ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
प्रथम अध्याय
प्रथम वल्ली
ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ। तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥
ॐ=ॐ इस सच्चिदानन्दघन परमात्माके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; ह वै=प्रसिद्ध है कि; उशन्=यज्ञका फल चाहनेवाले; वाजश्रवसः=वाजश्रवाके पुत्र (उद्दालक) ने; सर्ववेदसम्=(विश्वजित् यज्ञमें) अपना सारा धन; ददौ=(ब्राह्मणोंको) दे दिया; तस्य=उसका; नचिकेता=नचिकेता; नाम ह=नामसे प्रसिद्ध; पुत्रः आस=एक पुत्र था॥ १ ॥
**व्याख्या—**ग्रन्थके आरम्भमें परमात्माका स्मरण मङ्गलकारक है, इसलिये यहाँ सर्वप्रथम 'ॐ कार' का उच्चारण करके उपनिषद्का आरम्भ हुआ है। जिस समय भारतवर्षका पवित्र आकाश यज्ञधूम और उसके पवित्र सौरभसे परिपूर्ण रहता था, त्यागमूर्ति ऋषि-महर्षियोंके द्वारा गाये हुए वेदमन्त्रोंकी दिव्य ध्वनिसे सभी दिशाएँ गूँजती रहती थीं, उसी समयका यह प्रसिद्ध इतिहास है। गौतमवंशीय वाजश्रवात्मज महर्षि अरुणके पुत्र अथवा अन्नके प्रचुर दानसे महान् कीर्ति पाये हुए (वाज=अन्न, श्रव=उसके दानसे प्राप्त यश) महर्षि अरुणके पुत्र उद्दालक ऋषिने फलकी कामनासे विश्वजित् नामक एक महान् यज्ञ किया। इस यज्ञमें सर्वस्व दान करना पड़ता है। अतएव उद्दालकने भी अपना सारा धन ऋत्विजों और सदस्योंको दक्षिणामें दे दिया। उद्दालकजीके नचिकेता नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र था॥ १ ॥
तं॰ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाऽऽविवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥
दक्षिणासु नीयमानासु=(जिस समय ब्राह्मणोंको) दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये (गौएँ) लायी जा रही थीं, उस समय; कुमारम्=छोटा बालक;
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ७७
सन्तम्=होनेपर भी; तम् ह=उस (नचिकेता) में; श्रद्धा=श्रद्धा (आस्तिक बुद्धि) का; आविवेश=आवेश हो गया (और); सः=(उन जराजीर्ण गायोंको देखकर) वह; अमन्यत=विचार करने लगा॥ २॥
व्याख्या—उस समय गो-धन ही प्रधान धन था और वाजश्रवस उद्दालकके घरमें इस धनकी प्रचुरता थी। होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—ये चार प्रधान ऋत्विज होते हैं; ऐसा माना गया है कि इनको सबसे अधिक गौएँ दी जाती हैं। प्रशास्ता, प्रतिप्रस्थाता, ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा आधी; अच्छावाक, नेष्टा, आग्नीध्र और प्रतिहर्ता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा तिहाई एवं ग्रावस्तुत, नेता, होता और सुब्रह्मण्य—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा चौथाई गौएँ दी जाती हैं। नियमानुसार जब इन सबको दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय बालक नचिकेताने उनको देख लिया। उनकी दयनीय दशा देखते ही उसके निर्मल अन्तःकरणमें श्रद्धा—आस्तिकताने प्रवेश किया और वह सोचने लगा—॥ २॥
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत्॥ ३॥
पीतोदकाः=जो (अन्तिम बार) जल पी चुकी हैं; जग्धतृणाः=जिनका घास खाना समाप्त हो गया है; दुग्धदोहाः=जिनका दूध (अन्तिम बार) दुह लिया गया है; निरिन्द्रियाः=जिनकी इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी हैं; ताः=ऐसी (निरर्थक, मरणासन्न) गौओंको; ददत्=देनेवाला; सः=वह दाता (तो); ते लोकाः=वे (शूकर-कूकरादि नीच योनियाँ और नरकादि) लोक; अनन्दाः=जो सब प्रकारके सुखोंसे शून्य; नाम=प्रसिद्ध हैं; तान्=उनको; गच्छति=प्राप्त होता है (अतः पिताजीको सावधान करना चाहिये) ॥ ३॥
व्याख्या—पिताजी ये कैसी गौएँ दक्षिणामें दे रहे हैं! अब इनमें न तो झुककर जल पीनेकी शक्ति रही है, न इनके मुखमें घास चबानेके लिये दाँत ही रह गये हैं और न इनके स्तनोंमें तनिक-सा दूध ही बचा है। अधिक
७८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
क्या, इनकी तो इन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट हो चुकी हैं—इनमें गर्भधारण करनेतककी भी सामर्थ्य नहीं है! भला, ऐसी निरर्थक और मृत्युके समीप पहुँची हुई गौएँ जिन ब्राह्मणोंके घर जायँगी, उनको दुःखके सिवा ये और क्या देंगी? दान तो उसी वस्तुका करना चाहिये, जो अपनेको सुख देनेवाली हो, प्रिय हो और उपयोगी हो तथा वह जिनको दी जाय, उन्हें भी सुख और लाभ पहुँचानेवाली हो। दुःखदायिनी अनुपयोगी वस्तुओंको दानके नामपर देना तो दानके व्याजसे अपनी विपद् टालना है और दान ग्रहण करनेवालोंको धोखा देना है। इस प्रकारके दानसे दाताको वे नीच योनियाँ और नरकादि लोक मिलते हैं जिनमें सुखका कहीं लेश भी नहीं है। पिताजी इस दानसे क्या सुख पायेंगे? यह तो यज्ञमें वैगुण्य है, जो इन्होंने सर्वस्व-दानरूपी यज्ञ करके भी उपयोगी गौओंको मेरे नामपर रख लिया है; और सर्वस्वमें तो मैं भी हूँ, मुझको तो इन्होंने दानमें दिया नहीं। पर मैं इनका पुत्र हूँ, अतएव मैं पिताजीको इस अनिष्टकारी परिणामसे बचानेके लिये अपना बलिदान कर दूँगा। यही मेरा धर्म है॥ ३॥
