ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
सेना अपनी संभालना । भीष्मके आधीन रहना ।
द्रोणसे कहा जी ! देखना । आप यह सकल ॥ २३ ॥
एककी रक्षा करना । मैं ही हूं ऐसा मानना ।
यही सच्चा है अपना । दल भार सारा ॥ २४ ॥
तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥
राजाकी इस बातसे । भीष्मने भी संतोषसे ।
किया जो महावेगसे । सिंहनाद ॥ २५ ॥
गूंजा जो वह अद्भुत । दोनो सेनामें आद्यंत ।
प्रतिध्वनि है ध्वनित । चहूं दिशामें ॥ २६ ॥
उस प्रतिध्वनिके साथ । वीरवृत्तिसे हो ज्वलंत ।
भीष्मदेवने भी घोषित । किया दिव्य शंख ॥ २७ ॥
दोनो ही नाद मिले घोर । मानो हुए त्रिलोक बधिर ।
जैसा पड़ा हो टूट कर । आकाश सर्व ॥ २८ ॥
कंपित हुआ अंबर । उछल उठा सागर ।
प्रक्षुभित चराचर । भयसे महा ॥ २९ ॥
महा घोषसे उठे गजर । जिससे भरे गिरिकंदर ।
हुई सेना सब रणातुर । स्फुरित हो महा ॥ ३० ॥
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥
बढाने उनका हर्ष करके सिंह-गर्जन ।
प्रतापी वृद्ध दादाने बजाया शंख जोरसे ॥ १२ ॥
तब है शंख भेर्यादि रणवाद्य विचित्र जो ।
बजे जब सभी साथ हुवा शब्द भयंकर ॥ १३ ॥
१३ अर्जुनविषादयोग
रणवाद्य बजे जो एकत्र। भय फैलाते हुये सर्वत्र ।
आया हो जैसे प्रलय सत्र। इसी क्षणमें ॥ ३१ ॥
बज उठे बड़े ढोल । शंख झांज जो शिथिल ।
भयंकर कोलाहल । सुभटोंका ॥ ३२ ॥
ताल ठोकते आवेशसे । गोहारते त्वेश द्वेषसे ।
हाथी घोडे हैं उन्मादसे । अनावर ॥ ३३ ॥
कायरोंकी वहां क्या बात । कांच दिल गये उडत ।
कांप उठा स्वयं कृतांत । खडा न रहा ॥ ३४ ॥
कितनोंके बैठे हृदय । कितनोंका प्राण ही जाय ।
वीरोंकी कांपती है काया । उस नादसे ॥ ३५॥
ऐसा भयंकर रण गर्जन । सुन अकुलाया चतुरानन ।
प्रलय आ गया क्या इसी क्षण । बोले देव ॥ ३६ ॥
यह बात हुयी स्वर्गमें । आक्रोश देखके रणमें ।
यहां है पांडव दलमें । हुआ क्या ? ॥ ३७ ॥
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥
रथ था जो विजय-गर्भका । या भांडार था महातेजका ।
और था चार श्वेत अश्वोंका । गरुड समान ॥ ३८ ॥
आया जैसा मेरु पंखोंका । वैसा आया रथ जो बांका ।
छितराते दिव्य शोभाका । प्रकाश सर्वत्र ॥ ३९ ॥
अश्व चालक स्वयं भगवान । वैकुंठका जो स्वामी महान ।
उस रथका है गुणवर्णन । करना ही क्या ॥ १४० ॥
ध्वज स्तंभ पर वानर । जो है मूर्त्तिमान शंकर ।
सारथी स्वयं शार्गधर । अर्जुनका ॥ ४१ ॥
यहां धवल घोडोंके महान रथमें बसे ।
कृष्ण अर्जुनने फूंके अपने दिव्य शंख भी ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी १४
देखो नवल उस प्रभुका । अद्भुत प्रेम है जो भक्तोंका ।
सारथ्य करता है पार्थका । विश्वपति ॥ ४२ ॥
पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः ।
पौंड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥
पीछे किया है भक्तको । आगे किया अपनेको ।
फूंका है पांचजन्यको । लीलासे तब ॥ ४३ ॥
उसका घोष है भयंकर । गूंजत रहा जो चहूं ओर ।
जैसे निगलता दिनकर । उगते ही नक्षत्र ॥ ४४ ॥
