भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

३६४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

अनासक्तिपूर्वक करना। तुमको कभी भी सत्यसे नहीं चूकना चाहिये अर्थात् हँसी-दिल्लगी या व्यर्थकी बातोंमें वाणीकी शक्तिको न तो नष्ट करना चाहिये और न परिहास आदिके बहाने कभी झूठ ही बोलना चाहिये। इसी प्रकार धर्मपालनमें भी भूल नहीं करनी चाहिये अर्थात् कोई बहाना बनाकर या आलस्यवश कभी धर्मकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। लौकिक और शास्त्रीय—जितने भी कर्तव्यरूपसे प्राप्त शुभ कर्म हैं, उनका कभी त्याग या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, अपितु यथायोग्य उनका अनुष्ठान करते रहना चाहिये। धन-सम्पत्तिको बढ़ानेवाले लौकिक उन्नतिके साधनोंके प्रति भी उदासीन नहीं होना चाहिये। इसके लिये भी वर्णाश्रमानुकूल चेष्टा करनी चाहिये। पढ़ने और पढ़ानेका जो मुख्य नियम है, उसकी कभी अवहेलना या आलस्यपूर्वक त्याग नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार अग्निहोत्र और यज्ञादिके अनुष्ठानरूप देवकार्य तथा श्राद्ध-तर्पण आदि पितृकार्यके सम्पादनमें भी आलस्य या अवहेलनापूर्वक प्रमाद नहीं करना चाहिये।

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि। ये के चासमच्छ्रेयाः सो ब्राह्मणाः। तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्रंसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयादेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्।

मातृदेवः भव =तुम मातामें देवबुद्धि करनेवाले बनो; पितृदेवः भव =पिताको देवरूप समझनेवाले होओ; आचार्यदेवः भव =आचार्यको देवरूप समझनेवाले बनो; अतिथिदेवः भव =अतिथिको देवतुल्य समझनेवाले होओ; यानि =जो-जो; अनवद्यानि =निर्दोष; कर्माणि =कर्म हैं; तानि =उन्होंका; सेवितव्यानि =तुम्हें सेवन करना चाहिये; इतराणि =दूसरे (दोषयुक्त) कर्मोंका; नो =कभी आचरण नहीं करना चाहिये; अस्माकम् =हमारे (आचरणोंमेंसे भी); यानि =जो-जो; सुचरितानि =अच्छे

अनु० ११ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३६५

आचरण है; तानि=उनका ही; त्वया=तुमको; उपास्यानि=सेवन करना चाहिये; इतराणि=दूसरोंका; नो=कभी नहीं; ये के च=जो कोई भी; असम्त्=हमसे; श्रेयांसः=श्रेष्ठ (गुरुजन एवं); ब्राह्मणाः=ब्राह्मण आर्ये; तेषाम्=उनको; त्वया=तुम्हें; आसनेन=आसन-दान आदिके द्वारा सेवा करके; प्रशंसितव्यम्=विश्राम देना चाहिये; श्रद्धया देयम्=श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये; अश्रद्धया=बिना श्रद्धाके; अदेयम्=नहीं देना चाहिये; श्रिया देयम्=आर्थिक स्थितिके अनुसार देना चाहिये; ह्रिया देयम्=लज्जासे देना चाहिये; भिया देयम्=भयसे भी देना चाहिये (और); संविदा देयम्=(जो कुछ भी दिया जाय, वह सब) विवेकपूर्वक देना चाहिये।

व्याख्या— पुत्र! तुम मातामें देवबुद्धि रखना, पितामें भी देवबुद्धि रखना, आचार्यमें देवबुद्धि रखना तथा अतिथिमें भी देवबुद्धि रखना। आशय यह कि इन चारोंको ईश्वरकी प्रतिमूर्ति समझकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदा इनकी आज्ञाका पालन, नमस्कार और सेवा करते रहना; इन्हें सदा अपने विनयपूर्ण व्यवहारसे प्रसन्न रखना। जगत्में जो-जो निर्दीष कर्म हैं, उन्हींका तुम्हें सेवन करना चाहिये। उनसे भिन्न जो दोषयुक्त—निषिद्ध कर्म हैं, उनका कभी भूलकर—स्वप्नमें भी आचरण नहीं करना चाहिये। हमारे—अपने गुरुजनोंके आचार-व्यवहारमें भी जो उत्तम—शास्त्र एवं शिष्ट पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आचरण हैं, जिनके विषयमें किसी प्रकारकी शङ्काको स्थान नहीं है, उन्हींका तुम्हें अनुकरण करना चाहिये, उन्हींका सेवन करना चाहिये। जिनके विषयमें जरा-सी भी शङ्का हो, उनका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ—वय, विद्या, तप, आचरण आदिमें बड़े तथा ब्राह्मण आदि पूज्य पुरुष घरपर पधारें, उनको पाद्य, अर्घ्य, आसन आदि प्रदान करके सब प्रकारसे उनका सम्मान तथा यथायोग्य सेवा करनी चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेके लिये तुम्हें सदा उदारतापूर्वक तत्पर रहना चाहिये। जो कुछ भी दिया जाय, वह श्रद्धापूर्वक देना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि बिना श्रद्धाके किये हुए दान आदि कर्म असत् माने गये हैं (गीता १७। २७)। लज्जापूर्वक देना चाहिये अर्थात् सारा धन भगवान्का है, मैं यदि इसे अपना

३६६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

मार्नू तो यह अपराध है। इसे सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित भगवान्की सेवामें ही लगाना मेरा कर्तव्य है। मैं जो कुछ दे रहा हूँ, वह भी बहुत कम है। यों सोचकर संकोचका अनुभव करते हुए देना चाहिये। मनमें दानीपनके अभिमानको नहीं आने देना चाहिये। सर्वत्र और सबमें भगवान् हैं, अतः दान लेनेवाले भी भगवान् ही हैं। उनकी बड़ी कृपा है कि मेरा दिया हुआ स्वीकार कर रहे हैं। यों विचारकर भगवान्से भय मानते हुए दान देना चाहिये। 'हम किसीका उपकार कर रहे हैं' ऐसी भावना मनमें लाकर अभिमान या अविनय नहीं प्रकट करना चाहिये। परंतु जो कुछ दिया जाय—वह विवेकपूर्वक, उसके परिणामको समझकर निष्कामभावसे कर्तव्य समझकर देना चाहिये (गीता १७।२०)। इस प्रकार दिया हुआ दान ही भगवान्की प्रीतिका—कल्याणका साधन हो सकता है। वही अक्षय फलका देनेवाला है।

अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तैरन्। तथा तत्र वर्तैश्वाः। अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तेषु वर्तैरन्। तथा तेषु वर्तैश्वाः। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम्।

अथ=इसके बाद; यदि=यदि; ते=तुमको; कर्मविचिकित्सा=कर्तव्यके निर्णय करनेमें किसी प्रकारकी शङ्का हो; वा=या; वृत्तविचिकित्सा=सदाचारके विषयमें कोई शङ्का; वा=कदाचित्; स्यात्=हो जाय तो; तत्र=वहाँ; ये=जो; सम्मर्शिनः=उत्तम विचारवाले; युक्ताः=परामर्श देनेमें कुशल; आयुक्ताः=कर्म और सदाचारमें पूर्णतया लगे हुए; अलूक्षाः=स्निग्ध स्वभाववाले; (तथा) धर्मकामाः=एकमात्र धर्मके ही अभिलाषी; ब्राह्मणाः=ब्राह्मण; स्युः=हों; ते=वे; यथा=जिस प्रकार; तत्र=उस कर्म और आचरणके क्षेत्रमें; वर्तैरन्=बर्ताव करते हों; तत्र=उस कर्म

अनु० ११ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३६७

और आचरणके क्षेत्रमें; तथा=वैसे ही; वर्तैथाः=तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; अथ=तथा यदि; अभ्याख्यातेषु=किसी दोषसे लाञ्छित मनुष्योंके साथ बर्ताव करनेमें (संदेह उत्पन्न हो जाय, तो भी); ये=जो; तत्र=वहाँ; सम्मर्शिनः=उत्तम विचारवाले; युक्ताः=परामर्श देनेमें कुशल; आयुक्ताः=सब प्रकारसे यथायोग्य सत्कर्म और सदाचारमें भलीभाँति लगे हुए; अलूक्षाः=रूखेपनसे रहित; धर्मकामाः=धर्मके अभिलाषी; ब्राह्मणाः=(विद्वान्) ब्राह्मण; स्युः=हों; ते=वे; यथा=जिस प्रकार; तेषु=उनके साथ; वर्तैरन्=बर्ताव करें; तेषु=उनके साथ; तथा=वैसा ही; वर्तैथाः=तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; एषः आदेशः=यह शास्त्रकी आज्ञा है; एषः उपदेशः=यही (गुरुजनोंका अपने शिष्यों और पुत्रोंके लिये) उपदेश है; एषा=यही; वेदोपनिषत्=वेदोंका रहस्य है; च=और; एतत्=यही; अनुशासनम्=परम्परागत शिक्षा है; एवम्=इसी प्रकार; उपासितव्यम्=तुमको अनुष्ठान करना चाहिये; एवम् उ=इसी प्रकार; एतत्=यह; उपास्यम्=अनुष्ठान करना चाहिये।

व्याख्या—'यह सब करते हुए भी यदि तुमको किसी अवसरपर अपना कर्तव्य निश्चित करनेमें दुविधा उत्पन्न हो जाय, अपनी बुद्धिसे किसी एक निश्चयपर पहुँचना कठिन हो जाय—तुम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाओ तो ऐसी स्थितिमें वहाँ जो कोई उत्तम विचार रखनेवाले, उचित परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें तत्परतापूर्वक लगे हुए, सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करनेवाले तथा एकमात्र धर्मपालनकी ही इच्छा रखनेवाले विद्वान् ब्राह्मण (या अन्य कोई ऐसे ही महापुरुष) हों—वे जिस प्रकार ऐसे प्रसङ्गोंपर आचरण करते हों, उसी प्रकारका आचरण तुम्हें भी करना चाहिये। ऐसे स्थलोंमें उन्हींके सत्परामर्शके अनुसार उन्हींके स्थापित आदर्शका अनुगमन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जो मनुष्य किसी दोषके कारण लाञ्छित हो गया हो, उसके साथ किस समय कैसा व्यवहार करना चाहिये—इस विषयमें भी यदि तुमको दुविधा प्राप्त हो जाय—तुम अपनी बुद्धिसे निर्णय न कर सको तो वहाँ भी जो विचारशील, परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें पूर्णतया संलग्न तथा

३६८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

धर्मकामी (सांसारिक धनादिकी कामनासे रहित) निःस्वार्थी विद्वान् ब्राह्मण हों, वे लोग उसके साथ जैसा व्यवहार करें, वैसा ही तुमको भी करना चाहिये। उनका व्यवहार ही इस विषयमें प्रमाण है।'

'यही शास्त्रकी आज्ञा है—शास्त्रोंका निचोड़ है। यही गुरु एवं माता-पिताका अपने शिष्यों और संतानोंके प्रति उपदेश है तथा यही सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। इतना ही नहीं, अनुशासन भी यही है। ईश्वरकी आज्ञा तथा परम्परागत उपदेशका नाम अनुशासन है। इसलिये तुमको इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये।'

॥ एकादश अनुवाक समाप्त ॥ ११ ॥

द्वादश अनुवाक

शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्यर्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः*। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्। आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्।

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

नः=हमारे लिये; मित्रः=(दिन और प्राणके अधिष्ठाता) मित्रदेवता; शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों; (तथा) वरुणः=(रात्रि और अपानके अधिष्ठाता) वरुण भी; शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों; अर्यमा=(चक्षु और सूर्यमण्डलके अधिष्ठाता) अर्यमा; नः=हमारे लिये; शम् भवतु=कल्याणमय हों; इन्द्रः=(बल

  • यह मन्त्र ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त ९० का नवौ है तथा यजु० ३६। ९ है।