स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति। द्वितीयं तृतीयं तं होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति॥ ४॥
सः ह=यह सोचकर वह; पितरम्=अपने पितासे; उवाच=बोला कि; तत (तात)=हे प्यारे पिताजी! आप; माम्=मुझे; कस्मै=किसको; दास्यसि इति=देंगे?; (उत्तर न मिलनेपर उसने वही बात) द्वितीयम्=दुबारा; तृतीयम्=तिबारा (कही); तम् ह=(तब पिताने) उससे; उवाच= (क्रोधपूर्वक इस प्रकार) कहा; त्वा=तुझे (मैं); मृत्यवे=मृत्युको; ददामि इति=देता हूँ॥ ४॥
**व्याख्या—**यह निश्चय करके उसने अपने पितासे कहा—'पिताजी! मैं भी तो आपका धन हूँ, आप मुझे किसको देते हैं?' पिताने कोई उत्तर नहीं दिया; तब नचिकेताने फिर कहा—'पिताजी! मुझे किसको देते हैं?' पिताने इस बार भी उपेक्षा की। पर धर्मभीरु और पुत्रका कर्तव्य जाननेवाले नचिकेतासे नहीं रहा गया। उसने तीसरी बार फिर वही कहा—'पिताजी! आप
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ७९
मुझे किसको देते हैं?' अब ऋषिको क्रोध आ गया और उन्होंने आवेशमें आकर कहा—'तुझे देता हूँ मृत्युको!' ॥ ४ ॥
सम्बन्ध— यह सुनकर नचिकेता मन-ही-मन विचारने लगा कि—
बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः।
किँस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥
बहूनाम् = मैं बहुत-से शिष्योंमें तो; प्रथमः = प्रथम श्रेणीके आचरणपर; एमि = चलता आया हूँ (और); बहूनाम् = बहुतोंमें; मध्यमः = मध्यम श्रेणीके आचारपर; एमि = चलता हूँ (कभी भी नीची श्रेणीके आचरणको मैंने नहीं अपनाया फिर पिताजीने ऐसा क्यों कहा!); यमस्य = यमका; किम् स्वित् कर्तव्यम् = ऐसा कौन-सा कार्य हो सकता है; यत् अद्य = जिसे आज; मया = मेरे द्वारा (मुझे देकर); करिष्यति = (पिताजी) पूरा करेंगे ॥ ५ ॥
व्याख्या— शिष्यों और पुत्रोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं—उत्तम, मध्यम और अधम। जो गुरु या पिताका मनोरथ समझकर उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षा किये बिना ही उनकी रुचिके अनुसार कार्य करने लगते हैं, वे उत्तम हैं। जो आज्ञा पानेपर कार्य करते हैं, वे मध्यम हैं और जो मनोरथ जान लेने और स्पष्ट आदेश सुन लेनेपर भी तदनुसार कार्य नहीं करते, वे अधम हैं। मैं बहुत-से शिष्योंमें तो प्रथम श्रेणीका हूँ, प्रथम श्रेणीके आचरणपर चलनेवाला हूँ; क्योंकि उनसे पहले ही मनोरथ समझकर कार्य कर देता हूँ; बहुत-से शिष्योंसे मध्यम श्रेणीका भी हूँ, मध्यम श्रेणीके आचारपर भी चलता आया हूँ; परंतु अधम श्रेणीका तो हूँ ही नहीं। आज्ञा मिले और सेवा न करूँ, ऐसा तो मैंने कभी किया ही नहीं। फिर, पता नहीं, पिताजीने मुझे ऐसा क्यों कहा? मृत्युदेवताका भी ऐसा कौन-सा प्रयोजन है, जिसको पिताजी आज मुझे उनको देकर पूरा करना चाहते हैं ॥ ५ ॥
सम्बन्ध— सम्भव है, पिताजीने क्रोधके आवेशमें ही ऐसा कह दिया हो; परंतु जो कुछ भी हो, पिताजीका वचन तो सत्य करना ही है। इधर ऐसा दीख रहा है कि पिताजी अब पश्चात्ताप कर रहे हैं, अतएव उन्हें सान्त्वना देना भी आवश्यक है।
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यह विचारकर नचिकेता एकान्तमें पिताके पास जाकर उनकी शोकनिवृत्तिके लिये इस प्रकार आश्वासनपूर्ण वचन बोला—
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे। सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥
पूर्वे=आपके पूर्वज पितामह आदि; यथा=जिस प्रकारका आचरण करते आये हैं; अनुपश्य=उसपर विचार कीजिये (और); अपरे=(वर्तमानमें भी) दूसरे श्रेष्ठ लोग; [यथा=जैसा आचरण कर रहे हैं; ] तथा प्रतिपश्य=उसपर भी दृष्टिपात कर लीजिये (फिर आप अपने कर्तव्यका निश्चय कीजिये); मर्त्यः=(यह) मरणधर्मा मनुष्य; सस्यम् इव=अनाजकी तरह; पच्यते=पकता है अर्थात् जराजीर्ण होकर मर जाता है (तथा); सस्यम् इव=अनाजकी भाँति ही; पुनः=फिर; आजायते=उत्पन्न हो जाता है॥ ६॥
**व्याख्या—**पिताजी! अपने पितामहादि पूर्वजोंका आचरण देखिये और इस समयके दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंका आचरण देखिये। उनके चरित्रमें न कभी पहले असत्य था, न अब है। असाधु मनुष्य ही असत्यका आचरण किया करते हैं; परंतु उस असत्यसे कोई अजर-अमर नहीं हो सकता। मनुष्य मरणधर्मा है। यह अनाजकी भाँति जरा-जीर्ण होकर मर जाता है और अनाजकी भाँति ही कर्मवश पुनः जन्म ले लेता है॥ ६॥
**सम्बन्ध—**अतएव इस अनित्य जीवनके लिये मनुष्यको कभी कर्तव्यका त्याग करके मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये। आप शोकका त्याग कीजिये और अपने सत्यका पालनकर मुझे मृत्यु (यमराज)-के पास जानेकी अनुमति दीजिये। पुत्रके वचन सुनकर उद्दालकको दुःख हुआ; परंतु नचिकेताकी सत्यपरायणता देखकर उन्होंने उसे यमराजके पास भेज दिया। नचिकेताको यमसदन पहुँचनेपर पता लगा कि यमराज कहीं बाहर गये हुए हैं; अतएव नचिकेता तीन दिनोंतक अन्न-जल ग्रहण किये बिना ही यमराजकी प्रतीक्षा करता रहा। यमराजके लौटनेपर उनकी पत्नीने कहा—
वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्। तस्यैताँशान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७ ॥
