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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

४१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः छायातिशययोगमिच्छति तेन तेषां रसानामन्यतमः कश्चिद्विवक्षितो रसोऽङ्गित्त्वेन विनिवेशयितव्य इत्ययं युक्ततरो मार्गः ॥ २१ ॥ ननु रसान्तरेषु बहुषु प्राप्तपरिपोषेषु सत्सु कथमेकस्याङ्गिता न विरुध्यत इत्याशङ्क्येदमूच्यते— रसान्तरसमावेशः प्रस्तुतस्य रसस्य यः। नोपहन्त्यङ्गितां सोऽस्य स्थायित्वेनावभासिनः ॥ २२ ॥ छायातिशय का योग चाहता है उसे उन रसों में से किसी एक विवक्षित रस को अङ्गी रूप से रखना चाहिए, यह मार्ग युक्ततर है ॥ २१ ॥ (शंका) बहुत से रसान्तरों के परिपोष प्राप्त होने पर कैसे एक का अङ्गी होना विरुद्ध नहीं होगा ? यह आशङ्का करके यह कहते हैं— रसान्तरों के साथ जो प्रस्तुत रस का समावेश है वह स्थायी रूप से प्रतीत होने वाले इस (प्रधान रस) के अङ्गित्व को उपहत नहीं करता ॥ २२ ॥ लोचनम् अङ्गाङ्गिभावेनेत्येकनायकनिष्ठत्वेन । युक्ततर इति । यद्यपि समवकारादौ पर्याय- बन्धादौ च नैकस्याङ्गित्त्वं तथापि नायुक्तता तस्याप्येवंविधो यः प्रबन्धः तद्यथा नाटकं महाकाव्यं वा तदुत्कृष्टतरमिति तरशब्दस्यार्थः ॥ २१ ॥ नन्विति । स्वयं लब्धपरिपोषत्वे कथमङ्गत्त्वम् ? अलब्धपरिपोषत्वे वा कथं रसत्वमिति रसत्वमङ्गत्वं चान्योन्यविरुद्धं तेषां चाङ्गत्वायोगे कथमेकस्याङ्गित्त्व- मुक्तमिति भावः । रसान्तरेति । प्रस्तुतस्य समस्तेतिवृत्तव्यापिनस्तत एव विततव्याप्तिकत्वेनाङ्गिभावोचितस्य रसस्य रसान्तरैरितिवृत्तवशायातत्वेन परि- मितकथाशकलव्यापिभिर्यः समावेशः समुपबृंहणं स तस्य स्थायित्वेनेति- अर्थात् एकनायकनिष्ठ रूप से । युक्ततर—। यद्यपि समवकार आदि में और पर्यायबन्ध आदि में एक अङ्गी नहीं होता, तथापि उसकी भी अयुक्तता नहीं है, इस प्रकार का जो प्रबन्ध वह जैसे नाटक अथवा महाकाव्य है वह उत्कृष्टतर है, यह 'तर' शब्द का अर्थ है ॥ २१ ॥ (शङ्का)—। स्वयं परिपोष प्राप्त कर लेने पर अङ्गत्व कैसे होगा ? अथवा परिपोष प्राप्त न होने पर रसत्व कैसे होगा, इस प्रकार रसत्व और अङ्गत्व दोनों परस्पर विरुद्ध हैं और उनके अङ्गत्व के न होने पर कैसे एक का अङ्गित्व कहा गया यह भाव है । रसान्तर—। अर्थात् प्रस्तुत अर्थात् समस्त इतिवृत्त में व्याप्त रहने वाले, इसी लिए व्याप्ति के विस्तृत होने से अङ्गत्व के उचित रस का, इतिवृत्तवश प्राप्त होने के कारण परिमित कथाखण्डों में व्याप्त रहने वाले रसान्तरों के साथ जो समावेश अर्थात् समुपबृंहण है वह स्थायी रूप से अर्थात् इतिवृत्त में व्यापक के रूप से भासित

तृतीय उद्योतः ४१७ ध्वन्यालोकः प्रबन्धेषु प्रथमतं प्रस्तुत: सन् पुनः पुनरनुसन्धीयमानत्वेन स्थायी यो रसस्तस्य सकलबन्धव्यापिनो रसान्तरैरन्तरालवर्तिभिः समावेशो यः स नाङ्गितामुपहन्ति । एतदेवोपपादयितुमुच्यते— कार्यमेकं यथा व्यापि प्रबन्धस्य विधीयते । तथा रसस्यापि विधौ विरोधो नैव विद्यते ॥ २३ ॥ प्रबन्धों में पहले प्रस्तुत होता हुआ, बार-बार अनुसन्धीयमान होने के कारण स्थायी जो रस है, सकल रचना में व्याप्त रहने वाले उसके मध्यवर्ती रसान्तरों के साथ जो समावेश है वह अङ्गित्वि को उपहत नहीं करता । इसे ही उपपादन करने के लिए कहते हैं— जिस प्रकार प्रबन्ध का एक व्यापक कार्य बनाया जाता है उस प्रकार रस के भी विधान में कोई विरोध नहीं है ॥ २३ ॥ लोचनम् वृत्तव्यापितया भासमानस्य नाङ्गितामुपहन्ति, अङ्गितां पोषयत्येवेत्यर्थः । एतदुक्तं भवति—अङ्गभूतान्यपि रसान्तराणि स्वविभावादिसामग्र्या स्वा- वस्थायां यद्यपि लब्धपरिपोषाणि चमत्कारगोचरतां प्रतिपद्यन्ते, तथापि स चमत्कारस्तावत्येव न परितुष्य विश्राम्यति किं तु चमत्कारान्तरमनुधावति । सर्वत्रैव ह्यङ्गाङ्गिभावेऽयमेवोदन्तः । यथाह तत्रभवान्— गुणः कृतात्मसंस्कारः प्रधानं प्रतिपद्यते । प्रधानस्योपकारे हि तथा भूयसि वर्तते ॥ इति ॥ २२ ॥ उपपादयितुमिति । दृष्टान्तस्य समुचितस्य निरूपणेनेति भावः । न्यायेन होनेवाले उस ( रस ) अङ्गत्व को उपहत ( विघात ) नहीं करता, बल्कि अङ्गत्व को पुष्ट ही करता है । बात यह कही गई—अङ्गभूत भी रसान्तर अपने विभावादि की सामग्री से अपनी अवस्था में यद्यपि परिपोष प्राप्त करके चमत्कारगोचर बन जाते हैं तथापि वह चमत्कार उतने ही तक परितुष्ट होकर विश्राम कर लेता किन्तु अन्य चमत्कार का अनुधावन करता है । क्योंकि सभी अङ्गाङ्गिभाव में यही वृत्तान्त है । जैसा कि कहते हैं— गुण ( अर्थात् अङ्गभूत ) अन्य के अपने संस्कार किये जाने पर प्रधान का अधिका- धिक उपकार करता है ॥ २२ ॥ उपपादन करने के लिए—। भाव यह कि समुचित दृष्टान्त के निरूपण के द्वारा २७ ध्व०

४१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सन्ध्यादिमयस्य प्रबन्धशरीरस्य यथा कार्यमेकमनुयायि व्यापकं कल्प्यते न च तत्कार्यान्तरैर्न सङ्कीर्यते, न च तैः सङ्कीर्यमाणस्यापि तस्य प्राधान्यमपचीयते, तथैव रसस्याप्येकस्य सन्निवेशे क्रियमाणे सन्धि आदि से युक्त प्रबन्ध-शरीर का एक अनुयायी व्यापक कार्य कल्पित करते हैं, ऐसा नहीं कि वह अन्य कार्यों से संकीर्ण नहीं होता और न कि उनसे संकीर्ण होकर भी उसके प्राधान्य का अपचय होता है, उसी प्रकार एक रस के भी सन्निवेश लोचनम् चैतदेवोपपद्यते, कार्यं हि तावदेकमेवाधिकारिकं व्यापकं प्रासङ्गिककार्यान्तरोप- क्रियमाणमवश्यमङ्गीकार्यम् । तत्पृष्ठवर्तिनीनां नायकचित्तवृत्तीनां तन्मूलादेवाङ्गाङ्गि- भावः प्रवाहपतित इति किमत्रापूर्वमिति तात्पर्यम् । तथेति । व्याप्तितया । यदि वा एवकारो भिन्नक्रमः, तथैव तेनैव प्रकारेण कार्याङ्गाङ्गिभावरूपेण रसानामपि बलादेवासावापततीत्यर्थः । तथा च वृत्तौ वक्ष्यति ‘तथैवे’ति । कार्यमिति । ‘स्वल्पमात्रं समुत्सृष्टं बहुधा यद्विसर्पति’ इति लक्षितं बीजम् । बीजात्प्रभृति प्रयोजनानां विच्छेदे यदविच्छेदकारणं यावत्समाप्तिबन्धं स तु बिन्दुः’ इति बिन्दुरूपयार्थप्रकृत्या निर्वहणपर्यन्तं व्याप्नोति तदाह—अनु- यायीति । अनेन बीजं बिन्दुश्चेत्यर्थप्रकृती सङ्गृहीते । कार्यान्तरैरिति । ‘आग- र्भादाविमर्शाद्वा पताका विनिवर्तते’ इति प्रासङ्गिकं यत्पताकालक्षणार्थप्रकृति- निष्ठं कार्यं यानि च ततोऽप्यूनव्याप्तितया प्रकरीलक्षणानि कार्याणि तैरित्येवं और न्याय के अनुसार यही उपपन्न होता है कि प्रासङ्गिक कार्यान्तरों से उपकृत होता हुआ एक ही आधिकारिक व्यापक कार्य अवश्य अङ्गीकार करना चाहिए । उस (कार्य) के पीछे चलने वाली नायक की चित्तवृत्तियों के उसके (अर्थात् कार्यों के अङ्गाङ्गिभाव के) बल से ही अङ्गाङ्गिभाव का क्रम चला है, यहाँ नई बात क्या है यह तात्पर्य है । उस प्रकार—। अर्थात् व्यापक रूप से । अथवा ‘ही’ (एवकार) भिन्न क्रम है, उसी प्रकार उसी प्रकार से कार्य के अङ्गाङ्गिभाव के रूप से रसों का भी बलपूर्वक वह (अङ्गाङ्गिभाव) होगा । जैसा कि वृत्ति में कहेंगे उसी प्रकार— । कार्य—। ‘बीज’ का लक्षण है ‘जो थोड़ी मात्रा में छोड़े जाने पर बहुत प्रकार से फैल जाता है’ । ‘बीज’ से लेकर प्रयोजनों के विच्छेद की स्थिति में जो अविच्छेद का कारण समाप्तिपर्यन्त है वह ‘बिन्दु’ है । इस बिन्दुरूप अर्थप्रकृति से निर्वहणपर्यन्त व्याप्त रहता है उसे कहते हैं—अनुयायी—। इससे ‘बीज’ और ‘बिन्दु’ इन दो अर्थ प्रकृतियों को सङ्गृहीत किया । अन्य कार्यों से—। ‘गर्भ’ अथवा ‘विमर्श’ सन्धिपर्यन्त पताका लौटती है’ इस पताका रूप अर्थ-प्रकृति में रहने वाला प्रासङ्गिक जो कार्य है और जो उससे भी अधिक व्याप्ति रूप से प्रकरी रूप कार्य हैं उनसे, इस प्रकार पाँच

