ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
वर्णनीय तू प्रेमके कारण । करता सभामें मेरा वर्णन ।
तब सगर्व अपना बखान । करता मैं अधिक ॥ ७० ॥
ऐसे हैं कितने ही अपराध । उनकी मर्यादा नहीं गोविंद ।
क्षमा कर लक्ष लक्ष प्रमाद । प्रसाद रूप तू ॥ ७१ ॥
किंतु ऐसे विनय करनेमें । योग्यता कहां है देव मुझमें ।
शिशु जैसे पिताके दुलारमें । बोलता वैसे ही ॥ ७२ ॥
पिता पुत्रके अपराध । कितने भी हों वे अगाध ।
सहता है पिता निर्द्वंद्व । वैसे सह ले तू ॥ ७३ ॥
सखाकी उद्धतता । सखा शांत सहता ।
वैसे ही हे अनंत । सहन कर तू ॥ ७४ ॥
प्रियमैं कभी सम्मान । न करता प्रिय जान ।
आप उठाये रूठन । क्षमा करोजी ॥ ७५ ॥
या होता जहां जी-लगे स्नेहीका मिलन । कहा जाता जीवन संकटमें कथन ।
ऐसा करनेमें वहां आत्म-निवेदन । न होता संकोच ॥ ७६ ॥
जिसने किया तन-मन अर्पण । प्रेमादर-युत पतिके चरण ।
मिलनसे होता सर्वस्व कथन । स्वाभाविक वैसे ॥ ७७ ॥
वैसे ही देव मैंने अब । कह डाला तुझसे सब ।
दूसरा हेतु रहा कब । अपना स्वामी ॥ ७८ ॥
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥
अपूर्व देखा अपरूप दृश्य
तो भी बना व्याकुल चित्त मेरा ।
मुझे बताओ प्रभु मूळ रूप
प्रसन्न हो तू जगका निवास ॥ ४५ ॥
३९१ विश्व-रूप-दर्शनयोग
फिर भी किया मैंने देवसे प्यार । मांग की विश्व-रूपकी जिद्द कर ।
पूर्ण की जो माय-बाप बन कर । स्नेहाथं देव ॥ ७९ ॥
गाछ जो सुर-तरुका । अंगनमें लगानेका ।
बाछा भी काम-धेनुका । दिया खेलने ॥ ५८० ॥
मेरा नक्षत्रोंका दांव लगाना । चंद्रको गेंद बनाके खेलना ।
ऐसी धुनको भी पूर्ण करना । माता बनकर ॥ ८१ ॥
अमृत-बिंदुके लिये करते यत्न । उसकी वर्षा चारमास रात दिन ।
जिससे हर बालका जो कणकण । चिंतामणि हुवा ॥ ८२ ॥
तूने ऐसा कृतार्थ किया । बहु अधिक स्नेह दिया ।
परम-ब्रह्मको दिखाया । जो नहीं सुनाथा ॥ ८३ ॥
कैसा होगा इसका प्रत्यक्ष दर्शन । न होता उपनिषदोंको आकलन ।
हृदयकी ऐसी जो गिरह महान । मुझसे खोली प्रभु ॥ ८४ ॥
देव ! कल्पके आदिसे । इस क्षण तक ऐसे ।
हुए मेरे कितनेसे । यहां जन्म ॥ ८५ ॥
किया मैंने इन जन्मोंका संपूर्ण । खोज खोज कर अवलोकन ।
विश्व-रूप-श्रवणका भी स्मरण । वहां नहीं मिला ॥ ८६ ॥
अजी ! बुद्धि-शक्ति या ज्ञान । न जाता जिसके अंगन ।
कल्पना भी अंतःकरण । कर न सकता ॥ ८७ ॥
तब इसका दर्शन होना । इसकी कैसी करें कल्पना ।
कभी न देखा या सुना । ऐसा हुवा कहीं ॥ ८८ ॥
ऐसा यह विश्व-रूप । दिखाया मुझे अनूप ।
जिससे स्वरूप-रूप । हुवा चित्त ॥ ८९ ॥
चतुर्भुज सौम्य रूप दर्शनकी कामना—
अब रही एक कामना । तुझसे सानंद बात करना ।
तथा सामिप्यको अनुभवना । आलिंगनसे ॥ ५९० ॥
इस रूपसे यह कैसे करना । तब किस मुखसे कहो बोलना ।
अनंतको कैसे अंकमें भरना । नहीं होता यह देव ॥ ९१ ॥
ज्ञानेश्वरी ३९२
तमी वायुके साथ दौडना । गगनको आलिंगन देना ।
अथवा जल-क्रीडा करना । महा-सागरमें ॥ ९२ ॥
ऐसे करनेमें देव । भय-ग्रस्त होता जीव ।
विश्व-रूप तू केशव । समेट लेना ॥ ९३ ॥
घूम फिर देखना चराचर । सुखसे रहनेमें होना घर ।
वैसे चतुर्भुज है मनोहर । निवास देव ॥ ९४ ॥
योगाभ्यासका अनुभव । शास्त्राध्ययनका भी देव ।
अंतिम सिद्धांत केशव । यही एक ॥ ९५ ॥
हमने यज्ञ किये सकल । उस फलका भी यही फल ।
दान-पुण्यका भी है केवल । यही कारण ॥ ९६ ॥
अन्य दान-पुण्यका कारण । तीर्थ-यात्रादि जो है साधन ।
