गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
भाषाटीकासमेत । (९९) हे राजन्!इस ज्ञानके विषयको मैं कहता हूं तुम श्रवण करो जिसके जाननेसे संसारसागरसे छूटकर मुक्त होजाओगे॥२६॥ यदनादीन्द्रियैर्हीनं गुणभुग्गुणवर्जितम् ॥ अव्यक्तं सदसद्भिन्नमिन्द्रियार्थावभासकम्॥२७॥ जो अनादि इन्द्रियरहित सतरजतमके गुणोंका भोक्ता, गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्असत्से परे, इन्द्रियोंके विषयोंका प्रकाशक ॥ २७ ॥ विश्वभृच्चाखिलव्यापि त्वेकं नानेव भासते ॥ बाह्याभ्यन्तरतः पूर्णमसंगं तमसः परम् ॥२८॥ विश्वका धारण करनेहारा, सम्पूर्णमें व्यापक, एकही ब्रह्म अनेकरूपसे भासता है, वह बाह्य भीतरसे पूर्ण, असंग और अंधकारसे परे हैं ॥ २८ ॥ दुर्ज्ञेयं चादिसूक्ष्मत्वादीप्तानामपि भासकम् ॥ ज्ञेयमेतादृशं विद्धि ज्ञानगम्यं पुरातनम् ॥२९॥ अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह जाना नहीं जाता, ज्योतियोंका भी प्रकाश करनेवाला है, इस प्रकार ज्ञानसे जानने योग्य पुरातन पुरुषको ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९ ॥
( १०० ) गणेशगीता-अ० ९. एतदेव परं ब्रह्म ज्ञेयमात्मा परोऽव्ययः ॥ गुणान्प्रकृतिजान्भुङ्क्ते पुरुषः प्रकृतेः परः ॥३०॥ यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा पर अव्यय प्रकृतिसे परे पुरुष कहाता है, तथा प्रकृतिसे उत्पन्न हुए गुणोंको भोगता है ॥ ३० ॥ गुणैस्त्रिभिरियं देहे बध्नाति पुरुषं दृढम् ॥ यदा प्रकाशः क्षांतिश्च वृद्धे सत्त्वे तदाधिकम् ३१॥ प्रकृतिके तीन गुणही इस पुरुषको देहमें बांधते हैं, जिस समय देहमें शांति और प्रकाशकी वृद्धि हो तब सतोगुणकी वृद्धि होती है ॥ ३१ ॥ लोभोऽशमः स्पृहारंभः कर्मणां रजसो गुणः ॥ मोहोऽप्रवृत्तिश्चाज्ञानं प्रमादस्तमसो गुणः ॥३२॥ लोभ, अशांति, स्पृहा, यह रजोगुणके धर्म हैं, मोह, अप्रवृत्ति, अज्ञान, प्रमाद यही तमोगुण जानना ॥ ३२ ॥ सत्त्वाधिकः सुखं ज्ञानं कर्मसंगं रजोऽधिकः ॥ तमोऽधिकश्च लभते निद्रालस्यं सुखेतरत् ॥३३॥ सतोगुण अधिक होनेसे सुख ज्ञानकी , रजोगुण अधिक होनेसे कर्मकी प्राप्ति,और तमोगुण अधिक होनेसे सुखसे इतर निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥
भाषाटीकासमेत । ( १०१ ) एषु त्रिषु प्रवृद्धेषु मुक्तिसंसृतिदुर्गतीः ॥ प्रयान्ति मानवा राजंस्तस्मात्सत्त्वयुतोभव ३४ इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और दुर्गतिकी मनुष्योंको प्राप्ति होती है इस कारण हे राजन् ! सतोगुणयुक्त हूजिये ॥ ३४ ॥ ततश्च सर्वभावेन भज त्वं मां नरेश्वर ॥ भक्त्या चाव्यभिचारिण्यासर्वत्रैवचसंस्थितम् ३५ हे नरेश्वर ! तदनन्तर सर्वभावसे तुम मेरा भजन करो, और निश्चल भक्तिसे सब स्थानमें मुझे स्थित जानो ॥ ३५ ॥ अग्नौ सूर्ये तथा सोमे यच्च तारासु संस्थितम् ॥ विदुषि ब्राह्मणे तेजो विद्धि तन्मामकं नृप॥३६॥ अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, तारागण, विद्वान्, ब्राह्मणमें, जो तेज है वह मेराही तेज जानो ॥ ३६ ॥ अहमेवाखिलं विश्वं सृजामि विसृजामि च ॥ औषधीस्तेजसासर्वा विश्वंचाप्याययाम्यहम् ३७ मैंही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्न कर संहार करता हूं और अपने तेजसे औषधी और जगतको मैंही युक्त करता हूं॥३७॥
( १०२ ) गणेशगीता-अ० ९. सर्वेन्द्रियाण्यधिष्ठाय जाठरं च धनंजयम् ॥ भुनज्मिचाखिलान्भोगान्पुण्यपापविवर्जितः ३८ और सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें तथा उदरमें स्थित होकर धनञ्जय- नामक प्राण और जाठराग्नीरूपसे पापपुण्य रहित होकर सम्पूर्ण भोगोंको भोगता हूं ॥ ३८ ॥ अहं विष्णुश्च रुद्रश्च ब्रह्मा गौरी गणेश्वरः ॥ इन्द्राद्या लोकपालाश्च ममैवांशसमुद्भवाः ॥३९॥ मैंही विष्णु, ब्रह्मदेव, रुद्र, गौरी, गणपति हूं, इन्द्रादिक लोकपालें, मेरेही अंशसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३९ ॥ येनयेनहि रूपेण जनो मां पर्युपासते ॥ तथातथा दर्शयामि तस्मै रूपं सुभक्तितः ॥४०॥ जिस जिस रूपसे प्राणी मेरी, उपासना करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार उन्हें वैसा वैसाही रूप दिखाता हूं ॥ ४० ॥ इति क्षेत्रं तथा ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं मयेरितम् ॥ अखिलं भूपते सम्यगुपपन्नाय पृच्छते ॥ ४१ ॥ ॐतत्सादिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासुयोगामृता- र्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्त० गजाननवरेण्यसंवादे क्षेत्रज्ञातृज्ञेयविवेकयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥९॥
भाषाटीकामेत। (१०३) इस प्रकार क्षेत्र ज्ञाता ज्ञान ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, हे राजन् ! यह तुम्हारे प्रश्नका उत्तर सम्पूर्ण कहा, जो-- तुमने पूछा था ॥ ४१ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजाननवरेण्यसंवादे पण्डित- ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां क्षेत्रज्ञातृज्ञेय विवेकयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ श्रीगजानन उवाच । दैव्यासुरी राक्षसी च प्रकृतिस्त्रिविधा नृणाम् ॥ तासां फलानि चिह्नानि संक्षेपात्तेऽधुना ब्रुवे॥१॥ श्रीगणेशजी बोले-दैवी, आसुरी, राक्षसी तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, अनेक फल और चिह्न संक्षेपसे वर्णन करते हैं ॥ १ ॥ आद्या संसाधयेन्मुक्तिं द्वे परे बन्धनं नृप ॥ चिह्नं ब्रवीमि चाद्यायास्तन्मे निगदतः शृणु २॥ दैवी प्रकृति मुक्तिकी साधना करती है, आगेकी दोनों बंधनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न कहता हूं सो तुम सुनो ॥ २ ॥
( १०४ ) गणेशगीता अ० १०. अपैशुन्यं दयाक्रोधोऽचापल्यं धृतिरार्जवम् ॥ तेजोऽभयमहिंसा चक्षमा शौचममानिता ॥ ३ ॥ चुगली न करना, दया, अक्रोध, धैर्य, अचपलता, आर्जव, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमान ॥ ३ ॥ इत्यादि चिह्नमाद्याया आसुर्याः शृणु सांप्रतम् ॥ अतिवादोऽभिमानश्च दर्पोऽज्ञानं सकोपता ॥ ४ ॥ इत्यादि चिह्नयुक्त दैवी प्रकृति समझनी । अब आसुरीके चिह्न सुनो–अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान, क्रोध ॥ ४ ॥ आसुर्या एवमाद्यानि चिह्नानि प्रकृतेर्नृप ॥ निष्ठुरत्वं मदो मोहोऽहंकारो गर्व एव च ॥ ५ ॥ हे राजन् ! यह आसुरी प्रकृतिके चिह्न हैं, निष्ठुरता, मद, मोह, अहंकार, गर्व ॥ ५ ॥ द्वेषोऽहिंसाऽदया क्रोध औद्धत्यं दुर्विनीतता ॥ अभिचारिककर्तृत्वं क्रूरकर्मरतिस्तथा ॥ ६ ॥ द्वेष, हिंसा, अदया, क्रोध, उद्धत्ता, विनयहीनता, दूसरोंके नाशके निमित्त कर्मारंभ, क्रूर कर्मोंमें प्रीति ॥ ६ ॥ अविश्वासः सतां वाक्येऽशुचित्वं कर्महीनता ॥ निन्दकत्वं च वेदानां भक्तानामसुरद्विषाम् ॥७॥
भाषाटीकासमेत । ( १०५ ) श्रेष्ठ पुरुषोंके वाक्यमें अविश्वास, अपवित्रता, कर्मोंका न करना, वेद और देवताओंकी निन्दा करना ॥ ७ ॥ मुनिश्रोत्रियविप्राणां तथा स्मृतिपुराणयोः ॥ पाखण्डवाक्येविश्वासःसंगतिर्मलिनात्मनाम् ८ मुनि, श्रोत्रिय, ब्राह्मण, तथा स्मृति, पुराणकी निन्दा, पाखण्ड वाक्यमें विश्वास, दुष्टों तथा मलीन पुरुषोंकी संगति करनी ॥ ८ ॥ सदम्भकर्मकर्तृत्वं स्पृहा च परवस्तुषु ॥ अनेककामनावत्त्वं सर्वदाऽनृतभाषणम् ॥ ९ ॥ पांखड सहित कर्म करना, दूसरेकी वस्तुओंमें इच्छा, अनेक कामना होनी, सदा झूठ बोलना ॥ ९ ॥ परोत्कर्षासहिष्णुत्वं परकृत्यपराहतिः ॥ इत्याद्या बहवश्चान्ये राक्षस्याः प्रकृतेर्गुणाः॥१०॥ दूसरेकी उत्कर्षता न सहनी, दूसरेके कृत्यको नष्ट करना, इत्यादिक बहुत सारे राक्षसी प्रकृतिके गुण हैं ॥ १० ॥ पृथिव्यां स्वर्गलोके च परिवृत्य वसन्ति ते ॥ मद्भक्तिरहिता लोका राक्षसीं प्रकृतिं श्रिताः ११
( १०६ ) गणेशगीता अ० १०. पृथ्वी और स्वर्ग लोकमें यह सब गुण रहते हैं. जो लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वेही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त हुए हैं॥११॥ तामसीं ये श्रिता राजन्यान्ति ते रौरवं ध्रुवम् ॥ अनिर्वाच्यं च ते दुःखं भुञ्जते तत्र संस्थिताः १२ हे राजन्! जो तामसी प्रकृतिको प्राप्त हुए हैं, वे रौरवनरकको प्राप्त होते हैं, वहां वे अकथनीय दुःखको अवश्य भोगते हैं॥१२॥ दैवान्निःसृत्य नरकाज्जायन्ते भुवि कुब्जकाः ॥ जात्यन्धाःपङ्गवो दीना हीनजातिषु ते नृप १३ कदाचित् दैववश नरकसे निकलकर पृथ्वीमें कुबडे होते हैं वा जन्मान्ध, लँगडे, दीन और हीन जातिमें जन्म लेते हैं १३ पुनः पापसमाचारा मय्यभक्ताः पतन्ति ते ॥ उत्पतन्तिहि मद्भक्तायांकांचिद्योनिमाश्रिताः १४ पापाचरणवाले मुझमें भक्ति न करनेवाले पतित होते हैं, चाहें किसी योनिमें जन्म लें परन्तु मेरे भक्त नष्ट नहीं होते, उद्धार होजाते हैं ॥ १४ ॥ लभन्ते स्वर्गतिं यज्ञैरन्यैर्धर्मैश्च भूमिप ॥ सुलभा सा सकामानां मयिभक्तिः सुदुर्लभा १५
भाषाटीकासमेत । ( १०७ ) हे राजन् ! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी गति प्राप्त होती है, सो यह सकामी पुरुषोंको सुलभ है, परन्तु मुझमें भक्ति होनी दुर्लभ है ॥ १५ ॥ विमूढा मोहजालेन बद्धाः स्वेन च कर्मणा ॥ अहं हन्ता अहं कर्त्ता अहं भोक्तेति वादिनः१६॥ मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बंधनमें पडते हैं, वे मैंही हन्ता, मैंही करता, मैंही भोक्ता ऐसे कहा करते हैं॥१६॥ अहमेवेश्वरः शास्ता अहं वेत्ता अहं सुखी ॥ एतादृशीमतिर्नॄणामधः पातयतीह तान्। १७॥ मैं ईश्वर, मैं शिक्षक, मैं जाननेवाला, मैंही सुखी हूं, इस प्रकारकी मति मनुष्योंको नरकमें लेजाती है ॥ १७ ॥ तस्मादेतत्त्समुत्सृज्य दैवीं प्रकृतिमाश्रय ॥ भक्तिं कुरु मदीयां त्वमनिशं दृढचेतसा ॥१८॥ इस कारण इसको छोडकर दैवी प्रकृतिको आश्रय करो और तुम दृढ चित्तसे मेरी दृढ भक्ति करो ॥ १८ ॥ सापि भक्तिस्त्रिधा राजन्सात्त्विकी राजसीतरा॥ यद्देवान्भजते भक्त्या सात्त्विकी सामताशुभा १९
( १०८ ) गणेशगीता-अ० १०. हे राजन् ! वह भक्ति सात्त्विकी राजसी तामसी इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है, जो भक्तिसे देवताओंको भजन करते हैं, वह सात्त्विकी भक्ति है ॥ १९ ॥ राजसी सातु विज्ञेया भक्तिर्जन्ममृतिप्रदा ॥ यद्यक्षांश्चैव रक्षांसि यजन्ते सर्वभावतः ॥ २० ॥ और राजसी भक्ति जन्म मृत्यु देनेवाली है, जिसमें सर्व भावसे यक्ष और राक्षसोंकी पूजा होती है ॥ २० ॥ वेदेनाविहितंकूरं साहंकारं सदम्भकम् ॥ भजन्ते प्रेतभूतादीन्कर्म कुर्वन्ति कामुकम्॥२१॥ वेद विधानसे रहित क्रूर अहंकार तथा दम्भता सहित जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक कर्म करते हैं ॥२१॥ शोषयन्तो निजं देहमन्तःस्थं मां दृढाग्रहाः ॥ तामस्येतादृशी भक्तिर्नृणां सा निरयप्रदा ॥२२॥ अपने देहको शोषते हैं और हृदयमें स्थित मुझकूं दृढ आग्रह करते हैं यह तामसी भक्ति है जो मनुष्योंको नरक देने- हारी है ॥ २२ ॥
भाषाटीकासमेत । ( १०९ ) कामो लोभस्तथा क्रोधो दंभश्चत्वार इत्यमी ॥ महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् २३॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृ- तार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्य- संवादे उपदेशयोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ काम, लोभ, क्रोध, दंभ यह नरकके चार महाद्वार हैं इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥ ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ- शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ०श्रीगजाननवरेण्यसम्वादे पण्डित- ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायामुपदेशयोगोनाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ॥ श्रीगजानन उवाच ॥ तपोऽपि त्रिविधं राजन्कायिकादिप्रभेदतः ॥ ऋजुतार्जवशौचानि ब्रह्मचर्यमहिंसनम् ॥ १ ॥