तृतीय उद्योतः ४१९ ध्वन्यालोकः विरोधो न कश्चित् । प्रत्युत प्रत्युदितविवेकानाम Klingon-not-included अनुसन्धानवतां सचेतसां तथाविधे विषये प्रह्लादातिशयः प्रवर्तते ॥ २३ ॥ किए जाने पर कोई विरोध नहीं है । बल्कि प्रत्युदित विवेक वाले एवं अनुसन्धानशील सहृदयों का उस प्रकार के विषय में अतिशय प्रह्लाद होता है । लोचनम् पञ्चानामर्थप्रकृतीनां वाक्यैकवाक्यतया निवेश उक्तः । तथाविध इति । यथा तापसवत्सराजे । एवमनेन श्लोकेनाङ्गाङ्गितायां दृष्टान्तनिरूपणमितिवृत्तबलापतितत्वं च रसाङ्गाङ्गिभावस्येति द्वयं निरूपितम् । वृत्तिग्रन्थोऽप्युभयाभिप्रायेणैव नेयः । शृङ्गारेण वीरस्याविरोधो युद्धनयपराक्रमादिना कन्यारत्नलाभादौ । हास्यस्य तु स्पष्टमेव तदङ्गत्वम् । हास्यस्य स्वयमपुरुषार्थस्वभावत्वेऽपि समधिकतररञ्जनो- त्पादनेन शृङ्गाराङ्गतयैव तथात्वम् । रौद्रस्यापि तेन कथञ्चिदविरोधः । यथो- क्तम्—'शृङ्गारश्च तैः प्रसभं सेव्यते' । तैरिति रौद्रप्रभृतिभिः रक्षोदानवोद्धत- मनुष्यैरित्यर्थः । केवलं नायिकाविषयमौग्र्यं तत्र परिहर्तव्यम् । असम्भाव्य- पृथिवीसम्मार्जनादिजनितविस्मयतया तु वीराद्भुतयोः समावेशः । यथाह मुनिः—'वीरस्य चैव यत्कर्म सोऽद्भुतः' इति । वीररौद्रयोर्धीरोद्धते भीमसेनादौ समावेशः क्रोधोत्साहयोरविरोधात् । रौद्रकरुणयोरपि मुनिनैवोक्तः— ‘रौद्रस्यैव च यत्कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः ।' इति । अर्थ-प्रकृतियों के वाक्यैकवाक्य रूप से निवेश कहा है। उस प्रकार के—। जैसे 'तापसवत्सराज' में । इस प्रकार इस श्लोक से अङ्गाङ्गिभाव में दृष्टान्त का निरूपण और ( इसके अङ्गाङ्गिभाव का ) इतिवृत्त के बल से होना ये दो बातें निरूपण कीं । वृत्तिग्रन्थ को भी दोनों के अभिप्राय से ही समझना चाहिए । शृङ्गार के साथ वीर का अविरोध युद्ध, नीति और पराक्रम आदि द्वारा कन्यारत्न के लाभ आदि में । हास्य तो स्पष्ट ही उस ( शृङ्गार ) का अङ्ग है । हास्य स्वयं अपुरुषार्थ रूप है तथापि सम्यक् प्रकार से अधिकतर रञ्जन के उत्पन्न करने से शृङ्गार के अङ्गरूप से ही उस प्रकार ( पुरुषार्थ ) है । रौद्र का भी उस ( शृङ्गार ) के साथ कथञ्चित् विरोध नहीं । जैसे, कहा है— 'वे लोग शृङ्गार का हठात् सेवन करते हैं' । 'वे लोग' अर्थात् रौद्र प्रभृति राक्षस, दानव और उद्धत मनुष्य । केवल नायिका के सम्बन्ध का औग्र्य वहाँ परिहर्तव्य है । पृथिवी के सम्मार्जन आदि असम्भाव्य कार्यों से विस्मय के उत्पन्न करने के कारण वीर और अद्भुत का समावेश है । जैसे मुनि कहते हैं—'और वीर का ही जो कर्म है वह अद्भुत है' । वीर और रौद्र का धीरोद्धत भीमसेन आदि में समावेश है, क्योंकि क्रोध और उत्साह में विरोध नहीं । रौद्र और करुण में भी मुनि ने ही कहा है— 'रौद्र का ही जो कर्म है उसे करुण रस समझना चाहिए ।'

४२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ननु येषां रसानां परस्पराविरोधः यथा—वीरशृङ्गारयोः शृङ्गार- हास्ययो रौद्रशृङ्गारयोर्वीराद्भुतयोर्वीररौद्रयो रौद्रकरुणयोः शृङ्गाराद्भुत- योर्वा तत्र भवत्वङ्गाङ्गिभावः । तेषां तु स कथं भवेद्येषां परस्परं बाध्य- बाधकभावः । यथा—शृङ्गारबीभत्सयोर्वीरभयानकयोः शान्तरौद्रयोः शान्तशृङ्गारयोर्वा इत्याशङ्क्येदमुच्यते— अविरोधी विरोधी वा रसोऽङ्गिनि रसान्तरे । परिपोषं न नेतव्यस्तथा स्यादविरोधिता ॥ २४ ॥ ( शङ्का ) जिन रसों का परस्पर में अविरोध है, जैसे वीर और शृङ्गार का, शृङ्गार और हास्य का, रौद्र और शृङ्गार का, वीर और अद्भुत का, वीर और रौद्र का, रौद्र और करुण का अथवा शृङ्गार और अद्भुत का। उनमें अङ्गाङ्गिभाव हो । परन्तु उनका वह ( अङ्गाङ्गिभाव ) कैसे होगा जिनका परस्पर में बाध्यबाधक भाव है । जैसे शृङ्गार और बीभत्स का, वीर और भयानक का, शान्त और रौद्र का, अथवा शान्त और शृङ्गार का । यह आशङ्का करके यह कहते हैं— अन्य रस के अङ्गी होने पर अविरोधी अथवा विरोधी रस को परिपोष तक नहीं पहुँचाना चाहिए, इस प्रकार विरोध नहीं होगा ॥ २४ ॥ लोचनम् शृङ्गाराद्भुतयोरिति। यथा रत्नावल्यामैन्द्रजालिकदर्शने। शृङ्गारबीभत्सयोरिति । ययोर्हि परस्परोन्मूलनात्मकतयैवोद्भवस्तत्र कोऽङ्गाङ्गिभावः आलम्बननिमग्न- रूपतया च रतिरुत्तिष्ठति ततः पलायमानरूपतया जुगुप्सेति समानाश्रयत्वेन तयोरन्योन्यसंस्कारोन्मूलनत्वम् । भयोत्साहावप्येवमेव विरुद्धौ वाच्यौ । शान्तस्यापि तत्त्वज्ञानसमुत्थितसमस्तसंसारविषयनिर्वेदप्राणत्वेन सर्वतो निरीहस्वभावस्य विषयासक्तिजीविताभ्यां रतिक्रोधाभ्यां विरोध एव ॥ २३ ॥ अविरोधी विरोधी वेति । वाग्रहणस्यायमभिप्रायः—अङ्गिरसापेक्षया यस्य शृङ्गार और अद्भुत का—। जैसे 'रत्नावली' में ऐन्द्रजालिक के दर्शन के प्रसङ्ग में । शृङ्गार और बीभत्स का—। जिन ( शृङ्गार और बीभत्स का परस्पर उन्मूलनात्मक रूप से ही उद्भव है वहाँ कौन सा अङ्गाङ्गिभाव होगा ? आलम्बन में निमग्नरूपता से रति का उद्भव होता है और उस ( आलम्बन ) से पलायमानरूपता से जुगुप्सा का उदय होता है । इसलिए समानाश्रय रूप से दोनों एक दूसरे के संस्कारों का उन्मूलन करते हैं । भय और उत्साह भी इसी प्रकार विरुद्ध कहे जाने चाहिए । तत्त्वज्ञान से समुत्थित समस्त संसार के विषय में निर्वेद प्राण होने के कारण सब प्रकार से निरीहस्वभाव शान्त का भी विषयासक्ति से अनुप्राणित रति और क्रोध से विरोध ही है ॥ २३ ॥ अविरोधी अथवा विरोधी—। 'अथवा' ग्रहण का यह अभिप्राय है—अङ्गी रस की

