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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

बिना नामकां- १७ : ४१४-४२२
ब्राह्मण- १८ : ८३३-८५४,
मिथ्याचार ३ : ६४-६६
योग- ३ : ३७, ३ : ४४, ५ : १६-१७.
राजस- १८ : ५९०-६१०
लोकसंग्रहार्थ- ३ : १५४-१९५,
३ : १७३-१७६
विकर्म ४ : ९०
विभूति-७ : ४६-५१
विहित-३ : ११८-१२६, १८ : १४९-१५३
वैश्य-१८ : ८८०-८८२
शास्त्रोक्त-१८ : ८८८-८९३
शूद्र-१८ : ८८३.
-संग्रह १८ : ४७८-५१५
सात्विक-१८ : ५८६-५९३
क्षत्रिय-१८ : ८५६-८७८.
कामक्रोध-
-का परिणाम- ३ : २६०-२६२,
१६ : ४४५-४५४.
-का वर्णन ३ : २१-२८, ३ : २३९-२५९,
१६ : ३२७-३४२
१६ : ३९५-३९६, १८ : १०५७-१०६१.
-का सामर्थ्य ३ : २३२-२६६.
-के त्यागका कारण १६ : ४२५-४३६
-के त्यागका फल १६ : ४३७-४४४
-को जीतनेका उपाय ३ : २६७-२७०
कीर्तन-
अप्राप्य ९ : २०६
-का फल ९ : १९५-२०५,
९ : २०७-२०९.
-का स्वरूप ९ : २१०, १० : ११९-१२९,
कुंडलिनी-
-का परिणाम ६ : २६०-२९०, ९ : २१४
-का मार्ग १२ : ४८-५७
१८ : १०३६-१०४०
-का स्वरूप ६ : २२२-२५०
-की शक्ति ६ : २५१-२५९.
कृतार्थता-३ : १४७-१४८, ७ : १११,
७ : १७६-१७७, १५ : १८५-१८७,
१८ : १५६२-१५७१.
क्रमयोग- १८ : १०११-११११
गणेश- १ : १-२०, १० : १२४, १३ : १,
१७ : १-८.
गीता-
-और कर्म १८ : १४३७-१४३९.
-और ज्ञान १८ : १४४६-१४५१
-का उपासनाकांड १८ : १४४०-१४४५
-का फल १८ : ४८, १८ :१६९६.
-का माहात्म्य १ : ५०-५५,
१८ : ३०-५९
१८ : १६६०-१६८९.
-का संप्रदाय १८ : १४७५-१५०९.
-की गहनता १ : ७०-७१, ११ : २६-२७,
-की वेदोंसे तुलना १८ : १४५६-१४६२,
१८ : १५१०-१५११.
-के अधिकारी १ : ५६-६०, ६ : २२-३०,
९ : ३६-४०
१२ : २३०-२३३, १५ : ५८१,
१८ : १७४९
-के अनधिकारी ६ : १९४-१९६.
-के विषय १८ : १२४३-१२४४.
-वेदका मूल है १८ : १४२६-१४६६
गुण-
-और बंध १४ : १४६-१४८,
-और मरणोत्तर गति १४ : २५६-२५८,
रज १४ : २७२-२७३, १४ : २३८-२४२
सत्व १४ : २१४-२२५, १४ : २७१.
-और गुणातीत १४ : ३२७-३६९.
-की उत्पत्ति : १४ १३९-१४५,
तम-१४ : १७४-१९५, १४ : २५५-२५९.
१५ : १६३-१७४.
रज-१४ : १६०-१७३, १५ : १५५-१६२,
सत्व-१४ : १४९ १५९,
(4)
४१
विषय-विश्लेषण

१५ : १८४-२०५.
—की वृद्धि—
तम १४ : २४४-२५४
रज १४ : २२७-२३६
सत्व १४ : २०५-२१३,
—की व्याप्ति १७ : ५६-६०
१८ : ८१४-८१७
—से मुक्त होनेका मार्ग १४ : ३०१-३०८
१४ : ३७१-४००
चित्त—
आत्म-रत ३ : १८३, ५ : ३४-३६,
५ : १४८
ईश्वर-रत १८ : १२६७-१२६९
—शुद्धि १८ : १५५-१६०.
चिंता—
ईश्वरविषयक—६ : ४४७.
लौकिक १६ : ३३०-३३३.
जगत्—
—का स्वरूप १८ : २३८-२३९
—की उत्पत्ति १४ : ६६., १० : ९७-११६
जन्म-मृत्यु—
—अनिवार्य है २ : १५९-१६०, १८ : १०१
—का अनुदर्शन १३ : ५३६-५५४,
१६ : १७५-१८६
—का स्वरूप १८ : १२८०.
जरा—
अनुदर्शन १३ : ५५५-५८६
—का वर्णन १३ : ७५६-७६०.
जीव—
अविद्याग्रस्त—७ : ६०-६७.
कर्ता—१८ : ४९०-५०५.
—का पुनर्जन्म १५ : ३६१-३६७.
—का स्वरूप १८ : ३२१-३२६,
अलिप्तता १४ : ३४८-३५०.
—स्त्रीके विषयमें १५ : ३६८-३७२.
परमात्मासे ऐक्य प्राप्त—६ : ७१-८४,
६ : ४८०, १२ : १५३.
प्रकृतितत्त्व—१५ : ३५२-३६०.
तत्—
—नामका उपयोग १७ : ३७०-३७३.
तत्त्वज्ञानार्थदर्शन—१३ : ६२३-६३१.
तप—
—का स्वरूप ४ : ६५, १६ : १०५-११२,
१८ : ८३७.
—तामसिक १७ : २५४-२६२,
—मानसिक १७ : २२७-२३७
राजसिक १७ : २४२-२५७
वाचिक—१७ : २१६-२३३
शारीरिक—१७ : २०२-२१४.
सात्विक— १७ : २४०-२४१,
तेज १६ : १८६-१९०, १८ : ८५८-८६०
त्याग—
—का स्वरूप १६ : १३१-१३५,
१८ : ९२
तामसिक— १८ : १७८-१८३,
राजसिक— १८ : १८४-१९८
सात्विक— १८ : १९९-२१६,
दंभ— ३ : २५०, १३ : ६५८-६६०,
१६ : २१७-२२३
—त्याग ( अदंभ ) १३ : २०२-२१५,
दम— १६ : ८९-९३, १८ : ८३५-८३६,
दया— १६ : १५४-१६२,
दर्प— १६ : २२४-२२९, १६ : ३९३-३९४,
१८ : १०५५-१०५७,
दान—
—दैवीगुण १६ : ८५-८८,
—क्षत्रियोंमें १८ : ८६९-८७०,
तामसिक १७ : २९४-३०७,
—राजसिक १७ : २८४-२९३
—सात्विक १७ : २६६-२८३,
दुःख—
—का अनुदर्शन १३ : ५९०-५९१
—का कारण २ : १११-११९,
ज्ञानेश्वरी ४२