इसका कारण है दर्शन । चतुर्भुजका सतत ॥ ९७ ॥
चतुर्भुज दर्शनका जो चाव । बनाता उतावला केशव ।
वह व्याकुलता वासुदेव । दूर कर सत्वर ॥ ९८ ॥
अजी ! अंतःकरणका ज्ञाता । सकल विश्वका रचयिता ।
पूजित देवोंसे भी पूजित । तू हो प्रसन्न ॥ ९९ ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम्
'इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्र बाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥
जैसे नीलोत्पल रंजन । रंगता जो सदा गगन ।
तेजका ओज देता रत्न । इंद्र-नीलको ॥ ६०० ॥
हो तू गदा चक्र किरीट-धारी
चाहूँ वही मै तव रूप देखूं ।
संवार कर तू अनंत बाहू
चतुर्भुजा रूप बन विश्व-मूर्ते ॥ ४६ ॥
(50) ३९३ विश्व-रूप-दर्शनयोग
या परिमळ आया मरगज । आनंदमें उमड आये भुज ।
गोदमें खेला सो मकरध्वज । हुवा सुंदर ॥ १ ॥
अजी ! मस्तकपर रखा मुकुट । मस्तक बना-मुकुटका मुकुट ।
अंगारमें हुवा सौंदर्य प्रकट । शरीरसे ही ॥ २ ॥
जैसे इंद्र-धनुषका जो वर्तुल । घेरता मेघको गगन-मंडल ।
वैसे देवके शरीरको शामल । माला वैजयंती ॥ ३ ॥
कैसी वह है उदार गदा । मोक्ष देती असुरोंको सदा ।
वैसे ही चक्र वह गोविंद । सोहता सौम्य तेजसे ॥ ४ ॥
वैसे ही रूप शाम-सुंदर । देखनेको शिशु है आतुर ।
इसीलिये प्रभु तू सत्वर । बन जा वैसे ॥ ५ ॥
विश्व-रूपका उत्सव देख । शिथिल हुई है मेरी आंख ।
अब हुई हैं अति उत्सुक । कृष्ण-मूर्तिके लिये ॥ ६ ॥
कृष्ण-रूप वह जो साकार । उसके बिना सूना संसार ।
विश्व-रूप भी जो है असार । मानती आंखें ॥ ७ ॥
भोग मोक्षमें हमें कभी कहीं । श्रीमूर्तिके बिना कुछ भी नहीं ।
इसीलिये अब साकार होई । समेटले यह रूप ॥ ८ ॥
भगवान उवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेंदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥
श्रीभगवानने कहा
प्रसन्न होके निज-योग द्वारा
तुझे दिखाया यह विश्वरूप ।
अनंत तेजोमय आद्य पूज्य
देखा किसीने तुझसे न पूर्व ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३९४
अर्जुनका गंवारापन—
सुन अर्जुनकी यह बात । विश्व-रूप हुवा जो विस्मित ।
कहता ऐसा अव्यवस्थित । देखा न कोई ॥ ९ ॥
कैसी वस्तु हुई यह प्राप्त । इस लाभसे न होता मुदित ।
कैसे भयसे करता बात । सनकी बनकर ॥ ६१० ॥
होते जब हम सहज प्रसन्न । निहाल कर देते हैं तन मन ।
किसे देना यह वैभव अर्जुन । ऐसा कभी हुवा क्या ॥ ११ ॥
अपना सर्वस्व बटोर । खडा किया यह सुन्दर ।
तेरे लिये हे धनुर्धर । विश्व-रूप ॥ १२ ॥
यही जो अपर अपार । स्वरूप मेरा परात्पर ।
यहींसे सब अवतार । कृष्णादिक ॥ १३ ॥
तेरे चाहके ही कारण । पगलाई है कृपा जान ।
औ' इस गोप्यका महान् । ध्वज उभारा ॥ १४ ॥
ज्ञान-तेजसे जो निखिल । यह विश्वात्मक केवल ।
अनंत रूप है अचल । सबका आद्य ॥ १५ ॥
तेरे बिना यह अर्जुन । किसीने न देखा सुना जान ।
नहीं इसके योग्य साधन । इसीलिये ॥ १६ ॥
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
बोलाइसे वेद न यज्ञ द्वारा
या दान देके ना उग्र तपसे ।
तेरे बिना दर्शन है किसीको
हुवा नहीं जो जगमें अशक्य ॥ ४८ ॥
३९५ विश्व-रूप-दर्शनयोग
इसकी खोजमें जो गये । वेद वे मौन बैठ गये ।
यज्ञ वैसे ही लौट आये । स्वर्गसे ही ॥ १७ ॥
साधकोंने देखा मात्र त्रास । इसीलिये सूखा योगाभ्यास ।
तथा स्वाध्यायमें न सौरस । रूप-दर्शनका ॥ १८ ॥
