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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अध्याय ७: ज्ञानविज्ञानयोग

ममता दृष्टिका आच्छादन कर । जैसे दौडती है माता धनुर्धर
शिशुके पीछे सदा बद्ध होकर । रहता जो क्रीडारत ॥ ३४ ॥
शिशु जब जो जो खेल दिखाता । उसे स्वर्णमय करती माता ।
वैसे भक्तका प्रभुत्व बढाता । मैं उपासनामें ॥ ३५ ॥
उस उपासना पोषणसे । भक्त मिलन होगा मुझसे ।
देखता है इस भांतिसे । भाता है मुझे ॥ ३६ ॥
अजी ! भक्तकी मुझे है आस । उसकी एक-निष्ठाकी प्यास ।
प्रेमी भक्तोंका अकाल खास । रहता मेरे यहां ॥ ३७ ॥
स्वर्ग औ' मोक्षके पथ । छोड दिये उन्हींके हाथ ।
दिया तन लक्ष्मीके साथ । शेषके आधीन ॥ ३८ ॥
अपने पास केवल एक । रखा है निर्मल प्रेम-सुख ।
वह प्रेमियोंके लिये देख । किया जतन ॥ ३९ ॥
जैसे कहा मैंने अब तक । देखके अपनत्व नेक ।
लेते प्रेमियोंका प्रेम एक । जो शब्दसे परे ॥ ४० ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥
मुझ आत्मामें ही प्रेम-भाव । जिन्होंने किया जीनेका ठाव ।
उसके बिना अन्य पांडव । सब है व्यर्थ ॥ ४१ ॥
ऐसे प्रिय तत्वज्ञोंके सम्मुख । कर्पूर मशाल हाथमें रख ।
चलता हूं मैं आगे आगे देख । राह दिखाते ॥ ४२ ॥
उनको अज्ञान रातमें । घिरे हुए घने तममें ।
दूर कर तम राहमें । करता नित्योदय ॥ ४३ ॥
अर्जुनको कृष्ण परब्रह्म होनेका भास ---
प्रिय भक्तोंका प्रियतम । बोला जब पुरुषोत्तम ।
कहा अर्जुनने सप्रेम । मन हुआ शांत ॥ ४४ ॥
करुणा करके मैं ही हियमें रहके नित ।
तेजस्वी ज्ञान ज्योतीसे अज्ञान तम नाशता ॥ ११ ॥
३११ विभूति-चिंतनयोग

अजी ! मुझे क्या सुना दिया । संसार तापसे दूर किया ।
जन्म-मरणसे है छुड़ाया । कृपाकर प्रभु ॥ ४५ ॥
यह नव-जन्म अपना । देखते अपने नयन ।
मेरे हाथ आया जीवन । मन भाया जो ॥ ४६ ॥
उज्ज्वल हुआ आज आयुष्य । हुआ दैव दशाका उदय ।
वाक्प्रसाद पाया हे सदय । दैव मुखसे ॥ ४७ ॥
तेरे वचनके प्रकाशसे । अंतर्बाह्य तम मिटनेसे ।
देखता हूं यथार्थ रूपसे । स्वरूप तेरा ॥ ४८ ॥
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥
अजी ! वही है तू परब्रह्म । महाभूतोंका विश्राम-धाम ।
पवित्र तम अति परम । जगन्नाथ ॥ ४९ ॥
परम दैवत तू तीनोंका । पुरुष है तू पंचवीसका ।
दिव्य है तू प्रकृति भावका । परे है जो श्रेष्ठ ॥ १५० ॥
स्वामी तू है अनादि-सिद्ध । जन्म रहित जो प्रसिद्ध ।
हमने पाया अब शुद्ध । स्वरूप तेरा ॥ ५१ ॥
काल-यंत्रका तू सूत्रधार । जीवन कलाका कर्णधार ।
तू ही है ब्रह्मांडका आधार । जाना यह निश्चित ॥ ५२ ॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥
यहां ओर ही एक भांति । आती है इसकी प्रतीति ।
ऋषियोंने भी इसी भांति । किया है वर्णन ॥ ५३ ॥
अर्जुनने कहा
पवित्र तू पर-ब्रह्म श्रेष्ठ जो मोक्ष-धाम तू ।
आत्मा शाश्वत औ' दिव्य अजन्मा आदि औ' विभु ॥ १२ ॥
गाते हैं ऋषि जो सारे तथा असित देवल ।
व्यास नारद देवर्षि वैसे ही आपने कहा ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१२