५ : १२०-१२६ ७ : १६५-१७१,
१५ : ११४-१२०, १८ : १२७०
-का स्वरूप १३ : १३२-१३३,
-के नाशके उपाय ६ : ३६९-३७२,
देह-
-का आत्मासे संबंध १३ : १०९५ ११०३,
-का विचार २ : १०३-११०,
२ : १५९ १६९
-का स्वरूप ८ : १४०-१५०,
१३ : ११०४ १५ : ३०३-३७५
देहात्मवादी ३ : १२६-१२९,
१६ : १९९-३०२,
१८ : १८८-१९१, १८ : ३८१-३९४,
देहात्मवादका परिणाम ७ : १६५-१७१,
१८ : १२७४-१२८०,
दैव-
-का कार्य और लक्षण ६ : ३५४,
१५ : २२, १८ : ४९६,
१८ : १२९६-१२९८, १८ : १३४४,
देवताके रूपमें ५ : ९०,
१८ : ३४४-३५२,
-प्रतिकूल ११ : ४१२, १८ : ७२५,
-भाग्य आत्मलाभका १३ : ५२२
-भाग्य ज्ञानका १३ : १०६७,
१३ : १०७८,
द्वंद्व-

  • का कारण ७ : १६७-१७०,
    -का कार्य १५ : २९१-२९५,
    -से मुक्त ७ : १७२-१७९,
    १२ : १६५-१६९,
    १४ : ३५०-३५७,
    धर्म-
    -का पालन ३ : ११९-१२५,
    १८ : ९०६-९१३
    -का पालन न करनेवाला
    ३ : १०३-११७, ३ : १२७-१२९,
    -का फल ३ : ८०-८३,
    ३ : ९४-१०२, ३ : १५१-१५२,

-की रक्षाके लिये अवतार ४ : ४९-५७,
१० : २५२-२५४,
-की श्रेष्ठता २ : १८०-२००,
३ : २१९-२२९, १८ : ९२३-९३०,
-सहेतुक धर्मपालन २ : २२४-२२५,
धूम्रमार्ग-८ : २२६-२३६,
धृति-
-तामस १८ : ७४९-७६३
-दैवीगुण १३ : १४३-१४८,
१६ : १९२-१९६, १८ : ७६३-७६५
-राजस १८ : ७४५-७४८,
-सात्विक १८ : ७३३-७४४,
-क्षत्रियकी १८ : ८६१,
ध्यान-

  • का फल १२ : १३८
    -की श्रेष्ठता १२ : १४१
    -योग १८ : १०३१-१०४१,
    नमन-
    ॐकार रूपको १ : २०,
    -गणेश रूपसे १३ : ९, १७ : १-७.
    -पित्र रूपसे ९ : १-३३.
    -प्रार्थना रूप ६ : ३१-३६.
    १० : १-२२, ११ : १-२४
    १८ : १-२९
    -मातृरूपसे १२ : १-१०
    -मानसपूजा १५ : १-१८
    -सूर्यरूपसे १६ : १-१७
    -हेतु १४ : १७.
    नरक-
    -का कारण १६ : ३७१-३७४
    -का मार्ग १६ : ४३०-४३२
    नाथपरंपरा-१८ : १७५१-१७५९.
    नाम--
    -नामका सामर्थ्य १० : ३२१,
    १३ : ४०१-४०८,
    -का उपयोग १७ : ३५४-३९९
    -की आवश्यकता १७ : ३४५-३५२.
    -की महिमा १० : २३२-२३३.
    -सात्विक कर्ममें सहायक १७ : ३१०-३४४

४३ विषय-विश्लेषण

-से अभेद १७ : ४०३
-स्मरण ९ : २०६-२१०
निर्गुण १३ : १०७१-१०७४,
१३ : ११०७-१११३, १७ : ३२९,
१७ : ३६९.
पंचमहाभूत-१३ : ७६, १३ : १४३-१४६.
परिग्रह-१८ : १०६२-१०६६.
पाप-
-का परिणाम १ : ११९-१२४,
१ : २४५-२६१.
-की उत्पत्ति ३ : १२७-१२९, ३ : १४०,
३ : २३६ १३ : ३०-३१,
-के नाशका उपाय २ : २२५,
३ : ११९-१२४, ४ : १७२-१७८,
पारुष्य-१६ : २४३-२४५
पुनर्जन्म-८ : १५१-१६६
-का अंत २ : १७६, ७ : १७५-१७९,
८ : १९८-३०२
९ : ४९, ९ : ४०४, १० : १९८,
१२ : १३६, १३ : १०३३, १३ : १०४०,
१३ : १०४५, १३ : १०७७, १५ : ३२०
-के कारण ९ : ४०३.
पुरुष-८ : १८२-१८९.
-अधिदैव ८ : ३३-३६
-अधियज्ञ ८ : ३७
अव्यक्त ८ : १७९-१८१
-अक्षर १५ : ५०२-५२४.
-ब्रह्म ८ : १००-१०३
-उत्तम १५ : ५२५-५५७
-क्षर १५ : ४७८-५०१
पुरुषार्थ-
चौथा १४ : ४०१
पांचवा १२ : २१४, १ : २१९,
१८ : ८३७
प्रकृति-
अपरा ७ : १७-१८
-का कार्य ३ : १७७-१७८,
३ : १८४-१८५, ३ : १९४-१९६, ७ : १९
-का सामर्थ्य १८ : १२७८-१२९६.
-का स्वरूप ७ : १५-१६,
१३ : १८५-१९८
-की उत्पत्ति १३ : १०७९-१०८१.
-की माया १३ : ९८७, १४ : ६०-७०.
-पुरुष विचार १३ : ९५९-१०३५.
-पुरुष संबंध १३ : ९७९-९८५.
-विचार ९ : ९७-१२०.
बुद्धि-
-का स्वरूप १३ : ८३-८९,
१८ : ६९०-६९३.
-तामस १८ : ७२४-७२९,
-दुर्बुद्धि २ : ३४३-३५५
-बुद्धिभेद ३ : १७२-१७६
-योग २ : २३१-२४२
-राजस १८ : ७१८-७२३.
-सद्बुद्धि २ : २३६, २ : २४२, ५ : ८७
१६ : ८०
सद्बुद्धिका मार्ग ७ : १२७.
-सात्विक १८ : ६९९-७१७.
स्थूल-देहबुद्धि ९ : १४१-१४५,
ब्रह्म-
आनंद- ५ : १३०-१३५,
ऊर्ध्व- १५ : ७२-७९,
-का स्वरूप ८ : १५-१७, ८ : ६८९,
१३ : १०७२-१०७४,
१३ : ११४०-११४१, १५ : २६७
-पद ८ : १००-१०३,
१८ : १२५८-१२५९,
१८ : १३२१-१३२२,
परब्रह्म १८ : १००३,
-प्राप्तिका उपाय ६ : २८,
८ : १०४-१०६, ८ : १११-११९
१३ : ११२८-११३९, १५ : २६८-३०५
-श्रीकृष्ण २ : २९०, १४ : ४०४,
१७ : ३४, १४ : ४०३-४०८
ज्ञेय- १३ : ८६८-९३८,
ब्रह्मचर्य- १७ : २११
ज्ञानेश्वरी ४४

