ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
अ.-२, आ.-१, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेटा [ १८१ किं तु निर्माणशक्तिः साप्येवं विदुष ईशितुः । तथा विज्ञातृविज्ञेयभेदो यदवभास्यते ॥ ८ ॥ इह तत्त्वतः परमेश्वरस्य अप्रतिहतस्वातन्त्र्यरूपाविच्छिन्नस्वात्मविमर्शनयी अनन्योन्मु- खतारूपा इच्छैव क्रिया, इति उपसंहरिष्यते अधिकारान्ते । एवम् इच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया इति, चैत्रमैत्रादेरपि पचामि इति यैव अन्तेरिच्छा सैव क्रिया, तया च अधिश्रयणादिबहुतरस्पन्दन- सम्बन्धेऽपि पचामि इति नास्य विच्छिद्यते, यत्तु पचामि इति इच्छारूपं तदेव तथा स्पन्दनात्म- तया भाति, तत्र तु न कश्चित् क्रमः तत्त्वतः । एवम् ईश्वरस्यापि 'ईशे भासे स्फुरामि घूर्णे प्रत्यवमृशामि' इत्येवंरूपं यत् इच्छात्मकं विमर्शनम् 'अहम्' इत्येतावन्मात्रतत्त्वं न तत्र कश्चित् क्रमः, एतदेव च उच्यते—प्रमातृप्रमेयवैचित्र्यक्रम उल्लसतु अमुना वाक्येन, तदत्रापि न कश्चित् क्रमः, यदा तु इच्छारूपं 'पचामि' इति स्पन्दनात्मतां कायपर्यन्तां गतं क्रमारूषितम् आभाति तदा भगवदिच्छा प्रमातृप्रमेयभेदपर्यवसिता तत्क्रमोपश्लिष्टा भाति—दर्पणतलमिव विततप्रवहन्नदी- प्रवाहक्रमसमाश्लिष्टम्, अत्र च केवलं दर्पणस्य तथा इच्छा नास्ति, परमेश्वरस्य तु सा अस्ति— विद्वान् ईश्वर की वह निर्माण-शक्ति है । जिससे विज्ञाता और विज्ञेय का भेद अवभासित होता है ॥ ८ ॥ वस्तुतः परमेश्वर की अबाध्य-गति परम स्वातन्त्र्यरूप, अविच्छिन्न स्वात्मविमर्श करने- वाली, किसी अन्य की ओर उन्मुखता न रखनेवाली इच्छा-शक्ति ही क्रिया कही जाती है, इसका हम अधिकार के अन्त में उपसंहार करेंगे । इस प्रकार इच्छा-शक्ति ही हेतुत्व एवं कर्तृत्वरूप से क्रिया होती है, जैसे—चैत्र-मैत्रादि में मैं पकाता हूँ, ऐसा जो भीतरीभाव है वही इच्छा-शक्ति ही क्रिया कहलाती है, चूल्हे पर बटलोई को रखना और आग लगाना इत्यादि सम्बन्ध में सभी जगह पकानारूप क्रिया ही बनी रहती है उसका कभी-भी विच्छेद नहीं होता, उसकी जो इच्छा थी, वही तो इन पकाने आदि रूपों में स्पन्दात्मकरूप से भासती है, परमार्थतः उसमें कोई क्रम नहीं रहता । ऐसा ही ईश्वर का भी क्रम है 'मैं समर्थ हूँ, मैं भासित हो रहा हूँ, मैं स्फुरित हो रहा हूँ, मैं घूम रहा हूँ, मैं अपने को समझ-बूझ रहा हूँ, यह सब जो भी विमर्श है उसे 'अहम्' कहा जाता है। इन सब में कहीं पर भी क्रम से उपहित नहीं होते हुए दिखते, इसी बात को बतलाते हुए कहते हैं—प्रमाता एवं प्रमेय का विचित्र्यभावपूर्वक क्रम इस वाक्य के द्वारा उल्लसित होवें, इसलिए यहाँ पर भी कोई क्रम नहीं दिखता, किन्तु जब इच्छारूप 'पचामि' ऐसा कहकर स्पन्दन- रूपता को लेकर शरीर पर्यन्त परिणित होता हुआ क्रमरूप से युक्त भासता है तभी भगवान् की इच्छा-शक्ति प्रमाता एवं प्रमेय के भेद तक जानेवाली उस क्रम से मिली हुई भासती है—जैसे दर्पण तल में बृहद्रूप से बहता हुआ नदी का प्रवाह क्रम हो, [ तेनोपरागात् सक्रमं यथा स्फटिकादौ जवाकुसुमः । उसके साथ संपर्क होने से क्रमवाला दिखायी पड़ता है जैसे स्फटिकादि मणियों में जवापुष्प का प्रतिबिम्ब पड़ा हुआ ।] १. केवल इतना ही देश-काल का क्रम नहीं है जिससे कि देश-काल के क्रम न रहने के कारण क्रिया का अभाव हो जाय, किन्तु वही उसे अवभासन करनेवाली क्रिया-शक्ति है, इस प्रकार श्लोक में उद्धृत 'किन्तु' शब्द से द्योतित होता है ।
१८२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-८ इति उभयथा अस्य क्रियाशक्तिः 'क्रमरूपक्रियानिर्माणसामर्थ्यं क्रमरूपक्रियोपरागरूपयोगश्च' इति । एवं देशक्रमेऽपि वाच्यम्, तत्र तु अस्य चिच्छक्तिः उच्यते अन्यैः, इह तु क्रियाशक्तिरेव सा स्वीकृता, इति—पिण्डार्थः । अक्षरार्थस्तु—तथा इति स्वरूपभेदेन देशक्रमकारिणा क्रियाभेदेन च कालक्रमसम्पादकेन उपलक्षितो यो विज्ञातुः शून्यादेः प्रमातुः भेदोऽन्योन्यं ज्ञेयाच्च, एवं घटादेः परस्परं ज्ञातुश्च स भगवता अवभास्यते, यत् तदवभासनं सा ईशितुरपि निर्माणशक्तिः क्रियाशक्तिः न तु केवलं शून्यादेरेव क्रिया, यतश्च तन्निर्मितं ज्ञातृज्ञेयक्रियावैचित्र्यभेदम् असौ विद्वान् वेत्ति अनवरतम् तत्रैव हि तत् स्फुरति ततोऽपि तस्य सा क्रियाशक्तिः अतो भासनविच्छेदाभावात् क्रमाभावे स्थूलदृष्ट्या यद्यपि अस्य भवेत् क्रियानुपपत्तिशङ्का, किं तु एवमस्य क्रियाशक्तिरुपपन्ना—इति संगतिः । इति शिवम् ॥ ८ ॥ आदितः ९७ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभि- नवगुप्तपादकृतविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायां क्रियाधिकारे क्रियाशक्तिनिरूपणं नाम प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥ इसमें भेद इतना ही है कि दर्पण की वैसी कोई इच्छा विशेष नहीं रहती, किन्तु परमेश्वर में तो वैसा करने की इच्छा-विशेष होती है—इस प्रकार दोनों रूपों में इसकी क्रिया-शक्ति रहती है। इसी विषय को लेकर कहते हैं कि क्रमरूप क्रिया के निर्माण का सामर्थ्य बल और क्रमरूप क्रिया के उपराग का सम्बन्ध उसमें रहता है। एवं देशक्रम में भी लगा लेना चाहिए, कुछ लोग तो उसमें परमेश्वर की चेतन-शक्ति रहती है—ऐसा मानते हैं, किन्तु हम लोगों ने तो क्रिया-शक्ति को ही माना है, इतना ही इसका संक्षेप में अर्थ है। अब अक्षर सम्बन्धी अर्थों की व्याख्या करते हैं—'तथा इति' स्वरूप का भेद हो जाने से देशक्रम हो जाता है और क्रिया का भेद हो जाने से कालक्रम के सम्पादक से युक्त विज्ञाता, शून्यादि, प्रमाता के भेद और ज्ञेय से भी परस्पर भेद हो जाता है। इस प्रकार घटादि 'ज्ञेय' का परस्पर भेद ज्ञाता से और वह भगवान् के द्वारा ही भासित होता है। वह अवभासन ही ईश्वर की निर्माण-शक्ति क्रिया शक्ति बन जाती है। केवल शून्यादि प्रमाताओं की ही क्रिया नहीं होती, अपितु उसमें ज्ञाता एवं ज्ञेय की क्रिया भेद का विचित्र निर्माण भी होता है। विद्वान् व्यक्ति ही इस विषय को अच्छी तरह जानता है उसी में ही निरन्तर स्फुरित होता रहता है इसलिए भी उसकी वह क्रिया-शक्ति है। अतः इस अवभासन का अभाव न होने से क्रमाभाव रहता है, यद्यपि स्थूल-दृष्टि से तो इसमें क्रिया-शक्ति की अनुपपत्ति की शंका हो सकती है; किन्तु इसमें क्रिया-शक्ति का योग बना ही रहता है। यही संगति बैठती है ॥ ८ ॥ प्रथम आह्निक समाप्त १.. इसलिए यही सिद्ध होता है कि सर्वत्र यह क्रिया-शक्ति ही स्वयं अक्रमरूप होकर उपराग के कारण क्रमरूपता को प्राप्त करती है। इसका शुद्ध क्रमरूप होना व्यापक नहीं माना जाता है, जिससे कि व्यापक की अनुपलब्धि से भगवान् में क्रिया का निषेध हो ।
अथ द्वितीये क्रियाधिकारे भेदाभेदविमर्शानाख्यं द्वितीयमाह्निकम् विरोधमविरोधं च स्वेच्छयैवोपपादयन्। भेदाभेदौ च यो मन्त्रतत्त्ववित् तं स्तुमः शिवम् ॥ १ ॥ यदुक्तम्—अप्रतिहतसामर्थ्यात् भगवतो निर्माणशक्तिः इति, तदेव बाह्यवाददर्शनान्रुपपद्य- मानक्रियासंबन्धसामान्यादिपदार्थराशिसमर्थनमुखेन निर्वाहयितुं 'क्रियासंबन्धसामान्य............' इत्यादि '...................तेन न भ्रान्तिरीदृशी।' इत्यन्तं श्लोकसप्तकेन आह्निकं प्रस्तूयते। तत्र प्रथमश्लोकेन सूत्रकल्पेन 'एकानेकरूपस्य क्रियादेः बाह्यवादे विरुद्धधर्माध्यासदोषेणानुपपद्य- मानस्याप्यवश्यसमर्थनीयं वपुः' इति दृश्यंते। द्वितीयेन 'तत्र उपपत्तिः' सूच्यते। तृतीयेन 'निर्विकल्पकसंवेदनसंवेद्यत्वेऽपि विकल्पकाले एव स्फुटमेषां रूपम्' इत्युच्यते। चतुर्थपञ्चमाभ्याम् 'एकानेकस्वरूपताया विषयविभागः' चिन्रत्यते। षष्ठेन 'ग्रहणकसूत्रसूचितसंबन्धस्वीकृतानां क्रिया- कारकभावादीनां स्वरूपम्' उच्यते। सप्तमेन 'अर्थक्रियोपयोग' इति संक्षेपः। ननु एवं तया निर्माणशक्त्या अवभासनारूपया यत् निर्मीयते तस्यावभासनैव निर्माणं, न अन्यत्, सा च जो विरोध और अविरोध को तथा भेद और अभेद को अपनी इच्छामात्र से ही संपादन करते हैं; उस मन्त्र तत्त्ववेत्ता शिव की हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ जिसके विषय में कहा गया है कि अप्रतिहत सामर्थ्यवाले भगवान् की निर्माण-शक्ति अर्थात् जिसका अप्रतिहत स्वातन्त्र्य रहता है ऐसी वह निर्माण-शक्ति है। जो कि जगत् का निर्माण करती रहती है, इसी को न्यायादि दर्शनों के सिद्धान्तों में नहीं घटनेवाली निर्माण-शक्ति कहा जाता है और क्रिया सम्बन्ध का सामान्यादि पदार्थ-समूह के पहले समर्थन करते हुए निर्वाह करने के लिए क्रियासम्बन्धसामान्य .....' । इत्यादि से लेकर '.....