उन ऋषियोंने जो कहा था । अनुभवमें आयी सत्यता ।
कृपया आपने सुनाया था । इसीलिये अब ॥ ५४ ॥
आता था देव-ऋषि नारद । गाता था ऐसे बचन छंद ।
गानेका ही लेकर आनंद । खो देते थे अर्थ ॥ ५५ ॥
प्रकट हुए यदि भास्कर । अंधोंके ही गांवमें आकर ।
बिना उष्णताके तापकर । देखें प्रकाश कैसे ॥ ५६ ॥
सुन देवर्षि नारदका अध्यात्म-गान । उससे केवल नाद-माधुर्य ही सुन ।
चितसे न कर उसका सार-ग्रहण । छोड देते थे ॥ ५७ ॥
असित देवलके मुखसे । सुना है तेरा चरित्र ऐसे ।
किंतु चित्त विषय-विषसे । था अति ग्रस्त ॥ ५८ ॥
विषय-विष होता भयंकर । तीता विषय है अति मधुर ।
तथा परमार्थ होता मधुर । लगता तीता ही ॥ ५९ ॥
अजी ! औरोंका क्या कहना । भवनमें तेरा गुण गाना ।
व्यास देवका नित सुनाना । तेरा चरित्र श्रेष्ठ ॥ १६० ॥
अंधारमें चिंतामणि देखा । उपेक्षासे नहीं उठा सका ।
उजालेमें पहचान सका । ऐसे ही है यह ॥ ६१ ॥
वैसे व्यासादिकोंके वचन । मेरी भी जो चिद्रत्नोंकी खान ।
उपेक्षित पड़ी थी श्रीकृष्ण । बिना प्रकाशके ॥ ६२ ॥
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हिते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥
फैले तेरे वाक्सूर्य किरण । ऋषि-वाक्योंका हुआ स्मरण ।
मिटा सब अपरिचितपन । तेरी कृपासे ॥ ६३ ॥
ज्ञान-बीज रूप थे उनके बोल । हृदय-भूमिमें जमे थे सकल ।
उसपे तेरी कृपाका यह ओल । संवाद फल आया ॥ ६४ ॥
मानता सत्य ये सारा स्वयं तू कहता मुझे ।
देव दानव कोयी भी तेरा रूप न जानते ॥ १४ ॥
(40) ३१३ विभूति-चिंतनयोग

अजी ! नारदादिक जो संत । उनकी उक्ति रूप सरिता ।
मैं महोदधि बना अनंत । संवाद सुखका ॥ ६५ ॥
मेरा अनेकानेक जन्म- । किया हुआ जो सत्कर्म ।
फला है यह अत्युत्तम । तू सद्गुरु रूप ॥ ६६ ॥
वैसे सुने थे वृद्धोंके वचन । सदैव तेरे ही गुण-वर्णन ।
हुई अब तेरी कृपा महान । तभी फले सब ॥ ६७ ॥
तभी भाग्य होता अनुकूल । उद्यम होते सब सफल ।
सुना था वह है जो सफल । हुआ गुरु कृपासे ॥ ६८ ॥
माली जिसमें जन्म बिताता । गाछ लगाकर जन्म देता ।
किंतु वसंतमें ही खिलता । अनायास ॥ ६९ ॥
जब विषम ज्वर उतरता । तभी रसनामें स्वाद आता ।
रसायन भी है जो फल देता । जब होता आरोग्य ॥ १७० ॥
वाचा श्रवण नयन प्राण । अनुभवते सार्थकपन ।
संचरता उसमें चेतन । तभी मात्र ॥ ७१ ॥
वैसे शब्दजातका अध्ययन । योगाभ्यासादि समस्त साधन ।
अपना कह सकते हैं जान । जब गुरु अनुकूल ॥ ७२ ॥
इस प्रतीतिके आनंदसे । नाचता अर्जुन निश्चयसे ।
कहता है हे देव ! कृष्णसे । तेरी बात मानी ॥ ७३ ॥
सच है यह कैवल्यपति । हुई मुझे त्रिशुद्ध प्रतीति ।
सुरासुर-नरादिकी मति । न जानती तुझे ॥ ७४ ॥
न सुनकर तेरा वचन । अपनेसे ही कर चिंतन ।
अशक्य है होना तेरा ज्ञान । हुआ मेरा निश्चय ॥ ७५ ॥
स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥
तू ही है अपने आप जानता पुरुषोत्तम ।
देव देव जगन्नाथ भूतेश-भूत भावन ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१४

जीव स्व-सामर्थ्यसे ईश्वरको नहीं जान सकता—
जैसे अपनी विशालता गगन । आप ही जानता संपूर्ण रूपेण ।
अथवा जैसे अपना हो सपना । जानती पृथ्वी ॥ ७६ ॥
वैसे अपनी सर्वशक्ति । जानता तू ही लक्ष्मीपति ।
यहां वेदादिककी मति । अकडती व्यर्थ ॥ ७७ ॥
दौडनेमें जीतना मनको । आंकना हाथसे पवनको ।
पार करना आदि शून्यको । कैसे संभव ॥ ७८ ॥
ऐसा है तुझे जानना । उसको कह सकना ।
असंभव तेरे बिना । अन्य किसीको ॥ ७९ ॥
तू ही जानता अपनी बात । कहनेमें भी तू ही समर्थ ।
देव ! मेरे माथे का तू आर्त- । पसीना पोंछ दे ॥ १८० ॥
सुना क्या यह भूत-भावन । त्रिभुवन-गज-पंचानन ।
सकल देव-देवतार्चन । जगन्नायक ॥ ८१ ॥
जानना चाहें तो तेरा बड़प्पन । उसके सम्मुख हम रजकण ।
यह जान हुए तो सलज्ज मौन । नहीं अन्य उपाय ॥ ८२ ॥
चहूँ ओर सरिता सागर भरा । किंतु चातक बेचारा रहा कोरा ।
स्वातीका बूंद ही उसका सहारा । वही उसका पानी ॥ ८३ ॥
वैसे गुरु है सर्वत्र चहूँ ओर । किंतु कृष्ण ! मुझे तेरा ही आधार ।
रहने दो यह वचन विस्तार । कहो विभूतियोग ॥ ८४ ॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥
तेरी जो विभूति संपूर्ण । जिससे तू व्याप्त भुवन ।
कह तू दिव्य श्री कृष्ण । कृपा पूर्वक ॥ ८५ ॥
विभूति अपनी दिव्य मुझ अशेष तु कह ।
जिससे विश्व है सारा व्याप्त हो कर तू रहा ॥ १६ ॥
३१५ विभूति-चिंतनयोग