महादेव-
-का उपदेश ३ : ८५-१३६,
-का तप १७ : ३३६-३४१,
-की कालगणना ८ : १५४-१५९,
को पुनरावर्तन है ८ : १५२, ८ : १६६,
भक्ति-
अद्वैत- १८ : ११३७-११५१,
अंध- ७ : १३८-१५८,
अनन्य- ८ : १२४-१२६, ८ : १९२,
९ : ३३५-३३८, ११ : ६९६-६९८,
१२ : ३५-३८, १३ : ६०३-६१०
अभेद- १० : ११२-११८,
१४ : ३८१-३८७,
अव्यभिचारी- १४ : ३७२-३८७,
अज्ञान जन्य- ९ : १५५-१७१
-कर्ममें भक्ति ९ : ३९८-४०१,
११ : ७६-८१
-का अधिकार सबको ९ : ४४१-४७४,
-का फल ४ : ६३-६६, ८ : १२७-१३९,
९ : ३३८-३४३, १० : १३०-१४३,
१२ : ८३-९५
-का लक्षण ९ : ४११-४७४,
-की आवश्यकता ९ : ४९०-५१६,
कीर्तन- ९ : १९७-२१०,
--के चार प्रकार ७ : १०९-१११
-के मुख्य कारण भाव ९ : ३६७-३९७,
-कैसे करें ९ : ३५९-३६४,
९ : ५१७-५१९, १२ : ९७-१४०
१८ : १३५३-१३६१,
गहन- ९ : २१२-२१८,
गुरुकी- ९ : २२०-२२७,
नमन- ९ : २२१-२२९,
परा- १८ : ११११-१११७,
( महात्माओंकी ) भजन-भक्ति
९ : १५९-१९६, १० : ११९-१२९,
व्यभिचारी भक्ति १३ : ८०७-८२१
सहजभक्ति १८ : ११७३-११८४,
ज्ञानयुक्तभक्ति ९ : २३९-२६१,
ज्ञानी भक्ति ९ : १४४-२१४,
भारत-
-माहात्म्य १ : २८-४९
अमर- १ : २०१, ९ : ५८,
-जीव १६ : ४, १८ : ७२९, १८ : १३०९
भ्रांति-
-का स्वरूप २ : १३३.
-निरास १३ : ११३५-११३९,
१४ : ३०३-३०४.
-परिणाम ६ : ६८, ६ : ७२-७९,
९ : ६०,
मद-
-तारुण्यका १३ : ७५५-७६०,
-धनका १६ : २२७,
मन-
-का निग्रह १२ : ५०१-५०९,
-स्वरूप ६ : ४११-४१७,
१३ : १०६-११५
-की दौड-परमात्माकी ओर ८ : ८२-८३,
१२ : ९७-१२०.
-की दौड विषयोंकी ओर
१५ : ३५५-३६०,
-प्रसाद १७ : २२५-२३५,
-संयम का उपाय ६ : १८४,
६ : ३८०-३८९, ६ : ४१९-४२०,
८ : १११-११३, १२ १०१७-१०१८,
माया-
-का परिणाम ७ : ६०-६७,
-का वर्णन ७ : ६८-८२, १४ : ८८-८९,
१४ : ९१-११३, १५ : ८०-८९,
-का स्वरूप १४ : ६८-११५,
-का सामर्थ्य १ : १०३,
तरना कठिन ७ : ८३-९७.
तरनेका उपाय ७ : ९७-१०२
मार्दव-१६ : १६८-१७४.
मूढ-३ : १७८-१७९, ३ : १९८, ४ : २५,
९ : १४३-१४५.
मृत्युलोक ९ : ४९०-५१५.
४५
विषय-विश्लेषण

मोह-
—का परिणाम २ : ३२३-३२४,
१६ : ३६९-३७०.
—की उत्पत्ति ७ : २६७
—से ग्रस्त २ : ७१.
मोक्ष-
—का इच्छुक १५ : २७७-२७९.
—का स्वरूप ६ : ६८-७०
—के अधिकारी ६ : ३४२,
१८ : ९८८-९९१
—के उपाय ३ : ७७-८३, १४ : ५०-५९,
१५ : ३२, १५ : ३५, १७ : ३२७,
१८ : १०४६
—बद्ध ३ : ६४-६६.
मौन १० : २९८.
यज्ञ-
—के प्रकार तामस १७ : १८९-१९५,
द्वादश ४ : १२३-१४८,
१७ : ३६०-३६४.
राजस १७ : १८५-१८८.
—सात्विक १७ : १७१-१८४.
—स्वधर्मरूप ३ : ८६-१३०.
जपयज्ञ १० : २३२-२३३
—ज्ञानयज्ञ ९ : २३९-२५९.
योग-
—अभ्यासस्थान ६ : १६३-१८०.
—आसन ६ : १८१-१८५.
—का अधिकारी ६ : ३४६.
६ : ३४५-३५६.
—का अनधिकारी ६ : ६४४-६४८
का फल ६ : २९३-३१०.
—के अंग ६ : ५४-६०.
—के कष्ट १२ : ५१-६४.
—जीवपरमात्म १२ : १५३-१५५.
नाथमतका योगसंकेत ६ : २९१.
—योगभ्रष्टकी स्थिति ६ : ४३०-४३७,
—योगारूढ ५ : १४८-१६०.
६ : ६२-६५.
श्रेष्ठतम—६ : ४७४-४८५.
संन्यास कर्मैक्य योग ६ : ३९-५३.
सांख्य-५ : २९-३१
—बुद्धि २ : २७३-२७५.
राजहंस —९ : ४४, १२ : १२७,
१३ : ११४२, १८ : १७१३.
राजा ९ : ४५, १० : २३९, १८ : ७३३,
१८ : ८४९, १८ : १६३३.
लज्जा १३ : ५३५-५४३, १६ : १७५-१८२
लोकसंग्रह— ३ : १५२-१५९,
६ : १६८-१७८, १६ : ४६८.
विकार—
—की उत्पत्ति १३ : ९६६-९६७
—देहके १४ : ३१५
—क्षेत्रके १३ : ७२-१६०.
विभूति—१० : २१५-३०७.
विवेक—
—कार्य १ : २२, ५ : ८४-८५,
९ : १९०, १४ : २०६-२०८.
—का स्वरूप १८ : १६३२.
विश्वरूप—
—का महत्त्व ११ : ६०९-६२१.
—की दुर्लभता ११ : १६५-१७५
—दिखानेका उद्देश्य ११ : ४९७-४९८.
—दिव्य दृष्टिकी आवश्यकता ११ : १५४-
१६३.
—सगुणसे श्रेष्ठ ११ : ६२३-६३७.
विषय—
—का त्याग वास्तविक २ : ३३१-३३७
—का त्याग मिथ्या ३ : ६४-६६
—कर्मेंद्रियके १३ : ११९-१२०.
—का भोक्ता ५ : ११०-११२,
१६ : २२१-२२६,
—की उत्पत्ति १४ : ९३-९४,
—की स्मृति ३ : ३१७-३३०
—सुख ५ : ११३-१२०,
—सुखका परिणाम ३ : २०१,

