गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
भाषाटीकासमेत । (९१) शक्योऽहं वीक्षितुं ज्ञातुं प्रवेष्टुं भक्तिभावतः ॥ त्यज भीतिं च मोहं च पश्यमां सौम्यरूपिणम् २५ मैं भक्तिभावसे जाननेकूं दीखनेकूं प्राप्त होनेकूं समर्थ हूं अब तू भय और मोहको त्याग कर मेरे योग्य रूपको देख ॥२५॥ मद्भक्तो मत्परः सर्वसंगहीनो मदर्थकृत् ॥ निष्क्रोधःसर्वभूतेषु समो मामेति भूभुज ॥२६॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु यो- गामृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराण उत्तरखण्डे श्रीगजानवरेण्यसंवादे विश्वरूपदर्शनो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ हे राजन् ! जो भक्त मेरे परायण सर्व संगत्यागी सब कर्म- हीमें समर्पण करते हैं, और क्रोध त्यागन कर सर्व प्राणियोंमें समान दृष्टि करते हैं, वह मुझको प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेश० योगामृतार्षशास्त्रे श्रीगणेशपु० पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां विश्वरूपदर्शनो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
( ९२ ) गणेशगीता-अ० ९. वरेण्य उवाच । अनन्यभावास्त्वां सम्यङ्मूर्तिमन्तमुपासते ॥ योऽक्षरं परमं व्यक्तं तयोः कस्ते मतोऽधिकः १॥ वरेण्य बोले हे भगवन् ! जो मूर्तिमान् तुमको अनन्यभा- वसे भजन करते हैं और जो अक्षर परम और व्यक्तरूपसे तुम्हारी उपासना करते हैं, उनमें अधिक कौन हैं ॥ १ ॥ असि त्वं सर्ववित्साक्षी भूतभावन ईश्वरः ॥ अतस्त्वां परिपृच्छामि वद मे कृपया विभो २॥ हे ईश्वर तुम सब जाननेवाले सबके साक्षी भूतभावन(जग- त्के उत्पन्न कर्त्ता ) ईश्वर हो इस कारण मैं तुमसे पूछताहूं. आप कृपाकर कहिये ॥ २ ॥ श्रीगजानन उवाच । यो मां मूर्तिधरं भक्त्या मद्भक्तः परिषेवते ॥ स मे मान्योऽनन्यभक्तिर्नियुज्य हृदयं मयि ३॥ श्रीगणेशजी बोले जो भक्तिपूर्वक मूर्तिधारी मेरी उपासना करता है, वह अनन्य भक्तिमान् हृदयमें मुझे धारण करनेवाला मेरा मान्य है ॥ ३ ॥
भाषाटीकासमेत । (९३) खगणं स्ववशं कृत्वाखिलभूतहितार्थकृत् ॥ ध्येयमक्षरमव्यक्तं सर्वगं कूटग स्थिरम् ॥ ४ ॥ सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें कर सब प्राणियोंका हित करता हुआ जो अक्षर और अव्यक्त, सर्वव्यापी कूटस्थ (निश्चल) स्थिर ब्रह्मका ध्यान करता है ॥ ४ ॥ सोऽपि मामेत्यनिर्देश्यं मत्परो य उपासते ॥ संसारसागरादस्मादुद्धरामि तमप्यहम् ॥ ५ ॥ वहभी जो अनिर्देश्य (जाति गुण क्रियासे) जाननेको अशक्य मेरी उपासना करता है उसको मैं संसारसागरसे उद्धार करता हूं ॥ ५ ॥ अव्यक्तोपासनादुःखमधिकं तेन लभ्यते ॥ व्यक्तस्योपालनात्साध्यं तदेवाव्यक्तभक्तितः ६॥ अव्यक्त ब्रह्मकी उपासना करनेवाले जनोंको अधिक क्लेश भोगना पडता है, जो व्यक्तस्वरूपकी उपासना भक्तिसे प्राप्त होता है, वही अव्यक्तकी भक्तिसे होता है ॥ ६ ॥ भक्तिश्चैवादरश्चात्र कारणं परमं मतम् ॥ सर्वेषां विदुषां श्रेष्ठो ह्यकिंचिज्ज्ञोऽपिभक्तिमान् ७