विभूति जो यहां समस्त । लोगोंमें व्याप्त है अनंत ।
जो है प्रधान औ' विख्यात । कर तू प्रकट ॥ ८६ ॥
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
किस भांति जानूं तुझको । किस भांति गाऊं तुझको ।
विश्व रूप कहूँ तुझको । न होगा चिंतन ॥ ८७ ॥
अजी ! पीछे कहे जैसे । निज-भाव कहे वैसे ।
अभी सबिस्तर तैसे । कह तू एक बार ॥ ८८ ॥
किन भावोंका ले आधार । भजनेसे है सुखकर ।
कह वह मुझे सत्वर । विभूति-योग ॥ ८९ ॥
विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वंतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥
अर्जुनकी विभूति-विस्तार सुननेकी इच्छा—
मैंने पूछा जो विभूति । वहि कहो भूतपति ।
पुनः इसकी पुनरुक्ति । करना क्या ॥ १९० ॥
ऐसी आवे तो भाव कल्पना । उसको जाने दो जनार्दन ।
मुझ जैसेको अमृत पान । ना न कहलाता ॥ ९१ ॥
कालकूटका जो सहोदर । मृत्यु भयसे पिये अपार ।
किंतु चतुर्वेश पुरंदर । होते जाते हैं ॥ ९२ ॥
ऐसा वह क्षीराब्धिका रस । उसमें है अमृतका बास ।
उसके जो माधुर्य मृष्टांश । नहीं छोडा जाता ॥ ९३ ॥
उस अल्पामृतकी यह महता । उस सामान्यकी वह मधुरता ।
यहां तेरा वचन परमामृत । कहना क्या ॥ ९४ ॥
योगेश जानूं मैं कैसे तुझे चिंतनमें नित ।
कौन कौन स्वरूपोंमें करूं मैं तब चिंतन ॥ १७
योग-विभूति-विस्तार कह तू अपना निज ।
सुनके न अघाता मैं वचनामृत पानसे ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१६

मंदाराचलको न उतराना । क्षीर सागरको नहीं मथना ।
अनादि सिद्ध जो अमृत पीना । वह भी अनायास ॥ ९५ ॥
न है वह द्रव या बद्ध । न है वहां रस औ' गंध ।
वह मिलता नित्य-सिद्ध । स्मरते ही ॥ ९६ ॥
सुन कर होता निरास । निश्चित संसारका पाश ।
तथा आति नित्यता पास । अपने आप ॥ ९७ ॥
मिटती जन्म-मृत्युकी भाषा । भूल जाता सर्वस निःशेष ।
अंतर्बाह्य वह महा-सुख । बढ़ता जाता ॥ ९८ ॥
तथा दैवयोगसे होता सेवन । सेवनसे अमृत होता है प्राण ।
देता है स्वयं श्री कृष्ण भगवान । ना न कहता चित्त ॥ ९९ ॥
सहज भाता है चित्तको नाम । दर्शन होता रहता परम ।
तथा ज्ञान देता अमृतोपम । आनंद मगन हो ॥ २०० ॥
अनुभवता मैं कैसा सुख । कह न सकता परितोष ।
कथित कथन कृष्णमुख- । करता है आनंद ॥ १ ॥
आनादि भास्कर क्या बासी होता । अस्नात अग्नि अमंगल होता ।
नदी प्रवाह क्या पुराना होता । समय बीतनेसे ॥ २ ॥
सुन तेरे मंगल वचन । किया है नाद-ब्रह्म दर्शन ।
तथा कृष्णागरुके 'सुमन । बटोर लिये हैं ॥ ३ ॥
सुनकर पार्थके वचन । डुला कृष्णका अंतःकरण ।
कहता है भक्ति ज्ञान पूर्ण । सागर बना यह ॥ ४ ॥
प्रिय सखाके प्रेममें मस्त । उमड़ते स्नेहमें हो त्रस्त ।
कष्टसे संयत हो अनंत । बोलता क्या ॥ ५ ॥
भगवान उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
सुन मैं कहता दिव्य मुख्य मुख्य विभूतियां ।
मेरा विभूति-विस्तार न टूटता कभी कहीं ॥ १९ ॥
३१७ विभूति-चिंतनयोग

भगवानकी अनंत विभूतियोंकी कल्पना—
मैं हूँ पितामहका पिता । स्मरनेसे भी है भूलता ।
कहता बाबा पांडुसुत । अच्छा किया तूने ॥ ६ ॥
बाबा ! कहता वह अर्जुनको । इसमें विस्मय नहीं हमको ।
शिशु हो कहा नहीं क्या नंदको । बाबा ! उसने ॥ ७ ॥
यहांका प्रसंग है ऐसे । प्रेमोद्रेकमें होता वैसे ।
कृष्ण कहता अर्जुनसे । सुन धनंजय ॥ ८ ॥
तूने पूछा है मेरी विभूति । अनंत हैं वे सुभद्रापति ।
मेरी होकर भी मेरी मति । न जानती उन्हें ॥ ९॥
शरीरमें रोम हैं किती । जिसका उसे न गिनती ।
वैसी ही है मेरी विभूति । अनगिनत मुझे ॥ २१० ॥
वैसा भी मैं कैसा कितना । ज्ञान नहीं मुझे अपना ।
सबसे रूढ जो प्रधान । कहता हूं तुझे ॥ ११ ॥
जिनको जाननेसे हे पार्थ । सभी जान लिया होता ।
बीज जब हाथमें है आता । आया वृक्ष जैसा ॥ १२ ॥
या स्वाधीन होनेसे उपवन । आते सभी वृक्ष फल सुमन ।
वैसे जान लिया कर चिंतन । आता चित्तमें विश्व ॥ १३ ॥
वैसे सच ही है धनुर्धर । अनंत है जो मेरा विस्तार ।
आकाशका जो महा विस्तार । छिप जाता मुझमें ॥ १४ ॥
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
कुंतलालक मस्तक सुन । धनुर्वेद त्र्यंबक अर्जुन ।
बसा मैं हियमें आत्मा बन । भूतमात्रके ॥ १५ ॥
अंदर भी मैं हूँ अंतःकरणमें । बाहर भी मैं आवरण रूपमें ।
मैं ही हूँ आदिमें तथा निर्वाणमें । मैं मध्यमें भी ॥ १६ ॥
हियमें सबके मैं हूँ बसता आत्म रूपसे ।
मैं आदि भूत मात्रोंको मध्य मैं और अंत भी ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ३१८