अनु० १२]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३६९

और भुजाओंके अधिष्ठाता) इन्द्र; (तथा) बृहस्पतिः=(वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति; नः=हमारे लिये; शम् [ भवतु ]=शान्ति प्रदान करनेवाले हों; उरुक्रमः=त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले; विष्णुः=विष्णु (जो पैरोंके अधिष्ठाता हैं); नः=हमारे लिये; शम् [ भवतु ]=कल्याणमय हों; ब्रह्मणे=(उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप) ब्रह्माके लिये; नमः=नमस्कार है; वायो=हे वायुदेव!; ते=तुम्हारे लिये; नमः=नमस्कार है; त्वम्=तुम; एव=ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष (प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले); ब्रह्म अस्मि=ब्रह्म हो (इसलिये मैंने); त्वाम्=तुझको; एव=ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष; ब्रह्म=ब्रह्म; अवादिषम्=कहा है; ऋतम्=(तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैंने तुम्हें) ऋत नामसे; अवादिषम्=पुकारा है; सत्यम्=(तुम सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैंने तुम्हें) सत्य नामसे; अवादिषम्=कहा है; तत्=उस (सर्वशक्तिमान् परमेश्वरने); माम् आवीत्=मेरी रक्षा की है; तत्=उसने; वक्तारम् आवीत्=वक्ताकी—आचार्यकी रक्षा की है; आवीत् माम्=रक्षा की है मेरी; (और) आवीत् वक्तारम्=रक्षा की है मेरे आचार्यकी; ॐ शान्तिः=भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं।

व्याख्या —शीशावल्लीके इस अन्तिम अनुवाकमें भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें उनकी स्तुति करते हुए प्रार्थनापूर्वक कृतज्ञता प्रकट की गयी है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों—हमारी उन्नतिके मार्गमें किसी प्रकारका विघ्न न आने दें। हम सबके अन्तर्यामी ब्रह्मको नमस्कार करते हैं।

इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंमें व्याप्त परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं—‘हे सर्वशक्तिमान्, सबके प्राणस्वरूप वायुमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है। आप

३७०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

ही समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं; अतः मैंने आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहकर पुकारा है। मैंने ऋत नामसे भी आपको ही पुकारा है; क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके आप ही अधिष्ठाता हैं। यही नहीं, मैंने 'सत्य' नामसे भी आपको ही पुकारा है; क्योंकि सत्य—यथार्थ भाषणके अधिष्ठातु-देवता भी आप ही हैं। उन सर्वव्यापी अन्तर््यामी परमेश्वरने मुझे सत्-आचरण एवं सत्य-भाषण करनेकी और सत्-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म-मरणरूप संसारचक्रसे मेरी रक्षा की है तथा मेरे आचार्यको उन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान करके उनकी रक्षा—उनका भी सब प्रकारसे कल्याण किया है। यहाँ 'मेरी रक्षा की है, मेरे वक्ताकी रक्षा की है' इन वाक्योंको दुहरानेका अभिप्राय शीक्षावल्लीकी समाप्तिकी सूचना देना है।'

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः.—इस प्रकार तीन बार 'शान्तिः' पदका उच्चारण करनेका भाव यह है कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं। अतः उनके स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है।

॥ द्वादश अनुवाक समाप्त ॥ १२ ॥

॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥

—●—●—●—

ब्रह्मानन्दवल्ली

शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

ॐ=पूर्णब्रह्म परमात्मन्!; (आप) नौ=हम दोनों (गुरु-शिष्य) की; सह=साथ-साथ; अवतु=रक्षा करें; नौ=हम दोनोंका; सह=साथ-साथ; भुनक्तु=पालन करें; सह=(हम दोनों) साथ-साथ ही; वीर्यम्=शक्ति; करवावहै=प्राप्त करें; नौ=हम दोनोंकी; अधीतम्=पढ़ी हुई विद्या; तेजस्वि=तेजोमयी; अस्तु=हो; मा विद्विषावहै=हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।

व्याख्या —हे परमात्मन्! आप हम गुरु-शिष्य दोनोंकी साथ-साथ सब प्रकारसे रक्षा करें, हम दोनोंका आप साथ-साथ समुचितरूपसे पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-ही-साथ सब प्रकारसे बल प्राप्त करें, हम दोनोंकी अध्ययन की हुई विद्या तेजपूर्ण हो— कहीं किसीसे हम विद्यामें परास्त न हों और हम दोनों जीवनभर परस्पर स्नेह-सूत्रसे बँधे रहें; हमारे अंदर परस्पर कभी द्वेष न हो। हे परमात्मन्! तीनों तापोंकी निवृत्ति हो।

प्रथम अनुवाक

ब्रह्मविदाज्जोति परम्। तदेषाभ्युक्ता।

ब्रह्मवित्-ब्रह्मज्ञानी; परम्=परब्रह्मको; आज्जोति=प्राप्त कर लेता है; तत्=उसी भावको व्यक्त करनेवाली; एषा=यह (श्रुति); अभ्युक्ता=कही गयी है।

व्याख्या —ब्रह्मज्ञानी महात्मा परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, इसी बातको बतानेके लिये आगे आनेवाली श्रुति कही गयी है।

३७२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गृह्यायां परमे व्योमन्। सोऽश्रुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति।

ब्रह्म=ब्रह्म; सत्यम्=सत्य; ज्ञानम्=ज्ञानस्वरूप; (और) अनन्तम्=अनन्त है; यः=जो मनुष्य; परमे व्योमन्=परम विशुद्ध आकाशमें (रहते हुए भी); गृह्यायाम्=प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें; निहितम्=छिपे हुए (उस ब्रह्मको); वेद=जानता है; सः=वह; विपश्चिता=(उस) विज्ञानस्वरूप; ब्रह्मणा सह=ब्रह्मके साथ; सर्वान्=समस्त; कामान् अश्रुते=भोगोंका अनुभव करता है; इति=इस प्रकार (यह ऋचा है)।

व्याख्या —इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके स्वरूपबोधक लक्षण बताकर उनकी प्राप्तिके स्थानका वर्णन करते हुए उनकी प्राप्तिका फल बताया गया है। भाव यह है कि वे परब्रह्म परमात्मा सत्यस्वरूप हैं। 'सत्य' शब्द यहाँ नित्य सत्ताका बोधक है। अर्थात् वे परब्रह्म नित्य सत् हैं; किसी भी कालमें उनका अभाव नहीं होता तथा वे ज्ञानस्वरूप हैं, उनमें अज्ञानका लेश भी नहीं है और वे अनन्त हैं अर्थात् देश और कालकी सीमासे अतीत—सीमारहित हैं। वे ब्रह्म परम विशुद्ध आकाशमें रहते हुए भी सबके हृदयकी गुफामें छिपे हुए हैं। उन परब्रह्म परमात्माको जो साधक तत्त्वसे जान लेता है, वह सबको भलीभाँति जाननेवाले उन ब्रह्मके साथ रहता हुआ सब प्रकारके भोगोंको अलौकिक ढंगसे अनुभव करता है।*

  • इस कथनके रहस्यको समझ लेनेपर ईशावास्यापनिषद्के प्रथम मन्त्रमें साधकके लिये दिये हुए उपदेशका भी स्पष्ट हो जाता है। वहाँ कहा है कि इस ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी जड़-चेतनरूप जगत् है, वह ईश्वरसे परिपूर्ण है, उस ईश्वरको अपने साथ रखते हुए अर्थात् निरन्तर याद रखते हुए ही त्यागपूर्वक आवश्यक विषयोंका सेवन करना चाहिये। जो उपदेश वहाँ साधकके लिये दिया गया है, वही बात यहाँ सिद्ध महात्माकी स्थिति बतानेके लिये कही गयी है। 'वह ब्रह्मके साथ सब भोगोंका अनुभव करता है' इस कथनका अभिप्राय यही है कि वह परमात्माको प्राप्त सिद्ध पुरुष इन्द्रियोंद्वारा बाह्य विषयोंका सेवन करते हुए भी स्वयं सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है। उसके मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके व्यवहार, उनके द्वारा होनेवाली सभी चेष्टाएँ परमात्मामें स्थित रहते हुए ही होती हैं। लोगोंके देखनेमें आवश्यकतानुसार यथायोग्य विषयोंका इन्द्रियोंद्वारा उपभोग करते समय भी वह परमात्मासे कभी एक क्षणके लिये

अनु० १ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३७३

सम्बन्ध— वे परब्रह्म परमात्मा किस प्रकार कैसी गुफामें छिपे हुए हैं, उन्हें कैसे जानना चाहिये—इस जिज्ञासापर आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है—

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्निरापः। अदभ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नान्तरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः। तस्येदमेव शिरः। अयं दक्षिणः पक्षः। अयमुत्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।

वै=निश्चय ही; तस्मात्=(सर्वत्र प्रसिद्ध) उस; एतस्मात्=इस; आत्मनः=परमात्मासे; (पहले-पहल) आकाशः=आकाशतत्त्व; सम्भूतः=उत्पन्न हुआ; आकाशात्=आकाशसे; वायुः=वायु; वायोः=वायुसे; अग्निः=अग्नि; अग्नेः=अग्निसे; आपः=जल; (और) अदभ्यः=जलतत्त्वसे; पृथिवी=पृथ्वीतत्त्व उत्पन्न हुआ; पृथिव्याः=पृथ्वीसे; ओषधयः=समस्त ओषधियाँ उत्पन्न हुई; ओषधीभ्यः=ओषधियोंसे; अन्नम्=अन्न उत्पन्न हुआ; अन्नान्तरुषः=अन्नसे ही; पुरुषः=(यह) मनुष्य-शरीर उत्पन्न हुआ; सः=वह; एषः=यह; पुरुषः=मनुष्य-शरीर; वै=निश्चय ही; अन्नरसमयः=अन्नरसमय है; तस्य=उसका; इदम्=यह (प्रत्यक्ष दीखनेवाला सिर); एव=ही; शिरः=(पक्षीकी कल्पनामें) सिर है; अयम्=यह (दाहिनी भुजा) ही; दक्षिणः पक्षः=दाहिना पंख है; अयम्=यह (बायीं भुजा) ही; उत्तरः पक्षः=बायीं पंख है; अयम्=यह (शरीरका मध्यभाग) ही; आत्मा=पक्षीके अङ्गोंका मध्य भाग है;* इदम्=यह (दोनों पैर ही); पुच्छम् प्रतिष्ठा=पूँछ एवं प्रतिष्ठा है; तत् अपि=उसीके विषयमें; एषः=यह (आगे कहा जानेवाला); श्लोकः=श्लोक; भवति=है।

भी अलग नहीं होता (गीता ६।३१)। अतः सदा सभी कर्मोंसे निर्लप रहता है। यही भाव दिखानेके लिये 'विपक्षिता ब्रह्मणा सह सर्वान् कामान् अशनुते' कहा गया है। इस प्रकार यह श्रुति परब्रह्मके स्वरूप तथा उसके ज्ञानकी महिमाको बतानेवाली है।

*'मध्यं ह्येषामङ्गनामात्मा' इस श्रुतिके अनुसार शरीरका मध्यभाग सब अङ्गोंका आत्मा है।

३७४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

व्याख्या —इस मन्त्रमें मनुष्यके हृदयरूप गुफाका वर्णन करनेके उद्देश्यसे पहले मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका प्रकार संक्षेपमें बताकर उसके अङ्गोंकी पक्षीके अङ्गोंके रूपमें कल्पना की गयी है। भाव यह है कि सबके आत्मा अन्तर्यामी परमात्मासे पहले आकाशतत्त्व उत्पन्न हुआ। आकाशसे वायुतत्त्व, वायुसे अग्नितत्त्व, अग्निसे जलतत्त्व और जलसे पृथ्वी उत्पन्न हुई। पृथ्वीसे नाना प्रकारकी ओषधियाँ—अनाजके पौधे हुए और ओषधियोंसे मनुष्योंका आहार अन्न उत्पन्न हुआ। उस अन्नसे यह स्थूल मनुष्य-शरीररूप पुरुष उत्पन्न हुआ। अन्नके रससे बना हुआ यह जो मनुष्य-शरीरधारी पुरुष है, इसकी पक्षीके रूपमें कल्पना की गयी है। इसका जो यह प्रत्यक्ष सिर है, वही तो मानो पक्षीका सिर है; दाहिनी भुजा ही दाहिना पंख है। बायीं भुजा ही बाँया पंख है। शरीरका मध्यभाग ही मानो उस पक्षीके शरीरका मध्यभाग है। दोनों पैर ही पूँछ एवं प्रतिष्ठा (पक्षीके पैर) हैं। अन्नकी महिमाके विषयमें यह आगे कहा जानेवाला श्लोक—मन्त्र है।

॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अनुवाक

अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते। याः काश्च पृथिवीः श्रिताः। अथो अन्नैव जीवन्ति। अथैनदपि यन्त्यन्ततः। अन्नः हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वोषधमुच्यते। सर्वं वै तेष्वमानुवन्ति येष्वं ब्रह्मोपासते। अन्नः हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वोषधमुच्यते। अन्नाद्भूतानि जायन्ते। जातान्यन्नेन वर्धन्ते। अद्यतेऽति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्यत इति।

पृथिवीम् श्रिताः=पृथ्वीलोकका आश्रय लेकर रहनेवाले; याः काः च=जो कोई भी; प्रजाः=प्राणी हैं (वे सब); अन्नात्=अन्नसे; वै=ही; प्रजायन्ते=उत्पन्न होते

अनु० २ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३७५

हैं; अथो=फिर; अत्रेन एव=अत्रसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; अथ=फिर; अन्ततः=अन्तमें; एनत् अपि=इस अत्रमें ही; यन्ति=विलीन हो जाते हैं; अत्रम्=(अतः) अत्र; हि=ही; भूतानाम्=सब भूतोंमें; ज्येष्ठम्=श्रेष्ठ है; तस्मात्=इसलिये (यह); सर्वोषधम्=सर्वोषधरूप; उच्यते=कहलाता है; ये=जो साधक; अत्रम् ब्रह्म=अत्रकी ब्रह्मभावसे; उपासते=उपासना करते हैं; ते वै=वे अवश्य ही; सर्वम्=समस्त; अत्रम्=अत्रको; आनुवन्ति=प्राप्त कर लेते हैं; हि=क्योंकि; अत्रम्=अत्र ही; भूतानाम्=भूतोंमें; ज्येष्ठम्=श्रेष्ठ है; तस्मात्=इसलिये; सर्वोषधम्=(यह) सर्वोषध नामसे; उच्यते=कहा जाता है; अत्रात्=अत्रसे ही; भूतानि=सब प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; अत्रेन=अत्रसे ही; वर्धन्ते=बढ़ते हैं; तत्=वह; अद्यते=(प्राणियोंद्वारा) खाया जाता है; च=तथा; भूतानि=(स्वयं भी) प्राणियोंको; अन्ति=खाता है; तस्मात्=इसलिये; अत्रम्='अत्र'; इति=इस नामसे; उच्यते=कहा जाता है।

व्याख्या —इस मन्त्रमें अत्रकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि इस पृथ्वीलोकमें निवास करनेवाले जितने भी प्राणी हैं, वे सब अत्रसे ही उत्पन्न हुए हैं—अत्रके परिणामरूप रज और वीर्यसे ही उनके शरीर बने हैं, उत्पन्न होनेके बाद अत्रसे ही उनका पालन-पोषण होता है, अतः अत्रसे ही वे जीते हैं। फिर अन्तमें इस अत्रमें ही—अत्र उत्पन्न करनेवाली पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह कि समस्त प्राणियोंके जन्म, जीवन और मरण स्थूलशरीरके सम्बन्धसे ही होते हैं; और स्थूलशरीर अत्रसे ही उत्पन्न होते हैं, अत्रसे ही जीते हैं तथा अत्रके उद्गमस्थान पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। उन शरीरोंमें रहनेवाले जो जीवात्मा हैं, वे अत्रमें विलीन नहीं होते; वे तो मृत्युकालमें प्राणोंके साथ इस शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरोंमें चले जाते हैं।

इस प्रकार यह अत्र समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति आदिका कारण है, इसीपर सब कुछ निर्भर करता है; इसलिये यही सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये यह सर्वोषधरूप कहलाता है; क्योंकि इसीसे प्राणियोंका शुधाजन्य संताप दूर होता है। सारे संतापोंका मूल शुधा है, इसलिये उसके शान्त होनेपर सारे संताप दूर

३७६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

हो जाते हैं। जो साधक इस अत्रकी ब्रह्मरूपमें उपासना करते हैं अर्थात् 'यह अत्र ही सर्वश्रेष्ठ है, सबसे बड़ा है' यह समझकर इसकी उपासना करते हैं, वे समस्त अत्रको प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें यथेष्ट अत्र प्राप्त हो जाता है, अत्रका अभाव नहीं रहता। यह सर्वथा सत्य है कि यह अत्र ही सब भूतोंमें श्रेष्ठ है, इसलिये यह सर्वोपधमय कहलाता है। सब प्राणी अत्रसे उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होनेके बाद अत्रसे ही बढ़ते हैं—उनके अङ्गोंकी पुष्टि भी अत्रसे ही होती है। सब प्राणी इसको खाते हैं तथा यह भी सब प्राणियोंको खा जाता—अपनेमें विलीन कर लेता है, इसीलिये 'अद्यते, अति च इति अत्रम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार इसका नाम अत्र है।

तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः। तस्य प्राण एव शिरः। व्यानो दक्षिणः पक्षः। अपान उत्तरः पक्षः। आकाश आत्मा। पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।

