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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

[ए] पृष्ठ संख्या पृष्ठ संख्या सा मां द्रक्ष्यति वक्ष्यति ३४३ स्मर-शर-सुभग-नखेन ३४० सा ससाध्वस सानन्दं ३५७ स्मरातुरां दैवत वैद्य १७४ सानन्दं नन्दसूनुर्दिशतु ३७१ ह सुचिरमनुनयेन ३३० हस्त स्रस्त विलास ११९ सौन्दर्यैकनिधेरनङ्ग ३७३ हरि चरण शरण २३२ स्तन विनिहितमपि १६४ हरि परिरम्भण वलित २३८ स्तम्भः स्वेदोऽथ १७२ हरिरभिमानी १९६ स्थल-कमलगञ्जनं ३१३ हरिरभिसरति वहति २९३ स्थल-जलरुह-रुचि २६१ हरिरिति हरिरिति जपति १६९ स्थानेयानासने ७७ हरिरुपयातु वदति २९८ स्निग्धे यत्परुषाणि २९९ हरि हरि याहि २७४ स्फुरतु कुचकुम्भ ३१२ हारममलतर-तारमुरसि ३६० स्फुरदतिमुक्तालता ६६ हारावली-तरल-काञ्चन ३४८ स्फुरतुमनङ्ग-तरङ्ग ३३७ हृदि विसलता हारो १३७ स्मर-गरल-खण्डनं ३१५ हे मनोहर वेष धारिन् ४००

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श्रीश्रीगुरु-गौराङ्गौ-जयतः श्रीश्रीगीतगोविन्दम् प्रथमः सर्गः सामोद-दामोदरः मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुवः श्यामास्तमालद्रुमै- र्नक्तंभीरुरयं, त्वमेव तदिमं राधे! गृहं प्रापय। इत्थं नन्दनिदेशतश्चलितयोः प्रत्यध्वकुञ्जद्रुमं राधामाधवयोर्जयन्ति यमुनाकूले रहः केलयः ॥१ ॥ अन्वय—[कदाचित् बालगोपालेन सह गोष्ठस्थितो नन्दः सायं समये मेघाडम्बरमालोक्य स्वयं कार्यान्तरव्यासक्ततया नन्दनं गृहं नेतुमशक्तः किमपि कार्यमुद्दिश्य तत्रोपस्थितां राधां प्रति आह];—अम्बरं (आकाशतलं) मेघैः मेदुरं (निविड़- तमसाच्छन्नतया सान्द्र-स्निग्धं) वनभुवः (आरण्य-प्रदेशाः) तमालद्रुमैः (घनसन्निविष्टैः तमालवृक्षैः) श्यामाः (गाढ़नीलवर्णाः) [तथा च] अयं [मम शिशुः] नक्तं (सप्तम्यन्तमव्ययम्, रात्रौ इत्यर्थः) भीरुः (नितरां भयशीलः) (पूर्वरात्रे) त्वां विहाय अन्याभिः कृतरमणापराधतया त्वत्कृत-बहु-नायिकावल्लभा- रोपणाशङ्की अतएव भीरुः]; तत् (तस्मात्) हे राधे, त्वमेव इमं (बालगोपालं) गृहं (आलयं) प्रापय (नय); इत्थं (एवं) नन्दनिदेशतः (नन्दस्य आज्ञया); [अथवा नन्दयतीति नन्दः, नन्दश्चासौ निदेशश्चेति नन्दनिदेशः श्रीराधासखावचनं तस्मात्] प्रत्यध्वकुञ्जद्रुमं (कुञ्जेनोपलक्षितो द्रुमः कुञ्जद्रुमः, अध्वनः कुञ्जद्रुमोऽध्वकुञ्ज-द्रुमः, तं लक्षीकृत्य तत्रेत्यर्थः) चलितयोः (प्रस्थितयोः) राधामाधवयोः यमुनाकूले रहःकेलयः (विजनविहाराः)

“हरि-राधा मदमाते। यमुन-पुलिनके कुंज-कुंजसे क्रीड़ा करते जाते।”

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३ जयन्ति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तन्ते)। [श्रीकृष्णस्य स्वयं भगवत्त्वेन सर्वावतारेभ्यः, श्रीराधायाश्च सर्वलक्ष्मीमयत्वेनास्य सर्वप्रेयसीभ्यः श्रेष्ठ्यात् इतिभावः; तथाचोक्तं सूतेन “एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्” इति।] वृहद्-गोतमीये च-“देवी कृष्णामयी प्रोक्ता राधिका परदेवता सर्वलक्ष्मीमयी सर्वस्यान्तः- संमोहिनी परा” इति ॥१॥ अनुवाद—हे राधे! समस्त दिशाएँ घनघोर घटाओंसे आच्छादित हो गई हैं। वन वसुन्धरा श्यामल तमाल विटपावलीकी प्रतिच्छायासे तिमिरयुक्ता हो गई है। भीरु स्वभाववाले कृष्ण इस निशीथमें एकाकी नहीं जा सकेंगे—अतः तुम इन्हें अपने साथ ही लेकर सदनमें पहुँचो। श्रीराधाजी, सखी द्वारा उच्चरित इस वचनका समादर करती हुई आनन्दातिशयतासे विमुग्ध हो, पथके पार्श्वमें स्थित कुञ्ज- तरुवरोंकी ओर अभिमुख हुई और कालिन्दीके किनारे उपस्थित होकर एकान्तमें केलि करने लगीं। श्रीयुगल माधुरीकी यह रहस्यमयी लीला भक्तोंके हृदयमें स्फुरित होकर विजयी हो। पद्यानुवाद— मेघ भरित अम्बर अति श्यामल तरु तमालकी छाया, कान्ह भीरु ले जा राधे! गृह, व्याप्त रातकी माया। पा निर्देश यह नन्द महरका हरि-राधा मदमाते, यमुन-पुलिनके कुञ्ज-कुञ्जमें क्रीड़ा करते जाते ॥१॥ बालबोधिनी—गीतगोविन्द नामक इस प्रबन्धमें श्रीराधा- माधवकी ऐकान्तिकी प्रेममयी निकुञ्ज लीलाका चित्रण किया गया है। रचनाकार महाकवि श्रीजयदेव गोस्वामीने श्रीराधामाधवकी स्मरकेलि-लीलाका वर्णन कर उन दोनोंकी सर्वश्रेष्ठता स्थापित की है। ग्रन्थकृतिके प्रारम्भमें श्रीकविराजजीने तमालवृक्षके तमःपुञ्ज द्वारा समाच्छादित कुञ्ज-भवनमें श्रीराधा-माधवकी प्रविष्टिका चित्रण किया है।