ज्ञानेश्वरी ४६

३ : २१०-२१६,
विज्ञान ७ : ६, १८ : ८४७,
वेद-
-का मूल १८ : १४२६-१४३३,
-की उत्पत्ति १ : ७२, ९ : २७६-२७७
-परमात्मस्वरूप वर्णनमें असमर्थ
९ : ३७१, १० : ६४,
-श्रेष्ठ ९ : ३७०
वैराग्य-
-का फल १८ : ९०४,
-का स्वरूप ८ : ३७३-३७७,
१३ : ५१२-५२३, १५ : ३६-३९,
१५ : २५६-२५७, १५ : २७७
१८ : ९१८-९२१,
-की आवश्यकता १५ : ३९१-४६१,
१८ : १०४३-१०४७,
-की कठिनाई १८ : ७८२-७८९,
-शंकरका १३ : २४-२५, १८ : ७८९
शम- १८ : ८३३-८३४,
शरणता-
-का फल ९ : ८८,
१८ : १४०९-१४१५.
-के प्रकार १८ : १३१९,
१८ : १३९८-१४०५, १८ : १४१६.
शांति-
-का साधन ४ : १८९-१९१, ५ : ७१,
९ : ४२९, १८ : १३२०.
-का स्वरूप १६ : १३१-१४०
१७ : ४२४-४२६, १८ : १०८५.
शास्त्र- १६ : २९५-२९७,
१३ : ४५५-४६७, १८ : ८८८-८९३,
१८ : १४५३.
शौच १३ : ४६१-४८३,
१६ : १९७-१९८, १८ : ८३९-४०.
शौर्य १८ : ८५६-८५७.
श्रद्धा-
अश्रद्धा ४ : १९३-२०६, ९ : ५७-६१.
-का लक्षण ४ : १८७-१९१,
१६ : ४६०, १८ : ८४९-८५०.
-की व्याप्ति १७ : ६१-७७.
-तामस १७ : ७९-८२.
-राजस १७ : ७८
-सात्विक १७ : ७६-७७.
संजय-
-का आनंद १४ : ४१३-४१४,
१७ : ४२४-४३०, १८ : १६१३-१६२०.
-का भाग्य वर्णन १८ : १५७९-१५८३.
-के अष्टसात्विक भाव ९ : ५२५-५३०,
१८ : १६०२-१६०६.
-पर व्यास कृपा १८ : १६०८-१६१२.
सत्-
-नामका उपयोग १७ : ३७९-३८५.
संत २ : १२६, ३ : ६८-७४,
४ : ९३-११४, ५ : ७३-७५,
५ : १०५-१०६, ९ : १८८-१९६,
१४ : ३०८-३१८, १५ : २८४-३०५,
१५ : ५५९-५६९, १८ : १३५६.
-का संग १५ : ४२२, १८ : १६३२
-का स्तवन ५ : १३६-१४०,
१८ : १७७०-१७९१.
-स्थितप्रज्ञ २ : २९१-३६७.
सत्य- १६ : ११५-१२४.
सत्वशुद्धि- १६ : ७४-८०,
१७ : २२५-३३५.
संन्यास-
-आश्रम ६ : ४९-५०
-का महत्व १८ : ७०-७१
-का लक्षण ५ : १९-२५
-की व्याख्या १८ : ९२
-ज्ञानप्रधान १८ : २५७-२६७,
१८ : १२६०-१२६५
संपत्ति-
आसुरी-१६ : २१७-२६३.
आसुरी मनुष्यकी-९ : १७२-१८३,
१६ : २८१-३०४,
आसुरी मनुष्यकी गति ९ : १८४-१८५,
१६ : ४०५-४२२,
आसुरी सं. का परिणाम १६ : २६२,
दैवी-९ : १८८-१९४,
-का महत्त्व १६ : २०७-२१२,
का स्वरूप १६ : ५९, १६ : ६५-६७,
-की परिभाषा १६ : ६६
समचित्तत्व-२ : २६७-२८४,
१२ : १९७-२०४
४७ विषय-विश्लेषण