तृतीय उद्योतः ४२१ ध्वन्यालोकः अङ्गिनि रसान्तरे शृङ्गारादौ प्रबन्धव्यङ्ग्ये सति अविरोधी विरोधी वा रसः परिपोषं न नेतव्यः। तत्राविरोघिनो रसस्याङ्गिरसापेक्षया- त्यन्तमाधिक्यं न कर्तव्यमित्ययं प्रथमः परिपोषपरिहारः। उत्कर्ष- साम्येऽपि तयोर्विरोधासम्भवात्। यथा— अन्य शृङ्गार आदि रस के अङ्गी अर्थात् प्रबन्धव्यङ्ग्य होने पर अविरोधी अथवा विरोधी रस को परिपोष तक नहीं पहुँचाना चाहिए। उसमें अविरोधी रस का अङ्गी रस की अपेक्षा अत्यन्त आधिक्य नहीं करना चाहिए, इस प्रकार यह पहला परिपोष का परिहार है। उत्कर्ष का साम्य होने पर भी उन दोनों का विरोध सम्भव नहीं। जैसे— लोचनम् रसान्तरस्योत्कर्षो निवध्यते तदा तदविरुद्धोऽपि रसो निबद्धश्चोद्यावहः। अथ तु युक्त्याङ्गिनि रसेऽङ्गभावतानयेनोपपत्तिर्घटते तद्विरुद्धोऽपि रसो वक्ष्यमाणेन विषयभेदादियोजनानोपनिबध्यमानो न दोषावह इति विरोधाविरोधाव- किञ्चित्करौ। विनिवेशनप्रकार एव त्ववधातव्यमिति। अङ्गिनीति सप्तम्यनादरे। अङ्गिनं रसविशेषमनादृत्य न्यक्कृत्याङ्गभूतो न पोषयितव्य इत्यर्थः। अविरोधि- तेति। निर्दोषतेत्यर्थः। परिपोषपरिहारे त्रीन् प्रकारानाह—तत्रेत्यादिना तृतीय इत्यन्तेन। ननु न्यूनत्वं कर्तव्यमिति वाच्ये आधिक्यस्य का सम्भावना येनोक्त- माधिक्यं न कर्तव्यमित्याशङ्क्याह—उत्कर्षसाम्य इति। अपेक्षा जिस अन्य रस का उत्कर्ष निबन्धन करते हैं तब उस (अङ्गी रस) के अविरुद्ध भी रस दोषावह होता है। परन्तु युक्तिपूर्वक अङ्गी रस में अङ्गभावता के प्रकार से उपपत्ति घटती है तो उसके (अङ्गी रस के) विरुद्ध भी रस वक्ष्यमाण विषयभेद आदि के योजन से उपनिबद्धयमान होकर दोषावह नहीं होता, इस प्रकार विरोध और अविरोध नहीं कुछ नहीं करते। केवल विनिवेशन के प्रकार में ही अवधान रखना चाहिए। अङ्गी में 'सप्तमी' अनादरार्थक है, अर्थात् अङ्गी रसविशेष का अनादर करके—तिरस्कार करके अङ्गभूत (रस) का पोषण नहीं करना चाहिए। विरोध नहीं (अविरोधिता)—। अर्थात् निर्दोषता। परिपोष के परिहार में तीन प्रकारों को कहते हैं—'उनमें' इत्यादि से लेकर 'तृतीय' तक। 'न्यूनत्व करना चाहिए' यह जब कि कहना चाहिए ऐसी स्थिति में आधिक्य की सम्भावना हो कौन, जिससे कहा कि 'अधिक्य नहीं करना चाहिए'! यह आशङ्का करके कहते हैं—उत्कर्ष का साम्य होने पर भी—।

४२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एकन्तो रुअइ पिआ अण्णन्तो समरतूरणिग्घोसो । णेहेण रणरसेण अ भडस्स दोलाइअं हिअअम् ॥ यथा वा— कण्ठाच्छित्त्वाक्षमालावलयमिव करे हारमावर्तयन्ती कृत्वा पर्यङ्कबन्धं विषधरपतिना मेखलाया गुणेन । मिथ्यामन्त्राभिजापस्फुरदधरपुटव्यञ्जिताव्यक्तहासा देवी सन्ध्याभ्यसूयाहसितपशुपतिस्तत्र दृष्टा तु वोऽव्यात् ॥ एक ओर प्रिया रो रही है दूसरी ओर युद्ध के तूर्य का गर्जन है । स्नेह और रणराग से भट का हृदय दोलायित हो रहा है । अथवा जैसे— कण्ठ से हार निकाल कर अक्षमाला-वलय की भांति हाथ में फेरती हुई, मेखला ( करधनी ) के गुणरूपी सर्पराज के द्वारा पर्यङ्कबन्ध आसन मार कर झूठमूठ के मंत्र पढ़ने से फुरफुराते अधरपुट के द्वारा अव्यक्त हास व्यञ्जित करती हुई, सन्ध्या ( अपनी सौत ) के प्रति ईर्ष्यावश पशुपति ( शिव जी ) का उपहास करती हुई देखी गई देवी ( पार्वती ) आप लोगों की रक्षा करें । लोचनम् एकतो रोदिति प्रिया अन्यतः समरतूर्यनिर्घोषः । स्नेहेन रणरसेन च भटस्य दोलायितं हृदयम् ॥ इति च्छाया । रोदिति प्रियेत्यतो रत्युत्कर्षः । समरतूर्येति भटस्येति चोत्साहोत्कर्षः । दोलायितमिति तयोरन्यूनाधिकतया साम्यमुक्तम् । एतच्च मुक्तकविषयमेव भवति न तु प्रबन्धविषयमिति केचिदाहुस्तच्चासत्; आधिकारिकेष्वितिवृत्तेषु त्रिवर्गफलसमप्राधान्यस्य सम्भवात् । तथाहि— रत्नावल्यां सचिवायत्तसिद्धित्वाभिप्रायेण पृथिवीराज्यलाभ आधिकारिकं फलं कन्यारत्नलाभः प्रासङ्गिकं फलं, नायकाभिप्रायेण तु विपर्यय इति स्थिते मन्त्रिबुद्धौ नायकबुद्धौ च स्वाम्यमात्यबुद्ध्येकत्वात्फलमिति नीत्या एकीक्रिय- 'प्रिया रो रही है' यहाँ 'रति' का उत्कर्ष है । और 'युद्ध का तूर्य' यह भट के उत्साह का उत्कर्ष है । 'दोलायित' के द्वारा उन दोनों ( रति और उत्साह ) का अन्यूनाधिक ( न कम न ज्यादा ) होने के कारण साम्य कहा है । 'यह मुक्तक में ही होता है न कि प्रबन्ध में होता है' यह कुछ लोगों ने कहा है वह ठीक नहीं; क्योंकि आधिकारिक इतिवृत्तों में त्रिवर्ग रूप फल का समप्राधान्य सम्भव है । जैसा कि— 'रत्नावली' में 'सचिवायत्तसिद्धित्व' के अभिप्राय से पृथ्वी के राज्य का लाभ आधि- कारिक फल है और कन्यारत्न का लाभ प्रासङ्गिक फल है, परन्तु नायक के अभिप्राय से विपरीत है, ऐसी स्थिति में स्वामी और अमात्य की बुद्धि के एक होने से फल होता है इस नीति से मन्त्री की बुद्धि और नायक की बुद्धि के एक किए जाने पर समप्राधान्य