इसमें डूब गया गर्जन । कौरव दल-रव महान ।
जिससे विश्व-कंपायमान । था क्षण पूर्व ॥ ४५ ॥
इसके क्षणकाल बाद । हुआ जो गहरा निनाद ।
देवदत्तका गूंजा नाद । अर्जुनके ॥४६ ॥
दोनो शब्द प्रचंड । गूंजे जब अखंड ।
मानो टूटा ब्रह्मांड । शतधा होके ॥ ४७ ॥
उबल उठा तब वृकोदर । जैसे खौला हुआ महासागर ।
किया शंखनाद जो भयंकर । पौंड्रू नामके ॥ ४८ ॥
अनंतविजयं राजा कुन्ती पुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोष मणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
गरजा महाप्रलय जलधर । गूंज उठा शब्द अतीव गंभीर ।
तब अनंत विजय युधिष्ठिर । बजाने लगे ॥ ४९ ॥
पांचजन्य हृषीकेश पार्थने देवदत्तको ।
बजाया भीमने पौंडू शंखको बलसे महा ॥ १५ ॥
फूंका अनंतविजय शंख भी धर्मराजने ।
वैसे ही माद्रि पुत्रोंने सुघोष मणिपुष्पक ॥ १६ ॥
१५ अर्जुनविषादयोग
तथा नकुलने सुघोष। सहदेव मणिपुष्पक।
जिससे हुआ है आतंक। चहूं ओर ॥ १५० ॥
काश्यश्च परमेष्वासः शिखंडी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान् दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥
वहां भूपति थे अनेक। द्रुपद द्रौपदेयादिक ।
और काशीपति देख । महाबाहू जो ॥ ५१ ॥
तथा अर्जुनका सुत। सात्यकि अपराजित ।
धृष्टद्युम्न नृपनाथ । औ' शिखंडी भी ॥ ५२ ॥
विराट आदि नृपबर। हैं जो सेनाके मुख्य वीर ।
अनेक शंख निरंतर। बजाये उन्होंने ॥ ५३ ॥
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥
जिसका हुआ महा गर्जन । विकळ शेष-कूर्म महान ।
धरणी भारसे हो बेभान। लगे खिसकने ॥ ५४ ॥
हुआ जो ब्रह्मांड डांवाडोल। मेरु मंदार हुये चंचल ।
उछल उठा सागर जल । कैलासपर ॥ ५५ ॥
उलटता क्या पृथ्वीतल। आकाश होगा डांवाडोल ।
टूटते हैं तारे सकल । ऐसा लगा ॥ ५६ ॥
काशीराज धनुर्धारी शिखंडी भी महारथी ।
विराट और सेनानी अपराजित सात्यकी ॥ १७ ॥
द्रुपद द्रौपदी पुत्र अजानु अभिमन्युने ।
फूंके हैं सबने शंख अपने भिन्न भिन्न जो ॥ १८ ॥
उस गर्जनसे टूटा कौरवोंका हृदय ही ।
भरके भूमि आकाश गरजा जो भयंकर ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी १६
यह सब सृष्टि गयी रे गयी। देवोंको निराधार स्थिति आयी ।
ऐसी बडी हीगड़बडी हुयी । सत्यलोकमें ॥ ५७ ॥
दिनमें ही रुका भास्कर । जैसे प्रलयका प्रकार ।
जिससे हुआ हाहाकार । त्रिभुवनमें ॥ ५८ ॥
तब हुआ आदि पुरुष विस्मित । कहता होता क्या अब विश्व-अंत ।
किया है लोप वह रव अद्भुत । स-संभ्रम ॥ ५९ ॥
इससे हुआ है विश्वका रक्षण । नहीं तो आया था प्रलयका क्षण ।
शांत हुआ शंख ध्वनि विलक्षण । कृष्णार्जुनका ॥ १६० ॥
यदि हुआ वह गर्जन शांत । फिर भी रहा गूंजत सतत ।
जिससे रण भूमिमें है हृत । हुआ कौरवदल ॥ ६१ ॥
जैसे गज समूहके अंदर । सिंह करता लीलासे संहार ।
वैसे टूटे हैं हृदय गव्हर । कौरव दलके ॥ ६२ ॥
जब वे यह गूंजन सुनते । उनके हृदय सब कांपते ।
वे सब परस्पर हैं कहते । सावधरे सावध ॥ ६३ ॥
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ॥ २० ॥