४ श्रीगीतगोविन्दम् परम प्रेयसी श्रीराधा अपनी सखीके वचनोंका स्मरण कर श्रीकृष्णको साथ लेकर कुञ्जमें प्रवेश कर जो सुखक्रीड़ाएँ करती हैं, उन्हींको मङ्गलाचरणके रूपमें प्रस्तुत किया गया है। ग्रन्थका प्रतिपाद्य-तत्त्व श्रीराधामाधवकी लीलामाधुरी है; अतः यह प्रबन्ध सभीके लिए मङ्गलदायी और कल्याणकारी है। ‘मेघैर्मेदुरमम्बरम्’ इस श्लोकमें कह रहे हैं कि श्रीराधामाधवकी सर्वोत्कृष्ट रहःकेलि जययुक्त हो। ‘माधव’ पदके द्वारा इस कार्यकी सूचना दी गई है कि यद्यपि श्रीभगवान् लक्ष्मीपति हैं फिर भी उनका श्रीराधामें ही प्रेमाधिक्य है। श्रीकृष्ण स्वयं-भगवान् हैं, सर्व-अवतारी हैं; सभी अवतारोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं; श्रीमद्भागवतमें श्रीसूतजीने ऐसा ही निर्णय किया है। श्रीबृहद्गौतमीय तन्त्रमें कहा गया है— “देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वस्यान्तःसंमोहिनी परा।” श्रीमती राधिका द्योतमाना, परमा सुन्दरी हैं। ये कृष्णक्रीड़ाकी वसति नगरी अर्थात् आश्रय स्वरूपा हैं। कृष्णमयी—कृष्ण इनके भीतर-बाहर अवस्थित रहते हैं। निरन्तर कृष्णकी अभिलाषा पूर्ण करती हैं; समस्त देवताओंमें सर्वश्रेष्ठा हैं; समस्त लक्ष्मियोंमें परम लक्ष्मी-स्वरूपा हैं। सभीकी हृदय-स्वरूपा हैं, श्रीकृष्ण-चित्ताकर्षका हैं, परा हैं। ये श्रीश्रीराधामाधव इस काव्य-रचनाकी निर्विघ्न परिसमाप्तिके लिए अनुग्रह प्रदान करें—इस प्रकार कविके द्वारा शिष्टाचार परम्पराका निर्वाह किया गया है। जय शब्दसे तात्पर्य है—लीलाओंका सर्वोत्कृष्ट और भक्तजनोंके द्वारा नमस्करणीय होना। ये लीलाएँ भगवान्‌की स्वरूपशक्तिकी वृत्तिरूपा हैं, अतः ये जययुक्त हों। अब प्रश्न होता है कि कौन-सी लीलाएँ जययुक्त हों ? इसके उत्तरमें कहा है—यमुनाकूले—यमुनाके तटपर अवस्थित

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५ श्रीराधामाधवकी कुञ्जगृहकी लीला जययुक्त हों। इस पदके द्वारा रतिजनित श्रमको दूर करने वाला शिशिर समीर सम्प्राप्ति युक्तत्वको सूचित किया गया है। यह कुञ्ज तमाल वृक्षोंके द्वारा सघन रूपसे आच्छादित होकर श्यामवर्ण हो गया है, इसको लक्ष्य करके पथका निर्देश किया गया है। 'नन्दनिदेशतः'—नन्द अर्थात् जो सबके आनन्दका विधान करते हैं। नन्दश्चासौ निदेशश्चेति—इस प्रकारसे यह नन्दमहाराजका निर्देश भी कहा जा सकता है। इस पदसे यह भी इङ्गित होता है कि जो सदासर्वदा आनन्दमें डूबे हुए हैं, उन नन्दनन्दनका निर्देश पाकर। यद्यपि 'नन्दनिदेशतः' पदके बहुत प्रकारके अर्थ बतलाये गये हैं, फिर भी उक्त पदका अभिप्राय "परम प्रेयसी श्रीराधा अपनी सखीके वचनोंको सुनकर" ही समुचित लगता है, क्योंकि महाराज नन्दका श्रीमती राधाको श्रीकृष्णके साथ कुञ्जमें विहार करनेके लिए आदेश देना कुछ अटपटा-सा रसाभास-सा प्रतीत होता है। वैसे ही स्वयं श्रीकृष्णका वैसा आदेश भी अटपटा ही प्रतीत होता है। यहाँ यही अभिप्रेत है कि सखीवचनका समादर करती हुई श्रीराधिका कृष्णको साथ लेकर चलने लगीं। सखीवचन—हे राधे ! यह कृष्ण भीरु स्वभावयुक्त हैं क्योंकि पिछली रात तुम्हें छोड़कर दूसरी नायिकाके साथ मिलित हुए थे, अपने इस अपराधके कारण तुमसे डरे हुए हैं, उनका भयभीत होना स्वाभाविक ही है। तुम्हारे द्वारा लगाया गया अपराध 'बहु नायिका-वल्लभ' ठीक ही है, अब तुम ही मर्मपीडित श्रीकृष्णको अपनेमें प्राप्त कराओ। 'गृहं प्रापय'—हे राधे ! श्रीकृष्णको लेकर गृहं प्रापय अर्थात् मञ्जु वृक्षोंसे सुशोभित केलि सदनमें प्रवेश करो, क्योंकि यही तुम्हारे लिए अनुकूल है। अथवा घरमें ले जाओ अर्थात् कुञ्जगृहमें प्रवेश कराकर गृहस्थ अर्थात्

६ श्रीगीतगोविन्दम् अपनेमें मिलाकर गृहिणी मान कराओ। 'गृहं प्रापय' इस वाक्यके 'गृह' शब्दमें तटस्थ लक्षणा है और 'गृह' शब्द गृहमें रहनेवाली गृहिणीरूपी अर्थको लक्षित करता है तथा प्र-पूर्वक 'आप' धातु उदयार्थक है। 'एव' कारके द्वारा—इनकी भार्या होने योग्य केवल तुम ही हो। यदि कोई कहे कि उनकी भार्या तो रुक्मिणी हैं क्योंकि कुण्डिन नगरवासी जनोंने रुक्मिणीको आशीर्वाद दिया था—'तुम श्रीकृष्णकी भार्या बनो।' इसी प्रकार हे राधे ! तुम भी इनकी भार्या बनो, क्योंकि वह गृह, गृह नहीं जिसमें गृहिणी न हो। श्रीराधिका सखीसे कहती हैं, इस ज्योत्स्नामयी रात्रिमें जनसमूहके मध्य होकर श्रीकृष्णके साथमें कैसे जाऊँ? तदुत्तर कविने अनुकूल समयका चयन किया है। तदनुसार—हे राधे ! सम्प्रति आकाश बादलोंसे भरे हुए होनेके कारण मनोज्ञ हो गया है, जिससे चन्द्रमाकी किरणें अदृश्य हो रही हैं, श्रीकृष्णकी प्रिया-मिलनकी इच्छाको जानकर घटाओंने मानो चन्द्रमाको समाच्छादित कर लिया है। अथवा जिस प्रकार श्यामवर्णके मेघोंने गौरवर्ण चन्द्रमाका आलिङ्गन कर रखा है, उसी उद्दीपनसे विभावित हो श्रीश्याम गौराङ्गी श्रीराधासे मिलनेकी तीव्र इच्छासे उत्कण्ठित हो रहे हैं। यह समय भी अनुकूल है। रात्रिकी बेला है, वनभूमि तमाल वृक्षोंसे समाच्छादित होकर श्यामवर्ण हो गई है, चहुँओर निविड़ अन्धकार व्याप्त है, कोई तुम्हें देख नहीं सकता। डरनेकी तनिक भी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार महाकविने सूचित किया है कि इस काव्यका अङ्गी-रस रसराज शृङ्गार है। अन्धकारमय रात्रिकाल, मेघाच्छादित अम्बर तथा तमाल वृक्षोंसे सुशोभित शस्यश्यामला वनभूमि—ये उद्दीपन विभाव हैं; श्रीमती राधा आलम्बन विभाव हैं। रति स्थायी भाव है। हर्ष, आवेग, औत्सुक्य आदि व्यभिचारी

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७ भाव हैं। भीरुत्व अनुभाव है। शृङ्गार-रसमें नायिकाका प्राधान्य होनेके कारण श्रीराधाजीका यहाँ पहले निरूपण हुआ है। इस लीलाके अवसर पर सखी इस प्रकार कहेगी-चारों ओर देख सुनकर चलना उचित है—इत्यादि। इन वचनोंसे—'राधे! जब तक चन्द्र-ज्योत्स्ना दृश्यमाना नहीं होती, तब तक वनमें प्रविष्ट हो जाओ।' श्रीमद्भागवतमें श्रीशुकदेवजीने १०-३० में कहा है—'अन्धकारमय स्थानको देखकर'। प्रस्तुत श्लोकमें जयति शब्दके द्वारा नमस्कारका बोध होता है, ऐसे काव्य-प्रकाशमें भी नमस्कार शब्दसे सूचित किया है। यहाँ श्रीराधामाधवकी रहःकेलिका जो प्रतिपादन हुआ है, उससे वस्तु निर्देश भी लक्षित होता है तथा यह आशीर्वाद स्वरूप भी है। इसलिए इसे महाकाव्य कहा जाता है। काव्यके विषयमें चर्चा करने पर देखा जाता है कि काव्य ग्रन्थ दो प्रकारके हैं- साधारण काव्य एवं महाकाव्य। महाकाव्यके मङ्गलाचरण श्लोकमें तीन पक्षोंका वर्णन हुआ है—आशीर्वाद, नमस्कार एवं वस्तुनिर्देश। काव्यादर्शमें सर्गबन्धको महाकाव्य कहा गया है। प्रस्तुत श्लोकमें श्रीराधामाधवकी रहःकेलिका प्रतिपादन हुआ है। अतः यह वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण है, राधामाधव कहनेसे दोनोंका अविच्छिन्न नित्य सम्बन्ध प्राप्त होता है। राधाकृष्ण दुहे एक ही स्वरूप। लीलारस आस्वादिते धरे दुइ रूप॥ श्रीचैतन्यचरितामृतमें वर्णित इस पयारके अनुसार श्रीराधाकृष्ण दोनोंमें अव्यभिचारी सम्बन्ध सूचित होता है। ऋक् परिशिष्टमें कहा है—राधया माधवो देवो माधवेनैव श्रीराधिका—राधाके साथ माधव एवं माधवके साथ श्रीराधिका विराजमान हैं। राधामाधव इस पदमें द्वन्द्व समासके द्वारा दोनोंका अभिन्न सम्बन्ध प्रकाशित होता है।