( ११० ) गणेशगीता अ० ११. श्रीगणेशजी बोले हे राजन्! कायवचनमन इनभेदोंसे तपभी तीन प्रकारकाहै ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा १ गुरुविज्ञद्विजातीनां पूजनं चासुरद्विषाम् ॥ स्वधर्मपालनं नित्यं कायिकं तप ईदृशम् ॥२॥ गुरु, पण्डित, ब्राह्मण देवतोंका पूजन करना, नित्य स्वधर्म पालन करना, यह कायिक तप कहा है ॥ २ ॥ मर्मास्पृक्च प्रियं वाक्यमनुद्वेगं हितं ऋतम् ॥ अधितिर्वेदशास्त्राणां वाचिकं तप ईदृशम् ॥३॥ हृदयग्राहक प्रिय वचन बोलना, उद्वेग रहित हितकारी और सत्य भाषण करना, वेदशास्त्रोंका पढना यह वचनका तप कहा है ॥ ३ ॥ अन्तःप्रसादःशान्तत्वं मौनमिन्द्रियनिग्रहः ॥ निर्मलाशयता नित्यं मानसं तप ईदृशम् ॥४॥ अन्तःकरण प्रसन्न, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, सदा निर्मल भाव रखना, यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥ अकामतः श्रद्धया च यत्तपः सात्त्विकं च तत् ॥ ऋद्धयै सत्कारपूजार्थं सदम्भं राजसं तपः ॥५॥
भाषाटीकासमेत। ( १११ ) अकामता और श्रद्धासे जो तप किया जाता है,वह सात्त्विक है,ऐश्वर्य सत्कार पूजाके निमित्त और दम्भ सहित जो किया जाता है वह राजसी तप है ॥ ५॥ तदस्थिरं जन्ममृती प्रयच्छति न संशयः ॥ परात्मपीडकं यच्च तपस्तामसमुच्यते ॥ ६ ॥ रजोगुणी तप जन्म मृत्यु और अस्थिरताका देनेहारा है और जिसमें दूसरेको पीडा हो वह तमोगुणी तप है ॥ ६॥ विधिवाक्यप्रमाणार्थं सत्पात्रे देशकालतः ॥ श्रद्धया दीयमानं यद्दानं तत्सात्त्विकं मतम् ॥७॥ विधियुक्त प्रमाणपूर्वक देशकालमें श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है वह सात्त्विक दान है ॥ ७ ॥ उपकारं फलं वापि काङ्क्षद्भिर्दीयते नरैः ॥ क्लेशतो दीयमानं वा भक्त्या राजसमुच्यते ॥८॥ और जो उपकार वा फलकी कामनासे मनुष्य दान करते हैं ऐसा दान जो क्लेश अथवा भक्ति किसी प्रकारसे दिया वह राजसी दान कहाता है ॥ ८ ॥ अकालदेशतोऽपात्रेऽवज्ञया दीयते तु यत् ॥ असत्काराच्च यद्दत्तं तद्दानं तामसं स्मृतम् ॥९॥
( ११२ ) गणेशगीता अ० ११. जो देश काल रहित अपात्रमें दिया जाता है, अथवा जो दान अवज्ञासे दिया जाता है, वह तमोगुणी दान है ॥९॥ ज्ञानं च त्रिविधं राजञ् शृणुष्व स्थिरचेतसा ॥ त्रिधा कर्म च कर्त्तारं ब्रवीमि ते प्रसंगतः ॥१०॥ हे राजन् ! मन लगाकर सुनो,ज्ञानभी तीनही प्रकारका है, कर्म और कर्त्ताभी तीनही प्रकारकेहैं,सो मैं प्रसंगसे कहताहूं १० नानाविधेषु भूतेषु मामेकं वीक्षते तु यः ॥ नाशवत्सु च नित्यं मां तज्ज्ञानं सात्त्विकंनृप ११ जो अनेक प्रकारके प्राणियोंमें एक मुझहीको देखता,भूतों- को नाशवान् और मुझे नित्य जानता है, हे राजन् ! वह सात्त्विक ज्ञान है ॥ ११ ॥ तेषु वेत्ति पृथग्भूतं विविधं भावमाश्रितः ॥ मामव्ययं च तज्ज्ञानं राजसं परिकीर्तितम् १२॥ और उन भूतोंसे मुझे पृथक् देखकर जो अनेक भावका आश्रय करते हैं और अव्यय जानते हैं, इस ज्ञानका नाम राजसी है ॥ १२ ॥ हेतुहीनमसत्यं च देहात्मविषयं च यत्॥ असदल्पार्थविषयं तामसं ज्ञानमुच्यते ॥ १३ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ११३ ) हेतुरहित, असत्य, तथा देह और आत्माको एक मानना, क्रूर और थोडे अर्थयुक्त विषयोंमें लगना इस ज्ञानका नाम तामसी है ॥ १३ ॥ भेदतस्त्रिविधं कर्म विद्धि राजन्मयेरितम् ॥ कामनाद्वेषदम्भैर्यद्रहितं नित्यकर्म यत् ॥ १४ ॥ हे राजन् ! सत्,रज,तम इन भेदोंसे कर्म भी तीन प्रकारका है कामना,द्वेष और दंभरहित जो नित्य कर्म है ॥ १४ ॥ कृतं विना फलेच्छां यत्कर्म सात्त्विकमुच्यते ॥ यद्बहुक्लेशतः कर्म कृतं यच्च फलेच्छया ॥ १५ ॥ और फलकी इच्छा रहित जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक कहाता है और जो बहुत क्लेश तथा फलकी इच्छासे किया है ॥ १५ ॥ क्रियमाणं नृभिर्दम्भात्कर्म राजसमुच्यते ॥ अनपेक्ष्य स्वशक्तिं यदर्थक्षयकरं च यत् ॥ १६ ॥ और जिसको मनुष्य दंभपूर्वक करते हैं वह राजसी कर्म कहाता है और जो अपनी शक्तिके बाहर तथा अर्थका क्षय करनेहारा कर्म किया जाता है ॥ १६ ॥
( ११४ ) गणेशगीता अ० ११. अज्ञानात्क्रियमाणं यत्कर्म तामसमीरितम् ॥ कर्तारं त्रिविधं विद्धि कथ्यमानं मया नृप ।१७॥ तथा जो अज्ञानसे कर्म किया जाता है वह तामसी कहाता है, इसी प्रकार हे राजन् ! तीन प्रकारके कर्ता होते हैं ॥१७॥ धैर्योत्साही समोऽसिद्धौसिद्धौ चाविक्रियस्तुयः। अहंकरविमुक्तो यः स कर्ता सात्त्विको नृप १८। हे राजन् ! धैर्य उत्साह युक्त सिद्धि असिद्धिमें समान दृष्टि- वाले, विकार और अहंकार रहित सात्त्विकी कर्ता कहाते हैं १८ कुर्वन्हर्षं च शोकं च हिंसां फलस्पृहां च यः ॥ अशुचिर्लुब्धको यश्च राजसोऽसौ निगद्यते १९॥ जो हर्ष शोक सहित कर्म करते, हिंसा और फलमें इच्छा रखते हैं, जिनमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता कहे जाते हैं ॥ १९ ॥ प्रमादाज्ञानसहितः परोच्छेदपरः शठः ॥ अलसस्तर्कवान्यस्तु कर्ताऽसौताम सो मतः २० प्रमाद और अज्ञान सहित दूसरोंके नाश करनेहारे मूर्ख आलसी और जो तर्क करनेवाले हैं वे तामसी कर्ता हैं॥२०॥
भाषाटीकासमेत । ( ११५ ) सुखं च त्रिविधं राजन्दुःखं च क्रमशः शृणु ॥ सात्त्विकं राजसं चैव तामसं च मयोच्यते २१॥ हे राजन् ! इसी प्रकार सुख दुःखभी तीन प्रकारके हैं, वह तुम क्रमसे सुनो, इनकेभी सात्विक, राजस, तामस भेद हैं सो मैं कहता हूं ॥ २१ ॥ विषवद्भासते पूर्वं दुःखस्यान्तकरं च यत् ॥ इच्छमानं तथा वृत्त्या यदन्तेऽमृतवद्भवेत् २२॥ जो पहले तौ विषकी समान प्रतीत हो और दुःखका अन्त करनेवाला हो और मनोवृत्तिसे इच्छा किया हुआ जो अन्तमें अमृतकी समान हो ॥ २२ ॥ प्रसादात्स्वस्य बुद्धेर्यत्सात्त्विकं सुखमीरितम् ॥ विषयाणां तु यो भोगो भासतेऽमृतवत्पुरा २३॥ और जो अपनी बुद्धिको प्रसन्न करनेहारा हो,वही सात्विक सुख वर्णन किया है, और जो विषयोंका भोग प्रथम तौ अमृतकी समान विदित हो ॥ २३ ॥ हालाहलमिवान्ते यद्राजसं सुखमीरितम् ॥ तन्द्राप्रमादसंभूतमालस्यप्रभवं च यत् ॥ २४ ॥