तृतीय उद्योतः ४२३ ध्वन्यालोकः इत्यत्र । अङ्गिरसविरुद्धानां व्यभिचारिणां प्राचुर्येणानिवेशनम् , निवेशने वा क्षिप्रमेवाङ्गिरसव्यभिचार्यनुवृत्तिरिति द्वितीयः । अङ्गत्वेन पुनः पुनः प्रत्यवेक्षा परिपोषं नीयमानस्याप्यङ्गभूतस्य यहाँ पर । अङ्गी रस के विरुद्ध व्यभिचारी भावों का अधिकता से निवेश न करना, अथवा निवेश करने पर शीघ्र ही अङ्गी रस के व्यभिचारी की अनुवृत्ति यह दूसरा ( परिपोष का परिहार ) है । परिपोष तक पहुँचाए गए भी अङ्गभूत रस की अङ्ग रूप से बार-बार प्रत्यवेक्षा, लोचनम् माणायां समप्राधान्यमेव पर्यवस्यति । यथोक्तम्-‘कवेः प्रयत्नान्नेतॄणां युक्तानाम्’ इत्यलमवान्तरेण बहुना । एवं प्रथमं प्रकारं निरूप्य द्वितीयमाह—अङ्गीति । अनिवेशनमिति । अङ्गभूते रस इति शेषः । नन्वेवं नासौ परितुष्टो भवेदित्याशङ्क्य—निवेशने वेति । अत एव वाग्रहणमुत्तरपक्षदार्ढ्यं सूचयति न विकल्पम् । तथा चैक एवायं प्रकारः । अन्यथा तु द्वौ स्याताम् । अङ्गिनो रसस्य यो व्यभिचारी तस्यानुवृत्तिरनु- सन्धानम् । यथा—‘कोपात्कोमललोल’ इति श्लोकेऽङ्गभूतायां रतावङ्गत्वेन यः क्रोध उपनिबद्धस्तत्र बद्ध्वा दृढम्-इत्यमर्षस्य निवेशितस्य क्षिप्रमेव रुदत्येति हसन्निति च इत्युचितेष्यौत्सुक्यहर्षानुसन्धानम् । तृतीयं प्रकारमाह—अङ्गत्वेनेति । अत्र च तापसवत्सराजे वत्सराजस्य ही पर्यवसित होता है । जैसे कहा है—‘कवि के प्रयत्न से युक्त नायकों का०’ यह बहुत अवान्तर चर्चा ठीक नहीं । इस प्रकार प्रथम प्रकार का निरूपण करके दूसरे को कहते हैं—अङ्गी—। निवेशन न करना—। शेष यह कि अङ्गभूत रस में । इस प्रकार वह परितुष्ट नहीं होगा, यह आशङ्का करके मतान्तर कहते हैं—अथवा निवेशन में—। अतएव ‘अथवा’ ग्रहण उत्तर पक्ष का दार्ढ्य सूचित करता है न कि विकल्प । जैसा कि यह एक ही प्रकार है, अन्यथा दो होते । अङ्गी रस का जो व्यभिचारी है उसकी अनुवृत्ति अर्थात् अनुसन्धान । जैसे—‘कोपात् कोमललोल०’ इस श्लोक में अङ्गभूत रति में अङ्गरूप से जो क्रोध उपनिबद्ध किया गया है उसमें ‘बद्ध्वा दृढं’ से निवेशित अमर्ष के शीघ्र ही ( व्यभिचारी रूप से ) ‘रुदत्या’ और ‘हसन्’ इस रति के उचित औत्सुक्य और हर्ष से अनुसन्धान है । तीसरा प्रकार कहते हैं—अङ्ग रूप से—। यहाँ पर ‘तापसवत्सराज’ में वत्सराज का

४२४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः रसस्येति तृतीयः । अनया दिशान्येऽपि प्रकारा उत्प्रेक्षणीयाः । विरोधिनस्तु रसस्याङ्गिरसापेक्षया कस्यचिन्न्यूनता सम्पादनीया । यथा शान्तेऽङ्गिनी शृङ्गारस्य शृङ्गारे वा शान्तस्य । परिपोषरहितस्य रसस्य कथं रसत्वमिति चेत्—उक्तमत्राङ्गिरसापेक्षयेति । अङ्गिनो हि रसस्य यावान् परिपोषस्तावंस्तस्य न कर्तव्यः, स्वतस्तु सम्भवी परिपोषः केन वार्यते । एतच्चापेक्षिकं प्रकर्षयोगित्वमेकस्य रसस्य यह तीसरा (परिपोष का परिहार) है । इस प्रकार से अन्य प्रकारों की भी उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिए । अङ्गी रस की अपेक्षा किसी विरोधी रस की न्यूनता सम्पादन करनी चाहिए । जैसे अङ्गी शान्त (रस) में शृङ्गार की अथवा शृङ्गार में शान्त की । यदि कहो कि परिपोषरहित रस का रसत्व कैसा ? तो यहाँ कह चुके हैं 'अङ्गी रस की अपेक्षा' । अङ्गी रस का जितना परिपोष है उतना उसका नहीं करना चाहिए, परन्तु स्वतः होने वाले परिपोष को कौन निवारण कर सकता है ? बहुत रसों वाले प्रबन्धों में एक रस का रसों के साथ अङ्गाङ्गिभाव न स्वीकार करने वाला भी इस आपेक्षिक प्रकर्ष का निराकरण नहीं कर सकता, इस प्रकार से अविरोधी और विरोधी लोचनम् पद्मावतीविषयः सम्भोगशृङ्गार उदाहरणीकर्तव्यः । अन्येऽपीति । विभावानु- भावानां चापि उत्कर्षो न कर्तव्योऽङ्गिरसविरोधिनां निवेशनमेव वा न कार्यम्, कृतमपि चाङ्गिरसविभावानुभावैरुपबृंहणीयम् । परिपोषिता अपि विरुद्धरस- विभावानुभावा अङ्गत्वं प्रति जागरयितव्या इत्यादि स्वयं शक्यमुत्प्रेक्षितुम् । एवं विरोध्यविरोधिसाधारणं प्रकारमभिधाय विरोधिविषया साधारणदोष- परिहारप्रकारगतत्वेनैव विशेषान्तरमप्याह—विरोधिन इति । सम्भवीति । प्रधानावरोधित्वेनेति शेषः । एतच्चेति । उपकार्योपकारकभावो रसानां नास्ति पद्मावती के प्रति सम्भोग शृङ्गार को उदाहरण देना चाहिए । अन्य प्रकारों की भी—। और विभावों तथा अनुभावों का भी उत्कर्ष नहीं करना चाहिए, अथवा अङ्गी रस के विरोधी (विभावों तथा अनुभावों) का निवेश ही नहीं करना चाहिए, कर देने पर भी अङ्गी रस के विभावों तथा अनुभावों का पोषण करना चाहिए । परिपोषित भी विरुद्ध रस के विभाव तथा अनुभावों को अङ्गत्व के प्रति जागरित करना चाहिए, इत्यादि स्वयं उत्प्रेक्षा की जा सकती है । इस प्रकार विरोधी और अविरोधी के साधारण प्रकार का अभिधान करके विरोधी के विषय में असाधारण दोषपरिहार के प्रकार में ही विशेषान्तर की चर्चा करते हैं—परन्तु विरोधी—। सम्भव होने वाला—। शेष यह कि प्रधान के अविरोधी रूप से । इस (आपेक्षिक)—। रसों का उपकार्योप-

तृतीय उद्योतः ४२५ ध्वन्यालोकः बहुरसेषु प्रबन्धेषु रसानामङ्गाङ्गिभावमनभ्युपगच्छताप्यशक्यप्रतिक्षेप- मित्यनेन प्रकारेणाविरोधिनां विरोधिनां च रसानामङ्गाङ्गिभावेन समावेशे प्रबन्धेषु स्यादविरोधः । एतच्च सर्वं येषां रसो रसान्तरस्य व्यभिचारी- रसों का अङ्गाङ्गिभाव से समावेश होने पर प्रबन्धों में विरोध न होगा । और यह सब उनके मत से कहा गया है जिनका यह सिद्धान्त है कि रस रसान्तर का व्यभि- लोचनम् स्वचमत्कारविश्रान्तत्वात् ; अन्यथा रसत्वायोगात् , तदभावे च कथमङ्गाङ्गि- तेत्यपि येषां मतं तैरपि कस्यचिद्रसस्य प्रकृष्टत्वं भूयः प्रबन्धव्यापकत्वमन्येषां चाल्पप्रबन्धानुगामित्वमभ्युपगन्तव्यमितिवृत्तसङ्घटनाया एवान्यथानुपपत्तेः, भूयः प्रबन्धव्यापकस्य च रसस्य रसान्तरैर्यदि न काचित्सङ्गतिस्तदितिवृत्त- स्यापि न स्यात्सङ्गतिश्छेदयमेवोपकार्योपकारकभावः । न च चमत्कारविश्रान्ते- विरोधः कश्चिदिति समनन्तरमेवोक्तं तदाह—अनभ्युपगच्छतापीति । शब्दमात्रे- णासौ नाभ्युपगच्छति । अकाम एवाभ्युपगमयितव्य इति भावः । अन्यस्तु व्याचष्टे-एतच्चापेक्षिकमित्यादिग्रन्थो द्वितीयमतमभिप्रेत्य यत्र रसानामुपकार्योप- कारकता नास्ति, तत्रापि हि भूयो वृत्तव्याप्तत्वमेवाङ्गित्वमिति । एतच्चासत् ; एवं हि एतच्च सर्वमिति सर्वशब्देन य उपसंहार एकपक्षविषयः मतान्तरेऽपीत्यादिना च यो द्वितीयपक्षोपक्रमः सोऽतीव दुःश्लिष्ट इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह बहुना संलापेन । येषामिति । भावाध्यायसमाप्तावस्ति श्लोकः— कारकभाव नहीं है, क्योंकि ( वे ) अपने ही चमत्कार में विश्रान्त होते हैं । अन्यथा ( उनका ) रसत्व नहीं बन सकेगा । और रसत्व के अभाव में ( उनका ) अङ्गाङ्गिभाव कैसा ? यह भी जिनका मत है उन्हें भी किसी रस का प्रकृष्टत्व अर्थात् प्रबन्ध में अधिक व्यापकत्व और अन्य ( रसों ) का थोड़े प्रबन्ध में अनुगामित्व स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि इसके बिना इतिवृत्त सङ्घटन ही उपपन्न होगा । और प्रबन्ध में अधिक व्यापक रस का रसान्तरों के साथ यदि कोई सम्बन्ध नहीं, तब इतिवृत्त का भी सम्बन्ध नहीं है, ( इस लिए ) यही उपकार्योपकारकभाव है । चमत्कारविश्रान्ति का कोई विरोध नहीं है यह जो अभी कहा है उसे कहते हैं—न स्वीकार करने वाला भो—। वचनमात्र से वह स्वीकार नहीं करता । भाव यह कि नहीं चाहता हुआ भी वह स्वीकार कराने योग्य है । किन्तु दूसरे व्याख्यान करते हैं—‘इस आपेक्षिक’ इत्यादि ग्रन्थ दूसरे मत को अभिप्रेत करके है, जहाँ रसों का उपकार्योपकारकभाव नहीं है, वहाँ भी वृत्त ( अर्थात् कथा ) में अधिक व्याप्तत्व रूप ही अङ्गित्त्व है’ । यह ( व्याख्यान ) ठीक नहीं । क्योंकि इस प्रकार ‘और यह सब’ यहाँ ‘सब’ शब्द से एक पक्ष का उपसंहार है और ‘मतान्तर में भी’ इत्यादि द्वारा जो-जो दूसरे पक्ष का उपक्रम है वह अतीव दुःश्लिष्ट ( बेमेल ) होगा । अपने पूर्वजों के साथ बहुत संलाप ठीक नहीं । जिनका—। भावाध्याय की समाप्ति में श्लोक है—