१२ : २०७-२१०, १३ : ६००-६०१,
१४ : ३४९-३६८, १८ : १०१-१२१.
समदर्शन ५ : ८७-१०४, ६ : ९६-१००,
६ : ३९१-४१०.
७ : १३६, १३ : १०५६-१०७०.
सरस्वती १ : २१, १ : ७८,
१३ : ११६७.
संसार ९ : ६२, १५ : ३४७
मिथ्या होता है ८ : १९७-१९८,
१५ : २४, १५ : ४३, १७ : २०८.
सांख्यशास्त्र १८ : ५१९-५२२.
सुख-
आंतरिक ५ : १३०-१३५
आत्यंतिक ६ : ३६५-३७२.
की परिभाषा १३ : १२७-१३१,
१८ : ७६७-७७७
के पिछलगू २ : २४४-२५५,
९ : ३०७-३१९
तामस-१८ : ८०६-८०९
राजसिक-१८ : ७९४-८०५
सात्विक-१८ : ७७८-७९३
स्वर्ग-८ : १६०-१६७, ९ : ३२०,
१३ : ५९९.
स्थैर्य १३ : ४८४-४९९.
क्षमा- १३ : ३४०-३५३,
१३ : १९१-१९५.
क्षेत्र-
कालवादका-१३ : ५८-६५
की व्याख्या १३ : ७
जीववादका-१३ : १७-३२.
प्रकृतिवादका-१३ : ३३-३९
गीताका-१३ : ७२-१५०
संकल्पवादका-१३ : ४०-५१
स्वभाववादका-१३ : ५२-५७.
क्षेत्रज्ञ-१३ : ७-८.
ज्ञान-
अंध-९ : १५५-१७१, १५ : २४८-२५४,
१५ : ३७३-३८०.
का अधिकारी १५ : ३३-३६.
का फल ३ : ४३, ४ : १६९-१७८,
४ : १८९-१९२, ४ : २०७-२०८,
५ : ८३-८५, ५ : ९३-१०२.
१३ : १६८-१७३, १३ : १०७४-१०७८,
१३ : ११३९-११४२, १४ : ४९-६०,
१४ : ११४, १५ : ३०-३२.
का सामर्थ्य १६ : ४५, १६ : ५०-५१.
की महती ४ : १५८-१६४,
४ : १६९-१८३, ९ : ४७-५२
१४ : ४१-४८.
के लक्षण १२ : १४४-२१४,
१३ : १८४-२३१, १५ : २८५-३०४.
तामस १८ : ५४९-५७८.
निष्ठा ३ : ३६.
पानेका उपाय ४ : १६५-१३८,
४ : १८७-१८८, ८ : ४८-५२.
१३ : १६१-१६४, १३ : १०३६-१०४६,
१३ : ११२८-११३८.
यज्ञ ९ : २३९-२६१,
राजस १८ : ५३८-५४८.
विशेष ७ : ५, १३ : ९, १४ : ४८
सात्विक १८ : ५२९-५३७
ज्ञाता सामान्य १८ : ५६१-४६६
सामान्य १८ : ४६६-४७०
ज्ञेय सामान्य १८ : ४७२-४७६.
ज्ञानीके कर्म १८ : ४२२-४३६
ज्ञेय १३ : ८६२-९३८.
ज्ञानेश्वर-ज्ञानेश्वरी-
और काव्य ४ : २१२-१२४,
६ : १५-२०, ७ : १०७-२१०,
११ : २-६, १२ : ११-१४,
१३ : ११५६-११६३.
और गुरुभक्ति १ : २१-२७,
१३ : ४५५-४५८, १५ : १७-२७.
और तपस्या १६ : ३२-३३.
और मातृभाषा ६ : १४, १० : ४२.
११ : ९, १२ : १६.
का पसायदान १८ : १७९३-१८००.
कालीन परिस्थिति १८ : १८०४.
का लेखनस्थलकाल
१८ : १८०२-१८०३, १८ : १८१०.
की गीतासे तुलना १० : ४३-४७
१८ : १७३६-१७४१.
की नम्रता १ : ७६, १ : ८०-८२,
९ : १०-१२, १८ : १७६४-१७६८,
ग्रंथफल १८ : १७४२-१७४९.
परिहार १८ : १७८१-१७९२.
ॐ

ज्ञानेश्वरी
१
अर्जुनविषादयोग
ॐ नमो श्री आद्य । वेदप्रतिपाद्य ।
जय जय स्वयंवेद्य । आत्मरूप ॥१॥
देव तू ही श्री गणेश । सकल-मति प्रकाश ।
कहे निवृत्तिका दास । सुनियेजी ॥२॥
शब्द-ब्रह्म यह अशेष । वही है जो मूर्ति सुवेष ।
वहां वर्ण भी है निर्दोष । सजाया जो ॥३॥
स्मृति ही है ,अवयव । रेखायें अंगके भाव ।
लावण्य रूप वैभव । अर्थ शोभा ॥४॥
अष्टादश जो पुराण । वही हैं मणि-भूषण ।
पद पद्धति कोंदण । प्रमेय-रत्नका ॥५॥
पदबंध है वसन । रंगाया अति महीन ।
साहित्य शोभायमान । किनारी है ॥६॥
मानो है काव्य-नाटक । सोचनेसे स-कौतुक ।
पदकी क्षुद्रघंटिका । अर्थ-ध्वनि ॥७॥
अनेक तत्वोंका निरूपण । उसका नैपुण्य विलक्षण ।
उचित वचन सुलक्षण । दीखे रत्न-सम ॥८॥
१

व्यासादिकोंका शुद्धज्ञान । शोभता मेखला समान ।
उसकी दिशा है महीन । झलकती सदा ॥९॥
कहलाते जो षड्दर्शन । जैसे भुजदंड महान ।
तभी है असंगत-पूर्ण । आयुध करमें ॥१०॥
तर्क ही है परशु । नीति-भेद अंकुश ।
वेदांत महारस । शोभता मोदक ॥११॥
एक हाथमें हैं दन्त । स्वभावसे ही खंडित ।
जो बौद्धमत संकेत । वार्तिकोंका ॥१२॥
सहज सत्कारवाद । है पद्मकर वरद ।
धर्मप्रतिष्ठामें सिद्ध । अभयहस्त ॥१३॥
विवेकवंत सुविमल । वही शुंड-दंड सरल ।
है परमानंद केवल । महासुखका ॥१४॥
अजी संवाद है दशन । जो है समता शुभ्रवर्ण ।
देव उन्मेषसूक्ष्मेक्षण । विघ्नराज ॥१५॥
पूर्व उत्तर मीमांसा मान । उसके हैं दो श्रवणस्थान ।
मुनिमन बोधामृत पान । करते अमरसे ॥१६॥
प्रमेयप्रवालसुप्रभ । द्वैत अद्वैत हैं निकुंभ ।
तुल्यबल हैं जो सुलभ । मस्तक पर ॥१७॥
उस पर हैं दस उपनिषद् । जिसके उदार ज्ञान-मकरंद ।
मुकुट पर जो सुमन-सुगंध । सुहाते हैं ऐसे ॥१८॥
अकार चरण युगल । उकार उदर विशाल ।
मकार है महामंडल । मस्तकाकार ॥१९॥
जहां ये तीनो हुए एक । शब्दब्रह्म प्रकटा नेक ।
गुरु-कृपासे जाना देख । यह आदिबीज ॥२०॥
सरस्वती वंदन—
अजी अभिनव वाग्विलासिनी । जो चातुर्य-अर्थ-कलाकामिनी ।
वह है शारदा विश्व-मोहिनी । नमस्कार मेरा ॥२१॥
ज्ञानेश्वरी २