८ श्रीगीतगोविन्दम् इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें समुच्चयालङ्कार तथा उत्तरार्द्धमें आशीः अलङ्कार है। फलतः दोनोंकी संसृष्टि है। प्रस्तुत श्लोकमें वैदर्भी रीति, कैशिकी वृत्ति, सम्भाविता गीति, मध्य लय, प्रसाद गुण, अनुकूल नायक तथा स्वाधीनभर्त्तृका नायिका है। इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें अभिलाष लक्षण विप्रलम्भ शृङ्गार है तथा शार्दूल-विक्रीड़ित छन्द है॥१॥ वाग्देवताचरितचित्रितचित्तसद्मा पद्मावतीचरणचारणचक्रवर्ती। श्रीवासुदेवरतिकेलिकथासमेतमेतं करोति जयदेवकविः प्रबन्धम्॥२॥ अन्वय—वाग्देवताचरितचित्रितचित्तसद्मा (वाग्देवतायाः सरस्वत्याः चरितेन चित्रितं सुशोभितं चित्तमेव सद्म भवनं यस्य तादृशः; सर्वविद्याविशारद इत्यर्थः; यद्वा वाचां वक्तव्यत्वेन उपस्थितानां तत्केलिमयीनां देवता वक्ता प्रवर्त्तकश्च श्रीकृष्णः तच्चरितेन चित्ररूपेण लिखितं चित्तरूपं सद्म गृहं यस्य सः); [तथा] पद्मावतीचरणचारणचक्रवर्त्ती (पद्मावत्याः लक्ष्म्याः चरणयोः निमित्त भूतयोरेव चारणचक्रवर्त्ती नर्त्तकश्रेष्ठः; श्रियोऽपि प्रियसेवक इत्यर्थः); जयदेवकविः श्रीवासुदेवरतिकेलिकथासमेतं (श्रीवासुदेवस्य वासुनारायणः सचासौ देवश्चेति विग्रहः; श्रीवसुदेवसुतस्य वा रतिकेलिः सुरतोत्सवः तस्य कथा कीर्त्तनं तत्समेतं) एतं प्रबन्धं (ग्रन्थं) करोति॥२॥ अनुवाद—जिनके चित्त-सदनमें समस्त वाणियोंके नियन्ता श्रीकृष्णकी चरितावली सुचारु रूपसे चित्रित हो रही है, जो श्रीराधाजीके चरणयुगल प्राप्तिकी लालसामें निरन्तर नृत्यविधिके अनुसार निमग्न हो रहे हैं, ऐसे महाकवि जयदेव गोस्वामी श्रीकृष्णकी कुञ्ज-विहारादि सुरत लीला समन्वित इस गीतगोविन्द नामके ग्रन्थका प्रणयन कर भावग्राही भक्तजनोंके उज्ज्वल भक्तिरसको उच्छलित कर रहे हैं॥२॥