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८१
**वैवस्वत=**हे सूर्यपुत्र; **वैश्वानरः=**स्वयं अग्निदेवता (ही); **ब्राह्मणः अतिथिः=**ब्राह्मण अतिथिके रूपमें; गृहान्=(गृहस्थके) घरोंमें; **प्रविशति=**प्रवेश करते हैं; **तस्य=**उनकी; (साधु पुरुष) **एताम्=**ऐसी (अर्थात् अर्घ्य-पाद्य-आसन आदिके द्वारा); **शान्तिम्=**शान्ति; **कुर्वन्ति=**किया करते हैं; (अतः आप) उदकम् हर=(उनके पाद-प्रक्षालनादिके लिये) जल ले जाइये॥ ७॥
**व्याख्या—**साक्षात् अग्नि ही मानो तेजसे प्रज्वलित होकर ब्राह्मण अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरपर पधारते हैं। साधुहृदय गृहस्थ अपने कल्याणके लिये उस अतिथिरूप अग्निको शान्त करनेके लिये उसे जल (पाद्य-अर्घ्य आदि) दिया करते हैं; अतएव हे सूर्यपुत्र! आप उस ब्राह्मण-बालकके पैर धोनेके लिये तुरंत जल ले जाइये। भाव यह कि वह अतिथि लगातार तीन दिनोंसे आपकी प्रतीक्षामें अनशन किये बैठा है; आप स्वयं उसकी सेवा करेंगे, तभी वह शान्त होगा॥ ७॥
आशाप्रतीक्षे संगतꣳ सूनृतां च
इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान्।
एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो
यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे॥ ८॥
**यस्य=**जिसके; **गृहे=**घरमें; **ब्राह्मणः=**ब्राह्मण अतिथि; **अनश्नन्=**बिना भोजन किये; **वसति=**निवास करता है; [**तस्य=**उस;] **अल्पमेधसः=**मन्दबुद्धि; **पुरुषस्य=**मनुष्यकी; **आशाप्रतीक्षे=**नाना प्रकारकी आशा और प्रतीक्षा; **संगतम्=**उनकी पूर्तिसे होनेवाले सब प्रकारके सुख; **सूनृताम् च=**सुन्दर भाषणके फल एवं; **इष्टापूर्ते च=**यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मोंके और कुआँ, बगीचा, तालाब आदि निर्माण करानेके फल तथा; **सर्वान् पुत्रपशून्=**समस्त पुत्र और पशु; **एतद् वृङ्क्ते=**इन सबको (वह) नष्ट कर देता है॥ ८॥
**व्याख्या—**जिसके घरपर अतिथि ब्राह्मण भूखा बैठा रहता है, उस मन्दबुद्धि मनुष्यको न तो वे इच्छित पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेकी उसे पूरी आशा थी; न वे ही पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेका निश्चय था और
८२ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
वह बाट ही देख रहा था; कभी कोई पदार्थ मिल भी गया तो उससे सुखकी प्राप्ति नहीं होती। उसकी वाणीमेंसे सौन्दर्य, सत्य और माधुर्य निकल जाते हैं; अतः सुन्दर वाणीसे प्राप्त होनेवाला सुख भी उसे नहीं मिलता; उसके यज्ञ-दानादि इष्ट कर्म और कूप, तालाब, धर्मशाला आदिके निर्माणरूप पूर्तकर्म एवं उनके फल नष्ट हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अतिथिका असत्कार उसके पूर्वपुण्यसे प्राप्त पुत्र और पशु आदि धनको नष्ट कर देता है॥ ८॥
सम्बन्ध— पत्नीके वचन सुनकर धर्ममूर्ति यमराज तुरंत नचिकेताके पास गये और पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा विधिवत् उसकी पूजा करके कहने लगे—
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे
अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु
तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व॥ ९॥
ब्रह्मन्= हे ब्राह्मणदेवता; नमस्यः अतिथिः=आप नमस्कार करनेयोग्य अतिथि हैं; ते=आपको; नमः अस्तु=नमस्कार हो; ब्रह्मन्= हे ब्राह्मण; मे स्वस्ति= मेरा कल्याण; अस्तु=हो; यत्=(आपने) जो; तिस्रः=तीन; रात्रीः=रात्रियोंतक; मे=मेरे; गृहे=घरपर; अनश्नन्=बिना भोजन किये; अवात्सीः=निवास किया है; तस्मात्= इसलिये आप (मुझसे); प्रति=प्रत्येक रात्रिके बदले (एक-एक करके); त्रीन् वरान्=तीन वरदान; वृणीष्व=माँग लीजिये॥ ९॥
व्याख्या— ब्राह्मणदेवता! आप नमस्कारादि सत्कारके योग्य मेरे माननीय अतिथि हैं; कहाँ तो मुझे चाहिये था कि 'मैं आपका यथायोग्य पूजन-सेवन करके आपको संतुष्ट करता और कहाँ मेरे प्रमादसे आप लगातार तीन रात्रियोंसे भूखे बैठे हैं! मुझसे यह बड़ा अपराध हो गया है। आपको नमस्कार है। भगवन्! इस मेरे दोषकी निवृत्ति होकर मेरा कल्याण हो। आप प्रत्येक रात्रिके बदले एक-एक करके मुझसे अपनी इच्छाके अनुरूप तीन वर माँग लीजिये'॥ ९॥
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८३
सम्बन्ध— तपोमूर्ति अतिथि ब्राह्मण-बालकके अनशनसे भयभीत होकर धर्मज्ञ यमराजने जब इस प्रकार कहा, तब पिताको सुख पहुँचानेकी इच्छासे नचिकेता बोला—
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥
मृत्यो = हे मृत्युदेव; यथा = जिस प्रकार; गौतमः = (मेरे पिता) गौतमवंशीय उद्दालक; मा अभि = मेरे प्रति; शान्तसंकल्पः = शान्त संकल्पवाले; सुमनाः = प्रसन्नचित्त (और); वीतमन्युः = क्रोध एवं खेदसे रहित; स्यात् = हो जायँ (तथा); त्वत्प्रसृष्टम् = आपके द्वारा वापस भेजा जानेपर जब मैं उनके पास जाऊँ तो; मा प्रतीतः = वे मुझपर विश्वास करके (यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर); अभिवदेत् = मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें; एतत् = यह; (मैं) त्रयाणाम् = अपने तीनों वरोंमेंसे; प्रथमम् वरम् = पहला वर; वृणे = माँगता हूँ ॥ १० ॥
व्याख्या— मृत्युदेव! तीन वरोंमेंसे मैं प्रथम वर यही माँगता हूँ कि मेरे गौतमवंशीय पिता उद्दालक, जो क्रोधके आवेशमें मुझे आपके पास भेजकर अब अशान्त और दुःखी हो रहे हैं, मेरे प्रति क्रोधरहित, शान्तचित्त और सर्वथा संतुष्ट हो जायँ तथा आपके द्वारा अनुमति पाकर जब मैं घर जाऊँ, तब वे मुझे अपने पुत्र नचिकेताके रूपमें पहचानकर मेरे साथ पूर्ववत् बड़े स्नेहसे बातचीत करें ॥ १० ॥
सम्बन्ध— यमराजने कहा—
यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत
औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्यु-
स्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥
त्वाम् = तुमको; मृत्युमुखात् = मृत्युके मुखसे; प्रमुक्तम् = छूटा हुआ; ददृशिवान् = देखकर; मत्प्रसृष्टः = मुझसे प्रेरित; आरुणिः = (तुम्हारे पिता) अरुण-पुत्र; औद्दालकिः = उद्दालक; यथा पुरस्तात् = पहलेकी भाँति ही; प्रतीतः = यह मेरा
८४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास करके; वीतमन्युः=दुःख और क्रोधसे रहित; भविता=हो जायँगे; रात्रीः=(और वे अपनी आयुकी शेष) रात्रियोंमें; सुखम्=सुखपूर्वक; शयिता=शयन करेंगे॥ ११॥
व्याख्या—तुमको मृत्युके मुखसे छूटकर घर लौटा हुआ देखकर मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पिता अरुण-पुत्र उद्दालक बड़े प्रसन्न होंगे, तुमको अपने पुत्ररूपमें पहचानकर तुमसे पूर्ववत् प्रेम करेंगे तथा उनका दुःख और क्रोध सर्वथा शान्त हो जायगा। तुम्हें पाकर अब वे जीवनभर सुखकी नींद सोयेंगे॥ ११॥
सम्बन्ध—इस वरदानको पाकर नचिकेता बोला, हे यमराज!
स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति। उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥
स्वर्गे लोके=स्वर्गलोकमें; किंचन भयम्=किंचित्मात्र भी भय; न अस्ति=नहीं है; तत्र त्वम् न=वहाँ मृत्युरूप स्वयं आप भी नहीं हैं; जरया न बिभेति=वहाँ कोई बुढ़ापेसे भी भय नहीं करता; स्वर्गलोके=स्वर्गलोकके निवासी; अशनायापिपासे=भूख और प्यास; उभे तीर्त्वा=इन दोनोंसे पार होकर; शोकातिगः=दुःखोंसे दूर रहकर; मोदते=आनन्द भोगते हैं॥ १२॥
स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम्। स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥
मृत्यो=हे मृत्युदेव; सः त्वम्=वे आप; स्वर्ग्यम् अग्निम्=उपर्युक्त स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको; अध्येषि=जानते हैं (अतः); त्वम्=आप; मह्यम्=मुझ; श्रद्दधानाय=श्रद्धालुको (वह अग्निविद्या); प्रब्रूहि=भलीभाँति समझाकर कहिये; स्वर्गलोकाः=स्वर्गलोकके निवासी; अमृतत्वम्=अमरत्वको; भजन्ते=
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८५
प्राप्त होते हैं (इसलिये); एतत्= यह (मैं); द्वितीयेन वरेण= दूसरे वरके रूपमें; वृणे= माँगता हूँ ॥ १३ ॥
व्याख्या— मैं जानता हूँ कि स्वर्गलोक बड़ा सुखकर है, वहाँ किसी प्रकारका भी भय नहीं है। स्वर्गमें न तो कोई वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है और न जैसे मर्त्यलोकमें आप (मृत्यु)-के द्वारा लोग मारे जाते हैं वैसे कोई मारा ही जाता है। वहाँ मृत्युकालीन संकट नहीं है। यहाँ जैसे प्रत्येक प्राणी भूख और प्यास दोनोंकी ज्वालासे जलते हैं; वैसे वहाँ नहीं जलना पड़ता। वहाँके निवासी शोकसे तरकर सदा आनन्द भोगते हैं; परंतु वह स्वर्ग अग्निविज्ञानको जाने बिना नहीं मिलता। हे मृत्युदेव ! आप उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको यथार्थरूपसे जानते हैं। मेरी उस अग्निविद्यामें और आपमें श्रद्धा है, श्रद्धावान् तत्त्वका अधिकारी होता है; अतः आप कृपया मुझको उस अग्निविद्याका उपदेश कीजिये, जिसे जानकर लोग स्वर्गलोकमें रहकर अमृतत्वको—देवत्वको प्राप्त होते हैं। यह मैं आपसे दूसरा वर माँगता हूँ ॥ १२-१३ ॥
सम्बन्ध— तब यमराज बोले—
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध
स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां
विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥
नचिकेतः= हे नचिकेता; स्वर्ग्यम् अग्निम्= स्वर्गदायिनी अग्निविद्याको; प्रजानन्= अच्छी तरह जाननेवाला मैं; ते प्रब्रवीमि= तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ; तत् उ मे निबोध= (तुम) उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो; त्वम् एतम्= तुम इस विद्याको; अनन्तलोकाप्तिम्= अविनाशी लोककी प्राप्ति करानेवाली, प्रतिष्ठाम्= उसकी आधारस्वरूपा; अथो= और; गुहायाम् निहितम्= बुद्धिरूप गुफामें छिपी हुई; विद्धि= समझो ॥ १४ ॥
व्याख्या— नचिकेता ! मैं उस स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याको भलीभाँति
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जानता हूँ और तुमको यथार्थरूपसे बतलाता हूँ। तुम इसको अच्छी तरहसे सुनो। यह अग्निविद्या अनन्त—विनाशरहित लोककी प्राप्ति करानेवाली है और उसकी आधारस्वरूपा है। पर तुम ऐसा समझो कि यह है अत्यन्त गुप्त। विद्वानोंकी बुद्धिरूप गुफामें छिपी रहती है॥ १४॥
सम्बन्ध— इतना कहकर यमराजने—
लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै
या इष्टका यावतीर्वा यथा वा।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त-
मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः॥ १५॥
तम् लोकादिम्=उस स्वर्गलोककी कारणरूपा; अग्निम्=अग्निविद्याका; तस्मै उवाच=उस नचिकेताको उपदेश दिया; याः वा यावतीः=उसमें कुण्ड-निर्माण आदिके लिये जो-जो और जितनी; इष्टकाः=ईंटें आदि आवश्यक होती हैं; वा यथा=तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है (वे सब बातें भी बतायीं); च सः अपि=तथा उस नचिकेताने भी; तत् यथोक्तम्=वह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर; प्रत्यवदत्=यमराजको पुनः सुना दिया; अथ=उसके बाद; मृत्युः अस्य तुष्टः=यमराज उसपर संतुष्ट होकर; पुनः एव आह=फिर बोले—॥ १५॥
व्याख्या— उपर्युक्त प्रकारसे अग्निविद्याकी महत्ता और गोपनीयता बतलाकर यमराजने स्वर्गलोककी कारणरूपा अग्निविद्याका रहस्य नचिकेताको समझाया। अग्निके लिये कुण्ड-निर्माणादिमें किस आकारकी, कैसी और कितनी ईंटें चाहिये एवं अग्निका चयन किस प्रकार किया जाना चाहिये—यह सब भलीभाँति समझाया। तदनन्तर नचिकेताकी बुद्धि तथा स्मृतिकी परीक्षाके लिये यमराजने नचिकेतासे पूछा कि तुमने जो कुछ समझा हो, वह मुझे सुनाओ। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने सुनकर जैसा यथार्थ समझा था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया। यमराज उसकी विलक्षण स्मृति और प्रतिभाको देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले॥ १५॥
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८७
तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा
वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना भवितायमग्निः
सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥
प्रीयमाणः=(उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर) प्रसन्न हुए; महात्मा=महात्मा यमराज; तम्=उस नचिकेतासे; अब्रवीत्=बोले; अद्य=अब मैं; तव=तुमको; इह=यहाँ; भूयः वरम्=पुनः यह (अतिरिक्त) वर; ददामि=देता हूँ कि; अयम् अग्निः=यह अग्निविद्या; तव एव नाम्ना=तुम्हारे ही नामसे; भविता=प्रसिद्ध होगी; च इमाम्=तथा इस; अनेकरूपाम् सृङ्काम्=अनेक रूपोंवाली रत्नोंकी मालाको भी; गृहाण=तुम स्वीकार करो॥ १६॥
**व्याख्या—**महात्मा यमराजने प्रसन्न होकर नचिकेतासे कहा—‘तुम्हारी अप्रतिम योग्यता देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, इससे अब मैं तुम्हें एक वर और तुम्हारे बिना माँगे ही देता हूँ। वह यह कि यह अग्नि, जिसका मैंने तुमको उपदेश किया है, तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। और साथ ही यह लो, मैं तुम्हें तुम्हारे देवत्वकी सिद्धिके लिये यह अनेक रूपोंवाली विविध यज्ञ-विज्ञानरूपी रत्नोंकी माला देता हूँ। इसे स्वीकार करो॥ १६॥
**सम्बन्ध—**उस अग्निविद्याका फल बतलाते हुए यमराज कहते हैं—
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं
त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा
निचाय्येमाःशान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥
त्रिणाचिकेतः=इस (अग्निका शास्त्रोक्त रीतिसे) तीन बार अनुष्ठान करनेवाला; त्रिभिः संधिम् एत्य=तीनों (ऋक्, साम, यजुर्वेद)-के साथ सम्बन्ध जोड़कर; त्रिकर्मकृत्=यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको निष्काम-भावसे करता रहनेवाला मनुष्य; जन्ममृत्यू तरति=जन्म-मृत्युसे तर जाता है; ब्रह्मजज्ञम्=(वह) ब्रह्मासे उत्पन्न
८८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
सृष्टिके जाननेवाले; ईड्यम् देवम्= स्तवनीय इस अग्निदेवको; विदित्वा= जानकर तथा; निचाय्य= इसका निष्कामभावसे चयन करके; इमाम् अत्यन्तम् शान्तिम् एति= इस अनन्त शान्तिको पा जाता है (जो मुझको प्राप्त है) ॥ १७॥
व्याख्या— इस अग्निका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला पुरुष ऋक्, यजुः, साम—तीनों वेदोंसे सम्बन्ध जोड़कर तीनों वेदोंके तत्त्व-रहस्यमें निष्णात होकर, निष्कामभावसे यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको करता हुआ जन्म-मृत्युसे तर जाता है। वह ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिको जाननेवाले स्तवनीय इस अग्निदेवको भलीभाँति जानकर इसका निष्कामभावसे चयन करके उस अनन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है, जो मुझको प्राप्त है॥ १७॥
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम्। स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥
एतत् त्रयम्= ईंटोंके स्वरूप, संख्या और अग्नि-चयन-विधि—इन तीनों बातोंको; विदित्वा= जानकर; त्रिणाचिकेतः= तीन बार नाचिकेत-अग्निविद्याका अनुष्ठान करनेवाला तथा; यः एवम्= जो कोई भी इस प्रकार; विद्वान्= जाननेवाला पुरुष; नाचिकेतम्= इस नाचिकेत अग्निका; चिनुते= चयन करता है; सः मृत्युपाशान्= वह मृत्युके पाशको; पुरतः प्रणोद्य= अपने सामने ही (मनुष्य-शरीरमें ही) काटकर; शोकातिगः= शोकसे पार होकर; स्वर्गलोके मोदते= स्वर्गलोकमें आनन्दका अनुभव करता है॥ १८॥
व्याख्या— किस आकारकी कैसी ईंटें हों और कितनी संख्यामें हों एवं किस प्रकारसे अग्निका चयन किया जाय—इन तीनों बातोंको जानकर जो विद्वान् तीन बार नाचिकेत अग्निविद्याका निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है—अग्निका चयन करता है, वह देहपातसे पहले ही (जन्म) मृत्युके पाशको तोड़कर शोकरहित होकर अन्तमें स्वर्गलोकके (अविनाशी ऊर्ध्वलोकके) आनन्दका अनुभव करता है॥ १८॥
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८९
एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण। एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास- स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९॥
नचिकेतः=हे नचिकेता; एषः ते=यह तुम्हें बतलायी हुई; स्वर्ग्यः अग्निः=स्वर्ग प्रदान करनेवाली अग्निविद्या है; यम् द्वितीयेन वरेण अवृणीथाः=जिसको तुमने दूसरे वरसे माँगा था; एतम् अग्निम्=इस अग्निको (अबसे); जनासः=लोग; तव एव=तुम्हारे ही नामसे; प्रवक्ष्यन्ति=कहा करेंगे; नचिकेतः=हे नचिकेता; तृतीयम् वरम् वृणीष्व=(अब तुम) तीसरा वर माँगो॥ १९॥
**व्याख्या—**यमराज कहते हैं—नचिकेता! तुम्हें यह उसी स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याका उपदेश दिया गया है, जिसके लिये तुमने दूसरे वरमें याचना की थी। अबसे लोग तुम्हारे ही नामसे इस अग्निको पुकारा करेंगे। नचिकेता! अब तुम तीसरा वर माँगो॥ १९॥
**सम्बन्ध—**नचिकेता तीसरा वर माँगता है—
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥
प्रेते मनुष्ये=मरे हुए मनुष्यके विषयमें; या इयम्=जो यह; विचिकित्सा=संशय है; एके (आहुः) अयम् अस्ति इति=कोई तो यों कहते हैं कि मरनेके बाद यह आत्मा रहता है; च एके (आहुः) न अस्ति इति=और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता; त्वया अनुशिष्टः=आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ; अहम् एतत् विद्याम्=मैं इसका निर्णय भलीभाँति समझ लूँ; एषः वराणाम्=यही तीनों वरोंमेंसे; तृतीयः वरः=तीसरा वर है॥ २०॥
**व्याख्या—**इस लोकके कल्याणके लिये पिताकी संतुष्टिका वर और
९० ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
परलोकके लिये स्वर्गके साधनरूप अग्निविज्ञानका वर प्राप्त करके अब नचिकेता आत्माके यथार्थस्वरूप और उसकी प्राप्तिका उपाय जाननेके लिये यमराजके सामने दूसरे लोगोंके दो मत उपस्थित करके उसपर उनका अनुभूत विचार सुनना चाहता है। इसलिये नचिकेता कहता है कि भगवन्! मृत मनुष्यके सम्बन्धमें यह एक बड़ा संदेह फैला हुआ है। कुछ लोग तो कहते हैं कि मृत्युके बाद भी आत्माका अस्तित्व रहता है और कुछ लोग कहते हैं, नहीं रहता। इस विषयमें आपका जो अनुभव हो, वह मुझे बतलाइये।* आपके द्वारा उपदेश पाकर मैं इस रहस्यको भलीभाँति समझ लूँ। बस, तीनों वरोंमेंसे यही मेरा अभीष्ट तीसरा वर है॥ २० ॥
सम्बन्ध— नचिकेताका महत्त्वपूर्ण प्रश्न सुनकर यमराजने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा की। सोचा कि ऋषिकुमार बालक होनेपर भी बड़ा प्रतिभाशाली है, कैसे गोपनीय विषयको जानना चाहता है; परंतु आत्मतत्त्व उपयुक्त अधिकारीको ही बतलाना चाहिये। अनधिकारीके प्रति आत्मतत्त्वका उपदेश करना
* मृत्युके पश्चात् आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, इस सम्बन्धमें नचिकेताको स्वयं कोई संदेह नहीं है। पिताको दक्षिणामें जरा-जीर्ण गौएँ देते देखकर नचिकेताने स्पष्ट कहा था कि ऐसी गौओंका दान करनेवाले आनन्दरहित (अनन्दाः) नरकादि लोकोंको प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार दूसरे वरमें नचिकेताने स्वर्गसुखोंका वर्णन करके स्वर्गप्राप्तिके साधनरूप अग्निविद्याके उपदेशकी प्रार्थना की थी। इससे सिद्ध है कि वह स्वर्ग और नरकमें विश्वास करता था। स्वर्ग-नरकादि लोकोंकी प्राप्ति मरनेके पश्चात् ही होती है। आत्माका अस्तित्व न हो तो ये लोक किसको प्राप्त हों। यहाँ इसीलिये नचिकेताने अपना मत न बताकर कहा है कि कुछ लोग मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व मानते हैं और कुछ लोग नहीं मानते। यह प्रश्नका एक ऐसा सुन्दर प्रकार है कि जिसके उत्तरमें आत्माकी नित्य सत्ता, उसके स्वरूप, गुण और परम लक्ष्य परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंका विवरण अपने-आप ही आ जाता है। अतः यह प्रश्न आत्मज्ञान-विषयक है, न कि आत्माके अस्तित्वमें संदेह-व्यञ्जक। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें नचिकेताका जो इतिहास मिलता है, उसमें तो नचिकेताने तीसरे वरमें पुनर्मृत्यु (जन्म-मृत्यु) पर विजय पानेका—मुक्तिका साधन जानना चाहा है (तृतीयं वृणीष्वेति। पुनर्मृत्योर्मेऽपचितिं ब्रूहि)।
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ९१
हानिकर होता है, अतएव पहले पात्रपरीक्षाकी आवश्यकता है—यों विचारकर यमराजने इस तत्त्वकी कठिनताका वर्णन करके नचिकेताको टालना चाहा और कहा—
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा
न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥ २१॥
नचिकेतः=हे नचिकेता; अत्र पुरा=इस विषयमें पहले; देवैः अपि=देवताओंने भी; विचिकित्सितम्=संदेह किया था (परंतु उनकी भी समझमें नहीं आया); हि एषः धर्मः अणुः=क्योंकि यह विषय बड़ा सूक्ष्म है; न सुविज्ञेयम्=सहज ही समझमें आनेवाला नहीं है (इसलिये); अन्यम् वरम् वृणीष्व=तुम दूसरा वर माँग लो; मा मा उपरोत्सीः=मुझपर दबाव मत डालो; एनम् मा=इस आत्मज्ञानसम्बन्धी वरको मुझे; अतिसृज=लौटा दो॥ २१॥
**व्याख्या—**नचिकेता! यह आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म विषय है। इसका समझना सहज नहीं है। पहले देवताओंको भी इस विषयमें संदेह हुआ था। उनमें भी बहुत विचार-विनिमय हुआ था; परंतु वे भी इसको जान नहीं पाये। अतएव तुम दूसरा वर माँग लो। मैं तुम्हें तीन वर देनेका वचन दे चुका हूँ, अतएव तुम्हारा ऋणी हूँ; पर तुम इस वरके लिये, जैसे महाजन ऋणीको दबाता है वैसे मुझको मत दबाओ। इस आत्मतत्त्वविषयक वरको मुझे लौटा दो। इसको मेरे लिये छोड़ दो॥ २१॥
सम्बन्ध— नचिकेता आत्मतत्त्वकी कठिनताकी बात सुनकर तनिक भी घबराया नहीं, न उसका उत्साह ही मन्द हुआ; वरं उसने और भी दृढ़ताके साथ कहा—
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल
त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥ २२॥
९२ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
**मृत्यो=**हे यमराज; **त्वम् यत् आत्थ=**आपने जो यह कहा कि; **अत्र किल देवैः अपि=**सचमुच इस विषयपर देवताओंने भी; **विचिकित्सितम्=**विचार किया था (परंतु वे निर्णय नहीं कर पाये); **च न सुविज्ञेयम्=**और वह सुविज्ञेय भी नहीं है (इतना ही नहीं); **च=**इसके सिवा; **अस्य वक्ता=**इस विषयका कहनेवाला भी; **त्वादृक्=**आपके-जैसा; **अन्यः न लभ्यः=दूसरा नहीं मिल सकता; [अतः]=**इसलिये मेरी समझमें तो; **एतस्य तुल्यः=**इसके समान; **अन्यः कश्चित्=**दूसरा कोई भी; **वरः न=**वर नहीं है॥ २२॥
**व्याख्या—**हे मृत्यो! आप जो यह कहते हैं कि पूर्वकालमें देवताओंने भी जब इस विषयपर विचार-विनिमय किया था तथा वे भी इसे जान नहीं पाये थे और यह विषय सहज नहीं है, बड़ा ही सूक्ष्म है; तब यह तो सिद्ध ही है कि यह बड़े ही महत्त्वका विषय है और ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयको समझानेवाला आपके समान अनुभवी वक्ता मुझे ढूँढ़नेपर भी दूसरा कोई मिल नहीं सकता। आप कहते हैं इसे छोड़कर दूसरा वर माँग लो। परंतु मैं तो समझता हूँ कि इसकी तुलनाका दूसरा कोई वर है ही नहीं। अतएव कृपापूर्वक मुझे इसीका उपदेश कीजिये॥ २२॥
सम्बन्ध— विषयकी कठिनतासे नचिकेता नहीं घबराया, वह अपने निश्चयपर ज्यों-का-त्यों दृढ़ रहा। इस एक परीक्षामें वह उत्तीर्ण हो गया। अब यमराज दूसरी परीक्षाके रूपमें उसके सामने विभिन्न प्रकारके प्रलोभन रखनेकी बात सोचकर उससे कहने लगे—
शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्। भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि॥ २३॥
**शतायुषः=**सैकड़ों वर्षोंकी आयुवाले; **पुत्रपौत्रान्=**बेटे और पोतोंको (तथा); **बहून् पशून्=**बहुत-से गौ आदि पशुओंको (एवं); **हस्तिहिरण्यम्=**हाथी, सुवर्ण और; **अश्वान् वृणीष्व=**घोड़ोंको माँग लो; **भूमेः महत् आयतनम्=**भूमिके
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ९३
बड़े विस्तारवाले मण्डल (साम्राज्य) को; वृणीष्व=माँग लो; स्वयम् च=तुम स्वयं भी; यावत् शरदः=जितने वर्षोंतक; इच्छसि=चाहो; जीव=जीते रहो ॥ २३ ॥
व्याख्या—नचिकेता ! तुम बड़े भोले हो, क्या करोगे इस वरको लेकर ? तुम ग्रहण करो इन सुखकी विशाल सामग्रियोंको। इस सौ-सौ वर्ष जीनेवाले पुत्र-पौत्रादि बड़े परिवारको माँग लो। गौ आदि बहुत-से उपयोगी पशु, हाथी, सुवर्ण, घोड़े और विशाल भूमण्डलके महान् साम्राज्यको माँग लो और इन सबको भोगनेके लिये जितने वर्षोंतक जीनेकी इच्छा हो, उतने ही वर्षोंतक जीते रहो ॥ २३ ॥