जैसे मेघ तलमें गगन । अंदर बाहर सूक्ष्म स्थान ।
आकाशमें इनका जनन । रहना भी वही ॥१७॥
फिर ये सब लय हो जाते । अकाश ही बनके रहते ।
वैसे आदि अंत लय होते । भूतमात्र मुझमें ॥ १८ ॥
ऐसा विविध व्यापक पन । मेरा विभूति विस्तार जान ।
जीवका कर तू अब कान । सुन जो सुना था ॥ १९ ॥
अब भी मेरी वे जो विभूति । सुनना है क्या सुभद्रापति ।
पुनरुक्ति करता सप्रीति । प्रधान रूपसे ॥ २२० ॥
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
भगवानकी प्रधान ऐसी पिचत्तर विभूतियां —
यह कह बोला प्रेममें । मैं हूं विष्णु आदित्योंमें ।
तथा सूर्य ज्योतिर्वंतोंमें । जो है रश्मिवंत ॥ २१ ॥
मरीचि मैं मरुतोंमें । चंद्र मैं तारागणोंमें ।
बोले श्रीकृष्ण रणमें । गगन रंगके ॥ २२ ॥
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानांमस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
वेदोंमें मैं सामवेद । कहता वह गोविंद ।
देवोंमें मरुद्बंधु । महेंद्र हूँ मैं ॥ २३ ॥
इंद्रियोंमें मैं हूँ मन । जो है ग्यारहवा जान
भूतमात्रोंमें चेतन । स्वभावसे मैं ॥ २४ ॥
आदित्योंमें महा विष्णु सूर्य मैं ज्योतिमानमें ।
मरीचि मुख्य वायुमें नक्षत्रोंमें शशांक मैं ॥ २१ ॥
मैं सामवेद वेदोंमें देवोंमें देव-राज मैं ।
मन हूँ इंद्रियोंमें मैं चेतना भूत-मात्रमें ॥ २२ ॥
३१९ विभूति-चिंतनयोग

रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
मैं हूँ रुद्रोंमें शंकर । कामसे जिसका वैर ।
निःसंशय धनुर्धर । निष्भ्रांत मान तू ॥ २५ ॥
यक्ष-रक्ष गणमें विख्यात । शंभुका मित्र जो धनवंत ।
वह कुबेर मैं हूँ अनंत । कहने लगा ॥ २६ ॥
वैसे ही मैं वसुओंमें । अग्नि हूँ जान मनमें ।
सर्वोव्य मैं शिखरोंमें । मेरू हूं गिरीश जो ॥ २७ ॥
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिं ।
सेनानिनामहं स्कंदः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥
स्वर्ग सिंहासन सहायक । सर्वश्रेष्ठ सर्वज्ञ जो नेक ।
पुरोहित स्वर्गका प्रमुख । मैं वह बृहस्पति ॥ २८ ॥
त्रिभुवनका श्रेष्ठ सेनापति । कहलाता स्कंद जो महामति ।
अग्नि कृत्तिका जान जो विभूति । शिव वीर्य से ॥ २९ ॥
विश्वके सकल सरोवरमें । जल राशिमें समुद्र रूपमें ।
तपोराशि हूँ मैं महर्षियोंमें । कहलाता भृगु मुनि ॥ ३० ॥
सकल अक्षरोंमें जो है श्रेष्ठ । जहां सत्योत्कर्ष परमोत्कट ।
ज्ञानी जन जिससे एक निष्ठा । वह ओंकार मैं हूँ ॥ ३१ ॥
कुबेर यक्ष रक्षोंमें रुद्रोंमें मैं सदाशिव ।
मेरू मैं गिरि-मालामें अग्नि मैं वसु वर्गमें ॥ २३ ॥
बृहस्पति मुझे जान पुरोहित प्रधान जो ।
स्कंद सेनाधिपोंमें मैं समुद्र जल-राशिमें ॥ २४ ॥
मैं एकाक्षर वाणीमें भृगु मैं ऋषि-वृंदमें ।
जप हूं सब यज्ञोंमें स्थावरोंमें हिमालय ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३२०