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ९ पद्यानुवाद— चारु चरित 'वाणी'के चिन्तित मन-मन्दिरमें जिसके, पद्मावती चरण-चारणसे अङ्ग-अङ्ग सिहरे जिसके। कवि जयदेव रचित है (जिसकी मति-गति अति तल्लीना)— वासुदेव-श्री-केलि-कथामय, यह प्रबन्ध रस-भीना॥२॥ बालबोधिनी—पूर्वश्लोकमें एक पदके द्वारा सूचित श्रीराधामाधवकी लीला स्फूर्तिप्राप्त होनेसे श्रीजयदेवजीका हृदय अतिशय आनन्दसे परिप्लुत हो गया है। उस आनन्दराशिके प्लावनसे प्लावित होकर महान् करुणाके पारावार कवि-चक्रवर्त्ती श्रीजयदेवजी भक्तों पर अनुग्रह प्रकाश करते हुए अपने प्रबन्ध काव्यमें अपनी समर्थता 'वाग्देवता' इति श्लोकके द्वारा अभिव्यक्त करते हुए कह रहे हैं— जयदेवः—जय अर्थात् सर्वोत्कर्षता, देव अर्थात् द्योतयति— प्रकाशयति प्रकाश करते हैं। तात्पर्य यह है कि जो अपनी भक्तिके द्वारा श्रीकृष्णकी लीलाकी सर्वश्रेष्ठता प्रकाशित करते हैं, ऐसे श्रीजयदेवजी। साथ ही यह गीतगोविन्द नामक प्रबन्धकृति प्रकृष्ट रूपसे श्रोताओंके हृदयको आकर्षित करती है अथवा प्रकृष्ट रूपसे कृष्णलीला संसार-बन्धन मुक्त कर भक्तजनोंके हृदयमें उदित होती है। अब प्रश्न होता है कि ग्रन्थमें श्रोताओंके हृदयको आकर्षित करनेकी क्षमता कहाँसे आई? इसके उत्तरमें कहा है कि श्रीवासुदेव रतिकेलि कला समेतम्। यहाँ 'श्री' शब्दसे राधाका तथा वसुदेवके पुत्र रूपमें अवतीर्ण सम्पूर्ण जगत्के स्वामी एवं आत्मास्वरूप भगवान् श्रीकृष्णकी रतिकेलि-कथाका वर्णन है। वासुदेव अर्थात् वसुवंशको प्रकाशित अथवा उज्ज्वल करनेवाले वसुदेव अर्थात् श्रीनन्दमहाराज जो वसुओंमें प्रवर (सर्वश्रेष्ठ) हैं, ऐसे श्रीनन्दजीके पुत्र वासुदेव श्रीकृष्ण हैं। अतः इन दोनोंकी केलि कथाओंसे परिपूर्ण लीलाओंके वर्णनसे श्रीजयदेव कविके हृदयमें ऐसी क्षमता प्रकटित हुई।

१० श्रीगीतगोविन्दम् इस प्रकार यह प्रबन्ध सर्व-चित्ताकर्षक है। इस पदकी व्युत्पत्तिमें श्रीश्च वासुदेवश्च श्रीवासुदेवौ तयो रतिकेलि कथाः ताभिः समेतम्। अब प्रश्न होता है—इस प्रबन्धका वर्णन कैसे हुआ है? इसके उत्तरमें वाणी एवं वक्तव्य रूपमें केलि कलामय देवता, वक्ता एवं प्रवर्त्तक स्वयं श्रीकृष्ण जिनकी चित्तरूपी कन्दरामें सदा अवस्थित हैं, जिनकी इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवता श्रीकृष्ण उनमें शक्तिका सञ्चार करते हैं, ऐसे श्रीजयदेवजी अपने इष्टदेवको वाग्देवताके रूपमें निरूपित कर रहे हैं। अतएव इस काव्यकी रचनामें श्रीकृष्णका ही कर्त्तृत्व है। श्रीजयदेवके चित्त-सद्ममें समस्त लीलाएँ चित्रपटकी भाँति संग्रथित हैं। चित्रकारके हृदयमें जो स्फूर्ति होती है और चित्रफलकमें जो उदित होता है वही चित्ररूपमें बन जाता है, उसी प्रकार यह केलिचित्रण श्रीजयदेवजीकी लेखनी पर अधिष्ठित होकर अंकित हुआ है। कविका चित्तरूपी सद्म विलक्षण है तथा विचित्र कवितारूपी महाधनका भण्डार है और श्रीराधामाधवके केलि-चरित्रोंसे चित्रित है। कविकी वाणी और मन भी माधव परायण है। अतः निज कर्त्तृत्वका उनके द्वारा परित्याग कर दिया गया है। अब पुनः प्रश्न होता है कि यह सब होनेपर भी ऐसी चित्रण-शक्ति कहाँसे आई? इसके उत्तरमें कहते हैं—श्री जयदेवजीकी कायिकी-वृत्ति श्रीराधापरायणा अर्थात् श्रीराधाजीकी प्रेरणा ही उनकी इन्द्रिय शक्ति है। श्रीराधा किस प्रकार उनमें अवस्थित हैं? उत्तरमें—श्रीराधाजी पद्मावती हैं। पद्मं करे अस्ति यस्याः सा—यह पद्मावती शब्दकी व्युत्पत्ति है अर्थात् जिसके हाथमें कमल विद्यमान है, वे श्रीराधाजी ही पद्मावती हैं। इन श्रीराधाजीके चरणकमलोंकी प्राप्तिकी लालसासे चारण चक्रवर्त्ती—नर्त्तक-श्रेष्ठ नट-सार्वभौम श्रीजयदेवजी अपनी