गुरु-वंदन —
मेरे हृदयमें श्री सद्गुरु। जिसने तारा संसार-पूर ।
इससे है विशेष आदर। विवेकपे ॥२२॥
जैसे अंजन पड़ा आखोंमें। फूटे नव-अंकुर दृष्टिमें ।
लगा टोह दस दिशाओंमें। महानिधिका ॥२३॥
अथवा चिंतामणि आया करमें। सदा विजयवृत्ति बसी मनमें ।
वैसे हूं पूर्ण-काम निवृत्तिमें। कहता ज्ञानदेव ॥२४॥
इसीसे श्रीगुरुको भजा जानके। उससे ही सतत-कृतार्थ होके ।
सींचनेसे जैसे मूलको वृक्षके। खिलते शाखा-पल्लव ॥२५॥
त्रिभुवनके तीर्थ जिसमें। डूबते हैं सदा सागरमें ।
या अमृतके रसास्वादमें। आते रस सकल ॥२६॥
वैसे आगे आगे जो रहता है। नमन किया जिसे श्रीगुरु है ।
अभिलषित मनकी रुचि है। पूर्ण करता जो ॥२७॥
महाभारतका वर्णन—
सुनो अब कथा जो गहन। सब कौतुकका जन्मस्थान ।
अथवा अभिनव उद्यान । विवेक तरुका ॥२८॥
सभी सुखोंका जो है आदि। सब तत्वोंका महोदधि ।
नवरसोंका जो सुधाब्धि । है परिपूर्ण ॥२९॥
परमधाम प्रकट । विद्याओंका मूलपीठ ।
सभी शास्त्रोंमें जो श्रेष्ठ। अशेषका ॥३०॥
सभी धर्मोंका नैहर। सज्जनोंका है जिव्हार ।
लावण्य-रत्न भांडार । शारदाका ॥३१॥ ,
या प्रकटी है त्रिभुवनमें । भारती स्वयं कथा-रूपमें ।
स्फुरण होके व्यास -चित्तमें । जो है महामति ॥३२॥
या है यह काव्यराज । ग्रंथ-गुरुत्वका ताज ।
रसमें रसत्व आज । आया उमड़ ॥३३॥
सुनो एक और महता । शब्दोंमें आयी शास्त्रीयता ।
बढ़ी महाबोध मृदुता । इस ग्रंथसे ॥३४॥
३ अर्जुनविषादयोग

दक्ष हुआ यहां चातुर्य । आया है प्रमेयमें माधुर्य ।
सुखका हुआ है ऐश्वर्य । परिपुष्ट ॥३५॥
माधुर्यमें मधुरता । श्रंगारमें सुरेखता ।
प्रथाओंकी सुरूपता । दीखती यहां ॥३६॥
कलामें आयी है कुशलता । वैसे ही पुण्यमें तेजस्विता ।
नष्ट हुये दोष स्वभावतः । जनमेजयके ॥३७॥
क्षणभर देखनेसे लगता । रंगमें बढ़ आयी सु-रंगता ।
गुणमें अंकुरायी सुजनता । सामर्थ्य रूप ॥३८॥
भानु-तेजसे धवल । त्रिलोक दीखे उज्ज्वल ।
व्यास-मतिके चंगुल । शोभता विश्वपे ॥३९॥
सु-क्षेत्रमें पड़ा हुआ बीज । अपने आप फैला सहज ।
भारतमें उमड़ा है तेज । पुरुषार्थका ॥४०॥
नगरमें बसा नागरिक । रहता है जैसा सविवेक ।
वैसे व्यासोक्तिसे हुआ नेक । सभी विश्व ॥४१॥
अथवा तारुण्यारंभमें जैसे । खिलती लावण्य कलिका वैसे ।
आता अंगनाके अंगांगमेंसे । नित नव बहार ॥४२॥
या वसन्तागमनसे उद्यानमें । आता है बहार प्रति पल्लवमें ।
सौंदर्यकी खान खुलती वनमें । वैसे ही जान ॥४३॥
अथवा घनीभूत सुवर्ण । देखनेमें है जो साधारण ।
दीखे भूषण असाधारण । उसी भांति ॥४४॥
व्यासोक्तिके अलंकारार्थ । इच्छित सौंदर्य प्राप्त्यर्थ ।
इतिहास है आश्रयार्थ । आया भारतके ॥४५॥
या अपनी प्रतिष्ठाके लिये । अल्पत्वको है स्वीकार किये ।
पुराण आख्यान रूप लिये । आये भारतमें ॥४६॥
तभी जो महा-भारतमें नहीं । नहीं है त्रिभुवनमें कहीं ।
कहते हैं सब ही तभी यही । व्यासोच्छिष्ट जगत्रय ॥४७॥
जगतमें कथा सरस ऐसी । परमार्थकी है जन्म-भूमि-सी ।
मुनि वाणिसे अमृतमय-सी । सुनी जनमेजयने ॥४८॥
ज्ञानेश्वरी ४

अद्वितीय औ' उत्तम । पवित्रैक निरुपम ।
परम मंगलधाम । सुनिये अब ॥ ४९ ॥
श्रीमद्भगवद्गीता महिमा-
भारत कमल पराग । गीताख्यानका है प्रसंग ।
कहते हैं स्वयं श्रीरंग । अर्जुनसे ॥ ५० ॥
अथवा शब्द ब्रह्मान्धि । मथ लिया व्यास-बुद्धि ।
निचोड़ है निरवधि । नवनीत यह ॥ ५१ ॥
फिर ज्ञानाग्नि-संपर्कसे । तपाया तीव्र विवेकसे ।
हुवा पूर्ण परिपाकसे । सुगंधित घृत ॥ ५२ ॥
विरक्त उसकी अपेक्षा करते । संत उसका अनुभव करते ।
तथा पारंगत रमते रहते । सोऽहं भावमें ॥ ५३ ॥
सुनना उसे भक्तिमें । वंद्य है जो त्रैलोक्यमें ।
कहा है भीष्म-पर्वमें । श्रीहरिने ॥ ५४ ॥
उसको श्रीमद्भगवद्गीता कहते । ब्रह्मेश उसकी प्रशंसा करते ।
सनकादिक हैं सेवन करते । अति आदरसे ॥ ५५ ॥
जैसे शरद्‌चंद्रकलामें । होते सुधाकण साथमें ।
उठाते कोमल चोंचमें । चकोर-शावक ॥ ५६ ॥
उस पर भी सुन श्रोता । प्रतीत करो यह कथा ।
चितमें अति चेतनता । लाकरके तुम ॥ ५७ ॥
शब्दोंके बिन है बोलना । इंद्रियोंके बिन भोगना ।
बोलके बिन उलझना । प्रमेयोंसे ॥ ५८ ॥
भ्रमर जैसा पराग ले जाते । किंतु कमल दल न जानते ।
इस भांति अनुभव करते । ग्रंथको यहां ॥ ५९ ॥
अथवा अपना स्थान नहीं छोडते । आलिंगन करते चंद्रोदय होते ।
ऐसा प्रेम भोग भोगना है जानते । कुमुदिनि समान ॥ ६० ॥
ऐसी ही गंभीरतासे । स्थिर अन्तःकरणसे ।
जाने जो संपन्नतासे । युक्त मन हो ॥ ६१ ॥
५ अर्जुनविषादयोग