पूर्ण आचरित सत्कर्म । दौडे हो अतीव संभ्रम ।
करके अतिशय श्रम । पाया सत्यलोक ॥ १९ ॥
तपने देखा प्रभुत्व । छोडा अपना उग्रत्व ।
तप-साधनसे तत्व । रहा अपरांतर ॥ ६२० ॥
वह तूने यहां अनायाससे । देखा स्वाभाविक ही उल्हाससे ।
मनुष्य-लोकमें किसीको वैसे । असंभव जान ॥ २१ ॥
ध्यान-रूप संपत्तिके कारण । तू एकमेव है यहां अर्जुन ।
ऐसा नहीं परम-भाग्यवान । ब्रह्मदेव भी ॥ २२ ॥
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वम्
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
अर्जुनका अनाडीपन—
तभी यह विश्व-रूप महान । इसका तू भय नहीं मान ।
इससे कुछ भी श्रेष्ठ महान । अपने चित्तमें ॥ २३ ॥
अजी ! छलक रहा अमृत सागर । भाग्यसे पहुंचा कोई उसके तीर ।
तब मरनेके भयसे तजकर । भागेगा क्या वहांसे ॥ २४ ॥
धरो नहीं व्याकुल मूढ भाव
निहार मेरा वह घोर रूप ।
भय छोड़ तू हो प्रसन्न-चित्त
निहार मेरा प्रिय पूर्व रूप ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ३९६
अथवा देखा सुवर्णका टीला । उसको उठावूं मैं कैसे भला ।
कहके यह उसे छोड़ चला । ऐसे होता क्या ? ॥ २५ ॥
अथवा मानो चिंतामणि मिला । इस बोझको उठावूं क्यों भला ।
कामधेनु पालनेका झमेला । कह छोड़ेगा कोई ? ॥ २६ ॥
अथवा घरमें आया चन्द्रमा । इससे होता है बड़ा ही उष्मा ।
या सूर्यसे होती छायाकी कालिमा । मान तजेंगे क्या ? ॥ २७ ॥
वैसे ऐश्वर्य जो है महा-तेज । आया तेरे हाथमें जो सहज ।
और तू अकुलाया अचरज । कहना क्या ? ॥ २८ ॥
अरे ! है तू कितना गंवार । तुझे कहूं क्या मैं धनुर्धर ।
गले मिलता छोड शरीर । छायाके तू ॥ २९ ॥
विश्व-रूप मेरा निज-रूप । वहां बनाकर मन विरूप ।
प्रेम करता है तू क्षुद्र-रूप । चतुर्भुजसे ॥ ६३० ॥
इतने पर भी छोड़ तू पार्थ । विश्व रूपकी यह अनास्था ।
इसके विषयमें धर आस्था । श्रद्धा-पूर्वक ॥ ३१ ॥
यद्यपि विश्व-रूप है भयंकर । न दीखता उसका ओर छोर ।
किंतु है वह निश्चयका घर । उपासनामें ॥ ३२ ॥
जैसे है कृपणकी चित्तवृत्ति । गढे धनमें उल्झी रहती ।
केवल शरीर करता कृति । करना वैसे ॥ ३३ ॥
अथवा अपने घकुलेमें सब जीव । उल्झाकर उडती पक्षिणी सदैव ।
अंतरिक्षमें करने अपना निभाव । लाचारीसे ॥ ३४॥
अथवा गाय चरती है बाहर । मन लगा है बछडेके ऊपर ।
वैसे तू नित्य इसपे प्रेम कर । अपने स्वामित्वसे ॥ ३५ ॥
वैसे सामान्य चित्त । सख्य-सुख निमित्त ।
पूज तू मूर्तिमंत । चतुर्भुज ॥ ३६ ॥
किंतु कहता हूं सुन अर्जुन । यह बात कभी नहीं न भूलना ।
इस स्वरूप विषय भावना । करना स्थिर ॥ ३७ ॥
३९७ विश्व-रूप-दर्शनयोग
कभी किसीने जो देखा नहीं था। सो देख तू भय-भीत हुवा था।
संचित प्रेम-सर्वस्व जो भी था। रख वह यहीं पर ॥ ३८ ॥
अब तू जैसा ही है कहता। वैसे शांत रूप मैं धरता।
विश्वतोमुख यह कहता। तू निहार अब ॥ ३९ ॥
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥
विश्वरूप विसर्जन --
ऐसा वाक्य कह वह तत्क्षण । मनुष्य हुवा देव विलक्षण ।
कहें क्या प्रेमका वह लक्षण । लीला-कौतुक ॥ ६४० ॥
श्रीकृष्ण है कैवल्यधाम प्रकट । देता है सर्वस्व विश्व-रूप श्रेष्ठ ।
किंतु न भाता अर्जुनको जो शिष्ट । वह रूप अद्भुत ॥ ४१ ॥
जैसे कोई वस्तु लेकर लौटाना । रत्नोंका खोट निकालते बैठना ।
अथवा कन्या देखकर कहना । यह मन-भाया नहीं ॥ ४२ ॥
दिखा दी उसको विश्व रूपकी जो दशा । इससे दीखता प्रेम विकास है कैसा ।