प्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः ११ वाणीरूपी नृत्य-कलाके द्वारा सदा उनकी आराधनामें तत्पर हैं। इस प्रसङ्गसे यह भाव भी व्यक्त हो रहा है कि कविराजजी प्रधान रूपसे श्रीराधाजीके उपासना-परायण हैं। एक और भी गूढ़ रहस्य है कि महाकवि श्रीजयदेवजीकी पत्नीका नाम भी पद्मावती है। वे श्रीराधामाधव युगलकी उच्चकोटिकी प्रेममयी आराधिका हैं। उन श्रीपद्मावतीजीके प्रति भी महाकवि अपनी कृतज्ञता प्रकाश कर रहे हैं। प्रस्तुत श्लोकमें चित्त तथा सद्मका अभेद रूप होनेसे रूपकालङ्कार है तथा अनुज्ञालङ्कार भी। वसन्ततिलका छन्द, ओज गुण, गौड़ीया रीति, भारती वृत्ति तथा संभाविता गीति है॥२॥ यदि हरिस्मरणे सरसं मनो यदि विलासकलासु कुतूहलम्। मधुरकोमलकान्तपदावलीं शृणु तदा जयदेवसरस्वतीम्॥३॥ अन्वय—यदि हरिस्मरणे (श्रीकृष्णचिन्तने) मनः सरसं (रसवत्, स्निग्धमिति यावत्) [कर्त्तुमिच्छेः]; [तथा] यदि विलासकलासु [गतिस्थानासनादीनां मुखनेत्रादिकर्मणाम्। तात्कालि- कन्त्तु वैशिष्ट्यं विलासः प्रियसङ्गजम्॥ इत्युज्ज्वलनीलमणिः। तात्कालिकं दयितालोकनादिभवम्।] (श्रीकृष्णरतिप्रसङ्गेषु रास- कुञ्जादिलीलायाः कलासु वैदग्धीचारुचेष्टासु इत्यर्थः) कुतूहलं (कौतुकं) [स्यात्], तदा (तर्हि) मधुरकोमलकान्तपदावलीं (शृङ्गाररसप्राधान्यात् मधुरा माधुर्यगुणयुक्ताः कोमलाः सरसाः तथा गेयत्वात् कान्ताः मनोज्ञाः पदानाम् आवल्‍यः पङ्क्तयः यस्यां तादृशीं) जयदेव-सरस्वतीं (जयदेववाणीं तत्कृतप्रबन्धमिति यावत्) शृणु॥३॥

१२ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे श्रोताओं ! यदि श्रीहरिके चरित्रका चिन्तन करते हुए आपलोगोंका मन सरस अनुरागमय होता है तथा उनकी रास-विहारादि विलास-कलाओंकी सुचारु चातुर्यमयी चेष्टाके विषयमें आपके हृदयमें कुतूहल होता है तो मनोहर सुमधुर मृदुल तथा कमनीय कान्तिगुणवाले पदसमूह युक्त कवि जयदेवकी इस गीतावलीको भक्ति-भावसे श्रवणकर आनन्दमें निमग्न हो जाएँ। पद्यानुवाद— यदि हरि-चिन्तन-रस आतुर मन, यदि रति-भाव हुलासे। तो मधु कोमलकान्त पदावलि, सुनो, स्वर्ग-सुख भासे ॥३॥ बालबोधिनी—इस प्रबन्ध-काव्यकी रचना करनेमें अपनी योग्यता प्राप्त करते हुए सिद्ध अर्थात् प्रतिज्ञात अर्थके लिए कविके मनमें कोई खेद या विषाद नहीं रहा है। कदाचित् मन्दबुद्धि परायण व्यक्ति इसमें श्रद्धा न रखे, इसलिए इस महाकाव्यके अनुशीलनमें अधिकारीका निश्चय किया गया है। हे भक्तगण ! यदि श्रीकृष्णके निरन्तर स्मरणसे मन स्निग्ध हो जाता है तथा उनकी रास-विहार कुञ्ज-विलास (स्त्रियोंके हाव-भाव विशेषका नाम विलास है, गमनादिकी क्रियाओंको भी विलास कहा जाता है), लीला-चातुरी, विदग्ध-माधुरी आदि चारु-चेष्टाओंके विषयमें मनमें कौतूहल परायणता होती हो तो शृङ्गार रसके वर्णन करनेवाले कवि जयदेवजीकी इस मधुर वाणीका श्रवण करें। वस्तुतः किसीको सामान्य हरिःस्मरणसे और किसीको श्रीहरिकी विशिष्ट रासादि लीलाके अवलोकनसे परानन्दकी अनुभूति होती है। अब यह काव्य कैसा है? इसके उत्तरमें कहते हैं—यह काव्य शृङ्गार-रस प्रधान और अति मधुर है। इसका अर्थ सहज और बोधगम्य है। इस काव्यके पद अतिशय माधुर्य गुणोपेत-कोमल वर्णनोंसे ग्रथित तथा रमणीय

प्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः १३ हैं; क्योंकि वे राधाकृष्णकी कान्ति नामक गुणसे युक्त हैं, जैसे—कान्ता कान्तकी अतिशय प्रिया होती है, वैसे ही यह कमनीय पदावली भक्तजनोंको अतिशय प्रिय है। इससे इसको सङ्गीतात्मकता तथा गेयता प्राप्त है। इसे मधुर कण्ठसे गाया जाना चाहिए। प्राचीन अलङ्कारशास्त्रियोंने माधुर्य नामक गुणको दो प्रकारका बतलाया है— शब्दाश्रित और अर्थाश्रित। वाक्यगत पृथक्पदत्वको शब्दाश्रित माधुर्य कहते हैं तथा उक्तिकी विचित्रताको अर्थगत माधुर्य कहते हैं। ये दोनों प्रकारके माधुर्य इस काव्यमें दृष्टिगोचर होते हैं। शब्द और अर्थगत कोमलता भी इस काव्यमें पायी जाती है। इन पद्योंमें अभिधेय, प्रयोजन तथा अधिकारीका निरूपण हुआ है। श्रीराधामाधवकी रहःकेलि अभिधेय है, प्रतिपाद्य श्रीराधामाधव हैं और प्रतिपादक ग्रन्थ है। यह स्मार्य–स्मारक सम्बन्ध है। श्रीराधामाधवकी केलि–लीलाका श्रवण कीर्त्तन करते हुए अनुमोदनजनित आनन्दका अनुभव और इसमें विभावित अन्तःकरणवाले वैष्णव ही इसके अधिकारी हैं। इस पद्यमें दीपकालङ्कार, पाञ्चाली रीति, कैशिकी वृत्ति तथा द्रुतविलम्बित छन्द है। वाचः पल्लवयत्युमापतिधरः सन्दर्भशुद्धिं गिरां, जानीते जयदेवएव शरणः श्लाघ्यो दुरूह–द्रुते। शृङ्गारोत्तर–सत्प्रमेय– रचनैराचार्य–गोवर्द्धन– स्पर्द्धी कोऽपि न विश्रुतः श्रुतिधरो धोयी कवि–क्ष्मापतिः ॥४॥ अन्वय—उमापतिधरः (तन्नामा कविः) वाचः (वाक्यानि) पल्लवयति, (विस्तारयति; सन्दर्भे वागाडम्बरं प्रदर्शयति, न तु काव्यगुणयुक्ताः करोति) शरणः (तन्नामा कविः) दुरूहद्रुते