वै=निश्चय ही; तस्मात्=उस; एतस्मात्=इस; अन्नरसमयात्=अन्नरसमय मनुष्यशरीरसे; अन्यः=भिन्न; अन्तरः=उसके भीतर रहनेवाला; प्राणमयः आत्मा=प्राणमय पुरुष है; तेन=उससे; एषः=यह (अन्नरसमय पुरुष); पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह प्राणमय आत्मा; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः एव=पुरुषके आकारका ही है; तस्य=उस (अन्नरसमय) आत्माकी; पुरुषविधताम्=पुरुषतुल्य आकृतिमें; अनु=अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही; अयम्=यह; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका है; तस्य=उस (प्राणमय आत्मा) का; प्राणः=प्राण; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; व्यानः=व्यान; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; अपानः=अपान; उत्तरः=बार्या; पक्षः=पंख है; आकाशः=आकाश; आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; (और) पृथिवी=पृथ्वी; पुच्छम्=पूँछ; (एवम्) प्रतिष्ठा=आधार है; तत्=उस प्राण (की महिमा)के विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे बताया जानेवाला; श्लोकः भवति=श्लोक है।

अनु० ३ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३७७

व्याख्या —द्वितीय अनुवाकके इस दूसरे अंशमें प्राणमय शरीरका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पूर्वोक्त अत्रके रससे बने हुए स्थूलशरीरसे भिन्न उस स्थूलशरीरके भीतर रहनेवाला एक और शरीर है, उसका नाम 'प्राणमय' है; उस प्राणमयसे यह अत्रमय शरीर पूर्ण है। अत्रमय स्थूल शरीरकी अपेक्षा सूक्ष्म होनेके कारण प्राणमय शरीर इसके अङ्ग-प्रत्यङ्गमें व्याप्त है। वह यह प्राणमय शरीर भी पुरुषके आकारका ही है। अत्रमय शरीरकी पुरुषाकारता प्रसिद्ध है, उसमें अनुगत होनेसे ही यह प्राणमय शरीर भी पुरुषाकर कहा जाता है। उसकी पक्षीके रूपमें कल्पना इस प्रकार है—प्राण ही मानो उसका सिर है; क्योंकि शरीरके अङ्गोंमें जैसे मस्तक श्रेष्ठ है; उसी प्रकार पाँचों प्राणोंमें मुख्य प्राण ही सर्वश्रेष्ठ है। व्यान दाहिना पंख है। अपान बायाँ पंख है। आकाश अर्थात् आकाशमें फैले हुए वायुकी भाँति सर्वशरीरव्यापी 'समानवायु' आत्मा है; क्योंकि वही समस्त शरीरमें समानभावसे रस पहुँचाकर समस्त प्राणमय शरीरको पुष्ट करता है। इसका स्थान शरीरका मध्यभाग है तथा इसीका बाह्य आकाशसे सम्बन्ध है, यह बात प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके पाँचवें और आठवें मन्त्रोंमें कही गयी है तथा पृथ्वी पूँछ एवं आधार है; अर्थात् अपानवायुको रोककर रखनेवाली पृथ्वीकी आधिदैविक शक्ति ही इस प्राणमय पुरुषका आधार है। इसका वर्णन भी प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके आठवें मन्त्रमें ही आया है।

इस प्राणकी महिमाके विषयमें आगे कहा हुआ श्लोक—मन्त्र है।

॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥

तृतीय अनुवाक

प्राणं देवा अनु प्राणन्ति। मनुष्याः पशवश्च ये। प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यते। सर्वमेव त आयुर्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते। प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य।

३७८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

ये=जो-जो; देवाः=देवता; मनुष्याः=मनुष्य; च=और; पशवः=पशु आदि प्राणी हैं; [ ते ]=वे; प्राणम् अनु=प्राणका अनुसरण करके ही; प्राणन्ति=चेष्टा करते अर्थात् जीवित रहते हैं; हि=क्योंकि; प्राणः=प्राण ही; भूतानाम्=प्राणियोंकी; आयुः=आयु है; तस्मात्=इसलिये; (यह प्राण) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=कहलाता है; प्राणः=प्राण; हि=ही; भूतानाम्=प्राणियोंकी; आयुः=आयु—जीवन है; तस्मात्=इसलिये; (वह) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=कहलाता है; इति=यह समझकर; ये=जो कोई; प्राणम्=प्राणस्वरूप; ब्रह्म=ब्रह्मकी; उपासते=उपासना करते हैं; ते=वे; सर्वम् एव=निस्संदेह समस्त; आयुः=आयुको; यन्ति=प्राप्त कर लेते हैं; तस्य=उसका; एषः एव=यही; शरीरः=शरीरमें रहनेवाला; आत्मा=अन्तरात्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवालेका अर्थात् अत्ररसमय शरीरका अन्तरात्मा है।

व्याख्या —तृतीय अनुवाकके इस पहले अंशमें प्राणकी महिमाका वर्णन करनेवाली श्रुतिका उल्लेख करके फिर इस प्राणमय शरीरके अन्तर्यामी परमेश्वरको लक्ष्य कराया गया है। भाव यह है कि जितने भी देवता, मनुष्य, पशु आदि शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब प्राणके सहारे ही जी रहे हैं। प्राणके बिना किसीका भी शरीर नहीं रह सकता; क्योंकि प्राण ही सब प्राणियोंकी आयु—जीवन है, इसीलिये यह प्राण 'सर्वायुष' कहलाता है। जो साधक यह प्राणियोंकी आयु है, इसलिये यह सबका आयु—जीवन कहलाता है; यों समझकर इस प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं, वे पूर्ण आयुको प्राप्त कर लेते हैं। प्रश्नोपनिषद्में भी कहा है कि जो मनुष्य इस प्राणके तत्त्वको जान लेता है, वह स्वयं अमर हो जाता है और उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती है (३।११)। जो सर्वात्मा परमेश्वर अत्रके रससे बने हुए स्थूलशरीरधारी पुरुषका अन्तरात्मा है, वही उस प्राणमय पुरुषका भी शरीरान्तर्वर्ती अन्तर्यामी आत्मा है।

तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयादयोज्जर आत्मा मनोमयः। तैनेष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः।

अनु० ३ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३७९

तस्य यजुरेव शिरः। ऋगदक्षिणः पक्षः। सामोत्तरः पक्षः। आदेश आत्मा। अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।