तेन न भ्रान्तिरीदृशी।' इन सात श्लोकों से इस आह्निक का प्रस्ताव करते हैं। प्रथम श्लोक से सूत्ररूप में हो 'एकानेकरूपस्य क्रियादेः- बाह्यवादे विरुद्धधर्माध्यासदोषेणानुपपद्यमानस्याप्यवश्यसमर्थनीयं वपुः' अर्थात् एक एवं अनेक- रूप क्रियादि का बाह्यवाद में विरुद्धधर्म के अध्यास का दोष दिखा करके नहीं घटनेवाले पदार्थों का भी अवश्य समर्थन करनेवाला विषय दिखायेंगे। द्वितीय श्लोक से 'तत्र उपपत्तिः' उसमें [ समर्थन की ] उपपत्ति दिखायेंगे। तृतीय श्लोक से 'निर्विकल्पकसंवेदनसंवेद्यत्वेऽपि विकल्पकाले एव स्फुटमेषां रूपम्' अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान संवेद्य वस्तु के भी विकल्पकाल में भी पदार्थों का स्फुटरूप रहता है [ निर्विकल्पक अनुभव के वेद्यकाल में यह पदार्थ वर्ग जिस स्थिति में रहता है उसी प्रकार विकल्पकाल में भी स्फुटरूप से रहता है ] यह दिखायेंगे। चतुर्थ एवं पञ्चम श्लोक से एकत्व और अनेकत्व का विषय विभाग करते हुए उन पर विचार प्रकट करेंगे। षष्ठ श्लोक द्वारा 'ग्रहणकसूत्रसूचितसंबन्धस्वीकृतानां क्रियाकारकाभावादीनां स्वरूपम्' अर्थात् 'ग्रहणक सूत्र से सूचित सम्बन्धों का जो क्रियाकारकादि भाव है उनका स्वरूप' कहेंगे। सप्तम श्लोक से 'अर्थक्रियोपयोगः' अर्थात् अर्थ क्रिया का उपयोग इस प्रकार संक्षेप में कह दिया। अत्र शङ्का उठती है कि इस प्रकार उस निर्माण-शक्ति से, जो कि निरन्तर अवभासित होती रहती है,
१८४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-१ द्विचन्द्रादेरपि अस्ति, नीलादेरपि, नीलादिनिष्ठस्य कर्मसामान्यसंबन्धादेरपि ततश्च 'असत्यं सत्यं संवृतिसत्यमिति' य एवंप्रायेषु व्यवहारः स कथं संगच्छेत—निर्मेयत्वाविशेषात् ? इत्याशङ्क्य— ‘क्रियादीनामसत्यत्वं तावत् नोपपन्नम्’ इति वदन्—द्विचन्द्रादीनां तु इत्थमपि असत्यत्वम्, इति सूचयन् आह— क्रियासम्बन्धसामान्यद्रव्यदिक्कालबुद्धयः । सत्याः स्थैर्योपयोगाभ्यामेकानेकाश्रया मताः ॥ १ ॥ चित्तत्त्वात् अन्यत्र या क्रियाबुद्धिः कर्तृकर्मकरणादिषु 'चैत्रो व्रजति' 'तण्डुला विक्लिद्यन्ते' ‘एधा ज्वलन्ति’ इति, तस्या एकानेकरूपश्चैत्राद्यर्थ आश्रय आलम्बनम्, तथाहि—तत्तद्देशकाला- कारभिन्नः तत्र चैत्रदेहोऽनेकस्वभावोऽपि 'स एवायम्' इति एकरूपताम् अपरित्यजन्नेव निर्भासते, स एव च एकानेकरूपोऽर्थः क्रिया तथैव प्रतिभासनाच्च पारमार्थिकी, द्विचन्द्रादि तु तथा भास- जिसका भासना ही एक प्रकार निर्माण माना जाता है, अवभासन से अतिरिक्त नहीं, और वह तो द्विचन्द्रादि में भी भासन-शक्ति रहती है, एवं नील-सुखादि में भी होती है, नीलादि-पदार्थों में रहनेवाले कर्म [ क्रिया ] सामान्य [ जाति ] के सम्बन्ध में भी रहती है और इससे सिद्ध होता है कि 'असत्य, सत्य और संवृत्तिसत्य ये जो तीन प्रकार के व्यवहार देखे जाते हैं वे कैसे संभव हो सकते हैं; क्योंकि सब जगह निर्माण तो एक सा ही दिखायी पड़ता है ? अर्थात् सर्वत्र द्विचन्द्रादि में भी तो अवभासन एक सा ही होता हुआ दिखायी देता है ] ऐसी आशङ्का कर ‘क्रियादि का जो सत्यत्व है वह उपपन्न नहीं होता’, यह कहते हुए—किन्तु द्विचन्द्रादि में तो सब तरह असत्यत्व सिद्ध होता है, यह सूचना देते हुए कहते हैं— स्थिरता एवं उपयोग के द्वारा, क्रिया और उसका द्रव्यों के साथ सम्बन्ध तथा जाति, द्रव्य, दिशा, कालादि का ज्ञान, ये सभी प्रायः सत्य ही है; एक या अनेक दोनों के आश्रय से माने हुए हैं ॥१॥ चेतन में क्रिया नहीं रहती, अन्यत्र कर्ता, कर्म, करणादि में तो क्रिया बुद्धि रहती है 'चैत्रो व्रजति' चैत्र जाता है, 'तण्डुला विक्लिद्यन्ते' चावल पक रह हैं, 'एधा ज्वलन्ति' लकड़ियाँ जलती हैं इत्यादि, उसका एक या अनेकरूप से चैत्रादि के अर्थ का विषयत्व होता है । देखिये— वहाँ पर उन-उन देश, काल एवं आकारों से भिन्न चैत्र का देह अनेक रूपों में रहता हुआ ‘स एवायम्’ वही यह चैत्र है, इस प्रकार एकरूपता को न छोड़ता हुआ ही निर्भासित होता रहता है और एक से अनेक रूपों में भासित होना ही क्रिया है, उसी प्रकार वह भासित होने से १. निर्माण-शक्ति का अवभास क्रम तो देखा जाता है और नीलादि-पदार्थों में भी रहनेवाले कर्म-सामान्यादि का व्यवहार कैसे रहेगा ? दो चन्द्रमा में तो असत्यरूप से रहते हैं, नीलादि-पदार्थों में सत्यरूप से रहती हैं और क्रियादि में संवृत्ति सत्यरूप से रहती हैं, जैसे रूपादि पदार्थ भिन्न-भिन्न रहते हुए भी ज्ञान को उत्पन्न करते हैं और बहुत से परमाणु समूह नियम से अर्थक्रिया संपादित करते हैं तथा भिन्न-भिन्न क्षणों का समुदाय ओदनरूप फल को निष्पत्ति कर देता है, उसी प्रकार संवृत्ति सत्य भी है, जैसे अपने धर्म से अर्थ का अवच्छेदन कर दूसरे स्वरूप में परिणत कर देती है जिस कारण धर्म से आवृत हो जाता है, इस प्रकार संवृत्तिसत्य भ्रान्ति से भिन्न है, संवृत्तिसत्य ही कुछ नहीं होता—क्योंकि सामान्यादि का सत्यत्व उसमें रहता है, द्विचन्द्रादि तो असत्य ही होता है ।
अ.-२, आ.-२, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८५ मानमपि उत्तरकालं प्रमाव्यापारानुवृत्तिरूपस्य स्थैर्यस्य उन्मूलनेन 'द्विचन्द्रो नास्ति' इत्येवंरूपेण असत्यम्, इह पुनः 'चलति चैत्रः' इत्येवंभूतो विमर्शः अनुवर्तमानो न केनचित् उन्मूल्यमानः संवेद्यते, द्विचन्द्रादि च यद्यपि ह्लादोद्वेगयोः उपयुज्यते, तथापि द्विचन्द्राभिमानी न तावतीं तत्र अर्थक्रियाम् अभिमन्यते अपि तु यादृशी एकेन शशिना कर्तव्या-तिमिरापसारणादिरूपा, तादृश्येव अपरेण, इति न तद्दिगुणाम् अर्थक्रियाम् तत्र अध्यवस्यति, तस्यां च असौ न उपयुज्यते, व्रज्यायां तु यामेव ग्रामप्राप्तिम् अध्यवस्यति तस्याम् अविकलायाम् उपयोगोऽस्या, इति- स्थैर्यात् उपयोगच्च एकानेकरूपक्रियातत्त्वावलम्बना बुद्धिः सत्यैव, एवं संबन्धादिषु कालपर्यन्तेषु वाच्यम् उत्तरकारिकासु स्फुटीभविष्यति ॥ १ ॥ ननु एकत्वम् अनेकत्वं च परस्परं विरुद्धे, कथम् एकत्र वस्तुनि स्यातां, ततश्चायं बाधक- प्रमाणकृतः स्थैर्योन्मूलनप्रकारः ? इत्याशङ्कयाह- तत्रैकमान्तरं तत्त्वं तदेवेन्द्रियवेद्यताम् । संप्राप्यानेकतां याति देशकालस्वभावतः ॥ २ ॥ इह तावत् चैत्रे चलति दृष्टे न जातुचित् न चलति अयम् इति बुद्धिः जायते-न रजतम् इतिवत्, द्विचन्द्रेऽपि नायं द्विचन्द्रः तिमिरवशात्, अहम् उपप्लुतनायनः परम् एवं वेद्मि इति भवति ही पारमार्थिक कही जाती है किन्तु द्विचन्द्रादि तो वैसा भानमान होता हुआ भी उत्तरकाल में यथार्थ प्रमाज्ञान के हो जाने पर उन्मूलित हो जाता है, जिससे 'द्विचन्द्रो नास्ति' ऐसा बोध होने लग जाता है इसी कारण असत्य माना जाता है, क्रिया में तो 'चलति चैत्रः' अर्थात् चैत्र जाता है, ऐसा जो विमर्श होता है उसका उन्मूलन कोई कभी भी नहीं करता हुआ जाना जाता है । यद्यपि द्विचन्द्रादि आनन्द एवं उसके अभाव उद्वेग का उपयोगी होता है, तो भी 'द्विचन्द्रादि' का अभिमान करनेवाला मानता है कि यह 'द्विचन्द्रः' है, उतनी अर्थक्रिया का उसमें अभिमान नहीं रहता; जितना एक चन्द्रमा से अन्धकार दूर करना रखता है, वैसी दूसरे चन्द्रमा से नहीं होती, दुगुनी अर्थक्रिया 'प्रकाश' देने में उसे विश्वास नहीं होता; क्योंकि वह इसके लिए उपयोगी नहीं है, इसीलिए उसमें असत्य बुद्धि उत्पन्न होती है, किन्तु चैत्र विषयक गमन में तो ग्राम की प्राप्ति में अर्थक्रिया प्रत्यक्ष फल के रूप में दिखायी देती है, उपयोग भी तो अर्थक्रिया का सत्य अविकल है, इसलिए स्थैर्य और उपयोगी होने के कारण एक और अनेकरूप क्रियातत्त्व का आलम्बन करनेवाली बुद्धि सत्य ही होती है, इस प्रकार सम्बन्धादि से लेकर काल पर्यन्त कहना चाहिए यह बात हम आगे कारिकाओं में स्पष्ट करेंगे ॥ १ ॥ अब प्रश्न करते हैं कि एकत्व और अनेकत्व इन दोनों का स्वभाव परस्पर विरुद्ध सा ही लगता है; एक ही वस्तु में दोनों कैसे रह पायेंगे ? इसलिए स्थिरता के खण्डन करने का प्रकार बाधक मूलक है ? इस पर आशङ्का कर कहते हैं- उसमें एक ही आन्तरिक तत्त्व इन्द्रियों के द्वारा वेद्य होकर देश और काल के स्वभाव भेद से अनेकरूपता को प्राप्त कर लेते हैं ॥ २ ॥ चैत्र चलता है-इस प्रकार देखने पर नहीं कह सकते हो कि यह नहीं चलता है; ऐसी बुद्धि नहीं उत्पन्न होती, जैसी शुक्तिका को देखने पर यह रजत नहीं है, दो चन्द्रमा को भी देख २४
उन्मूलनाबुद्धिः, यत्तु उक्तम्—एकमेव कथम् अनेकं भवति इति, तत्र उच्यते—इह कारणमेव कथम् अकारणं भवति, अथ उच्यते—विषयभेदात् तथा, इति तद्विषयभेदे एतत् न विरुध्यते, इति केन अयं विनीर्णो वरः ? संवेदनेन इति चेत् ‘चलति’ इत्यादौ संवेदनमेव अस्माभिः प्रमाणी- कृतं किमिति न सह्यते, विषयभेदोऽपि च अत्र वक्तुं न शक्यते, तथाहि—आभासान्तरेण असंभेदने तदेकाभासमात्रम्, अत एव अन्यापेक्षावियोगात् अन्तरङ्गत्वात् आन्तरम् अनुवर्तमानं तथाभूता- भासमात्रग्रहणोचितान्तःकरणवेद्यतया च आन्तरं तथा स्वरूपापरिच्युतेः तत्त्वम् आभासान्तर- योगेन तननसहिष्णुत्वाच्च तत्त्वम् ‘एकम्’ इति प्रतीयते, तदेव देशाभासेन इह अमुत्र इति, कालाभासेन अधुना तदानीमिति, स्वभावाभासेन कृशः स्थूल इत्यादिना, मिश्रतया अनेकमिति बाह्येन्द्रियवेद्यतायां प्रतीयते, तथा ‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य…………… १’ इति उक्तनीत्या विश्वमेव आन्तरं सत् एकम्, तदेव सान्तर्विपरिवर्तिनः उभयेन्द्रियवेद्यत्वम्, इति वक्ष्यमाणकार्यकारणभाव- तत्त्वदृष्ट्या इन्द्रियवेद्यतायामनेकम्—देशाद्याभासमिश्रणात् इति, एकत्वम्—आभासान्तरामिश्र-
कर यह ‘द्विचन्द्रः’ नहीं हैं, ऐसा बोध अपने को हो जाता है; नेत्र दोष से दूषित होने के कारण मैं चकाचौंध हो गया हूँ, इसलिए ऐसा समझता हूँ अतः यह दो चन्द्रमा नहीं हैं—ऐसी बुद्धि हो जाती है, किन्तु यह जो कहा गया है कि एक ही अनेक कैसे हो जाता है, वहाँ पर यह कहना है कि कारण [ बीजादि ] कैसे अकारण [ अङ्कुरादि ] बन जाते हैं, इसके समाधान में उत्तर देते हैं कि विषय भेद से वैसा हो जाता है, [ कारण-अकारण ] विषय के भेद हो जाने पर कोई विरोध नहीं होता, यदि यह कहो कि विषय भेद से ऐसा हो जाता है तो मैं भी कहूँगा कि यह भी तो विषय भेद से हो जाता है, इसको किसने वरदान दिया है कि यह इसके लिए नहीं होगा ? यदि कहो कि संवेदनरूप ज्ञान से ऐसा होता है तब तो हम लोगों ने भी ‘चलति’ इत्यादि ज्ञान को जो प्रमाणित किया है इसको क्यों नहीं मान लेते हो ? इसमें विषय भेद भी नहीं हैं, ऐसा नहीं कह सकते, देखिये—दूसरे आभास से न ज्ञान होने पर एक ही आभास मात्र रहता है, इसीलिए किसी अन्य की अपेक्षा न रहने के कारण अन्तरंग हो जाने से वह अपने भीतर स्थिर रहा करता है । उसी प्रकार आभास ग्रहण में समर्थ अन्तःकरण से वेद्य होकर उसका अपने स्वरूप से च्युत न होना ही आन्तरतत्त्व कहलाता है; उसको तत्त्व इसलिए कहते हैं कि दूसरे आभास के सम्बन्ध से अपने विस्तार को सह सकता है जिससे ‘एकम्’ एक प्रतीत होता है, उसी को देश आभास से यहाँ और वहाँ कहा जाता है, काल आभास से ‘अधुना’ अब और ‘तदानीन्तन’ तब कहा जाता है, स्वभाव के आभास से कृश एवं स्थूल इत्यादिरूपों से कहा जाता है, मिले-जुले अनेकरूपों में बाह्येन्द्रियों के ज्ञान से प्रतीत होते हैं, वैसा कहा भी है ‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य’ अर्थात् अपनमें रहनेवाले स्वामी का……। इस कही हुई नीति से यह सारा का सारा विश्व ही आन्तरतत्त्व में एक सद्रूप होकर रहता है, उसी अन्तर्वर्ती परिवर्तन के साथ दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर आगे कहनेवाले कार्य- कारणभाव यथार्थ दृष्टि से इन्द्रियों के द्वारा वेद्य होने पर अनेकता को प्राप्त हो जाते हैं—देशादि आभास के मिल जाने से, ‘एकत्व’—दूसरे आभास के मिल जाने पर केवल अन्तःकरण से वेद्य
१. बाह्य-इन्द्रियों से वेद्य होने के कारण सभी प्रमाणों का आसाधारण रूप बाहर में रहने पर अकेला आ जाता है ।
अ.-२, आ.-२, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८७ ताया अन्तःकरणैकवेद्यत्वे चिन्मात्रतायाम्, अनेकत्वं पुनर्—आभासान्तरमिश्रतायाम् उभयकरण- वेद्यत्वे चिदतिरिक्ताभासने च, इति—स्फुटो विषयभेदः, तस्यैव च तथात्वम् इति परामर्शबला- देव कारणाकारणवत् उपादानसहकारिवत् । अथ व्यपदेशमात्रम् एतत् 'कारणम् अकारणं च' इत्यादि, तदिहापि एकमनेकमिति व्यवहारमात्रम्, नीलं पीतम् अविकल्पकं सविकल्पकम् इत्यपि सर्वं मायापदे व्यवहारमात्रम् इति सर्वं समानम्, तस्मात् एकत्वानेकत्वविरोधो न बाधकः, तदेतत् एवकारेण उक्तम् । तत्र इति—तेषु क्रियादिषु यत् आन्तरं तत्त्वं तदेव इन्द्रियवेदनीयतां प्राप्य देशादिभेदात् अनेकतां याति इति संबन्धः, तत्र इति सत्यत्वे स्थिते तयोर्वा एकत्वानेकत्वयोः मध्ये 'एकत्वमेवम् अनेकत्वमेवम्' इति योजना ॥ २ ॥ ननु एवं विषयभेदे अभ्युपगम्यमाने यदा एकं प्रतिभातं भवति तदा न अनेकम्, अनेक- प्रतिभासे च न एकं प्रतिभातम्, इति कथम् एकानेकरूपं वस्तु स्यात्, तथाहि बाह्येन इन्द्रियेण होकर चेतन अवस्था में एकता को संपादन कर लेता है। दूसरे आभास के साथ में संयुक्त हो जाने पर दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर चेतन से भिन्न भासता हुआ स्फुट रूपों में व्यक्त हो जाता है और इसका स्फुट हो जाना ही विषय भेद माना जाता है। उस विषय भेद का ही एकत्व एवं अनेकत्व है। इस प्रकार परामर्श के बल से कारण-अकारण के जैसा एवं उपादान सहकारी कारण के जैसा मात्र कथन में ही भेद रहता है इसके अतिरिक्त कुछ भी भेदभाव नहीं रहता। [जैसा कि सहकारी सामग्री के अभाव में उपादान का अनुपादनत्व रहता है] पहले कारण और अकारण इत्यादि कहना। यहां पर भी एक और अनेक का ऐसा व्यवहार ही मात्र होता है, नील-पीत एवं अविकल्प सविकल्प जितने भी हैं वे सभी मायीय जगत् में व्यवहार मात्र होते हैं—यह सब समान है, इसलिए एकत्व और अनेकत्व का विरोध बाधक नहीं होता, उसे 'एवकार' शब्द से कहा गया है। उन क्रियादिओं में जो आन्तरतत्त्व है वह तो एक ही है, वही इन्द्रिय से वेद्य होकर देश-कालादि के भेद द्वारा अनेक रूपों में विभक्त हो जाता है, यही सम्बन्ध भी है, इसलिए उनकी सत्यता प्रमाणित हो जाने पर उन एकत्व एवं अनेकत्व के बीच में एकत्व ऐसा होता है तथा अनेकत्व ऐसा होता है, यह जोड़ देना चाहिए ॥ २ ॥ अब शंका उठती है कि [ विषयभेद से एकत्व और अनेकत्व में कोई भी विरोध नहीं आने पाता है यह 'ननु' कहकर आक्षेप किया है ] विषयभेद के स्वीकार करने पर जब एक का प्रतिभान होता है तब अनेक का प्रतिभान नहीं होता और अनेक का प्रतिभान होता है, तब फिर एक का १. सब ही नील-मधुर-कर्कश इत्यादि पदार्थों की यथार्थतः चिन्मयता होने के कारण, प्रत्येक में उस-उस धर्मों का योग होने से विश्वरूपता और विश्वशरीरता सिद्ध होती है—इसलिए ईश्वर एवं आत्मा में दोनों की उभयरूपता का कहना ठीक हो है, एकत्व करना ठीक नहीं है; क्योंकि वह तो द्वित्वादि प्रतियोगी की अपेक्षा सदा रखता है—अप्रतियोगी में कैसे रहेगा ? इसी को दिखाते हुए कहते हैं 'विश्वमेवान्तरं सत्' इत्यादि से। जब फिर उस नीलादि-पदार्थों में अभेद की अन्तःकरण वेद्यतया सभी प्रमाताओं की असाधारणत्व भावपूर्वक मात्र व्यवस्था देखी जाती है। भीतर एकत्वरूप से आभास रहता है और बाहर में अनेकत्वरूप से हो जाता है इसी बात को 'एकमिति' इस प्रतीक से कहा गया है। उसमें भी विभाग दिखाते हैं। अन्तःकरण के साथ परिवर्तन होनेवाली उभय इन्द्रियां वेद्य रहती है, अन्तःकरण की वेद्यता में एकत्व एव बाह्य-इन्द्रियों की वेद्यता में अनेकत्व रहता है।
१८८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-३ चैत्रो विचित्रदेशक्रः परम् अनुभूयते, न तु अनेकाभाससंमिश्रीकारे बाह्येन्द्रियस्य अविकल्पकस्य व्यापारः—संनिहितविषयबलोत्पत्तेः अविचारकत्वात् इत्याहुः, विकल्पेनापि मानसेन तथाभूतं वस्तु नैव स्पृश्यते इति कया धिया वस्तु एकानेकरूपं गृह्येत ? इति परव्यामोहनिवर्हणाय आह— तद्द्वयालम्बना एता मनोऽनुव्यवसायि सत् । करोति मातृव्यापारमयीः कर्मादिकल्पनाः ॥ ३ ॥ इह ‘ज्ञानमालाया अन्तःसूत्रकल्पः स्वसंवेदनात्मकः प्रमाता जीवितभूतः’ इति उपपादितं प्राक्, स च ‘स्वतन्त्र’ इत्यपि निर्णीतम्, स तु विशुद्धस्वभावः शिवात्मा, मायापदे तु संकुचित- स्वभावः पशुः, तदस्य मनःसमुल्लासावसरे विकल्पभूमिकायां स्फुट उल्लासः, ऐन्द्रियके निर्वि- कल्पके सदाशिवेश्वरदशाभ्युदयात्, अविकल्पकबोधाबहिर्भूतविमर्शव्यापारस्य पश्चाद्भाविनं व्यवसायं निश्चयात्मकं विकल्पकम् अनुव्यवसायशब्दवाच्यं विदधदन्तःकरणम् एतान् क्रिया- सम्बन्धादिविकल्पान् सम्पादयति, ते च विकल्पाः तद्द्वयम् एकत्वानेकत्वरूपम् अवलम्बन्ते, न हि विकल्पेषु प्रतिभासमानम् अवस्तु तत्—इति हि उक्तम् ‘प्रकाशतैव वस्तुत्वम्’ इति, न च विकल्पस्य प्रकाशरूपतां मुक्त्वा आरोपणाध्यवसायाभिमानादिनामधेयं व्यापारान्तरं युक्तम्, नहीं होता, इस प्रकार वस्तु एक—अनेकरूप कैसे होगी ? देखिये—बाह्य-इन्द्रिय [ चाक्षुष अनुभव ] से चैत्र एक देश को छोड़कर दूसरे देश में चला गया—ऐसी प्रतीति होती है, किन्तु अनेक आभासों को मिला देने पर बाह्येन्द्रिय जन्य अविकल्पक व्यापार नहीं हो सकता; क्योंकि संनिहित विषय के बलोत्पत्ति का ज्ञान नहीं होता है, यह कह सकते हैं, मानस विकल्प से भी एक एवं अनेकरूप वस्तु का बोध नहीं हो सकता तब फिर किस बुद्धि [ अनुभव ] से एक-अनेकरूप वस्तु को ग्रहण करेंगे ? यह दूसरों के ऊपर मोह के आवरण को हटाने के लिए कहते हैं— इसलिए अनुव्यवसाय करनेवाला स्थिर मन इन एकत्व और अनेकत्व का आधार लेकर प्रमाता के व्यापारमय कर्मादि की कल्पना करता है ॥ ३ ॥ यहाँ पर ‘ज्ञानमाला का आभ्यन्तरीय स्वसंवेदनरूप प्रमाता ही जीवन है, इसका हमने ज्ञानाधिकार के द्वितीय आह्निक में विवेचन कर दिया है और वह ‘स्वतन्त्र’ है इसका भी निर्णय कर दिया है, वह तो विशुद्ध स्वभाववाला शिवात्मा है, किन्तु मायायी जगत् में तो संकुचित- परिच्छिन्न स्वभाववाला पशु हो जाता है, इसलिए इसका मन के समुल्लास अवसरकाल में, जो विकल्प भूमिका है उसमें स्फुटरूप से उल्लास होता है; क्योंकि इन्द्रियजन्य निर्विकल्प दशा में सदाशिव और ईश्वर दशा का उदय होता है, अविकल्प बोध से बाहर में नहीं होनेवाला जो विमर्श का व्यापार है उसके बाद में होनेवाला निश्चयात्मक व्यवसायरूप विकल्प को अनुव्यवसाय शब्द का वाच्य होता है, उसी को करनेवाला अन्तःकरण क्रिया सम्बन्धादि विकल्पों को सम्पादन करता है, और वे सब के सब विकल्प उन एकत्व और अनेकत्वरूप द्वित्व का ही अवलम्बन करते हैं, इसलिए विकल्पों में प्रतिभासित होनेवाली अवस्तु नहीं हो सकती; यही हमने कहा है कि ‘प्रकाशतैव वस्तुत्वम्’ आभास को ही वस्तु कहा जाता है और विकल्प के प्रकाशरूप को छोड़कर आरोप करना, अध्यवसाय करना और अभिमानादि नामक दूसरा व्यापार युक्त नहीं बैठता है,
अ.-२, आ.-२, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८९
ततोऽबाह्यं बाह्यम् आरोपयन्ति इत्यादि वचोवस्तुशून्यम्, तच्च एतत् उक्तम् 'भ्रान्तित्वे चाव- सायस्य…………' इत्यत्र। अथ ब्रूयात्—परो यत् इन्द्रियज्ञानेन प्रकाशनीयं स्वलक्षणं तत् कथं विकल्पः स्पृशेदिति, भवेदेवं—यदि विकल्पो नाम स्वतन्त्रो भवेत्, यावता प्रमातुरसौ व्यापारः प्रमाता च पूर्वानुभवान्तःस्वसंवेदनरूपः तदस्य च अयमेव पूर्वानुभवसंस्कारो—यत् विकल्पन- व्यापारकालेऽपि पूर्वानुभवात्मत्वम् अनुज्झन्नेव आस्ते, ततः पूर्वानुभवतादात्म्यापन्नप्रमातृत्त्व- व्यापारोऽपि विकल्पस्तद्विषय एव, अत एवमुक्तम् आचार्येण—'पूर्वानुभवसंस्कारः प्रमातुरयमेव सः। यदपोहनकालेऽपि स पूर्वानुभवः स्थितः ॥' इति, तस्मात् प्रमातुः यो व्यापार एकत्वानेकत्व- संयोजनात्मा स एव प्रकृतो यत्र तादृशीः क्रियादिकल्पना एकानेकवस्तुविषया 'एता' इति ग्रहणकवाक्यसूचिता मन एव करोति इति स्थितम्, यद्यपि अविकल्पेऽपि सामान्याद्यवभासो घटमात्रावभासादौ, तथापि न तदा सामान्यादि स्फुटं—समानोपरञ्जकत्वे सम्बन्धिद्वयोद्भूवे क्रमिकक्षणसन्तानात्यागे अवयवकदम्बकस्वीकारे अवध्यवधिमत्परिग्रहादौ सामान्यसम्बन्धक्रिया- द्रव्यादिगादिपदार्थस्य परमार्थतः स्फुरणात्, इति, 'मानसविकल्पग्राह्या एकानेकरूपाः सामान्यादय' इति स्थितम्। एवं च संवृतिः विकल्पबुद्धिः, तद्वशात् उच्यतां संवृतिसत्यत्वं सत्यत्वस्यैव तु प्रकारः तत्, इति द्विचन्द्रादिवत् न असत्यता ॥ ३ ॥ इसलिए अबाह्यरूप आन्तर तत्त्व को बाह्यरूप में देखते हैं इत्यादि कहना ही वस्तु शून्य हो जाता है, इसी कारण यह कह दिया है 'भ्रान्तित्वे चावचायस्य ˙।' इस कारिका में अब भी कोई दूसरा यदि कहे कि जो इन्द्रिय ज्ञान से प्रकाशित होनेवाला निर्विकल्पक ज्ञान है वह कैसे विकल्प को स्पर्श करेगा, ऐसा तब होता जबकि विकल्प का कोई अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रहता—किन्तु ऐसी तो कोई बात दिखती नहीं, जब तक प्रमाता का वह व्यापार और प्रमाता दोनों पूर्व स्वसंवेदन- रूप होते और उसका यह पूर्व के अनुभव संस्कार जो कि विकल्प व्यापार काल में भी पूर्वानुभव- रूप को नहीं छोड़ता हुआ रहता है, इससे यह सिद्ध होता है कि जब तक पूर्वानुभव अपने स्वरूप को प्रकाश करता रहता है तब तक ही पूर्वानुभव के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर, प्रमाता और उसका व्यापार भी विकल्प पूर्व के अनुभव का ही विषय होता है, इसलिए आचार्य ने कहा कि—'पूर्व के अनुभव का संस्कार प्रमाता का ही विषय है। विकल्प दशा में भी पूर्व का अनुभव स्थिर रहता है।' इसलिए प्रमाता का जो व्यापार एकत्व और अनेकत्व का संयोजनरूप है वही प्रकृत प्रसङ्ग में आ रहा है जिसमें ऐसी एक एवं अनेक वस्तु विषयक क्रियादि की कल्पना है, उसे 'एता' इस शब्द से सूचित किया गया है, जब कि वह मन ही करता है यह बात स्थिर हुई, यद्यपि अविकल्प दशा में भी केवल घटादि के अवभास में सामान्यादि का अवभास होता है, तो भी सामान्यादि का उसमें स्फुटाभास नहीं होता; दो सम्बन्धियों से उत्पन्न होनेवाले समानतः उपरञ्जकता में क्रमिक क्षण-सन्तान छोड़ देने पर एवं अवयव समूह के स्वीकार करने पर अवधि और अवधिमान् के ग्रहण करने में सामान्य सम्बन्ध, क्रिया, द्रव्य, दिशा, कालादि पदार्थों का परमार्थतः स्फुरण होने से मानस विकल्प से गृहीत होनेवाले एकरूप और अनेकरूप सामान्यादि होते हैं यही सिद्ध होता है। इस प्रकार संवृति विकल्पबुद्धि, उसी कारण से संवृति है और सत्यत्व का प्रकार भी सत्य होता है, उसमें द्विचन्द्रादि की जैसी असत्यता नहीं रहती, अपितु सत्य रहता हुआ सत्यरूप में भासित भी होता है ॥ ३ ॥
१९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-४ तत्र च अयं संविदवतरणक्रमो—यत् क्रियाशक्तेरेव अयं सर्वो विस्तारः, तत्रापि सम्बन्ध एव मूलभूतः तथाहि—समानानां यत् एकं भाति तत् सामान्यम्, देवदत्तस्य यत् वैतत्यं सा क्रिया, अवयवानां यदैक्यं वैतत्यं च देशतः सोऽवयवी, इमम् अवधिं कृत्वा अयम् इत्थम् ततोऽ य अयं पुरस्तात् इत्यादिर्र्दिक्, अस्यायं क्रियाप्रतानः सहभावेन आस्ते विनाभावेन वा इति वर्तमानादिः कालः, यावत् हि प्रातिपदिकार्थस्य पृष्ठपाति वपुः भाति तदतिरिक्तं सर्वं सम्बन्ध एव इति कारकाणामपि सम्बन्धरूपतैव, केवलं क्वचित् असौ सम्बन्धो व्यपदेशान्तरग्रंन्थि सहते, यथा सास्नादिमतां सम्बन्धो 'गाव' इति एकव्यपदेशसहिष्णुः तत्र सामान्यादिव्यवहारः, व्यपदेशान्तर- ग्रन्थिभङ्गे तु सम्बन्धवाचोयुक्तिरेव, अत एव मुष्टिप्रस्थपलादिप्रमाणपरिमाणोन्मानरूपं तत्र अन्तर्गतं वा अणुमहदादि संख्यापृथक्त्वादि च यत् तत् सर्वं सम्बन्धस्यैव विजृम्भितम्, येऽपि सामान्यादि वस्त्वन्तरम् अमंसत तेऽपि तत्र समवायम् अभ्युपजग्मुः जीवितत्वेन, समवायश्च सम्बन्धात्मा तदनुग्राह्यो वा केषाञ्चित्, यत आहुः 'तां शक्तिं समवायाख्यामनुगृह्णाति सम्बन्धः।' इति, यदपि च कारकं तदपि क्रियामुखप्रेक्षि, सापि कालं प्राणेश्वरम् आश्रयति, सोऽपि क्रिया- द्वारेण सर्वभावान्, सापि सम्बन्धम् उद्धुरयति इति सम्बन्धाधौनैव इयं चित्रा लोकयात्रा, तदाह इस प्रकार [ क्रियादि संवृतिसत्य में द्विचन्द्रादि के समान असत्यता का निराकरण कर देने पर ] कहते हैं कि वहाँ पर संवित् ज्ञान का जो क्रम है, वह सब क्रिया-शक्ति का ही विस्तार है, उसमें भी एक-अनेकरूप सम्बन्ध हो मूलभूत कारण माना जाता है, देखिये — समान पदार्थों में जो एकरूपता दिखती है वही सामान्य कहलाता है, देवदत्त का विस्तार दिखायी पड़ता है वही तो क्रिया है अवयव पदार्थों में जो एकता का विस्तार दिखायी देता है वही देशभाव से अवयवी माना जाता है, इसी को सीमित मान करके यह ऐसा है, इसके पूर्व में यह है, इत्यादि भावों को लेकर दिशाएँ बन जाती हैं। इसी के साथ क्रिया के विस्तार से वर्तमानादि काल का भाव होता है, जब तक प्रातिपदिकार्थ पोषक-शरीर का भाव होता है तब तक ही उसकी स्थिति रहती है, उससे अतिरिक्त सब सम्बन्ध ही रहता है इसीलिए कारकों की भी सम्बन्धरूपता मानी जाती है । वह सम्बन्ध केवल कहीं पर ही दूसरे नाप से अभिहित होता है। जैसे सास्नादि के सम्बन्ध से 'गौ' यह नाप कहा जाता है और उसमें सामान्यादि का भी व्यवहार होता है, दूसरा कोई प्रकार नहीं होता है और यही कहने का व्यवहार जगत् का नियम है, इसलिए एक मुट्ठी, प्रसर, पलादि परिमाणों से और उसके अन्तर्गत अणु, महान्, संख्या-पृथक्त्वादि जो कुछ छोटा या बड़ा है वह सब सम्बन्ध को ही लेकर होता है और सारा का सारा विस्तार सम्बन्ध का ही है, [ अधिक परिमाण, कम-परिमाण, पूरा-परिमाण। लम्बाई चौड़ाई ये सब बाह्य संख्या ही कही जाती हैं ] जो लोग सामान्यादि [ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, सम्बन्ध और विशेष ] पदार्थों को दूसरी वस्तु के रूप में मानते हैं। वे भी उसमें समवाय को ही जीवनरूप से माने हुए हैं और समवाय भी तो एक प्रकार से सम्बन्धरूप ही है अथवा किसी के मन में समवाय के द्वारा ही उत्पन्न होता है; क्योंकि उन लोगों का कथन भी है— सम्बन्ध ही समवाय नामक शक्ति पर अनुग्रह करता है और जो कारक है वह भी तो क्रिया की उन्मुखता रखता है, क्रिया भी अपने प्राणेश्वर काल का आश्रय लेती है, वह काल भी क्रिया के द्वारा समस्त पदार्थ राशि को देखता है, इस प्रकार क्रिया सम्बंध को जगाता है,
अ.-२, आ.-२, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १९१ आचार्य एव—'भेदाभेदात्मसम्बन्धसहसर्वार्थसाधिता। लोकयात्राकृतिर्यस्य स्वेच्छया....' ॥ इति, अतः सम्बन्धमेव प्रथमं निरूपयितुम् आह— स्वात्मनिष्ठा विविक्तभा भावा एकप्रमातरि । अन्योन्यान्वयरूपैक्ययुजः सम्बन्धधीपदम् ॥ ४ ॥ राजा पुरुषश्च बहिस्तटस्थौ स्वात्मैकपरिसमाप्तौ प्रमातृभूमौ यद्वैक्यं गच्छतः, न च ऐक्य- मात्रं—तयोः भेदविगलनापत्तेः, अपि तु परस्पररूपश्लेषात्मकं युगपदेव निमज्जदुन्मज्जद्भेदाभेद- कोटिद्वयदोलारोहणलक्षणम् अन्वयरूपं, तदा तावेव सम्बन्धधिय आलम्बनं भवतो 'राज्ञः पुरुष' इति, तथा हि—राजा यदा पूर्वं धिया गृहीतोऽपि न स्वात्मविश्रान्त्यौ तुष्यति तदा रूपान्तरेण पुंसा श्लेषं भजन् कृतार्थोभवति पुरुषोऽप्येवं, स च एष रूपश्लेष एकएव उभयोः चिदात्मनि तथा इसलिए यह सारा का सारा लोक व्यवहार सम्बन्ध के अधीन ही रहता है, उसके विषय में आचार्यपाद ने कहा है कि—भेद और अभेद के साथ समस्त अर्थों का साधन हो जाता है। अपनी इच्छा से लोक यात्रा का आकार-प्रकार बनता है। इसलिए सर्वप्रथम सम्बन्ध का ही निरूपण करते हुए कहते हैं— एक ही प्रमाता में भिन्न-भिन्न रूपों से भासनेवाले भाव-पदार्थ यदि उसमें भासित होते हैं, तो परस्पर अन्वयरूप से एकत्व को प्राप्त होकर सम्बन्धरूप का वाच्य बन जाते हैं ॥ ४ ॥ राजा और पुरुष ये दोनों परस्पर भिन्न-भिन्न हैं। वे अपने आप में तटस्थरूप से रहते हैं तथा प्रमातृभूमि में संमिलित होकर एकत्व की प्राप्ति कर लेते हैं और वे स्वयं तो एक नहीं हो पाते; क्योंकि तब तो भेद ही विनष्ट हो जायेगा, अपितु प्रमाता की बुद्धि में परस्पर मिल करके एक ही बार डूबते हुए एवं ऊपर की ओर उठते हुए भेद-अभेद कोटिरूपी झूले पर चढ़े हुए के समान हो जाते हैं, तब सम्बन्ध बुद्धि का आलम्बन होता है और यह राजा है तथा यह पुरुष है, देखिये—जब राजा पूर्व बुद्धि से गृहीत होता हुआ भी वह अपने में विश्रान्ति का अनुभव नहीं करता तब दूसरे रूप से पुरुष के साथ संपर्क कर कृतार्थ हो जाता है उसी प्रकार पुरुष भी कृतार्थ १. 'राज्ञः पुरुषः' इस वाक्य का यह आशय है—कि मन से भी चाक्षुष प्रत्यक्ष का परामर्श होता है, इसलिए राजा एवं पुरुष का एक पिण्डीभाव से ऐक्य नहीं बैठता है और न तो बाहर के जैसा तटस्थ रूप से ही भेद होता हुआ दिखाई देता है, अपितु यही वह सम्बन्ध प्रतीति कहलाती है जो यह भेद प्रथा सम्बन्धियों में दिख पड़ती है, वह भी बाह्य एवं आन्तररूप से ठीक ही बैठती है। इसमें कोई विरोध नहीं है और विमर्श बल से अन्वय प्रमाता के साथ नहीं बैठती है, इसलिए 'राज्ञः पुरुषः' ऐसा कहा जाता है। २. वस्तुतः प्रमाताओं की एकता को ही एकता कहा जाता है विशेषण और विशेष्य के कारण ही कभी 'राज्ञः पुरुषः' राजा का पुरुष है और कभी 'पुरुषस्य राजः' यह पुरुष का राजा है—ऐसा होता है नील एवं कमल, धव और खदिर इस से भिन्न इत्यादि, वैचित्र्यभाव से रहनेवाले के भेद को न छोड़ने- वाले विशेषण का ही विशेष में अन्तः प्रवेश से तद्रूप होकर एक भावपूर्वक परिणत होना और तरह- तरह के विरुद्धधर्मी के अध्यास दोष को छोड़ देना, फिर भी प्रमेयरूप से निर्मित होकर भासित होता रहता है।
१९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-५ अवस्थानरूपः पूर्वप्रतिलब्धसंवित्प्रतिष्ठे तत एव अधिकसंविन्मज्जनात् अनाभासमानपृथग्भवन- लक्षणस्वातन्र्त्ये विश्राम्यति, इति तत्रैव निर्भासिते समास्कन्दितपुरुषपरमार्थोऽपि, एवं बहिरनेकता, अन्तस्तु परस्पररूपश्लेषेणैक्यम्, इति सम्बन्धस्य रूपम् ॥ ४ ॥ जातिद्रव्यावभासानां बहिरप्येकरूपताम् । व्यक्त्येकदेशभेदं चाप्यालम्वन्ते विकल्पनाः ॥ ५ ॥ जात्यवभासस्य—अवभासमानरूपायाः जातेः ग्राहिकायाः कल्पनाः, ता न केवलं सम्बन्ध- वत् अन्तर् एकरूपतां बहिश्च अनेकरूपताम् आलम्बन्ते, यावत् बहिरपि व्यक्तिभेदलक्षणम् अनैक्यं बहिरेव च तदनुस्यूततारूपाम् एकताम् आलम्बनत्वं नयन्ति, 'गाव' इति हि प्रतिभासे पृथक् च ता बहिर् व्यक्तयो भान्ति, येन च बहुवचनम्, अनुयायि च आसां भाति वपुः यत एकप्रातिपदि- कार्थपरामर्शानुगमः, उभयं च तद्बहिरेव 'इमा' इति अङ्गुल्या निर्देशात्, केवलं बाह्यत्वमपि स्थिते परमार्थप्रकाशान्तर्भावि, इति न तत्र भेदाभेदौ दूषणं—चित्रसंवेदन इव, अनेन द्रव्येऽपि रक्तरक्तादिविरोधः कृतप्रतिविधानः, आन्तरं तु ऐक्यं सम्बन्धद्वारेण तद्वदेव सर्वत्र, एवम् अवभास- मानस्य घट इति अवयविद्रव्य ग्राहिका याः कल्पनाः ता न केवलं सम्बन्धवत् अन्तर्बहोरूपतया हो जाता है और यही दोनों का एकरूप में श्लेष होना कहा जाता है जो कि चिदात्मा में दोनों की स्थिति हो जाती है पूर्व से प्राप्त प्रतिष्ठित ज्ञान में अच्छी तरह डूब जाने के कारण, भिन्नरूप में न आभासित होने से परम स्वातन्त्र्य में विश्रान्त हो जाता है और उसी में पुरुष के साथ निर्भासित होकर एकरूप में रहता है एवं बाहर में तो अनेकरूपों में भासता है, आन्तर की तो परस्पर सम्बन्धरूपता होने से ऐक्य अवस्था में रहता है, यही सम्बन्ध का स्वरूप है ॥ ४ ॥ जाति और द्रव्य के अवभासों की बाहर में भी एकरूपता रहती है और व्यक्ति के एक देश भेद से तरह-तरह के विकल्प भेद भी रहते हैं ॥ ५ ॥ जाति का अवभास वस्तु है और अवभासमान होते हुए जाति की ग्रहण करने को कल्पना होती है, वे कल्पनाएँ केवल सम्बन्ध के जैसे भीतर एकरूपता से और बाहर में अनेकरूपता से आलम्बन करती हैं, किन्तु बाहर में भी व्यक्ति के भेदरूप होकर ऐक्यरूप में नहीं रहती और बाहर में भी उससे अनुस्यूत होकर एकता का आलम्बन ले आती हैं गावः अर्थात् ये गायें हैं इस प्रकार भिन्नरूप से भासित होने पर बाहर में व्यक्तियों के रूपों में भासती हैं और जिससे बहुवचन का प्रयोग हुआ है और इन्हीं के पीछे इनका एक शरीर भी भासता है जो कि प्रातिपदिकार्थ का परामर्श करनेवाला होता है और ये दोनों बाहर की ही वस्तुएँ हैं जिनको अङ्गुलिनिर्देश कर कहा जाता है कि यह ऐसा ही है, बाह्यत्व भी मात्र परमार्थ प्रकाश के अन्तर्भूत बना रहता है, इस प्रकार उसमें भेद-अभेद का बना रहना चित्र ज्ञान के समान दोष युक्त नहीं होता, इसी प्रकार द्रव्य में भी रक्त-अरक्तादि का विरोध ठीक बैठ जाता है, किन्तु भीतर की एकता तो सम्बन्ध के द्वारा उसी प्रकार सर्वत्र बनी हो रहती है, इस प्रकार अवभासमान घट भी अवयवी द्रव्य है उसमें ग्राहिका बुद्धि की कल्पनाएँ होती हैं, वे केवल सम्बन्ध के समान नहीं होती, आन्तर और बाह्यरूप से एक एवं अनेक विषय वाली हैं; क्योंकि
अ.-२, आ.-२, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९३ एकानेकविषया यावत् बहिरप्येकं निःसन्धिबन्धरूपत्वेन भिन्नं च अवयवलक्षणैकदेशद्वारेण स्वीकुर्वते, घट इति हि निःसन्धिबन्धनैकघनात्मा विततरूपश्च भाति इति ॥ ५ ॥ क्रियाविमर्शविषयः कारकाणां समन्वयः । अवध्यवधिमद्भावान्वयालम्बा दिगादिधीः ॥ ६ ॥ कारकाणां कर्त्रादिशक्त्याधाराणां द्रव्याणां च योऽन्योन्यं समन्वयो दृश्यते, यथा मातृ- मेयमानानां मिथः, सोऽन्तर्लीनप्रमात्मकक्रियाविशेषपरामर्शकनिमित्तकः, नहि प्रमापरामर्शम् अन्तर्वर्तिनं विहाय वस्तुनः साक्षात् अन्वयोऽत्र संवेद्यते, अनन्यत्र भावरूपतानिमित्तता अत्र विषयार्थः, कारकणक्तीनामपि यः स्वाश्रयैः संबन्धः सोऽपि क्रियापरामर्शनिमित्तकः, द्रव्याणां च शक्तीनां च क्रियया साकं साक्षात् संबन्धः, इति इयं क्रियैव भगवती एतावद्विजृम्भितं संबन्धम् आविर्भावयति अस्मादिदं पूर्वं परं दूरे इत्येवं बहिर्भिन्नतया परामृश्यमानयोः भावयोरन्तर् अभेदपूर्वकं भेदावमर्शमध्यम् अभेदविश्रान्तं च यत् रूपम् आमृश्यते तत् दिग् इत्युच्यते, अत्र हि तयोः मुखाद्यवयवविशेषपरामर्शदरः तत्संमुखत्वपराङ्मुखत्वादि निश्चयः संयोगसंयुक्तसंयोगाल्प- तादिपरिग्रहश्च उपयोगी, कालपरामर्शस्य पूर्वपरादिरूपत्वे जन्मस्थित्यल्पतादिविमर्शाश्चिर- क्षिप्रदिरूपत्वे च, पक्ष्यति पचति अपाक्षीत् इत्यादौ तु संभावितस्य स्फुटस्य स्फुटभूतपूर्वस्य बाहर में भी ऐक्यरूप से और भिन्न-भिन्न अवयवों के रूपों में एक देश द्वार से जब स्वीकार करेंगे तब घटरूपी बुद्धि होगी। वही ऐक्यरूप और विस्तृत एकत्व की दृढता से भासती है ॥ ५ ॥ जो क्रिया के विमर्श का विषय है वही कारकों का समन्वय है । अवधि और अवधिमान् के भाव का अवलम्बन करनेवाली दिशादि की बुद्धि होती है ॥ ६ ॥ कारकों का और कर्तादि शक्ति के आधारभूत द्रव्यों का परस्पर समन्वय देखा जाता है, जैसे प्रमाता, प्रमेय, प्रमाणों का परस्पर समन्वय होता है, वह भीतर में रहनेवाले प्रमाणरूप क्रिया- विशेषण का एक परामर्श निमित्तक है, प्रमापरामर्श जो अन्तर्वर्ती है उसे छोड़कर साक्षात् वस्तु का अन्वय इसमें नहीं ज्ञात होता है अर्थात् अन्तर्वर्ती वस्तु का ही साक्षात् अन्वय होता है, यहाँ पर भावरूपता एवं अनिमित्तता ही क्रियाविमर्श विषयार्थ माना जाता है, कारक शक्तियों का भी जो अपने आश्रयों से सम्बन्ध है, वह भी क्रिया परामर्श के निमित्त से होता है और द्रव्यों के तथा शक्तियों का क्रिया के साथ साक्षात् सम्बन्ध होता है, इस प्रकार यह भगवती क्रिया का ही सारा का सारा विस्तार है । वह आविर्भूत करती है कि—इससे यह पूर्व है तथा पश्चिम है एवं दूर-समीपवर्त्ती है । बाहर में भिन्नरूप से परामर्श होनेवाले दो भाव-पदार्थों का भीतर अभेदपूर्वक भेद अवमर्श के बीच में और अभेद विश्रान्तरूप का जो आमर्शन करता है उसे दिशा कहा जाता है; क्योंकि इसमें इन दोनों भाव-पदार्थों के मुखादि अवयवविशेष परामर्श का आदर तथा उसके सन्मुखत्व या पराङ्मुखत्वादि का निश्चय और संयोग संयुक्त के संयोग की अल्पता का परिग्रहज्ञान उपयोगी होता है । कालपरामर्श का भी पूर्वोत्तरादिरूप से उत्पत्ति और स्थिति की अल्पता का विचार चिरकाल और शीघ्रकाल के रूप में होता है, पकायेगा, पकाता है और पका दिया इत्यादि में तो संभावित स्पष्टता का और उस स्पष्टता से पहले होनेवाले अपना २५
१९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-७ आत्मीयसंवेदनस्पन्दितप्राणादित्वादिक्रियान्तरस्य फलविशेषस्य च ओदनादेः परामर्श उपयुज्यते, एवं संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागप्रभृतिषु संबन्धरूपतैव वाच्या, सर्वथा अयं संक्षेपः, यत्र पदार्थाभासस्य आत्मविश्रान्त्या सन्तोषमपुष्यतः आभासान्तरपरामर्शविश्रान्तिसाकाङ्क्षतया स्वरूपनिष्ठा तत्र संबन्धरूपतैव क्रियाशक्तिविजृम्भामयी, तत्रापि भावान्तरापेक्षया संबन्धान्तरमपि अस्तु, यथा संख्यादौ समवायं मन्यन्ते, न च अनवस्था भवन्ती अपि दोषाय, पूर्वापरकल्पसृष्ट्य- नवस्थेव, नहि उत्तरसंबन्धसृष्ट्या विना पूर्वसंबन्धावभासे हानिः काचित् येन मूले क्षतिः शंक्येत ॥ ६ ॥ एवं सकललोकयात्रानुप्राणितकल्पानल्पसंबन्धबन्धुरीभावभावं क्रियाशक्तिविजृम्भात्मकम् अभिधाय, तस्य स्थैर्योपयोगो पूर्वसूचितो निरूपयितुमाह— एवमेवार्थसिद्धिः स्यान्मातुरर्थक्रियार्थिनः । भेदाभेदवतार्थेन तेन न भ्रान्तिरीदृशी ॥ ७ ॥ इह भावानां न सत्तासंबन्धः, सत्त्वम्—अव्यापकत्वात् अनवस्थावैयर्थ्यादिदोषात्, आत्मीय संवेदन ज्ञान, स्पन्दन, प्राण इत्यादि से भिन्न-भिन्न क्रियाओं के फलविशेष ओदनादि हैं, उन सब का परामर्श उपयुक्त ही होता है । इस प्रकार संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभागादि गुणों में सम्बन्ध रूपता ही कहनी चाहिए, यही संक्षेप में इसका सार है। यहाँ पर पदार्थ आभास की अपने स्वरूप में विश्रान्ति हो जाने से भली भाँति सन्तोष का अनुभव न मिलने के कारण दूसरे आभास के परामर्श को जो विश्रान्ति है उसकी आकांक्षा से अपने स्वरूप में रहता ही उसमें सम्बन्ध रूपता मानी जाती है और वही क्रिया-शक्ति का विलास भी है, उसमें भी दूसरे आभास की अपेक्षा से दूसरा सम्बन्ध भी भले ही प्रतीत हो, जैसे संख्यादि में समवाय सम्बन्ध मानते हैं, इस प्रकार अनवस्था का दोष आ भी जाय तो भी कोई दोष नहीं माना जाता, जैसे पूर्वोत्तरकल्प की सृष्टि में अनवस्था आ जाती है, उत्तर सम्बन्ध की सृष्टि के बिना पूर्व सम्बन्ध के अवभास में कोई हानि नहीं होती, जिससे कि मूल में क्षति की शंका खड़ी हो ॥ ६ ॥ इस समस्त लोक व्यवहार से अनुप्राणित प्रायः अनन्तर सम्बन्ध का मिश्रणरूप क्रिया- शक्ति के विचार को कह कर, उसकी स्थिरता एवं उपयोगिता को भी हम पहले कह चुके हैं । पुनः उसका निरूपण करने के लिए कहते हैं— पदार्थक्रिया के अर्थी प्रमाता की ऐसी अर्थसिद्धि होती है । इसी कारण भेद और अभेदवाले अर्थ के साथ ऐसी भ्रान्ति नहीं खड़ी होती ॥ ७ ॥ यहाँ पर पदार्थ-भावों की सत्ता का सम्बन्ध नहीं बैठता है; क्योंकि अव्यापक होने से तथा अनवस्था और व्यर्थता इत्यादि दोषों से सत्ता भी नहीं होती और उससे कोई कार्यत्व की सिद्धि भी नहीं दिखती; क्योंकि उसमें उसका मिश्रण नहीं देखते [ अव्याप्यवृत्ति का नाम सम्बन्ध है और पदार्थों का सत्ता सम्बन्ध है । वह व्यापक नहीं होता, इसीलिए सत्ता के सम्बन्ध से पूर्व पदार्थ रहते हुए भी न रहने के ही बराबर होते हैं ? यदि वे नहीं होते हैं तो न रहने के कारण शशशृङ्ग के सदृश ही है और उसका न रहना ही अव्यापक-भाव कहलाता है, यदि वे रहते हैं ऐसा मानते हो, तब तो अनवस्थादि दोषों से ग्रस्त हो जायेंगे ]
अ.-२, आ.-२, का.-७] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९५ न अर्थक्रिया—वस्त्वन्तरत्वात्, न तत्कारित्वं—सर्वदा तदावेशादर्शनात्, उक्तं हि—'अर्थ- क्रियापि सहजा नार्थानाम्·····॥' इति, तत्कारित्वस्य च प्रत्यक्षानुपलम्भात्मकान्वयव्यतिरेकगम्यस्य अप्रत्यक्षत्वे सतोऽपि अप्रत्यक्षत्वप्राप्तेः न अर्थक्रियाकरणयोग्यत्वम्—तस्य सत्यासत्यके निश्चयकाले दुरवधानत्वात्, सर्वस्य च अस्य अप्रकाशमानत्वे नरशृङ्गप्रायत्वम्, अर्थक्रियाकारितान्तरपर्येषणे च अनवस्था, इति प्रकाशमानतैव अनुन्मूल्यमानतयोचित-विमर्शपरिस्यन्दा भावस्य सत्त्वम्, सा च भेदाभेदवपुषां सम्बन्धादीनामस्ति, इति—निराशङ्कमेव सत्यत्वमेव तेषाम्, अथापि यदि परोऽनुबन्धीयात्—इह लोकः प्राचुर्येण अर्थक्रियार्थी तत्कारिणि सत्यत्वं व्यवहरति तत् किं सम्बन्धादीनाम् अस्ति इति, तदस्य हृदयम् आश्वास्यते, यदि न कुप्यसि तत् सर्वत्रैव व्यवहारे यत्रापि स्फुटा सम्बन्धादिधीः न उदेति एवमेव तत्रापि, इति सम्बन्धादिरूपतया भेदाभेदवान् योऽर्थः तेनैव अर्थक्रिया, न तु स्वात्ममात्रविश्रान्तेन काचिदपि कदाचिदपि अर्थक्रिया, तथाहि—सुखेन स्मर्यमाणेन अभिलाषः, इत्यादिक्रमेण सर्वो व्यवहारः सुखाभासश्च योऽनुभूतः स एव अभिलष्यते न तु अन्योऽननुभूतः, स एव च यदि प्राप्यते तदभिलषितं प्राप्तम् इति तुष्यते यदि च तत् तदेव र्तार्ह किम् अभिलष्यते—प्राप्तत्वात्, अथ अतदेव, तथापि कथम् अर्थ्यते—अज्ञातत्वात्, तस्मात् एतत् एवं भवति—यदि तदेव च अतदेव च तदपि च अतदपि च इति, एवं सुखसाधनेषु इसलिए कहा भी गया है—'अर्थक्रिया भी पदार्थों के साथ नहीं उत्पन्न होती है' और इसी कारण उसका कार्यत्व प्रत्यक्षरूप से उपलब्ध नहीं होता है किन्तु अन्वय-व्यतिरेक से ज्ञात होनेवाले पदार्थ के प्रत्यक्ष न होने पर रहते हुए भी उसका अभाव हो जाता है और वह अर्थ- क्रिया करने के योग्य नहीं रहता; सत्यता और असत्यता के निश्चयकाल में ध्यान न देने के कारण इन सबों का अप्रकाश हो रहता है। मनुष्य के शृङ्ग के समान और दूसरी अर्थक्रिया के अन्वेषण में अनवस्था हो जाती है, इसलिए प्रकाशमान रहना एवं उन्मूलित न हो जाना तथा समुचित विमर्श होते रहना ही पदार्थ को सत्ता मानो जाती है और वह प्रकाशमानता भेद एवं अभेद शरीरवाले सम्बन्धादिकों की होती है, इस प्रकार उनकी सत्यता निश्चितरूप से हो रहती है अर्थात् बिना शङ्का की ही सत्यता उनमें रहतो है, फिर भी यदि कोई दूसरा आग्रह करे और दोष दिखाये—यहाँ पर अधिकतया लोग पदार्थक्रिया के ही अर्थी होते हैं और उस क्रिया के कर्त्ता में सत्यता का व्यवहार करते हैं तब क्या वह अर्थक्रियाकारित्व सम्बन्धादिकों में रहता है ? इसलिए दूसरों के हृदय में विश्वास होता है, यदि क्रोध नहीं करते हो तो सब जगह व्यवहार में जहाँ पर भी सम्बन्ध बुद्धि स्फुटरूप से रहती है वहाँ पर भेद एवं अभेदमय सम्बन्ध के बिना कोई भी अर्थक्रिया व्यवहारभूमि में नहीं हो सकती, इस प्रकार सम्बन्धादिरूप से भेद और अभेदवाले जो पदार्थ हैं उसी से अर्थक्रिया होती है अपने में ही रहनेवाले पदार्थ की तो कोई भो—कभी भी अर्थक्रिया नहीं होती । देखो—सुखपूर्वक स्मरण करने से अभिलाषा होती है इत्यादि क्रम से समस्त व्यवहार और सुखाभास जो अनुभव में आता है उसी की अभिलाषा की जाती है किसी अन्य की नहीं, चाहे वह अनुभूत भी क्यों न हो ? और वह यदि मिल जाता है तब अभिलषित प्राप्त हुआ ऐसा समझ करके सन्तुष्ट हो जाता है, यदि वह वही है, तब फिर क्या अभिलाषा होगी ? क्योंकि वह तो रहता ही है, यदि वह नहीं है, तो उसकी चाह क्यों करेंगे ? क्योंकि वह तो अज्ञात है, इसलिए यह ऐसा होता है—यदि वही है और वह नहीं है और वही
१९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२ वाच्यम् तदुक्तम् आचार्येण 'इष्टार्थितायामिष्टं वा विमृश्येतेष्टकारि वा । न चाप्यदृष्टमिष्टं द्यौरपोष्टा दृष्टभोगभूः ॥ दृष्टं च सह दृष्टचैव विनष्टमिति कार्थता । द्रष्ट्रैकेन विमृष्टं तत्.........॥' इत्यादि, एवं च आभासात्मनि अस्मिन् असंवैद्यमपि आभासान्तरं सामान्यसम्बन्धरूपतया अनुप्रविष्टम्, अन्यथा न कथंचिद्व्यवहारः इति सकलदेशकालदशापुरुषोपयोगी यदि एषः व्यवहारो न सत्यः तर्हि न अन्यस्य सत्यत्वं विद्मः —इति न अत्र भ्रान्तिः इति भ्रमितव्यम् । इति शिवम् ॥ ७ ॥ आदितः ॥ १०४ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्त- पादकृतविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायां क्रियाधिकारे भेदाभेदविमर्शनं नाम द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥ अथ द्वितीये क्रियाधिकारे मानतत्फलमेयनिरूपणाख्यं तृतीयमाह्निकम् प्रमाणानि प्रमावेशे स्वबलाक्रमणक्रमात् । यस्य वक्रावलोकीनि प्रमेये तं स्तुमः शिवम् ॥ १ ॥ है और नहीं भी है इत्यादि भाव बनते हैं, ऐसा सुख के साधनों में भी करना होगा। इसलिए आचार्य ने इसका प्रतिपादन भी किया है— अभीष्ट पदार्थ को चाह में इष्ट का विचार करें अथवा इष्टकारी जो सुख साधन है उसका विचार करें और इसमें अदृष्टरूप जो स्वर्गादि है उसकी इच्छा नहीं होती है, दृष्ट तो दृष्टमात्र से ओझल हो जाता है इसी कारण उसकी चाह क्यों होगी ? इसलिए एक द्रष्टा से ही वह विमृष्ट हुआ करता है..। इत्यादि कहा है । इस प्रकार आभासरूप इस भाव-समूह में सूक्ष्मता के कारण ठीक-ठीक उसका ज्ञान न होने से दूसरा आभास भी सामान्य सम्बन्धरूप से उसमें प्रविष्ट रहता है, अन्यथा किसी प्रकार भी व्यवहार नहीं हो पायेगा । इस प्रकार सकल देश, काल, दशा पुरुष के उपयोगी यह व्यवहार सत्य नहीं है तो फिर अन्य को सत्यता को हम नहीं जानते हैं—इस प्रकार इसमें कोई भ्रान्ति नहीं उठती है और न भ्रम में पड़ना ही चाहिए ॥ ७ ॥ द्वितीय आह्निक समाप्त जिस शिव के मुखावलोकन करके सभी प्रमाण प्रमा की प्राप्ति के लिए प्रमेय में अपने बल के आक्रमण क्रम से प्रवृत्त होते हैं, उस शिव को हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ १. उस महेश्वर का यह स्वरूप स्वतः ही सिद्ध है। 'आदि सिद्धः कर्ता ज्ञाता चैक एव महेश्वरः । ऐसा जो महेश्वर के विषय में बताया गया है कि एक महेश्वर ही कर्ता और ज्ञाता है । प्रमाणसिद्धं यत्किञ्चित्सत्सत्यमिति कथ्यते । प्रमाणाविषयं यत्तु तत्खपुष्पेण संमतम् ॥ जो कुछ प्रमाण के द्वारा सिद्ध होता है वह सत्य कहलाता है और जो प्रमाणभूत नहीं है अर्थात् प्रमाण का अविषय है वह तो आकाश कुसुम के समान है। इत्यादि युक्ति की संभावना करके अन्य लोग कहते
अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९७ एवं क्रियाशक्तिविस्फारनिरूपणप्रसङ्गेन सम्बन्धपुरःसरं सामान्यादीनां तत्त्वम् उपपादि- तम्, अधुना तु सम्बन्धतत्त्वमेव एकघनतया व्युत्पादनीयम् । तच्च द्विविधमेव परमार्थतो— ज्ञाप्यज्ञापकता कार्यकारणता च, तत्र पूर्वस्यां मानमेयभावादिचिन्तास्पदभूतायां सर्वम् उक्तचरं इस प्रकार क्रियाशक्ति का ही यह सारा का सारा विस्तार-स्फुरित होता है; क्रिया-शक्ति के निरूपणके प्रसंग से सामान्यादिकों के सम्बन्ध उपक्रम का पारमार्थिक तत्त्व दिखा दिया गया, अब तो सम्बन्ध तत्त्व को ही मुख्यरूप से प्रतिपादन करना है । परमार्थतः सम्बन्ध दो प्रकार के हैं । एक तो ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव है दूसरा कार्य-कारणभाव वाला है, [ ज्ञाप्य-ज्ञापक सम्बन्ध तो जड और चेतन इन दोनों में रहता है एवं कार्य-कारणरूप सम्बन्ध मात्र जड में ही रहता है । ] प्रमाण, हैं कि किस प्रमाण से उस महेश्वर का प्रमाणित होना सिद्ध होता है, प्रस्तुत प्रकरण में ईश्वरता की सिद्धि के लिए कोई भी प्रमाण उपयुक्त नहीं दिखायी पड़ता है और न तो प्राप्त ही हो रहा है। इस आशय को लेकर कहते हैं कि— प्रमाणान्यपि वस्तूनां जीवितं यानि तन्वते । तेषामपि परो जीवः स एव परमेश्वरः ॥ उन वस्तुओं का प्रमाण ही जीवन है कि जिसका शास्त्रकार लोग विस्तार करते हैं प्रमाणों से भी बढ कर जीव होता है और वही परमेश्वर है। इस प्रकार आगम की युक्ति से आह्निक के अर्थ का आशय आक्षेप किया जाता है; प्रत्यक्षादि प्रमाणों की प्रमा जीवित होकर उसमें रह कर अपने बल के आक्रमण के अधीन रहती है जिसका मुख परिकर वर्ग अधिकार समर्पणार्थ, जैसे राजा के मुख की ओर देखते रहते हैं उसी प्रकार प्रमेय विषयमें भी प्रत्यक्षादि प्रमाण को देखते हैं, उस शिव की हम स्तुति करते हैं । १. इत्थं च अत्र मुख्यया वृत्त्या प्रस्तुतेश्वरसत्तासिद्धतारूपतया प्रमाणार्थत्वासंभवेऽपि । अर्थवत्त्वं न चेज्जातं मुख्यैर्यस्य प्रयोजनैः । तस्यानुषङ्गिकैश्वाशा कुशकाशावलम्बनम् ॥ इस प्रकार मुख्य वृत्ति से प्रस्तुत प्रकरण में ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि में प्रमाण का अर्थित्व भाव न रहने पर भी मुख्य प्रयोजन से यदि अर्थतत्त्व जिसका न होता हो तो भी उसका आनुषङ्गिकों में आशा रखना कुश के सहारे सागर पार करने के समान है । नैयायिकों द्वारा दी गई उक्ति से प्रमा का यथार्थ लक्षण करना अयुक्त ही सिद्ध होगा, फिर भी यदि कोई कैसा प्रमाण या उसका फल अनुपपत्ति या अनुप्रयोग से महेश्वरता की सिद्धि के विषय में बतलायेगा, उसके विषय में प्रमाण और उसके फल के कथन काल में ही प्रमाणादि की सम्बन्धरूपता घोषित करने के लिए क्रिया-शक्ति ऐसा अवतरण देकर कहते है— अर्थवत्त्वं न चेज्जातं मुख्यैर्यस्य प्रयोजनैः । तस्यापि कथनं युक्तमानुषङ्गिकसिद्धये ॥ मुख्य प्रयोजन से यदि अर्थतत्त्व होता हो, तो भी उसका कथन आनुषङ्गिक की सिद्धि के लिए युक्त ही है । २. ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव सम्बन्ध जड और चेतन में रहता है एवं कार्य-कारणभाव सम्बन्ध मात्र जड में ही रहता है ।
१९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२ वक्ष्यमाणं च आयत्तं—प्रमाणाधीना वस्तुसिद्धिः इति तत्र तत्र प्रसिद्धेः, एवं च प्रकृतसमर्थनीय- वस्तूपयोगितया स्वयं च सम्बन्धस्वरूपतया अवश्यविचार्य्या मानादिस्थितिं निरूपयितुम् 'इद- मेतादृक् ................' इत्यावि, '............ईशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ॥' इत्यन्तं श्लोकसप्तदशकेन आह्निकान्तरमारभ्यते । तत्र श्लोकद्वयेन प्रमाणतत्फलस्वरूपं ततः प्रमेयस्य स्वरूपं निरूपयितुं प्रत्याभासं प्रमाणस्य व्यापारो न तु स्वलक्षणात्मकवस्त्वेकनिष्ठतानियमेन—इति दर्शयितुं प्रत्यव- मर्शबलेन आभासव्यवस्था, इति दशभिः श्लोकैः उच्यते, तत्प्रसंगात् मिथ्याज्ञानस्वरूपं श्लोकेन, प्रमेयस्वरूपसिद्धिश्च प्रकृतमपि ईश्वरवादम् अवलम्ब्य घटते—इति श्लोकेन उपदर्श्यते, स च एष सर्वः प्रमाणतत्फलप्रमेयादिप्रविभागः सति प्रमातरि प्रदर्शितरूपे ततो न तस्य प्रमेयंता येन अत्रापि प्रमाणव्यापारसम्भवः केवलं व्यवहारमात्रसिद्धिफलं प्रमाणम् अत्र, इति श्लोकत्रयेण—इति तात्पर्यार्थः । यदुक्तम् 'क्रियासम्बन्धादिबुद्धयो न भ्रान्तिस्वभावाः' इति, तदेव निर्णेतुं प्रमाण- तत्फलस्वरूपं तावत् प्रसिद्धमनुवदति— प्रमेयभाव आदि का विचार-विमर्श करते समय पूर्व में ही सब कुछ दिखा दिया है एवं आगे भी इस पर विचार प्रकट किया जायेगा । तथा प्रमाण के अधीन ही वस्तु की सिद्धि होती है, यह तो सर्वत्र प्रसिद्ध ही है । प्रकृत विषय में समर्थन करने कारण तथा उस समर्थनीय वस्तु के उपयोगी होने से, प्रत्यक्षादि प्रमाणों की स्थिति अवश्य विचारणीय है। इसका निरूपण करने के लिए कहते हैं-'इदमेतादृक्...।' इत्यादि से लेकर'...'ईशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ।।' यहाँ तक, सत्रह श्लोकों से दूसरा आह्निक प्रारम्भ किया जाता है। दो श्लोकों से प्रमाण और उसके प्रमाणरूप फल का स्वरूप, इसके बाद प्रमेय के स्वरूप का निरूपण करने के लिए प्रत्याभास प्रमाण का व्यापार नहीं होता, किन्तु स्वरूपात्मक वस्तु पदार्थ की विश्रान्ति होने से ही है, प्रत्यवमर्श [विमर्श] के बल से आभास व्यवस्था होती है—ऐसा दश श्लोकों से दिखाया जायेगा—उसके प्रसंग को लेकर मिथ्या-ज्ञान के स्वरूप को एक श्लोक से से बतायेंगे और प्रमेय के स्वरूप की सिद्धि प्रकृत एक ईश्वरवाद का अवलम्बन करके ही घटित होती है, यह एक श्लोक से दिखाया जायेगा और वही यह सब प्रदर्शित प्रमाता के रहने पर ही प्रमाण, प्रमा और प्रमेयादि है, इसलिए प्रमाता की प्रमेयता नहीं होती है जिससे कि भगवान् में भी प्रमाण का व्यापार सम्भव हो सके; भगवान् में तो केवल व्यवहार की सिद्धिके लिए प्रमाण होता है तीन श्लोकों से तात्पर्यार्थ दिखायेंगे । 'क्रियासम्बन्धादिबुद्धयो न भ्रान्तिस्वभावाः' अर्थात् क्रिया सम्बन्ध आदि की बुद्धियाँ भ्रान्ति स्वभाववाली नहीं होती हैं उसे दिखाने के वास्ते प्रमाण और उसका जो प्रमाणरूप फल है उसे कहते हैं [ प्रसिद्ध वस्तु को फिर से संस्काररूप से कहने का नाम अनुवाद कहलाता है । ] १. जाति, व्यक्ति, लिङ्ग, संख्यादि में उपयोगी होने के कारण परम्परा से ईश्वर प्रत्यभिज्ञा में भी इसका उपयोग सिद्ध होता है, आनुषङ्गिक जाति आदि पदार्थ के व्यवस्थापन करने में और ईश्वर के व्यवहार साधन में भी इसका उपयोग होता है—इसलिए इसमें लक्षण के निर्माण की उपेक्षा नहीं की जाती है ।
अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९९ इदमेतादृगित्थं यद्वशाद्व्यवतिष्ठते । वस्तु प्रमाणं तत्सोऽपि स्वाभासोऽभिनवोदयः ॥ १ ॥ सोऽन्तस्तथाविमर्शात्मा देशकालाद्यभेदिनि । एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता ॥ २ ॥ यस्य वशात्—सामर्थ्यात्, वस्तु 'नीलसुखादिकं' व्यवतिष्ठते—नियतां प्रकाशमर्यादां न अतिवर्तते 'इदमिति' स्वरूपेण 'एतादृक्' इति च विशेषणभूतनित्यानित्यत्वादिधर्मान्तरयोगेन, तल्लोके 'प्रमाणम्' इति स्थितम्, तच्च विवेचकेन विचार्यम्—इह वस्तुनः स्वरूपं स्वात्मवशेनैव न तावत् व्यवतिष्ठते—जडत्वात्, मम नीलं प्रकाशते चैत्रस्य वेति च तदा कथमवभासः तस्मात् अन्यवशेन व्यवतिष्ठते, अन्योऽपि चेत् जडः तत् अन्धेन अन्धस्य हस्तादानं, तस्मात् अन्योऽसौ संविदात्मा, सोऽपि यदि शुद्धो निर्विशेषो न तर्हि नीलस्यैव व्यवस्थाहेतुः भवेत्—पीतादावपि तस्य तथात्वात्, तदसौ नीलोपरक्तो नीलोन्मुखो नीलप्रकाशस्वभाव इत्याभासः सन् नीलस्य व्यवस्थापकः, तत्प्रकाशस्वभावतैव हि तद्व्यवस्थापकता, स च नीलस्य प्रकाशो यदि अव्यतिरिक्तस्य, तत् पीतस्यापि स्यात्—प्रकाशात्मकचित्त्वतत्तादात्म्याविशेषात्, तेन व्यतिरिक्तीकृतस्य नीलस्य स प्रकाशः नीलं च इत्थम् ततो व्यतिरेकाभासयोग्यं यदि सोऽपि आभासो महतः प्रकाशात् व्यति- यह ऐसा इत्यादि जिसके कारण व्यवस्थित किया जाता है । वही पदार्थ प्रमाणभूत है और वह भी अपने आप भासित होता है तथा उसका नवीन उदय होता है ॥ १ ॥ वह अन्तर में उसी प्रकार विमर्शरूप से प्रकाशित रहता है, देश-कालादि से अभेद होने पर एकतत्त्व के कथन से विषय में वस्तु का अबाधित ज्ञान होता है ॥ २ ॥ जिसके सामर्थ्य से, 'नील सुखादि' वस्तु व्यवस्थित रहती है। व्यवस्थित रहने का अर्थ यह है कि निश्चित प्रकाश मर्यादा को नहीं छोड़ना, 'इदमिति' इस रूप से और 'एतादृक्' ऐसा विशेषणभूत नित्य-अनित्यादि दूसरे धर्म के योग से, इस प्रकार का लोक में प्रमाण माना जाता है, यही सत्य है और इस विषय में प्रबुद्ध पुरुषो का विचार-विमर्श करना चाहिए। जब तक वे विचार करते हैं तब तक यही सिद्ध होता है कि वस्तु का स्वरूप अपने स्वरूप में प्रकाशित नहीं रहता; क्योंकि वस्तु का स्वरूप जड होता है, मुझे नील का प्रकाश होता है व चैत्र का प्रकाश होता हो तो भी वह दूसरे के द्वारा ही प्रकाशित होता है, जिससे वह प्रकाशित होता है उसे चेतन ही मानना चाहिए, यदि वह दूसरा भी जड है तो एक अन्धा दूसरे अन्धे को हाथ पकड़ कर ले जाता है यही कहना होगा, इसलिए इसे संविद्रूप ही मानो, वह भी शुद्ध नहीं है; क्योंकि शुद्ध निर्विशेष वेदान्तियों का ब्रह्म माना जायेगा, जिससे नील की व्यवस्था का कारण नहीं बनता; क्योंकि पीतादि का भी उसी प्रकार प्रकाश वह करता है, यदि वह शुद्ध रहता तो, नील में ही रह जाता और पीत का नहीं प्रकाश कर सकता, किन्तु करता रहता है। इसलिए वह यहाँ १. नील-पदार्थ बाह्य वस्तु है और सुख आन्तरिक वस्तु है । २. वस्तु के स्वरूप और विशेषण में व्यवस्था करनेवाले का नाम प्रमाण है ।
२०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२ रिच्येत—महाप्रकाशाव्यतिरेके तस्य ततो नीलादेः व्यतिरेकाभावप्रसंगात्, महाप्रकाशाच्च न व्यतिरेकं किंचिदपि सहते, इति नूनं महाप्रकाशेन संकोच आत्मनि निर्भासनीयः, संविदो वस्तूनां च अन्योन्यसंकोचनप्राणो नञर्थरूपोऽसौ शून्य इत्युच्यते, संकोचावभास एव च मायीयप्रमातुः उत्थानम्, अत एकया सृष्टिशक्त्या प्रमातृप्रमाणप्रमेयोल्लासः परमार्थतः, तेन—शून्यधीप्राण- देहाद्युपाध्याश्रयस्वीकारात्मकसंकोचपरिग्रहसंकुचितात् मायाप्रमातुः अनन्तकालान्तर्मुखसंवेदन- रूपात् स प्रमाणाभिमत आभासो यावत् प्रमेयोन्मुखतास्वभावः तावत् प्रमेयस्य देशकालाकाराभास- संभेदवत्त्वात् सोऽपि तथैव क्षणे क्षणे अन्यान्याभासरूपः स्रष्टव्यः, तदुक्तम् ‘अभिनवोदयः’ इति— अभिनवः — क्षणवासपरम्लान्यापि न कलङ्कितः, तेन ‘नवनवोदय’ इत्युक्तं भवति, सोऽपि³ यदि तथाभूतो मायाप्रमातृलग्नो न भवेत् ततो मम नीलाक्भासो यस्य तस्यैव पीताभासो मम इति न स्यात्, अस्ति च इदं स्वसंवेदनं—यत् सर्वत्र अबाध्यमानम्, इत्येवं स्वत्वेन आभासमानो य आभासो—नवनवप्रमेयोन्मुख्यात् नवनवोदयः स प्रमाणं यतः प्रमां विधत्ते, कासौ प्रमा ? फल- प्रकाश है—ऐसा मानना पड़ेगा, उसके स्वरूप में सङ्कोच नहीं करना होगा, यदि वह महा प्रकाश से भिन्न होता तो नीलादि से भी भिन्न हो जाता किन्तु वह कभी भी महा प्रकाश से भिन्न रूप में नहीं आता है, इसीलिए उसे अपने में, अवश्य महा प्रकाश से सङ्कुचित करना पड़ेगा संवित् और वस्तुओं में परस्पर सङ्कुचित होने के कारण न अर्थ स्वरूप शून्य ही कहा जाता है, इसीलिए मायीय प्रमाता से सङ्कोच का अवभास होना ही उत्थान है, अतः एक ही सृष्टि-शक्ति के द्वारा प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय का उल्लास परमार्थतः होता है, इसीलिए शून्यप्रमाता, बुद्धिप्रमाता, प्राणप्रमाता और देहादिप्रमाता की उपाधि के आश्रय को स्वीकार कर, परिग्रह से सङ्कुचित होने से मायाप्रमाता का अनन्तकाल तक अन्तर्मुख संवेदन होने से, जब तक वह प्रमेय उन्मुख स्वभाव देश, काल और आकार से उपरक होने के कारण वह भी क्षण-क्षण में दूसरा-दूसरा आभासरूप हुआ करता है, इसीसे ‘अभिनवोदयः’ नया-नया हुआ करता है ऐसा कहा जाता है; किसी एक क्षण में आबद्ध नहीं रहता, इसी से वह क्षणमात्र भी मलिनता से युक्त नहीं रहता, अत एव ‘नवनवोदय’ ऐसा इसे कहा गया है। यदि वह भी मायीय प्रमाता में संलग्न नहीं होता तो नीलाभास जैसा मुझे हुआ वैसा मुझे ही पीताभास हुआ, यह नहीं कह सकता, किन्तु ऐसा स्वसंवेदन होता है और सर्वत्र अबाध्यरूप से रहता भी है, इसप्रकार अपने रूप से आभासमान माया प्रमाता में नील-पीतादिरूप से नये-नये १. आभास के महाप्रकाश से नीलादि पदार्थ में व्यतिरेक अभाव प्रसंग आ जायेगा। २. क्योंकि ज्ञान ही सब काल में अनुभव-करनेवाला प्रमा हो जाता है, यद्यपि माया-शक्ति से व्याकुल कर देने के कारण उसका प्रमा मात्र प्रतिभास होता है, उसका प्रतिभास सांसारिक जीवों के लिए अभेदपूर्वक सिद्ध नहीं कर सकता तथापि सम्बन्धरूप से सिद्ध ही है; क्योंकि ऐसा मुझे भासित होता है, इस विमर्श से एवं इसमें तो स्वसंवेदन ज्ञान ही प्रमाण माना जाता है। ३. यद्यपि प्रतिभास ज्ञान स्वभाववाला होता है तथापि उसीका माया-शक्ति वशात् मायीय प्रमाता के प्रति- भासमान विषय वस्तु विच्छेदरूप होकर पृथग्रूप में व्यवहृत नहीं होती है, वैसे ही भिन्न-भिन्न वस्तुओं में होनेवाले उन-उन प्रमाताओं से चित्तत्त्व में व्यापकत्व इत्यादि विशेषणों का व्यवहार होता है, वस्तु स्वयं अपने स्वरूप से नहीं भासित होती है—इसलिए इसे प्रमाणरूप नहीं माना जाता है।