जो है समस्त यज्ञोंमें । जपयज्ञ मैं लोकमें ।
कर्म-त्याग प्रणवादिमें । नित्य होता ॥ ३२ ॥
अजी ! जप यज्ञ जो परम । बांध न सकते यज्ञादि कर्म ।
नामसे पावन धर्म-अधर्म । परब्रह्म वेदार्थ ॥ ३३ ॥
स्थावरोंमें जो पर्वत । पुण्य रूप रहा स्थित ।
पुण्य-पुंज हिमवंत । मैं हूँ जान तू ॥ ३४ ॥
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् देवर्षीणां च नारदः ।
गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलोमुनिः ॥ २६ ॥
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेंद्राणाम् नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥
कल्पद्रुम औ' पारिजात । गुणमें चंदन है ख्यात ।
फिर भी वृक्षोंमें अश्वत्थ । मेरी विभूति है ॥ ३५ ॥
देवऋषियोंमें मुझे पार्थ । जानना तू नारद यथार्थ ।
तथा गंधर्वोंमें चित्ररथ । मुझे ही जान ॥ ३६ ॥
सभी सिद्धोंमें महासिद्ध । कपिलाचार्य जो प्रबुद्ध ।
तुरंगोंमें जो हैं प्रसिद्ध । उच्चैःश्रव मैं ॥ ३७ ॥
गजोंमें मैं हूं राज-भूषण । ऐरावत स्वर्ग-भूषण ।
पय-राशि कर मंथन । निकाला अमृतांश ॥ ३८ ॥
यहां मैं नरोंमें जो राजा । विभूति विशेष सहज ।
जन कहलाते हैं प्रजा । जिसकी सब ॥ ३९ ॥
अश्वत्थ सब वृक्षोंमें देवर्षि बोच नारद ।
चित्ररथ गंधर्वों में सिद्धोंमें कपिलमुनि ॥ २६ ॥
उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं निकला जो अमृतसे ।
ऐरावत गजेंद्रोंमें नरोंमें मैं नराधिप ॥ २७ ॥
३२१ विभूति-चिंतनयोग
(41)

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कंदर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥
वज्र हूँ मैं हथियारोंमें । पकड़ता इंद्र करमें ।
जो शतमख करनेमें । होता है उत्तीर्ण ॥ ४० ॥
धेनुओंमें मैं कामधेनु । कहता कृष्ण भगवान ।
जन्मदात्रोंमें मैं मदन । जान तू यह ॥ ४१ ॥
सर्प कुलका अधिष्ठाता । वासुकि हूँ मैं कुंति-सुत ।
नागोंमें जो कहलाता । वह अनंत मैं हूँ ॥ ४२ ॥
जलराशी में पांडुसुत । पश्चिम प्रमदाका कांत ।
कहता है देवकी सुत । मैं हूँ वरुण ॥ ४३ ॥
तथा पितृगणोंमें समस्त । जो है अर्यमा पितृ-देवता ।
वह मैं ही यह तत्वता । जान तू अर्जुन ॥ ४४ ॥
जगका कर शुभाशुभ लेखन । तथा प्राणियोंके मनका दर्शन ।
तदनुरूप करते नियमन । पाप-पुण्य फलका ॥ ४५ ॥
उन नियमितोंमें यम । सर्व साक्षी रूप मैं धर्म ।
कहता यह आत्माराम । मैं हूँ वह ॥ ४६ ॥
प्रल्हादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्
मृगानां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥
मैं कामधेनु गायोंमें शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा ।
उत्पत्ति हेतु मैं काम मैं सर्पोत्तम वासुकी ॥ २८ ॥
मैं हूँ वरुण पानीमें नागोंमें शेष-नाग मैं ।
पितरोंमें अर्यमा हूँ यम संयम-कारक ॥ २९ ॥
मैं हूँ प्रह्लाद दैत्योंमें काल हूँ गणितज्ञमें ।
मृगोंमें मैं मृगराज पक्षियोंमें खगेंद्र हूँ ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ३२२

दानव कुल तिलक। भक्त प्रल्हाद मैं नेक।
आसुरी गुणोंमें देख। न हुआ जो लिप्त ॥ ४७ ॥
ग्रासनेमें मैं महाकाल। कहता है वह गोपाल।
श्वापदोंमें मैं शार्दूल। जान तू यह ॥ ४८ ॥
पक्षि-जातिमें तू सुन। गरुड हूं मैं अर्जुन।
तभी तो वह आसन। हो सका मेरा ॥ ४९ ॥
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥
पृथिवीका है जो पसारा। क्षण भरमें धनुर्धर।
उङ्घाण जो सप्तसागर। करते रहते ॥ २५० ॥
ऐसे रहते जो गतिवंत। उनमें पवन मैं पांडुसुत।
शस्त्र-धारियोंमें जो हैं समस्त। श्रीराम मैं हूं ॥ ५१ ॥
पक्ष लेके संकटग्रस्त धर्मका। सहारा मात्र अपने धनुष्यका।
मोड़ लिया मुख विजय लक्ष्मीका। जिसने अपनी ओर ॥ ५२ ॥
चढ़कर पर्वत मस्तक सुवेली। प्रताप लंकेश्वरकी मस्तकावली।
आकाशस्त भूतोंको दी हस्त-बलि। जो चीखते थे ॥ ५३ ॥
बढाया उन्होंने देवोंका मान। किया धर्मका जीर्णोद्धार जान।
जनमा सूर्यवंशको महान। मानो सूर्य रूप ही ॥ ५४ ॥
ऐसा जो धनुर्बाण हस्त। रामचंद्र मैं सीता-कांत।
तथा मकर पुच्छवंत। मैं हूं जलचरोंमें ॥ ५५ ॥
अजी ! जान तू सकल जल ओघ। उसमें भगीरथकी लायी गंगा।
उसको निगले जन्हुकी जांघ। फाड आयी जो ॥ ५६ ॥
वह त्रिभुवनैक सरिता। जाह्नवी है सुन पांडुसुत।
जल प्रवाहोंमें समस्त। मेरी विभूति है ॥ ५७ ॥
राम मैं शस्त्र-वीरोंमें वायु मैं वेगवानमें।
मत्स्योंमें मैं बना नक्र नदियोंमें गंगा नदी ॥ ३१ ॥
३२३ विभूति-चिंतनयोग