वै=यह निश्चय है कि; तस्मात्=उस; एतस्मात्=इस; प्राणमयात्=प्राणमय पुरुषसे; अन्यः=भिन्न; अन्तरः=उसके भीतर रहनेवाला; मनोमयः=मनोमय; आत्मा=आत्मा (पुरुष) है; तेन=उस मनोमय शरीरसे; एषः=यह प्राणमय शरीर; पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह मनोमय शरीर; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका; एव=ही है; तस्य=उसकी; पुरुषविधताम् अनु=पुरुषतुल्य आकृतिमें अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही; अयम्=यह मनोमय शरीर; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका है; तस्य=उस (मनोमय पुरुष)का; यजुः=यजुर्वेद; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; ऋक्=ऋग्वेद; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; साम=सामवेद; उत्तरः=बायाँ; पक्षः=पंख है; आदेशः=आदेश (विधिवाक्य); आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; अथर्वाङ्गिरसः=अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिद्वारा देखे गये अथर्ववेदके मन्त्र ही; पुच्छम्=पूँछ; (एवं) प्रतिष्ठा=आधार हैं; तत्=उसकी महिमाके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे कहा जानेवाला; श्लोकः भवति=श्लोक है।

व्याख्या—इस तृतीय अनुवाकके दूसरे अंशमें मनोमय पुरुषका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पहले बताये हुए प्राणमय पुरुषसे भिन्न, उससे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला दूसरा पुरुष है; उसका नाम है मनोमय। उस मनोमयसे यह प्राणमय शरीर पूर्ण है अर्थात् वह इस प्राणमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त हो रहा है। वह यह मनोमय शरीर भी पुरुषके ही आकारका है। प्राणमय पुरुषमें अनुगत होनेसे ही यह मनोमय शरीर पुरुषके समान आकारवाला है। उसकी पक्षीके रूपमें इस प्रकार कल्पना की गयी है—उस मनोमय पुरुषका मानो यजुर्वेद ही सिर है, ऋग्वेद दाहिना पंख है, सामवेद बायाँ पंख है, आदेश (विधिवाक्य) मानो शरीरका मध्यभाग है तथा अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंद्वारा देखे हुए अथर्ववेदके मन्त्र ही पूँछ और आधार हैं।

३८०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

यज्ञ आदि कर्मोंमें यजुर्वेदके मन्त्रोंकी ही प्रधानता है। इसके सिवा जिनके अक्षरोंकी कोई नियत संख्या न हो तथा जिनकी पाद-पूर्तिका कोई नियत नियम न हो, ऐसे मन्त्रोंको ‘यजुः’ छन्दके अन्तर्गत समझा जाता है। इस नियमके अनुसार जिस किसी वैदिक वाक्य या मन्त्रके अन्तमें ‘स्वाहा’ पद जोड़कर अग्रिममें आहुति दी जाती है, वह वाक्य या मन्त्र भी ‘यजुः’ ही कहलायेगा। इस प्रकार यजुर्मन्त्रोंके द्वारा ही अग्रिको हविष्य अर्पित किया जाता है, इसलिये वहाँ यजुः प्रधान है। अङ्गोंमें भी सिर प्रधान है, अतः यजुर्वेदको सिर बतलाना उचित ही है। वेद-मन्त्रोंके वर्ण, पद और वाक्य आदिके उच्चारणके लिये पहले मनमें ही संकल्प उठता है; अतः संकल्पात्मक वृत्तिके द्वारा मनोमय पुरुषके साथ वेद-मन्त्रोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसीलिये इन्हें मनोमय पुरुषके ही अङ्गोंमें स्थान दिया गया है। शरीरमें जो स्थान दोनों भुजाओंका है, वही स्थान मनोमय पुरुषके अङ्गोंमें ऋग्वेद और सामवेदका है। यज्ञ-यागदिमें इनके मन्त्रोंद्वारा स्तवन और गायन होता है, अतः यजुर्मन्त्रोंकी अपेक्षा ये अप्रधान हैं; फिर भी भुजाओंकी भाँति यज्ञमें विशेष सहायक हैं, अतएव इनको भुजाओंका रूप दिया गया है। आदेश (विधि) वाक्य वेदोंके भीतर हैं, अतः उन्हें ही मनोमय पुरुषके अङ्गोंका मध्यभाग बताया गया है। अथर्ववेदमें शान्तिक-पौष्टिक आदि कर्मोंके साथक मन्त्र हैं, जो प्रतिष्ठाके हेतु हैं; अतः उनको पुच्छ एवं प्रतिष्ठा कहना सर्वथा युक्तिसंगत ही है। संकल्पात्मक वृत्तिके द्वारा मनोमय पुरुषका इन सबके साथ नित्य सम्बन्ध है, इसीलिये वेदमन्त्रोंको उसका अङ्ग बताया गया है—यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिये।

इस मनोमय पुरुषकी महिमाके विषयमें भी यह आगे चतुर्थ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।

॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥

— ● ● ● —

अनु० ४ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३८१

चतुर्थ अनुवाक

यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न विभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य ।

यतः=जहाँसे; मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि इन्द्रियाँ; अप्राप्य=उसे न पाकर; निवर्तन्ते=लौट आती हैं; [ तस्य ] ब्रह्मणः=उस ब्रह्मके; आनन्दम्=आनन्दको; विद्वान्=जाननेवाला पुरुष; कदाचन=कभी; न विभेति=भय नहीं करता; इति=इस प्रकार यह श्लोक है; तस्य=उस मनोमय पुरुषका भी; एषः एव=यही परमात्मा; शारीरः=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहले बताये हुए अन्नरसमय शरीर या प्राणमय शरीरका है।

व्याख्या—इस मन्त्रमें ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाले विद्वान्की महिमाके साथ अर्थान्तरसे उसके मनोमय शरीरकी महिमा प्रकट की गयी है। भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका जो स्वरूपभूत परम आनन्द है, वहाँतक मन, वाणी आदि समस्त इन्द्रियोंके समुदायरूप मनोमय शरीरकी भी पहुँच नहीं है; परंतु ब्रह्मको पानेके लिये साधन करनेवाले मनुष्यको यह ब्रह्मके पास पहुँचानेमें विशेष सहायक है। ये मन-वाणी आदि साधनपरायण पुरुषको उन परब्रह्मके द्वारतक पहुँचाकर, उसे वहाँ छोड़कर स्वयं लौट आते हैं और वह साधक उनको प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मके आनन्दमय स्वरूपको जान लेनेवाला विद्वान् कभी भयभीत नहीं होता। इस प्रकार यह मन्त्र है।