४२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम्

बहूनां समवेतानां रूपं यस्य भवेद्बहु । स मन्तव्यो रसस्थायी शेषाः सञ्चारिणो मताः ॥ इति । तत्रोक्तक्रमेणाधिकारिकेतिवृत्तव्यापिका चित्तवृत्तिरवश्यमेव स्थायित्वेन भाति प्रासङ्गिकवृत्तान्तगामिनी तु व्यभिचारित्येति रस्यमानतासमये स्थायि- व्यभिचारिभावस्य न कश्चिद्विरोध इति केचिद्व्याचचक्षिरे । तथा च आगुरि- रपि किं रसानामपि स्थायिसञ्चारितास्तीत्याक्षिप्याभ्युपगमेनैवोत्तरमवोच- द्बाढमस्तीति । अन्ये तु स्थायितया पठितस्यापि रसस्य रसान्तरे व्यभिचारित्वमस्ति, यथा क्रोधस्य वीरे व्यभिचारितया पठितस्यापि स्थायित्वमेव रसान्तरे, यथा तत्त्वज्ञानविभावकस्य निर्वेदस्य शान्ते; व्यभिचारिणो वा सत एव व्यभिचार्य- न्तरापेक्षया स्थायित्वमेव, यथा विक्रमोर्वश्यामुन्मादस्य चतुर्थेऽङ्के इतीयन्त- मर्थमवबोधयितुमयं श्लोकः बहूनां चित्तवृत्तिरूपाणां भावानां मध्ये यस्य बहुलं रूपं यथोपलभ्यते स स्थायी भावः, स च रसो रसीकरणयोग्यः; शेषास्तु सञ्चारिण इति व्याचक्षते, न तु रसानां स्थायिसञ्चारिभावेनाङ्गाङ्गित्वोक्तेति । अत एवान्ये रसस्थायीति षष्ठ्या सप्तम्या द्वितीयया वाश्रितादिषु गम्यादीना-

बहुत से समवेत भावों में जिस (भाव) का रूप बहुत (अर्थात् व्यापक) हो उस स्थायी (भाव) को रस मानना चाहिए, शेष सञ्चारी (भाव) माने जाते हैं। उस (श्लोक) में उक्त क्रम के अनुसार आधिकारिक इतिवृत्त में व्याप्त रहने वाली चित्तवृत्ति अवश्य ही स्थायी रूप से प्रतीत होती है और प्रासङ्गिक वृत्तान्त में रहने वाली (चित्तवृत्ति) व्यभिचारी रूप से (प्रतीत होती है), इस प्रकार रसास्वाद के समय में स्थायी और व्यभिचारी भाव का कोई विरोध नहीं है, यह कुछ लोगों ने व्याख्यान किया है। जैसा कि भागुरि ने भी 'क्या रसों का भी स्थायित्व और सञ्चारित्व है?' इस (प्रश्न) का आक्षेप करके 'अभ्युपगम' से ही उत्तर कहा है 'हां जरूर है'। किन्तु अन्य लोग यह व्याख्यान करते हैं कि स्थायी रूप से पठित भी रस रसान्तर में व्यभिचारी हो जाता है, जैसे क्रोध वीर में; व्यभिचारी रूप से पठित भी (रस) रसान्तर में स्थायी ही हो जाता है, जैसे तत्त्वज्ञान रूप विभाव वाला निर्वेद शान्त में; अथवा व्यभिचारी की अवस्था में ही अन्य व्यभिचारी की अपेक्षा स्थायी ही होता है, जैसे 'विक्रमोर्वशी' में उन्माद चतुर्थ अङ्क में; इतने अर्थ को जताने के लिए यह श्लोक है, बहुत से चित्तवृत्ति रूप भावों के बीच जिसका बहुत रूप जैसे उपलब्ध होता है वह स्थायी भाव है, और वह रस रसीकरण के योग्य है, शेष तो सञ्चारी (भाव) हैं। न कि रसों का स्थायित्व और सञ्चारित्व रूप से अङ्गाङ्गिभाव कहा गया है। अतएव अन्य लोग 'रसस्थायी' यह षष्ठी, सप्तमी अथवा द्वितीया से आश्रित आदि में 'गम्यादीनां०' से

तृतीय उद्योतः ४२७ ध्वन्यालोकः भवति इति दर्शनं तन्मतेनोच्यते । मतान्तरेऽपि रसानां स्थायिनो भावा उपचाराद्रसशब्देनोक्तास्तेषामङ्गत्वं निर्विरोधमेव ॥ २४ ॥ एवमविरोधिनां विरोधिनां च प्रबन्धस्थेनाङ्गिना रसेन समावेशे साधारणमविरोधोपायं प्रतिपाद्येदानीं विरोधिविषयमेव तं प्रतिपाद- यितुमिदमुच्यते— विरुद्धैकाश्रयो यस्तु विरोधी स्थायिनो भवेत् । स विभिन्नाश्रयः कार्यस्तस्य पोषेऽप्यदोषता ॥ २५ ॥ ऐकाधिकरण्यविरोधी नैरन्तर्यविरोधी चेति द्विविधो विरोधी । चारी होता है। किन्तु मतान्तर में भी रसों के स्थायी भाव उपचार से (लक्षणा द्वारा) 'रस' शब्द से कहे गए हैं, उनका अङ्गत्व निर्विरोध ही है ॥ २४ ॥ इस प्रकार अविरोधी और विरोधी (रसों) का प्रबन्ध में रहने वाले अङ्गी रस के साथ समावेश में अविरोध का साधारण उपाय प्रतिपादन करके अब उस विरोधी (रस) के उसे ही प्रतिपादन करने के लिए यह कहते हैं— स्थायी का जो विरोधी एकाश्रय रूप से विरोधी हो उसे विभिन्नाश्रय कर देना चाहिए, (ऐसी स्थिति में) उसके परिपोष होने पर भी दोष नहीं ॥ २५ ॥ विरोधी (रस) दो प्रकार का है—ऐकाधिकरण्यविरोधी और नैरन्तर्यविरोधी । विरुद्ध एक आश्रय वाला जो विरोधी है, जैसे वीर के साथ भयानक, उसे विभिन्नाश्रय लोचनम् मिति समासं पठन्ति । तदाह—मतान्तरेऽपीति । रसशब्देनेति । 'रसान्तर- समावेशः प्रस्तुतस्य रसस्य यः' इत्यादिप्राक्तनकारिकानिविष्टेनेत्यर्थः ॥ २४ ॥ अथ साधारणं प्रकारमुपसंहरन्नसाधारणमासूत्रयति—एवमिति । तमित्यवि- रोधोपायम् । विरुद्धेति विशेषणं हेतुगर्भम् । यस्तु स्थायी स्थाय्यन्तरेणासंभाव्य- मानैकाश्रयत्वाद्विरोधी भवेद्यथोत्साहेन भयं स विभिन्नाश्रयत्वेन नायकविपक्षा- समास पढ़ते हैं। उसे कहते हैं—मतान्तर में भी—। 'रस' शब्द से—। अर्थात् 'प्रस्तुत रस का जो रसान्तर में समावेश है' इत्यादि प्राचीन कारिका में निविष्ट ('रस' शब्द से) ॥ २४ ॥ अब साधारण प्रकार का उपसंहार करते हुए असाधारण (प्रकार) का सूत्र बनाते हैं—इस प्रकार—। 'उसे' अर्थात् अविरोध का उपाय । 'विरुद्ध' यह हेतुगर्भ विशेषण है। जो स्थायी अन्य स्थायी के साथ एकाश्रय रूप से रहने में सम्भव न होने कारण विरोधी हो, जैसे उत्साह के साथ भय, वह विभिन्नाश्रय रूप से नायक के विपक्ष आदि में