ऐसी मेरी विभूति अनेक । उनका नाम लूं मैं एकेक ।
बीतेंगे सहस्र जन्म देख । सुननेमें ही ॥ ५८ ॥
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥
नक्षत्र चुनना आकाशके पूर्ण । ऐसी अपेक्षा जब करेगा मन ।
तब पोटलीमें बांधना गगन । यही है अच्छा ॥ ५९ ॥
यदि पृथ्वीके परमाणु गिनना । तो पृथ्वीको ही बगलमें दबाना ।
वैसा विस्तार यदि मेरा जानना । तो मेरे ही ज्ञानसे ॥ २६० ॥
जैसे शाखाओंके फूल फल । बटोरना चाहे तो सकल ।
उखाडना वृक्ष सहमूल । लेना हाथमें ॥ ६१ ॥
वैसी मेरी विभूति विशेष । जानना चाहे यदि अशेष ।
मेरा स्वरूप एक निर्दोष । जानना होगा ॥ ६२ ॥
अन्यथा भिन्न भिन्न विभूति । कहूँ कितनी सुभद्रापति ।
एक बातमें ही जान महामति । मैं हूँ सर्वस्व ॥ ६३ ॥
मैं हूं संपूर्ण सृष्टिमें । अजी ! आदि मध्यांतमें ।
होते हैं जैसे पटमें । तंतु ही तंतु ॥ ६४ ॥
व्यापक ऐसे मुझे जानना । विभूति-भेद है क्या करना ।
तुझमें योग्यताका न होना । सो कहना पड़ा ॥ ६५ ॥
या तूने पूछ लिया है पार्थ । इसीलिये कहता विस्तृत ।
विद्याओंमें जान तू प्रस्तुत । मैं हूँ आत्म-विद्या ॥ ६६ ॥
आदि मध्य तथा अंत मैं चराचर सृष्टिका ।
विद्यामें आत्म-विद्या मैं वादिका तत्व-वाद मैं ॥ ३२ ॥
मैं हूँ द्वंद्व समासोंमें अक्षरोंमें अकार मैं ।
मैं ही अक्षय जो काल विश्वकर्ता विराट् स्वयम् ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ३२४

वाद जो है बोलनेवालोंमें । जान तू वह हूँ मैं संक्षेपमें ।
कभी न आते एक मतमें । जिससे शास्त्र ॥ ६७ ॥
विषय-निश्चयमें जो बढता । सुनके तर्कका जोर चढता ।
तथा वाणीका रस है बढता । औ' होता मधुर भाषण ॥ ६८ ॥
ऐसे प्रतिपादनमें वाद । कहता है मैं ही हूँ गोविंद ।
औ' अक्षरोंमें जो विशद् । वह अकार मैं हूँ ॥ ६९ ॥
वैसे समासमें अर्जुन । द्वंद्व समास मैं हूँ जान ।
करता जो सर्व भक्षण । वह काल मैं हूँ ॥ २७० ॥
जिसमें मेरु मंदार सहित । पृथिवी भी हो जाती द्रवित ।
उस एकार्णवको भी जो पार्थ । पचाता अपनेमें ॥ ७१ ॥
उस प्रलय तेजको भी ग्रासता । तथा महा अनिलको निगलता ।
आकाशको भी अपनेमें समाता । धनंजय ॥ ७२ ॥
ऐसा है जो असीम काल । मैं हूँ कहता है गोपाल ।
सृजता विश्व जो निर्मल । वह ब्रह्मा मैं हूँ ॥ ७३ ॥
मृत्युः सर्व हरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीवाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४॥
तथा उत्पन्न भूतोंका धारण । सबका जीवन भी संपूर्ण ।
अंतमें सबको देता मरण । वह भी मैं हूँ ॥ ७४ ॥
स्त्री जातिमें अर्जुन । सात मेरी है सुन ।
कहता वह कौन । सकौतुक ॥ ७५ ॥
सुन नित्य नूतन कीर्ति । अर्जुन वह मेरी मूर्ति ।
तथा स-औदार्य संपत्ति । मैं हूँ जान ॥ ७६ ॥
तथा वह है जो वाणी । न्याय सुआसन वासिनी ।
औ' विवेक-पथ गामिनी । मेरा ही रूप ॥ ७७ ॥
सर्व नाशक मैं मृत्यु जन्म भी मैं भविष्यका ।
वाणी श्री कीर्ति नारीमें क्षमा मेधा धृति स्मृति ॥ ३४॥
३२५
विभूति-चिंतनयोग