सेनाके पराक्रमी वीर । महारथी औ' महाशूर ।
उन्होंने दिया पुनः धीर । अपनी सेनाको ॥ ६४ ॥
क्षोभसे हुई हैं लड़नेमें सिद्ध । अत्युत्साहसे उछली हो सन्नध्द ।
सेनाका क्षोभ देख हुआ है विद्ध । लोकत्रय सब ॥ ६५ ॥
बाणोंका वर्षा धनुर्धर । करते हैं जो निरंतर ।
बरसते हैं जलधर । प्रलय कालके ॥ ६६ ॥
फिर सीधा खडा सारा कुरु सैन्य व्यवस्थित ।
चलते हैं अभी शस्त्र इतनेमें कपिध्वज ॥ २० ॥
१७ अर्जुनविषादयोग
(3)
उल्लसित अर्जुनका सेनाबलोकन-
देखकर वह अर्जुन । होकर उल्हसित मन ।
लगाये उत्सुक नयन । सेनापर ॥ ६७॥
संग्राममें सब सावधान । खडे सर्वत्र कौरव जन ।
लीलया लिये तीर कमान । पार्थने तब ॥ ६८ ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापयमेऽच्युत ॥ २१ ॥
पार्थने की कृष्णसे प्रार्थना। प्रभु मेरे रथको हांकना ।
बीचमें वह खड़ा करना। दोनों दलके ॥ ६९ ॥
यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्
कैर्मयासह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्रसमागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥
तब मैं क्षण एक। सब वीर सैनिक ।
देखूंगा ये अशेष। जो हैं झुंजार ॥ ७० ॥
यहां सभी जो ये आये हैं। मुझे लडना किससे है।
मुझको यह देखना है। इसीलिये ॥७१॥
हाथमें धनुष्य लेके बोला कृष्णसे वाक्य ये ।
अर्जुनने कहा
दोनों सेना मध्य देव मेरा रथ खडा कर ॥ २१ ॥
देखूंगा मुझसे कौन करता युद्ध कामना ।
रण-संग्राममें आज किससे जूझना मुझे ॥ २२ ॥
जुझारू वीर जो सारे देख लेता यहां सभी ।
यहां उस कुबुद्धिके करना चाहते प्रिय ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी १८
यहां हैं सारे कौरव। आतुर जो दुःखभाव ।
मारते हैं हाथ पांव। पुरुषार्थ हीन ॥ ७२ ॥
करते हैं ये युध्द कामना। न जाने स्थिरतासे लड़ना।
सुनोजी संजयका कहना। अब राजासे ॥ ७३॥
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥
पार्थका कर शब्द श्रवण। रथको खडा किया तत्क्षण।
दोनों दलके बीच समान। श्रीकृष्णने तब ॥ ७४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥ २५ ॥
यहां भीष्म-द्रोणादिक। आत्मीय जन सम्मुख ।
अन्य नृपति अनेक। खडे हैं जो ॥ ७५॥
यहां स्थिर कर रथ। देखता रहा है पार्थ।
सेना समूह समस्त। उमंगसे ॥ ७६ ॥
कहता है देव ! देख देख। हैं ये कुलगुरु अशेष।
विस्मय हुआ क्षण एक। सुन श्रीकृष्ण ॥ ७७॥
कृष्ण बोले मनमें अपने। इसके मनका कौन जाने।
मनमें सोचा क्या है इसने। अचरज है ॥ ७८ ॥
उसने किया भावी अनुमान। हृदयस्थको है सबका ज्ञान।
किंतु रहा उस समय मौन। कुछ न बोल ॥ ७९॥
संजयनें कहा
यह अर्जुनका वाक्य सुन श्रीकृष्ण शीघ्र ही।
मध्यमें उन सैन्योंके लाया उत्तम जो रथ ॥ २४ ॥
फिर निहारके ठीक भीष्म द्रोणादि जो नृप।
कहता है जुटे पार्थ देखो कौरव तू सब ॥ २५ ॥
१९ अर्जुनविषादयोग
तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ॥ २६ ॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥
तब वहां पार्थ सकल। पित्र पितामह केवल।