(११६) गणेशगीता अ० ११. और अन्तमें विषकी समान फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं, और जो तन्द्रा तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ और जो आलस्यसे हुआ है ॥ २४ ॥ सर्वदा मोहकं स्वस्य सुखं तामसमीदृशम् ॥ न तदस्ति यदेतैर्यन्युक्तं स्यात्त्रिविधैर्गुणैः॥२५॥ तथा जो अपनेको सदा मोह करता है, उसका नाम तामसी सुख है, ऐसा कोई भी प्राणी नहीं जो इन तीनों गुणोंसे मुक्त हो ॥ २५ ॥ राजन्ब्रह्मापि त्रिविधमोंतत्सदिति भेदतः ॥ त्रिलोकेषु त्रिधाभूतमखिलं भूप वर्तते ॥ २६ ॥ हे राजन् ! ब्रह्म भी तौ ( ॐ ) ( तत् ) ( सत् ) इस भेदसे तीन प्रकारका है, हे राजन् ! वह तीन प्रकारसे ब्रह्म त्रिलोकीमें व्याप्त है ॥ २६ ॥ ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राः स्वभावाद्भिन्नकर्मणः ॥ तानि तेषां तु कर्माणि संक्षेपात्तेऽधुना वदे ॥२७॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यह स्वभावसेही भिन्न २ कर्म करनेवाले हैं, इनके कर्म संक्षेपसे मैं तुमसे कहताहूं ॥ २७ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ११७ ) अन्तर्बाह्येन्द्रियाणां च वश्यत्वमार्जवं क्षमा ॥ नानातपांसि शौचं च द्विविधं ज्ञानमात्मनः २८ बाह्य और अन्तर इन्द्रियोंका वश करना, सरलता, क्षमा, अनेक प्रकारके तप,पवित्रता,दोनों प्रकार आत्माका ज्ञान २८॥ वेदशास्त्रपुराणानां स्मृतीनां ज्ञानमेव च ॥ अनुष्ठानं तदर्थानां कर्म ब्राह्ममुदाहृतम् ॥ २९ ॥ वेद शास्त्र पुराण और स्मृतियोंका ज्ञान होना और उनके अर्थोंका अनुष्ठान करना, यह ब्राह्मणके कर्म हैं ॥ २९ ॥ दार्ढ्यं शौर्यं च दाक्ष्यं च युद्धे पृष्ठाप्रदर्शनम् ॥ शरण्यपालनं दानं धृतिस्तेजः स्वभावजम् ३० दृढता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना, शरणा- गतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज ॥ ३० ॥ प्रभुता मन औन्नत्यं सुनीतिर्लोकपालनम् ॥ पञ्चकर्माधिकारित्वं क्षात्रं कर्म समीरितम् ३१॥ प्रभुता,मनकी उदारता,अच्छीनीति, लोकपालन इन पांच- कर्मोंमें अधिकार यह क्षत्रियोंका स्वाभाविक कर्म है ॥ ३१ ॥
( ११८ ) गणेशगीता अ० ११, नानावस्तुक्रयो भूमेः कर्षणं रक्षणं गवाम् ॥ त्रिधाकर्माधिकारित्वंवैश्यकर्म समीरितम् ३२॥ अनेक प्रकारकी वस्तुओंका क्रय, विक्रय, पृथ्विकर्षण अर्थात् खेती आदि करना, गायोंकी रक्षा करना, इन तीन प्रका- रके कर्मोंमें वैश्यका अधिकार है, यही वैश्यके कर्म हैं ॥३२॥ दानं द्विजानां शुश्रूषा सर्वदा शिवसेवनम् ॥ एतादृशं नरव्याघ्र कर्म शौद्रमुदीरितम् ॥ ३३ ॥ दान, ब्राह्मणोंकी सेवा, सदाशिवजीकी सेवा, हे राजन् । यह शूद्रोंका स्वकर्म वर्णन किया ॥ ३३ ॥ स्वस्वकर्मरता एते मय्यर्प्याखिलकारिणः ॥ मत्प्रसादात्स्थिरं स्थानं यान्ति ते परमं नृप३४ यह सब वर्ण अपने अपने कर्म यथावत् करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपासे निश्चल परम स्थानको गमन करते हैं ॥ ३४ ॥ इति ते कथितो राजन्प्रसादाद्योग उत्तमः ॥ सांगोपांगःसविस्तारोऽनादिसिद्धो मया प्रिय३५