देवने दिया रहस्यमय उपदेश । धनंजयको ॥ ४३ ॥
सुवर्णका घड गलाकर । किया जो आभूषण सुन्दर ।
नहीं हुवा उसका स्वीकार । गलाया पुनः ॥ ४४ ॥
संजयने कहा
ऐसा कहा श्रीहरिने तुरंत
तथा दिखाया वह पूर्व-रूप ।
आश्वस्त करने डरे हुएको
हुवा पुनः सौम्य उदार देव ॥ ५० ॥
ज्ञानेश्वरी ३९८
वैसे शिष्यके प्रेममें आकर । कृष्णत्वको पूर्ण गलाकर ।
लिया जो विश्व-रूप भयंकर । बना फिर श्रीकृष्ण ॥ ४५ ॥
अजी ! शिष्यका दिया यह त्रास । सहनेवाले गुरु कहां कौन देश ।
न जाने कैसे हरिका प्रेम-विकास ! कहता है संजय ॥ ४६ ॥
विश्व-रूपका यह योग विस्तार । समा लिया अपनेमें ही सत्वर ।
तथा प्रकटा कृष्ण-रूप सुन्दर । क्षण भरमें ॥ ४७ ॥
जैसे त्वं पद होता संपूर्ण । तत् पदमें लीन सर्व रूपेण ।
वृक्ष मिटा होता बीज-कण । यह उसी भांति ॥ ४८ ॥
अथवा स्वप्न-संभ्रम जैसा । निगलता जागृत जीव-दशा ।
श्रीकृष्णने योग-विस्तार वैसा । समा लिया अपनेमें ॥ ४९ ॥
जैसे सूर्यादिका तेज बिंबमें । घनादिका जल गगनमें ।
ज्वारका जल सब समुद्रमें । वैसे नरेंद्र ॥ ५० ॥
अथवा कृष्ण रूपका थान । खोल दिया विश्व-रूप दर्शन ।
दिखाता स-कौतुक जनार्दन । प्रिय अर्जुनको ॥ ५१ ॥
मानो तब उसका आकार प्रकार । गाहक कहता है देखकर ।
यह नहीं हमारे मन अनुसार । और समेटा थान ॥ ५२ ॥
अपना पसारा फैलाकर । विश्वको किया सहज पार ।
उसे समेट हुवा साकार । बना मन-मोहन ॥ ५३ ॥
वह भाग्य अर्जुनको मिला जो किसीको नहीं मिला था—
अथवा हुवा अनंत । जैसे था बना जो सांत ।
पार्थको करने शांत । था जो अधीर ॥ ५४ ॥
जैसे देखता है स्वर्ग स्वप्नमें । जगते ही पाता बिछावनमें ।
ऐसे ही पार्थको क्षण-भरमें । हुवा अति विस्मय ॥ ५५ ॥
अथवा गुरु-कृपासे संपूर्ण । प्रपंच-ज्ञान होता है क्षीण ।
तथा होता पर-ब्रह्म स्फुरण । वैसा देखा कृष्ण-रूप ॥ ५६ ॥
सोचता था पार्थ चितमें एक । विश्व-रूपके परदेको रोक ।
वह गया बड़ा ही हुवा नेक । मेरे हितमें ॥ ५७ ॥
३९९ · विश्व रूप-दर्शनयोग
आया जैसे कालको जीतकर । अथवा बवंडर चीरकर ।
या सप्त-सागर तैरकर । अपने बाहूसे ॥ ५८ ॥
उसे हुआ ऐसा अति-संतोष । माना पार्थने परम-उल्लास ।
देख कर श्रीकृष्णको स-हास । विश्व-रूपके नंतर ॥ ५९ ॥
सूर्यके होते ही अस्तमान । नक्षत्रोंसे भरता गगन ।
वैसे देखने लगा अर्जुन । लोगों सह पृथ्वी ॥ ६६० ॥
देखता वैसे ही कुरु-क्षेत्र । दोनों ओर हैं वैसे सगोत्र ।
रण-सज्ज वीर ले शस्त्रास्त्र । चलाते हुए ॥ ६१ ॥
रण-मध्यमें वहां सब शांत । वैसा ही रथ खडा है रक्षित ।
बैठा है उसमें श्रीलक्ष्मी-कांत । अपने पास ॥ ६२ ॥
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥
एवं पहले जैसे था वैसे । देखा यह वीर्य-विलाससे ।
फिर कहता जिया मैं ऐसे । हुवा अब ॥ ६३ ॥
बुद्धिको छोड कर ज्ञान । भयसे गया था जो वन ।
अहंकार सह है मन । भाग गया था ॥ ६४ ॥
इन्द्रियां प्रवृत्ति भूल गयी थीं । भाषा प्राणसे वंचित हुई थीं ।
शरीर-ग्राममें अव्यवस्था थी । अभूतपूर्व ॥ ६५ ॥
हुवे वे सब अब प्रफुल्लित । प्रकृति हुई फिरसे जीवित ।
अब हुवा पुनरुज्जीवित । ऐसे लगता मुझे ॥ ६६ ॥
जीवने ऐसा सुख पा लिया । फिर कृष्णसे है कह दिया ।
मैंने तेरा वह जो पा लिया । यह मानवी रूप ॥ ६७ ॥
अर्जुनने कहा
देखके यह जो सौम्य मानवी-रूप माधव ।
हुवा प्रसन्न औ' शांत आया मैं निज भावमें ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी ४००
