड़ी वस्तु की अभिव्यक्ति अधिक से अधिक तभी होगी जब अधिक से अधिक उस अभिव्यक्ति के उपायभूत आलोक को सम्पादित करेंगे, उसी प्रकार रस की भी अभिव्यक्ति तारतम्य-युक्त होगी यह एक दोष, दूसरा दोष यह कि अभिव्यक्ति को परगत मानते हैं या स्वगत, यह झगड़ा तब भी रह ही जाता है। इस प्रकार भट्टनायक काव्य से रस के प्रतीत, उत्पन्न या अभिव्यक्त होने के सिद्धान्तों का निराकरण करके अपने मत का प्रतिष्ठापन करते हैं कि काव्यात्मक शब्द, चूँकि अन्य शब्दों से विलक्षण होते हैं, के अभिधायकत्व, भावकत्व और भोजकत्व ये तीन अंशभूत व्यापार हैं। प्रथम अर्थविषयक व्यापार है, दूसरा रसादि-विषयक और तीसरा सहृदय-विषयक व्यापार है। और को न मानकर यदि केवल शुद्ध अभिधा को ही यहाँ मानते हैं तो शास्त्र के 'तन्त्र' आदि
१९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्पत्तिरेवाभ्युपगता स्यात् । सा चायुक्ता, सीतायाः सामाजिकं प्रत्यविभाव- त्वात् । कान्तात्वं साधारणं वासनाविकासहेतुविभावतायां प्रयोजकमिति चेत्- देवतावर्णनादौ तदपि कथम् । न च स्वकान्तास्मरणं मध्ये संवेद्यते । अलोक- सामान्यानां च रामादीनां ये समुद्रसेतुबन्धादयो विभावास्ते कथं साधारण्यं भजेयुः । न चोत्साहादिमान् रामः स्मर्यते, अननुभूतत्वात् । शब्दादपि तत्प्र- तिपत्तौ न रसोपजनः । प्रत्यक्षादिव नायकमिथुनप्रतिपत्तौ । उत्पत्तिपक्षे च करुणस्योत्पादाद् दुःखित्वे करुणप्रेक्षासु पुनरप्रवृत्तिः स्यात् । तन्न उत्पत्तिरपि, नाप्यभिव्यक्तिः, शक्तिरूपस्य हि शृङ्गारस्याभिव्यक्तौ विषयार्जनतारतम्यप्रवृत्तिः स्यात् । तत्रापि किं स्वगतोऽभिव्यज्यते रसः परगतो वेति पूर्ववदेव दोषः । और स्वगत रूप से (अर्थात् सहृदय में) वह (रस) राम आदि के चरित रूप काव्य से नहीं प्रतीत होता है, क्योंकि अपने आप में प्रतीति मान लेने पर सहृदय में रस की उत्पत्ति माननी होगी। परन्तु वह ठीक नहीं, क्योंकि सामाजिक (या सहृदय) के प्रति सीता विभाव नहीं है। यदि कहिए कि साधारण कान्तात्व रत्यादि वासना के विकास के हेतुभूत विभावना में प्रयोजक है। तो वह भी देवता के वर्णन आदि में कैसे होगा ? ऐसा नहीं कि बीच में अपनी कान्ता के स्मरण का संवेदन होता है। और, आलोक सामान्य चरित वाले राम आदि में जो समुद्र के सेतुबन्ध आदि विभाव हैं, वे कैसे साधारण्य को प्राप्त कर सकते हैं ? और उत्साह आदि से युक्त राम का तत्काल स्मरण भी नहीं होता, क्योंकि उनका पहले कभी अनुभव नहीं हुआ रहता है। शब्द रूप काव्य से यदि उस रामगत उत्साह की प्रतीति करते हैं, तब भी (सहृदयों के) रस उत्पन्न नहीं होगा, जैसे नायक-नायिका को प्रत्यक्ष देखकर (किसी के रसोत्पत्ति नहीं होती) । रस की उत्पत्ति को (सहृदयों में) मान लेने पर करुण रस के उत्पन्न होने से दुःखी होने पर पुनः वे (सहृदय) करुण रस-प्रधान नाटकों में प्रवृत्त नहीं होंगे। इस लिए उत्पत्ति भी नहीं, अभिव्यक्ति भी नहीं। शक्ति या वासना रूप शृङ्गार (और वीर आदि अन्य रस) की अभिव्यक्ति में विषय के अर्जन (ग्रहण) में अनुभव के अंश में तारतम्य की
से और काव्य के 'शेष' अलङ्कार से भेद रह जायगा ? (अनेक अर्थ के बोध की इच्छा से एक पद का एक बार उच्चारण 'तन्त्र' कहलाता है 'हलन्त्यम्' में दो अर्थ हैं।) यदि कहिए कि शास्त्र के शब्दों में नागरिका आदि वृत्तियों का विचार नहीं होता और श्रुतिदुष्ट आदि दोषों का वर्जन नहीं होता, यही दोनों का भेद या अन्तर है। तो इतने मात्र से कुछ भी नहीं होता। इसलिए रसभावनाव्य या भावकत्व रूप द्वितीय व्यापार की कल्पना करते हैं। इस व्यापार से अभिधा विलक्षण हो जाती है। यह व्यापार रसविषयक होकर विभावादि को 'साधारण' बना देता है। इस प्रकार रस के भावित होने पर सहृदय को भोजकत्व व्यापार से रस का 'भोग' होता है। वह 'भोग' अनुभव और स्मरण से विलक्षण, द्रुतविस्तरविकारूप, रजस्तमोवैचित्र्यानुविद्धसत्त्वमय, चित्स्वभाव, निर्वृत्ति या आनन्दरूप, परब्रह्मास्वादसहोदर एवं विश्रान्ति या विगलितवेद्यान्तर- स्थिति रूप है। इस प्रकार भोजकत्ववादी भट्टनायक का मत है।
