हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
कर परिवार के साथ विन्ध्याचल के जंगल में चली गई। जब वहाँ वह अग्निप्रवेश करने के लिए तैयार थी तब हर्ष उसे ढूँढते हुए पहुँच गए। इस अवस्था में सहसा भाई को पाकर वह विलाप करने लगी। हर्ष ने रोते हुए कहा—'अब धीरज धरो, अपने को सम्हालो।' राज्यश्री पर इस समय दुःख का पहाड़ टूट पड़ा था, हर्ष ने मृत्यु के मुख से खींच कर उसे बचा लिया। वह अपने सतीत्व की रक्षा के लिए शत्रु के कारावास से भी भाग निकली। भारतीय नारी का यह उच्च आदर्श राज्यश्री में एकान्ततः प्रस्फुरित होता है। बौद्धभिक्षु आचार्य दिवाकरमित्र के सामने राज्यश्री ने हर्ष से विनयपूर्वक कषाय वस्त्र धारण की अनुज्ञा माँगी। एक विधवा के तपस्वी जीवन के लिए आत्मसंयम के अतिरिक्त और दूसरा क्या कर्तव्य रह जाता है। हर्ष ने भाई के वध का बदला लेने की जो प्रतिज्ञा की थी उसे सुनाकर तत्काल राज्यश्री को ऐसा न करने के लिए कहा। उन्होंने भिक्षु दिवाकरमित्र से कह दिया कि प्रतिज्ञा पूरी होने पर मैं और यह एक साथ कषाय ग्रहण करेंगे। तब राज्यश्री ने भाई की बात पर आग्रह नहीं किया। इस प्रकार इन प्रमुख पात्रों की चर्चा के साथ ही हर्षचरित का कथानक भी बहुत अंश में सामने आ जाता है।
कादम्बरी
महाकवि बाणभट्ट की दूसरी 'अतिद्वयी' रचना कादम्बरी है। यह एक कथा है। आधुनिक परिभाषा में कथा को ही उपन्यास कहते हैं। यद्यपि कथा और उपन्यास में बहुत अन्तर है, तथापि काल्पनिकता का सम्बन्ध दोनों में एक-सा अभिलक्षित होता है। आधुनिक उपन्यास कथा का विकसित रूप है और कथा उपन्यास का पूर्वरूप। कादम्बरी संस्कृत साहित्य की सर्वोत्कृष्ट गद्य-रचना है और बाण की अमर कृति है। 'हर्षचरित इस पृथिवी लोक की तथ्यात्मक आख्यायिका है पर कादम्बरी दिव्य-लोक को भूतल पर लाने वाली काव्य-कल्पना है।' यह दृढ़ता के साथ कहा जा सकता है कि बाण हर्षचरित की अपेक्षा कादम्बरी में अधिक सफल हुए हैं। कादम्बरी की कथा के सम्बन्ध में यह मान्यता है कि यह गुणाढ्यकृत बृहत्कथा से ली गई है। गुणाढ्य ने बृहत्कथा को पैशाची भाषा में लिखा था, जो अब तक उपलब्ध नहीं है। उसके संस्कृत अनुवाद के रूप में क्षेमेन्द्रकृत बृहत्कथामंजरी और सोमदेवकृत कथासरित्सागर में कादम्बरी-कथा का मूल रूप सुरक्षित है। भारतीय प्राचीन साहित्य में उपजीव्य तीन ग्रन्थ विशेष रूप से रहे हैं—रामायण, महाभारत और बृहत्कथा। अतः सम्भव है कि बाण ने अपनी कथा की मूल घटनाएँ बृहत्कथा से ली हों, किन्तु यह निर्विवाद है कि उन्होंने अपनी प्रतिभा से उसे एक सर्वथा नवीन और मौलिक रूप दे दिया है। कादम्बरी की कथा संक्षेप में इस प्रकार है—'विदिशा के राजा शूद्रक के समीप एक चाण्डालकन्या पंजरबद्ध आश्चर्यकारी शुक को उनकी सेवा में अर्पित करती है। यह
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शुक अपने जन्म से लेकर महर्षि जाबालि के आश्रम में पहुँचने तक का वृत्तान्त सुनाता है। महर्षि जाबालि शुक के पूर्वजन्म की कथा सुनाते हैं—उज्जयिनी के राजा तारापीड थे। उनकी रानी विलासवती थी। उनके गुणवान् महामन्त्री शुकनास थे। बड़ी प्रतीक्षा के बाद राजा को एक पुत्र होता है। उसी समय शुकनास की पत्नी मनोरमा के गर्भ से भी पुत्र होता है। राजा के पुत्र का नाम चन्द्रापीड़ था और शुकनास के पुत्र का नाम वैशम्पायन। दोनों ने एक साथ गुरुकुल में अध्ययन किया। दोनों दिग्विजय के लिए सेना लेकर निकल पड़े। राजकुमार चन्द्रापीड़ एक बार किन्नर-मिथुन का पीछा करते हुए बहुत दूर अच्छोद नामक सरोवर के समीप पहुँच गए। वहाँ महाश्वेता नामक एक तपस्विनी गन्धर्वकन्या मिलती है। पूछने पर अवगत हुआ कि उसका अभीप्सित प्रिय पुण्डरीक मिलने के पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। प्रिय के भावी मिलन की आशा में वह अच्छोद सरोवर के किनारे रहने लगी थी। उसकी सखी कादम्बरी ने भी कौमार्यव्रत धारण किया था। वह चन्द्रापीड़ को कादम्बरी के पास ले जाती है वहाँ प्रथम साक्षात्कार में ही चन्द्रापीड़ और कादम्बरी दोनों अनुरक्त हो जाते हैं। चन्द्रापीड़ फिर लौट कर अपने स्थान पर आते हैं। वहाँ से पिता का पत्र पाकर अकेले घर आ जाते हैं। घर से फिर स्कन्धावार पहुँच कर वैशम्पायन को वहाँ न देख दौड़े-दौड़े महाश्वेता के पास जाते हैं। महाश्वेता ने जब यह कहा कि मुझसे उसने प्रणययाचना की तो मैंने उसको शुक बना दिया, तो इस प्रकार अपने सुहृद् की आपत्ति से चन्द्रापीड़ के प्राण निकल जाते हैं। वहाँ कादम्बरी भी पहुँचकर चन्द्रापीड़ के पुनः मिलन की आशा से उनके शवशरीर की सेवा करती है। यहाँ जाबालि की कथा समाप्त हो जाती है। तब शुक ने शूद्रक से कहा कि मैं जाबालि के आश्रम से महाश्वेता के लिए उड़ चला तो बीच ही में चाण्डालकन्या ने पकड़ कर मुझे आप के समीप ला दिया। तब चाण्डाल- कन्या ने कहा कि मैं लक्ष्मी हूँ, यह शुक पुण्डरीक है और आप चन्द्रापीड़ हैं। शूद्रक को कादम्बरी का प्रेम स्मृत हो उठा। उनके प्राण निकल गए और उधर चन्द्रापीड़ जीवित हो गए। शुक की आत्मा भी पुण्डरीक के मृत शरीर में आकर पुनः मिल गई, जो चन्द्रलोक में सुरक्षित था। तत्पश्चात् महाश्वेता और पुण्डरीक, कादम्बरी और चन्द्रापीड़ सब एकत्र हो गए और विवाहित होकर सुख-पूर्वक रहने लगे। इस प्रकार कादम्बरी अनेक अप्राकृतिक घटनाओं से भरी होने पर भी कुतूहल उत्पन्न करने में अपूर्व है। उत्सुकता तो कथा के आरम्भ में चाण्डालकन्या द्वारा शूद्रक की सभा में वैशम्पायन शुक के लाए जाने से ही लेकर आरम्भ हो जाती है और पाठक को बरबस आगे बढ़ने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कथा की प्रधान नायिका कादम्बरी बड़ी लम्बी चढ़ान के बाद मिलती है। अनेक उपकथाएँ भी साथ-साथ चल पड़ती हैं जो कथा के सूत्र में पुष्टि लाने का काम करती हैं। महाश्वेता की प्रणयकथा कादम्बरी की प्रणयकथा के अन्तर्भुक्त होने पर भी अपना अस्तित्व अलग रखती है। कादम्बरी एक मुग्धा नायिका