४२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र प्रबन्धस्थेन स्थायिनाऽङ्गिना रसेनाौचित्यापेक्षया विरुद्धैकाश्रयो यो विरोधी यथा वीरेण भयानकः स विभिन्नाश्रयः कार्यः । तस्य वीरस्य य आश्रयः कथानायकस्तद्विपक्षविषये सन्निवेशयितव्यः । तथा सति च तस्य विरोधिनोऽपि यः परिपोषः स निर्दोषः । विपक्ष- विषये हि भयातिशयवर्णने नायकस्य नयपराक्रमादिसम्पत्सुतरामु- द्योतिता भवति । एतच्च ऽमदीयेऽर्जुनचरितेऽर्जुनस्य पातालावतरण- प्रसङ्गे वैशद्येन प्रदर्शितम् । एवमैकाधिकरण्यविरोधिनः प्रबन्धस्थेन स्थायिना रसेनाङ्गभाव- कर देना चाहिए । उस वीर ( रस ) का जो आश्रय कथानायक है उसके विपक्ष ( अर्थात् प्रतिनायक ) में ( उस भयानक रस ) का सन्निवेश करना चाहिए । ऐसी स्थिति में उस विरोधी का भी जो परिपोष है वह निर्दोष है । क्योंकि विपक्ष में अतिशय भय के वर्णन करने पर नायक की नीति, पराक्रम आदि सम्पत्ति सुतरां प्रकाशित हो जाती है । यह मेरे 'अर्जुनचरित' में अर्जुन के पातालावतरण के प्रसंग में स्पष्ट रूप से दिखाया गया है । इस प्रकार ऐकाधिकरण्यविरोधी का प्रबन्ध में रहने वाले स्थायी रस के साथ लोचनम् दिगामित्वेन कार्यः । तस्येति । तस्य विरोधिनोऽपि तथाकृतस्य तथानिबद्धस्य परिपुष्टतायाः प्रत्युत निर्दोषता नायकोत्कर्षाधानात् । अपरिपोषणन्तु दोष एवेति यावत् । अपिशब्दो भिन्नक्रमः । एवमेव वृत्तावपि व्याख्यानात् । ऐकाधिकरण्यमेकाश्रयेण सम्बन्धमात्रम्, तेन विरोधी यथा—भयेनोत्साहः, एकाश्रयत्वेऽपि सम्भवति कश्चिन्निरन्तरत्वेन निर्व्यवधानत्वेन विरोधी, यथा रत्या निर्वेदः । प्रदर्शितमिति । 'समुत्थिते धनुर्ध्वनौ भयावहे किरीटिनो महानुपप्लवोऽभवत्पुरे पुरन्दरद्विषाम् ।' इत्यादिना ॥ २५ ॥ जाने वाला किया जाना चाहिए । उसका— । उस प्रकार निबद्ध उस विरोधी की भी परिपुष्टता के कारण प्रत्युत निर्दोषता होगी, क्योंकि नायक के उत्कर्ष का आधान होता है । अपरिपोषण तो दोष ही होगा । 'भी' शब्द भिन्नक्रम है । क्योंकि इसी प्रकार वृत्ति में भी व्याख्यान है । ऐकाधिकरण्य अर्थात् एक आश्रय से सम्बन्ध मात्र, उससे विरोधी, जैसे भय से उत्साह । एकाश्रयत्व के सम्भव होने पर भी कोई नैरन्तर्य अर्थात् निर्व्यव- धानत्व के कारण विरोधी होता है, जैसे रति से निर्वेद दिखाया गया है— । 'अर्जुन के गाण्डीव की भयावह आवाज के होने पर इन्द्र-शत्रु असुरों के नगर में बड़ी खलबली मच गई' इत्यादि द्वारा ॥ २५ ॥

तृतीय उद्योतः ४२९ ध्वन्यालोकः गमने निर्विरोधित्वं यथा तथा प्रदर्शितम्। द्वितीयस्य तु तत्प्रतिपाद- यितुमुच्यते— एकाश्रयत्वे निर्दोषो नैरन्तर्ये विरोधवान् । रसान्तरव्यवधिना रसो व्यङ्ग्यः सुमेधसा ॥ २६ ॥ यः पुनरेकाधिकरणत्वे निर्विरोधो नैरन्तर्ये तु विरोधी स रसान्त- रव्यवधानेन प्रबन्धे निवेशयितव्यः । यथा शान्तशृङ्गारौ नागानन्दे निवेशितौ । अङ्गभाव प्राप्त करने में निर्विरोधत्व जैसा है वैसा उसे दिखाया । दूसरे का उसे प्रति- पादन करने के लिए कहते हैं— एकाश्रय होने में निर्दोष और नैरन्तर्य में विरोधी रस को सुमेधा (कवि) रसान्तर का व्यवधान करने से व्यञ्जित करे ॥ २६ ॥ जो एकाधिकरण होने में निर्विरोध है, किन्तु नैरन्तर्य में विरोधी है उसे रसान्तर के व्यवधान से प्रबन्ध में निवेशित करना चाहिए । जैसे शान्त और शृङ्गार नागानन्द में निवेशित किए गए हैं । लोचनम् द्वितीयस्येति । नैरन्तर्यविरोधिनः । तदिति । निर्विरोधित्वम् । एकाश्रयत्वेन निमित्तेन यो निर्दोषः न विरोधी किं तु निरन्तरत्वेन निमित्तेन विरोधमेति स तथाविधविरुद्धरसद्वयाविरुद्धेन रसान्तरेण मध्ये निवेशितेन युक्तः कार्य इति कारिकार्थः । प्रबन्ध इति बाहुल्यापेक्षं, मुक्तकेऽपि कदाचिदेवं भवेदपि । यद्वक्ष्यति—‘एकवाक्यस्थयोरपि’ इति । यथेति । तत्र हि—‘रागस्यास्पदमित्य- वैमि न हि मे ध्वंसीति न प्रत्ययः’ इत्यादिनोपक्षेपात्प्रभृति परार्थशरीरवित- रणात्मकनिर्वहणपर्यन्तः शान्तो रसस्तस्य विरुद्धो मलयवतीविषयः शृङ्गार- स्तदुभयाविरुद्धमद्भुतमन्तरीकृत्य क्रमप्रसरसम्भावनाभिप्रायेण कविना दूसरे का—। अर्थात् नैरन्तर्यविरोधी का । उसे—। निर्विरोधित्व को । कारिका का अर्थ यह है कि एकाश्रयत्व रूप कारण से जो निर्दोष अर्थात् विरोधी नहीं है, किन्तु निरन्तरत्व रूप कारण से विरोध ग्रहण करता है उसे उस प्रकार के विरुद्ध दो रसों के बीच अविरुद्ध रसान्तर के साथ युक्त करना चाहिए । प्रबन्ध में—। अपेक्षा करके बहुल रूप से, कदाचित् उस प्रकार मुक्तक में भी हो सकता है । जिसे कहेंगे—‘एक वाक्य में स्थित का भी’ । जैसे—। क्योंकि वहां—‘जिस (शरीर) का राग का आस्पद’ करके समझता हूं, (वह शरीर) मेरा विश्वास नहीं कि ध्वंसशील नहीं है !' इत्यादि ‘उपक्षेप’ से लेकर दूसरे के लिए शरीर का वितरण रूप ‘निर्वहण’ तक शान्त रस है, उसके विरुद्ध मलयवतीविषयक शृङ्गार को, उन दोनों (शान्त और शृङ्गार) के अविरुद्ध अद्भुत

४३० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शान्तश्च तृष्णाक्षयसुखस्य यः परिपोषस्तल्लक्षणो रसः प्रतीयत एव । तथा चोक्तम्— और शान्त, तृष्णाक्षय रूप सुख का जो परिपोष है तद्रूप रस प्रतीत होता ही है । जैसा कि कहा है— लोचनम् निबद्धः 'अहो गीतमहो वादित्रम्' इति । एतदर्थमेव 'व्यक्तिर्व्यञ्जनधातुना' इत्यादि नीरसप्रायमप्यत्र निबद्धमद्भुतरसपरिपोषकतयात्यन्तरसरसता- वहमिति 'निर्दोषदर्शनाः कन्यकाः' इति च क्रमप्रसरो निबद्धः । यथाहूः— 'चित्तवृत्तिप्रसरप्रसंख्यानधनाः सांख्याः पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिक- प्रसङ्गेने'ति । अनन्तरं च निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गागतो यः शेखरकवृत्तान्तो- दितहास्यरसोपकृतः शृङ्गारस्तस्य विरुद्धो यो वैराग्यशमपोषको नागीयकलेवरा- स्थिजालावलोकनादिवृत्तान्तः स मित्रावसोः प्रविष्टस्य मलयवतीनिर्गमन- कारिणः 'संसर्पद्भिः समन्तात्' इत्यादि काव्योपनिबद्धक्रोधव्यभिचार्युपकृत- वीररसान्तरितो निवेशितः । ननु नास्त्येव शान्तो रसः तस्य तु स्थाय्येव नोपदिष्टो मुनिनेत्याशङ्क्याह— शान्तश्चेति । तृष्णानां विषयाभिलाषाणां यः क्षयः सर्वतो निवृत्तिरूपो निर्वेदः ( रस ) को मध्य में रखकर कवि ने क्रम से प्रसर की सम्भावना के अभिप्राय से निव- न्धन किया है 'अहो गीतं अहो वादित्रं' । एतदर्थ ही 'व्यक्तिर्व्यञ्जनधातुना' इत्यादि अद्भुत रस के परिपोषक रूप से अत्यन्त रस की रसता का वहन करने वाले इस नीरस- प्राय को भी यहां निबन्धन किया है और 'निर्दोषदर्शनाः कन्यकाः' यह क्रम से प्रसर को भी निबन्धन किया है । जैसे चित्तवृत्ति के प्रसरों में दोषदर्शन करने वाले साङ्ख्य लोग कहते हैं—'निमित्त ( धर्म आदि ) और नैमित्तिक ( स्थूल देह आदि ) के प्रसङ्ग ( सम्बन्ध ) से यह ( लिङ्ग अर्थात् सूक्ष्म शरीर नट की भांति विविध रूप धारण करके ) पुरुषार्थ फल के लिए व्यवस्थित होता है' । अनन्तर जो निमित्त-नैमित्तिक के प्रसङ्ग से आया हुआ, शेखरक के वृत्तान्त से उत्पन्न हास्य-रस से उपकृत शृङ्गार है उसके विरुद्ध जो वैराग्य एवं शम का पोषक, नाग के शरीर में अस्थिजाल का अवलोकन आदि वृत्तान्त है वह मलयवती का निर्गमन करने वाले प्रविष्ट मित्रावसु के 'संसर्पद्भिः समन्तात्' इत्यादि काव्य द्वारा उपनिबद्ध क्रोध के व्यभिचारी से उपकृत रस से अन्तरित होकर रखा गया है । ( शङ्का ) शान्त रस तो है ही नहीं, क्योंकि मुनि ने उसके स्थायी का उपदेश नहीं किया है, यह आशङ्का करके कहते हैं—और शान्त—। विषयाभिलाष रूप तृष्णाओं का जो क्षय अर्थात् सब से निवृत्ति रूप निर्वेद है तद्रूप ही सुख है, स्थायी रूप में उस