( ९४ ) गणेशगीता-अ० ९. इसमें मुख्य कारण भक्ति ही है, सम्पूर्ण विद्वानोंमें थोडा जाननेवालाभी यदि भक्तिमान हो तो वह उनसे श्रेष्ठ है ॥७॥ भजन्भक्त्या विहीनो यः स चाण्डालोऽभिधीयते । चाण्डालोऽपि भजन्भक्त्या ब्राह्मणेभ्योऽधिकोमम॥ जो भक्तिविहीन होकर भजन करता है, वह चाण्डाल है और चाण्डाल होकर मेरी भक्तिसे भजन करे और ब्राह्मण मेरा भक्त न हो तो वह उस ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है ॥ ८ ॥ शुकाद्याः सनकाद्याश्च पुरा मुक्ता हि भक्तितः ॥ भक्त्यैव मामनुप्राप्ता नारदाद्याश्चिरायुषः ॥ ९ ॥ शुकादि सनकादिक भक्तिसे ही मुक्त हुए हैं, और भक्ति सेही नारद और मार्कण्डेयादि मुझको प्राप्त हुए हैं ॥ ९ ॥ अतो भक्त्या मयि मनो निधेहि बुद्धिमेव च ॥ भक्त्या यजस्व मां राजंस्ततो मामेव यास्यसि १० इस कारण भक्तिसे मन और बुद्धि मुझमें लगानी, हे राजन् ! भक्तिसे मेरा यजन करो तो मुझको प्राप्त होगे ॥ १० ॥ असमर्थोऽर्पितुं स्वान्तमेवं मयि नराधिप ॥ अभ्यासेन च योगेन ततो गन्तुं यतस्व माम् ११
भाषाटीकासमेत । ( ९५ ) हे राजन् ! जो मुझमें एक संग अपना मन न लगासको तो अभ्यासयोगसे मुझे प्राप्त होनेका यत्न करो ॥ ११ ॥ तत्रापि त्वमशक्तश्चेत्कुरु कर्म मदर्पणम् ॥ ममानुग्रहतश्चैवं परां निर्वृतिमेष्यसि ॥ १२ ॥ और जो यहभी न हो सके तो जो कुछ कर्म करो सो मेरे अर्पण करो, मेरी कृपासेही परम शान्तिको प्राप्त होगे ॥१२॥ अथैतदप्यनुष्ठातुं न शक्तोऽसि तदा कुरु ॥ प्रयत्नतःफलत्यागं त्रिविधानां हि कर्मणाम् १३ और जो यहभी अनुष्ठान न करसको तो यत्नपूर्वक तीनों प्रकारके कर्मोंका फल त्यागन करो ॥ १३ ॥ श्रेयसी बुद्धिरावृत्तेस्ततो ध्यानं परं मतम् ॥ ततोऽखिलपरित्यागस्ततःशान्तिर्गरीयसी १४॥ प्रथम मेरेमें बुद्धि लगनी श्रेष्ठ है,उससे ध्यान श्रेष्ठ है,उससे सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग श्रेष्ठ है, इससे अत्यन्त श्रेष्ठ शान्ति प्राप्त होती है ॥ १४ ॥ निरहंममताबुद्धिरद्वेषः करुणासमः ॥ लाभालाभे सुखेदुःखे मानामाने समे प्रियः १५
( ९६ ) गणेशगीता-अ० ९. अहंकारका त्याग, ममता बुद्धिका न होना, द्वेष न करना, सबमें समान दृष्टि, लाभ अलाभ, सुख दुःख, मान अपमानमें एक दृष्टि रहे, सो मेरा प्यारा है ॥ १५ ॥ यं वीक्ष्य न भयं याति जनस्तस्मान्न च स्वयम् ॥ उद्वेगभीःकोपमुद्दीरहितो यः स मे प्रियः॥१६॥ जिसको देखकर किसी प्राणीका भय नहीं होता, और जो मनुष्योंसे शंकायुक्त नहीं होता है, उद्वेग और क्रोधके भयसे जो रहित हो वही मेरा प्रिय है ॥ १६ ॥ रिपौ मित्रेऽथ गर्हायां स्तुतौ शोके समः समुत्॥ मौनी निश्चलधीर्भक्तिरसंगः स च मे प्रियः १७ शत्रु मित्र निन्दा स्तुति शोकमें जिसका चित्त एक है मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान्, असंग, ऐसाही प्राणी मेरा प्रिय है ॥ १७ ॥ संशीलयति यश्चैनमुपदेशं मया कृतम् ॥ स वंद्यःसर्वलोकेषु मुक्तात्मा मे प्रियःसदा १८॥ जो मेरे किये उपदेशको विचार करता है, वह त्रिलोकीमें नमस्कारके योग्य है और मेरा प्रिय है ॥ १८ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ९७ ) अनिष्टाप्तौ च न द्वेष्टीष्टप्राप्तौ न च तुष्यति ॥ क्षेत्रतज्ज्ञौ च यो वेत्ति स मे प्रियतमो भवेत् १९ जो अनिष्टकी प्राप्तिमें द्वेष और इष्टकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं करता है क्षेत्र और क्षेत्रज्ञको जो जानता है, वही मेरा प्यारा है॥१९॥ वरेण्य उवाच । किं क्षेत्रं कश्च तद्वेत्ति किं तज्ज्ञानं गजानन ॥ एतदाचक्ष्व मह्यं त्वं पृच्छते करुणाम्बुधे ॥२०॥ वरेण्य बोले भगवन् ! क्षेत्र क्या है और उसका जानने- वाला कौन है, उसका ज्ञान क्या है, हे करुणासागर मुझ प्रश्न करनेवालेसे यह सब आप वर्णन कीजिये ॥ २० ॥ श्रीगजानन उवाच ॥ पञ्च भूतानि तन्मात्राः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च ॥ अहंकारो मनो बुद्धिः पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि च२१॥ श्रीगणेशजी बोले पांच भूत और उनकी तन्मात्रा, पंच कर्में- न्द्रिय, अहंकार, मन, बुद्धि और पांच ज्ञानेंद्रिय ॥ २१ ॥ इच्छाव्यक्तं धृतिद्वेषौ सुखदुःखे तथैव च ॥ चेतनासहितश्चायं समूहः क्षेत्रमुच्यते ॥ २२ ॥
( ९८ ) गणेशगीता अ० ९. इच्छा, व्यक्त, धैर्य, द्वेष, सुख, दुःख और चेतना सहित यह समूह, सब क्षेत्र कहाता है ॥ २२ ॥ तज्ज्ञं त्वं विद्धि मां भूप सर्वान्तर्यामिणं विभुम्॥ अयं समूहोऽहं चापि यज्ज्ञानविषयौ नृप ॥२३॥ हे राजन् ! उसका, जाननेवाला सर्वान्तर्यामी तुम मुझको ( क्षेत्रज्ञ ) जानो, मैं और यह समूह यह दोनों ज्ञेय अर्थात् ज्ञानके विषय हैं ॥ २३ ॥ आर्जवं गुरुशुश्रूषाविरक्तिश्चेन्द्रियार्थतः ॥ शौचं क्षान्तिरदंभश्च जन्मादिदोषवीक्षणम्॥२४॥ सरलता, गुरुशुश्रूषा, इन्द्रियोंका विषयोंसे वैराग्य, पवि- त्रता, सहनशीलता, पाखण्डका त्याग, जन्ममरणादि दोषोंमें दृष्टि ॥ २४ ॥ समदृष्टिर्दृढा भक्तिरेकान्तित्वं शमो दमः ॥ एतैर्यच्च युतं ज्ञानं तज्ज्ञानं विद्धि बाहुज ॥२५॥ समदृष्टिता, दृढभक्ति, एकान्तता, शम, दम, हे राजन् ! इनके सहित जो ज्ञान है, उसीको ज्ञान कहते हैं ॥ २५ ॥ तज्ज्ञानविषयं राजन्ब्रवीमि त्वं शृणुष्व मे ॥ यज्ज्ञात्वेति च निर्वाणं मुक्त्वा संसृतिसागरम् २६
भाषाटीकासमेत । (९९) हे राजन्!इस ज्ञानके विषयको मैं कहता हूं तुम श्रवण करो जिसके जाननेसे संसारसागरसे छूटकर मुक्त होजाओगे॥२६॥ यदनादीन्द्रियैर्हीनं गुणभुग्गुणवर्जितम् ॥ अव्यक्तं सदसद्भिन्नमिन्द्रियार्थावभासकम्॥२७॥ जो अनादि इन्द्रियरहित सतरजतमके गुणोंका भोक्ता, गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्असत्से परे, इन्द्रियोंके विषयोंका प्रकाशक ॥ २७ ॥ विश्वभृच्चाखिलव्यापि त्वेकं नानेव भासते ॥ बाह्याभ्यन्तरतः पूर्णमसंगं तमसः परम् ॥२८॥ विश्वका धारण करनेहारा, सम्पूर्णमें व्यापक, एकही ब्रह्म अनेकरूपसे भासता है, वह बाह्य भीतरसे पूर्ण, असंग और अंधकारसे परे हैं ॥ २८ ॥ दुर्ज्ञेयं चादिसूक्ष्मत्वादीप्तानामपि भासकम् ॥ ज्ञेयमेतादृशं विद्धि ज्ञानगम्यं पुरातनम् ॥२९॥ अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह जाना नहीं जाता, ज्योतियोंका भी प्रकाश करनेवाला है, इस प्रकार ज्ञानसे जानने योग्य पुरातन पुरुषको ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९ ॥
( १०० ) गणेशगीता-अ० ९. एतदेव परं ब्रह्म ज्ञेयमात्मा परोऽव्ययः ॥ गुणान्प्रकृतिजान्भुङ्क्ते पुरुषः प्रकृतेः परः ॥३०॥ यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा पर अव्यय प्रकृतिसे परे पुरुष कहाता है, तथा प्रकृतिसे उत्पन्न हुए गुणोंको भोगता है ॥ ३० ॥ गुणैस्त्रिभिरियं देहे बध्नाति पुरुषं दृढम् ॥ यदा प्रकाशः क्षांतिश्च वृद्धे सत्त्वे तदाधिकम् ३१॥ प्रकृतिके तीन गुणही इस पुरुषको देहमें बांधते हैं, जिस समय देहमें शांति और प्रकाशकी वृद्धि हो तब सतोगुणकी वृद्धि होती है ॥ ३१ ॥ लोभोऽशमः स्पृहारंभः कर्मणां रजसो गुणः ॥ मोहोऽप्रवृत्तिश्चाज्ञानं प्रमादस्तमसो गुणः ॥३२॥ लोभ, अशांति, स्पृहा, यह रजोगुणके धर्म हैं, मोह, अप्रवृत्ति, अज्ञान, प्रमाद यही तमोगुण जानना ॥ ३२ ॥ सत्त्वाधिकः सुखं ज्ञानं कर्मसंगं रजोऽधिकः ॥ तमोऽधिकश्च लभते निद्रालस्यं सुखेतरत् ॥३३॥ सतोगुण अधिक होनेसे सुख ज्ञानकी , रजोगुण अधिक होनेसे कर्मकी प्राप्ति,और तमोगुण अधिक होनेसे सुखसे इतर निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥
भाषाटीकासमेत । ( १०१ ) एषु त्रिषु प्रवृद्धेषु मुक्तिसंसृतिदुर्गतीः ॥ प्रयान्ति मानवा राजंस्तस्मात्सत्त्वयुतोभव ३४ इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और दुर्गतिकी मनुष्योंको प्राप्ति होती है इस कारण हे राजन् ! सतोगुणयुक्त हूजिये ॥ ३४ ॥ ततश्च सर्वभावेन भज त्वं मां नरेश्वर ॥ भक्त्या चाव्यभिचारिण्यासर्वत्रैवचसंस्थितम् ३५ हे नरेश्वर ! तदनन्तर सर्वभावसे तुम मेरा भजन करो, और निश्चल भक्तिसे सब स्थानमें मुझे स्थित जानो ॥ ३५ ॥ अग्नौ सूर्ये तथा सोमे यच्च तारासु संस्थितम् ॥ विदुषि ब्राह्मणे तेजो विद्धि तन्मामकं नृप॥३६॥ अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, तारागण, विद्वान्, ब्राह्मणमें, जो तेज है वह मेराही तेज जानो ॥ ३६ ॥ अहमेवाखिलं विश्वं सृजामि विसृजामि च ॥ औषधीस्तेजसासर्वा विश्वंचाप्याययाम्यहम् ३७ मैंही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्न कर संहार करता हूं और अपने तेजसे औषधी और जगतको मैंही युक्त करता हूं॥३७॥
( १०२ ) गणेशगीता-अ० ९. सर्वेन्द्रियाण्यधिष्ठाय जाठरं च धनंजयम् ॥ भुनज्मिचाखिलान्भोगान्पुण्यपापविवर्जितः ३८ और सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें तथा उदरमें स्थित होकर धनञ्जय- नामक प्राण और जाठराग्नीरूपसे पापपुण्य रहित होकर सम्पूर्ण भोगोंको भोगता हूं ॥ ३८ ॥ अहं विष्णुश्च रुद्रश्च ब्रह्मा गौरी गणेश्वरः ॥ इन्द्राद्या लोकपालाश्च ममैवांशसमुद्भवाः ॥३९॥ मैंही विष्णु, ब्रह्मदेव, रुद्र, गौरी, गणपति हूं, इन्द्रादिक लोकपालें, मेरेही अंशसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३९ ॥ येनयेनहि रूपेण जनो मां पर्युपासते ॥ तथातथा दर्शयामि तस्मै रूपं सुभक्तितः ॥४०॥ जिस जिस रूपसे प्राणी मेरी, उपासना करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार उन्हें वैसा वैसाही रूप दिखाता हूं ॥ ४० ॥ इति क्षेत्रं तथा ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं मयेरितम् ॥ अखिलं भूपते सम्यगुपपन्नाय पृच्छते ॥ ४१ ॥ ॐतत्सादिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासुयोगामृता- र्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्त० गजाननवरेण्यसंवादे क्षेत्रज्ञातृज्ञेयविवेकयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥९॥
भाषाटीकामेत। (१०३) इस प्रकार क्षेत्र ज्ञाता ज्ञान ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, हे राजन् ! यह तुम्हारे प्रश्नका उत्तर सम्पूर्ण कहा, जो-- तुमने पूछा था ॥ ४१ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजाननवरेण्यसंवादे पण्डित- ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां क्षेत्रज्ञातृज्ञेय विवेकयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ श्रीगजानन उवाच । दैव्यासुरी राक्षसी च प्रकृतिस्त्रिविधा नृणाम् ॥ तासां फलानि चिह्नानि संक्षेपात्तेऽधुना ब्रुवे॥१॥ श्रीगणेशजी बोले-दैवी, आसुरी, राक्षसी तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, अनेक फल और चिह्न संक्षेपसे वर्णन करते हैं ॥ १ ॥ आद्या संसाधयेन्मुक्तिं द्वे परे बन्धनं नृप ॥ चिह्नं ब्रवीमि चाद्यायास्तन्मे निगदतः शृणु २॥ दैवी प्रकृति मुक्तिकी साधना करती है, आगेकी दोनों बंधनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न कहता हूं सो तुम सुनो ॥ २ ॥
( १०४ ) गणेशगीता अ० १०. अपैशुन्यं दयाक्रोधोऽचापल्यं धृतिरार्जवम् ॥ तेजोऽभयमहिंसा चक्षमा शौचममानिता ॥ ३ ॥ चुगली न करना, दया, अक्रोध, धैर्य, अचपलता, आर्जव, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमान ॥ ३ ॥ इत्यादि चिह्नमाद्याया आसुर्याः शृणु सांप्रतम् ॥ अतिवादोऽभिमानश्च दर्पोऽज्ञानं सकोपता ॥ ४ ॥ इत्यादि चिह्नयुक्त दैवी प्रकृति समझनी । अब आसुरीके चिह्न सुनो–अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान, क्रोध ॥ ४ ॥ आसुर्या एवमाद्यानि चिह्नानि प्रकृतेर्नृप ॥ निष्ठुरत्वं मदो मोहोऽहंकारो गर्व एव च ॥ ५ ॥ हे राजन् ! यह आसुरी प्रकृतिके चिह्न हैं, निष्ठुरता, मद, मोह, अहंकार, गर्व ॥ ५ ॥ द्वेषोऽहिंसाऽदया क्रोध औद्धत्यं दुर्विनीतता ॥ अभिचारिककर्तृत्वं क्रूरकर्मरतिस्तथा ॥ ६ ॥ द्वेष, हिंसा, अदया, क्रोध, उद्धत्ता, विनयहीनता, दूसरोंके नाशके निमित्त कर्मारंभ, क्रूर कर्मोंमें प्रीति ॥ ६ ॥ अविश्वासः सतां वाक्येऽशुचित्वं कर्महीनता ॥ निन्दकत्वं च वेदानां भक्तानामसुरद्विषाम् ॥७॥
भाषाटीकासमेत । ( १०५ ) श्रेष्ठ पुरुषोंके वाक्यमें अविश्वास, अपवित्रता, कर्मोंका न करना, वेद और देवताओंकी निन्दा करना ॥ ७ ॥ मुनिश्रोत्रियविप्राणां तथा स्मृतिपुराणयोः ॥ पाखण्डवाक्येविश्वासःसंगतिर्मलिनात्मनाम् ८ मुनि, श्रोत्रिय, ब्राह्मण, तथा स्मृति, पुराणकी निन्दा, पाखण्ड वाक्यमें विश्वास, दुष्टों तथा मलीन पुरुषोंकी संगति करनी ॥ ८ ॥ सदम्भकर्मकर्तृत्वं स्पृहा च परवस्तुषु ॥ अनेककामनावत्त्वं सर्वदाऽनृतभाषणम् ॥ ९ ॥ पांखड सहित कर्म करना, दूसरेकी वस्तुओंमें इच्छा, अनेक कामना होनी, सदा झूठ बोलना ॥ ९ ॥ परोत्कर्षासहिष्णुत्वं परकृत्यपराहतिः ॥ इत्याद्या बहवश्चान्ये राक्षस्याः प्रकृतेर्गुणाः॥१०॥ दूसरेकी उत्कर्षता न सहनी, दूसरेके कृत्यको नष्ट करना, इत्यादिक बहुत सारे राक्षसी प्रकृतिके गुण हैं ॥ १० ॥ पृथिव्यां स्वर्गलोके च परिवृत्य वसन्ति ते ॥ मद्भक्तिरहिता लोका राक्षसीं प्रकृतिं श्रिताः ११
( १०६ ) गणेशगीता अ० १०. पृथ्वी और स्वर्ग लोकमें यह सब गुण रहते हैं. जो लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वेही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त हुए हैं॥११॥ तामसीं ये श्रिता राजन्यान्ति ते रौरवं ध्रुवम् ॥ अनिर्वाच्यं च ते दुःखं भुञ्जते तत्र संस्थिताः १२ हे राजन्! जो तामसी प्रकृतिको प्राप्त हुए हैं, वे रौरवनरकको प्राप्त होते हैं, वहां वे अकथनीय दुःखको अवश्य भोगते हैं॥१२॥ दैवान्निःसृत्य नरकाज्जायन्ते भुवि कुब्जकाः ॥ जात्यन्धाःपङ्गवो दीना हीनजातिषु ते नृप १३ कदाचित् दैववश नरकसे निकलकर पृथ्वीमें कुबडे होते हैं वा जन्मान्ध, लँगडे, दीन और हीन जातिमें जन्म लेते हैं १३ पुनः पापसमाचारा मय्यभक्ताः पतन्ति ते ॥ उत्पतन्तिहि मद्भक्तायांकांचिद्योनिमाश्रिताः १४ पापाचरणवाले मुझमें भक्ति न करनेवाले पतित होते हैं, चाहें किसी योनिमें जन्म लें परन्तु मेरे भक्त नष्ट नहीं होते, उद्धार होजाते हैं ॥ १४ ॥ लभन्ते स्वर्गतिं यज्ञैरन्यैर्धर्मैश्च भूमिप ॥ सुलभा सा सकामानां मयिभक्तिः सुदुर्लभा १५
भाषाटीकासमेत । ( १०७ ) हे राजन् ! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी गति प्राप्त होती है, सो यह सकामी पुरुषोंको सुलभ है, परन्तु मुझमें भक्ति होनी दुर्लभ है ॥ १५ ॥ विमूढा मोहजालेन बद्धाः स्वेन च कर्मणा ॥ अहं हन्ता अहं कर्त्ता अहं भोक्तेति वादिनः१६॥ मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बंधनमें पडते हैं, वे मैंही हन्ता, मैंही करता, मैंही भोक्ता ऐसे कहा करते हैं॥१६॥ अहमेवेश्वरः शास्ता अहं वेत्ता अहं सुखी ॥ एतादृशीमतिर्नॄणामधः पातयतीह तान्। १७॥ मैं ईश्वर, मैं शिक्षक, मैं जाननेवाला, मैंही सुखी हूं, इस प्रकारकी मति मनुष्योंको नरकमें लेजाती है ॥ १७ ॥ तस्मादेतत्त्समुत्सृज्य दैवीं प्रकृतिमाश्रय ॥ भक्तिं कुरु मदीयां त्वमनिशं दृढचेतसा ॥१८॥ इस कारण इसको छोडकर दैवी प्रकृतिको आश्रय करो और तुम दृढ चित्तसे मेरी दृढ भक्ति करो ॥ १८ ॥ सापि भक्तिस्त्रिधा राजन्सात्त्विकी राजसीतरा॥ यद्देवान्भजते भक्त्या सात्त्विकी सामताशुभा १९