देख विश्वका पदार्थ । देता मेरा यथार्थ ।
ज्ञान जो है वह पार्थ । स्मृति मैं विशुद्ध ॥ ७८ ॥
स्वहितके अनुकूल । मेधा हूं मैं जो निर्मल ।
त्रिभुवन धृति-शील । तथा क्षमा मैं ॥ ७९ ॥
नारि जातिमें सात । शक्तियां हैं जो पार्थ ।
मैं हूं कही है बात । श्रीकृष्णने यह ॥ २८० ॥
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
वेद-राशिमें बृहत्साम । मैं हूं सुन तू प्रियोत्तम ।
कहता है पुरुषोत्तम । धनंजयसे ॥ ८१ ॥
छंदमें गायत्री छंद । मेरा स्वरूप है विशद ।
जान यह अप्रमाद । अर्जुन तू ॥ ८२ ॥
मासोंमें जो मगसिर । जान यह धनुर्धर ।
ऋतुमें कुसुमाकर । वसंत मैं हूं ॥ ८३ ॥
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्वं सत्ववतामहम् ॥३६॥
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पांडवानां धनंजयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥
कपट कारस्थानमें द्यूत । मैं हूं जान यह पांडुसुत ।
तभी चौरस्तेका है प्रशस्त । चलता यह चौर्य ॥ ८४ ॥
तेजस्वियोंका तेज निश्चय । मैं ही हूं जान तू धनंजय ।
कार्योद्देश्यमें जो है विजय । वह भी मैं हूं ॥ ८५ ॥
गायत्री सब छंदोंमें मैं बृहत्साम साममें ।
मैं मार्गशीर्ष मासोंमें ऋतुओंमें वसंत मैं ॥ ३५ ॥
द्यूत मैं छलियोंमें हूं तेज तेजस्विका बना ।
सत्व मैं सात्विकोंमें हूँ जय मैं व्यवसायमें ॥ ३६ ॥
मैं वासुदेव वृष्णीमें पांडवोंमें धनंजय ।
मुनियोंमें मुनी व्यास कविमें उशना कवि ॥ ३७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३२६

उद्योगमें जो है धनंजय । उद्योगसे दीखता है न्याय ।
मेरा रूप यह यदुराय । कहता है ॥ ८६ ॥
सत्व है जो सत्वस्थमें । कृष्ण है यदुवंशमें ।
तथा श्री संपन्नतामें । मैं हूं जान ॥ ८७ ॥
वसुदेव देवकीसे मैं उत्पन्न । कुमारि स्थानमें गोकुल गमन ।
प्राणोसह चूस लिय मैंने स्तन । पूतनाके ॥ ८८ ॥
मिटा नहीं था अभी कौमार्य । किया अदानव सृष्टिकार्य ।
गिरिधर बन कूता आर्य । इंद्रकी महिमा ॥ ८९ ॥
मिटाया कालिंदी-हृदय शूल । बचा लिया ज्वाला ग्रस्त गोकुल ।
बनाया मैने ब्रह्माको पागल । बछडे बनाके ॥ २९० ॥
होते ही बाल्यका प्रभात । कंसादि प्रचंड अत्यंत ।
मिटाये दुष्ट जो ज्वलंत । सहज लीलासे ॥ ९१ ॥
कहना मेरा कार्य कितना । तूने स्वयं देखा है अर्जुन ।
यादवोंमें श्रीकृष्ण जानना । मेरा रूप ॥ ९२ ॥
पांडव जो हैं सोम वंशस्थ । उनमें मैं अर्जुन हूं पार्थ ।
हमारा प्रेम भाव विध्वस्थ । कभी न टूटता ॥ ९३ ॥
नहीं तो विचार कर देख अर्जुन । संन्यासी हो चूराई तूने बहन ।
किंतु विकल्प न हुआ मेरा मन । क्यों कि हम एक हैं ॥ ९४ ॥
मुनियोंमें मैं व्यासराय । मैं कहता है यादवराय ।
तथा मैं हूं उषनाचार्य । कवीश्वरोंमें ॥ ९५ ॥
दंडो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥
चींटीसे ब्रह्मतक समान । चलता है जो सुनियमन ।
उसमें अनिवार्य शासन । मैं हूं पार्थ ॥ ९६ ॥
दंड मैं दमवंतोंमें धर्म मैं विजयर्थिका ।
ज्ञान हूँ ज्ञानियोंमें में गूढोंमें श्रेष्ठ मौन हूँ ॥ ३८ ॥
३२७ विभूति-चिंतनयोग

सारासार कर निर्णय । धर्म-ज्ञानका जो निश्चय ।
सभी शास्त्रोंमें धनंजय । मैं हूँ नीति शास्त्र ॥ ९७ ॥
सब गुह्योंमें अर्जुन । मौन है अति महान ।
गूँगोंके सम्मुख जान । होता अज्ञानी ब्रह्म ॥ ९८ ॥
अजी ! मैं हूँ ज्ञानियोंमें । श्रेष्ठ है जो जगतमें ।
ज्ञान जान तू इसमें । अंत नहीं पार्थ ॥ ९९ ॥
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान् मया भूतं चराचरं ॥ ३९ ॥
नांतोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एषतूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥
अजी ! पर्जन्यकी धार । गिनेगा क्या धनुर्धर ।
या पृथ्वीके तृणाँकुर । होंगे क्या गिनके ॥ ३०० ॥
लहरें क्या महा सागरकी । किसीने कभी क्या गिननेकी ।
मेरी अनंत विभूतियोंकी । कहूँ कैसा ॥ १ ॥
फिर भी पचत्तर प्रधान । विभूतियां तुझसे अर्जुन ।
ऊपर ऊपरकी तू जान । कहीं तुझसे ॥ २ ॥
मेरे विभूति-विस्तारका कहीं । आदि अंत यहां कुछ भी नहीं ।
तभी तू सुनेगा कितनी यहीं । और मैं कहूँगा कितनी ॥ ३ ॥
इसीलिये एक वाक्यमें तुझ । मर्म कहता हूँ अब मैं निज ।
तभी तू सब भूतांकुर-बीज । जान मुझको ही ॥ ४ ॥
तभी छोटा बडा न मानना । नीच उच्च भावको तजना ।
भूतमात्रमें मुझे देखना । सम भावसे ॥ ५ ॥
वैसे ही सब भूतोंका मुझको बीज जान तू ।
बिना मेरे नहीं कोई कहीं भी कुछ भी यहां ॥ ३९ ॥
नहीं अंत कभी आता मेरी दिव्य समृद्धिका ।
तो भी विभूति विस्तार मैंने जो अल्पमें कहा ॥ ४० ॥
ज्ञानेश्वरी ३२८