जो हैं अर्जुनके साथ । बैठ सकते हैं सन्त ।
कृपया सुने ये बात। दत्त-चित्त हो ॥ ६२ ॥
श्रोताओंको नमन—
आपका हृदय है अति कोमल । तभी निकले हैं ये प्रीतिके बोल ।
वैसे मेरी विनय अति सरल । चरण युगलमें ॥ ६३ ॥
जैसे स्वभाव माता-पिताका । तोतली बोली सुननेका ।
सानंद अपने आपत्यका । वैसे ही यहां ॥ ६४ ॥
वैसे किया मेरा स्वीकार । सज्जनोंने अपनाकर ।
कम अधिक क्षमाकर । उपेक्षासे ॥ ६५ ॥
कविकी नम्रता—
किंतु दूसरे ही अपराधका । क्षमा प्रार्थी हूं मैं यहां आपका ।
गीतार्थ कथनके प्रयासका । सुनियेजी ॥ ६६ ॥
न सोचकर अपनी क्षमता । चित जो यह साहस करता ।
जैसे भानु-तेजमें चमकता । खद्योत जैसे ॥ ६७ ॥
अथवा जैसे टिटहर । सुखाना चाहता सागर ।
वैसे अल्पज्ञ यह भार । उठाता है ॥ ६८ ॥
यदि है आकाश लपेटना । उससे अधिक बडा होना ।
ऐसा है यह मेरा करना । विचारान्तमें ॥ ६९ ॥
ऐसी है गीतार्थकी महत्ता । शंभु स्वयं कथन करता ।
प्रश्न करती भवानी माता । चमत्कृत होके ॥ ७० ॥
शिव कहते हैं उमासे । अथाह तव रूप जैसे ।
भगवद्गीता तत्व वैसे । नित्य नूतन ॥ ७१ ॥
यह है वेदार्थ सागर । उस निद्रस्थका है घोर ।
कहता यह सर्वेश्वर । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७२ ॥
ऐसा है जो अगाध । भ्रमते जहां वेद ।
वहां मैं मतिमंद । कहूंगा क्या ॥ ७३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६

यह अपार कैसे लपेटेगा । महातेजको कैसे उजालेगा ।
आकाश कैसे मुट्ठीमें कसेगा । यह क्षुद्र जीव ॥ ७४ ॥
गुरु कृपाकी महिमा—
किंतु यहां है एक आधार । उसीका है मुझे महा-धीर ।
अनुकूल है श्रीगुरुवर । कहता ज्ञानदेव ॥ ७५ ॥
नहीं तो मैं अति-मूर्ख । वैसे ही है अविवेक ।
सन्त-कृपाका दीपक । करता सोज्वल ॥ ७६ ॥
हो जाता है कनक लोहेका । सामर्थ्य है यह पारसका ।
मृतको जीवित करनेका । अमृतमें जैसे ॥ ७७ ॥
प्रकटती जब सरस्वती । गूंगेको भी है वक्ता करती ।
केवल वस्तु - सामर्थ्य-शक्ति । अचरज नहीं ॥ ७८ ॥
मैं गुरुकी कठपुतली हूं—
कामधेनु है प्रसन्न जिसे । अप्राप्य नहीं है कछु उसे ।
नहीं तो प्रवृत्त होता कैसे । इस कार्यमें मैं ॥ ७९ ॥
अपूर्णको पूर्ण कर लेना । अधिकको न्यून मान लेना ।
ऐसे ही मुझे संभाल लेना । विनय है यह ॥ ८० ॥
अजी ! आप अब सुनियेगा । आप कहें सो तुतलाऊंगा ।
नचावे वैसा ही मैं नाचूंगा । सूत्रधार जो ॥ ८१ ॥
वैसे मैं अनुगृहीत । साधुओंसे निरूपित ।
आपसे हे अलंकृत । अपनत्वमें ॥ ८२ ॥
गुरु प्रसादकी सूचना —
श्रीगुरु कहते अब । न कह तू यह सब ।
कर ग्रंथका प्रारंभ । तुरंत ही ॥ ८३ ॥
आज्ञांस निवृत्तिका दास । कहता हो परमोल्हास ।
देके मनको अवकाश । सुनो अब ॥ ८४ ॥
७ अर्जुनविषादयोग

अध्याय २: सांख्ययोग

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥
मोहग्रस्त धृतराष्ट्रकी जिज्ञासा—
मोहित है जो पुत्र-स्नेहसे । धृतराष्ट्र पूछे संजयसे ।
वृत्तांत कहो अति त्वरासे । कुरुक्षेत्रका ॥ ८५ ॥
कहते जिसे धर्म - क्षेत्र । वहां मेरे औ' पांडुपुत्र ।
हुये युध्दार्थ जो एकत्र । करते हैं क्या ? ॥ ८६ ॥
तभी उन्होने परस्पर । किया क्या इस अवसर ।
कहो जी अब सविस्तर । मुझसे तुम ॥ ८७ ॥
संजय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
दुर्योधन उवाच
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३ ॥
धृतराष्ट्रने कहा
पवित्र कुरु-क्षेत्रपे हमारे और पांडुके ।
लड़ायीके लिये आये हुवा क्या कह संजय ॥ १
संजयने कहा
निहारी पांडवी-सेना सजी कौरवने जब ।
तब जा गुरुके पास उनसे बात ये कहीं ॥ २ ॥
दुर्योधनने कहा
गुरुजी आपका शिष्य प्रवीण द्रुपदात्मज ।
रचा जो इसने व्यूह देखें पांडव सैन्यका ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८

युद्धवर्णन—
“सुनो” तब वह संजय बोला। पांडवी सेनाने किया हमला।
जैसे महा-प्रलयमें है फैला। कृतांत मुख ॥ ८८ ॥
सेना मानो महापूर जैसे। चढ आती है जो उग्रतासे।
उबलता कालकूट जैसे। रोके कौन ? ॥ ८९॥
अथवा जैंस बड़वानल भड़का। उसको साथ मिला प्रलय-वातका।
उठा जो शोषण करके सागरका। आकाश तक ॥ ९० ॥
ऐसा वह दल दुर्धर। व्यूह रचनामें चतुर।
जिससे अति भयंकर। दीखता है॥ ९१ ॥
जिसे देखकर दुर्योधन। उपेक्षा करके अनमन।
जैसे न गिनता पंचानन। गज-समूहको ॥ ९२ ॥
गया वह गुरुके पास। बात कही है स-उल्हास।
उछला सेनाका उल्हास। देखो पांडवोंकी ॥ ९३ ॥
गिरि-दुर्ग चलते हैं जैसे। विविध व्यूह बनते वैसे।
रचा अति कुशलतासे। द्रुपद-पुत्रने ॥९४॥
किया जो आपने ही शिक्षित। विद्यासे किया है ज्ञानवंत।
रचा सैन्य-सिंह सुशोभित। उसने देखें ॥ ९५॥
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुन समायुधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥
और भी हैं असाधारण। शस्त्रास्त्रमें हैं जो प्रवीण।
क्षात्र-धर्ममें हैं निपुण। अन्यवीर ॥ ९६ ॥
जो हैं बल प्रौढ़ि पौरुषमें। भीम अर्जुनकी समतामें।
कहूंगा मैं इस प्रसंगमें। नाम उनके ॥ ९७॥
यहां युयुधानु सुभट। आया वह वीर विराट।
वैसे ही महारथी श्रेष्ठ। द्रुपदराज ॥ ९८॥
यहां शूर धनुर्धारी जैसे हैं भीम अर्जुन।
महारथी जो द्रुपद विराट नृप सात्यकी ॥ ४ ॥
९ अर्जुनविषादयोग
(२)