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥
नचिकेतः=हे नचिकेता; वित्तम् चिरजीविकाम्=धन, सम्पत्ति और अनन्तकालतक जीनेके साधनोंको; यदि त्वम्=यदि तुम; एतत्तुल्यम्=इस आत्मज्ञानविषयक वरदानके समान; वरम् मन्यसे वृणीष्व=वर मानते हो तो माँग लो; च महाभूमौ=और तुम इस पृथ्वीलोकमें; एधि=बड़े भारी सम्राट् बन जाओ; त्वा कामानाम्=(मैं) तुम्हें सम्पूर्ण भोगोंमेंसे; कामभाजम्=अति उत्तम भोगोंको भोगनेवाला; करोमि=बना देता हूँ॥ २४॥
व्याख्या—‘नचिकेता! यदि तुम प्रचुर धन-सम्पत्ति, दीर्घजीवनके लिये उपयोगी सुख-सामग्रियाँ अथवा और भी जितने भोग मनुष्य भोग सकता है, उन सबको मिलाकर उस आत्मतत्त्व-विषयक वरके समान समझते हो तो इन सबको माँग लो। तुम इस विशाल भूमिके सम्राट् बन जाओ। मैं तुम्हें समस्त भोगोंको इच्छानुसार भोगनेवाला बनाये देता हूँ।' इस प्रकार यहाँ यमराजने वाक्चातुर्यसे आत्मतत्त्वका महत्त्व बढ़ाते हुए नचिकेताको विशाल भोगोंका प्रलोभन दिया॥ २४॥
९४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
सम्बन्ध— इतनेपर भी नचिकेता अपने निश्चयपर अटल रहा, तब स्वर्गके दैवी भोगोंका प्रलोभन देते हुए यमराजने कहा—
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाँः श्छन्दतः प्रार्थयस्व। इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः। आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः॥ २५॥
ये ये कामाः = जो-जो भोग; मर्त्यलोके = मनुष्यलोकमें; दुर्लभाः = दुर्लभ हैं; सर्वान् कामान् = उन सम्पूर्ण भोगोंको; छन्दतः प्रार्थयस्व = इच्छानुसार माँग लो; सरथाः सतूर्याः इमाः रामाः = रथ और नाना प्रकारके बाजोंके सहित इन स्वर्गकी अप्सराओंको (अपने साथ ले जाओ); मनुष्यैः ईदृशाः = मनुष्योंको ऐसी स्त्रियाँ; न हि लम्भनीयाः = निःसंदेह अलभ्य हैं; मत्प्रत्ताभिः = मेरे द्वारा दी हुई; आभिः = इन स्त्रियोंसे; परिचारयस्व = तुम अपनी सेवा कराओ; नचिकेतः = हे नचिकेता; मरणम् = मरनेके बाद आत्माका क्या होता है; मा अनुप्राक्षीः = इस बातको मत पूछो॥ २५॥
व्याख्या— नचिकेता! जो-जो भोग मृत्युलोकमें दुर्लभ हैं, उन सबको तुम अपने इच्छानुसार माँग लो। ये रथों और विविध प्रकारके वाद्योंसहित जो स्वर्गकी सुन्दरी रमणियाँ हैं, ऐसी रमणियाँ मनुष्योंमें कहीं नहीं मिल सकतीं। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि इनके लिये ललचाते रहते हैं। मैं इन सबको तुम्हें सहज ही दे रहा हूँ। तुम इन्हें ले जाओ और इनसे अपनी सेवा कराओ; परंतु नचिकेता! आत्मतत्त्वविषयक प्रश्न मत पूछो॥ २५॥
सम्बन्ध— यमराज शिष्यपर स्वाभाविक ही दया करनेवाले महान् अनुभवी आचार्य हैं। इन्होंने अधिकारिपरीक्षाके साथ ही इस प्रकार भय और एकके बाद एक उत्तम भोगोंका प्रलोभन दिखाकर, जैसे खूँटेको हिला-हिलाकर दृढ़ किया जाता है, वैसे ही नचिकेताके वैराग्यसम्पन्न निश्चयको और भी दृढ़ किया। पहले
वल्ली १ ] कठोपनिषद् ९५
कठिनताका भय दिखाया, फिर इस लोकके एक-से-एक बढ़कर भोगोंके चित्र उसके सामने रखे और अन्तमें स्वर्गलोकमें भी उसका वैराग्य करा देनेके लिये स्वर्गके दैवी भोगोंका चित्र उपस्थित किया और कहा कि इनको यदि तुम अपने उस आत्मतत्त्वसम्बन्धी वरके समान समझते हो तो इन्हें माँग लो। परंतु नचिकेता तो दृढ़निश्चयी और सच्चा अधिकारी था। वह जानता था कि इस लोक और परलोकके बड़े-से-बड़े भोग-सुखकी आत्मज्ञानके सुखके किसी क्षुद्रतम अंशके साथ भी तुलना नहीं की जा सकती। अतएव उसने अपने निश्चयका युक्तिपूर्वक समर्थन करते हुए पूर्ण वैराग्ययुक्त वचनोंमें यमराजसे कहा—
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः। अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते॥ २६॥
अन्तक = हे यमराज! (जिनका आपने वर्णन किया, वे); श्वोभावाः = क्षणभङ्गुर भोग (और उनसे प्राप्त होनेवाले सुख); मर्त्यस्य = मनुष्यके; सर्वेन्द्रियाणाम् = अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका; यत् तेजः = जो तेज है; एतत् = उसको; जरयन्ति = क्षीण कर डालते हैं; अपि सर्वम् = इसके सिवा समस्त; जीवितम् = आयु (चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो); अल्पम् एव = अल्प ही है (इसलिये); तव वाहाः = ये आपके रथ आदि वाहन और; नृत्यगीते = ये अप्सराओंके नाच-गान; तव एव = आपके ही पास रहें (मुझे नहीं चाहिये) ॥ २६ ॥
व्याख्या—हे सबका अन्त करनेवाले यमराज! आपने जिन भोग्य वस्तुओंकी महिमाके पुल बाँधे हैं, वे सभी क्षणभङ्गुर हैं। कलतक रहेंगी या नहीं, इसमें भी संदेह है। इनके संयोगसे प्राप्त होनेवाला सुख वास्तवमें सुख ही नहीं है, वह तो दुःख ही है (गीता ५। २२)। ये भोग्य वस्तुएँ कोई लाभ तो देती ही नहीं, वरं मनुष्यकी इन्द्रियोंके तेज और धर्मको हरण कर लेती हैं। आपने जो दीर्घजीवन देना चाहा है, वह भी अनन्तकालकी तुलनामें अत्यन्त अल्प ही है। जब ब्रह्मा आदि देवताओंका जीवन भी अल्पकालका है—एक दिन उन्हें भी मरना पड़ता है, तब औरोंकी तो बात