( १०८ ) गणेशगीता-अ० १०. हे राजन् ! वह भक्ति सात्त्विकी राजसी तामसी इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है, जो भक्तिसे देवताओंको भजन करते हैं, वह सात्त्विकी भक्ति है ॥ १९ ॥ राजसी सातु विज्ञेया भक्तिर्जन्ममृतिप्रदा ॥ यद्यक्षांश्चैव रक्षांसि यजन्ते सर्वभावतः ॥ २० ॥ और राजसी भक्ति जन्म मृत्यु देनेवाली है, जिसमें सर्व भावसे यक्ष और राक्षसोंकी पूजा होती है ॥ २० ॥ वेदेनाविहितंकूरं साहंकारं सदम्भकम् ॥ भजन्ते प्रेतभूतादीन्कर्म कुर्वन्ति कामुकम्॥२१॥ वेद विधानसे रहित क्रूर अहंकार तथा दम्भता सहित जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक कर्म करते हैं ॥२१॥ शोषयन्तो निजं देहमन्तःस्थं मां दृढाग्रहाः ॥ तामस्येतादृशी भक्तिर्नृणां सा निरयप्रदा ॥२२॥ अपने देहको शोषते हैं और हृदयमें स्थित मुझकूं दृढ आग्रह करते हैं यह तामसी भक्ति है जो मनुष्योंको नरक देने- हारी है ॥ २२ ॥
भाषाटीकासमेत । ( १०९ ) कामो लोभस्तथा क्रोधो दंभश्चत्वार इत्यमी ॥ महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् २३॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृ- तार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्य- संवादे उपदेशयोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ काम, लोभ, क्रोध, दंभ यह नरकके चार महाद्वार हैं इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥ ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ- शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ०श्रीगजाननवरेण्यसम्वादे पण्डित- ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायामुपदेशयोगोनाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ॥ श्रीगजानन उवाच ॥ तपोऽपि त्रिविधं राजन्कायिकादिप्रभेदतः ॥ ऋजुतार्जवशौचानि ब्रह्मचर्यमहिंसनम् ॥ १ ॥
( ११० ) गणेशगीता अ० ११. श्रीगणेशजी बोले हे राजन्! कायवचनमन इनभेदोंसे तपभी तीन प्रकारकाहै ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा १ गुरुविज्ञद्विजातीनां पूजनं चासुरद्विषाम् ॥ स्वधर्मपालनं नित्यं कायिकं तप ईदृशम् ॥२॥ गुरु, पण्डित, ब्राह्मण देवतोंका पूजन करना, नित्य स्वधर्म पालन करना, यह कायिक तप कहा है ॥ २ ॥ मर्मास्पृक्च प्रियं वाक्यमनुद्वेगं हितं ऋतम् ॥ अधितिर्वेदशास्त्राणां वाचिकं तप ईदृशम् ॥३॥ हृदयग्राहक प्रिय वचन बोलना, उद्वेग रहित हितकारी और सत्य भाषण करना, वेदशास्त्रोंका पढना यह वचनका तप कहा है ॥ ३ ॥ अन्तःप्रसादःशान्तत्वं मौनमिन्द्रियनिग्रहः ॥ निर्मलाशयता नित्यं मानसं तप ईदृशम् ॥४॥ अन्तःकरण प्रसन्न, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, सदा निर्मल भाव रखना, यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥ अकामतः श्रद्धया च यत्तपः सात्त्विकं च तत् ॥ ऋद्धयै सत्कारपूजार्थं सदम्भं राजसं तपः ॥५॥