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुंतिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंगवः ॥ ५ ॥
युधामन्युश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥
चेकितान धृष्टकेतु । काशीश्वर है विक्रांत ।
उत्तमौजा नृपनाथ । तथा शैव्य है ॥ ९९ ॥
अजी यहां कुंतिभोज है । युधामन्यु भी आगया है ।
पुरुजित् आदि राजा हैं । सबको देखलें ॥ १०० ॥
यह सुभद्रा हृदय नंदन । पौरुषमें मानो नव अर्जुन ।
हैं अभिमन्यु कहे दुर्योधन । गुरु द्रोणसे ॥ १ ॥
वैसे ही द्रौपदी कुमार । सभी महारथी वीर ।
मैं नहीं जानु हैं अपार । यहां वीर लोग ॥ २ ॥
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपस्य समितिंजयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥
शूर है जो धृष्टकेतु कास्य औ' चेकितान भी ।
पुरुजित् कुंतिभोजीय तथा शैब्य नरोत्तम ॥ ५ ॥
वीर हैं उत्तमौजा भी युधामन्यु पराक्रमी ।
सौभद्र और ये पुत्र द्रोपदीके महारथी ॥ ६ ॥
अपने पक्षके जो हैं सेनाके मुख्य नायक ।
कहता हूं सुने आप आचार्य चित्त देकर ॥ ७ ॥
स्वयं आप तथा भीष्म यशस्वी कृप कर्ण हैं ।
सौमदत्ति अश्वत्थामा जयद्रथ विकर्ण भी ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी १०

अब अपने दलके नायक । हैं जो दृढ वीर तथा सैनिक ।
सुनिये सभी ध्यान पूर्वक । कहता हूं मैं ॥ ३ ॥
आप तथा अन्य जो हैं । मुख्य रुपसे दीखते हैं ।
यह केवल संक्षेप है । कहता हूं सुनिये ॥ ४ ॥
यह है भीष्म गंगा नंदन । प्रतापमें हैं भानु समान ।
हैं जो रिपु-गज-पंचानन । कर्ण महाबीर ॥ ५ ॥
इसमें एकेकका मनो-व्यापार । करता है विश्वोत्पत्ति औ' संहार ।
यह कृप आचार्य है महावीर । अपर्याप्त हैं क्या ? ॥ ६ ॥
यह विकर्ण भी वीर है । यह अश्वत्थामा खड़ा है ।
हियमें जिसका डर है । कृतांतके भी ॥ ७ ॥
सौमदत्ति है समितिंजय । करने आये मेरी विजय ।
धाता न जाने जिनका शौर्य । ऐसे हैं अनेक ॥ ८ ॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥
जो शस्त्र-विद्या पारंगत । तथा मंत्रावतार मूर्त ।
अस्त्रमात्रके जो अभ्यस्त । पूर्ण रुपसे ॥ ९ ॥
अप्रतिम जो मल्ल-जगतमें । पूर्ण प्रताप जिनके तनमें ।
परंतु सर्व-प्राणं जो मुझमें । लगाया है ॥ ११० ॥
जैसे है पतिव्रताका हृदय । पति बिन न स्पर्शे अन्य काया ।
वैसे सर्वस्व है मुझको दिया । इन सुभटोंने ॥ ११ ॥
हमारे कार्य सिध्यर्थ । इन्होने दिया जीवित ।
ऐसे हैं ये स्वामि-भक्त । निस्सीम ॥ १२ ॥
हैं ये युध्द कलामें निपुण । यश प्राप्तिमें दक्ष महान ।
क्षात्र नीतिका है जनन । हुआ इनसे ॥ १३ ॥
अनेक दूसरे वीर मैरे हित सभी तज ।
सजे हैं सब शस्त्रोंसे रणमें दक्ष जो सदा ॥ ९ ॥
११ अर्जुनविषादयोग

ऐसे सर्वांग पूर्ण वीर । अपने दलमें अपार ।
गणनाका नहीं है पार । कहें कितने ॥ १४ ॥
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥
सब क्षत्रियमों श्रेष्ठ । विश्व विख्यात सुभट ।
भीष्मने सजाया पीठ । सेनापतिका ॥ १५ ॥
इन्होंने अपने सामर्थ्यसे । रचाया सेनाके दुर्ग जैसे ।
इनके सम्मुख विश्व जैसे । है कःपदार्थ ॥ १६ ॥
पहले ही है महासागर । सबको ही है वह दुस्तर ।
फिर वडवानल प्रखर । विराजा वहां ॥ १७ ॥
या प्रलय-वन्हि-महावात । दोनोंका हुआ समान साथ ।
ऐसे सैन्यका है गंगा-सुत । सेनापति बना ॥ १८ ॥
इससे अब कौन लड़ेगा । पांडव दल ओछा पड़ेगा ।
कहिये उसका क्या चलेगा । इनके सम्मुख ॥ १९ ॥
भीमसेन बडा बोथा । बना है जो सेनानाथ ।
ऐसा कह कर बात । छोडी उसने ॥ १२० ॥
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षंतु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥
पुनरपि बोले दुर्योधन । सुनो बात तुम सभी जन ।
सैन्य सहित हो सावधान । रहे अपना ॥ २१ ॥
जिसकी जो अक्षोहिणी सेनामें । जिसके साथ भिडेगी रणमें ।
सन्नध्द करो नियत स्थलमें । महारथीके सम्मुख ॥ २२ ॥
अपार अपनी सेना जो है रक्षित भीष्मसे ।
थोडीसी उनकी सेना जिसका भीम रक्षक ॥ १० ॥
मिला जो जिनको स्थान डटके उस स्थानपे ।
करेंगे भीष्मकी रक्षा सब ही सब ओरसे ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी १२