ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
भगवान उवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥
कृष्णका उपदेश—
कहे हरि सोचलो तुम अर्जुन । शोक करने योग्य क्या यह स्थान ।
तूं कौन है क्यों आया है यह जान । औ' करता क्या है ? ॥ ६ ॥
तुझे हुआ क्या है ? । क्या न्यून आया है ? ।
औ' करना क्या है ? । खेद क्यों ? ॥ ७ ॥
कभी न सोचना तू असंगत । न छोड़ना कभी धैर्य उदात्त ।
भागे तुझसे अ-यशकी बात । कोसों दूर ॥ ८ ॥
तू है शौर्य-वृत्तिका स्थान । क्षत्रियोंमें अति महान ।
तेरी कीर्ति-कथाका गान । त्रिभुवनमें ॥ ९ ॥
तूने जीता रणमें शिवको । मिटाया निवात कवचोंको ।
तथा हराया है गंधर्वोंको । पराक्रमसे ॥ १० ॥
देखनेसे यह तेरे सम्मुख । दीखते हैं बौने ये तीनों लोक ।
ऐसा है पौरुषका लौकिक । अर्जुन तेरे ॥ ११ ॥
ऐसा तू इस स्थान पर । वीर-वृत्तिको छोड़कर ।
दीन-सा अधोमुख होकर । रोता रहा है ॥ १२ ॥
कैसे विषम वेलामें सूझा पाप यह तुझे ।
न सोहता बड़ोंको जो देता दुष्कीर्ति दुर्गति ॥ २ ॥
न हो निर्वीर्य तू पार्थ तुझे न शोभता यह ।
अपनी दुबली वृत्ति छोडके उठ तू अब ॥ ३ ॥
(3) ३३ सांख्ययोग
सोचकर देख तू अर्जुन । किस करुणासे उदासीन ।
कहो अंधेरेमें कैसे भानु । ढका आज ॥ १३ ॥
डरता क्या मेघसे पवन । है क्या अमृतको भी मरण ।
निगलता आगको ईंधन । सोचले तू ॥ १४ ॥
या नमकसे क्या पानी पिघलेगा । अन्य स्पर्शसे कालकूट मरेगा ।
अथवा महाशेषको निगलेगा । मंडूक अल्प ॥ १५ ॥
सिंहसे भिडे क्या जंबूक । ऐसा हुवा क्या अलौकिक ।
दिखाया है सच कौतुक । तूने आज ॥ १६ ॥
इसलिये सुन अर्जुन । न होने दो चितको दीन ।
धैर्य दो मनको तत्क्षण । सावध होके ॥ १७ ॥
छोड़ दो यह अज्ञान । उठालो तीर कमान ।
रणमें किसका कौन । कारुण्य कैसे ॥ १८ ॥
तू है बड़ा जानकार । रणमें दया विचार ।
करना ऐसा अपार । उचित है क्या ॥ १९ ॥
इससे कीर्तिका नाश । परलोक अप भ्रंश ।
कहता जगन्निवास । अर्जुनसे ॥ २० ॥
इसीलिये शोक न कर । मनमें तू धीरज धर ।
तज दे तू पांडुकुमार । इस शोकको ॥ २१ ॥
तुझे नहीं यह उचित । इसमें अकीर्ति बहुत ।
अब भी तू अपना हित । सोचले ठीक ॥ २२ ॥
संग्राम समयमें ऐसे । करुणासे हित हो कैसे ।
आप्त हुये क्या ये अभीसे । कहो मुझे ॥ २३ ॥
पहलेसे क्या जानता नहीं । संग्राम है कुल-जनसे ही ।
करता है यह अ-कारण ही । शोक तू पार्थ ॥ २४ ॥
यह संघर्ष नहीं आजका । यह चला है जन्म कालका ।
आज ही क्यों ऐसा करुणाका । पुलक उठा ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४
अब ही क्या है हुआ ऐसा । आया यह तरस कैसा ।
अर्जुन यह विचित्र-सा । किया अनुचित ॥ २६ ॥
इस मोहसे ऐसा होगा । नाम जो था वह मिटेगा ।
परलोक साथ जायेगा । लौकिकके ॥ २७ ॥
शिथिलता ऐसी हृदयकी । कारण होगी जो अहितकी ।
जानो संग्राममें पतनकी । क्षत्रियोंके ॥ २८ ॥
ऐसा वह कृपावंत । सिखाता है जो सतत ।
सुन यह पांडुसुत । बोले ऐसा ॥ २९ ॥
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हा वरिसूदन ॥ ४ ॥
अर्जुनका प्रत्युत्तर—
देव सुनोजी इतना । कारण नहीं बोलना ।
अपनेमें ही सोचना । यह युद्ध है क्या ॥ ३० ॥
युद्ध नहीं यह अपराध । करना है कुलका उच्छेद ।
करना पडा यह प्रमाद । हमको यहां ॥ ३१ ॥
माता पिताका वंदन । देना उन्हे समाधान ।
छोड़ करना हनंन । उचित है क्या ॥ ३२ ॥
सन्त-वृंदका करे वंदन । हो सके तो करना पूजन ।
छोड़ सुनाना निंदा वचन । उचित है क्या ? ॥ ३३ ॥
हमारे कुल-गुरु ये ऐसे । वंदनीय हमें नियमसे ।
हमें पूज्य भीष्म द्रोण वैसे । सदा सर्वत्र ॥ ३४ ॥
जिनका वैर न करता है मन । स्वप्नमें भी यह असंभव जान ।
उनका करना प्रत्यक्ष हनन । कैसे देव ॥ ३५ ॥
रणमें मैं लडूं कैसे विरुद्ध भीष्म-द्रोणके
कैसे मारूं इन्हे बाण हमें ये पूजनीय हैं ॥४॥
३५ सांख्ययोग
अजी जलने दो ऐसा जीवन । सबका हुआ क्या अंतःकरण ।
वधमें क्या क्षात्रत्व- अभिमान । गुरुजनोंके ॥ ३६ ॥
पार्थका गुरु है यह द्रोण । दिया धनुर्विद्याका शिक्षण ।
है क्या उसकी यह दक्षिणा । वध करना ॥ ३७ ॥
जिसकी कृपासे मिला वर । उसीसे मनमें अभिचार ।
ऐसां बनुं क्या मैं भस्मासुर । कहता अर्जुन ॥ ३८ ॥
गुरुनहत्वा हि महानुभावान
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव
भुंजीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान ॥ ५ ॥
देख गंभीर होता सागर । वह भी है ऊपर ऊपर ।
न क्षोभता हृदय सागर । द्रोणका कभी ॥ ३९ ॥
अपार यह गगन । उसका भी होगा भान ।
अगाध अति गहन । है द्रोण हृदय ॥ ४० ॥
अमृत भी बिगडेगा । वज्र भी टूट जायेगा ।
किंतु दोष न आयेगा । इनके मनमें ॥ ४१ ॥
ममता होती है माताकी । ख्याति है इस बातकी ।
किंतु मूर्ति है ममताकी । द्रोणाचार्य ॥ ४२ ॥
ये हैं कारुण्यके आगर । सकल गुणोंके सागर ।
विद्या सिंधु हैं ये अपार । कहता पार्थ ॥ ४३ ॥
ऐसे हैं ये महान महत । हमसे हैं अति कृपावंत ।
अब कहो क्या करना घात । असंभव यह ॥ ४४ ॥
न मारके पूज्य आचार्य श्रेष्ठ
जीना भला है भिक्षान्नसे ही ।
हितेच्छुओंके वधसे ये भोग
किस भांति भोगें जो रक्त सिक्त ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६
ऐसोंको रणमें मारना । फिर राज्य सुख भोगना ।
इसका विचार करना । हे असंभव ॥ ४५ ॥
दूभर है राज्य भोग भोगना । इंद्रपद भी ग्रहण करना ।
इससे अधिक भला है जीना । भिक्षान्नसे ही ॥ ४६ ॥
न तो देश-त्याग कर जाना । गिरी-कंदरामें जा बसना ।
करमें शस्त्र नहीं धरना । इनके सम्मुख ॥ ४७ ॥
पैने शस्त्रोंसे मर्म-स्थान । करना इनका भेदन ।
फिर इनके खूनमें सान । पाना भोगैश्वर्य ॥ ४८ ॥
रक्त-सिक्त वे ऐसे । भोग भोगना कैसे ।
न जंचे मुझे ऐसे । वचन तेरे ॥ ४९ ॥
दीन अर्जुनकी अनन्य शरणता—
उस समयमें अर्जुन । कहता है कृष्ण तू सुन ।
किंतु वह न देता कान । सुन करके भी ॥ ५० ॥
यह जानकर चौंका अर्जुन । फिरसे बोला अपना वचन ।
देता नहीं तू देव अवधान । मेरी बात पर ॥ ५१ ॥
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
जो विचार मेरे मनमें । बोला मैं वह इस स्थानमें ।
अब है भला जो करनेमें । जाने वह तू ही ॥ ५२ ॥
होगी हमारी जय या उन्हींकी
किसमें भलायी यही न जानूं ।
हत्यासे जिनके जीना न चाहूं
वही खडे हैं युद्धार्थ डटके ॥ ६ ॥
३७ सांख्ययोग
किंतु जिनसे बैर करना । मृत्यु सम है यह कल्पना ।
लेकर खडे युद्ध-भावना । वे इस रणमें ॥ ५३ ॥
अब क्या ऐसोंका वध करना । अथवा इन्हे छोड़कर जाना ।
इन दोनोंमें हमें क्या करना । यह हम न जानते ॥ ५४ ॥
कार्पण्य दोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
कौन बात करना यहां उचित । वह विचारही नहीं स्फुरित ।
इस मोहसे ग्रस्त है मम चित्त । अकुलाहटसे ॥ ५५ ॥
आंखों पर जब धुंद पडता । दृष्टिका तेज तब भ्रंश होता ।
पासका भी कछु नहीं दीखता । वस्तुमात्र ॥ ५६ ॥
मेरा ऐसा ही हुआ है । भ्रांतिने मन लीला है ।
निज-हित किसमें है । वही न दीखता ॥ ५७ ॥
देव ! विचार कर देखना । जिसमें हित है वह कहना ।
तू है प्रिय सखा ही अपना । तथा सर्वस्व ॥ ५८ ॥
जैसे तू गुरु बंधु पिता । तू हमारा इष्ट देवता ।
तू ही है रक्षण करता । सदा सर्वत्र ॥ ५९ ॥
कभी शिष्यका अनादर । न होता है गुरुके घर ।
जैसे सरिताको सागर । त्यजे कैसे ॥ ६० ॥
अथवा आपत्यको माता । छोड़ती कर निष्ठुरता ।
किसके बल वह जीता । कह तू कृष्ण ॥ ६१ ॥
दीनातासे नष्ट हुयी स्व-वृत्ति
घिरा मोहसे है स्वधर्म-ज्ञान ।
कैसे मेरा श्रेय होगा कहोजी
पगमें झुका हूं ले शिष्यभाव ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८
सर्वोपरि तू हैं ईश वैसे । हमारा जीवनाधार जैसे ।
असहमत मेरी बातसे । अब जो कही थी ॥ ६२ ॥
तो करना क्या उचित । यहां है धर्म-सम्मत ।
कहो मुझे तू त्वरित । पुरुषोत्तम ॥ ६३ ॥
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात्
यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥
हरि-कृपाका वर्णन—
देखकर यह कुल सकल । हृदय हुआ है शोक विव्हल ।
सुनकरके वह तेरे बोल । होगा शांत ॥ ६४ ॥
मिलेगा यह पृथ्वीतल । या महेंद्र पद सकल ।
मन है जो मोह विव्हल । शांत न होगा ॥ ६५ ॥
भूना हुआ बीज जैसे । अच्छे खेतमें बोनेसे ।
औ' खाद पानी देनेसे । नहीं अंकुरता ॥ ६६ ॥
यदि आयुष्य भरा हो किसीका । उपयोग न होता औषधका ।
वहां उपाय परमामृतका । एकमात्र ॥ ६७ ॥
वैसे राज्य-भोग समृद्धि । न दें संजीवन जीवबुद्धि ।
अनुग्रह ही है कृपानिधि । तव कारुण्यका ॥ ६८ ॥
ऐसा बोला है अर्जुन । जो था मोह-मुक्त क्षण ।
मोह-उर्मिसे तत्क्षण । हुआ व्याप्त ॥ ६९ ॥
यहां मिलेगा बिना शत्रु राज्य
वैसे ही इंद्रासन स्वर्गमें भी ।
तोभी न होगा यह शोक शांत
मेरे सभी इंद्रिय सोखता जो ॥ ८ ॥
३९ सांख्ययोग
मुझे लगता यह नहीं मो-लहर । यह है असंगत कोई अन्य प्रकार ।
इसपर पड़ा काल-सर्पका असर । महामोहकें ॥ ७० ॥
मर्म-स्थान जो हृदय कमल । उसपे कारुण्यका सम काल ।
दंश किया है महा-मोह व्याल । चढ़ता विष लहर ॥ ७१ ॥
इसके प्रभावको जानकर । जिसकी कृपादृष्टि ही उतार ।
दौड़ा है श्रीहरी करुणाकर । सपेरा बनके ॥ ७२ ॥
व्याकुल वह पांडुकुमार । समीप उसके जादूगर ।
रक्षा करेगा वह सत्वर । कृपा-लीलासे ॥ ७३ ॥
इसीलिये वह पार्थ । जो है मोहफणिग्रस्त ।
जानकर यह बात । कही मैंने ॥ ७४ ॥
वहां खड़ाथा धनुर्धर । मोहसे व्याकुल होकर ।
जैसे बादलोंमें भास्कर । निस्तेज होता ॥ ७५ ॥
वैसा खड़ा वह पांडुकुमार । दुःखावेगसे होकर जर्जर ।
जैसे ग्रीष्मकालमें गिरिवर । होता दावानल ग्रस्त ॥ ७६ ॥
इसलिये सहज सुनील । कृपामृतसे जो है सजल ।
अनुकूल हुआ श्रीगोपाल । महामेघ हो ॥ ७७ ॥
द्युति है वहां सुदर्शनकी । झलक वही विद्युल्लताकी ।
सजी हुई गंभीर वाणीकी । गर्जना-सी ॥ ७८ ॥
अब होगी वह वर्षा उदार । शांत होगा अर्जुन गिरिवर ।
फूटेगा ज्ञानका नव अंकुर । उसी स्थानपे ॥ ७९ ॥
सुनो यह कथा गहन । जिससे शांत होता मन ।
ज्ञानदेवका है बचन । जो निवृत्तिदास ॥ ८० ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप ।
न योत्स्य इति गोविंदमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥
ऐसा अर्जुन जो वीर बोलके कृष्णसे यह
अंतमें मैं न जूझूंगा कहके शांत हो गया ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०
अहंता छंदन—
संजय ऐसा बोला । राजा ! अर्जुन बोला ।
पुनः हो शोकाकुल । यह बात ॥ ८१ ॥
धनंजय बोला श्रीकृष्णसे । अब न कहो कुछ मुझसे ।
न लडूंगा सर्वथा इनसे । निश्चित यह ॥ ८२ ॥
ऐसा कहकर अर्जुन । बैठा रहा हो मौन ।
देख कर यह श्रीकृष्ण । हुआ चकित ॥ ८३ ॥
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥ १० ॥
फिर कहता मन ही मन । क्या करता है यह अर्जुन ।
न जानता यह अनजान । क्या करना अब ॥ ८४ ॥
अब होगा कैसे इसको ज्ञान । कैसे आयेगा धीरजका भान ।
करता है श्रीकृष्ण अनुमान । मांत्रिकसा ॥ ८५ ॥
अथवा देख असाध्य-व्याधी । अमृत सम दिव्य औषधि ।
योजता है वैद्य निरवधि । निदान करके ॥ ८६ ॥
करता श्रीहरि विवेचन । दोनों सेनाओंके मध्यस्थान ।
जिससे होगा मुक्त अर्जुन । महामोहसे ॥ ८७ ॥
उस निश्चित हेतुसे । हरिने कहा क्रोधसे ।
माताके क्रोधमें जैसे । रहता स्नेह ॥ ८८ ॥
औषधके तीतापनके अंदर । होता है जैसे अमृतका असर ।
वह गुण रूपसे ही निरंतर । दीखता वैसे ॥ ८९ ॥
वैसे ऊपरसे कठोर । अंदर जो अति मधुर ।
ऐसे वाक्य शार्गधर । बोला पार्थसे ॥ ९० ॥
पार्थसे यों हृषीकेश हंसके कहने लगे ।
खडा जो शोकमें डूबा वहीं उभयं सैन्यमें ॥ १० ॥
(6) ४१ सांख्ययोग
भगवान उवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचंति पंडिताः ॥ ११ ॥
फिर अर्जुनसे कहता है। हमने अचरज देखा है।
आज तुमने यहां किया है। मेरे समक्ष ॥ ९१ ॥
बनता बड़ा जानकार । न छोड़ता मूर्ख विचार ।
औ' कहता नीति विचार । सिखाना चाहुं ॥ ९२ ॥
जन्मांधका पागलपन । करता है जैसा थैमान ।
वैसा तेरा श्यानापन । दौडता चहूँ ओर ॥ ९३ ॥
अपनी बात न जानता । तो भी कौरवोंकी सोचता ।
देखकर विस्मय होता । मुझे अतिशय ॥ ९४ ॥
मुझे कह तू जरा अर्जुन । तुझपे है स्थित त्रिभुवन ।
अनादि यह विश्व-निर्माण । असत्य क्या ? ॥ ९५ ॥
सर्व समर्थ है यहां एक । उससे निर्माण होते लोक ।
कहना जगतका तू देख । व्यर्थ है क्या ? ॥ ९६ ॥
औ' ऐसा हुआ है क्या सांप्रत । जन्म मृत्यु तुझसे निर्मित ।
नाश होंगे ये तेरे ही हाथ । तेरे करनेसे ॥ ९७ ॥
भ्रमसे तू अहंकृति मानता । यदि इनका घात न करता ।
तो यह सैन्य क्या अमर होता । चिरजीवि-सा ॥ ९८ ॥
अथवा तू है एक घातक । तथा अन्य सभी हैं मृतक ।
चित्तमें ऐसा ही भ्रम एक । नहीं आने दे ॥ ९९ ॥
अनादि सिद्ध है यह पूर्ण । होना जाना स्वभाव कारण ।
सोचनेका तुझे क्या कारण । है इसमें ॥ १०० ॥
श्री भगवानने कहा
करता तू वृथा शोक कहता ज्ञान भी फिर ।
ज्ञानी न करता शोक गतागत विचारका ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२
अज्ञानवश कुछ न जानता । जो सोचना वह नहीं सोचता ।
फिर भी बडी नीति है कहता । हमको ही ॥ १ ॥
होते हैं जो विवेकी । न सोचते दोनोंकी ।
आना जाना भ्रांतिकी । मानकर ॥२ ॥
न त्वेवाहं जातु नाऽऽसं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥
आत्म लक्ष्य—
कहता हूं बात एक । यहां हम तुम देख ।
तथा भूपति अनेक । सारे जन ॥ ३ ॥
नित्य ऐसे ही रहेंगे । या निश्चित क्षय होंगे ।
यह भ्रांति छोड देंगे । दोनों व्यर्थ ॥ ४ ॥
यह जन्म तथा नाश । दीखता है भ्रमवश ।
तत्वतः है अविनाश । वह वस्तु ॥ ५ ॥
जैसे पवन जल हिलाता । उससे हिलोर जो उठता ।
उसको कहें क्या जनमता । कह तू पार्थ ॥ ६ ॥
वायुका वही स्फुरण गया । हिलोर भी वहां बैठगया ।
तब कहें क्या है मर गया । सोचकर देख ॥ ७ ॥
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहांतरप्राप्तिः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
सुनो शरीर है एक । वयसे भेद अनेक ।
यह प्रत्यक्ष ही देख । प्रमाण तू ॥ ८ ॥
मैं तू तथैव ये राजे पहले थे सभी यहां ।
वैसे ही हम जो सारे होंगे भविष्यमें यहीं ॥ १२ ॥
देहीको देहमें आता बाल्य तारुण्य औ' जरा ।
वैसा ही है नया देह न डिगे धीर जो कभी ॥ १३ ॥
४३ सांख्ययोग
होता है प्रथम कौमार्य । बदलता उसे तारुण्य ।
उससे नहीं होता लय । शरीरका ॥ ९ ॥
इस चैतन्यके भी ऐसे । बदलते शरीर वैसे ।
जो यह जानता है उसे । न मोह न दुःख ॥ १० ॥
मात्रास्पर्शास्तु कौंतेय शीतोष्ण सुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥
न जाननेका है यह कारण । जो है इंद्रियोंका आधीनपन ।
यह खींचता है अंतःकरण । इससे है भ्रम ॥ ११ ॥
इंद्रियां विषय सेवन करतीं । जिससे हर्ष शोक हैं उपजातीं ।
तथा अंतरंगको रस है देतीं । संसर्गसे अपने ॥ १२ ॥
विषयोंमें नहीं रहती । सदैव एकसी ही स्थिति ।
कभी दुःखकी है दीखती । कभी सुखकी ॥ १३ ॥
देखो है यह शब्दकी व्याप्ति । कहते हैं निंदा तथा स्तुति ।
उपजाते हर्ष शोक अति । श्रवणद्वारसे ॥ १४ ॥
मृदु और कठिन । स्पर्शके हैं दो गुण ।
त्वचा दे संग कारण । हर्ष शोक ॥ १५ ॥
सुरूप और कुरूप । रूपके हैं ये स्वरूप ।
नेत्रोंसे देते अमाप । सुख औ' दुःख ॥ १६ ॥
सुगंध औ' दुर्गंध । ये हैं गंधके भेद ।
दें विषाद औ' मोद । घ्राणके संग ॥ १७ ॥
ऐसा ही द्विविध रस । उपजाता प्रीति त्रास ।
तभी यह अपभ्रंश । विषय संगका ॥ १८ ॥
होनेसे इंद्रियोंके आधीन । भोगना शीत तथा उष्ण ।
जो हैं सुख दुखके कारण । अपनेको ॥ १९ ॥
शीतोष्ण विषय-स्पर्श फेंकते सुख दुःखमें ।
यही तू झेल ले सारा आते जाते अनित्य ये ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४
विषयोंके बिना है नहीं । रम्य कछु मिलता नहीं ।
स्वभाव जैसा हुवा यही । इंद्रियोंका ॥ १२० ॥
ये विषय भी हैं कैसे । रोहिणीके जल जैसे ।
स्वप्नके गजराज से । आभास रूप ॥ २१ ॥
अनित्य इन्हे जानकर । इनका कर अनादर ।
कभी इनका नहीं कर । संग तू पार्थ ॥ २२ ॥
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥
विषय ये जिन्हे नहीं जकड़ते । उन्हे सुख दुःख दोनों नहीं होते ।
तथा गर्भवास संग नहीं होते । उनको कभी ॥ २३ ॥
वे हैं नित्य रूप पार्थ । जानो है तुम सर्वथा ।
जो कभी इंद्रियार्थ । हुये नहीं ॥ २४ ॥
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥
सन्तोंको ही आत्मदर्शनकी शक्यता—
पार्थ अब कुछ एक । कहूंगा सुन तू नेक ।
जिससे तू परलोक । जानेगा सब ॥ २५ ॥
इस उपाधिमें गुप्त । चैतन्य है सर्वगत ।
वह तत्वज्ञ जो संत । स्वीकारते हैं ॥ २६ ॥
सलीलमें पय जैसे । एक हो रहे हैं वैसे ।
किंतु राज-हंस उसे । जाने भिन्न ॥ २७ ॥
इनकी न चले बात सम जो सुख दुःखमें ।
ऐसा ही धीर होता है मोक्ष लाभार्थ योग्य जो ॥ १५ ॥
असत्यको न अस्तित्व सत्यका नाश भी नहीं ।
जानते यह तत्वज्ञ दोनोंको इस भांतिसे ॥ १६ ॥
४५ सांख्ययोग
अथवा है अग्नि मुखसे मल । जलाके करते स्वर्ण निर्मल ।
निकाल लेते उसीको केवल । बुद्धिमान ॥ २८ ॥
अथवा ज्ञान मथनीसे । दधि मथन करनेसे ।
दीखता नवनीत जैसे । अन्तमें जो ॥ २९ ॥
रहता भूसा नाज मिलकर । उसे देखनेसे फटककर ।
नाज रहता है स्व स्थानपर । भूसा उड़ जाता ॥ १३० ॥
सोचनेसे है छूट जाता । प्रपंच यह स्वभावता ।
रहता है तत्व तत्वता । ज्ञानियोंको ॥ ३१ ॥
जिससे अनित्यमें नहीं । आस्तिक्य बुद्धि होती कहीं ।
यह निष्कर्ष दोनोंमें ही । देखा है सदा ॥ ३२ ॥
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति ॥१७॥
अंतर्यामीका घात नहीं होता-
सरासर विचार कर । जान तू भ्रांति है असार ।
स्वभावसे ही जो है सार । नित्य जान ॥ ३३ ॥
लोकत्रयका है आकार । जिसका है यह विस्तार ।
वहां वर्ण नाम आकार । नहीं चिन्ह ॥ ३४ ॥
वह है सर्वदा सर्वगत । जन्म मरणके है अतीत ।
करनेसे भी उसका घात । कभी होता नहीं ॥ ॥ ३५ ॥
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥
जिससे है भरा सारा जान तू वह अक्षय ।
नहीं हो सकता नाश उस अव्यय तत्वका ॥ १७ ॥
विनाशी देह हैं सारे सदा ही उसमें कहा ।
नित्य निःसीम है आत्मा इससे जूझ तू यहां ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६
नष्ट होना शरीरका स्वभाव है-
तथा सारा शरीर जात । स्वभावसे है नाशवंत ।
इसलिये हो युद्धरत । ऊठ अर्जुन ॥ ३६ ॥
य एनं वेत्ति हंतारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हंति न हन्यते ॥ १९ ॥
परिवर्तन देहोंका है, बाहरी है -
धर तू देहका अभिमान । शरीरको ही सर्वस्व मान ।
मारता मैं मरते आप्त जन । कह रहा है ॥ ३७ ॥
अर्जुन ! तू यह नहीं जानता । यदि विचार करे तो तत्वता ।
तू नहीं हैं किसीका वधिता । न ये हैं बध्य ॥ ३८ ॥
न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥
जैसे स्वप्नका है दृश्य । स्वप्नमें ही है सत्य ।
जगकर देखें तो अदृश्य । वैसे ही ॥ ३९ ॥
कहे जो मारता आत्मा और जो मरता कहे ।
दोनों न जानते तत्व मार या मरता न जो ॥ १९ ॥
न जन्म पाता न कदापि मृत्यु
होता न पीछे न आगे न होगा ।
अजन्म जो नित्य सदा पुराण
देही न मरता नाशे भी देह ॥ २० ॥
जानता जो निर्विकार अनाशी नित्य अव्यय ।
कैसे वह मरता या मारता किसको कब ॥ २१ ॥
४७ सांख्ययोग.
जान तू ऐसी है यह माया । भ्रममें तू है व्यर्थ ही गया ।
शस्त्रसे वध किया तो छाया । न टूटता अंग ॥ १४० ॥
अथवा पूर्ण कुंभ उलट । दीखता बिंबाकार है टूटा ।
किंतु भानु-बिंब है अटूट । वैसे ही ॥ ४१ ॥
अथवा जैसे मठमें आकाश । मठकृतिसे बना मठाकाश ।
भंगनेसे मठके समावेश । महदाकाशमें ॥ ४२ ॥
लोप होनेसे वैसे शरीरका । नाश न होता कभी स्वरुपका ।
तभी आरोप न कर नाशका । भ्रांतिसे तू ॥ ४३ ॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्
अन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥
जैसे जीर्ण वस्त्रको त्यजते । फिर नवीनको हैं ओढते ।
वैसे देहान्तर स्वीकारते । चैतन्यके ॥ ४४ ॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥
उतारके जर्जर जीर्ण वस्त्र
मनुष्य लेता दुसरे नवीन ।
तथैव तजके शरीर जीर्ण
आत्मा भी लेता दुसरे नवीन ॥ २२ ॥
इसे न चुभते शस्त्र इसे अग्नि न बालता ।
न गलाता इसे पानी इसे वायू न सोखता ॥ २३ ॥
छिदता जलता ना जो गलता सूखता नहीं ।
स्थिर निश्चल है नित्य सर्व-व्यापी सनातन ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥
है यह अनादि नित्य सिद्ध । निरुपाधि तथा विशुद्ध ।
इससे शस्त्रादिकोंसे छिद्र । न होता यह ॥ ४५ ॥
प्रलयोदकसे यह न भीगता । अग्निदाह यहां न संभवता !
महाशोषका प्रभाव न होता । मारुतके ॥ ४६ ॥
अर्जुन यह है नित्य । अचल तथा शाश्वत ।
सर्वत्र यह सदोदित । परिपूर्ण होता है ॥ ४७ ॥
अजी ! दृष्टिसे तर्ककी । भेंट न होती इसकी ।
ध्यानको इसकी भेंटकी । उत्कंठा है ॥ ४८ ॥
मनसे न होता प्राप्त । साधनासे अप्राप्त ।
निःसीम यह पार्थ । पुरुषोत्तम ॥ ४९ ॥
है गुणत्रय रहित । व्यक्तिकेलिये अतीत ।
अनादि औ' अविकृत । स्वरुप इसका ॥ ५० ॥
अर्जुन इसको ऐसे जानना । सकलात्मक रूप ही देखना ।
इससे सहज ही शोक पूर्ण । मिटेगा तेरा ॥ ५१ ॥
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥
यदि तू ऐसा नहीं जानता । अन्तवन्त ही इसे मानता ।
तब भी कहो कैसी है चिन्ता । पांडुकुमार ॥ ५२ ॥
जो है आदि स्थिति अंत । है निरंतर औ' नित ।
प्रवाह है अनुस्यूत । गंगा जलका-सा ॥ ५३ ॥
अचिंत्य वह अव्यक्त निर्विकारी कहे सब ।
ऐसी है जानके आत्मा तेरा शोक अकारण ॥ २५ ॥
अथवा देखता तू है जन्म-मृत्यु प्रति-क्षण ।
तो भी तुझे न है कोयी शोकका योग्य कारण ॥ २६ ॥
४९ सांख्ययोग
(7)
आदि भी वह अखंड रहता । अन्तमें है सागरसे मिलता ।
मध्यमें वह बहता रहता । दीखता वैसे ॥ ५४ ॥
वैसे ही यहां ये तीन । चलते एक समान ।
असंभव है अर्जुन । रोकना इसको ॥ ५५ ॥
इसलिये इस बातका । कारण नहीं शोकका ।
स्वभाव ही है इसका । मूल रूपसे ॥ ५६ ॥
न तो भी सुन अर्जुन । जीव जन्म मरणाधीन ।
देख कर यह कारण । शोक है व्यर्थ ॥ ५७ ॥
इससे यहां कुछ नहीं । शोकका कारण भी कहीं ।
टलता यहां कभी नहीं । जन्म औ' मरण ॥ ५८ ॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥
अजी ! जन्मता जो सो नाशता । नाशता सो है पुनः दीखता ।
जैसे घटिका-यंत्र चलता । वैसे ही पार्थ ॥ ५९ ॥
या उदयास्त जैसे स्वभावसे । अखंडित होते जाते हैं वैसे ।
जन्म-मरण भी विश्वमें वैसे । हैं अनिवार्य ॥ १६० ॥
महाप्रलयके अवसर । होता त्रिभुवनका संहार ।
इसीलिये नहीं परिहार । आदि अन्तका ॥ ६१ ॥
जानकर तू यह मनमें । पडता क्यों व्यर्थ ही दुःखमें ।
जानकर बनता जनमें । पागलका--सा ॥ ६२ ॥
सब ढंगसे पार्थ । शोक है सब व्यर्थ ।
दुःखदायह सर्वथा । नहीं विषय ॥ ६३ ॥
तय है जन्मसे मृत्यु मृत्युसे जन्म निश्चित ।
अटल उसका जो है व्यर्थका शोक है यह ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥
हैं यहां ये भूत समस्त । जन्मके पहले अमूर्त ।
फिर किया व्यक्तित्त्व प्राप्त । जन्म लेके ॥ ६४ ॥
मिटाकर अपना आकार । नाशसे बनते निराकार ।
जाते हैं मूल-रूपमें और । यथा स्थिति ॥ ६५ ॥
मध्यमें जो प्रतिभासे । निद्रितका स्वप्न जैसे ।
वैसे आकार मायासे । है सत्यरूपका ॥ ६६ ॥
न तो वायुने छेड़ा नीर । बना जैसे तरंगाकार ।
परापेक्षासे अलंकार । दीखता सोनेमें ॥ ६७ ॥
वैसे सकल हैं यह मूर्त । जान ले तू मायाका है रीत ।
जैसे आकाशमें है बिंबित । बादल सारे ॥ ६८ ॥
नहीं यहां जो मूलता । उसके लिये है रोता ।
देख तू नित तत्वता । चैतन्यएक ॥ ६९ ॥
उसकेलिये होकर पार्थ । विषय तज करके संत ।
रहते हैं सदैव विरक्त । एकांतमें ॥ १७० ॥
दृष्टि रखकर जिस पर । ब्रह्मचर्यादि व्रतको कर ।
तपाचरते मुनीश्वर । अनन्य हो ॥ ७१ ॥
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्
आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥
अव्यक्त मूल भूतोंका मध्य है व्यक्त भासता ।
पुनः है अंत अव्यक्त इसमें शोक है कहां ॥ २८ ॥
आश्चर्य कोयी अवलोकता है
आश्चर्य कोयी कहता यही है ।
आश्चर्य है वर्णित अन्य बातें
सुने भी ना जान पाता इसे हैं ॥ २९ ॥
५१ सांख्ययोग
अन्तरमें एक निश्चल । देख करके जो केवल ।
भूल गये हैं जो सकल । संसार मात्र ॥ ७२ ॥
गुणगान करता । उपरत हो चित्त ।
सदैव तल्लीनता । रहते हैं वे ॥ ७३ ॥
शांत होते सुनकर । देहभान भूलकर ।
पाते तद्रूप होकर । अनुभाव ॥ ७४ ॥
जैसे नदी-नद बहकर । सागरमें नहीं मिलकर ।
परांग्मुख आते लौटकर । ऐसा नहीं होता ॥ ७५ ॥
वैसे है योगियोंकी मति । पाकरके आत्मानुभूति ।
पुनः देह-तादात्म्य वृत्ति । पाती । नहीं ॥ ७६ ॥
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वंशोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥
देहमें जो सर्वत्र बसता । उसका घात कभी न होता ।
देख वह विश्वात्मक सत्ता । चैतन्य एक ॥ ७७ ॥
स्वभाव ही है इसका । होता जाता है सबका ।
इसमें क्या है शोकका । यहां कारण ॥ ७८ ॥
न तो भी हे अर्जुन । न जाने क्यों बुद्धिमान ।
शोक करना है हीन । सब प्रकारसे ॥ ७९ ॥
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥
क्षात्र धर्म महता—
अबतक तू क्या सोचता । यह कैसी चिन्ता करता ।
स्वधर्म को ही है भूलता । जो है तारक ॥ १८० ॥
अमर नित्य जो आत्मा सबके देहमें बसा ।
इससे भूत-मात्रोंमें नकर शोक तू कभी ॥ ३० ॥
स्वधर्म देखके यों भी न योग्य डिगना तुझे ।
क्षत्रियोंको नहीं कोयी श्रेष्ठ है धर्म-युद्धसे ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५२