देवेश ! तूने यह रूप दिखाकर । मुझ राह भूले शिशुको बुलाकर ।
माताने मानो स्नेहसे गोद लेकर । कराया स्तन-पान ॥ ६८ ॥
अजी ! महा सागरमें विश्व-रूपके । जूझ रहा था हमलोंसे तरंगोंके ।
अब पा लिया किनारा निज-मूर्ति के । दर्शनानुग्रहसे देव ॥ ६९ ॥
सुन तू यह द्वारकापुराध्यक्ष । विश्व रूपसे मानो सूखा था वृक्ष ।
इस दर्शनसे तूने की है रक्षा । प्रेम-मेघ-वर्षासे ॥ ६७० ॥
तृषार्थिको जैसे मिला अपार । लहराता अमृत-सिंधु तीर ।
जीनेका संदेह हुवा है दूर । इस दर्शनसे ॥ ७१ ॥
मेरे हृदयांगणमें आज । खिली आनंद-लता सहज ।
सुख-दर्शनका हुवा साज । मुझको तेरे ॥ ७२ ॥
भगवान उवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥
पार्थके ऐसे बोलको सुन । ऐसे क्यों कहता जनार्दन ।
तू आ-प्रेमका दृढ स्थान मान । विश्व-रूप वह ॥ ७३ ॥
सदैव यहां मूर्ति-दर्शन । करना केवल लेके तन ।
भूला तू मेरा यह कथन । सुभद्रापति ॥ ७४ ॥
केवल अनन्य भक्तिसे ही यह मिलता है—
अरे ! ऐसा कैसा तू अंधा अर्जुन । हाथ आया स्वर्गका मेरु महान ।
कहता है वह ओछा तेरा मन । यह है भ्रम-भाव ॥ ७५ ॥
रूप है जो मेरा विश्वात्मक । दिखाया तुझे प्रेम-पूर्वक ।
शंभूने किये तप अनेक । किंतु न पा सका वह ॥ ७६ ॥
तथा संकटमें अष्टांग-योगके । पडते हैं योगी आशासे इसके ।
किंतु नहीं पाते भाग्य दर्शनके । इसके कभी वे ॥ ७७ ॥
श्री भगवानने कहा
देखा तूने वह मेरा अति दुर्लभ दर्शन ।
चाहते देव भी नित्य वह स्वरूप दर्शन ॥ ५२ ॥
४०१ विश्व-रूप-दर्शनयोग
(51)
विश्व-रूप कभी किसी काल । देखेंगे अणुमात्र केवल ।
इस आशासे देव सकल । करते हैं चिंतन ॥ ७८ ॥
अंजली जैसे आशाकी । माथे पर ले सदाकी ।
निहारते आकाशकी । राह चातक ॥ ७९ ॥
ऐसे उत्कंठासे भरकर । देखते हैं सदा सुर नर ।
निहारते हैं आठो प्रहर । उसके दर्शनार्थ ॥ ८० ॥
फिर भी विश्व-रूप सरीखा । स्वप्न भी किसीने नहीं देखा ।
प्रत्यक्ष मिला जो वह सुख । तुझको यहां ॥ ८१ ॥
नाहं वेदैर्न तपसा न दाने न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
वहां पहुंचनेका साधन । कोई नहीं जान तू अर्जुन ।
वेद सहित षड्दर्शन । व्यर्थ है वहां ॥ ८२ ॥
करने विश्व-रूप दर्शन । करनेमें सब तपको जान ।
अशक्य पानेमें वह स्थान । धनंजय ॥ ८३ ॥
तथा जैसे देखा तूने सविस्तर । वैसे ज्ञान यज्ञसे भी धनुर्धर ।
निहारना जान तू अति दुस्तर । किसीको भी ॥ ८४ ॥
इसका है एक ही प्रकार । सुन तू यह चित्त देकर ।
चित्त करता जब स्वीकार । भक्तिको नित्य ॥ ८५ ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ ५४ ॥
वह भी भक्ति है कैसी । वर्षा न जानती जैसी ।
दूसरा आसरा वैसी । धरती बिन ॥ ८६ ॥
तप यज्ञ किया दान तथा अभ्यास वेदका ।
तो भी दर्शन है मेरा अशक्य जो तुझे मिला ॥ ५३ ॥
अनन्य भक्तिसे शक्य मेरा है ज्ञान दर्शन ।
तत्वता जानना पाना प्रवेश मुझमें फिर ॥ ५४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०२
या सकल जल संपत्ति । लेकर सागरमें जाती ।
जैसे गंगा अनन्य-गति । लय हो मिलती है ॥ ८७ ॥
वैसे सर्व भाव सहित । होकर अति स्नेह-सिक्त ।
रहना मुझमें हो रत । मेरे ही रूपमें ॥ ८८ ॥
तथा मैं रहता ऐसा । क्षीर-सागरमें है जैसा ।
तटपे मध्यमें एकसा । रहता है दूध ॥ ८९ ॥
मुझसे चींटी पर्यंत । चराचरमें समस्त ।
भजनमें नहीं भ्रांत । होता कभी ॥ ६९० ।
उसी क्षणसे है होती । विश्व-रूपकी प्रतीति ।
नयन सम्मुख आती । मूर्ति विश्व-रूपकी ॥ ९१ ॥
ईंधनसे जैसे अग्नि प्रदीप्त । होनेसे होता ईंधन समाप्त ।
तथा ईंधन ही अग्नि बन व्याप्त । होता है वैसे ॥ ९२ ॥
सूर्यके अभावसे जैसे अंबर । बन जाता है स्वयं ही अंधकार ।
सूर्योदयसे होता है तेजाकार । पूर्णरूपसे वह ॥ ९३ ॥
वैसे है मेरा साक्षात्कार । दूर करता अहंकार ।
तथा मिटता द्वैताकार । सहज भावसे ॥ ९४ ॥
फिर मैं वह यह संपूर्ण । बनता है जो एक रूपेण ।
तथा एक भाव एक गुण । होता है समरस ॥ ९५ ॥
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पांडव ॥ ५५ ॥
मेरे लिए ही जो सतत । करता कर्म समर्पित ।
मेरे बिन उसे जगत । लगता सूना ॥ ९६ ॥
दृश्यादृश्य उसे सकल । जो कुछ है मैं ही केवल ।
उसका जीनेका जो फल । मेरा ही नाम ॥ ९७ ॥
मग्न जो कर्ममें मेरे भक्तिसे है भरा हुआ ।
असंग सर्व-निर्वैर पाता हो मुझ मत्पर ॥ ५५ ॥
४०३ विश्व-रूप-दर्शनयोग
प्राणि-मात्रोंकी बातको भूल । सर्वत्र देखता मुझे ही केवल ।
इसीलिये होता निर्वैर सकल । विश्वको भजता ॥ ९८ ॥
अजी ! होता है जो ऐसा भक्त । होनेपे उसका देह-पात ।
मैं ही हो जाता है वह पार्थ । पूर्ण रूपसे ॥ ९९ ॥
अगले अध्यायकी भूमिका—
ऐसा वह विश्वोदर तोंदल । वैसे ही करुणा-रस रसाल ।
श्रीकृष्ण बोला ऐसे मधुबोल । कहता संजय ॥ ७०० ॥
सुनकर यह पांडुकुमार । आनंद-संपदामें भरकर ।
श्रीहरि पद-कमल-भ्रमर । मान अपनेको ॥ १ ॥
उसने देखली वे दोनो मूर्ति । अपने चितमें भरी आकृति ।
तब विश्व-रूपसे कृष्णाकृति । लगी सुंदर ॥ २ ॥
किंतु उसका बना जो ज्ञान । अमान्य करता जनार्दन ।
व्यापकसे न होता महान । कभी रूप एक ॥ ३ ॥
करनेमें समर्थन । इसका श्री भगवान ।
कहता है दो वचन । अर्जुनसे ॥ ४ ॥
उन्हें सुनकर अर्जुन । चितमें करता चिंतन ।
इसमें बड़ा है कौन । पूछें इनसे ॥ ५ ॥
ऐसा सोचकर चितमें पार्थ । करेगा प्रश्न जो अब उचित ।
सुनेंगे अब हम जो खचित । अगले निरूपणमें ॥ ६ ॥
प्रांजल ओवी प्रबंध । कहा मैंने स-विनोद ।
यह निवृत्ति प्रसाद । कहे ज्ञानदेव ॥ ७ ॥
भरके सद्भावनाकी अंजली । मैंने ओवी सुमन भरी खुली ।
अर्पण की हे चरण युगली । विश्व-रूपके ॥ ८ ॥
गीता श्लोक ५५
ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.
ॐ
१२
भक्तियोग
मातृ-रूपसे गुरुका वन्दन—
जय-जय हे शुद्धे । उदारतम प्रसिद्ध ।
अनवरत आनन्दे । वर्षा कर ॥ १ ॥
विषयव्यालका जकडनव । विषतम भ्रमका अंजन ।
गुरु-कृपाके स्निग्ध-नयन । निर्विष करेंगे ॥ २ ॥
झुरसा हो कैसे ही तापमें । या जला हो कैसे हि शोकमें ।
तव कृपा-रस-कल्लोलमें । होंगे शीतल ॥ ३ ॥
अजी ! योग-सुखका उमंग । तव स्नेह-रसके तरंग ।
सोऽहं सुख सिद्धिसें अंतरंग । भर देते हैं ॥ ४ ॥
आधार शक्तिकी गोदमें । बढाती प्रेम-सुख-मोदमें ।
हृदयाकाश पालनेमें । झुलाती सदा ॥ ५ ॥
उतारती प्रागज्योतिकी आरति । मन पवन खिलौनोंसे खिलाती ।
आत्म-सुख अलंकारसे सजाती । बालकको नित ॥ ६ ॥
सत्रहवींका स्तन्य देती । अनाहतके गीत गाती ।
समाधि-बोधमें सुलाती । समझाके ॥ ७ ॥
तभी तू साधकोंकी मां कहलाती । चरणमें साहित्य-लता खिलती ।
तब चरण तलकी छाया ही गति । सर्वदा मुझे ॥ ८ ॥
अजी ! सद्गुरुकी कृपा-दृष्टि । तब कारुण्य जिसकी अधिष्ठी ।
सकल विद्याओंकी जो सृष्टि । धात्री ही है ॥ ९ ॥
तभी हे अंबे श्रीमंते । निज-जन कल्पलते ।
आज्ञा दे तू मुझे माते । ग्रन्थ-निरूपणकी ॥ १० ॥
नव-रसके भरे सागर । जो हैं महा रत्नोंके आगर ।
भावार्थके ऊँचे गिरिवर । उठ आयेंगे ॥ ११ ॥
साहित्य सुवर्णकी खान । हो देश-भाषाका अंगन ।
विवेक-वल्लीका उद्यान । लगे सर्वत्र ॥ १२ ॥
संवाद-फल निधान । प्रमेयोंका उपवन ।
लगे सर्वत्र गहन । निरंतर ॥ १३ ॥
पटे पाखंडकी खायी महान । मिटे वाग्वाद सब अर्थ-शून्य ।
भगे कुतर्कके दुष्ट-श्वान । सदाके लिए ॥ १४ ॥
मेरा चित्त सदैव श्री कृष्ण गुणवर्णनमें समर्थ हो—
श्रीकृष्ण-गुणगानमें चित्त । रहे मेरा सर्वदा समर्थ ।
श्रोता श्रवणासनपे रत । रहे निरंतर ॥ १५ ॥
त्रिभुवनके सभी नगर । बने ब्रह्मविद्याका आगर ।
लेन-देनका रहे आधार । सुविचार मात्र ॥ १६ ॥
मां अपने स्नेहांचलमें । संभालो सर्वदा गोदमें ।
वहां यह सब लीलामें । उपजाऊँ मैं ॥ १७ ॥
इस विनयसे रीझ उठी । श्रीगुरुकी अनुग्रह-दृष्टि ।
कहा कर अब गीता गोष्ठि । न बोल अन्य ॥ १८ ॥
वहांका यह महा-प्रसाद । पाकर हुआ महदानन्द ।
अब कहूँगा गीता-प्रबंध । सुनियेजी ॥ १९ ॥
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ।
विलीन तुझमें होके भजता भक्त जो तुझे ।
कोई अक्षर अव्यक्त योगियोंमें श्रेष्ठ कौन हैं ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०६
ईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग—
तब सकल वीराधिराज । सोम-वंशका विजयध्वज ।
बोलने लगा वह आत्मज । पांडु नृपतिका ॥ २० ॥
कृष्ण ! मैने किया श्रवण । तथा विश्वरूप दर्शन ।
भय-ग्रस्त हुआ जी मन । देख अद्भुत ॥ २१ ॥
कृष्ण-मूर्तिका है रूप सुन्दर । जिसका किया चितने आधार ।
श्रीकृष्ण तूने ना कहकर । दूर किया मुझसे ॥ २२ ॥
अजी ! व्यक्त तथा अव्यक्त । एकमात्र तू है निर्भ्रांत ।
भक्तिसे जो मिलता व्यक्त । अव्यक्त योगसे ॥ २३ ॥
अजी ! ये हैं दो ही पथ । दर्शनार्थिको उचित ।
द्वारमें व्यक्त अव्यक्त । पहुंचाते जो ॥ २४ ॥
कस होता है जो तोला स्वर्णका । वही कस होता एक रत्तिका ।
इसीलिए जो है एक व्यापक । दूसरा है सीमित ॥ २५ ॥
जो महानता अमृत व सिंधुकी । वही शक्ति है अमृत-बिंदुकी ।
करनेसे आचमन दोनोंकी । मिलती एकसे जो ॥ २६ ॥
इन दोनोंसे तत्वतः तुझे कौन जानता है ?—
बात है यह मेरा चित्त । प्रतीत करता निश्चित ।
जानना चाहूं तेरा मत । योगेश्वर ॥ २७ ॥
श्रीकृष्ण तूने क्षण एक । स्वीकार किया जो व्यापक ।
यथार्थमें था या कौतुक । जिज्ञासासे ॥ २८ ॥
तेरे लिए ही सब कर्म । तु ही है जिनका परम ।
भक्तका यह मनो-धर्म । सर्व-समर्पण ॥ २९ ॥
तथा अन्य सब भांति । तुझको ही मान गति ।
दृढ़ कर यह मति । भजते तुझे ॥ ३० ॥
तथा जो प्रणवके उस पार । वैखरीके लिए भी जो है पर ।
उपमा रहित औ' निराकार । वस्तु है जो ॥ ३१ ॥
४०७ भक्तियोग
वह है अक्षर औ' अव्यक्त । तथा निर्देश देश रहित ।
तत्वऽमसि भावसे पूजित । ज्ञानियोंसे ॥ ३२ ॥
योगी या भक्तमें तत्वता । तुमको कौन है जानता ।
कह तू मुझको अनंता । इस समय ॥ ३३ ॥
सुन अर्जुनकी यह बात । जगद्बन्धु हो प्रसन्न चित्त ।
कहे करना प्रश्न उचित । जानता तू ॥ ३४ ॥
भगवान उवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥
दिन रात मेरा चिंतन करनेवाला भक्त मुझे जानता है -
जैसे अस्ताचलके समीप । गये रवि-बिंबके आतप ।
रविके पीछे अपने आप । चलता वैसे ॥ ३५ ॥
वर्षा-ऋतुकी जो सरिता । चढ़ती जाती पांडुसुता ।
वैसी नित्य-नूतन आस्था । दीखे भजनमें ॥ ३६ ॥