गुरुबंधु सखा मातुल। देखने लगा ॥ ८० ॥
इष्ट मित्र आप्त। पुत्रादि समस्त।
आये हैं युद्धार्थ। सेनामें सब ॥ ८१ ॥
सुहृदजन श्वशुर। अन्य भी हैं सखा वीर।
पुत्र पौत्रादि कुमार। धनुर्धर जो ॥ ८२ ॥
जिन्होने उपकार किये थे। संकटमें जो काम आये थे।
श्रेष्ठ कनिष्ठ सभी जन थे। वहां सारे ॥ ८३ ॥
कुल सर्वस्व दोनो दलमें। आया था जो लडने रणमें।
देखा सब उस समयमें। पार्थने वहां ॥ ८४ ॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्
मनमें वहां गडबड हुयी। सहज भावसे करुणा आयी।
अपमानसे वीरवृत्ति गयी। उसको छोड़ ॥ ८५ ॥
होती है जो उत्तम कुलकी। मूर्ति मानो गुण लावण्यकी।
वह नहीं रहती अन्याकी। तेजस्वितासे ॥ ८६ ॥
अर्जुनकी करुणा-
नवीनाके चावसे है जैसे। कामासक्त हठता पत्नीसे।
चसका लगता है भ्रमसे। वैसेही ॥ ८७ ॥
तब अर्जुनने देखा खडे हैं सिद्ध हो कर।
दादा चाचा तथा मामा सगे संबंधि औ' सखा ॥ २६ ॥
गुरुबंधु पुत्र पौत्र खडे स्वजन हैं सभी ।
सबको देख कौंतेय रणमें जो स्वबांधव ॥ २७ ॥
२० ज्ञानेश्वरी
अथवा तपोबलसे ऋध्दि। पाकर भृंश होती है बुध्दि।
फिर उसे विरक्ति औ' सिध्दि। भूल जाती ॥ ८८ ॥
ऐसा हुआ वहां अर्जुनका। गया पुरुषत्व जो उसका।
दिया दान अन्तःकरणका। करुणाको ॥ ८९ ॥
थर्रानेसे जैसे मंत्रज्ञमें। भूत संचार होता तनमें।
वैसे अर्जुन महामोहमें। डूब गया ॥ १९० ॥
जिससे गया उसका धैर्य। द्रवने लगा उसका हिय।
द्रवता जैसा चांदनीमें काय। सोमकांतका ॥ ९१ ॥
वैसा ही है वह पार्थ। अतिस्नेहसे मोहित।
कहता सखेद बात। अच्युतसे ॥ ९२ ॥
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥
सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥
गांडीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥
कहता वह सुनो कृष्ण। यहां गोत्र वर्ण संपूर्ण।
करने आया है जो रण। देखता मैं ॥ ९३ ॥
अत्यंत करुणाग्रस्त शोकसे बोलने लगा।
अर्जुनने कहा
कृष्ण स्वजन हैं सारे रणमें देख उत्सुक ॥ २८ ॥
होते शिथिल हैं गात्र वैसे ही मुख सूखता।
शरीर कांपता सारा रोम रोम हुये खडे ॥ २९ ॥
छोड़ता हाथ गांडीव जलती है सभी त्वचा।
असह्य है खड़ा होना मन ही भ्रमता सब ॥ ३० ॥
२१ अर्जुनविषादयोग
रणमें ये अति उद्यत । लड़ने आये हैं समस्त ।
किन्तु हमें यह उचित । होगा क्या ॥ ९४ ॥
इस लड़ाईके विचारसे । कसमसाता तन मनसे ।
अस्थिर हूं मन औ' बुद्धिसे । इस क्षणमें ॥ ९५ ॥
देखो कांपता है तन । शुष्क हुवा है वदन ।
शिथिल सारे करण । हुये मेरे ॥ ९६ ॥
मन मेरा अति व्यग्र । खडे हैं सारे रोमाग्र ।
गळ गांडीव समग्र । हाथ हैं लूले ॥ ९७ ॥
न पकडते वह खिसका । न जानते छूटा है हाथका ।
हृदय हुवा महा-मोहका । घर ही मानो ॥ ९८ ॥
वज्रसे वह कठिन । दुर्धर अति दारुण ।
उससे असाधारण । यह स्नेह ॥ ९९ ॥
जीता जिसने रणमें शिवको । मिटाया है निवात कवचको ।
स्नेहने लपेटा उसी पार्थको । क्षणभरमें यहां ॥ २०० ॥
भेदता रहता भ्रमर जैसे । अति कठिन काष्ठ भी लीलासे ।
फंसता कमल-कलिमें जैसे । अति कोमल ॥ १ ॥