द्वितीय उद्योतः १९३ लोचनम् तेन न प्रतीयते नोत्पद्यते नाभिव्यज्यते काव्येन रसः । किं त्वन्यशब्दवैलक्षण्यं काव्यात्मनः शब्दस्य त्र्यंशताप्रसादात् । तत्राभिधायकत्वं वाच्यविषयम्, भावकत्वं रसादिविषयम्, भोगकृत्त्वं सहृदयविषयमिति त्रयोऽशभूता व्यापाराः। तत्राभिधाभागो यदि शुद्धः स्यात्तत्तन्त्रादिभ्यः शास्त्राम्नायेभ्यः श्लेषाद्यलङ्काराणां को भेदः ? वृत्तिभेदवैचित्र्यं चाकिञ्चित्करम्। श्रुतिदुष्टादिवर्जनं च किमर्थम् ? तेन रसभावनाख्यो द्वितीयो व्यापारः; यद्वशादभिधा विलक्षणैव । तच्चैतद्भाव- कत्वं नाम रसान् प्रति यत्काव्यस्य तद्विभावादीनां साधारणत्वापादनं नाम । भाविते च रसे तस्य भोगः योऽनुभवस्मरणप्रतिपत्तिभ्यो विलक्षण एव द्रुति- विस्तरविकासात्मा रजस्तमोवैचित्र्यानुविद्धसत्त्वमयनिजचित्स्वभावनिर्वृतिवि- श्रान्तिलक्षणः परब्रह्मास्वादसविधः । स एव च प्रधानभूतोऽशः सिद्धरूप इति । व्युत्पत्तिर्नासाप्रधानमेवे'ति । अत्रोच्यते—रसस्वरूप एव तावद्विप्रतिपत्तयः प्रतिवादिनाम् । तथाहि- प्रवृत्ति करनी पड़ेगी । वहाँ भी, क्या स्वगत ( सहृदयात्मगत ) रस अभिव्यक्त होगा, या परगत, यह दोष पहले के समान ही है । इस लिए काव्य से रस न प्रतीत होता है, न उत्पन्न होता है, न अभिव्यक्त होता है। किन्तु तीन अंशों वाला होने के प्रसाद से काव्य रूप शब्द की अन्य शब्दों से विलक्षणता है। वहाँ अभिधायकत्व ( अभिधा ) वाच्यविषयक व्यापार है भावकत्व रसादिविषयक व्यापार है और भोगकृत्त्व (भोजकत्व ) सहृदयविषयक व्यापार है, इस प्रकार काव्यरूप शब्द के ये तीन अंश- भूत व्यापार हैं। वहाँ यदि अभिधा के अंश को शुद्ध ( अर्थात् इतर व्यापार से अनालिङ्गित ) मान लिया जाय तो तन्त्र आदि शास्त्र के प्रकारों से श्लेष आदि अलङ्कारों का क्या भेद होगा? उपनागरिका आदि वृत्तियों के भेदों का वैचित्र्य ( विलक्षणता ) कुछ नहीं कर सकती । और फिर श्रुतिदुष्ट आदि दोषों का वर्जन किस काम का होगा ? इस लिए रसभावना रूप दूसरा व्यापार है, जिसके कारण अभिधा विलक्षण ही हो जाती है । वह यह भावकत्व रसों के प्रति जो काव्य के उन रसों के विभावादि के साधारणीकरणत्व आपादन है । रस के भावित होने पर, उसका भोग, जो अनुभव, स्मरण और प्रतिपत्ति से विलक्षण ही है, और वह द्रुति, विस्तार और विकास रूप है, तथा रजस् और तमस् के वैचित्र्य से अनुविद्ध स्वात्मचैतन्य रूप लोकोत्तर आनन्द है, अर्थात् विगलित वेद्यान्तररूप में अवस्थिति रूप वाला एवं परब्रह्म के आस्वाद का समीपवर्ती है। वही प्रधानभूत अंश सिद्धरूप है । ( सहृदयों को ) व्युत्पत्ति ( चतुर्वर्ग फल की प्राप्ति रूप फल ) मिलता है, वह तो अप्रधान है ।' इस प्रसङ्ग में कहते हैं—रस के स्वरूप के सम्बन्ध में ही प्रतिवादियों के विभिन्न मत हैं । जैसा कि—कुछ लोग कहते हैं' 'पूर्व अवस्था' में जो 'स्थायी' है, वही व्यभि- १. भट्ट लोल्लट आदि का उत्पत्तिवाद—विभावादि के संयोग से रस की निष्पत्ति या उत्पत्ति होती है । यह रस की उत्पत्ति अनुकार्य राम में होती है । इस विचार को 'काव्य-प्रकाश' में इस १३ ध्व०