१४ श्रीगीतगोविन्दम् (दुरूहस्य दुर्बोधस्य सन्दर्भस्य द्रुते शीघ्रवचने) श्लाघ्यः (प्रशंसनीयः) [नतु प्रसादादिगुणयुक्ते]; शृङ्गारोत्तरसत्प्रमेयरचनैः (शृङ्गारोत्तराणि शृङ्गार-रसप्रधानानि सन्ति उत्कृष्टानि यानि प्रमेयाणि प्रबन्धाः तेषां रचनैः) कोऽपि [कविः] आचार्य-गोवर्द्धन-स्पर्द्धी तेन तुल्यः) न विश्रुतः (न ज्ञातः) [नतु रसान्तर-वर्णने]; [तथा] कवि-क्ष्मापतिः (कविराजः) धोयी (तन्नामा कविः) श्रुतिधरः (श्रुत्या श्रवणमात्रेणैव अभ्यासकर्त्ता इत्यर्थः) नतु [स्वयं कवितारचनायाम्]; [परन्तु] जयदेव एव [नत्वन्यः कोऽपि कविः] गिरां (वाचां) सन्दर्भशुद्धिं (विशुद्धग्रन्थनं) जानीते [अथवा दैन्योक्तिरियम्-गिरां सन्दर्भशुद्धिं किं जयदेव एव जानीते? न जानीते एव; यत्र उमापतिधरो वाचः पल्लवयतीत्यादि ॥४॥ अनुवाद-उमापति धर नामक कोई विख्यात कवि अपनी वाणीको अनुप्रासादि अलङ्कारके द्वारा सुसज्जित करते हैं। शरण नामके कवि अत्यन्त क्लिष्ट पदोंमें कविताका विन्यासकर प्रशंसाके पात्र हुए हैं। सामान्य नायक-नायिकाके वर्णनमें केवल शृङ्गार रसका उत्कर्ष वर्णन करनेमें गोवर्द्धनके समान दूसरा कोई कवि श्रुतिगोचर नहीं हुआ है। कविराज धोयी तो श्रुतिधर हैं। वे जो कुछ भी सुनते हैं, कण्ठस्थ कर लेते हैं। जब ऐसे-ऐसे महान् कवि सर्वगुणसम्पन्न नहीं हो सके, फिर जयदेव कविका काव्य किसप्रकार सर्वगुणसम्पन्न हो सकता है? बालबोधिनी-कवि जयदेवजीने अति दैन्य-विनय वचनोंके द्वारा स्वयंको पद्मावती श्रीराधारानीके चरणकमलोंका चारण चक्रवर्त्ती कहकर अपना परिचय दिया है, उसी आवेशमें अन्य कवियोंकी कृतियोंमें प्राकृत भाव अथवा हेयताकी उपलब्धि कर अपने काव्यमें प्रौढ़ता अर्थात् गाम्भीर्यका विस्तार करते हुए कहते हैं-महाराज लक्ष्मणसेनकी सभामें छह प्रख्यात विद्वान थे। (१) उमापतिधर नामक कवि राजा

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः १५ लक्ष्मणसेनके अमात्य थे, वे केवल अपनी वाणीका विस्तार मात्र करना जानते थे, उनके काव्यमें वाङ्माधुर्य तथा शब्दार्थ गुणोंका अभाव होता था। उन्होंने वाणीको शाखा-प्रशाखाओंमें पल्लवित तो किया, परन्तु ग्राह्य नहीं बना पाये थे, फलतः उनका काव्य सहृदय स्वरूपा ह्लादक अर्थात् आनन्ददायिनी न होकर केवल चित्रकोटिके काव्यमें सन्निविष्ट होता था। (२) शरण नामके कवि दुरूह तथा शीघ्रतापूर्वक कविताका प्रणयन करनेके लिए प्रख्यात थे। वे लोकप्रिय तो हुए, परन्तु उनका भी काव्य गूढार्थत्वादि दोषोंसे युक्त एवं प्रसादादि गुणोंसे रहित होता था। (३) गोवर्द्धनाचार्य लक्ष्मणसेनकी सभाके तीसरे पण्डित थे। शृङ्गार-रस जो क्रमशः अन्यान्य रसोंसे श्रेष्ठ है—ऐसे उसके आलम्बन स्वरूप साधारण नायक-नायिकाके वर्णन करनेमें आचार्य गोवर्द्धनका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं हुआ। परन्तु वे रसान्तर अर्थात् दूसरे-दूसरे रसोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हो सके। उनके काव्यमें निर्दोष अर्थका सन्निवेश होता था। (४) श्रुतिधर नामक कवि तो अपने गुणोंके कारण ही प्रसिद्ध थे। वे केवल एकबार सुनकर ही काव्यको याद कर लेते थे। (५) धोयी कवि अपनी कविराजकी प्रथासे प्रसिद्ध थे। ग्रन्थके अधिकारी बन तो जाते थे, परन्तु स्वयं कविताका निर्माण नहीं कर पाते थे। (६) लक्ष्मणसेनकी सभाके छठे कवि जयदेव थे। वाणीकी शुद्धि केवल भगवान्‌के नाम, रूप, गुण एवं लीला आदिके वर्णनसे होती है। इस वाणी-शोधनकी प्रथा एकमात्र कवि जयदेव ही जानते हैं। श्रीमद्भागवतमें श्रीनारदजी कह रहे हैं—“तद्वाग् विसर्गो जनताघविप्लवो”। अथवा कविने स्वयं दैन्य प्रकट किया है, तदनुसार इस श्लोकका भावार्थ होगा कि क्या वाणीकी शुद्धि कवि जयदेव जानते हैं? नहीं, वे नहीं जानते।