तृतीय उद्योतः ४३१ ध्वन्यालोकः यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ लोक में जो कामसुख है और जो दिव्य महान् सुख है, ये दोनों तृष्णाक्षय रूप सुख के षोडशांश भी प्राप्त नहीं करते । लोचनम् तदेव सुखं तस्य स्थायिभूतस्य यः परिपोषो रस्यमानताकृतस्तदेव लक्षणं यस्य स शान्तो रसः । प्रतीयत एवेति । स्वानुभवेनापि निवृत्तभोजनाद्यशेषविषये- च्छाप्रसरतत्काले सम्भाव्यत एव । अन्ये तु सर्वचित्तवृत्तिप्रशम एवास्य स्थायीति मन्यन्ते । तृष्णासद्भावस्य प्रसज्यप्रतिषेधरूपत्वे चेतोवृत्तित्वाभावेन भावत्वायोगात् । पर्युदासे त्वस्मत्पक्ष एवायम् । अन्ये तु— स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताद्भावः प्रवर्तते । पुनर्निमित्तापाये तु शान्त एव प्रलीयते ॥ इति भरतवाक्यं दृष्टवन्तः सर्वरससामान्यस्वभावं शान्तमाचक्षाणा अनु- पजातविशेषान्तरचित्तवृत्तिरूपं शान्तस्य स्थायिभावं मन्यन्ते । एतच्च नाती- वास्मत्पक्षाद् दूरम् । प्रागभावप्रध्वंसाभावकृतस्तु विशेषः । युक्तश्च प्रध्वंस एव ( निर्वेद ) का जो रस्यमानताकृत परिपोष है वह रूप है जिसका ऐसा शान्त रस है । प्रतीत होता ही है—। भोजन आदि अशेष विषयों की इच्छा के प्रसरतव के समय अपने अनुभव से भी सम्भावित होता ही है । अन्य लोग सभी चित्तवृत्तियों का प्रशम ही इसका स्थायी है ऐसा मानते हैं । तृष्णा के सद्भाव के प्रसज्यप्रतिषेध ( अर्थात् अत्यन्ताभाव ) होने पर चित्तवृत्ति मात्र के अभाव से भावत्व सम्भव नहीं होगा । पर्युदास के प्रकार से ( मानने पर ) तो हमारा पक्ष ही यह है ( हमें भी यह स्वीकार है कि सभी चित्तवृत्तियों का प्रशम का अर्थ सभी चित्त- वृत्तियों का विरोधी चित्तवृत्तिविशेष है ) । अन्य लोग तो— भाव अपना-अपना निमित्त पाकर शान्त से प्रवृत्त होता है, परन्तु फिर निमित्त के समाप्त होने पर शान्त में ही प्रलीन हो जाता है । इस भरत-वाक्य को देख कर सभी रस के सामान्य स्वरूप का अभाव रूप शान्त को कहते हुए शान्त का स्थायी भाव विशेष में उत्पन्न न होने वाली आन्तर ( अर्थात् आत्मविषयक ) चित्तवृत्ति को मानते हैं । यह भी हमारे पक्ष से अतीव दूर नहीं है । किन्तु भेद प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव का है ( अर्थात् इस मत का प्रागभाव में पर्यव- सान है और हमारे मत का प्रध्वंसाभाव में ) । तृष्णाओं का प्रध्वंसक ही ठीक है ।

४३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तृष्णानाम् । यथोक्तम्—‘वीतरागजन्मादर्शनात्’ इति । प्रतीयत एवेति । मुनिनाप्यङ्गीक्रियत एव ‘क्वचिच्छमः’ इत्यादि वदता । न च तदीया पर्यन्ता- वस्था वर्णनीया येन सर्वचेष्टोपरमादनुभावाभावेनाप्रतीयमानता स्यात् । ‘शृङ्गारादेरपि फलभूमाववर्णनीयतैव पूर्वभूमौ तु ‘तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्’, ‘तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः’ इति सूत्रद्वयनीत्या चित्राकारा यमनियमादिचेष्टा राज्यधुरोद्वहनादिलक्षणा वा शान्तस्यापि जनकादेर्दृष्टैवेत्यनुभावसद्भावाद्यमनियमादिमध्यसम्भाव्यमानभूयोव्यभिचारिस- द्भावाच्च प्रतीयत एव । ननु न प्रतीयते नास्य विभावाः सन्तीति चेत्—न; प्रतीयत एव तावद्सौ। तस्य च भवितव्यमेव प्राक्तनकुशलपरिपाकपरमेश्वरानुग्रहाध्यात्मरहस्यशास्त्र- वीतरागपरिशीलनादिभिर्विभावैरितीयतैव विभावानुभावव्यभिचारिसद्भावः स्थायी च दर्शितः । ननु तत्र हृदयसंवादाभावाद्रस्यमानतैव नोपपन्ना । क एवमाह स नास्तीति, यतः प्रतीयत एवेत्युक्तम् । जैसा कि कहा है—‘क्योंकि रागरहित (पुरुष) का जन्म नहीं देखा जाता’। प्रतीत होता ही है—। ‘कहीं पर शम है’ इत्यादि कथन करते हुए मुनि ने भी अङ्गीकार किया ही है । उस (शान्त) की पर्यन्त अवस्था का वर्णन नहीं करना चाहिए, जिससे समस्त चेष्टाओं के उपरम हो जाने से उस शान्त की) अप्रतीति हो । फल-भूमि (अर्थात् सुरत आदि पर्यन्त भूमि) में शृङ्गार आदि की भी अवर्णनीयता है ही । ‘तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्’ (अर्थात् उक्त निरोध के संस्कार से वह चित्त विक्षेपरहित होकर प्रशान्त- वाही अर्थात् सदृशप्रवाहपरिणामी हो जाता है) और ‘तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारे- भ्यः’ (अर्थात् उस समाधि में स्थित योगी के छिद्रों = अन्तरालों में प्रत्ययान्तर = व्युत्थान रूप ज्ञान होते हैं अर्थात् प्राग्भूत व्युत्थान के अनुभव से उत्पन्न ‘अहं मम’ इत्याकारक क्षीयमाण संस्कारों से भी व्युत्थान रूप ज्ञान होते हैं) इन दोनों सूत्रों के अनुसार राज्यधुरा के 'उद्वहन रूप यम-नियमादि आश्चर्यकारिणी चेष्टाजनक आदि की भी देखी ही गई है इस कारण अनुभावों के सद्भाव से और यम, नियम आदि के बीच सम्भाव्यमान बहुत से व्यभिचारी भावों के सद्भाव से (शान्त रस) प्रतीत होता ही है । यदि यह कहो कि (शान्त रस) प्रतीत नहीं होता, क्योंकि इसके विभाव नहीं हैं, तो ऐसा; वह तो प्रतीत ही होता है और उसके प्राक्तन कुशल (सत्कर्मों) का विपाक, परमेश्वर का अनुग्रह तथा अध्यात्मरहस्य के शास्त्रों और वीतरागों के सम्बन्ध में परि- शीलन आदि विभाव होने ही चाहिए, इस प्रकार इतने से ही विभाव, अनुभाव, सञ्चारी का सद्भाव और स्थायी दिखाया गया । (शङ्का) उस (शान्त रस) में हृदयसंवाद के न होने से रस्यमानता ही नहीं बनती ! (समाधान) कौन ऐसा कहता है कि वह (हृदयसंवाद) नहीं है, क्योंकि ‘प्रतीत होता ही है’ यह कहा जा चुका है ।