मनोमय शरीरके भी अन्तर््यामी आत्मा वे ही परमात्मा हैं, जो पूर्वोक्त अन्नरसमय शरीर और प्राणमय शरीरके अन्तर््यामी हैं।

तस्माद्वा एतस्मान्नमनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनेष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुष-विधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ।

वै=निश्चय ही; तस्मात्=उस पहले बताये हुए; एतस्मात्=इस; मनोमयात्=

३८२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

मनोमय पुरुषसे; अन्यः=अन्य; अन्तरः=इसके भीतर रहनेवाला; आत्मा=आत्मा; विज्ञानमयः=विज्ञानमय है; तेन=उस विज्ञानमय आत्मासे; एषः=यह मनोमय शरीर; पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह विज्ञानमय आत्मा; वै=निस्संदेह; पुरुषविधः एव=पुरुषके आकारका ही है; तस्य=उसकी; पुरुषविधत्वात् अनु=पुरुषाकृतिमें अनुगत होनेसे ही; अयम्=यह विज्ञानमय आत्मा; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका बताया जाता है; तस्य=उस विज्ञानमय आत्माका; श्रद्धा=श्रद्धा; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; व्रतम्=सदाचारका निश्चय; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; सत्यम्=सत्यभाषणका निश्चय; उत्तरः=बायाँ; पक्षः=पंख है; योगः=(ध्यानद्वारा परमात्मामें एकाग्रतारूप) योग ही; आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; महः='महः' नामसे प्रसिद्ध परमात्मा ही; पुच्छम्=पुच्छ; (एवं) प्रतिष्ठा=आधार है; तत्=उस विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे कहा जानेवाला; श्लोकः=श्लोक; भवति=है।

व्याख्या —चतुर्थ अनुवाकके इस दूसरे अंशमें विज्ञानमय पुरुषका अर्थात् विज्ञानमय शरीरके अधिष्ठाता जीवात्माका वर्णन है। भाव यह है कि पहले बताये हुए मनोमय शरीरसे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला जो आत्मा है, वह अन्य है। वह है विज्ञानमय पुरुष अर्थात् बुद्धिरूप गुफामें निवास करनेवाला और उसमें तदाकार-सा बना हुआ जीवात्मा। उससे यह मनोमय शरीर पूर्ण है। अर्थात् वह इस मनोमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त है और मनोमय अपनेसे पहलेवाले प्राणमय और अन्नमयमें व्याप्त है। अतः यह विज्ञानमय जीवात्मा समस्त शरीरमें व्याप्त है। गीतामें भी यही कहा है कि जीवात्मारूप क्षेत्रज्ञ शरीररूप क्षेत्रमें सर्वत्र स्थित है (१३।३२)। वह विज्ञानमय आत्मा भी निश्चय ही पुरुषके आकारका है। उस मनोमय पुरुषमें व्याप्त होनेसे ही वह पुरुषाकार कहा जाता है। उस विज्ञानमयके अङ्गोंकी पक्षीके रूपमें इस प्रकार कल्पना की गयी है। श्रद्धा कहते हैं बुद्धिकी निश्चित विश्वासरूप वृत्तिको; वही उस विज्ञानात्माके शरीरमें प्रधान अङ्गरूप सिर है; क्योंकि यह दृढ़ विश्वास ही प्रत्येक विषयमें उन्नतिका कारण है। परमात्माकी प्राप्तिमें तो सबसे पहले और सबसे अधिक इसीकी आवश्यकता है। सदाचरणका निश्चय ही इसका दाहिना पंख है, सत्य-भाषणका निश्चय ही इसका बायाँ पंख है। ध्यानद्वारा परमात्माके साथ संयुक्त

अनु० ५ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३८३

रहना ही विज्ञानमय शरीरका मध्यभाग है और 'महः' नामसे प्रसिद्ध* परमात्मा पुच्छ और आधार है; क्योंकि परमात्मा ही जीवात्माका परम आश्रय है।

इस विज्ञानात्माकी महिमाके विषयमें भी यह आगे पञ्चम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।

॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक

विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च। विज्ञानं देवाः सर्वे। ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। विज्ञानं ब्रह्म चेद्देव। तस्माच्छेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा। सर्वाङ्कामान्समशनुत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य।

विज्ञानम्=विज्ञान ही; यज्ञम् तनुते=यज्ञोंका विस्तार करता है; च=और; कर्माणि अपि तनुते=कर्माँका भी विस्तार करता है; सर्वे=सब; देवाः=इन्द्रियरूप देवता; ज्येष्ठम्=सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म=ब्रह्मके रूपमें; विज्ञानम् उपासते=विज्ञानकी ही सेवा करते हैं; चेतु=यदि; (कोई) विज्ञानम्=विज्ञानको; ब्रह्म=ब्रह्मरूपसे; वेद=जानता है; (और) चेतु=यदि; तस्मात्=उससे; न प्रमाद्यति=प्रमाद नहीं करता, उस निश्चयसे कभी विचलित नहीं होता (तो); पाप्मनः=(शरीराभिमानजनित) पापसमुदायको; शरीर=शरीरमें ही; हित्वा=छोड़कर; सर्वाङ्कामान्=समस्त भोगोंका; समशनुते=अनुभव करता है; इति=इस प्रकार यह श्लोक है; तस्य=उस विज्ञानमयका; एषः=यह परमात्मा; एव=ही; शारीर=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवालेका है।

  • शीक्षावल्ली पञ्चम अनुवाकमें 'भूः','भुवः','स्वः' और 'महः'—इन चार व्याहृतियोंमें 'महः'को ब्रह्मका स्वरूप बताया गया है, अतः 'महः' व्याहृति ब्रह्मका नाम है और ब्रह्मको आत्माकी प्रतिष्ठा बतलाना सर्वथा युक्तिसंगत है।