वहां प्राण भी निकल जायेगा । किन्तु न कमल चीरा जायेगा ।
कोमलपन ही कठिन होगा । स्नेहका ऐसा ॥ २ ॥
यह है आदि पुरुषकी माया । ब्रह्मा भी इसे समझ न पाया ।
तभी झुलाया अर्जुनको राया । कहता है संजय ॥ ३ ॥
सुनो फिर वह अर्जुन । देख कर सारे स्वजन ।
भूल गया है अभिमान । युद्धका जो ॥ ४ ॥
न जाने कैसी करुणा । स्पर्शी है अन्तःकरणा ।
तब कहे वह कृष्ण । चलो यहांसे ॥ ५ ॥
मन मेरा अति व्याकुल । कांपता है तन सकल ।
वाचा होती है अनर्गल । इससे मेरी ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी २२
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥
युद्ध परांग्मुखता
वध्य हैं यदि कौरवादिक । क्यों न बंधु युधिष्ठिरादिक ।
सभी हैं एकसे सगोत्रिक । एकत्र यहां ॥ ७ ॥
ल्गाता तभी मिटा दो रण । नहीं करता है मेरा मन ।
यह है सब मूल कारण । महापापका ॥ ८ ॥
देव ! कैसे ही देखने पर । लड़ना है बुराईका घर ।
न लड़ें यदि हम आखिर । भला है सबका ॥ ९ ॥
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥
न चाहूंगा विजय वृत्ति । न चाहूंगा राज्य औ' कीर्ति ।
उससे क्या मिलेगी शांति । कह तू यह ॥ २१० ॥
येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥
मार कर इन सबको । भोगना है जिन भोगोंको ।
जलने दे उन सबको । कहता अर्जुन ॥ ११ ॥
आने दो कैसी ही स्थिति । सहेंगे विषम विपत्ति ।
बुझें न क्यों जीवन-ज्योति । उस पर भी ॥ १२ ॥
कृष्ण मैं देखता सारे सभी अशुभ लक्षण ।
कोयी न दीखता श्रेय यहां स्वजन घातसे ॥ ३१ ॥
न चाहूं जय औ' राज्य वैसे ही सुख भोग भी ।
राज्यमें या भोगमें क्या है जीनेमें भी धरा यहां ॥ ३२ ॥
जिनके हित है सारा राज्य भोग सुखादि जो ।
वेही युद्धार्थ हैं सिद्ध धन प्राणादि त्याग के ॥ ३३ ॥
२३ अर्जुनविषादयोग
अपनोंका घात करना। फिर राज्य-सुख भोगना।
मेरा यह सोच सकना। स्वप्नमें भी असंभव ॥ १३ ॥
गुरु जनोंका अहित करना। तो किसके लिये है जनमना।
तथा किसके लिये कह जीना। शत्रुबुद्धिसे ॥ १४ ॥
पुत्रको चाहता है कुल। उसका क्या यही है फल।
गोत्र-जन वध केवल। करना है क्या ॥ १५ ॥
वज्र सम है यह कठोर। कैसा करे इसका उच्चार।
हमें करना मंगल कर। यथा संभव ॥ १६ ॥
हमको है जो जो करना। इन्ही सबको है भोगना।
प्राण निछावर करना। इनके हित ॥ १७ ॥
बनकर विश्वके भूपाल। जीत करके विश्व सकल।
रखना है अपना ही कुल। संतुष्ट सदा ॥ १८ ॥
वही है यहां समस्त। कैसा कर्म विपरीत।
हुए वे सब उद्यत। युध्द करने ॥ १९ ॥
त्यज कर ये परिवार। वैसे ही गृह औ' भांडार।
शस्त्रांपे रख तैयार। हुए हैं प्राण ॥ २० ॥
ऐसोंको मैं कैसे मारूं। किन पर शस्त्र धरूं।
अपने हियका करूं। घात कैसा ॥ २१ ॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥
तू न जानता क्या ये हैं कौन। सम्मुख खडे हैं भीष्म द्रोण।
इनके उपकार महान। हैं हमपर ॥ २२ ॥
वैसे साले श्वशुर मातुल। तथा अन्य बंधु हैं सकल।
पुत्र पौत्र हैं अति केवल। आप्त जन सारे ॥ २३ ॥
दादा बाबा पुत्र पौत्र अपने दीखते यहां।