( २६ ) है जो सिर्फ प्रणय करना जानती है, महाश्वेता तपी हुई वनिता है जो प्रणय के सच्चे मार्ग पर कादम्बरी को प्रतिष्ठित करने में सहायक होती है। कादम्बरी से महाश्वेता का व्यक्तित्व किसी अंश में दुर्बल नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि कादम्बरी बिलकुल एक कठपुतली रह गई है। वह सबके प्रभाव से अलग होकर अपने प्रणय का अस्तित्व बनाने में अत्यन्त निपुण है। आरम्भ में उसका वासना-जनित प्रेम भी आगे चल कर विरह-तप्त होकर महाश्वेता के प्रणय के समान ही पवित्र बन गया। आरम्भ से अन्त तक कादम्बरी कथा अनेक प्रकार की विविधतापूर्ण घटनाओं से भरी होने के कारण कवि के वस्तुविन्यास- कौशल का परिचय देती है। बाण के चरित्र की अपनी विशेषता है। जैसा कि हम हर्षचरित में देख चुके हैं, उसी प्रकार कादम्बरी के भी सभी पात्र सजीव बन पड़े हैं। नवयुवक चन्द्रापीड जो अपनी सौम्यता में, महाराज तारापीड जो अपनी उदारता में, आदर्श महामन्त्री शुकनास जो अपनी अगाध प्रवीणता में, रानी विलासवती जो अपनी सुकुमारता में, छाया की भाँति चन्द्रापीड का अनुसरण करने वाली पत्रलेखा अपनी तत्परता में, कठोर कपिंजल अपनी स्नेहमयता में कादम्बरी के जीते-जागते पात्र हैं जो पाठक के मन पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। कादम्बरी के चित्रण में बाण ने भावों के सम्बन्ध में अपने मार्मिक निरीक्षण का अपूर्व परिचय दिया है। कादम्बरी के समस्त भाव सहृदय और समीक्षक पाठक के लिए अलग से अध्ययन के विषय हैं। बाण के मौलिक कवित्व का साक्षात्कार इन्हीं विषयों में होता है।
वर्णन-वैचित्र्य कल्पनाओं का अतिरंजित हो जाना बाण जैसे कल्पनाशील मन वाले भावुकहृदय कवि के लिए कोई आश्चर्यजनक नहीं। सबसे बड़ी बात तो यह दृष्टि में आती है कि बाण ने अपने बहुमुखी जीवन के अनुभवों को समेट कर पद-पद में अनुस्यूत कर डाला है। हर्षचरित में बाण की दृष्टि के सामने उनके जो समस्त अनुभव थे, कादम्बरी में वे ही बिलकुल उनके तरल मानस से अन्तर्लीन होकर कुछ विलक्षण रूप में प्रस्फुरित होते हैं। जैसे कोई चित्रकार किसी प्रपात के मनोहर दृश्य के सामने बैठ कर उसका रेखाचित्र बना लेता है और घर पर जाकर आँखों के मार्ग से मन में उतारे हुए उस हृदय के समस्त छविमय आकार को विविध प्रकार के रंगों से अभिव्यंजित करता है, ठीक उसी प्रकार बाण ने अभ्यास के लिए अनुभव के विविध रूपों का एक खाका तैयार कर लिया, जो हर्षचरित के रूप में सहृदय जनों के सामने है। फिर वे ही अनुभव नये-नये रंगरूप में अलौकिकता के साथ कादम्बरी के पद-पद में बीन गए हैं। यही कारण है कि कवि की सफलता हर्ष- चरित की अपेक्षा कादम्बरी में अधिक समझी जाती है। हर्षचरित में जो सेनापति सिंहनाद का उपदेश है उसकी कोटि में कादम्बरी का शुकनासोपदेश कितना विस्तृत और
( २७ ) पूर्ण बन गया है। ऐसा लगता है जैसे महर्षि व्यास ने महाभारत के अतिरिक्त प्रकरण में गीता को उपनिबद्ध कर दिया है वैसे ही महाकवि बाण ने शुकनासोपदेश के नाम से एक अतिरिक्त रचना ही कादम्बरी में उपनिबद्ध कर दी हो। कादम्बरी शताधिक वर्णनों का अद्भुत संग्रह है। डा० वासुदेवशरणजी अग्रवाल के शब्दों में कादम्बरी में बाण की वर्णन-क्षमता का मृद्वीकापाक हुआ है। बाण की चित्र- ग्राहिणी प्रतिभा वर्णनों में वर्णनातीत सफल हुई है। कादम्बरी में बाण ने नदी, वन, वृक्ष सरोवर, नगर, सायं-प्रातः, चन्द्रोदय, धूलिपटल, राजकुल, इन्द्रायुध, अश्व आदि के वर्णनों में बड़ी दूरदर्शिता से काम लिया है। व्यक्ति चित्रण में उसके सौन्दर्य की सूक्ष्मतम कल्पना में बाण के अतिरिक्त कौन सफल हो सकता है? यद्यपि संस्कृत-साहित्य में वर्णनकर्ता कवियों की कमी नहीं है, कालिदास का तो कहना क्या ? लेकिन बाण विस्तार-प्रधान वर्णन के पक्षपाती हैं। कालिदास जिस चित्र को थोड़े में ही अंकित कर सके हैं उसे बाण ने भव्य रूप देकर बड़ा बना दिया है। यही कारण है कि कालिदास के पश्चात् सर्वाधिक मौलिकता बाण की अपेक्षा अन्य को नहीं मिली। बाण की दृष्टि में किसी विशेष वर्णन में पक्षपात नहीं दिखाई देता। बाण जिस सूक्ष्मता से धवलदेहकान्तिप्रतिमण्डिता महाश्वेता का वर्णन करते हैं उसी सूक्ष्मता से नीलम की पुतली के समान काली-कलूटी चाण्डालकन्या का भी वर्णन करते हैं। अपेक्षाकृत बाण के वर्णन प्रातःकाल से अधिक सायंकाल के ही मिलते हैं। सम्भव है प्रातःकाल की अपेक्षा सायंकाल का दृश्य ही उनको अधिक पसंद रहा हो। नगरी उज्जयिनी के वर्णन से जाबालि के शान्त और पवित्र आश्रम का वर्णन भी कम अद्भुत नहीं। कादम्बरी के सौन्दर्य-वर्णनों में भी कम आकर्षण नहीं। मानवीय सौन्दर्य का वर्णन और तद्वाची शब्दों की विकसित सामग्री भी कालिदास से कहीं अधिक बाण की इस रचना में मिल जाती है। इसके अतिरिक्त इन्द्रायुध अश्व के सजीव वर्णन से बाण को 'तुरङ्गबाण' की पदवी भी मिली है। बाण के साहित्य के प्राण वर्णन ही हैं। उन्हें अलग कर देने पर कथा कुछ भी न रह जायगी। बाण अत्यन्त परिहास-प्रिय व्यक्ति थे। कादम्बरी के चण्डिका-मन्दिर के बुड्ढे पुजारी के वर्णन में उनकी परिहासप्रियता का पता चलता है। उस पुजारी के वर्णन में बाण ने खुलकर मजाक किया है। 'देवी के चरणों पर बार-बार माथा रगड़ने से उसके माथे पर घट्टा पड़ गया था। किसी ठगवैद्य द्वारा दिए हुए सिद्धांजन से उसकी एक आँख फूट गई थी इसलिये वह दूसरी आँख में प्रतिदिन तीन बार अंजन लगाता था जिससे लकड़ी की सलाई भी घिस कर चिकनी हो गई थी। रेशम के कोये का छल्ला पैर के अंगूठे में मढ़ लेने के कारण उसकी काट से अंगूठा घायल हो गया था। पिशाच चढ़े हुए लोगों का भूत उतारने के लिए वह मंत्र पढ़कर पीली सरसों से बार-बार उन्हें मारता तो वे भी उसकी ओर लपक कर लप्पड़ मारते जिससे उसका कान दब कर चपटा हो गया था। वह दिन भर मच्छर की तरह भनभनाता हुआ सिर हिला कर कुछ गुनगुनाता रहता था। वह
लाचार ब्रह्मचारी था, अत एव जब दूर जगहों से आकर ठहरी हुई बुड्डी तापसियों को देखता तो ताव खा-खा कर स्त्रीवशीकरण चूर्ण का उन पर प्रयोग करता था। कभी आए हुए बटोद्दियों को वहाँ न ठहरने देने के लिए उनसे जूझ जाता और तब वे भी बिगड़ कर उसके साथ गुत्थम-गुत्था करने लगते और उसे पटककर उसकी पीठ चटका देते। रतौंधी के कारण वह दिन में ही आ-जा लेता। उसका पेट निकला हुआ था और खाने की कोई थाह न थी। फाल्गुन में जब लोगों को मस्ती चढ़ती तो वे मचियासहित किसी बूढ़ी दासी को उठा ले आते और उसके साथ ब्याह रचा कर उसकी ठठोली करते।' इस प्रकार बाण के इस बुद्धे पुजारी को देख कर मन में रस भर आते हैं। हास्य, वीभत्स और भयानक का जीता-जागता चित्र बाण ने यहाँ देकर अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन किया है। कादम्बरी का एक प्रसंग बहुत ही आश्चर्यकारी है जहाँ बाण की कथानिर्माणक्षमता का अनुमान सहज ही होने लगता है। जब महाश्वेता के साथ चन्द्रापीड़ कादम्बरी के यहाँ भवन में जाकर ताम्बूल द्वारा उससे सम्मानित होते हैं। तत्पश्चात् उस समय कथा- क्रम शिथिल होता प्रतीत होता है। सबके सब चुपचाप यथास्थान बैठते हैं। कादम्बरी, चन्द्रापीड़, महाश्वेता एवं और सब उपस्थित सखी और परिजनों के लिए इस समय ऐसे हल्के झोंके की आवश्यकता थी कि जिससे फिर वे अपनी स्वाभाविक स्थिति प्राप्त कर सकें। बाण ने वहाँ सहसा एक सारिका और परिहास नामक शुक के झगड़े का प्रसंग लाकर कथा के प्रवाह को विलक्षण युक्ति से सम्हाल लिया है। चन्द्रापीड़ ने इस प्रसंग में नर्म भाषित करके सबको प्रभावित कर लिया। वहाँ का वातावरण उन पर हावी न हो सका। वहाँ के लोगों और चन्द्रापीड़ में अपरिचयकृत दूरी हट गई और वे उन सबके ऊपर प्रभावशाली हो गए तथा परस्पर सबके निकट आ गए। इस प्रकार बाण की लेखनी कथा के वस्तु-विन्यास-वर्णनों के संवर्धन एवं मानस भावों के अंकन में सर्वत्र जागरूक रहती है। वर्णनों की भरमार से कथा-प्रवाह के शिथिल प्रतीत होते हुए भी उनकी सरसता एवं चित्रमयता से पाठक को किसी प्रकार का उद्वेजन नहीं हो पाता। वह कथा के अग्रिम मोड़ से परिचित होने के लिए उत्सुक होकर भी तत्काल वर्णनों के भीतर इतना डूब जाता है कि कथा की ओर से उसका ध्यान हट जाता है। इसे बाण की अपनी विशेषता समझना चाहिए। यह पहले कहा जा चुका है कि कादम्बरी का उत्तर भाग बाणभट्ट के सुयोग्य पुत्र की रचना है। सौभाग्य की बात है कि उत्तरभाग भी बाणरचित पूर्वभाग की तरह ही बन गया है। सम्भव था बाण कुछ और विस्तृत करके लिखते। उत्तर भाग को देख कर ऐसा लगता है कि अगर भूषणभट्ट या पुलिन्द (न्ध्र) भट्ट ने अपना नाम बिना लिखे ही कादम्बरी की पूर्ति कर दी होती तो निश्चय ही यह किसी के लिए निर्णय करना कठिन हो जाता कि पूरी रचना एक ही कवि की है या नहीं। हाँ, इतना तो लोग अवश्य कहते कि बाण अन्त
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में चल कर हड़बड़ा गए और कथा को शीघ्र समाप्त कर डाला। कहीं उत्तर भाग में भी पूर्व भाग के टक्कर की रचना हो गई है। फिर भी बाण-पुत्र यह कहते हुए तनिक भी रुकते नहीं कि मैंने पिता की वाणी के समुद्रगामी प्रवाह में अपनी वाणी की धारा मिला दी जिससे कथा समाप्ति को प्राप्त सके। उनका यह कथन सर्वथा सत्य है। बाण की धारा में मिल पाने से ही उनकी वाणी यह काम कर सकी, अन्यथा बाण-जैसे वर्णनशिल्पी के सामने किसी दूसरे का डट पाना कभी सम्भव न था। बाण-पुत्र में कुछ-कुछ कवित्व का जो गुण था वह उनके पिता के आशीर्वाद का ही फल था। उन्होंने कादम्बरी के सम्बन्ध में कहा है— कादम्बरीरसभरेण समस्त एव मत्तो न किञ्चिदपि चेतयते जनोऽयम् । भीतोऽस्मि यन्न रसवर्णविवर्जितेन तच्छेषमात्मवचसाऽप्यनुसन्दधानः ॥ अर्थात् कादम्बरी (एक प्रकार की मदिरा तथा कादम्बरीकथा) के उत्तम रस को पीकर सहृदय जनों का वर्ग बिल्कुल छक कर अपनी सुध-बुध खो बैठा है। ऐसी स्थिति में रस और वर्ण से विहीन अपनी बाणी द्वारा कादम्बरी की पूर्ति करते हुए मुझे कुछ भय नहीं, क्योंकि बेहोशी में किसी को पता न चलेगा। बाण की दृष्टि में काव्य का स्वरूप बाण की शैली जानने से पूर्व हमें बाण के विचार में काव्य के स्वरूप को जान लेना चाहिए। बाण काव्य के स्वरूप के सम्बन्ध में अपनी अलग दृष्टि रखते हैं, जैसा कि हर्ष- चरित के आरम्भ में उन्होंने समझाया है। बाण को उन कवियों की कविता पसंद न थी जो राग द्वेष में भर कर मनमाने ढंग से बकवास करते हैं। बाण के अनुसार ऐसे 'वाचाल' और 'कामकारी' लोग ही कुकवि हो जाते हैं। नई वस्तु उत्पन्न करने वाला ही सच्चे अर्थ में कवि कहलाने योग्य है और वही 'उत्पादक' है। बाण केवल स्वभावोक्ति (जाति) के पक्षपाती न थे। प्रायः उन दिनों साहित्य में कविता के नाम पर प्रचुर मात्रा में स्वभा- वोक्तिशैली का प्रचलन था। बाण की प्रतिक्रिया यह थी कि स्वभावोक्ति किसी प्रकार भी कविता नहीं हो सकती; क्योंकि उसमें नवीनता का सर्वथा अभाव रहता है। आगे चलकर अलंकारशास्त्र के आचार्यों ने वक्रोक्तिवाद को खड़ा करके बाण के निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण किया। स्वभावोक्ति एक अलंकारमात्र तक सीमित रह गई। वस्तु के यथार्थ रूप में कोई आकर्षण नहीं रहता, अन्यथा कविता लिखने की कोई आवश्यकता ही नहीं। कवि वस्तु के यथार्थ रूप को बदल डालता है और अपनी प्रतिभा से नई वस्तु का निर्माण करता है, यही बाण का अभिप्रेत पक्ष था। वक्रोक्ति ने श्लेषप्रधान शैली को उत्पन्न किया। श्लेषपूर्ण शैली का काव्य निर्माण भी चल पड़ा। उसकी झलक बाण के पूर्ववर्त्ती सुबन्धु की प्रत्यक्षरश्लेषमय रचना वासवदत्ता में मिलती है। यह शैली बाण की भी पसंद थी। कादम्बरी में उन्होंने लगातार श्लेषों से भरी हुई (निरन्तरश्लेषघना) शैली की प्रशंसा
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की है । वस्तु की भावात्मक रचना में जब तक शब्दों की मरोड़ से उत्पन्न नवत्व का साक्षात्कार नहीं मिलता तब तक कवि प्रशंसा के पात्र नहीं, सम्भवतः बाण की यही दृष्टि थी । यह भी बात नहीं कि जाति या स्वभावोक्ति-शैली बाण को सर्वथा अनभिमत थी, उन्होंने अग्राम्या जाति की प्रशंसा की है, अर्थात् वह स्वभावोक्ति जो केवल वस्तु के यथार्थ रूप का चित्रण न होकर सुन्दरतापूर्ण चित्रण हो, बाण को सर्वथा मान्य थी । बाण कविता में समन्वय दृष्टि के पक्षपाती थे । वे एकांगी दृष्टि को कविता के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे । उन दिनों प्रायः पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के कवि लोग एकांगी दृष्टि से काव्य लिखते थे, जैसा कि बाण ने स्वयं निर्देश किया है— श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडम्बरम् ॥ ( हर्ष० ) अर्थात् उत्तर के लोगों में श्लेष-प्रधान शैली में रचना करने की प्रवृत्ति है, पश्चिम के लोग अर्थमात्र पर ध्यान देते हैं, भाषा कैसी भी हो अर्थ बढ़िया होना चाहिए । दाक्षिणात्य लोग उत्प्रेक्षा करने में खूब पड़ हैं, उत्प्रेक्षाशैली उड़न्त भरना या हद तक कल्पना करना है, गौड़ देश के निवासी कवियों में अक्षराडम्बर ही खूब चलता है । अक्षराडम्बर अर्थात् विकट शब्दों की योजना की आनुप्रासिक प्रवृत्ति से तात्पर्य है । इस प्रकार चारों ओर साहित्यिक समाज में एकांगी दृष्टि से काव्य-निर्माण की प्रवृत्ति चल पड़ी थी जो बाण को अभिप्रेत न थी । बाण कविता में सब शैलियों का समन्वय मानते थे । बाण की दृष्टि में बढ़िया काव्य वह है जिसमें पांच बातों का मेल हो— नवोऽर्थो जातिरग्राम्या श्लेषोऽक्लिष्टः स्फुटो रसः । विकटाक्षरबन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुर्लभम् ॥ ( हर्ष० श्लोक १।८ ) अर्थात् विषय की नवीनता, सुन्दर लगने वाली स्वभावोक्ति, श्लेष ऐसा जो क्लिष्ट न हो, स्फुट रस, जिसके निर्णय के लिए सहृदय को विशेष माथा-पच्ची न करनी पड़े, विकट या भारी भरकम शब्दों की योजना । बाण का कहना है कि सब मिल कर ये पाँचों बातें किसी एक काव्य में दुर्लभ हैं, परन्तु सच्चे अर्थ में वही काव्य कहने योग्य है जिसमें इन सब का समन्वय हो । बाण ने अपने काव्यों में इनके समन्वय का हमेशा ध्यान रखा है । बाण की यह समन्वयप्रधान शैली किसी प्रकार के एकांगी दृष्टिकोण के अधीन नहीं रही, यही उसकी विशेषता है । सचमुच श्लाघनीय रचना समन्वयप्रधान दृष्टिकोण का कवि ही कर सकता है, बाण की सफलता का रहस्य भी यही है । बाण रचना में विषय की सर्व- धिक नूतनता, सरल श्लेष-प्रधान शैली की अद्भुत योजना, वस्तुओं का अग्राम्य यथार्थ वर्णन, समासबहुल पदविन्यास तथा कथावस्तु का ग्रंथन, इन सब का विलक्षण सामंजस्य मिल जाता है ।
( ३१ ) कहा गया है कि बाण मनमाने ढंग की कविता करने वाले वाचाल एवं अनुत्पादक कवियों से खूब चिढ़े हुए थे। दूसरे कवि के वर्णों को बदल कर उनके स्थान में अपने शब्द रख कर काव्य निर्माण की प्रवृत्ति रखने वाले कवि बाण के शब्दों में चोर होते हैं। वे सहज ही पकड़े जाते हैं। ऐसे कवियों की रचना किसी अंश में आदर के योग्य नहीं। बाण की दृष्टि में कविता की भूमिका अपने स्वरूप में सर्वथा मौलिक और महत्वपूर्ण है। कविता की सिद्धि के लिए कवि को महती साधना करनी पड़ती है। साधना-विहीन कवि किसी प्रकार भी कविता की उच्च भूमिका में नहीं पहुँच सकता। बाण ने किसी विशेष कवि का नाम लेकर इस प्रकार की कुछ भी निन्दा की बात नहीं कही है। व्यक्तिगत आक्षेप बाण को अभिमत नहीं। प्रशंसा के अवसर पर वे विशेष कवियों की चर्चा हृदय खोल कर करते हैं। इसी प्रसंग में बाण ने अनेक कवियों का आदर-पूर्वक स्मरण किया है। सर्वविद् महर्षि व्यास और आख्यायिका निर्माण करने वाले कवीश्वरों की वन्दना के पश्चात् बाण अपने पूर्ववर्ती गद्यकाव्य वासवदत्ता की प्रशंसा करते हैं। वासवदत्ता सुबन्धु- कृत होनी चाहिए। किन्तु कुछ विद्वानों की कथा के रूप में सुबन्धु की उपलब्ध श्लेष-बहुल- रचना वासवदत्ता आख्यायिका के प्रसंग में कवियों के दर्प को विचलित करने वाली बाण की निर्दिष्ट (आख्यायिका) वासवदत्ता से अतिरिक्त लगती है। अस्तु, वे वासवदत्ता के गुण से प्रभावित अवश्य थे, पर अन्य कवियों की तरह विगलित-दर्प न थे, क्योंकि कादम्बरी के आरम्भिक पद्यों में बाण ने अपनी कथा को 'निरन्तरश्लेषघना' और 'अतिद्वयी' अर्थात् वासवदत्ता और गुणाढ्यकृत बृहत्कथा का अतिक्रमण करने वाली कहा है। फिर बाण ने भट्टार हरिचन्द्र नामक कवि के गद्यबन्ध चर्चा की है, जिसमें पद- बन्ध उज्ज्वल, मनोहर तथा अनुप्रास के रूप में क्रम से वर्णों की स्थिति है। उसकी शैली बाण के लिए आदर्श थी। भट्टार हरिचन्द्र के गद्यबन्ध के उपलब्ध न होने से यह ठीक पता नहीं चलता कि वे कौन थे। सम्भावना है कि राजशेखर ने जिन हरिचन्द्र का उल्लेख किया है वे ही बाण के भट्टार हरिचन्द्र हों। इस प्रकार बाण ने सातवाहन के सुभाषित- कोश गाथासप्तशती, प्रवरसेन की प्रसिद्ध रचना सेतुबन्ध और भास के यशस्वी नाटकों का सादर संस्मरण किया है। महाकवि कालिदास बाणभट्ट के अत्यन्त प्रिय कवि थे। बाण ने उसकी मधुरसान्द्र सूक्तियों में खूब आनन्द लिया था। सचमुच कालिदास के बाद बाण का ही नाम लिया जा सकता है। बाण ने कालिदास को खूब समझा है और उनकी शैली को आदर्श मान कर और भी पल्लवित रूप में निर्माण करने की अद्भुत क्षमता अर्जित की है। गुणाढ्य की बृहत्कथा और आढ्यराज नामक कवि के काव्योत्साह भी बाण के लिए आश्चर्यकारी थे। आढ्यराज की प्रशंसा में बाण कहते हैं कि जिह्वा ही भीतर की ओर खिंच जाती है और कविता करने के लिए प्रवृत्त नहीं होती।
( ३२ ) इस प्रकार बाणभट्ट जितने अंश में दोषज्ञ थे उतने ही अंश में गुणज्ञ भी। फिर भी किसी विशेष के प्रति उनकी बुरी धारण न थी। बाण के साहित्य में ऐसे व्यक्ति का कोई भी निर्देश नहीं मिलता जिससे बाणभट्ट क्षुब्ध हों। कादम्बरी में उन्होंने थोड़े में ही अपनी काव्यनिर्माणशैली की ओर संकेत किया है। जैसा कि कहा जा चुका है श्लेष- प्रधान शब्दों की अद्भुत योजना बाण की शैली की विशेषता है। कादम्बरी में इस शैली की प्रांजलता का साक्षात्कार होता है। बाण के शब्दों में बाण की शैली को 'निरन्तर- श्लेषघना' कहना चाहिए। आख्यायिका और कथा महाकवि बाण आख्यायिका और कथा दोनों के लेखक हैं। हर्षचरित आख्यायिका है और कादम्बरी कथा। अमरकोश में 'आख्यायिकोपलब्धार्था' कहा है, अर्थात् आख्या- यिका वह कथा है जिसका सत्यार्थ ज्ञात हो। कथा का विषय कल्पित होता है। आगे चल कर आख्यायिका के इस लक्षण का विकास हुआ और भिन्न-भिन्न आचार्यों ने अपनी-अपनी परिभाषा की। हर्षचरित और कादम्बरी को देख कर आख्यायिका का विषय ऐतिहासिक होना और कथा का कल्पनाप्रसूत होना, ऐसा ज्ञात होता है। अग्निपुराण के अनुसार आख्यायिका वह है जिसमें लेखक के वंश की प्रशंसा कुछ विस्तार से हो, कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ आदि विपत्तियों का वर्णन हो, रीति और वृत्ति अति प्रदीप्त शैली में हों, परिच्छेदों का नाम उच्छ्वास हो, चूर्णक शैली का बाहुल्य हो तथा वक्त्र और अपवक्त्र नामक श्लोक हों (अग्नि० ३३६।१३-१४)। कथा में इसके विपरीत कुछ श्लोकों में कवि-वंश का संक्षिप्त वर्णन हो, मुख्यार्थ के अवतरण के रूप में दूसरी कथा कही जाय, जिसमें परिच्छेद न हों अथवा कहीं पर लम्बक हों (अग्नि० ३३६।१५-१७)। दण्डी ने भी काव्यादर्श में दोनों के भेद-बताने का प्रयत्न किया है। आख्यायिका का वक्ता स्वयं नायक होता है, कथा का नायक या अन्य कोई; किन्तु यह नियम सर्वत्र लागू नहीं। दण्डी दोनों में किसी विशेष अन्तर के पक्षपाती न थे। नाममात्र का ही भेद है, यही उनका तात्पर्य था। पर बाण ने दोनों को अलग-अलग माना है। हर्षचरित में वक्त्रादि छन्दों का भी प्रयोग किया है और उच्छ्वास के रूप में विभाग किया है। कथा में बाण ने इससे बिल्कुल भिन्न दृष्टि अपनाई है। आगे चल कर आचार्यों ने हर्षचरित और कादम्बरी को देख कर ही आख्यायिका और कथा के लक्षण बनाये हैं। दण्डी के अनुसार नाम-भेद वाला पक्ष किसी को सम्मत नहीं। बाण ने अनेक आख्यायिकाकार कवियों की आख्यायिकाएँ देखी थीं। सम्भवतः महाभाष्य में उल्लिखित वासवदत्ता नाम की आख्यायिका से ही बाण परिचित हों। सुबन्धु की वासवदत्ता, जो कथारूप में अभी उपलब्ध है, बाण के बाद की रचना हो। पतंजलि ने वासवदत्ता के अतिरिक्त सुमनोत्तरा और भैमरथी आख्यायिकाओं का भी
( ३३ ) उल्लेख किया है। तात्पर्य यह कि बाण का हर्षचरित संस्कृत-साहित्य की पहली आख्यायिका नहीं, पर यह अवश्य है कि उपलब्ध पहली आख्यायिका यही दृष्टिपथ में आती है। बाण की शैली अब हमें संक्षेप में बाण की शैली के आधार पर वर्णनों का अध्ययन कर लेना चाहिए। बाण के समय से ही चार प्रकट की गद्यशैलियाँ चल पड़ी थीं, जिनमें बाण के साहित्य में तीन मिलती है, जैसे—एक दीर्घ समास वाली, दूसरी अल्प समास वाली और तीसरी समास-रहित । लम्बे-लम्बे समासों वाली शैली को उत्कलिका, छोटे- छोटे समासों वाली शैली को चूर्णक और समासरहित शैली को आविद्ध कहते हैं। बाण को इन तीनों शैलियों में बड़ी सफलता प्राप्त थी। उन्हें किसी विशेष शैली पर आग्रह नहीं था, फिर भी उत्कलिका अर्थात् दीर्घ समास वाली शैली बाण के चित्रात्मक प्रसंग के अनुकूल पड़ती थी। इसलिए बाण वर्णनों में प्रायः इसका आश्रयण करते हैं। हर्षचरित के दधीचिवर्णन, ग्रीष्मवर्णन आदि प्रसंगों में विशेष रूप से यह शैली प्रयुक्त है। वर्णनों में चलचित्र के समान शब्दों के माध्यम से छोटे-छोटे चित्र प्रस्तुत करने पड़ते हैं। संस्कृत भाषा की महती विशेषता है कि उन लघु चित्रों को प्रस्तुत करने में कवि कई शब्दों को गूँथकर एक लड़ी बना डालता है। बाण के जिस वर्णन को लीजिए, उसमें दीर्घ समासोंवाली शैली मिलेगी। वर्णन के अन्त में प्रायः बाण उत्कलिका को छोड़कर समासरहित आविद्ध शैली का आश्रयण करते हैं। आविद्ध शैली में किसी चित्र को प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वस्तु से सम्बन्धित कुछ बातों की सामान्य चर्चा के लिए यह उपयोगी है। बाण ने अपने वर्णनों में प्रायः ऐसा ही किया है। चूर्णकशैली को जिसमें छोटे-छोटे समास होते हैं, बाण खूब लिखते हैं। इसके लिए कोई खास नियम नहीं है। वर्णन करते-करते कभी-कभी शास्त्रीय उपदेश भी करने की प्रवृत्ति बाण के साहित्य में जगह-जगह मिलती है। उसमें प्रायः अल्पसमास चूर्णकशैली बाण को पसंद है। बाण की शैली का निखरा हुआ रूप हर्षचरित के चतुर्थ उच्छ्वास में जहाँ राज्यश्री के विवाह का प्रसंग है, मिलता है। हर्षचरित की अपेक्षा कादम्बरी के वर्णन चित्रमयता और प्राञ्जलता तथा सरसता की दृष्टि से अपूर्व बन पड़े हैं। महाश्वेता, कादम्बरी आदि के वर्णनों में बाण की अलौकिक वर्णन-क्षमता का परिचय मिलता है। बाण स्वयं कादम्बरी में गद्य की उत्कृष्ट शैली की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं— उत्कृष्टकविगद्यमिव विविधवर्णश्रेणिप्रतिपाद्यमानाभिनवार्थसञ्चयम् ।' अर्थात् नाना प्रकार के वर्णों द्वारा नये अर्थ-समूह का प्रतिपादन करने वाला गद्य उत्कृष्ट होता है अथवा वह उत्कृष्ट कवि द्वारा लिखा जाता है। रीति की दृष्टि से बाण में पाञ्चाली रीति का प्राचुर्य है : स्वयं भोजराज भी इसे स्वीकार करते हैं— ३ ह० भू०
( ३४ ) शब्दार्थयोः समो गुम्फः पाञ्चाली रीतिरिष्यते । शीलाभट्टारिकावाचि बाणोक्तिषु च सा यदि ॥ (सरस्वतीकण्ठाभरण) अर्थात् शब्द और अर्थ का समान रूप से गुम्फन पाञ्चाली रीति में होता है, वह शीलाभट्टारिका और बाण दोनों की उक्तियों में पाई जाती है। विषय के अनुरूप शब्दावली का प्रयोग ही पाञ्चाली रीति का तात्पर्य है। बाण इसके सिद्धहस्त कवि हैं। इस भूमिका में बाण के जीवन और साहित्य के सम्बन्ध में कुछ उपयोगी बातों की चर्चा की गई है। आशा है बाण के विद्यार्थी इससे लाभान्वित होंगे। श्रद्धेय डा० वासुदेव शरण जी अग्रवाल ने हर्षचरित और कादम्बरी पर अलग-अलग अपना सांस्कृतिक अध्ययन प्रस्तुत किया। भूमिका में मैंने उनकी दृष्टि का बहुत अंश में अनुसरण करने का प्रयत्न किया है। बाण के साहित्य को जानने के लिए जो कुछ अन्य स्रोत भी मिले हैं मैंने उनका उपयोग किया है। अनुवाद के सम्बन्ध में हर्षचरित का अनुवाद मैंने किया यह कहने की हिम्मत मुझमें नहीं। अनुवाद आरम्भ करने के पूर्व मैंने अपने गुरुदेव डा० अग्रवाल जी से इस सम्बन्ध में पूछा था। उन्होंने सहर्ष अनुमति दी और उत्साहित किया। तत्काल स्वयं चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय से उन्होंने बातें भी कर लीं और मुझे अनुवाद तैयार करने के लिए सूचित किया। उन्होंने उत्साहित करते हुए यह कहा कि कहीं शंका हो तो पूछ लेना। मैंने अपना कार्य आरम्भ कर दिया। इसी बीच अध्यापनार्थ मुझे वैद्यनाथधाम गुरुकुल आना पड़ा। मैं ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता गया मेरी कठिनाइयाँ भी बढ़ने लगीं। किसी- किसी प्रसंग में मैंने अपने आपको सर्वथा असमर्थ पाया। अनुवाद की परिसमाप्ति की लोलुपता और गुरुदेव का असांनिध्य दोनों ने मुझे अहोरात्र उद्वेलित किया, तब मैंने ऐसे प्रसंगों में 'हर्षचरित एक सांस्कृतिक अध्ययन' की शरण ली और बड़ी सरलता से पूरे ग्रन्थ का अनुवाद तैयार कर लिया। इस अनुवाद की आधारभित्ति गुरुदेव की कृति ही है। अतः गुरुदेव के लिए मैं अपनी कृतज्ञता कैसे प्रकट करूँ ? आशा है वे मेरी विवशताजन्य धृष्टता को क्षमा कर देंगे। चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय धन्यवाद के पात्र हैं, जिन्होंने मेरे अनुवाद को अपने यहाँ से प्रकाशित किया और आगे के कार्य के लिए भी प्रेरित किया है। जगन्नाथ पाठक
विषय-सूची प्रथम उच्छ्वास ( वात्स्यायनवंशवर्णन ) विषय पृष्ठ मङ्गलाचरण १ कुकवि-निन्दा ४ काव्य का देशिक रूप-भेद ५ काव्य स्वरूप, आख्यायिकाकार कवि ६ वासवदत्ता, हरिचन्द्र, सातवाहन, प्रवरसेन, भास, कालिदास, बृहत्कथा, आढ्यराज आदि का उल्लेख ७ हर्षचरित-आख्यायिका १० ब्रह्माजी की गोष्ठी में विवाद १२ सरस्वती-वर्णन १४ दुर्वासा का क्रोध १६ सावित्री-वर्णन १७ दुर्वासा का सरस्वती को शाप देना २० ब्रह्माजी द्वारा दुर्वासा की भर्त्सना २१ फिर सरस्वती को सान्त्वना देना २३ सन्ध्या-रात्रि-चन्द्रोदयवर्णन २५ सावित्री का सरस्वती को सान्त्वना देना २८ ब्रह्मलोक से सरस्वती और सावित्री का प्रस्थान तथा मन्दाकिनी-वर्णन ३२ शोण के तट पर सरस्वती का निवास ३४ दूर से घोड़ों को देखना ३६ दधीच-वर्णन ३७ विकुक्षिवर्णन ४१ दधीच और सरस्वती का परिचय ४३ दधीच का च्यवनाश्रम जाना ४९ सरस्वती का औत्सुक्य ५० विकुक्षि का पुनः आगमन ५४ मालती-वर्णन ५५
( १६ ) सरस्वती-मालती की रहःसंकथा ६० मालती का प्रस्थान, सरस्वती की उत्कण्ठा ६४ दधीच का आगमन और सरस्वती के साथ रहना ६६ पुत्रोत्पत्ति के बाद सरस्वती का गमन ६७ सारस्वत और वत्स में स्नेह ६७ वात्स्यायन वंश के ब्राह्मण ६९ बाण के पूर्वज ७२ बाण और उसके साथी ७३ घुमक्कड़ बाण का अपने गाँव लौटना ७६ द्वितीय उच्छ्वास ( राजदर्शन ) बाण द्वारा अपने गाँव के घर में घूमना ७८ ग्रीष्म-समय-वर्णन ७९ कृष्ण के दूत मेखलक का आगमन और उसके द्वारा कृष्ण का सन्देश सुनाना ८९ बाण का एकान्त में विचार करके निर्णय करना ९५ बाण का तैयार होकर प्रीतिकूट से निकल पड़ना ९६ मल्लकूट और वनग्रामक पार करके राजद्वार पर पहुँचना और राजद्वार का वर्णन ९७ प्रतीहार पारियात्र का वर्णन १०५ मन्दुश और इमधिष्ण्यागार-वर्णन १०७ दर्पशात हाथी का वर्णन ११० सम्राट् हर्ष का वर्णन ११८ बाण की हर्ष से भेंट १३४ बाण और हर्ष की तीखी बातचीत और मेल १३५ तृतीय उच्छ्वास ( राजवंशवर्णन ) शरत्काल-वर्णन १४१ बाण का दरबार से अपने गाँव लौटना १४३ गाँव के भाई-बन्धुओं से परस्पर वार्तालाप १४४ पुस्तकवाचक सुदृष्टि द्वारा वायुपुराण का पाठ १४६ बाण के भाइयों की हर्षचरित सुनाने के लिए उससे प्रार्थना १४९ दूसरे दिन बाण द्वारा हर्षचरित का आरम्भ १५१ श्रीकण्ठजनपद-वर्णन १५१
( ३७ ) स्थाण्वीश्वर-वर्णन १६४ पुष्पभूति का वर्णन १६९ भैरवाचार्य का शिष्य १७२ भैरवाचार्य का वर्णन १७५ पुष्पभूति का भैरवाचार्य का कृपाण देना १८२ भैरवाचार्य की साधना १८८ पुष्पभूति का श्रीकंठनाग को परास्त करना १९२ लक्ष्मी का प्रसन्न होकर प्रकट होना और पुष्पभूति को वर देना १९४ भैरवाचार्य का विद्याधर-योनि को प्राप्त होना १९७ चतुर्थ उच्छ्वास ( चक्रवर्तिजन्मवर्णन ) पुष्पभूति के वंश में प्रभाकरवर्धन २०३ यशोमतीवर्णन २०५ यशोमती का स्वप्न देखना २०९ यशोमती के गर्भ से राज्यवर्धन की उत्पत्ति २१४ हर्ष की उत्पत्ति २१७ पुत्रजन्मोत्सव-वर्णन २१९ राज्यश्री का जन्म २२९ हर्ष का ममेरा भाई भण्डि २३० मालवराज पुत्र कुमारगुप्त और माधवगुप्त २३६ राज्यश्री के विवाह की चिन्ता २४० विवाह की तैयारियां २४२ ग्रहवर्मा का बरात लेकर आना २४८ ग्रहवर्मा द्वारा वधूमूखदर्शन २५१ विवाह और वासगृह में वर-वधू का आना २५४ पञ्चम उच्छ्वास ( महाराज-मरण-वर्णन ) युद्ध के लिए राज्यवर्धन का प्रयाण २५७ हर्ष का बीच में ही मृगया के लिए रुक जाना २५८ दुःस्वप्न-दर्शन २५८ दीर्घाध्वग कुरंगक का आगमन २५९ पिताजी की बीमारी का समाचार सुनकर हर्ष का लौटना २६० शोकाकुल स्कन्धावार २६२ राजकुल में प्रवेश २६४
धवलगृह में प्रभाकरवर्धन की परिचर्या २६६ रुग्णावस्था में प्रभाकरवर्धन का वर्णन २६९ प्रभाकरवर्धन का पुत्र-प्रेम २७२ रसायन का पावक-प्रवेश २७८ राजभवन में अशुभ-सूचक महोत्पात २८० वेलाप्रतीहारी का पहुँचकर हर्ष को यशोमती के सती होने की तैयारी की सूचना देना २८३ यशोमती सतीवेश में २८५ यशोमती के अन्तिम वाक्य २८९ हर्ष को प्रभाकरवर्धन की सान्त्वना २९३ प्रभाकरवर्धन की मृत्यु २९५ राजा की और्ध्वदेहिक क्रिया २९६ हर्ष की चिन्ता २९७ राजा की चिन्ता में भृत्य, मित्र, सचिवों का गृह-त्याग ३०१ हर्ष को राज्यवर्धन की चिन्ता ३०४ षष्ठ उच्छ्वास ( राजप्रतिज्ञावर्णन ) राज्यवर्धन का लौटना ३०८ राज्यवर्धन का हर्ष को समझाना और निर्वेद की बात करना ३१४ हर्ष का चिन्ता करना ३१८ मालवराज द्वारा ग्रहवर्मा की मृत्यु और राज्यश्री को कारावास दिए जाने का समाचार ३२१ राज्यवर्धन का क्रोध करना और युद्ध के लिए प्रस्थान करना ३२२ हर्ष का दुःस्वप्न देखना ३२७ राज्यवर्धन के वध का समाचार ३२९ हर्ष का प्रचण्ड क्रोध ३३० सेनापति सिंहनाद ३३३ सिंहनाद का उपदेश ३३५ हर्ष की दिग्विजयप्रतिज्ञा ३४२ हर्ष का प्रदोपस्थान और शयनगृह में जाना ३४५ गजसेना के अध्यक्ष स्कन्दगुप्त ३४७ स्कन्दगुप्त का राजाओं के छल-कपट का वर्णन करना ३५० अपशकुन-वर्णन ३५५
( ३९ ) सप्तम उच्छ्वास ( छत्रलब्धि ) दण्डयात्रालग्न का निश्चय, ब्राह्मणों को दान देना ३५९ छावनी में सैनिकप्रयाण की कलकल ३६२ सैनिक-प्रयाण से जनता को कष्ट ३७२ हर्ष द्वारा सेना का निरीक्षण ३८० हंसवेग का आगमन ३८२ छत्र की विशेषता ३८३ छत्रवर्णन ३८४ भास्करवर्मा के भेजे हुए अन्य उपहार ३८६ हंसवेग द्वारा संदेश-कथन ३९१ सरकारी नौकरों पर फवतियाँ ३९५ भण्डि का आगमन ४०२ राज्यश्री का समाचार ४०४ राज्यश्री की खोज में हर्ष का प्रयाण और विन्ध्याटवी के समीप आ जाना ४०६ विन्ध्याटवी वर्णन ४०६ अष्टम उच्छ्वास ( विन्ध्याद्रिनिवेशन ) हर्ष का विन्ध्याटवी में प्रवेश और आटविक सामन्त शरभकेतु ४१३ शबरयुवक निर्घात का वर्णन ४१३ निर्घात की हर्ष से बातें ४१७ विभिन्न वृक्षों का वर्णन ४१८ दिवाकरमित्र का वर्णन ४२२ दिवाकरमित्र द्वारा हर्ष का सत्कार ४२६ हर्ष द्वारा आगमन-प्रयोजन का निवेदन ४२९ एक भिक्षु द्वारा राज्यश्री की दशा का वर्णन ४३० हर्ष का राज्यश्री के समीप जाना ४४० स्त्रियों के आलाप ४४० हर्ष का राज्यश्री से मिलन ४४४ दिवाकर द्वारा हर्ष को एकावली की भेंट ४४८ राज्यश्री को दिवाकरमित्र का उपदेश ४५३ राज्यश्री को हर्ष द्वारा सौपना ४५८ सूर्यास्त-चन्द्रोदय-वर्णन ४६० परिशिष्ट : बाण-प्रशस्ति ४६३
द्वितीय संस्करण प्रथम संस्करण में जो त्रुटियाँ रह गई थीं, उन्हें इसमें जहाँ तक हो सका है, दूर करने का प्रयत्न किया गया है। आशा है, हर्षचरित के मूल अर्थ तक पहुँचने में यह अनुवाद प्रामाणिक रूप में सहायक होगा। इधर बिहार के कुछ विद्वानों में महाकवि बाणभट्ट के जन्म-स्थान को लेकर बहुत दिनों से विवाद चला आ रहा है। कुछ लोग शाहाबाद के किसी स्थान को बाणभट्ट की जन्मभूमि सिद्ध करते हैं, तो कुछ लोग गया जिले के किसी स्थान को। अनुकूल तर्क अपने-अपने अनुसार दोनों पक्षों के लोग उपस्थित करते हैं। अस्तु, बाणभट्ट ने 'हर्षचरित' में अपने ग्राम का नाम 'प्रीतिकूट' निर्दिष्ट किया है, जो शोणभद्र के तट पर था। —जगन्नाथ पाठक
॥ श्रीः ॥ हर्षचरितम् 'सङ्केत'-संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम् प्रथम उच्छ्वासः १नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्रचामरचारवे । त्रैलोक्यनगरारम्भमूलस्तम्भाय शम्भवे ॥ १ ॥ ॐ सङ्केतः ॐ श्च्योतन्मदाम्बुभरनिर्भरचण्डगण्डशुण्डाग्रशौण्डपरिमण्डितभूरिभृङ्गान् । विघ्नानिवानवरतं चलगण्डतालैरुत्सारयञ्जयति जातघृणो गणेशः ॥ शङ्करनामा कश्चिच्छ्रीमत्पुण्याकरात्मजो व्यलिखत् । शिष्टोपरोधवशतः सङ्केतं हर्षचरितस्य ॥ 'सर्वकर्माणि कुर्वीत प्रणिपत्येष्टदेवताम् इति शिष्टाचारमनुपालयन् 'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः । यथास्मै रोचते विश्वं तथेद्ं परिवर्तते ॥' इति काव्यलक्षणामपूर्वां सृष्टि स्थिरां प्रवर्तयंन्नेष कविः शिवं बहुशक्तियुतमपि नियतशक्त्या- त्मकमेव स्तौति—नमस्तुङ्गेत्यादिना । न क्वचित्प्रणतो यो मूर्धा तत्स्पर्शो चन्द्र एव सितवालतुल्यप्रभाप्रसरतया स्वेदाविनाश्याद्विशिष्टस्यानस्थितश्च चामरम् । त्रैलोक्यमेव नानाभङ्गिशोभित्वात्नगरं तदारम्भे मूलस्तम्भः । नगरारम्भे हि मूलस्तम्भो भवति । त्रिभुवनरूपी नगर के निर्माण-आरम्भ के मूलस्तम्भ; (जिनके) उन्नत (कहीं भी न झुकने वाले) मस्तक पर चन्द्र के चँवर की शोभा है (उन) भगवान् शङ्कर को नमस्कार है† ॥ १ ॥ † कवि ने भगवान् शंकर को त्रिभुवन-नगर के निर्माण-आरम्भ का मूलस्तम्भ- १. जीवानन्दपाठे प्रथमः श्लोकः— चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूमम । मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती ॥
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri २ हर्षचरितम् 'हरकण्ठग्रहानन्दमीलिताक्षीं नमाम्युमाम् । कालकूटविषस्पर्शजातमूर्च्छागमामिव ॥ २ ॥ लग्नं च पट्टबन्धादिवदुत्प्रेक्षणानन्तरमुन्नते पृष्ठदेशे चन्द्रतुल्यं श्वेतं चामरं क्रियत इति स्थितिः । केचित्पुनः—त्रैलोक्यनगरस्यारम्भे मूलं मूलकारणं परमाणवस्तेषामुपाय- श्रयेण मूलकारणत्वात्स्तम्भ इव । ते हि तद्वशात्कार्यमारभन्ते । तस्य निमित्त- कारणत्वादित्याहुः । 'स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः' इति नामसहस्रे दृष्टत्वाद्धरेः, 'शम्भु- र्ब्रह्मत्रिलोचनो' इत्यभिधानकोशदर्शनाच्च ब्रह्मणोऽपि नमस्कारोऽयमित्यन्ते वदन्ति । व्याकुर्वते च हरिपक्षे—त्रैलोक्याक्रमणकाले । यद्वा—'यस्याग्निरास्यं द्योर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ मही' इत्यभिप्रायेण तुङ्गमूच्छ्रितं शुभलक्षणं यच्छिरस्तच्चुम्बिचन्द्र एव चामरं तेन चारवे । ब्रह्मपक्षे—चन्द्रः स्वर्णं तन्मयं चामरमिव चामरं केशकलापा 'हिरण्यकेशो हि ब्रह्मा त्रैलोक्यादीनि शेषं सर्वत्र तुल्यमिति ॥ १ ॥ हरेत्यादिना । प्रियं प्रति गाढस्नेहादि सौकुमार्यं चोपमयोच्यते । कालकूटविषेति अर्थसार्थः सामान्यपदप्रयोगो मेरुमहीधरचूतवृक्षादिवत् । आग्रमः प्रारम्भः ॥ २ ॥ उमा को प्रणाम करता हूँ, जिनकी आँखें शिव के कण्ठालिङ्गन के आनन्द से मूँद गई हैं, मानों शिव के गले में स्थित कालकूट विष के स्पर्श हो जाने से उन्हें मूर्च्छा आ गई हो ॥ २ ॥ कहा है, जिस प्रकार शङ्कर के उन्नत मस्तक पर चन्द्र की शोभा है उसी प्रकार प्राचीन वास्तुकला के अनुसार पहले मूलस्तम्भों पर चन्द्राकृति चँवर बनाये जाते थे, जो स्तम्भ के उपरिभाग में लगे होते थे । चन्द्र के साथ चँवर का अभेद इस अंश में भी है कि दोनों श्वेतवर्ण एवं श्रमापहारक हैं, चन्द्र की किरणों के समान ही चँवर के उजले केश-जाल छिटके रहते हैं । किसी के अनुसार ईश्वर (शिवजी) जगत् के निमित्त कारण होने से त्रिभुवन रूपी नगर के आरम्भ में मूल अर्थात् मूलकारण (उपादान कारण) परमाणुओं के आधार हैं, स्तम्भ हैं। किसी ने इस श्लोक को ब्रह्माजी और विष्णु के पक्ष में भी लगाया है । विष्णु के वामनावतार में त्रैलोक्य को लांघने के समय उनके सिर से चन्द्र का चँवर लग गया, अथवा आकाश रूप उनके सिर से चँवर रूप चन्द्र लगा रहता है । और ब्रह्माजी हिरण्यकेश होने के कारण स्वर्णमय केशकलाप वाले हैं। इस पक्ष में चन्द्र का अर्थ हिरण्य या सुवर्ण है । पाठान्तरम्—१. हरकण्ठाग्रहानन्द । २. स्पर्शाज्जात । CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
प्रथम उच्छ्वासः ३ नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय कविवेधसे । चक्रे पुण्यं सरस्वत्या यो वर्षमिव भारतम् ॥ ३ ॥ संप्रत्युत्कृष्टकवित्वाभिमानेन तादृशमेव कविवरं स्तौति—नमः सर्वस्येत्यादिना । सर्वा वेदादिका विद्या गीतादिकलाश्च वेत्ति यस्तस्मै । तदुक्तम्—'नासौ शब्दो न तद्वाच्यं न सा विद्या न सा कला । जायते यत्र काव्याङ्गमहो भारो महाकवेः ॥' इति कविरेव वेधाः । उक्तं च—'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः' । कवीनां वेधाः । कविशब्दोऽत्रोपचारात्कविबुद्धिषु वर्तते । तेन कविबुद्धीनां श्रेष्ठ इत्यर्थः । तथा चाह मुनिः—इतिहासोत्तमादस्माज्जायन्ते कविबुद्धयः' इति । यद्वा व्युत्पत्यु- त्पादनद्वारेण कवय एवंभूताः सन्तः क्रियन्ते । मुख्य एव कविशब्दस्यार्थः । यदु- क्तम्—'इदं कविवरैः सर्वैराख्यानमुपजीव्यते' इति । पुण्यं पावनम् । यदुक्तम्— 'भारताध्ययनात्पुण्यादपि पादमधीयतः । श्रद्दधानस्य पूयन्ते सर्वपापानि देहिनः ॥' इति । सरस्वती वाणी, तस्या लतया इव पुष्पादिहेतुत्वाद्वर्षं वृष्टिमिव । वर्षं वा स्थानविशेषः । 'यतोऽसौ तत्रास्ते । यदुक्तम्—'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्' । भरतानधिकृत्य कृतो ग्रन्थो भारतस्तम् । यद्वा—भारतं वर्षमिव । भरतः कश्चिद्राजा तस्य निवासं भारतं वर्षं भूभागैकदेशस्तदिव । उक्तं च— 'स्याद्वृष्टयां लोकधात्र्यंशे वत्सरे वर्षमस्त्रियाम्' इति । यद्वा—भारतवर्षान्तरस्था मावा मनुष्येषु सुलभास्तद्वन्महाभारतस्था सरस्वती । एतदपि सरस्वत्याख्यया पुण्यम् ॥ ३ ॥ समस्त ( विद्याओं और कलाओं को ) जानने वाले और कवियों के प्रजापति महर्षि व्यास को प्रणाम है, जिन्होंने सरस्वती ( नदी ) से पवित्र ( भारत ) वर्ष की भाँति (अपनी) सरस्वती ( वाणी ) से भारत ( महाभारत ग्रन्थ ) का निर्माण किया। ॥ ३ ॥ † जिस प्रकार कालिदास के आदर्श थे—महर्षि वाल्मीकि, उसी प्रकार महर्षि व्यास को सम्भवतः इन्होंने अपना आदर्श माना था । यह चयन बाण के स्वभाव के अनुकूल था । बाण अपनी कृति के द्वारा सर्व जगत् को 'बाणोच्छिष्ट' कर लेना चाहते थे, जैसा महर्षि व्यास ने भी कहा है—'जो जो यहां ( महाभारत में ) है, वह अन्यत्र है और जो-जो यहां नहीं है, वह कहीं नहीं है।' इसी प्रकरण के नवम पद्य में स्वयं बाण ने कवि की उस वाणी को सराहा है जो महाभारत की कथा के समान सभी प्रकार के वृत्तान्तों से युक्त होकर तीनों जगत् में व्याप्त नहीं हो जाती है अर्थात् अपनी व्याप्ति में सबको समेट नहीं लेती है ।