तृतीय उद्योतः ४३३ ध्वन्यालोकः यदि नाम सर्वजनानुभवगोचरता तस्य नास्ति नैतावतासा- वलोकसामान्यमहानुभावचित्तवृत्तिविशेषः प्रतिक्षेप्तुं शक्यः । न च वीरे तस्यान्तर्भावः कर्तुं युक्तः । तस्याभिमानमयत्वेन व्यवस्थापनात् । अस्य चाहङ्कारप्रशमैकरूपतया स्थितेः । तयोश्चैवंविधविशेषसद्भावेऽपि यदि वह (शान्त) सभी लोगों के अनुभव का गोचर नहीं है, इतने से अलोक- सामान्य महापुरुषों के चित्तवृत्तिविशेष को निराकरण नहीं किया जा सकता । और वीर में उसका अन्तर्भाव करना ठीक नहीं । क्योंकि उस (वीर) का अभिमानमय रूप से व्यवस्थापन होता है । और यह (शान्त) अहङ्कार के एकमात्र प्रशमरूप से लोचनम् ननु प्रतीयते सर्वस्य श्लाघास्पदं न भवति । तर्हि वीतरागाणां शृङ्गारो न श्लाघ्य इति सोऽपि रसत्वाच्च्यवतामिति तदाह-यदि नामेति । ननु धर्मप्रधा- नोऽसौ वीर एवेति सम्भावयमान आह-न चेति । तस्येति वीरस्य। अभिमान- मयत्वेनेति । उत्साहो ह्यहमेवंविध इत्येवंप्राण इत्यर्थः । अस्य चेति शान्तस्य । तयोश्चेति । ईहामयत्वनिरीहत्वाभ्यामत्यन्तविरुद्धयोरपीति चशब्दार्थः । वीररौ- द्रयोस्त्वत्यन्तविरोधोऽपि नास्ति । समानं रूपं च धर्मार्थकामार्जनोपयोगित्वम् । नन्वेवं दयावीरो धर्मवीरो दानवीरो वा नासौ कश्चित्, शान्तस्यैवेदं नामान्तरकरणम् । तथा हि मुनिः- दानवीरं धर्मवीरं युद्धवीरं तथैव च । रसवीरमपि प्राह ब्रह्मा त्रिविधसम्मितम् ॥ (शङ्का) प्रतीत तो होता है पर सब की प्रशंसा का पात्र नहीं होता (अर्थात् सब लोग उसे नहीं चाहते) । (समाधान) तब तो वीतराग पुरुषों की दृष्टि में शृङ्गार श्लाघ्य नहीं है तो वह भी रसत्व से च्युत हो जाय ! इसे कहते हैं-यदि-। 'वह (शान्त) धर्मप्रधान वीर ही है' यह सम्भावना करते हुए कहते हैं-वीर में...ठीक नहीं-। 'उसका' अर्थात् वीर का । अभिमानमय रूप से-। अर्थात् 'मैं इस प्रकार का हूँ' एतद्-रूप उत्साह होता है । 'और' शब्द का अर्थ है कि ईहामयत्व और निरी- हत्व से अत्यन्त विरुद्ध भी (उन दोनों में) । वीर और रौद्र का तो अत्यन्त विरोध भी नहीं है। धर्म, अर्थ, काम के अर्जन का उपयोगित्व समान रूप है। (शङ्का) इस प्रकार वह दयावीर, धर्मवीर अथवा दानवीर कोई नहीं, बल्कि यह शान्त का ही दूसरा नामकरण है। जैसा कि मुनि कहते हैं- दानवीर, धर्मवीर और उसी प्रकार युद्धवीर ये रस वीर को ही ब्रह्माजी ने तीन प्रकार से विभक्त करके कहा है । २८ ध्व०

४३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यद्यैक्यं परिकल्प्यते तद्वीररौद्रयोरपि तथा प्रसङ्गः । दयाविरादीनां च चित्तवृत्तिविशेषाणां सर्वाकारमहङ्काररहितत्वेन शान्तरसप्रभेदत्वम् , इतरथा तु वीरप्रभेदत्वमिति व्यवस्थाप्यमाने न कश्चिद्विरोधः । तदेवमस्ति शान्तो रसः । तस्य चाविरुद्धरसव्यवधानेन प्रबन्धे विरोधि- रससमावेशे सत्यपि निर्विरोधत्वम् । यथा प्रदर्शिते विषये । रहता है। और उन दोनों में इस प्रकार के विशेष (भेद) के विद्यमान रहने पर भी यदि ऐक्य (अभेद) की परिकल्पना करते हैं तो वीर और रौद्र में भी उस प्रकार का प्रसङ्ग होगा। और दयावीर आदि चित्तवृत्ति-विशेषों के सब प्रकार से अहङ्काररहित होने के कारण शान्त रस के प्रभेद हो सकते हैं, अन्यथा वीर रस के प्रभेद हैं, इस प्रकार व्यवस्था करने पर कोई विरोध नहीं है। तो इस प्रकार शान्त रस है। और प्रबन्ध में अविरुद्ध रस का व्यवधान करके उसके विरोधी रस का समा- वेश होने पर भी विरोध नहीं होगा। जैसे प्रदर्शित विषय में। लोचनम् इत्यागमपुरःसरं त्रैविध्यमेवाभ्यधात् । तदाह—दयावीरादीनाञ्चेत्यादि- ग्रहणेन । विषयजुगुप्सारूपत्वाद् बीभत्सेऽन्तर्भावः शङ्क्येत । सा त्वस्य व्यभिचारिणी भवति न तु स्थायितामेति, पर्यन्तनिर्वाहे तस्या मूलत एव विच्छेदात्। आधिकारिकत्वेन तु शान्तो रसो न निबद्धव्य इति चन्द्रिकाकारः। तच्चेहास्माभिर्न पर्यालोचितं, प्रसङ्गान्तरात् । मोक्षफलत्वेन चायं परमपुरुषार्थ- निष्ठत्वात्सर्वरसेभ्यः प्रधानतमः । स चायमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन काव्य- कौतुके, अस्माभिश्च तद्विवरणे बहुतरकृतनिर्णयपूर्वपक्षसिद्धान्त इत्यलं बहुना ॥ २६ ॥ इस आगम के अनुसार त्रैविध्य ही कहा है। उसे कहते हैं—'और दयावीर आदि' इत्यादि ग्रहण द्वारा । (शान्त रस के स्थायी के) विषयजुगुप्सा रूप होने के कारण वीभत्स में अन्तर्भाव की (कुछ लोग) सम्भावना करते हैं। परन्तु वह (जुगुप्सा) इसकी (शान्त की) व्यभिचारी भाव होती है, न कि स्थायी भाव है, पर्यन्त तक निर्वाह की स्थिति में वह मूल में ही विच्छिन्न हो जाती है। चन्द्रिकाकार का कहना है कि आधिकारिक रूप से शान्त रस को निबन्धन नहीं करना चाहिए। प्रसङ्गान्तर होने के कारण हमने उसका पर्यालोचन नहीं किया है। मोक्ष रूप फल वाला होने के कारण परमपुरुषार्थनिष्ठ होने से यह (शान्त) सभी रसों में प्रधानतम है। उसे हमारे उपाध्याय भट्टतौत ने 'काव्यकौतुक' में और हमने उसके 'विवरण' में पूर्वपक्ष और सिद्धान्त के द्वारा बहुत प्रकार से निर्णय किया है ॥ २६ ॥

तृतीय उद्योतः ४३५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः एतदेव स्थिरीकर्तुमिदमुच्यते— रसान्तरान्तरितयोरेकवाक्यस्थयोरपि । निवर्तते हि रसयोः समावेशे विरोधिता ॥ २७ ॥ रसान्तरव्यवहितयोरेकप्रबन्धस्थयोर्विरोधिता निवर्तत इत्यत्र न काचिद्भ्रान्तिः । यस्मादेकवाक्यस्थयोरपिरसयोरुक्तया नीत्या विरुद्धता निवर्तते । यथा— भूरेणुदिग्धान्नवपारिजातमालारजोवासितबाहुमध्याः । गाढं शिवाभिः परिरभ्यमाणान्सुराङ्गनाश्लिष्टभुजान्तरालाः ॥ सशोणितैः क्रव्यभुजां स्फुरद्भिः पक्षैः खगानामुपवीज्यमानान् । संवीजिताश्चन्दनवारिसेकैः सुगन्धिभिः कल्पलतादुकूलैः ॥ विमानपर्यङ्कतले निषण्णाः कुतूहलाविष्टतया तदानीम् । निर्दिश्यमानांल्ललनाङ्गुलीभिर्वीराः स्वदेहान् पतितानपश्यन् ॥ इसे ही स्थिर करने के लिए यह कहते हैं— एक ही वाक्य में स्थित रहने वाले होने पर भी दो रसों का दूसरे रस के बीच में होने से समावेश होने पर विरोध नहीं होता ॥ २७ ॥ दूसरे रस के बीच में होने से एक ही प्रबन्ध में रहने वाले भी ( रसों का ) विरोध निवृत्त हो जाता है, इसमें कोई भ्रम नहीं । क्योंकि उक्त नीति के अनुसार एक वाक्य में रहने वाले ( रसों ) का भी विरोध निवृत्त हो जाता है । जैसे— नये पारिजात की माला के पराग से वासित बाहुमध्य वाले, सुराङ्गनाओं द्वारा आलिङ्गन किए जाते हुए भुजमध्य वाले, सुगन्धि चन्दन के पानी के छिड़काव से युक्त कल्पलता के दुकूलों द्वारा झले जाते गए, विमान के पर्यङ्क पर बैठे वीरों ने ललनाओं की उंगलियों से दिखाए जाते हुए पृथ्वी की धूल में सने, सियारियों द्वारा कसकर पकड़े जाते हुए, खून से भिंगे और चमकते हुए मांसभक्षी पक्षियों के पंखों से झले जाते हुए अपने शरीरों को उस समय कुतूहल से आविष्ट होकर देखा । लोचनम् स्थिरीकर्तुमिति । शिष्यबुद्धावित्यर्थः । अपिशब्देन प्रबन्धविषयतया सिद्धो- ऽयमर्थ इति दर्शयति—भूरेण्विति । विशेषणैरतीव दूरापेतत्वमसम्भावनास्पद- स्थिर करने के लिए—। अर्थात् शिष्य की बुद्धि में । 'भी' शब्द से यह बात सिद्ध हो चुकी है' यह दिखाते हैं— नये पारिजात—। विशेषणों से बहुत दूर की बात होना