गुरु औ' ससुरा साला सगे स्वजन हैं सभी ॥ २३४ ॥
ज्ञानेश्वरी २४
सुनो हैं ये अतीव निकट के । आप्त जन सब परिवारके ।
इन्हें कटु बोलें तभी पापके । भागी हैं हम ॥ २४ ॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥
चाहे सो इन्हें करने दो । हमको अभी मारने दो ।
किंतु मनमें न लाने दो । इनका अहित ॥ २५ ॥
मिले यदि विश्व साम्राज्य । तब भी हमें यह वर्ज्य ।
कार्य अनुचित जो त्याज्य । नहीं करूंगा ॥ २६ ॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाऽऽश्रयेदस्मान् हत्वैतानातातयिनः ॥ ३६ ॥
यदि आज हम ऐसा करेंगे । कौन हमारा आदर करेंगे ।
तेरा दर्शन भी कैसा करेंगे । कह श्रीकृष्ण ॥ २७ ॥
वध करनेसे गोत्र जनोंका । घर बनके महा-पापका ।
खोऊंगा मैं तुझको हाथका । जो है अपना ॥ २८ ॥
कुल नाशके पापसे । पूर्णता डूब जानेसे ।
देखूंगा मैं तुझे कैसे । इस भांति ॥ २९ ॥
जैसे उद्यानमें अनल । लगा देख अति प्रबल ।
क्षण भी न रहे कोयल । स्थिर वैसे ॥ २३० ॥
स-कर्दम सरोवर । देख करके चकोर ।
करे उसका अव्हेर । वैसा ही तू ॥ ३१ ॥
अजी ओ मेरे देवराय ! । मिटनेसे पुण्य-संचय ।
छोड़कर होग अदृश्य । हमसे तब ॥ ३२ ॥
इन्हें न मारना चाहूँ यदि ये मारते मुझे ।
विश्व-साम्राज्य छोड़ूंगा पृथ्वीकी बात क्या भला ॥ ३५ ॥
घातसे कौरवोंका है क्या होगा अपना हित ।
भले ये आततायी हैं इनका घात पाप है ॥ ३६ ॥
२५ अर्जुनविषादयोग
(4)
तस्मान् नार्हा वयं हंतुं धार्तराष्ट्रान् स्वबांधवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनःस्याम माधव ॥ ३७॥
इसीसे म यह नहीं करूंगा । रणमें शस्त्र नहीं उठाऊंगा ।
क्यों कि मुझे यह युध्द प्रसंग । दीखता निंद्य ॥ ३३ ॥
तुझसे ही जब वियोग होगा । भला तब हमारा क्या रहेगा ।
उस दुखसे हृदय फटेगा । तेरे बिन श्रीकृष्ण ॥ ३४ ॥
तब कौरव वध होगा । हमें राज्य-भोग मिलेगा ।
यह सारा अशक्य होगा । कहता है पार्थ ॥ ३५ ॥
यद्यप्येते न पश्यंति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापद्स्मान् निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥
अभिमान मदसे भूलकर । यदि आये ये रणभूमिपर ।
केसा होगा यहां मंगलकर । यह देखना होगा ॥ ३६ ॥
ऐसा कैसा यह करना । अपनोंको आप मारना ।
जानबूझकर है लेना । विष कालकूट ॥ ३७ ॥
अजी कभी राह चलते । यदि कहींसे सिंह आते ।
उसको टालकर जाते । इसीमें भला है ॥ ३८ ॥
तथैव घात बंधूका हमें योग्य नहीं कभी ।
घातसे स्वजनोंके क्या जीयेंगे सुखसे हम ॥ ३७ ॥
लोभसे नष्ट है बुद्धि जिससे ये न जानते ।
कुलके क्षयका पाप तथा क्या मित्र-द्रोहका ॥ ३८ ॥
पापसे बचना ऐसे न सोचें क्या भला हम ।
कुलक्षय महा-दोष दीखता स्पष्ट ही यहां ॥ ३९ ॥
ज्ञानेश्वरी २६
प्राप्त प्रकाशको छोड़ना । अंधकूपमें फिर जाना ।
उससे है क्या लाभ होना । कहो देव ॥ ३९ ॥
आगको सम्मुख देख कर । गये न उसको लाघकर ।
क्षणमें वह लपटेकर । जला देगा ॥ ४० ॥
वैसे दोष असाधारण । घेरते हैं हमको पूर्ण ।
जानकर भी आचरण । करना कैसे ॥ ४१ ॥
पूछ कर इतना बोले पार्थ । सुनो देव इसका मतितार्थ ।
कहूंगा इस पापका अनर्थ । अब तुझसे ही ॥ ४२ ॥
कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
जेसे लकडीका घर्षण । उपजाता अग्नि महान ।
उससे जल जाता इंधन । प्रज्वल होके ॥ ४३ ॥
कुलमें वैसे परस्पर । वध किया तो स-मत्सर ।
उससे महादोष घोर । कुलघातका होगा ॥ ४४ ॥
अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषुदुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥
इससे है ऐसा पाप । करें कुल-धर्म लोप ।
बढ़ता अधर्म व्याप । कुलमें ही ॥ ४५ ॥
इससे सारासार विचार । किसके कैसे क्या है आचार ।
मिट जाते हैं मूल आधार । विधि-निषेधके ॥ ४६ ॥
कुलके क्षयसे नाश कुल-धर्म सनातन ।
अधर्म फैलता सारा कुलके धर्म-नाशसे ॥ ४० ॥
अधर्म फैल जानेसे भ्रष्ट होती कुल-स्त्रियां ।
स्त्रियोंके भ्रष्ट होनेसे होता है वर्ण-संकर ॥ ४१ ॥
२७ अर्जुनविषादयोग
बुझाकर हाथका दीप । तममें चलनेसे आप ।
टकराये अपने आप । स्वाभाविक ॥ ४७ ॥
वैसा कुलक्षय जब होता । कुलमें आद्य-धर्म मिटता ।
कहो तब वहां क्या होता । पापके बिन ॥ ४८ ॥
छूटते हैं तब यम औ' नियम । टूटता मन-इंद्रियोंका संयम ।
घडता है व्यभिचारका कुकर्म । कुलस्त्रियोंसे ॥ ४९ ॥
उत्तममें अधमका संस्कार होता । इस भांति वर्ण अवर्णमें घुलता ।
तब है मूल सहित उखड जाता । संस्कृति धर्म ॥ ५० ॥
जैसे चौराहेके बलि पर । उडते हैं काग चहूं ओर ।
वैसे हैं दोष घुसते घोर । सत्कुलोंमें ॥ ५१ ॥
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतंति पितरो ह्येषां लुप्त पिंडोदक क्रियाः ॥ ४२ ॥
फिर उस पूर्ण कुलको । तथा उस कुलघातिको ।
नरक मिला दोनोंको । इसको जान ॥ ५२ ॥
वंश विस्तार ही समस्त । होता जाता है जो पतित ।
गिरते पूर्वज स्वर्गस्थ । इससे सभी ॥ ५३ ॥
लोप होते जहां नित्य-कर्म । फिर कैसे नैमित्तिक धर्म ।
कहां रहे तब श्राध्द कर्म । किसके लिये ॥ ५४ ॥
नखाग्रमें डसनेसे साप । शिखाग्रतक विषका व्याप ।
वैसे आब्रह्म डूबता आप । समूचा कुल ॥ ५५ ॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यंते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥
इससे नर्कमें जाता कुलघ्नों सह है कुल ।
पितरोंका अधःपात होता है श्राद्ध लोपसे ॥ ४२ ॥
दोषसे है कुलघ्नोंके होता है वर्ण-संकर ।
डूबते जातिके धर्म कुल धर्म सनातन ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी २८
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुमः ॥ ४४ ।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हंतुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥
सुन प्रभुजी वचन एक । यहां घडता महापातक ।
जिस संग दोषसे लौकिक । पाता है भ्रांति ॥ ५६ ॥
जैसे है अपने घरको । लगी आग सब गांवको ।
निगलती है सर्वस्वको । जला करके ॥ ५७ ॥
वैसे ही उस कुल संगतिसे । दूसरे जनके बरतनेसे ।
उनके ऐसे हीन संसर्गसे । फैलते हैं दोष ॥ ५८ ॥
ऐसे नाना दोषोंका सकल । भांडार होता है ऐसा कुल ।
कहता पार्थ उसे केवल । नरक भोग घोर ॥ ५९ ॥