१६ श्रीगीतगोविन्दम् उमापति वाणीका विस्तारकर सकते हैं, शरण कवि दुरूह वाक्योंको शीघ्र रचित करनेके लिए प्रसिद्ध हैं, आचार्य गोवर्द्धनके समान कोई कवि हुआ ही नहीं, धोयी कविराज हैं, श्रुतिधर तो श्रुतिधर ही हैं, परन्तु जयदेव कवि कुछ नहीं जानते। रसमञ्जरीकार लक्ष्मणसेनकी सभाके पाँच कवियोंको ही स्वीकार करते हैं और वे 'श्रुतिधरः' पदको कवि-विशेषकी संज्ञा न मानकर उसे धोयी कविका ही विशेषण मानते हैं। इस विषयमें उनका कहना है कि धोयी कवि तो किसी काव्यको एक बार सुनने मात्रसे ही उसे कण्ठस्थ कर लेते हैं। वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वतीजीने प्रमाणित किया है कि पूर्वोक्त भावार्थ ही ठीक है। भगवान्‌की लीलाओंके वर्णनके कारण यह रचना समस्त प्रकारके काव्योंमें श्रेष्ठ है। यह गीति-काव्य अति महत्वपूर्ण, सरस, गोपनीय एवं मधुर है। इस श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द तथा समुच्चयालङ्कार है ॥४॥ अथ प्रथमः सन्दर्भः। अष्टपदी गीतम् ॥१॥ मालवगौड़रागेण रूपकतालेन च गीयते ॥प्रबन्धः ॥१॥ प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं विहितवहित्रचरित्रमखेदम् । केशव धृत-मीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ध्रुवपदम् ॥१॥

प्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः १७ क्षितिरतिविपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे धरणि–धरणकिण–चक्रगरिष्ठे । केशव धृत–कूर्मशरीर जय जगदीश हरे ॥२ ॥ वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना। केशव धृत–शूकररूप जय जगदीश हरे ॥३ ॥ तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम् दलितहिरण्यकशिपु–तनुभृङ्गम्। केशव धृत–नरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥४ ॥ छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन पद–नख–नीर–जनितजनपावन। केशव धृत–वामनरूप जय जगदीश हरे ॥५ ॥ क्षत्रिय–रुधिरमये जगदपगत–पापम् स्नपयसि पयसि शमित–भवतापम्। केशव धृत–भृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥६ ॥ वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति–कमनीयं दशमुख–मौलि–बलिं रमणीयम्। केशव धृत–रामशरीर जय जगदीश हरे ॥७ ॥ वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् हलहति–भीति–मिलित–यमुनाभम्। केशव धृत–हलधररूप जय जगदीश हरे ॥८ ॥

१८ श्रीगीतगोविन्दम् निन्दसि यज्ञ-विधेरहह श्रुतिजातम् सदय-हृदय दर्शितपशुघातम्। केशव धृत-बुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥९॥ म्लेच्छ-निवहनिधने कलयसि करवालं धूमकेतुमिव किमपि करालम्। केशव धृत-कल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥१०॥ श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् शृणु सुखदं शुभदं भवसारम्। केशव धृत-दशविधरूप जय जगदीश हरे ॥११॥ वेदानुद्धरते जगन्ति वहते भूगोलमुद्बिभ्रते दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते। पौलस्तं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते म्लेच्छान् मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः ॥१२॥ प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं विहितवहित्रचरित्रमखेदम् । केशव धृत-मीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ध्रुवपदम् ॥१॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-मीनशरीर ! (स्वीकृत-मत्स्य- कलेवर) त्वं प्रलयपयोधिजले (कल्पान्तसागर-सलिले) विहित- वहित्रचरित्रम् (विहितं स्वीकृतम् अवलम्बितमिति यावत् वहित्रस्य अर्णवपोतस्य चरित्रं व्यवहारो यस्मिन् तद्यथा स्यात् तथा) अखेदं (अनायासं यथा स्यात् तथा) वेदं धृतवानसि (रक्षितवानसि) [अतः] हे जगदीश, हे हरे, (हरति भक्तानामशेषक्लेशमिति हरिः तत्सम्बुद्धौ) त्वं जय (सर्वोत्कर्षे वर्त्तस्व) ॥१॥