विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
हरिवंशपर्व ] नवमोऽध्यायः ३७
कुरुवंशी राजन् ! तपानेवालोंमें श्रेष्ठ आदित्यने संज्ञाके गर्भसे दो प्रजापति और एक कन्या—इन तीन संतानोंको उत्पन्न किया ॥ ७ ॥
मनुर्वैवस्वतः पूर्वं श्राद्धदेवः प्रजापतिः।
यमश्च यमुना चैव यमजौ सम्बभूवतुः ॥ ८ ॥
उनमें एक प्रजापति तो विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु थे और दूसरे प्रजापति श्राद्धदेव यम थे। इस तरह यम तथा यमुना नामक दो जुड़वीं संतान उत्पन्न हुई थी ॥
सा विवर्णं तु तद्रूपं दृष्ट्वा संज्ञा विवस्वतः।
असहन्ती च स्वां छायां सवर्णां निर्ममे ततः ॥ ९ ॥
तदनन्तर संज्ञाने सूर्यके कठिनतासे सहने योग्य तेजस्वी रूपको देखकर उनके तेजको न सह सकनेके कारण अपनी छायाको ही अपने समान नाम और रूपवाली बनाकर तैयार कर दिया* ॥ ९ ॥
मायामयी तु सा संज्ञा तस्याश्छाया समुत्थिता।
प्राञ्जलिः प्रणता भूत्वा छाया संज्ञां नरेश्वर ॥ १० ॥
उवाच किं मया कार्यं कथयस्व शुचिस्मिते।
स्थितास्मि तव निर्देशे शाधि मां वरवर्णिनि ॥ ११ ॥
वह मायामयी संज्ञा संज्ञाकी छायासे उत्पन्न हुई थी। नरेश्वर ! वह छाया संज्ञाको प्रणामकर हाथ जोड़कर बोली—'शुचिस्मिते ! बताओ, मुझे क्या करना चाहिये? श्रेष्ठ अङ्गोंवाली ! मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगी, तुम मुझे आज्ञा दो' ॥
संज्ञोवाच
अहं यास्यामि भद्रं ते स्वमेव भवनं पितुः।
त्वयेह भवने मह्यं वस्तव्यं निर्विकारया ॥ १२ ॥
इमौ च बालकौ मह्यं कन्या चेयं सुमध्यमा।
सम्भाव्यास्ते न चाख्येयमिदं भगवते क्वचित् ॥ १३ ॥
संज्ञाने कहा—तुम्हारा कल्याण हो ! मैं अब अपने पिताके घर जा रही हूँ, तुम मेरे इस घरमें शान्त होकर रहो। ये मेरे दोनों पुत्र हैं और यह एक सुमध्यमा (सुन्दर कटिवाली) कन्या है। इनका तू ध्यान रखना और इस रहस्यको भगवान् सूर्यसे कभी न बतलाना ॥ १२-१३ ॥
छायोवाच
आ कचग्रहणाद् देवि आ शापान्नैव कर्हिचित्।
आख्यास्यामि मतं तुभ्यं गच्छ देवि यथासुखम् ॥ १४ ॥
छायाने कहा—देवि ! मेरे बाल पकड़े जाने तथा शाप देनेकी नौबत आनेके पूर्व मैं यह बात किसी प्रकार भी न कहूँगी। आप सुखपूर्वक (अपने पिताके यहाँ) जायँ ॥
वैशम्पायन उवाच
समादिश्य सवर्णां तां तथेत्युक्ता च सा तया।
त्वष्टुः समीपमगमद् व्रीडितेव तपस्विनी ॥ १५ ॥
पितुः समीपगा सा तु पित्रा निर्भर्त्सिता तदा।
भर्तुः समीपं गच्छेति नियुक्ता च पुनः पुनः ॥ १६ ॥
अगच्छद् वडवा भूत्वा ऽऽच्छाद्य रूपमनिन्दिता।
कुरूनथोत्तरान् गत्वा तृणान्येव चचार ह ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—अपने समान नाम-रूपवाली छायाको आज्ञा देकर और उससे 'तथास्तु' कहे जानेपर वह तपस्विनी लज्जित-सी होती हुई अपने पिता त्वष्टाके यहाँ चली गयी। पिताके पास पहुँचनेपर उसके पिताने उसे बड़े जोरों-से डाँटा तथा उससे बार-बार पतिके पास ही जानेके लिये कहा। तब निन्दित कर्मोंसे सदा दूर रहनेवाली वह संज्ञा अपने रूपको बदलकर घोड़ीका रूप धारण करके उत्तरकुरुके देशोंमें जाकर घास चरने लगी ॥ १५-१७ ॥
द्वितीयायां तु संज्ञायां संज्ञेयमिति चिन्तयन्।
आदित्यो जनयामास पुत्रमात्मसमं तदा ॥ १८ ॥
उस दूसरी संज्ञाको भी संज्ञा ही समझते हुए सूर्य देवताने उसके गर्भसे अपने ही समान पुत्र उत्पन्न किया ॥ १८ ॥
पूर्वजस्य मनोस्तात सदृशोऽयमिति प्रभुः।
सवर्णत्वात्मनोर्भूयः सावर्णि इति चोक्तवान् ॥ १९ ॥
तात ! ये अपने बड़े भाई मनुके समान वर्ण तथा शक्तिवाले थे, अतएव सावर्णि कहलाये ॥ १९ ॥
मनुरेवाभवन्नाम्ना सावर्णि इति चोच्यते।
द्वितीयो यः सुतस्तस्याः स विज्ञेयः शनैश्चरः ॥ २० ॥
वे ही मनु हुए, जिनका नाम सावर्णि मनु है। उस (छाया) से जो दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ, उनको तुम शनैश्चर समझो ॥ २० ॥
संज्ञा तु पार्थिवी तात स्वस्य पुत्रस्य वै तदा।
चकाराभ्यधिकं स्नेहं न तथा पूर्वजेषु वै ॥ २१ ॥
मनुस्तस्याक्षमत्तत्तु यमस्तस्या न चक्षमे।
वह पार्थिवी* संज्ञा अपने पुत्रसे तो अधिक स्नेह करती थी, परंतु वैसा स्नेह उनसे पहलेकी संतानोंसे नहीं करती थी। मनुने तो इस बातको सह लिया, परंतु यम इसे न सह सके ॥ २१½ ॥
तां स रोषाच्च बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य वै बलात्।
* संज्ञाके समान नाम और वर्णवाली होनेसे छायाका नाम सवर्णा भी है। इसीके पुत्र सावर्णि मनु हैं।
* संज्ञाकी छायाके पृथ्वीमें पड़नेके कारण वह पृथ्वीसे उत्पन्न हुई, अतएव 'पार्थिवी' कहलाती थी।
३८ . श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
पदा संतर्जयामास संज्ञां चैवस्ततो यमः ॥ २२ ॥
वे वैवस्वत यम बालस्वभाव एवं रोषके कारण तथा होनहार (भावी) के वशीभूत हो संज्ञाको पैर दिखाकर डाँटने लगे ॥ २२ ॥
तं शशाप ततः क्रोधात् सावर्णिजननी नृप।
चरणः पततामेष तवेति भृशदुःखिता ॥ २३ ॥
राजन् ! इसपर सावर्णीकी माताने अति दुःखित हो कोपमें भरकर उन्हें शाप दिया कि 'तुम्हारा यह चरण गिर जाय' ॥ २३ ॥
यमस्तु तत् पितुः सर्वं प्राञ्जलिः प्रत्यवेदयत् ।
भृशं शापभयोद्विग्नः संज्ञावाक्यप्रतोदितः ॥ २४ ॥
छाया-संज्ञाके उस वाक्यसे पीड़ित और शापके भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर यमने हाथ जोड़कर पितासे वह सब बात कह दी ॥
शापोऽयं विनिवर्तेत प्रोवाच पितरं तदा ।
मात्रा स्नेहेन सर्वेषु वर्तितव्यं सुतेषु वै ॥ २५ ॥
वे पितासे बोले—'मुझे यह शाप न लगे । ( देखिये ) माताको तो सब पुत्रोंके प्रति समानरूपसे स्नेहपूर्वक व्यवहार करना चाहिये ॥ २५ ॥
सेयमस्मानपाहाय यवीयांसं बुभूपति ।
तस्यां मयोद्यतः पादो न तु देहे निपातितः ॥ २६ ॥
बाल्याद्वा यदि वा मोहात् तद्भवान् क्षन्तुमर्हति ।
'पर यह हम सबको छोड़कर सबसे छोटेसे ही स्नेहका व्यवहार करती है। सो मैंने उसके ऊपर पैर उठाया ही था, शरीरपर मारा नहीं था। मैंने यह काम लड़कपनसे किया हो अथवा मोहवश, परंतु आप मुझे क्षमा कर दें ॥ २६½ ॥
यस्मात् ते पूजनीयाहं लङ्घितास्मि त्वया सुत ॥ २७ ॥
तस्मात् तवैष चरणः पतिष्यति न संशयः ।
अपत्यं दुरपत्यं स्यान्नाम्बा कुजननी भवेत् ॥ २८ ॥
'(संज्ञाने कहा—) बेटा ! मैं तुम्हारी पूजनीया हूँ, तो भी तुमने मेरा तिरस्कार किया है, अतः तुम्हारा यह पैर निस्सन्देह गिर जायगा ।' संतान तो कुसंतान हो सकती है, परंतु माता कुमाता नहीं हो सकती ॥ २७-२८ ॥
शप्तोऽहमस्मि लोकेश जनन्या तपतां वर ।
तव प्रसादाच्चरणो न पतेन्मम गोपते ॥ २९ ॥
'लोकेश्वर ! माताने मुझे शाप दे दिया है, परंतु तपनेवालोंमें श्रेष्ठ गोपते ! आपकी कृपासे मेरा पैर न गिरे(ऐसी कृपा कीजिये )' ॥ २९ ॥
विवस्वानुवाच
असंशयं पुत्र महत् भविष्यत्यत्र कारणम् ।
येन त्वामाविशत् क्रोधो धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ॥ ३० ॥
सूर्यने कहा—पुत्र ! तुम धर्मज्ञ और सत्यवादी हो, तुमको जो क्रोध चढ़ आया इसमें निस्संदेह कोई बड़ा भारी कारण होगा ॥ ३० ॥
न शक्यमन्यथा कर्तुं मया मातुर्वचस्तव ।
कृमयो मांसमादाय यास्यन्ति धरणीतलम् ॥ ३१ ॥
तव पादान्महाप्राज्ञ ततस्त्वं प्राप्स्यसे सुखम् ।
कृतमेवं वचस्तथ्यं मातुस्तव भविष्यति ॥ ३२ ॥
शापस्य परिहारेण त्वं च त्रातो भविष्यसि ।
मैं तुम्हारी माताके वचनको ( सर्वथा तो ) लौटा नहीं सकता। ( पर ) महाप्राज्ञ ! कीड़े तुम्हारे चरणमेंसे मांस लेकर पृथ्वीतलपर चले जायेंगे, तब तुम्हें सुख मिलेगा । इस प्रकार तुम्हारी माताका कहा हुआ वचन ( भी ) सत्य हो जायगा और शापका परिहार होनेसे तुम्हारी भी रक्षा हो जायगी ॥ ३१-३२½ ॥
आदित्योऽथाब्रवीत् संज्ञां किमर्थं तनयेषु वै ॥ ३३ ॥
तुल्येष्वभ्यधिकः स्नेहः क्रियतेऽति पुनःपुनः ।
सा तत्परिहसन्ती तु नाचचक्षे विवस्वते ॥ ३४ ॥
फिर सूर्यने संज्ञासे कहा—'सभी पुत्र बराबर हैं, तो भी तू (किसीसे कम और किसीसे ) अधिक स्नेह क्यों करती है।' सूर्यने यह बात बार-बार कही, परंतु वह हँसती ही रह गयी और उसने सूर्यसे कुछ भी न कहा ॥ ३३-३४ ॥
आत्मानं सुसमाधाय योगात् तथ्यमपश्यत ।
तां शप्तुकामो भगवान् नाशाय कुरुनन्दन ॥ ३५ ॥
मूर्धजेषु च जग्राह समयेऽतिगतेऽपि च ।
सा तत् सर्वं यथावृत्तमाचचक्षे विवस्वते ॥ ३६ ॥
कुरुनन्दन ! भगवान् सूर्यने अपने चित्तको एकाग्र करके योगके द्वारा सत्य बात जान ली और शापद्वारा उसका विनाश करनेके लिये उसके केश पकड़ लिये । तब अपनी शपथके उतर जानेपर छायाने सूर्यनारायणसे सारी बात ज्यों-की-त्यों बतला दी ॥ ३५-३६ ॥
विवस्वांश्च तच्छ्रुत्वा क्रुद्धस्त्वष्टारमभ्यगात् ।
त्वष्टा तु तं यथा न्यायमर्चयित्वा विभावसुम् ।
निर्दग्धुकामं रोषेण सान्त्वयामास वै तदा ॥ ३७ ॥
सूर्यनारायण इस बातको सुनते ही क्रोधमें भरकर त्वष्टाके पास पहुँचे । त्वष्टाने विधिपूर्वक उनकी पूजा करके जब देखा कि ये तो रोषसे मुझे भस्म ही करना चाहते हैं, तब उन्होंने सूर्यनारायणको इस प्रकार शान्त करना-समझाना आरम्भ किया ॥ ३७ ॥
त्वष्टोवाच
तवातितेजसाक्षिप्तमिदं रूपं न शोभते ।
असहन्ती च तत् संज्ञा वने चरति शाद्वले ॥ ३८ ॥
हरिवंशपर्व ] नवमोऽध्यायः ३९
त्वष्टाने कहा—आदित्य ! आपका यह अतितेजस्वी रूप अच्छा नहीं लगता। इसको न सह सकनेके कारण ही संज्ञा हरी घासवाले वनमें (हरी घासोंको) चर रही है ॥ ३८ ॥
द्रष्टा हि तां भवानद्य स्वां भार्यां शुभचारिणीम् ।
नित्यं तपस्यभिरतां वडवारूपधारिणीम् ॥ ३९ ॥
पर्णाहारां कृशां दीनां जटिलां ब्रह्मचारिणीम् ।
हस्तिहस्तपरिक्षिप्तां व्याकुलां पद्मिनीमिव ।
श्लाघ्यां योगबलोपेतां योगमास्थाय गोपते ॥ ४० ॥
किरणोंके स्वामी ! आज आप हाथीके सूँडसे खींचे जानेके कारण पद्मिनीके समान व्याकुल हुई, शुद्ध आचरणवाली और योगके बलसे सम्पन्न अतएव योगसे घोड़ीका रूप धारण करके सदा तप करती हुई, पत्तोंका आहार करनेवाली, दुबली, दीन, जटाधारिणी और ब्रह्मचारिणी अपनी उस प्रशंसनीया भार्याको देखेंगे ॥ ३९-४० ॥
अनुकूलं तु देवेश यदि स्यान्मम तन्मतम् ।
रूपं निर्वर्त्तयाम्यद्य तव कान्तमरिंदम ॥ ४१ ॥
देवेश ! यदि आपको मेरी बात ठीक लगे तो शत्रुदमन ! मैं आज आपके रूपको मनोहर बना दूँ ॥ ४१ ॥
रूपं विषमतश्चासीत् तिर्यगूर्ध्वसमं तु वै ।
तेनासौ सम्भृतो देवरूपेण तु विभावसुः ॥ ४२ ॥
पहले सूर्यका रूप तिरछा, ऊँचा और सब ओरसे एक-सा था। उस रूपसे सम्पन्न होनेके कारण ही वे विभावसु कहे जाते हैं ॥ ४२ ॥
तस्मात्त्वष्टुः स वै वाक्यं बहु मेने प्रजापतिः ।
समनुज्ञातवांश्चैव त्वष्टारं रूपसिद्धये ॥ ४३ ॥
इसलिये उन प्रजापति सूर्यनारायणने त्वष्टाकी बातको बहुत अच्छा समझा और उन्होंने अपना रूप ठीक करनेके लिये त्वष्टाको अनुमति दे दी ॥ ४३ ॥
ततोऽभ्युपगमात् त्वष्टा मार्तण्डस्य विवस्वतः ।
भ्रमिमारोप्य तत् तेजः शातयामास भारत ॥ ४४ ॥
भारत ! तब त्वष्टाने मार्तण्ड (सूर्य) के समीप जाकर उनको सानपर चढ़ाकर उनके तेजको खरादना आरम्भ कर दिया ॥ ४४ ॥
ततो निर्भासितं रूपं तेजसा संहृतेन वै ।
कान्तात् कान्तरं द्रष्टुमधिकं शुशुभे तदा ॥ ४५ ॥
इस प्रकार तेजके छिल जानेसे उनका रूप खिल उठा और उनका रूप रम्यातिरम्य होकर अधिक सुशोभित होने लगा ॥ ४५ ॥
मुखे निर्वर्तितं रूपं तस्य देवस्य गोपतेः ।
ततः प्रभृति देवस्य मुखमासीत् तु लोहितम् ।
मुखरागं तु यत्पूर्वं मार्तण्डस्य मुखच्युतम् ॥ ४६ ॥
आदित्या द्वादशैवेह सम्भूता मुखसम्भवाः ।
धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोऽशो भगस्तथा ॥ ४७ ॥
इन्द्रो विवस्वान् पूषा च पर्जन्यो दशमस्तथा ।
ततस्त्वष्टा ततो विष्णुरजघन्यो जघन्यजः ॥ ४८ ॥
तबसे किरणोंके स्वामी भगवान् सूर्यके मुखका रूप बदल गया । उस समयसे उनका मुख रक्तवर्णका हो गया । उन मार्तण्डके मुखसे जो मुखराग छूटा था, उससे बारह आदित्य उत्पन्न हुए । उनके मुखसे धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, दसवें पर्जन्य, त्वष्टा, बारहवें विष्णु उत्पन्न हुए, जो अन्तमें प्रकट होनेके कारण सबसे छोटे होकर भी गुणोंमें सर्वश्रेष्ठ थे ॥ ४६–४८ ॥
हर्षे लेभे ततो देवो दृष्ट्वाऽऽदित्यान् स्वदेहजान् ।
गन्धैः पुष्पैरलङ्कारैर्भासता मुकुटेन च ॥ ४९ ॥
गन्ध, पुष्प, अलंकार और प्रकाशमान मुकुटोंसे सुशोभित अपने शरीरसे उत्पन्न हुए उन आदित्योंको देखकर भगवान् सूर्य बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४९ ॥
एवं सम्पूजयामास त्वष्टा वाक्यमुवाच ह ।
गच्छ देव निजां भार्यां कुरुंश्चरति सोत्तरान् ॥ ५० ॥
वडवारूपमास्थाय वने चरति शाद्वले ।
इस प्रकार सूर्यनारायणका पूजन कर त्वष्टाने उनसे कहा—'देव ! अब आप अपनी पत्नीके पास जाइये । वह उत्तर कुरु (देशों) में भ्रमण कर रही है और हरी घाससे भरे हुए वनमें घोड़ीका रूप धारण करके विचर रही है' ॥
स तथा रूपमास्थाय स्वभार्यारूपलीलया ॥ ५१ ॥
ददर्श योगमास्थाय स्वां भार्यां वडवां ततः ।
अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा नियमेन च ॥ ५२ ॥
वडवावपुषा राजंश्चरन्तीमकुतोभयाम् ।
सोऽश्वरूपेण भगवांस्तां मुखे समभावयत् ॥ ५३ ॥
मैथुनाय विचेष्टन्ती परपुंसोपशङ्कया ।
सा तन्निरवमच्छुक्रं नासिकायां विवस्वतः ॥ ५४ ॥
तब सूर्यनारायणने भी अपनी पत्नीके रूपके अनुसार घोड़ेके समान विचरण करनेके लिये घोड़ेका ही रूप धारण कर लिया । उस समय सूर्यने ध्यानसे देखा तो उन्हें तेज और नियमके कारण सब भूतोंसे अधृष्य घोड़ीका रूप धारण करके किसी ओरसे भी भयकी आशंका न कर निर्भय हो विचरती हुई अपनी भार्या (संज्ञा) दीख पड़ी। राजन्! फिर तो घोड़ेके रूपमें भगवान् सूर्य उसके मुखके समीप पहुँचे । पर वह पर-पुरुषकी आशंकासे मैथुनके प्रतिकूल चेष्टा करने लगी और सूर्यके वीर्यको उसने अपनी नाकपरसे गिरा दिया ॥ ५१–५४ ॥
| ४० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
देवौ तस्यामजायेतामश्विनौ भिषजां वरौ।
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनाविति ॥ ५५ ॥
उससे वैद्योंमें श्रेष्ठ अश्विनीकुमार नामक देवता उत्पन्न हुए। वे दोनों अश्विनीकुमार नासत्य और दस्र नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ५५ ॥
मार्तण्डस्यात्मजावेतावष्टमस्य प्रजापतेः।
संज्ञायां जनयामास वडवायां स भारत।
तां तु रूपेण कान्तेन दर्शयामास भास्करः ॥ ५६ ॥
भारत! ये दोनों आठवें प्रजापति मार्तण्डके पुत्र हैं। इन्हें सूर्य भगवान्ने अश्वरूपा संज्ञाके गर्भसे उत्पन्न किया था। तदनन्तर सूर्यने उसे अपने मनोहर रूपमें दर्शन दिया ॥ ५६ ॥
सा च दृष्ट्वैव भर्तारं तुतोष जनमेजय।
यमस्तु कर्मणा तेन भृशं पीडितमानसः ॥ ५७ ॥
जनमेजय! तब वह स्वामीको देखकर बड़ी संतुष्ट हुई। इधर यम अपने उस कर्मसे मन-ही-मन बड़े दुःखित रहते थे ॥ ५७ ॥
धर्मेण रञ्जयामास धर्मराज इह प्रजाः।
स लेभे कर्मणा तेन परमेण महाद्युतिः ॥ ५८ ॥
पितॄणामाधिपत्यं च लोकपालत्वमेव च।
मनुः प्रजापतिस्त्वासीत् सावर्णः स तपोधनः ॥ ५९ ॥
अतएव वे अपने धर्मराजत्वके अनुरूप ही धर्मयुक्त आचरणसे प्रजाओंको प्रसन्न रखने लगे। उस श्रेष्ठ कर्मके कारण उन महाकान्तिमान् धर्मराजको पितरोंका आधिपत्य और लोकपालका पद मिला तथा वे तपस्याके धनी प्रजापति सावर्ण मनु हुए ॥ ५८-५९ ॥
भाव्यः सोऽनागते काले मनुः सावर्णिकेऽन्तरे।
मेरुपृष्ठे तपो घोरमद्यापि चरति प्रभुः ॥ ६० ॥
वे सर्वसमर्थ सावर्ण भविष्यके (आठवें) मन्वन्तरके मनु होंगे। वे आज भी सुमेरुपर्वतके शिखरपर घोर तप कर रहे हैं ॥ ६० ॥
भ्राता शनैश्चरश्चास्य ग्रहत्वमुपलब्धवान्।
नासत्यौ यौ समाख्यातौ स्वर्वैद्यौ तौ बभूवतुः ॥ ६१ ॥
इनके भाई शनैश्चर ग्रह बन गये और जिन नासत्योंका वर्णन किया है, वे स्वर्गके वैद्य बन गये ॥ ६१ ॥
सेवतोऽपि तथा राजन्नश्वानां शान्तिदोऽभवत्।
त्वष्टा तु तेजसा तेन विष्णोश्चक्रमकल्पयत् ॥ ६२ ॥
तदप्रतिहतं युद्धे दानवान्तचिकीर्षया।
वे उपासना करनेवालेके घोड़ोंको शान्ति देते हैं। उसी तेज (की छीलन) से त्वष्टाने विष्णु भगवान्का (सुदर्शन) चक्र बनाया। वह दानवोंके अन्त करनेकी इच्छासे बनाया गया चक्र युद्धमें किसी प्रकार भी व्यर्थ नहीं जाता ॥ ६२ १/२ ॥
यवीयसी तयोर्या तु यमी कन्या यशस्विनी ॥ ६३ ॥
अभवत् सा सरिच्छ्रेष्ठा यमुना लोकभाविनी।
मनुरित्युच्यते लोके सावर्ण इति चोच्यते ॥ ६४ ॥
उन दोनोंमें छोटी जो यमी नामकी यशस्विनी कन्या थी, वह नदियोंमें श्रेष्ठ, लोकोंको पवित्र करनेवाली यमुना हुई। मनु संसारमें मनु कहलाते हैं और सावर्ण भी कहलाते हैं ॥ ६३-६४ ॥
द्वितीयो यः सुतस्तस्य मनोर्भ्राता शनैश्चरः।
ग्रहत्वं स च लेभे वै सर्वलोकाभिपूजितम् ॥ ६५ ॥
उनके दूसरे पुत्र और मनुके भ्राता जो शनैश्चर हैं, उन्होंने सब लोकोंसे पूजित ग्रहका पद प्राप्त किया ॥ ६५ ॥
य इदं जन्म देवानां शृणुयाद् वापि धारयेत्।
आपद्भ्यः स विमुच्येत प्राप्नुयाच्च महद्यशः ॥ ६६ ॥
जो मनुष्य देवताओंके जन्म (की इस कथा) को सुनता है अथवा मनमें धारण करता है, वह आपत्तियोंसे छूट जाता और बड़ा भारी यश पाता है ॥ ६६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि वैवस्वतोत्पत्तौ नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें वैवस्वत मनु (आदि) की उत्पत्तिविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
दशमोऽध्यायः
वैवस्वत मनुके वंशजोंका वर्णन और पुरूरवाकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
मनोर्वैवस्वतस्यासन् पुत्रा वै नव तत्समाः। नरिष्यंश्च तथा प्रांशुर्नाभागारिष्टसप्तमाः।
इक्ष्वाकुश्चैव नाभागो धृष्णुः शर्यातिरेव च ॥ १ ॥ करूषश्च पृषध्रश्च नवैते भरतर्षभ ॥ २ ॥
हरिवंशपर्व ] दशमोऽध्यायः ४१
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतर्षभ! वैवस्वत मनुके उनके ही समान इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्णु, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रांशु, सातवें नाभागारिष्ट, करुष और पृषध्र—ये नौ पुत्र हुए ॥ १-२ ॥
अकरोत् पुत्रकामस्तु मनुरिष्टिं प्रजापतिः।
मित्रावरुणयोस्तात पूर्वमेव विशांपते ॥ ३ ॥
अनुत्पन्नेषु नवसु पुत्रेष्वेतेषु भारत।
तस्यां तु वर्तमानायामिष्ट्यां भरतसत्तम ॥ ४ ॥
मित्रावरुणयोरंशे मुनिराहुतिमाजुहोत्।
आहुत्यां हूयमानायां देवगन्धर्वमानुषाः ॥ ५ ॥
तुष्टिं तु परमां जग्मुर्मुुनयश्च तपोधनाः।
अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य श्रुतमद्भुतम् ॥ ६ ॥
प्रजापालक तात! इन नौ पुत्रोंके उत्पन्न होनेसे पहिले प्रजापति मनुने पुत्रकी कामनासे मित्रावरुणकी इष्टि (यज्ञ) की थी। भारत! जब यह इष्टि हो रही थी, उस समय मुनिने मित्रावरुणके लिये आहुति दी। भरतश्रेष्ठ! आहुतिके सम्पन्न होनेपर देवता, गन्धर्व, मनुष्य और तपोधन मुनि परम प्रसन्न हुए (और कहने लगे—) 'अहो! इसका तपोबल आश्चर्यजनक है और इसका शास्त्रीय ज्ञान भी अद्भुत है!' ॥ ३-६॥
तत्र दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता।
दिव्यसंहनना चैव इला जज्ञे इति श्रुतिः ॥ ७ ॥
उस यज्ञमें दिव्य वस्त्रोंको धारण किये हुए, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित और दिव्य शरीरवाली इला नामक कन्या उत्पन्न हुई थी, ऐसी ख्याति है ॥ ७ ॥
तामिलेत्येव होवाच मनुर्दण्डधरस्तदा।
अनुगच्छस्व मां भद्रे तमिला प्रत्युवाच ह।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं पुत्रकामं प्रजापतिम् ॥ ८ ॥
राजा मनुने उस कन्याको 'इला' कहकर पुकारा और कहा—'भद्रे! तू मेरे पीछे-पीछे आ।' तब पुत्रकी कामनावाले प्रजापतिको इलाने यह धर्ममय उत्तर दिया॥ ८॥
इलोवाच
मित्रावरुणयोरंशे जातास्मि वदतां वर।
तयोः सकाशं यास्यामि न मां धर्मो हतोऽवधीत्॥ ९ ॥
इलाने कहा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ! मैं धर्मकी हत्या नहीं कर सकती, अन्यथा धर्म मुझे भी मार डालेगा। मैं मित्रावरुणके अंशसे उत्पन्न हुई हूँ; अतः उनके ही पास जाऊँगी ॥९॥
सैवमुक्त्वा मनुं देवं मित्रावरुणयोरिला।
गत्वांतिकं वरारोहा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १० ॥
श्रेष्ठ नितम्बोंवाली इला राजा मनुसे इस प्रकार कहकर मित्रावरुणके पास गयी और दोनों हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहने लगी—॥ १० ॥
अंशेऽस्मि युवयोर्जाता देवौ किं करवाणि वाम्।
मनुना चाहमुक्ता वै अनुगच्छस्व मामिति ॥ ११ ॥
'देवताओ! मैं आप दोनोंके अंशसे उत्पन्न हुई हूँ; अतः आपलोग बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मनुजीने मुझसे कहा है कि तू मेरे पीछे-पीछे आ' ॥११॥
तां तथावादिनीं साध्वीमिलां धर्मपरायणाम्।
मित्रश्च वरुणश्चोभावूचतुर्यन्निबोध तत् ॥ १२ ॥
राजन्! धर्मपरायणा साध्वी इलाके इस प्रकार कहनेपर मित्र और वरुणने उससे जो कुछ कहा था, उसे सुनो ॥ १२ ॥
अनेन तव धर्मेण प्रश्रयेण दमेन च।
सत्येन चैव सुश्रोणि प्रीतौ स्वो वरवर्णिनि ॥ १३ ॥
'सुन्दर कटिभागवाली सुन्दरी! तेरे इस धर्म, विनय, इन्द्रियसंयम और सत्यसे हम दोनों तुमपर बहुत प्रसन्न हैं ॥१३॥
आवयोस्त्वं महाभागे ख्यातिं कन्येति यास्यसि।
मनोर्वंशधरः पुत्रस्त्वमेव च भविष्यसि ॥ १४ ॥
'महाभागे! तू हमारी पुत्रीरूपसे प्रसिद्ध होगी और मनुका वंशधर पुत्र भी तू ही होगी॥ १४ ॥
सुद्युम्न इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु शोभने।
जगत्प्रियो धर्मशीलो मनोर्वंशविवर्धनः ॥ १५ ॥
'शोभने! (उस समय) तू मनुके वंशको बढ़ानेवाले, जगत्में प्रिय, धर्मशील सुद्युम्नके नामसे तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होगी' ॥ १५ ॥
निवृत्ता सा तु तच्छ्रुत्वा गच्छन्ती पितुरन्तिकम्।
बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनायोपमन्त्रिता ॥ १६ ॥
इस बातको सुनकर वह अपने पिता मनुके पास वापस जा रही थी; इसी बीचमें अवसर देखकर बुधने उसे सहवासके लिये आमन्त्रित किया ॥ १६ ॥
सोमपुत्राद् बुधाद् राजंस्तस्यां जज्ञे पुरूरवाः।
जनयित्वा सुतं सा तमिला सुद्युम्नतां गता ॥ १७ ॥
राजन्! चन्द्रमाके पुत्र बुधद्वारा उस इलाके गर्भसे पुरूरवा उत्पन्न हुए और उस पुत्रको उत्पन्न करके वह इला सुद्युम्न हो गयी ॥ १७ ॥
सुद्युम्नस्य तु दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः।
उत्कलश्च गयश्चैव विन्ताश्वश्च भारत ॥ १८ ॥
भारत! सुद्युम्नके उत्कल, गय और विन्ताश्व नामक तीन परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥
उत्कलस्योत्कला राजन् विन्ताश्वस्य पश्चिमा।
दिक् पूर्वा भरतश्रेष्ठ गयस्य तु गया पुरी ॥ १९ ॥
राजन्! उत्कलकी राजधानी उत्कला (उड़ीसा) हुई।
| ४२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
विनताश्वको पश्चिम दिशाका राज्य मिला और भरतश्रेष्ठ ! गयकी राजधानी पूर्व दिशामें गया नामकी पुरी हुई ॥ १९ ॥
प्रविष्टे तु मनो तात दिवाकरमरिंदम।
दशधा तद्धतक्षत्रमकरोत् पृथिवीमिमाम् ॥ २० ॥
तात ! शत्रुसूदन ! मनुके सूर्यमें प्रवेश कर जानेपर उनके इक्ष्वाकु आदि दस पुत्रोंने पृथ्वीको दस भागोंमें बाँट लिया ॥ २० ॥
यूपाइ्किता वसुमती यस्येयं सवनाकरा।
इक्ष्वाकुर्ज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवान् ॥ २१ ॥
मनुके बड़े पुत्र इक्ष्वाकुको मध्यदेशका राज्य मिला। यज्ञस्तम्भोंसे अलंकृत एवं वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी इक्ष्वाकुकी ही है ॥ २१ ॥
कन्याभावाच्च सुद्युम्नो नैनं गुणमवाप्तवान्।
वसिष्ठवचनाच्चासीत् प्रतिष्ठाने महात्मनः ॥ २२ ॥
प्रतिष्ठा धर्मराजस्य सुद्युम्नस्य कुरुद्वह।
सुद्युम्न कन्याभावके कारण इस सौभाग्यपूर्ण पदको न पा सके। परंतु कुरुद्वह ! वसिष्ठजीके वचनसे महात्मा धर्मराज सुद्युम्नको भी प्रतिष्ठानपुर (झूँसी—प्रयाग) का राज्य मिल गया था ॥ २२½ ॥
तत्पुरूरवसे प्रादाद् राज्यं प्राप्य महायशाः ॥ २३ ॥
सुद्युम्नः कारयामास प्रतिष्ठाने नृपक्रियाम्।
महायशस्वी सुद्युम्नने राज्य पानेके बाद प्रतिष्ठानमें (कुछ दिनतक) राज्य किया, फिर उन्होंने अपना राज्य पुरूरवा-को दे दिया ॥ २३½ ॥
उत्कलस्य त्रयः पुत्रास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः।
धृष्टकश्चाम्बरीषश्च दण्डश्चेति सुतास्त्रयः ॥ २४ ॥
उत्कलके तीन पुत्र थे, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध थे। उनके नाम थे—धृष्टक, अम्बरीष और दण्ड ॥ २४ ॥
यश्चकार महात्मा वै दण्डकारण्यमुत्तमम्।
धनं तल्लोकविख्यातं तापसानामन्नुत्तमम् ॥ २५ ॥
तत्र प्रविष्टमात्रस्तु नरः पापात् प्रमुच्यते।
महात्मा दण्डने दण्डकारण्य नामक वनका निर्माण किया, जो तपस्वियोंके लिये परमोत्तम (आश्रम) तथा लोकमें अत्यन्त विख्यात है। उसमें प्रवेश करते ही मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २५½ ॥
सुद्युम्नश्च दिवं यात ऐलमुत्पाद्य भारत ॥ २६ ॥
मानवेयो महाराज स्त्रीपुंसोर्लक्षणैर्युतः।
धृतवान् य इलेत्येव सुद्युम्नश्चातिविश्रुतः ॥ २७ ॥
भरतवंशी महाराज ! सुद्यम्न कन्यावस्थामें ऐल (पुरूरवा) को(और पुरुषावस्थामें उत्कल आदि अन्य तीन पुत्रोंको) उत्पन्न करके स्वर्ग चले गये। ये सुद्युम्न स्त्री तथा पुरुष दोनोंके ही लक्षणोंसे संयुक्त हुए थे। इन्होंने इलाके रूपमे रहनेपर गर्भ धारण किया था, फिर ये ही (पुरुषत्व प्राप्त होनेपर) सुद्युम्न नामसे प्रसिद्ध हो गये थे ॥ २६-२७ ॥
नरिष्यतः शकाः पुत्रा नाभागस्य तु भारत।
अम्बरीषोऽभवत् पुत्रः पार्थिवर्षभसत्तमः ॥ २८ ॥
भारत ! (मनुके पञ्चम पुत्र) नरिष्यन्तके पुत्र शक हुए और (मनुके द्वितीय पुत्र) नाभागके पुत्र राजराजेश्वर अम्बरीष हुए ॥ २८ ॥
धृष्णोस्तु धार्ष्टकं क्षत्रं रणधृष्टं बभूव ह।
करूपस्य तु कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥ २९ ॥
सहस्रं क्षत्रियगणो विक्रान्तः सम्बभूव ह।
नाभागारिष्टपुत्राश्च क्षत्रिया वैश्यतां गताः ॥ ३० ॥
(मनुके तृतीय पुत्र) धृष्णुके धार्ष्टक नामक क्षत्रिय हुए। वे रणमें ढीठ थे। (मनुके आठवें पुत्र) करूपसे कारूष नामवाले युद्धदुर्मद क्षत्रिय हुए। यह हजारों क्षत्रियोंका मण्डल परम पराक्रमी था। (मनुके सप्तम पुत्र) नाभागारिष्ट-के क्षत्रिय पुत्र वैश्य हो गये थे* ॥ २९-३० ॥
प्रांशोरेकोऽभवत् पुत्रः शर्यातिरिति विश्रुतः।
नरिष्यतस्य दायादो राजा दण्डधरो दमः।
शर्यातेर्मिथुनं चासीदानर्तो नाम विश्रुतः ॥ ३१ ॥
पुत्रः कन्या सुकन्याख्या या पत्नी च्यवनस्य ह।
आनर्तस्य तु दायादो रेवो नाम महाद्युतिः ॥ ३२ ॥
(मनुके छठे पुत्र) प्रांशुके एक पुत्र हुआ, वह शर्याति नामसे प्रसिद्ध था। (मनुके पञ्चम पुत्र) नरिष्यन्तका पुत्र दण्डधारी राजा दम हुआ। (मनुके चौथे पुत्र) शर्यातिकी दो संतान उत्पन्न हुईं; उनमें एक तो पुत्र था, जो आनर्त नामसे प्रसिद्ध हुआ और एक कन्या थी, जिसका नाम सुकन्या था। वह च्यवन ऋषिकी पत्नी हुई। आनर्तके रेव नामका महाकान्तिमान् पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ३१-३२ ॥
आनर्तविषयश्चासीत् पुरी चास्य कुशस्थली।
रेवस्य रैवतः पुत्रः ककुद्मी नाम धार्मिकः ॥ ३३ ॥
उसका राज्य आनर्त (जहाँ आज द्वारका है) देशमें था और उसकी पुरी (राजधानी) का नाम कुशस्थली (आजकी द्वारकापुरी) था। रेवके पुत्र रैवत हुए, इन्हींका दूसरा नाम ककुद्मी था। ये धार्मिक थे ॥ ३३ ॥
ज्येष्ठःपुत्रशतस्यासीद् राज्यं प्राप्य कुशस्थलीम्।
स कन्यासाहितः श्रुत्वा गान्धर्वं ब्रह्मणोऽन्तिके ॥ ३४ ॥
* युद्धमें हार जानेके कारण क्षत्रिय होनेपर भी इनका नाना अपनेको वैश्य कहता था; अतः ऐसी वैश्यपुत्रीके पुत्र होनेसे ये वैश्य कहलाये। इस ग्रन्थके ग्यारहवें अध्यायके नवें श्लोककी टिप्पणीमें इसका पूर्ण समाधान है।
हरिवंशपर्व ] एकादशोऽध्यायः ४३
मुहूर्तभूतं देवस्य गतं बहुयुगं प्रभो ।
आजगाम युवैवाथ स्वां पुरीं यादवावृताम् ॥ ३५ ॥
(रेवके) सौ पुत्रोंमें ये सबसे ज्येष्ठ थे। कुशस्थलीका राज्य पानेके अनन्तर एक दिन ये अपनी कन्याके साथ (ब्रह्मलोकमें) गये, वहाँ ब्रह्माजीके समीप गन्धर्वोंका गीत सुनने लगे। राजन् ! संगीत सुनते-सुनते ये दो घड़ी वहाँ ठहरे रहे। इतने ही समयमें मानवलोकमें अनेक युग बीत गये। तत्पश्चात् ये यादवोंसे घिरी हुई अपनी पुरीमें आये। उस समयतक इनकी युवावस्था ज्यों-की-त्यों बनी हुई थी ॥ ३४-३५ ॥
कृतां द्वारवतीं नाम्ना बहुद्वारां मनोरमाम् ।
भोजवृष्ण्यन्धकैर्गुप्तां वासुदेवपुरोगमैः ॥ ३६ ॥
(उस समय उस पुरीमें) बहुत-से दरवाजे बन गये थे और वासुदेव आदि भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी उस रमणीय पुरीकी रक्षा कर रहे थे। यादवोंने उसका नाम बदलकर द्वारवती रख दिया था ॥ ३६ ॥
ततः स रैवतो ज्ञात्वा यथातत्त्वमरिंदम ।
कन्यां तां बलदेवाय सुव्रतां नाम रेवतीम् ॥ ३७ ॥
दत्त्वा जगाम शिखरं मेरोस्तपसि संस्थितः ।
रेमे रामोऽपि धर्मात्मा रेवत्या सहितः सुखी ॥ ३८ ॥
शत्रुमर्दन ! इन सब बातोंको यथार्थ रीतिसे जानकर राजा रैवत अपनी रेवती नामकी सुव्रता कन्याको बलदेवजीके हाथमें देकर स्वयं मेरुपर्वतके शिखरपर चले गये और वहाँ तपस्यामें लग गये। (इधर) धर्मात्मा बलरामजी भी रेवतीके साथ सुखपूर्वक विहार करने लगे ॥ ३७-३८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि ऐलोत्पत्तिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पुरूरवाकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः
धुन्धुमारकी कथा
जनमेजय उवाच
कथं बहुयुगे काले समतीते द्विजोत्तम ।
न जरा रेवतीं प्राप्ता रैवतं च ककुद्मिनम् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—द्विजोत्तम ! बहुत-से युगोंका समय बीत जानेपर भी रेवती और ककुद्मी रैवतको बुढ़ापा क्यों नहीं व्याप्त हुआ ? ॥ १ ॥
मेहे गतं वा तस्य शार्यातेः संततिः कथम् ।
स्थिता पृथिव्यामद्यापि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २ ॥
शार्यातिके प्रपौत्र रैवत मेरुपर्वतपर चले गये, तब भी उनकी संतान आजतक पृथिवीपर कैसे वर्तमान है ? इस बातको मैं यथार्थ रीतिसे सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
न जरा क्षुत्पिपासे वा न मृत्युर्भरतर्षभ ।
ऋतुचक्रं न भवति ब्रह्मलोके सदानघ ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने उत्तर दिया—निष्पाप भरतश्रेष्ठ ! ब्रह्मलोकमें मृत्यु, भूख-प्यास और बुढ़ापा नहीं होते और वहाँ ऋतुचक्र भी अपना प्रभाव नहीं दिखाता (वहाँ तो सदा एक-सी दशा रहती है) ॥ ३ ॥
ककुद्मिनस्तु तं लोकं रैवतस्य गतस्य ह ।
हता पुण्यजनैस्तात राक्षसैः सा कुशस्थली ॥ ४ ॥
तात ! जब रैवत ककुद्मी ब्रह्मलोकको चले गये, तब यक्षों और राक्षसोंने कुशस्थलीको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ॥ ४ ॥
तस्य भ्रातृशतं चासीद् धार्मिकस्य महात्मनः ।
तद् वध्यमानं रक्षोभिर्दिशः प्राद्रवदच्युतम् ॥ ५ ॥
धर्मात्मा एवं महात्मा रैवतके सौ भाई थे। वे राक्षसोंसे हारे नहीं, परंतु राक्षसोंके बार-बार आक्रमण करनेके कारण (अनेक) दिशाओंमें भाग गये ॥ ५ ॥
विद्रुतस्य तु राजेन्द्र तस्य भ्रातृशतस्य वै ।
तेषां तु ते भयाक्रान्ताः क्षत्रियास्तत्र तत्र ह ॥ ६ ॥
राजेन्द्र ! जब उनके सौ भाई भाग गये, तब उस कुलके अन्य क्षत्रिय भी राक्षसोंके भयसे भागकर जहाँ-तहाँ बस गये॥६॥
अन्ववायस्तु सुमहांस्तत्र तत्र विशांपते ।
येषामेते महाराज शार्याता इति विश्रुताः ॥ ७ ॥
क्षत्रिया भरतश्रेष्ठ दिक्षु सर्वासु धार्मिकाः ।
सर्वशः पर्वतगणान् प्रविष्टाः कुरुनन्दन ॥ ८ ॥
प्रजानाथ ! उनका बड़ा भारी वंश जहाँ-तहाँ फैल गया। महाराज ! उनके वंशके ही ये धार्मिक क्षत्रिय सब दिशाओंमें शार्यात नामसे प्रसिद्ध हैं। भरतश्रेष्ठ कुरुनन्दन ! वे सब क्षत्रिय चारों ओरके पर्वतोंकी कन्दराओंमें प्रविष्ट हो गये थे ॥ ७-८ ॥
४४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
नाभागारिष्टपुत्रौ द्वौ वैश्यौ ब्राह्मणतां गतौ।
करूपस्य च कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥ ९ ॥
नाभाग और अरिष्टके पुत्र ये दोनों वैश्य होकर पुनः)* ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये। करूषके कारूषनामक युद्धदुर्मद क्षत्रिय उत्पन्न हुए ॥ ९ ॥
प्रांशोरेकोऽभवत् पुत्रः प्रजातिरिरितः श्रुतम् ।
पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गां जनमेजय ॥ १० ॥
शापाच्छूद्रत्वमापन्नो नवैते परिकीर्तिताः ।
वैवस्वतस्य तनया मनोर्वै भरतर्षभ ॥ ११ ॥
हमने सुना है कि (मनुके छठे पुत्र) प्रांशुके प्रजाति नामका एक ही पुत्र उत्पन्न हुआ था। जनमेजय ! गुरुकी गौको मारनेपर (गुरुके) शापसे पृषध्र शूद्रत्वको प्राप्त हो गया था। भरतर्षभ ! यहाँ तक वैवस्वत मनुके नौ पुत्रोंका मैंने वर्णन किया ॥ १०-११ ॥
क्षुवतश्च मनोस्तात इक्ष्वाकुरभवत् सुतः।
तस्य पुत्रशतं त्वासीदिक्ष्वाकोर्भूरिदक्षिणम् ॥ १२ ॥
तात ! मनुके छींकनेसे इक्ष्वाकु नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई थी। उन इक्ष्वाकुके भी सौ पुत्र उत्पन्न हुए। ये सब-के-सब बड़ी-बड़ी दक्षिणा देनेवाले थे ॥ १२ ॥
तेषां विकुक्षिज्येष्ठस्तु विकुक्षित्वादयोधताम् ।
प्राप्तः परमधर्मज्ञः सोऽयोध्याधिपतिः प्रभुः ॥ १३ ॥
उनमें सबसे बड़ा पुत्र विकुक्षि था। यह विकुक्षि-विशाल कोख (वक्षःस्थल) वाला होनेसे सर्वथा अयोध्य था; अर्थात् उसके सामने कोई योद्धा ठहर नहीं सकता था। वही परम धार्मिक राजा विकुक्षि अयोध्याका स्वामी हुआ ॥ १३ ॥
शकुनिप्रमुखास्तस्य पुत्राः पञ्चाशदुत्तमाः ।
उत्तरापथदेशस्था रक्षितारो महीपते ॥ १४ ॥
राजन् ! उसके शकुनि आदि पचास उत्तम पुत्र थे, वे उत्तरापथ देशमें रहकर उस देशकी रक्षा करते थे ॥ १४ ॥
चत्वारिंशत्तथाष्टौ च दक्षिणस्यां तथा दिशि ।
शशादप्रमुखाश्चान्ये रक्षितारो विशाम्पते ॥ १५ ॥
जनेश्वर ! उसके शशाद आदि अड़तालीस पुत्र दक्षिण दिशामें रहकर दक्षिण दिशाकी रक्षा करते थे ॥ १५ ॥
* मातृजातयः पुत्राः स्युः—'पुत्र माताकी जातिके होते हैं' इस शास्त्रीय वचनसे वैश्य-स्त्रीमें उत्पन्न होनेके कारण ये पुत्र वैश्य कहलाते थे और इस वैश्य-स्त्रीका पिता भी क्षत्रिय था, परंतु संग्राममें शत्रुओंसे हार जानेके कारण अपनेको वैश्य कहने लगा था। इस कथाका विस्तृत वर्णन मार्कण्डेयपुराणके ११३ वें अध्यायमें है।
इक्ष्वाकुस्तु विकुक्षिं वै अष्टकायामथादिशत् ।
मांसमानय श्राद्धार्थं मृगान् हत्वा महाबलः ॥ १६ ॥
महाबली इक्ष्वाकुने अष्टका श्राद्धके लिये (अपने पुत्र) विकुक्षिको आज्ञा दी कि तू मृग नामक कन्दविशेषको काटकर श्राद्धके लिये उसका गूदा ला ॥ १६ ॥
श्राद्धकर्मणि चोद्दिष्टमकृते श्राद्धकर्मणि ।
भक्षयित्वा शशं तात शशादो मृगयागतः ॥ १७ ॥
परंतु तात ! विकुक्षिने श्राद्धकर्मके लिये नियत किये हुए शश (कन्दविशेष)को श्राद्ध पूर्ण होनेसे पहले ही खाकर उच्छिष्ट कर दिया और शिकार करके वापस लौट आया ॥ १७ ॥
इक्ष्वाकुणा परित्यक्तो वसिष्ठवचनात् प्रभुः ।
इक्ष्वाकौ संस्थिते तात शशादः पुरमावसत् ॥ १८ ॥
उस समय इक्ष्वाकुने वसिष्ठजीके कहनेसे शशादको त्याग दिया। तात ! फिर इक्ष्वाकुके मरनेपर शशाद नगरमें आया (और राज्यका स्वामी बनकर राज्य करनेलगा) ॥ १८ ॥
शशादस्य तु दायादः ककुत्स्थो नाम वीर्यवान् ।
इन्द्रस्य वृषभूतस्य ककुत्स्थोऽजयदासुरान् ॥ १९ ॥
पूर्वं देवासुरे युद्धे ककुत्स्थस्तेन हि स्मृतः ।
अनेनास्तु ककुत्थस्य पृथुरानैनसः स्मृतः ॥ २० ॥
शशादके ककुत्स्थ नामवाला वीर्यवान् पुत्र उत्पन्न हुआ, उसे पहले देवासुर-संग्राममें इन्द्रने स्मरण किया था। उस समय उसने इन्द्रको बैल बनाकर उनके ककुद् (पीठ)पर बैठकर असुरोंको जीता था; इसलिये इसका नाम ककुत्स्थ हुआ। ककुत्स्थके अनेना नामक पुत्र हुआ और अनेनाका पुत्र पृथु हुआ ॥ १९–२० ॥
विष्टराश्वः पृथोः पुत्रस्तस्मादार्द्रस्त्वजायत ।
आर्द्रस्य युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्तु चात्मजः ॥ २१ ॥
पृथुके विष्टराश्व और विष्टराश्वके आर्द्र नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, आर्द्रके युवनाश्व और युवनाश्वका पुत्र श्राव हुआ ॥ २१ ॥
जज्ञे श्रावस्तको राजा श्रावस्ती येन निर्मिता ।
श्रावस्तस्य तु दायादो बृहदश्वो महायशाः ॥ २२ ॥
वह श्रावस्तक नाम धारण करके राजसिंहासनपर बैठा, उसीने श्रावस्तीपुरी बसायी। श्रावस्तका पुत्र महायशस्वी बृहदश्व हुआ ॥ २२ ॥
कुवलाश्वः सुतस्तस्य राजा परमधार्मिकः ।
यः स धुन्धुवधाद् राजा धुन्धुमारत्वमागतः ॥ २३ ॥
उसका पुत्र परमधार्मिक राजा कुवलाश्व हुआ, धुन्धु नामक दैत्यको मारनेके कारण वह राजा 'धुन्धुमार' नामसे भी प्रसिद्ध हुआ ॥ २३ ॥
हरिवंशपर्व ] एकादशोऽध्यायः ४५
जनमेजय उवाच
धुन्धोर्वधमहं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।
यदर्थं कुवलाश्वः सन् धुन्धुमारत्वमागतः॥ २४॥
जनमेजयने कहा—ब्रह्मन् ! मैं धुन्धुके वधकी उस कथाको यथार्थ रीतिसे सुनना चाहता हूँ, जिससे कुवलाश्वका नाम धुन्धुमार पड़ गया था॥ २४॥
वैशम्पायन उवाच
कुवलाश्वस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम्।
सर्वे विद्यासु निष्णाता बलवन्तो दुरासदाः॥ २५॥
वैशम्पायनजी बोले—कुवलाश्वके धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ सौ पुत्र थे। वे सभी समस्त विद्याओंमें निपुण, बलवान् तथा दुर्दम्य थे॥ २५॥
बभूवुर्धार्मिकाः सर्वे यज्वानो भूरिदक्षिणाः।
कुवलाश्वं सुतं राज्ये बृहदश्वो न्ययोजयत्॥ २६॥
वे सभी धार्मिक पुत्र यज्ञ करके बहुत-सी दक्षिणा दिया करते थे। बृहदश्वने अपने ज्येष्ठ पुत्र कुवलाश्वको राज-सिंहासनपर बैठाया॥ २६॥
पुत्रसंक्रामितश्रीस्तु वनं राजा समाविशत्।
तमुत्तङ्कोऽथ विप्रर्षिः प्रयान्तं प्रत्यवारयत्॥ २७॥
अपनी राज्यलक्ष्मीको पुत्रके अधीन करके राजा बृहदश्व स्वयं वनको चले। उस समय ब्रह्मर्षि उत्तङ्कने उन्हे वनमें जानेसे रोका॥ २७॥
उत्तङ्क उवाच
भवता रक्षणं कार्यं तत् तावत् कर्तुमर्हसि।
निरुद्विग्नस्तपस्तप्तुं न हि शक्नोषि पार्थिव॥ २८॥
उत्तङ्क ऋषिने कहा—राजन् ! हमारी रक्षा करना आपका कर्तव्य है; अतः पहले वही कीजिये। अन्यथा आप निश्चिन्त होकर तप नहीं कर सकते॥ २८॥
त्वया हि पृथिवी राजन् रक्ष्यमाणा महात्मना।
भविष्यति निरुद्विग्ना नारण्यं गन्तुमर्हसि॥ २९॥
राजन् ! जब आप-जैसे महात्मा इस पृथिवीकी रक्षा करेंगे, तभी इस पृथ्वीपर शान्ति होगी; अतः आपका वन-में जाना उचित नहीं है॥ २९॥
पालने हि महान् धर्मः प्रजानामिह दृश्यते।
न तथा दृश्यतेऽरण्ये मा ते भूद् बुद्धिरीदृशी॥ ३०॥
हम देखते हैं कि यहाँ रहकर प्रजाका पालन करनेसे आपको महान् पुण्य होगा। वनमें रहनेपर ऐसे पुण्यकी प्राप्ति आपको हो, यह हमे नहीं दीखता। इसलिये आप ऐसा विचार न करें॥ ३०॥
ईदृशो न हि राजेन्द्र धर्मः क्वचन दृश्यते।
प्रजानां पालने यो वै पुरा राजर्षिभिः कृतः।
रक्षितव्याः प्रजा राज्ञा तास्त्वं रक्षितुमर्हसि॥ ३१॥
राजेन्द्र ! प्राचीन कालमें राजर्षियोंने प्रजाओंका पालन करके जैसा पुण्य-संचय किया है, वैसा पुण्य और कहीं नहीं दिखायी देता। राजाको प्रजाओंकी रक्षा करनी चाहिये; अतः आप प्रजाकी रक्षा करें॥ ३१॥
ममाश्रमसमीपे हि समेषु मरुधन्वसु।
समुद्रो वालुकापूर्ण उज्जानक इति श्रुतः।
देवतानामवध्यश्च महाकायो महाबलः॥ ३२॥
अन्तर्भूमिगतस्तत्र वालुकान्तर्हितो महान्।
राक्षसस्य मधोः पुत्रो धुन्धुनामा महासुरः।
शेते लोकविनाशाय तप आस्थाय दारुणम्॥ ३३॥
मेरे आश्रमके समीप मरुप्रदेशकी समतल भूमिमें बालूसे भरा हुआ उज्जानक नामवाला समुद्र है। वहीं एक विशालकाय महाबली राक्षस रहता है, जो देवताओंके लिये भी अवध्य है। वह महान् असुर मधु नामक राक्षसका पुत्र है। उसका नाम धुन्धु है। वह वहाँ पृथिवीके भीतर बालूमें छिपकर सोता है और सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेके लिये कठोर तपस्या कर रहा है॥ ३२-३३॥
संवत्सरस्य पर्यन्ते स निःश्वासं प्रमुञ्चति।
यदा तदा भूश्चलति सशैलवनकानना॥ ३४॥
वह एक वर्ष बीतनेपर जब बड़े जोरसे साँस छोड़ता है, उस समय पर्वत और वनोंसहित सारी पृथिवी डोलने लगती है॥ ३४॥
तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूयते महत्।
आदित्यपथमावृत्य सप्ताहं भूमिकम्पनम्॥ ३५॥
उसके श्वासकी वायुसे बड़ी भारी धूलि उड़ती है, जो सूर्यके मार्गको भी ढँक लेती है; साथ ही एक सप्ताह तक भूकम्प होता रहता है॥ ३५॥
सविस्फुलिङ्गं साङ्गारं सधूममतिदारुणम्।
तेन तात न शक्नोमि तस्मिन् स्थातुं स्वकाश्रमे॥ ३६॥
तात ! (उस समय पृथिवीमेंसे) चिनगारियाँ, अंगारे और अत्यन्त दारुण धुएँ निकलने लगते हैं। इसलिये तात ! मैं अपने आश्रममें (सुखपूर्वक) नहीं रह पाता॥ ३६॥
तं मारय महाकायं लोकानां हितकाम्यया।
लोकाः स्वस्था भवन्त्वद्य तस्मिन् विनिहतेऽसुरे॥ ३७॥
आप लोकोंका हित करनेकी इच्छासे उस विशाल शरीरवाले दैत्यका संहार करें, आज उस असुरकें मारे जानेपर सब लोग सुखी हो जायें॥ ३७॥
त्वं हि तस्य वधायैकः समर्थः पृथिवीपते।
विष्णुना च वरो दत्तो महाँ पूर्वयुगेऽनघ॥ ३८॥
पृथिवीपते ! एक आप ही उसका वध कर सकते हैं, क्योंकि निष्पाप नरेश ! भगवान् विष्णुने पहले युगमें मुझे एक वर दिया था॥ ३८॥
४६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
यस्त्वं महासुरं रौद्रं हनिष्यसि महाबलम् ।
तस्य त्वं वरदानेन तेज आप्याययिष्यसि ॥ ३९ ॥
भगवान्के उस वरदानके अनुसार जब कि (अयोध्याके राजा) आप इस महाबली भयंकर दानवका संहार करेंगे, अपने तेजको (वैष्णव तेजसे) परिपुष्ट कर लोगे ॥ ३९ ॥
न हि धुन्धुर्महातेजास्तेजसाल्पेन शक्यते ।
निर्दग्धुं पृथिवीपाल स हि वर्षशतैरपि ।
वीर्यं हि सुमहत्तस्य देवैरपि दुरासदम् ॥ ४० ॥
पृथिवीपाल ! महातेजस्वी धुन्धुको अल्प तेजवाला पुरुष सौ वर्षमें भी नहीं मार सकता। उसमें इतना अधिक बल है कि देवताओंके लिये भी उसे दबाना कठिन है ॥ ४० ॥
स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केन महात्मना ।
कुवलाश्वं सुतं प्रादात् तस्मै धुन्धुनिबर्हणे ॥ ४१ ॥
महात्मा उत्तङ्कने जब उन राजर्षिसे इस प्रकार कहा, तब उन्होंने धुन्धु दैत्यको नष्ट करनेके लिये अपने पुत्र कुवलाश्वको उनकी सेवामें दे दिया ॥ ४१ ॥
बृहदश्व उवाच
भगवन् न्यस्तशस्त्रोऽहमयं तु तनयो मम ।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठ धुन्धुमारो न संशयः ॥ ४२ ॥
बृहदश्वने कहा—भगवन् ! मैंने तो शस्त्र त्याग दिये हैं, किंतु द्विजश्रेष्ठ ! यह मेरा पुत्र (आपको समर्पित) है, यह अवश्य धुन्धुमार होगा ॥ ४२ ॥
स तं व्यादिश्य तनयं राजर्षिर्धुन्धुमारणे ।
जगाम पर्वतायैव तपसे संशितव्रतः ॥ ४३ ॥
(यह कहकर) प्रशंसनीय व्रतवाले वे राजर्षि अपने पुत्रको धुन्धुका वध करनेकी आज्ञा देकर स्वयं तप करनेके लिये पर्वतपर चले गये ॥ ४३ ॥
कुवलाश्वस्तु पुत्राणां शतेन सह पार्थिवः ।
प्रायादुत्तङ्कसहितो धुन्धोस्तस्य विनिग्रहे ॥ ४४ ॥
तब राजा कुवलाश्व अपने सौ पुत्रों और उत्तङ्कको साथमें लेकर धुन्धुको दण्ड देनेके लिये चल दिये ॥ ४४ ॥
तमाविशत् तदा विष्णुर्भगवान्स्तेजसा प्रभुः ।
उत्तङ्कस्य नियोगाद् वै लोकस्य हितकाम्यया ॥ ४५ ॥
उस समय भगवान् विष्णु उत्तङ्क ऋषिकी प्रेरणासे लोकोंका हित करनेके लिये अपने तेजःस्वरूपसे उस राजाके शरीरमें प्रविष्ट हो गये ॥ ४५ ॥
तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे दिवि शब्दो महानभूत् ।
एष श्रीमानवध्योऽद्य धुन्धुमारो भविष्यति ॥ ४६ ॥
तब उस दुर्धर्ष राजाके प्रस्थान करनेपर आकाशमे गम्भीर वाणी सुनायी दी कि 'ये श्रीमान् राजा अवध्य हैं, आज इनके हाथसे धुन्धु अवश्य मारा जायगा' ॥ ४६ ॥
दिव्यैर्माल्यैश्च तं देवाः समन्तात् समवाकिरन् ।
देवदुन्दुभयश्चापि प्रणेदुर्भर्तर्षभ ॥ ४७ ॥
भरतर्षभ ! तदनन्तर देवताओंने अपनी दुन्दुभियाँ बजाकर उनके ऊपर चारों ओरसे दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की ॥ ४७ ॥
स गत्वा जयतां श्रेष्ठस्तनैः सह वीर्यवान् ।
समुद्रं खानयामास वालुकार्णवमव्ययम् ॥ ४८ ॥
विजय पानेवालोंमें श्रेष्ठ वह वीर्यवान् राजा अपने पुत्रोंके साथ वहाँ पहुँचकर अपार रेतेसे भरे हुए समुद्रको खुदवाने लगे ॥ ४८ ॥
नारायणेन कौरव्य तेजसाऽऽप्यायितः स वै ।
बभूव स महातेजा भूयो बलसमन्वितः ॥ ४९ ॥
कौरव्य ! वे महाबली राजा भगवान् नारायणके तेजसे पुष्ट होनेके कारण और भी अधिक तेजस्वी हो गये ॥ ४९ ॥
तस्य पुत्रैः खनद्भिस्तु वालुकान्तर्हितस्तदा ।
धुन्धुरासादितो राजन् दिशमावृत्य पश्चिमाम् ॥ ५० ॥
राजन् ! धरती खोदते हुए कुवलाश्वपुत्रोंने बालूके भीतर छिपे हुए धुन्धुका पता लगा लिया। वह पश्चिम दिशाको घेरकर पड़ा था ॥ ५० ॥
मुखेनाग्निना क्रोधाल्लोकानुद्वर्तयन्निव ।
वारि सुस्राव वेगेन महोदधिरिवोदये ॥ ५१ ॥
सोमस्य भरतश्रेष्ठ धारोर्मिकलिलं महत् ।
तस्य पुत्रशतं दग्धं त्रिभिरूनं तु रक्षसा ॥ ५२ ॥
धुन्धु अपने मुखकी आगसे सम्पूर्ण लोकोंका संहार-सा करता हुआ जलका स्रोत बहाने लगा। भरतश्रेष्ठ ! जैसे चन्द्रमाके उदयकालमें समुद्रमें ज्वार आता है, उसकी उत्ताल तरङ्गं बढ़ने लगती हैं, उसी प्रकार वहाँ धारा, लहर और कीचड़से युक्त महान् जलस्रोत वेगपूर्वक बढ़ने लगा। उस राक्षसने कुवलाश्वके सौ पुत्रोंमेंसे तीनको छोड़कर शेष सबको अपनी मुखाग्निसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ ५१-५२ ॥
ततः स राजा कौरव्य राक्षसं तं महाबलम् ।
आससाद महातेजा धुन्धुं धुन्धुनिबर्हणः ॥ ५३ ॥
कुरुनन्दन ! तब धुन्धुका संहार करनेके लिये आये हुए वे महातेजस्वी राजा उस महाबली राक्षसके सामने पहुँचे ॥ ५३ ॥
तस्य वारिमयं वेगमापीय स नराधिपः ।
योगी योगेन वह्निं च शमयामास वारिणा ॥ ५४ ॥
फिर उन योगी नरेशने योगके प्रभावसे उसके जलमय वेगको पी लिया तथा जलसे अग्निको शान्त कर दिया ॥ ५४ ॥
निहत्य तं महाकायं बलेनोदकराक्षसम् ।
उत्तङ्कं दर्शयामास कृतकर्मा नराधिपः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार उस विशाल शरीरवाले जल-राक्षसको बल-
हरिवंशपर्व ] द्वादशोऽध्यायः [ ४७
पूर्वक मारकर राजाने अपना काम पूर्ण करके उस मारे हुए राक्षसको उत्तङ्क ऋषिको दिखाया ॥ ५५ ॥
उत्तङ्कस्तु वरं प्रादात् तस्मै राज्ञे महात्मने ।
ददौ तस्याक्षयं वित्तं शत्रुभिश्चापराजयम् ॥ ५६ ॥
धर्मे रतिं च सततं स्वर्गवासं तथाक्षयम् ।
पुत्राणां चाक्षयाँल्लोकान् स्वर्गे ये रक्षसा हताः ॥ ५७ ॥
उस समय उत्तङ्कने उन महात्मा राजाको वरदान दिया कि 'आपके पास अक्षय धन रहेगा तथा शत्रुओंसे आप कभी पराजित नहीं होंगे ॥ ५६ ॥
'धर्मपर आपकी श्रद्धा सर्वदा बनी रहेगी तथा आप अनन्त कालतक स्वर्गमें रहेंगे । साथ ही राक्षसने आपके जिन पुत्रोंको मार डाला है, उन्हें भी स्वर्गमें अक्षय लोक मिलेंगे' ॥ ५७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि धुन्धुवधे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें धुन्धुवधविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः
धुन्धुमारके वंशका वर्णन और गालवकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
तस्य पुत्रास्त्रयः शिष्टा दृढाश्वो ज्येष्ठ उच्यते ।
चन्द्राश्वकपिलाश्वौ तु कुमारौ द्वौ कनीयसौ ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! उन (धुन्धुमार) के तीन पुत्र बच गये थे, जिनमें दृढाश्व सबसे बड़ा था तथा चन्द्राश्व और कपिलाश्व दो छोटे थे ॥ १ ॥
धौन्धुमारिर्दृढाश्वस्तु हर्यश्वस्तस्य चात्मजः ।
हर्यश्वस्य निकुम्भोऽभूत् क्षत्रधर्मरतः सदा ॥ २ ॥
धुन्धुमारके दृढाश्व, दृढाश्वके हर्यश्व और हर्यश्वके निकुम्भ नामक पुत्र हुआ, जो सदा क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहता था ॥ २ ॥
संहताश्वो निकुम्भस्य पुत्रो रणविशारदः ।
अकृशाश्वः कृशाश्वश्च संहताश्वसुतौ नृप ॥ ३ ॥
निकुम्भके संहताश्व नामक पुत्र हुआ, जो युद्धकी कलामे निपुण था । राजन् ! संहताश्वके अकृशाश्व और कृशाश्व नामक दो पुत्र हुए ॥ ३ ॥
तस्य हैमवती कन्या सतां माता दृषद्वती ।
विख्याता त्रिषु लोकेषु पुत्रश्चास्याः प्रसेनजित् ॥ ४ ॥
उस (संहताश्व) की भार्या हिमवान्की पुत्री थी, जो तीनों लोकोंमें दृषद्वतीके नामसे प्रसिद्ध है । उससे प्रसेनजित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था । वह श्रेष्ठ पुत्रोंकी जननी थी ॥ ४ ॥
लेभे प्रसेनजिद् भार्या गौरीं नाम पतिव्रताम् ।
अभिशप्ता तु सा भर्त्रा नदी वै बाहुदामभवत् ॥ ५ ॥
प्रसेनजित्की गौरी नामवाली भार्या थी । वह पतिव्रता थी । वह पतिके शाप देनेपर बाहुदा नदी हो गयी ॥ ५ ॥
तस्याः पुत्रो महानासीद् युवनाश्वो महीपतिः ।
मान्धाता युवनाश्वस्य त्रिलोकविजयी सुतः ॥ ६ ॥
उसके पुत्र महाराज युवनाश्व थे, युवनाश्वके त्रिलोक-विजयी मान्धाता नामक पुत्र हुआ ॥ ६ ॥
तस्य चैत्ररथी भार्या शशविन्दोः सुताभवत् ।
साध्वी बिन्दुमती नाम रूपेणासदृशी भुवि ॥ ७ ॥
शशविन्दु की पुत्री बिन्दुमती, जिसका दूसरा नाम चैत्ररथी था, मान्धाताकी भार्या थी । वह साध्वी पृथ्वीमे अनुपम रूपवती थी ॥ ७ ॥
पतिव्रता च ज्येष्ठा च भ्रातॄणामयुतस्य सा ।
तस्यामुत्पादयामास मान्धाता द्वौ सुतौ नृप ॥ ८ ॥
पुरुकुत्सं च धर्मज्ञं मुचुकुन्दं च धार्मिकम् ।
पुरुकुत्ससुतस्वासीत् त्रसदस्युर्महीपतिः ॥ ९ ॥
उसके दस हजार भाई थे और वह पतिव्रता उनमें सबसे बड़ी थी । राजन् ! मान्धाताने उसके गर्भसे धर्मज्ञ पुरुकुत्स और धार्मिक मुचुकुन्द—इन दो पुत्रोंको उत्पन्न किया। पुरुकुत्स-का पुत्र राजा त्रसदस्यु हुआ ॥ ८-९ ॥
नर्मदायामथोत्पन्नः सम्भूतस्तस्य चात्मजः ।
सम्भूतस्य तु दायादः सुधन्वा नाम पार्थिवः ॥ १० ॥
त्रसदस्युके नर्मदा नामवाली स्त्रीके गर्भसे सम्भूत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । सम्भूतका पुत्र सुधन्वा नामक राजा था ॥ १० ॥
सुधन्वनः सुतश्चासीत् त्रिधन्वा रिपुमर्दनः ।
राज्ञस्त्रिधन्वनस्त्वासीद् विद्वांस्त्रय्यारुणः सुतः ॥ ११ ॥
सुधन्वाके त्रिधन्वा नामक पुत्र हुआ, जो शत्रुओंका मर्दन करनेवाला था । राजा त्रिधन्वाके त्रय्यारुण नामक विद्वान् पुत्र हुआ ॥ ११ ॥
तस्य सत्यव्रतो नाम कुमारोऽभून्महाबलः ।
पाणिग्रहणमन्त्राणां विघ्नं चक्रे सुदुर्मतिः ॥ १२ ॥
त्रय्यारुणके सत्यव्रत नामवाला महाबली कुमार हुआ । उसकी
४८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
बुद्धि बड़ी खोटी थी। वह (परस्त्रीहरणद्वारा) विवाहके मन्त्रोंमें विघ्न डालने लगा ॥ १२ ॥
येन भार्या हृता पूर्वं कृतोद्वाहा परस्य वै । बाल्यात् कामाच्च मोहाच्च संदर्पाच्चापलेन च ॥ १३ ॥
उसने बालकपन, काम, मोह, हर्ष और चपलताके कारण किसी दूसरे (नागरिक) की विवाहिता स्त्रीको छीन लिया था ॥ १३ ॥
अहार कन्यां कामात् स कस्यचित् पुरवासिनः । अधर्मशङ्कुना तेन राजा त्रय्यारुणोऽत्यजत् ॥ १४ ॥ अपध्वंसेति बहुशो वदन् क्रोधसमन्वितः । पितरं सोऽब्रवीत्त्यक्तः क्व गच्छामीति वै मुहुः॥ १५ ॥
इसी प्रकार उसने कामके वशमें होकर एक पुरवासीकी कन्याको हर लिया था। इस पापरूपी कीलसे विद्ध होनेके कारण राजा त्रय्यारुणने क्रोधमें उसे बार-बार कहा---'ओ नीच ! भाग जा यहाँसे।' पिताके त्याग देनेपर उसने बार-बार उनसे पूछा---'मैं कहाँ जाऊँ ?' ॥ १४-१५ ॥
पिता त्वेनमथोवाच श्वपाकः सह वर्तय । नाहं पुत्रेण पुत्रार्थी त्वयाद्य कुलपांसन ॥ १६ ॥
तब उसके पिताने कहा---'ओ कुलकलंक ! जा तू श्वपाकों* के साथ रह, मैं तुझ-जैसे पुत्रसे पुत्रवान् बनना नहीं चाहता'॥
इत्युक्तः स निराक्रामन्नगराद् वचनात् पितुः । न च तं वारयामास वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ १७ ॥
पिताके इस प्रकार कहनेपर वह उनके कथनानुसार नगरसे बाहर निकल गया। उस समय भगवान् वसिष्ठ ऋषि-ने भी उसके पिताको इस प्रकार कहनेसे नहीं रोका ॥ १७ ॥
स तु सत्यव्रतस्तात श्वपाकावसथान्तिके । पित्रा त्यक्तोऽवसद्धीरः पिता तस्य वनं ययौ ॥ १८ ॥
तात ! धीर सत्यव्रत पिताके त्याग देनेपर चाण्डालोंकी बस्तीमें रहने लगा और उसके पिता त्रय्यारुण (विरक्त होकर) वनको चले गये ॥ १८ ॥
ततस्तस्मिंस्तु विषये नावर्षत् पाकशासनः । समा द्वादश राजेन्द्र तेनाधर्मेण वै तदा ॥ १९ ॥
राजेन्द्र ! उस समय उस देशमें (उस कन्याहरणरूप) अधर्मके कारण इन्द्रने बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं की ॥ १९ ॥
दारांस्तु तस्य विषये विश्वामित्रो महातपाः । संन्यस्य सागरानूपे चचार विपुलं तपः ॥ २० ॥
उस समय महातपस्वी विश्वामित्र भी सत्यव्रतके उस देशमें अपनी स्त्रीको न्यास (धरोहर) के रूपमें रखकर समुद्रके तटपर भयंकर तप कर रहे थे ॥ २० ॥
तस्य पत्नी गले बद्ध्वा मध्यमं पुत्रमौरसम् । शेषस्य भरणार्थाय व्यक्रीणाद् गोशतेन वै ॥ २१ ॥
विश्वामित्रकी स्त्री अपने शेष कुटुम्बके पालनके लिये अपने मध्यम पुत्रके गलेमें रस्सी बाँधकर उसको सौ गौओंके मूल्यपर बेचनेके लिये लेकर घूमने लगी ॥ २१ ॥
तं तु बद्धं गले दृष्ट्वा विक्रीयन्तं नृपात्मजः । महर्षिपुत्रं धर्मात्मा मोक्षयामास भारत ॥ २२ ॥
भारत ! धर्मात्मा राजकुमार (सत्यव्रत) ने उस महर्षिपुत्रको गलेमें बँधा तथा बिकता देखकर छुड़ा लिया ॥ २२ ॥
सत्यव्रतो महाबाहुर्भरणं तस्य चाकरोत् । विश्वामित्रस्य तुष्ट्यर्थमनुकम्पार्थमेव च ॥ २३ ॥
फिर महाबाहु सत्यव्रतने विश्वामित्रको संतुष्ट करने और उनकी कृपा प्राप्त करनेके लिये उस पुत्रका भरण-पोषण किया २३
सोऽभवद् गालवो नाम गलबन्धान्महातपाः । महर्षिः कौशिकस्तात तेन वीरेण मोक्षितः ॥ २४ ॥
वह महातपस्वी गलेमें बन्धन पड़नेके कारण गालव नामसे प्रसिद्ध हुआ। तात ! (इस प्रकार) उस वीरने कुशिकवंशी महर्षि (गालव) को (इस आपत्तिसे) मुक्त किया था ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि गालवोत्पत्तौ द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें गालवकी उत्पत्तिविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः
त्रिशङ्कुके चरित्रका वर्णन तथा उनके वंशमें हरिश्चन्द्र आदिका उत्पन्न होना
वैशम्पायन उवाच
सत्यव्रतस्तु भक्त्या च कृपया च प्रतिज्ञया । विश्वामित्रकलत्रं तद् बभार विनये स्थितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं---राजन् ! विश्वामित्रजीके प्रति श्रद्धा-भक्ति, उनके असहाय कुटुम्बके प्रति दयाभाव तथा अपनी की हुई प्रतिज्ञासे प्रेरित हो सत्यव्रत विनय-
* श्वपाक चाण्डालोंकी एक जातिका नाम है।
हरिवंशपर्व ] त्रयोदशोऽध्यायः ४९
पूर्वक विश्वामित्रजीकी स्त्रीका पालन करने लगा ॥ १ ॥
हत्वा मृगान् वराहांश्च महिषांश्च वनेचरान् ।
विश्वामित्राश्रमस्याभ्याशे मांसं वृक्षे बबन्ध सः ॥ २ ॥
वह ढूँढ़नेसे मिलनेवाले कंदविशेष, वराही कंद तथा महिष कंद आदि जंगली कंद-मूलोंको [काटकर उनका गूदा विश्वामित्रके आश्रमके पासके वृक्षोंमें बाँध देता था ॥ २ ॥
उपांशुव्रतमास्थाय दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।
पितुर्निंयोगाद्वसतः तस्मिन् वनगते नृपे ॥ ३ ॥
पिता (राजा) के वन चले जानेपर बारह वर्षोंके लिये वह चुपचाप (किसीको विदित न हो इस प्रकार) व्रत करने लगा ॥ ३ ॥
अयोध्यां चैव राष्ट्रं च तथैवान्तःपुरं मुनिः ।
याज्योपाध्यायसम्बन्धाद् वसिष्ठः पर्यरक्षत ॥ ४ ॥
इधर पुरोहिताई और यजमानीके सम्बन्धके कारण मुनि वसिष्ठ अयोध्याकी, राज्यकी और रनिवासकी रक्षा करने लगे ॥ ४ ॥
सत्यव्रतस्तु बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य वा बलात् ।
वसिष्ठेऽभ्यधिकं मन्युं धारयामास वै तदा ॥ ५ ॥
इधर सत्यव्रत अपनी मूर्खता या होनहारके कारण वसिष्ठ-जीके ऊपर अधिक कुपित रहने लगा ॥ ५ ॥
पित्रा तु तं तदा राष्ट्रात् त्यज्यमानं स्वमात्मजम् ।
न वारयामास मुनिर्वसिष्ठः कारणेन ह ॥ ६ ॥
परंतु मुनि वसिष्ठने तो उसके पिताको, उनके द्वारा अपने पुत्रके राज्यसे निकाले जाते समय विशेष कारणवश ही नहीं रोका था ॥ ६ ॥
पाणिग्रहणमन्त्राणां निष्ठा स्यात् सप्तमे पदे ।
न च सत्यव्रतस्तस्य तमुपांशुमबुध्यत ॥ ७ ॥
पाणिग्रहण अर्थात् विवाहके मन्त्र सप्तपदीके पूर्ण होनेपर पूर्ण हुए माने जाते हैं। (इसके पहले स्त्रीमें कन्यात्व ही रहता है; अतः वसिष्ठजी सत्यव्रतसे बारह वर्षोंतक कन्याहरणका प्रायश्चित्त कराना चाहते थे ।) परंतु वसिष्ठजीके इस गूढ़ आशयको सत्यव्रत समझ न सका ॥ ७ ॥
जानन् धर्मं वसिष्ठस्तु न मां त्रातीति भारत ।
सत्यव्रतस्तदा रोषं वसिष्ठे मनसाकरोत् ॥ ८ ॥
'वसिष्ठजी धर्मको जानते हैं, तब भी मेरी रक्षा नहीं करते हैं !' भारत ! यह विचारकर सत्यव्रत अपने मनमें उनपर कुपित रहने लगा ॥ ८ ॥
गुणबुद्ध्या तु भगवान् वसिष्ठः कृतवांस्तथा।
न च सत्यव्रतस्तस्य तमुपांशुमबुध्यत ॥ ९ ॥
भगवान् वसिष्ठजीने तो गुणबुद्धिसे ऐसा किया था, परंतु सत्यव्रत उनके इस गुप्त अभिप्रायको समझ न सका ॥ ९ ॥
तस्मिन्नपरितोषो यः पितुरासीन्महात्मनः ।
तेन द्वादश वर्षाणि नाववर्षत् पाकशासनः ॥ १० ॥
उसके महात्मा पिताको सत्यव्रतके ऊपर जो असंतोष उत्पन्न हो गया, इस कारण इन्द्रने उसके राज्यमें बारह वर्षों-तक वर्षा नहीं की ॥ १० ॥
तेन त्विदानीं वहता दीक्षां तां दुर्वहां भुवि ।
कुलस्य निष्कृतिस्तात कृता सा वै भवेदिति ॥ ११ ॥
न तं वसिष्ठो भगवान् पित्रा त्यक्तं न्यवारयत्।
अभिषेक्ष्यामहं पुत्रमस्येत्येवं मतिर्मुनेः ॥ १२ ॥
तात ! 'यदि (सत्यव्रत) भूतलपर कठिनतासे पूर्ण होनेवाली इस दीक्षाको पूर्ण कर लेगा तो इसके कुलका उद्धार हो जायगा'। यह विचारकर भगवान् वसिष्ठने उसके पिताद्वारा त्यागे गये सत्यव्रतको नहीं रोका था, उनका विचार था कि '(प्रायश्चित्तके अनन्तर) इसके पुत्रको ही मैं राज्यपर अभिषिक्त कर दूँगा' ॥ ११-१२ ॥
स तु द्वादशवर्षाणि दीक्षां तामुद्वहन् बली ।
उपांशुव्रतमास्थाय महत् सत्यव्रतो नृप ॥ १३ ॥
राजन् ! बलवान् सत्यव्रतने भी चुपचाप दीक्षा लेकर बारह वर्षतक इस महाव्रतको धारण किया ॥ १३ ॥
अविद्यमाने मांसे तु वसिष्ठस्य महात्मनः ।
सर्वकामदुघां दोग्ध्रीं ददर्श स नृपात्मजः ॥ १४ ॥
एक समय कंद-मूलके गूदेके न रहनेपर उस राजकुमार-की दृष्टि सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाली महात्मा वसिष्ठकी दुधार गौके ऊपर पड़ी ॥ १४ ॥
तां वै क्रोधाच्च मोहाच्च श्रमाच्चैव क्षुधार्दितः ।
दशधर्मान् गतो राजा जघान जनमेजय ॥ १५ ॥
जनमेजय ! राजकुमार सत्यव्रतने उस गौको क्रोध, मोह और कामके कारण तथा भूखसे पीड़ा पानेके कारण दश अनिष्ट धर्मों (अवस्थाओं)* को प्राप्त होनेकी दशामें मार डाला ॥ १५ ॥
* वे दस धर्म या अवस्थाएँ इस प्रकार हैं--
मत्तः प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो बुभुक्षितः ।
त्वरमाणश्च भीरुश्च लुब्धः कामी च ते दश ॥
अर्थात् मद, प्रमाद, उन्माद, श्रम, क्रोध, भूख, उतावली, भय, लोभ और काम--इन दस दशाओंमें पड़े हुए मनुष्य पाप कर बैठते हैं।
५० श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तच्च मांसं स्वयं चैव विश्वामित्रस्य चात्मजान्।
भोजयामास तच्छ्रुत्वा वसिष्ठोऽप्यस्य चुक्रुधे।
क्रुद्धस्तु भगवान् वाक्यमिदमाह नृपात्मजम् ॥ १६ ॥
उस मांसको उसने विश्वामित्रके पुत्रोंको खिलाया और अपने आप भी खाया। यह सुनकर वसिष्ठजी भी क्रोधमें भर गये और क्रोधमें भरे हुए वसिष्ठजीने राजाके पुत्रसे यह बात कही ॥ १६ ॥
वसिष्ठ उवाच
पातयेमहं क्रूर तव शङ्कूमसंशयम्।
यदि ते द्वाविमौ शङ्कन स्यातां वै कृतौ पुनः॥ १७ ॥
वसिष्ठजीने कहा—क्रूर ! यदि तुझमें फिर किये हुए ये दो शङ्कु (पाप) न होते तो मैं तेरे प्रथम शङ्कु (पाप) को अवश्य नष्ट कर देता ॥ १७ ॥
पितुश्चापरितोषेण गुरोर्दाग्धीवधेन च।
अप्रेक्षितोपयोगाच्च त्रिविधस्ते व्यतिक्रमः ॥ १८ ॥
पिताको संतुष्ट न रखने, गुरुकी दूध देनेवाली गौकी हत्या कर डालने और अप्रेक्षित मांस खानेसे तुम्हारे द्वारा तीन प्रकारके पाप बन गये ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं त्रीण्यस्य शङ्कनि तानि दृष्ट्वा महोतपाः।
त्रिशङ्कुरिति होवाच त्रिशङ्कुरिति स स्मृतः॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी बोले—इस प्रकार उसके तीन शङ्कुओंको देखकर महातपस्वी वसिष्ठजीने जो उसे त्रिशङ्कु कहा, इसके कारण वह त्रिशङ्कु ही कहलाने लगा ॥ १९ ॥
विश्वामित्रस्तु दारणामागतो भरणे कृते।
स तु तस्मै वरं प्रादान्मुनिः प्रीतस्त्रिशङ्कवे ॥ २० ॥
जब विश्वामित्रजी लौटे, तब अपनी स्त्री आदिका भरण-पोषण करनेके कारण प्रसन्न होकर त्रिशङ्कुको वर देने लगे ॥
छन्द्यमानो वरेणाथ वरं वव्रे नृपात्मजः।
सशरीरो व्रजे स्वर्गमित्येवं याचितो मुनिः ॥ २१ ॥
जब विश्वामित्रजीने राजकुमारसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा तब उसने मुनिसे वर माँगा कि ‘मैं सदेह स्वर्गमें जाऊँ’ ॥ २१ ॥
अनावृष्टिभये तस्मिन् गते द्वादशवार्षिके।
राज्येऽभिषिच्य पित्र्ये तु याजयामास तं मुनिः॥ २२ ॥
(विश्वामित्रके प्रसादमात्रसे) बारह वर्षोंकी अनावृष्टिका भय दूर हो जानेपर विश्वामित्र (मुनि अपने तपसे उसके पापोंको भस्म करके) उसका पिताके राज्यपर अभिषेक कर उसका यज्ञ कराने लगे ॥ २२ ॥
मिषतां देवतानां च वसिष्ठस्य च कौशिकः।
सशरीरं तदा तं तु दिवमारोपयत् प्रभुः ॥ २३ ॥
तदनन्तर तपकी शक्तिसे सम्पन्न कौशिकगोत्री विश्वामित्र वसिष्ठ और देवताओंके देखते-देखते ही त्रिशङ्कुको सशरीर स्वर्गमें भेज दिया ॥ २३ ॥
तस्य सत्यरथा नाम भार्या कैकयवंशजा।
कुमारं जनयामास हरिश्चन्द्रमकल्मषम् ॥ २४ ॥
त्रिशङ्कुके कैकयवंशमें उत्पन्न हुई एक सत्यरथा नामकी भार्या थी। उसमें उसने हरिश्चन्द्र नामवाले निष्पाप पुत्रको उत्पन्न किया ॥ २४ ॥
स वै राजा हरिश्चन्द्रस्त्रैशङ्कव इति स्मृतः।
आहर्ता राजसूयस्य स सम्राडिति विश्रुतः॥ २५ ॥
वे राजा हरिश्चन्द्र त्रैशङ्कवनामसे प्रसिद्ध थे, उन्होंने राजसूय यज्ञ किया था, अतएव वे सम्राट् कहलाते थे ॥ २५ ॥
हरिश्चन्द्रस्य पुत्रोऽभूद्रोहितो नाम वीर्यवान्।
येनेदं रोहितपुरं कारितं राज्यसिद्धये ॥ २६ ॥
हरिश्चन्द्रके रोहित नामवाला वीर्यवान् पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसने अपने राज्य-कार्यकी सिद्धिके लिये रोहितपुर बसाया था ॥ २६ ॥
कृत्वा राज्यं स राजर्षिः पालयित्वा त्वथ प्रजाः।
संसारासारतां ज्ञात्वा द्विजेभ्यस्तत्पुरं ददौ ॥ २७ ॥
उस राजर्षिने राज्य तथा प्रजाका पालन करनेके अनन्तर संसारकी असारताको जानकर अपना नगर ब्राह्मणोंको दे दिया था ॥ २७ ॥
हरितो रोहितस्याथ चञ्चुर्हारीत उच्यते।
विजयश्च सुदेवश्च चञ्चुपुत्रौ बभूवतुः ॥ २८ ॥
रोहितका पुत्र हरित और हरितका पुत्र चञ्चु हुआ—यह प्रसिद्ध है। चञ्चुके विजय और सुदेव नामवाले दो पुत्र हुए ॥ २८ ॥
जेता क्षत्रस्य सर्वस्य विजयस्तेन संस्मृतः।
रुरुकस्तनयस्तस्य राजधर्मार्थकोविदः ॥ २९ ॥
उस (विजय) ने सम्पूर्ण क्षत्रियोंको जीत लिया था, इसलिये वह विजय कहलाता था। उसके राजकार्य, धर्मकार्य और आर्थिक विषयोंमें चतुर रुरुक नामवाला पुत्र हुआ ॥ २९ ॥
रुरुकस्य वृकः पुत्रो वृकाद् बाहुस्तु जज्ञिवान्।
शकैर्यवनकाम्बोजैः पारदैः पह्लवैः सह ॥ ३० ॥
हैहयास्तालजङ्घाश्च निरस्यन्ति स्म तं नृपम्।
नात्यर्थं धार्मिकस्तात स हि धर्मयुगेऽभवत् ॥ ३१ ॥
रुरुकका पुत्र वृक हुआ और वृकके बाहु नामवाला पुत्र उत्पन्न हुआ। वह राजा उस (राज) धर्मके युगमें
हरिवंशपर्व ] चतुर्दशोऽध्यायः [ ५१
अतिधार्मिक नहीं था, इसलिये हैहय और तालजङ्घ वंशके राजाओंने शक, यवन, काम्बोज, पारद और पह्लव (आदि) राजाओंका साथ देकर बाहुकको उसके राज्यसे भ्रष्ट कर दिया ॥ ३०-३१ ॥
आग्नेयमस्त्रं लब्ध्वा च भार्गवात् सगरो नृपः।
जिगाय पृथिवीं हत्वा तालजङ्घान् सहैहयान् ॥ ३३ ॥
सगरने भृगुवंशी और्वसे आग्नेय अस्त्रको सीखकर तालजंघ और हैहय राजाओंको मारकर पृथिवीको जीत लिया ॥ ३३ ॥
सगरस्तु सुतो बाहोर्जज्ञे सह गरेण च।
और्वस्याश्रममागम्य भार्गवेणाभिरक्षितः ॥ ३२ ॥
बाहुकका जो पुत्र उत्पन्न हुआ वह गर अर्थात् विषके साथ ही उत्पन्न हुआ था। इससे वह सगर कहलाने लगा। (उसकी माताके) और्वके आश्रममें आनेपर भृगुवंशी और्वने उसकी रक्षा की थी ॥ ३२ ॥
शकानां पह्लवानां च धर्मं निरसदच्युतः।
क्षत्रियाणां कुरुश्रेष्ठ पारदानां स धर्मवित् ॥ ३४ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! धर्मको जाननेवाले पूर्णशक्ति-सम्पन्न सगरने शक, पह्लव और पारद क्षत्रियोंको धर्मभ्रष्ट कर दिया था ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि त्रिशङ्कुचरितकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमे त्रिशङ्कुके चरित्रका वर्णनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
चतुर्दशोऽध्यायः
सगरकी उत्पत्ति और चरित्र तथा सगर-पुत्रोंके उद्योगसे समुद्रका 'सागर' होना
जनमेजय उवाच
कथं स सगरो जातो गरेणैव सहाच्युतः।
किमर्थं च शकादीनां क्षत्रियाणां महौजसाम् ॥ १ ॥
धर्मं कुलोचितं क्रुद्धो राजा निरसदच्युतः।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण तपोधन ॥ २ ॥
**जनमेजने कहा—**तपोधन ! वे राजा सगर विषके साथ क्यों उत्पन्न हुए थे ? विषके साथ रहते हुए भी मरे क्यों नहीं ? और मर्यादासे च्युत न होनेवाले उन नरेशने क्रोधमें भरकर महाबली शक आदि क्षत्रियोंके कुलोचित धर्मको क्यों नष्ट कर दिया था ? इसका आप मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
बाहोर्व्यसनिनस्तात हृतं राज्यमभूत् किल।
हैहयैस्तालजङ्घैश्च शकैः सार्धं विशाम्पते ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**राजन् ! राजा बाहु शिकार और जुए आदि व्यसनोंमें ही पड़ा रहता था। तात ! (इस अवसरसे लाभ उठाकर) बाहुके राज्यको हैहय, तालजङ्घ तथा शकोंने छीन लिया ॥ ३ ॥
यवनाः पारदाश्चैव काम्बोजाः पह्लवाः खसाः।
एते ह्यपि गणाः पञ्च हैहयार्थे पराक्रमन् ॥ ४ ॥
यवन, पारद, काम्बोज, खस और पह्लव—इन पाँच गणोंने भी हैहय राजाओंके लिये पराक्रम किया था ॥ ४ ॥
हृतराज्यस्तदा राजा स वै बाहुर्वनं ययौ।
पत्न्या चानुगतो दुःखी वने प्राणानवासृजत् ॥ ५ ॥
राज्यके छिन जानेपर राजा बाहु वनको चला गया और उसकी पत्नी भी उसके पीछे-पीछे गयी। इसके बाद उस राजाने दुखी होकर वनमें ही अपने प्राणोंको त्याग दिया ॥ ५ ॥
पत्नी तु यादवी तस्य सगर्भा पृष्ठतोऽन्वगात्।
सपत्न्या च गरस्तस्यै दत्तः पूर्वमभूत् किल ॥ ६ ॥
उसकी पत्नी यदुवंशकी कन्या थी। वह गर्भवती थी, तब भी बाहुके पीछे-पीछे वनमें गयी थी। उसकी सौतने उसे पहले ही विष दे दिया था ॥ ६ ॥
सा तु भर्तुश्चितां कृत्वा वने तामध्यरोहत।
और्वस्तां भार्गवस्तात कारुण्यात् समवारयत् ॥ ७ ॥
तात ! जब वह स्वामीकी चिता बनाकर उसपर चढ़ने लगी, उसी समय वनमें विराजमान भृगुवंशी और्व ऋषिले दयाके कारण उसे रोका ॥ ७ ॥
तस्याश्रमे च तं गर्भं गरेणैव सहाच्युतम्।
व्यजायत महाबाहुं सगरं नाम पार्थिवम् ॥ ८ ॥
तब उसने उनके आश्रममें ही विष (गर) सहित गर्भको, जो आगे चलकर सगर नामक महाबाहु राजाके रूपमें प्रसिद्ध हुआ, उत्पन्न किया। राजा सगर कभी धर्मसे च्युत नहीं हुए थे ॥ ८ ॥
और्वस्तु जातकर्मादि तस्य कृत्वा महात्मनः।
अध्याप्य वेदशास्त्राणि ततोऽस्त्रं प्रत्यपादयत् ॥ ९ ॥
और्वने महामना सगरके जातकर्म आदि संस्कार कराकर उन्हें वेद और शास्त्र पढ़ाये, फिर अस्त्रविद्या सिखायी ॥ ९ ॥
| ५२ | श्रीमहाभारते खिलेभागे | [ हरिवंशे |
|---|
आग्नेयं तु महाघोरममरैरपि दुःसहम्।
स तेनास्त्रबलेनाजी बलेन च समन्वितः ॥ १० ॥
हैहयान्निजघानाशु क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ।
आजहार च लोकेषु कीर्तिं कीर्तिमंतां वरः ॥ ११ ॥
उन्होंने सगरको देवताओंके लिये भी असह्य महाघोर आग्नेय अस्त्र दिया था। जब वे अस्त्र-बल और शारीरिक बलसे सम्पन्न हो गये, तब क्रोधमें भरकर रुद्र जैसे शीघ्रतासे पशुओंका संहार करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने हैहयोंका संहार कर डाला। इस प्रकार कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ उन वीर पुरुषने संसारमें (अद्भुत) कीर्ति पायी थी ॥ १०-११ ॥
ततः शकान् सयवनान् काम्बोजान् पारदांस्तथा।
पह्लवांश्चैव निःशेषान् कर्तुं व्यवसितस्तदा ॥ १२ ॥
इसके अनन्तर उन्होंने शक, यवन, काम्बोज, पारद और पह्लवोंको भी निःशेष (सर्वथा नष्ट) करनेका निश्चय किया॥ १२ ॥
ते बध्यमाना वीरेण सगरेण महात्मना ।
वसिष्ठं शरणं गत्वा प्रणिपेतुर्मनीषिणम् ॥ १३ ॥
जब वीर और महात्मा सगर उनका सर्वनाश करने लगे, तब वे (शक, यवनादि) बुद्धिमान् वसिष्ठजीकी शरणमें गये और उनके पैरोंमें गिर पड़े ॥ १३ ॥
वसिष्ठस्त्वथ तान् दृष्ट्वा समयेन महाद्युतिः ।
सगरं वारयामास तेषां दत्त्वाभयं तदा ॥ १४ ॥
परम यशस्वी वसिष्ठजीने कुछ विशेष शर्तोंपर उनको अभयदान दिया और सगरको (उन्हें मारनेसे) रोका ॥ १४ ॥
सगरः स्वां प्रतिज्ञां च गुरोर्वाक्यं निशम्य च ।
धर्मं जघान तेषां वै वेषान्यत्वं चकार ह ॥ १५ ॥
सगरने अपनी प्रतिज्ञा और गुरुके वाक्यकी ओर ध्यान देकर (उनके प्राण नहीं लिये) उनके धर्मको नष्ट कर दिया; और उनका वेष बदल दिया ॥ १५ ॥
अर्द्धं शकानां शिरसो मुण्डं कृत्वा व्यसर्जयत्।
यवनानां शिरः सर्वं काम्बोजानां तथैव च ॥ १६ ॥
उन्होंने शकोंके आधे शिरको मूँड़कर छोड़ दिया, यवनोंके सारे शिरको मूँड़ दिया, और पह्लवोंके भी शिरको मुँड़वा दिया ॥ १६ ॥
पारदा मुक्तकेशाश्च पह्लवाः श्मश्रुधारिणः ।
निःस्वाध्यायवषट्काराः कृतास्तेन महात्मना ॥ १७ ॥
उन महात्मा नरेशने पारदोंके शिरको मुक्तकेश (खुले हुए केशोंवाला) कर दिया और पह्लवोंको श्मश्रुधारी (केवल दाढ़ीवाला) बना दिया और सबको स्वाध्याय तथा वषट्कारसे रहित कर दिया ॥ १७ ॥
शका यवनकाम्बोजाः पारदाश्च विशाम्पते ।
कोलिसर्पाः समहिषा दार्वाश्चोलाः सकेरलाः ॥ १८ ॥
सर्वे ते क्षत्रियास्तात धर्मस्तेषां निराकृतः ।
वसिष्ठवचनाद् राजन् सगरेण महात्मना ॥ १९ ॥
तात ! जनेश्वर ! शक, यवन, काम्बोज, पारद, कोलिसर्प, महिष, दर्द, चोल और केरल—ये सब क्षत्रिय ही थे। वसिष्ठजीके वचनसे महात्मा सगरने (इन सबका संहार न करके केवल) इनके धर्मको ही नष्ट कर दिया था ॥ १८-१९ ॥
खसांस्तुपारान्द्रांश्चोलांश्च मद्रान् किष्किन्धकांस्तथा।
कौन्तलांश्च तथा वङ्गान् साल्वान् कौद्रुणकांस्तथा ॥ २० ॥
स धर्मविजयी राजा विजित्येमां वसुंधराम् ।
अश्वं वै प्रेरयामास वाजिमेधाय दीक्षितः ॥ २१ ॥
उन धर्मविजयी राजाने अश्वमेधकी दीक्षा लेकर खस, तुषार, चोल, मद्र, किष्किन्धक, कौन्तल, वङ्ग, साल्व तथा कौद्रुण देशके राजाओंको जीता। इस प्रकार पृथ्वीका विजय करते हुए उन्होंने अश्वमेध यज्ञके लिये अपना घोड़ा छोड़ा ॥
तस्य चारयतः सोऽश्वः समुद्रे पूर्वदक्षिणे ।
वेलासमीपेऽपहृतो भूमिं चैव प्रवेशितः ॥ २२ ॥
जब उनका घोड़ा घुमाया जा रहा था, उस समय पूर्व-दक्षिणमें समुद्रके किनारे किसीने उस घोड़ेको चुरा लिया और उसे भूमिमें छिपा दिया ॥ २२ ॥
स तं देशं तदा पुत्रैः खानयामास पार्थिवः ।
आसेदुस्ते ततस्तत्र खन्यमाने महार्णवे ॥ २३ ॥
तमादिपुरुषं देवं हरिं कृष्णं प्रजापतिम् ।
विष्णुं कपिलरूपेण स्वपन्तं पुरुषोत्तमम् ॥ २४ ॥
उस समय राजा (सगर) ने अपने पुत्रोंसे उस स्थानको खुदवाया। समुद्रके खोदनेपर उनके पुत्रोंने आदिपुरुष, हरि (अविद्याको हरनेवाले), कृष्ण (सच्चिदानन्दस्वरूप) प्रजापति पुरुषोत्तम, (कपिलरूपी विष्णुको वहाँ सोते हुए समाधिमें स्थित) देखा ॥ २३-२४ ॥
तस्य चक्षुःसमुत्थेन तेजसा प्रतिबुध्यतः ।
दग्धास्ते वै महाराज चत्वारस्त्ववशेषिताः ॥ २५ ॥
बर्हकेतुः सुकेतुश्च तथा धर्मरथो नृपः ।
शूरः पञ्चजनश्चैव तस्य वंशकरो नृपः ॥ २६ ॥
उनके योगनिद्राको त्यागनेपर उनके नेत्रमोंसे निकलते हुए तेजसे वे सब (राजकुमार) भस्म हो गये। महाराज ! केवल बर्हकेतु, सुकेतु, राजा धर्मरथ और वंशको चलानेवाला शूर पञ्चजन—ये चार राजकुमार ही जीवित बच सके थे ॥ २५-२६ ॥
प्रादाच्च तस्मै भगवान् हरिनारायणो वरान् ।
अक्षयं वंशमिक्ष्वाकोः कीर्तिं चाप्यनिवर्तनीम् ॥ २७ ॥
पुत्रं समुद्रं च विभुः स्वर्गवासं तथाक्षयम् ।
पुत्राणां चाक्षयाँल्लोकांस्तस्य ये चक्षुषा हताः ॥ २८ ॥
हरिवंशपर्व ] 'पञ्चदशोऽध्यायः ५३
उन्हें (कपिलरूपी) विष्णु हरिनारायण भगवान्ने यह वरदान दिया था कि इक्ष्वाकुका वंश अक्षय रहेगा और राजा सगरकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं होगी। समुद्र उनका पुत्र कहा जायगा (अर्थात् भविष्यमें यह सागर नामसे प्रसिद्ध होगा) और उन्हें अक्षय स्वर्गवास मिलेगा। कपिलजीने अपने नेत्रके तेजसे भस्म हुए सगर-पुत्रोंको भी अक्षयलोकोंकी प्राप्ति होनेका वर दिया ॥ २७-२८ ॥
समुद्रश्चार्घ्यमादाय ववन्दे तं महीपतिम् ।
सागरत्वं च लेभे स कर्मणा तेन तस्य वै ॥ २९ ॥
(उस समय) समुद्रने अर्घ्य लेकर उन राजा (सगर) को प्रणाम किया और सगरके इस कर्मके कारण समुद्रका सागर नाम पड़ गया ॥ २९ ॥
तं चाश्वमेधिकं सोऽश्वं समुद्रादुपलब्धवान् ।
आजहाराश्वमेधानां शतं स सुमहायशाः ।
पुत्राणां च सहस्राणि षष्टिस्तस्येति नः श्रुतम् ॥ ३० ॥
उन्होंने अश्वमेधयज्ञके घोड़ेको भी समुद्रसे प्राप्त किया। इस तरह उन महायशस्वी राजाने सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे—ऐसा सुना जाता है। इन महाराजके पुत्रोंकी संख्या साठ हजार थी ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि सगरोत्पत्तिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें सगरकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः
सूर्यवंशका वर्णन
| जनमेजय उवाच<br>सगरस्यात्मजा वीराः कथं जाता महात्मनः ।<br>विक्रान्ताः षष्टिसहस्रा विधिना केन वा द्विज ॥ १ ॥<br>जनमेजयने कहा—द्विज ! महात्मा सगरके साठ हजार वीर और पराक्रमी पुत्र किस प्रकार उत्पन्न हुए थे ? ॥ १ ॥ | तत्रैका जगृहे पुत्राँल्लुब्धा शूरान् बहूंस्तथा ॥ ५ ॥<br>एकं वंशधरं त्वेका तथेत्याह च तां मुनिः ।<br>केशिन्यसूत सगरादसमञ्जसमात्मजम् ॥ ६ ॥<br>उनमेंसे एक पुत्रलोभिनी स्त्रीने तो बहुतसे शूरवीर पुत्रोंको माँग लिया तथा एकने एक ही वंशधर पुत्रको माँगा। तब मुनिने तथास्तु—ऐसा ही होगा, कहकर वरदान दे दिया। केशिनीके सगरसे असमञ्जस नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ५-६ ॥ |
| वैशम्पायन उवाच<br>द्वे भार्ये सगरस्यास्तां तपसा दग्धकिल्बिषे ।<br>ज्येष्ठा विदर्भदुहिता केशिनी नाम विश्रुता ॥ २ ॥<br>वैशम्पायनजीने उत्तर दिया—सगरकी दो रानियाँ थीं। तपसे उनके पाप नष्ट हो गये थे। उनमें बड़ी रानी विदर्भ-नरेशकी पुत्री थीं और केशिनी नामसे प्रसिद्ध थीं ॥ २ ॥ | राजा पञ्चजनो नाम बभूव सुमहाबलः ।<br>इतरा सुषुवे तुम्बीं बीजपूर्णामिति श्रुतिः ॥ ७ ॥<br>वह पञ्चजन नामसे प्रसिद्ध महाबलवान् राजा था। दूसरीने बीजोंसे भरी हुई एक तूंबी उत्पन्न की, यह बात प्रसिद्ध है ॥ ७ ॥ |
| कनीयसी तु या तस्य पत्नी परमधर्मिणी ।<br>अरिष्टनेमिदुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ ३ ॥<br>उन राजाकी जो छोटी पत्नी थी, वह बड़ी ही धर्मात्मा थी। वह अरिष्टनेमि (कश्यप) की पुत्री थी। उसके समान पृथिवीपर कोई भी दूसरी रूपवती स्त्री नहीं थी ॥ ३ ॥ | तत्र षष्टिसहस्राणि गर्भास्ते तिलसम्मिताः ।<br>सम्बभूवुर्यथाकालं ववृधुश्च यथाक्रमम् ॥ ८ ॥<br>उस तूंबीमें तिलके समान साठ हजार गर्भ थे, जो समय आनेपर उत्पन्न हुए और क्रमशः बढ़ने लगे ॥ ८ ॥ |
| और्वस्ताभ्यां वरं प्रादात् तं निबोध जनाधिप ।<br>षष्टिं पुत्रसहस्राणि गृह्णात्वेका तपस्विनी ॥ ४ ॥<br>एकं वंशधरं त्वेका यथेष्टं वरयत्विति ।<br>जनाधिप ! और्वने उन दोनोंको जो वर दिया था, उसे सुनो। (और्वने कहा था) दोनोंमेंसे कोई एक तपस्विनी रानी तो साठ हजार पुत्र माँग ले और एक वंश चलानेवाले एक ही पुत्रको माँगे। अब जिसे जो वर अच्छा लगता हो वह उस वरको माँग ले ॥ ४½ ॥ | घृतपूर्णेषु कुम्भेषु तान् गर्भान् निदधे पिता ।<br>धात्रीश्चैकैकशः प्रादात् तावतीरेव पोषणे ॥ ९ ॥<br>पिताने उन गर्भोको घृतसे भरे हुए घड़ोंमें डाल दिया और उनका पोषण करनेके लिये एक-एक घड़ेपर एक-एक करके उतनी ही धाइयोंको नियुक्त कर दिया ॥ ९ ॥<br><br>ततो दशसु मासेषु समुत्तस्थुर्यथासुखम् ।<br>कुमारास्ते यथाकालं सगरप्रीतिवर्धनाः ॥ १० ॥ |
५४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
दस महीने बीतनेपर सगरकी प्रीतिको बढ़ानेवाले बहुत-से बच्चे सुखपूर्वक समयानुसार उत्पन्न होने लगे ॥ १० ॥
षष्टिः पुत्रसहस्राणि तस्यैवामभवन् नृप ।
गर्भादलाबुमध्द्याद् वै जातानि पृथिवीपते ॥ ११ ॥
राजन् ! इस प्रकार सगरके साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए थे और पृथिवीपते ! वे तूँबीके बीजोंकी तरह तूँबी (लौकी) के मध्यमें रखे हुए गर्भोंसे उत्पन्न हुए थे ॥ ११ ॥
तेषां नारायणं तेजः प्रविष्ठानां महात्मनाम् ।
एकः पञ्चजनो नाम पुत्रो राजा बभूव ह ॥ १२ ॥
भगवान् नारायण (कपिलदेव) के तेजमें प्रविष्ट हुए राजकुमारोंमेंसे एक पञ्चजन (असमंजस) नामक राजपुत्र ही राजा हो पाया ॥ १२ ॥
सुतः पञ्चजनस्यासीदंशुमान् नाम वीर्यवान् ।
दिलीपस्तनयस्तस्य खट्वाङ्ग इति विश्रुतः ॥ १३ ॥
पञ्चजन (असमंजस) का पुत्र वीर्यवान् अंशुमान् हुआ। उसका पुत्र दिलीप हुआ, जो खट्वाङ्ग नामसे भी प्रसिद्ध है ॥ १३ ॥
येन स्वर्गादिहागत्य मुहूर्तं प्राप्य जीवितम् ।
त्रयोऽनुसंहिता लोका बुद्ध्या सत्येन चानघ ॥ १४ ॥
अनघ ! उसने मुहूर्त भरका (४८ मिनटका) जीवन पाकर स्वर्गसे इस मृत्युलोकमें आकर सूक्ष्म बुद्धिसे तथा सत्य (ब्रह्मभाव) के द्वारा तीनों लोकोंको तत्त्वतः जान लिया था ॥ १४ ॥
दिलीपस्य तु दायादो महाराजो भगीरथः ।
यः स गङ्गां सरिच्छ्रेष्ठामवातारयत प्रभुः ॥ १५ ॥
दिलीपके पुत्र महाराज भगीरथ हुए । उन प्रभुने नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीको (स्वर्गसे भूमिपर) उतारा था ॥ १५ ॥
कीर्तिमान् स महाभागः शक्रतुल्यपराक्रमः ।
समुद्रमानयच्चैनां दुहितृत्वेन कल्पयन् ।
तस्माद् भागीरथी गङ्गा कथ्यते वंशचिन्तकैः ॥ १६ ॥
इन्द्रके तुल्य पराक्रमी उन यशस्वी महापुरुषने गङ्गाजीको समुद्रतक पहुँचा दिया और उन्होंने गङ्गाजीको अपनी पुत्री बनाया; इसीलिये वंशका कीर्तन करनेवाले विद्वान् गङ्गाजीको भागीरथी (भगीरथकी पुत्री) कहते हैं ॥ १६ ॥
भगीरथसुतो राजा श्रुत इत्यभिविश्रुतः ।
नाभागस्तु श्रुतस्यासीत् पुत्रः परमधार्मिकः ॥ १७ ॥
भगीरथका पुत्र श्रुत नामसे प्रसिद्ध है। श्रुतका नाभाग नामक परमधार्मिक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १७ ॥
अम्बरीषस्तु नाभागिः सिन्धुद्वीपपिताभवत् ।
अयुताजिद् तु दायादः सिन्धुद्वीपस्य वीर्यवान् ॥ १८ ॥
नाभागका पुत्र अम्बरीष हुआ । वह सिन्धुद्वीपका पिता था । सिन्धुद्वीपके अयुताजित् नामक वीर्यवान् पुत्र हुआ ॥ १८ ॥
अयुताजित्सुतस्त्वासीदृतुपर्णो महायशाः ।
दिव्याक्षहृदयज्ञो वै राजा नलसखो बली ॥ १९ ॥
अयुताजित्के ऋतुपर्णनामवाला महायशस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। वह दिव्य अक्ष (द्यूत) विद्याका रहस्यवेत्ता, राजा नलका सखा तथा बड़ा बली था ॥ १९ ॥
ऋतुपर्णसुतस्त्वासीदार्तुपर्णिर्महीपतिः ।
सुदासस्तस्य तनयो राजा त्विन्द्रसखोऽभवत् ॥ २० ॥
ऋतुपर्णका पुत्र राजा आर्त्तपर्णि हुआ। उसका पुत्र राजा सुदास हुआ, जो इन्द्रका मित्र था ॥ २० ॥
सुदासस्य सुतस्त्वासीत्सौदासो नाम पार्थिवः ।
ख्यातः कल्माषपादो वै नाम्ना मित्रसहस्तथा ॥ २१ ॥
सुदासके सौदास नामका पुत्र हुआ, जो राजा कल्माषपाद और मित्रसह नामसे भी प्रसिद्ध था ॥ २१ ॥
कल्माषपादस्य सुतः सर्वकर्मेति विश्रुतः ।
अनरण्यस्तु पुत्रोऽभूद् विश्रुतः सर्वकर्मणः ॥ २२ ॥
कल्माषपादके सर्वकर्मा नामसे प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुआ और सर्वकर्माका पुत्र अनरण्य नामसे विख्यात हुआ ॥ २२ ॥
अनरण्यसुतो निघ्नो निघ्नपुत्रौ बभूवतुः ।
अनमित्रो रघुश्चैव पार्थिवर्षभ सत्तमो ॥ २३ ॥
नृपश्रेष्ठ ! अनरण्यका पुत्र निघ्न हुआ, निघ्नके अनमित्र और रघु नामक दो श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २३ ॥
अनमित्रस्य धर्मात्मा विद्वान् दुलिदुहोऽभवत् ।
दिलीपस्तनयस्तस्य रामप्रपितामहः ॥ २४ ॥
अनमित्रके दुलिदुह नामवाला धर्मात्मा और विद्वान् पुत्र उत्पन्न हुआ। दुलिदुहके पुत्र दिलीप हुए, जो श्रीरामचन्द्रजीके वृद्ध प्रपितामह थे ॥ २४ ॥
दीर्घबाहुर्दिलीपस्य रघुर्नामाभवत् सुतः ।
अयोध्यायां महाराजो रघुश्चासीन्महाबलः ॥ २५ ॥
दिलीपके रघुनामक महाबाहु पुत्र उत्पन्न हुए। ये रघु अयोध्यामें महाबली सम्राट् हुए ॥ २५ ॥
अजस्तु रघुनो जज्ञे अजाद् दशरथोऽभवत् ।
रामो दशरथाज्जज्ञे धर्मात्मा सुमहायशाः ॥ २६ ॥
रघुसे अज उत्पन्न हुए । अजसे दशरथ हुए तथा दशरथसे धर्मात्मा एवं महायशस्वी श्रीरामचन्द्र प्रकट हुए ॥ २६ ॥
| हरिवंशपर्व ] | षोडशोऽध्यायः | ५५ |
|---|
रामस्य तनयो जज्ञे कुश इत्यभिविश्रुतः।
अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः ॥ २७ ॥
श्रीरामके कुश नामसे प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुआ। कुशके अतिथि नामक पुत्र हुआ और अतिथिके पुत्रका नाम निषध था ॥ २७ ॥
निषधस्य नलः पुत्रो नभः पुत्रो नलस्य तु।
नभस्य पुण्डरीकस्तु क्षेमधन्वा ततः स्मृतः ॥ २८ ॥
निषधका पुत्र नल, नलका पुत्र नभ, नभका पुत्र पुण्डरीक और पुण्डरीकका पुत्र क्षेमधन्वा हुआ ॥ २८ ॥
क्षेमधन्वसुतस्त्वासीद् देवानीकः प्रतापवान्।
आसीदहीनगुर्नाम देवानीकसुतः प्रभुः ॥ २९ ॥
क्षेमधन्वाका पुत्र प्रतापी देवानीक हुआ, देवानीकके अहीनगु नामक प्रभावशाली पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ २९ ॥
अहीनगोस्तु दायादः सुधन्वा नाम पार्थिवः।
सुधन्वनः सुतश्चैव ततो जज्ञेऽनलो नृपः ॥ ३० ॥
अहीनगुका पुत्र राजा सुधन्वा हुआ और सुधन्वाका पुत्र अनल नामक राजा हुआ ॥ ३० ॥
उक्थो नाम स धर्मात्मानलपुत्रो बभूव ह।
वज्रनाभः सुतस्तस्य उक्थस्य च महात्मनः ॥ ३१ ॥
अनलके उक्थ नामक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ और उन महात्मा उक्थके पुत्रका नाम वज्रनाभ हुआ ॥ ३१ ॥
शङ्खस्तस्य सुतो विद्वान् व्युषिताश्व इति श्रुतः।
पुष्पस्तस्य सुतो विद्वानर्थसिद्धिश्च तत्सुतः ॥ ३२ ॥
वज्रनाभके शंख नामक विद्वान् पुत्र उत्पन्न हुआ, जो व्युषिताश्वके नामसे भी प्रसिद्ध है। शंखका पुत्र पुष्प और पुष्पका पुत्र विद्वान् अर्थसिद्धि था ॥ ३२ ॥
सुदर्शनः सुतस्तस्य अग्निवर्णः सुदर्शनात् ।
अग्निवर्णस्य शीघ्रस्तु शीघ्रस्य तु मरुः सुतः ॥ ३३ ॥
अर्थसिद्धिका पुत्र सुदर्शन, सुदर्शनसे अग्निवर्ण, अग्निवर्णका पुत्र शीघ्र और शीघ्रके मरु नामका पुत्र हुआ ॥ ३३ ॥
मरुस्तु योगमास्थाय कलापद्वीपमास्थितः।
तस्यासीद् विश्रुतवतः पुत्रो राजा बृहद्बलः ॥ ३४ ॥
मरु योगका आश्रय लेकर कलापद्वीपमें रहने लगे। परम प्रसिद्ध मरुके पुत्र राजा बृहद्बल हुए ॥ ३४ ॥
नलौ द्वावेव विख्यातौ पुराणे भरतर्षभ।
वीरसेनात्मजश्चैव यश्चेक्ष्वाकुकुलोद्भवः ॥ ३५ ॥
भरतर्षभ ! पुराणमें नल नामसे दो ही राजा प्रसिद्ध हैं—एक वीरसेन-पुत्र नल और दूसरा इक्ष्वाकु-कुलोत्पन्न (निषध-पुत्र) नल ॥ ३५ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवाः प्राधान्येनेह कीर्तिताः।
एते विवस्वतो वंशे राजानो भूरितेजसः ॥ ३६ ॥
विवस्वान् (सूर्य) के वंशमें ये परम तेजस्वी राजा उत्पन्न हुए हैं। यहाँ इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुए मुख्य-मुख्य राजाओंका वर्णन किया गया है ॥ ३६ ॥
पठन् सम्यगिमां सृष्टिमादित्यस्य विवस्वतः।
श्राद्धदेवस्य देवस्य प्रजानां पुष्टिदस्य च ॥ ३७ ॥
प्रजावानेति सायुज्यमादित्यस्य विवस्वतः।
विपाप्मा विरजाश्चैव आयुष्मान्श्च भवत्युत ॥ ३८ ॥
जो मनुष्य अदितिनन्दन भगवान् सूर्यकी तथा प्रजाओंके पोषक देवता श्राद्धदेवकी इस सृष्टि-परम्पराका भलीभाँति पाठ करता है, वह संतानवान् होता और निष्पाप, रजोगुण-रहित एवं दीर्घायु हो अन्तमे भगवान् सूर्यका सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ३७-३८ ॥
इति श्रीमद्भारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आदित्यस्य वंशानुकीर्तनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें सूर्यवंशका वर्णनविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
षोडशोऽध्यायः
श्राद्धकल्प—जनमेजयद्वारा पिताका श्राद्ध तथा पितृस्वरूपनिर्णयसम्बन्धी प्रश्न, शन्तनुका अपने श्राद्धमें स्वयं हाथ बढ़ाकर भीष्मसे पिण्ड माँगना
| जनमेजय उवाच | |
|---|---|
| कथं वै श्राद्धदेवत्वमादित्यस्य विवस्वतः।<br>श्रोतुमिच्छामि विप्राग्र्य श्राद्धस्य च परं विधिम् ॥ १ ॥ | सूर्यके पुत्र यम श्राद्धदेव क्यों कहलाते हैं ? और श्राद्धकी उत्तम विधि क्या है ? इसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥ |
| जनमेजयने पूछा— द्विजश्रेष्ठ ! अदितिनन्दन भगवान् | पितॄणामादिसर्गं च क एते पितरः स्मृताः।<br>एवं च श्रुतमस्माभिः कथ्यमानं द्विजातिभिः ॥ २ ॥ |
५६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
स्वर्गस्थाः पितरो ये च देवानापि देवताः।
इति वेदविदः प्राहुरेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
पितरोंकी आदि सृष्टि कैसे हुई ? ये पितर कौन हैं ? हमने ब्राह्मणोंके मुखसे यह बात सुनी है कि जो पितर स्वर्गमें स्थित हैं, वे देवताओंके भी देवता हैं। वेदके जाननेवाले भी ऐसा ही कहते हैं। अतः मैं इस बातको भलीभाँति जानना चाहता हूँ ॥ २-३ ॥
ये च तेषां गणाः प्रोक्ता यच्च तेषां बलं परम्।
यथा च कृतमस्माभिः श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन् ॥ ४ ॥
प्रीताश्च पितरो ये श्न श्रेयसा योजयन्ति हि।
एषं वेदितुमिच्छामि पितॄणां सर्गमुत्तमम् ॥ ५ ॥
उनके जो गण कहे गये हैं, उनका जो परम बल है और हमारा किया हुआ श्राद्ध जिस प्रकार उन्हें तृप्त करता है तथा जो पितर प्रसन्न होकर मनुष्योंका कल्याण करते हैं उन सबको एवं उत्तम पितृसर्गको मैं जानना चाहता हूँ ॥ ४-५ ॥
वैशम्पायन उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि पितॄणां सर्गमुत्तमम्।
यथा च कृतमस्माभिः श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन्।
प्रीताश्च पितरो ये श्न श्रेयसा योजयन्ति हि ॥ ६ ॥
मार्कण्डेयेन कथितं भीष्माय परिपृच्छते।
अपृच्छद् धर्मराजो हि शरतल्पगतं पुरा।
एवमेव पुरा प्रश्नं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ७ ॥
तद् तेऽनुपूर्व्या वक्ष्यामि भीष्मेणोदाहृतं यथा।
गीतं सनत्कुमारेण मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी बोले—बहुत अच्छा, मैं तुमसे पितरोंके उत्तम सर्गका वर्णन करूँगा, हमारा किया हुआ श्राद्ध जिस प्रकार पितरोंको तृप्त करता है तथा जो पितर श्राद्धसे संतुष्ट होकर हमें कल्याणके भागी बनाते हैं, उनका परिचय दूँगा। पूर्वकालमें भीष्मके पूछनेपर मार्कण्डेयजीने उनसे इस विषयका वर्णन किया था। फिर महाभारतकालमें शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजीसे धर्मराज युधिष्ठिरने भी पहले ऐसा ही प्रश्न किया था, जैसा इस समय तुम मुझसे पूछ रहे हो। भीष्मजीने युधिष्ठिरको जिस प्रकार उत्तर दिया था, वह सब मैं तुम्हें क्रमशः बताऊँगा। पहले मार्कण्डेयजीके पूछनेपर सनत्कुमारजीने जो उपदेश दिया था, वही युधिष्ठिर और भीष्मके संवादमें कहा गया है ॥ ६-८ ॥
युधिष्ठिर उवाच
पुष्टिकामेन धर्मज्ञ कथं पुष्टिरवाप्यते।
एतद् वै श्रोतुमिच्छामि किं कुर्व्वाणो न शोचति ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—धर्मज्ञ ! पुष्टि चाहनेवाला पुरुष किस प्रकार पुष्टि पा सकता है और कैसा कर्म करनेसे मनुष्यको शोक नहीं करना पड़ता ? इसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
श्राद्धैः प्रीणाति हि पितॄन् सर्वकामफलैस्तु यः।
तत्परः प्रयततः श्राद्धी प्रेत्य चेह च मोदते ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर ! जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्राद्धोंद्वारा तत्पर होकर पितरोंको तृप्त करता है, वह पितरोंकी प्रीतिमें लीन रहनेवाला श्राद्धकर्ता इस संसारमें आनन्दभागी होता है और मरनेके बाद परलोकमें सुख भोगता है ॥ १० ॥
पितरो धर्मकामस्य प्रजाकामस्य च प्रजाम्।
पुष्टिकामस्य पुष्टिं च प्रयच्छन्ति युधिष्ठिर ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर ! पितर धर्म चाहनेवालेको धर्म, संतान चाहनेवालेको संतान और पुष्टि चाहनेवालेको पुष्टि भी प्रदान करते हैं ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
वर्तन्ते पितरः स्वर्गे केषांचिन्नरके पुनः।
प्राणिनां नियतं वापि कर्मजं फलमुच्यते ॥ १२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—किन्हींके पितर स्वर्गमें रहते हैं और किन्हींके नरकमें; क्योंकि यह बात प्रसिद्ध है कि प्राणियोंको (अपने) कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाला फल अवश्य भोगना पड़ता है ॥ १२ ॥
श्राद्धानि चैव कुर्व्वन्ति फलकामाः सदा नराः।
अभिसंधाय पितरं पितुश्च पितरं तथा ॥ १३ ॥
पितुः पितामहं चैव त्रिषु पिण्डेषु नित्यशः।
तानि श्राद्धानिदत्तानि कथं गच्छन्ति वै पितॄन् ॥ १४ ॥
फल चाहनेवाले पुरुष सदा पिता, पितामह और प्रपितामहको लक्ष्य करके श्राद्ध करते हैं। सर्वदा इन तीन पिण्डोंमें ही दिये गये श्राद्ध पितरोंको कैसे प्राप्त होते हैं ? ॥ १३-१४ ॥
कथं च शक्तास्ते दातुं नरकस्थाः फलं पुनः।
के वा ते पितरोऽन्ये स्युःकान् यजामो वयं पुनः ॥ १५ ॥
और वे पितर (जब स्वयं) नरकमें निवास कर रहे हैं, तब वे फल भी कैसे दे सकते हैं ? अथवा यदि वे पितर उनसे भिन्न हैं तो कौन हैं—उनका क्या परिचय है ? हम किन पितरोंकी पूजा करें ? ॥ १५ ॥
देवा अपि पितॄन् स्वर्गे यजन्तीति च नः श्रुतम्।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते ॥ १६ ॥