इस पर भी साधारण । कर कहता सावधान ।
सूचित करता अर्जुन । मेरी विभूति ॥ ६ ॥
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छत्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥ ४१ ॥
जहां जहां संपत्ति औ' दया । दोनो वसति हैं धनंजय ।
वहां तू जान अति निश्चय । मेरी विभूति है ॥ ७ ॥
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
नभमें होता रवि-बिंब एक । त्रिभुवनका जो है प्रकाशक ।
उसके आज्ञा-रत होते लोक । सकल हि सदैव ॥ ८ ॥
ऐसोंको अकेला नहीं कहना । साधन-हीन न मानना ।
साथ होते हैं क्या सभी साधन । कामधेनुके कभी ॥ ९ ॥
उससे जब जो चाहता । तभी प्रसवती है माता ।
वैसे अंगभूत रहता । विश्व भी उसके ॥ ३१० ॥
उनकी पहचानकी है संज्ञा । विश्व मानता उसकी आज्ञा ।
ऐसे मनुष्यको जान तू प्राज्ञ ! । मेरा ही अवतार ॥ ११ ॥
अब है सामान्य विंशेष । जानना यहां महा दोष ।
क्यों कि मैं ही एक अशेष । विश्व है जान ॥ १२ ॥
तब क्यों बुरा भला कहना । स्व-मतिसे विभाग करना ।
औ' अपनी मतिसे लगाना । कलंक मुझको ॥ १३ ॥
नहीं तो क्या घीका करते मंथन । अमृतको पकाके करें क्या न्यून ।
वायुका होता क्या दायां बायां पन । कह तू मुझसे ॥ १४ ॥
विभूति-युक्त जो वस्तु लक्ष्मीवंत उदात्त वा ।
मेरी ही किरणोंमेंसे निकली जान तू यह ॥ ४१ ॥
अथवा लाभ ही क्या है जान विस्तारसे तुझे ।
एकांशमें विश्व सारा मुझसे है भरा रहा ॥ ४२ ॥
३२९ विभूति-चिंतनयोग
(42)

रविका होता क्या पेट पीठ । देखनेसे अंधी होगी दीठ ।
ऐसी मेरी स्वरुप-गोष्ट । न यहां भला-बुरा ॥ १५॥
गिनेगा कितनी मेरी विभूति । अनगिनतकी क्या है गिनती ।
जाने दें बातें हे सुभद्रापति । विभूतीकी आज ॥ १६ ॥
मेरा है एक ही जो अंश । विश्व व्यापता अशेष ।
भेद छोड़ तू निःशेष । भज साम्य भावसे ॥ १७ ॥
ऐसा ज्ञानी-वन वसंत । विरक्त जनोंका एकांत ।
बोला यह बात श्रीमंत । श्रीकृष्णचंद्र ॥ १८ ॥
अजी ! देव-देवेश श्रीकृष्ण । कहता है सनम्र अर्जुन ।
बोला तू अविवेक वचन । भेद त्यागका ॥ १९ ॥
अर्जुनका अद्वैतानुभव—
विश्वसे कहता है क्या भास्कर । आता मैं दूर करो अंधार ।
कैसे कहूँ मेरा यह विचार । तू है अडबंग नाथ ॥ ३२०॥
तेरा नाम भी किसी समय । सुनने मिला तो हे तन्मय ।
छोडकर भागेगा हृदय । भेदासुर तुरंत ॥ २१॥
ऐसा है परब्रह्म तू अभेद श्रेष्ठ । दान-सा मिला हो भाग्यका पराकाष्ठ ।
तो भी देखता है क्या भेद कनिष्ठ । किससे औ' कहां ॥ २२॥
चंद्र-बिंबके हृदयमें ठौर । 'तपन' कहता क्या यदु-श्रेष्ठ ।
शोभा देता है क्या कह तू स्पष्ट । यह बड़ायी तेरी ॥ २३ ॥
श्री कृष्णका अर्जुन प्रेम—
सुन यह कृष्णने मन ही मन । कर लिया पार्थका प्रेमालिंगन ।
इस बोलने पर न रुसना । कहता श्री हरि ॥ २४ ॥
भेद मार्गसे कही कहानी । विभूतियोंकी बडी सुहानी ।
अभेदांतःकरणसे सुनी । तुझे जंची या नहीं ॥ २५ ॥
देखनेके लिये मैंने इसीको । कही बाह्य व्यवहारी बातको ।
जाना तूने विभूति विस्तारको । भली भांति ॥ २६ ॥
अर्जुन कहता देवदेवेश । तू ही जाने तेरा वह विशेष ।
किंतु मैं देखता विश्व अशेष । तुझसे भरा हुआ ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३०