उस स्थानमें हुआ पतन । न होता कल्पांतमें उत्थान ।
कुलक्षयका पाप महान । अर्जुन कहता ॥ ६० ॥
अजी सुनके यह कानसे । घिन नहीं की तूने चितसे ।
कठोर किया हिय वज्र-से । कृष्ण तूने ॥ ६१ ॥
अपेक्षा है क्यों राज्य औ' सुख । जिसके लिये वह क्षणिक ।
जानकर भी यह ये दोष । नहीं त्यजना क्या ? ॥ ६२ ॥
आये यहां अपने कुलके श्रेष्ठ । हमने देखा शत्रु दृष्टिसे भृष्ट ।
नहीं क्या यह महादोष अनिष्ट । किया हमने ॥ ६३ ॥
जिनके कुलके धर्म डूबते उनको नित ।
होता नरकमें वास सुनते हैं यही हम ॥ ४४ ॥
कैसा यह महापाप करने जा रहे हम ।
मारना स्वजनोंको भी राज्यके सुख लोभसे ॥ ४५ ॥
२९ अर्जुनविषादयोग
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥
इस पर भी क्या है जीना । उससे भला चुप होना ।
शस्त्र छोडकर सहना । इनके तीर ॥ ६५ ॥
इससे जो कुछ होगा । मरनेमें भला होगा ।
यह पाप नहीं होगा । कभी मुझसे ॥ ६६ ॥
ऐसा देखकर सकल । अर्जुनने अपना कुल ।
कहा तब राज्य केवल । है नरकवास ॥ ६७ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥ ४७ ॥
उस समयमें ऐसे । अर्जुन बोला कृष्णसे ।
संजय कहे राजासे । सुनियेजी ॥ ६८ ॥
अति उद्वेगसे ऐसे फिर । खिन्न मन गद्गद होकर ।
कूद कर आया पृथ्वी पर । रथसे वह ॥ ६९ ॥
राज कुंवर ऐसा पदच्युत । होकर के सर्वथा उपरत ।
या जैसे रवि हो राहुग्रस्त । हुआ हतप्रभ ॥ २७० ॥
अथवा महासिद्धिके भ्रममें । तापस उलझा मोहजालमें ।
तथा फंस कामना भंवरमें । हुआ है दीन ॥ ७१ ॥
इससे तजके शस्त्र रहना शांत होकर ।
मारेंगे फिर शस्त्रोंसे रणमें मुझे कौरव ॥ ४६ ॥
संजयने कहा
रणमें कहके ऐसा शोकाकुल धनंजय ।
डाल कर सभी शस्त्र रथमें बैठ ही गया ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३०
तैसा वह धनुर्धर । दुःखावेगसे जर्जर ।
रथको था जो सुंदर । दिया छोड ॥ ७२ ॥
तथा छोड तीर कमान । करते अश्रुपात नयन ।
राजन् सुनो यह कथन । बोला संजय ॥ ७३ ॥
दूसरे अध्यायकी प्रस्तावना —
इस पर वैकुंठ नाथ । देखके खेद-मूर्ती पार्थ ।
किस भांतिका परमार्थ । कहेगा भला ॥ ७४ ॥
सविस्तर करेगा वर्णन । सकौतुक कहेगा कथन ।
कहेगा ज्ञानदेव वचन । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥
गीता श्लोक ४७
ज्ञानेश्वरी ओवी २४७.
ॐ
२
सांख्य योग
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
अर्जुनकी मनोदशा
संजयने कहा राजासे । पार्थने साश्रु नयनसे ।
अति शोकाकुल होनेसे । किया रुदन ॥ १ ॥
स्वकुल देखकर समस्त । स्नेह उपजा अत्यद्भुत ।
उससे द्रवित हुवा चित्त । इस प्रकार ॥ २ ॥
जलमें घुलता जैसे नून । अथवा हिलता वातसे घन ।
ऐसे वह दृढ अन्तःकरण । हुवा द्रवित ॥ ३ ॥
मोहाधीन होनेसे वह ऐसा । दिखाया जैसा मुरझाया-सा ।
कीचमें फंसा हुआ-सा जैसा । राजहंस ॥ ४ ॥
इस भांति वह पांडुकुमार । महामोहमें हो अति जर्जर ।
खड़ा देख उसे श्रीशार्ंगधर । बोले ऐसा ॥ ५ ॥
संजयने कहा
ऐसा जो करुणाग्रस्त अधीर अश्रु-पूरित ।
करता था जभी शोक उससे कृष्णने कहा ॥ १ ॥