मिलन स्थलमें जैसे सागर । गंगा-प्रवाह होता अनिवार ।
वैसा आता है अनिवार पूर । प्रेम-भावका ॥ ३७ ॥
वैसे जो सर्वेंद्रिय सहित । नित रहता मुझमें रत ।
स्मरता रहता दिन-रात । न जानकर भी ॥ ३८ ॥
इस प्रकार है जो भक्त । कर सर्वस्व समर्पित ।
उसको ही मैं योगयुक्त । मानता श्रेष्ठ ॥ ३९ ॥
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥
मुझमें मनको रोप भजता नित्य जो मुझे ।
जुड़ा परम श्रद्धासे उसे मैं श्रेष्ठ मानता ॥ २ ॥
जो है अचिंत्य अव्यक्त सर्व-व्यापी अवर्णित ।
नित्य निश्चल निर्लिप्त जो अक्षर उपासता ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०८
निराकारका योग-मार्ग—
तथा अन्य है जो पांडव । आरूढ होके सोऽहं भाव ।
उलझते निरवयव । अक्षरसे ॥ ४० ॥
जहाँ मनकी रसाई नहीं होती । बुद्धिकी दृष्टि भी नहीं पहुँचती ।
वहाँ होगी इन्द्रियोंकी कौन गति । कह तू अर्जुन ॥ ४१ ॥
ध्यानमें भी वह आना कठिन । होता नहीं उसका एक स्थान ।
न होता उसका आकार गुण । इससे ही ॥ ४२ ॥
जिसका सर्वत्र सर्व काल । रहना सदैव सर्व-स्थल ।
देख होती कुंठित सकल । चिंतन-शक्ति ॥ ४३ ॥
जिसका आदि अन्त है नहीं । तथा है नहींका पता नहीं ।
जिसका कोई उपाय नहीं । जाननेका ॥ ४४ ॥
जो स्थिर न चर । जर ना अजर ।
पाया वह पर । जिन्होंने स्वयं ॥ ४५ ॥
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवंति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥
उनके वैराग्य महाज्वालसे । विषय-वाहिनीको जलानेसे ।
अधजले इंद्रियोंको धैर्यसे । समेट लिया है ॥ ४६ ॥
फिर संयमके पाशमें । पैंठके अंतर तममें ।
इंद्रियाँ हृदय द्वारमें । बाँध रखी ॥ ४७ ॥
लगाया अपानका जो द्वार । देकर आसन मुद्राधार ।
मूलबन्धका सुदृढ़ घर । बना लिया ॥ ४८ ॥
तोड़ा लगाव चाहका । ढा दिया ढाँचा भयका ।
मिटाया निद्रा-तमका । अंधियारा जो ॥ ४९ ॥
रोकता इन्द्रियां सारी सर्वत्र सम-बुद्धिसे ।
पाते हैं मुझको ही वे विश्वके हितमें रत ॥ ४ ॥
(52) ४०९ भक्तियोग
महा ज्वालाओंसे वजाग्निकी । होली कर अपान धातुकी ।
व्याधि-वर्ग मुंडोंसे पूजा की । शतघ्नीकी ॥ ५० ॥
फिर मशाल कुण्डलिनीकी । आधारचक्र पर खड़ी की ।
राह बतायी ब्रह्म-रंध्रकी । उस प्रभाने ॥ ५१ ॥
नव-द्वारके किवाड पर । संयम सांखली लगाकर ।
खोला सुषुम्ना गवाक्ष-द्वार । धनंजय ॥ ५२ ॥
तब प्राण-शक्ति चामुंडा । प्रहारसे संकल्प भेड ।
मन महिषासुर मुंड । लेती है बलि ॥ ५३ ॥
इडा पिंगलाका ऐक्य कर । अनाहद नाद जगाकर ।
जीत लिया इन्द्रामृत नीर । उसी क्षण ॥ ५४ ॥
फिर मध्यमा मध्य विवर । जिसका द्वार अति सुन्दर ।
खोलके ब्रह्मरंध्र शिखर । पालिया है ॥ ५५ ॥
सिवा मकारांत सोपान । छोड करके जो गहन ।
फाँकमैं ले शून्य गगन । पाया ब्रह्मैक्य ॥ ५६ ॥
ऐसे जो सर्वत्र समबुद्धि । निगल जानेमें सोऽहं सिद्धि ।
प्राप्त करते हैं निरवधि । योग दुर्ग ॥ ५७ ॥
अपनेको ही बेचकर । लेते हैं शून्य निराकार ।
वे भी पाते हैं धनुर्धर । मुझको ही ॥ ५८ ॥
अव्यक्तोपासकसे व्यक्तोपासक भले-क्यों कि—
पाते हैं योग बलसे । विशेष हैं कछु ऐसे ।
नहीं कष्ट ही अधिकसे । पाते हैं वे ॥ ५९ ॥
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥
विशेष क्लेश पाते हैं गूंथ अव्यक्तमें चित्त ।
होना अज्ञातमें बोध कठिन देह-धारिको ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१०