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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM नहीं बनता। परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करे ॥ १५॥ पंच परवाण पंच परधान ॥ पंचे पावहे दरगहे मान ॥ पंचे सोहहे दर राजान ॥ पंचा का गुर एक ध्यान ॥ जे को कहै करै वीचार ॥ करते कै करणै नाही सुमार ॥ धौल धरम दया का पूत ॥ संतोख थाप रखिआ जिन सूत ॥ जे को बुझै होवै सचिआर ॥ धवलै उपर केता भार ॥ धरती होर परै होर होर ॥ तिस ते भार तलै कवण जोर ॥ जीअ जात रंगा के नाव ॥ सभना लिखिआ वुड़ी कलाम ॥ एहो लेखा लिख जाणै कोए ॥ लेखा लिखिआ केता होए ॥ केता ताण सुआलिहो रूप ॥ 18 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM केती दात जाणै कौण कूत ॥ कीता पसाओ एको कवाओ ॥ तिस ते होए लख दरीआओ ॥ कुदरत कवण कहा वीचार ॥ वारिआ न जावा एक वार ॥ जो तुध भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामत निरंकार ॥१६॥ जिन्होंने प्रभु-नाम का चिन्तन किया है वे श्रेष्ठ संतजन निरंकार के द्वार पर स्वीकृत होते हैं, वे ही वहाँ पर प्रमुख होते हैं। ऐसे गुरुमुख प्यारे अकाल पुरुष की सभा में सम्मान पाते हैं। ऐसे सद्-पुरुष राज दरबार में शोभावान होते हैं। सद्गुणी मानव का ध्यान उस एक सतगुरु (निरंकार) में ही दृढ़ रहता है। यदि कोई व्यक्ति उस सृजनहार के बारे में कहना चाहे अथवा उसकी रचना का लेखा करे तो उस रचयिता की कुदरत का आकलन नहीं किया जा सकता। निरंकार द्वारा रची गई सृष्टि धर्म रूपी वृषभ (धौला बैल) ने अपने ऊपर टिका कर रखी हुई है जो कि दया का पुत्र है (क्योंकि मन में दया-भाव होगा तभी धर्म-कार्य इस मानव जीव से सम्भव होगा।) जिसे संतोष रूपी सूत्र के साथ बांधा हुआ है। यदि कोई परमात्मा के इस रहस्य को जान ले तो वह सत्यनिष्ठ हो 19 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM सकता है। यदि कोई ईश्वर के इस कौतुक को नहीं मानता तो उसके मन में यही शंका उत्पन्न होगी कि उस शरीर धारी बैल पर इस धरती का कितना बोझ है, वह कितना बोझ उठाने की समर्था रखता है। क्योंकि इस धरती पर सृजनहार ने जो रचना की है वह परे से परे है, अनन्त है। फिर उस बैल का बोझ किस शक्ति पर आश्रित है। सृजनहार की इस रचना में अनेक जातियों, रंगों तथा अलग-अलग नाम से जाने जाने वाले लोग मौजूद हैं। जिनके मस्तिष्क पर परमात्मा की आज्ञा में चलने वाली कलम से कर्मों का लेखा लिखा गया है। किन्तु यदि कोई जन-साधारण इस कर्म- लेख को लिखने की बात कहे तो वह यह भी नहीं जान पाएगा कि यह लिखा जाने वाला लेखा कितना होगा। लिखने वाले उस परमात्मा में कितनी शक्ति होगी, उसका रूप कितना सुन्दर है। उसकी कितनी दात है, ऐसा कौन है जो उसका सम्पूर्ण अनुमान लगा सकता है। अकाल पुरुष के मात्र एक शब्द से समस्त सृष्टि का प्रसार हुआ है। उस एक शब्द रूपी आदेश से ही सृष्टि में एक से अनेक जीव-जन्तु, तथा अन्य पदार्थों के प्रवाह चल पड़े हैं। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्था का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है 20 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं ॥ १६॥ असंख जप असंख भाओ ॥ असंख पूजा असंख तप ताओ ॥ असंख ग्रंथ मुख वेद पाठ ॥ असंख जोग मन रहहे उदास ॥ असंख भगत गुण ज्ञान वीचार ॥ असंख सती असंख दातार ॥ असंख सूर मुह भख सार ॥ असंख मोन लिव लाए तार ॥ कुदरत कवण कहा वीचार ॥ वारिआ न जावा एक वार ॥ जो तुध भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामत निरंकार ॥१७॥ इस सृष्टि में असंख्य लोग उस सृजनहार का जाप करते हैं, असंख्य ही उसको प्रीत करने वाले हैं। असंख्य उसकी अर्चना करते हैं, असंख्य तपी तपस्या कर रहे है। असंख्य लोग धार्मिक ग्रंथों व वेदों आदि का मुंह द्वारा पाठ कर रहे हैं। असंख्य ही योग- 21 | P a g e sikhizm.com

३. पौड़ी ११-२०: पञ्च परवाण, कुदरत व करम महिमा

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM साधना में लीन रह कर मन को आसक्तियों से मुक्त रखते हैं। असंख्य ऐसे भक्तजन हैं जो उस गुणी निरंकार के गुणों को विचार कर ज्ञान की उपलब्धि करते हैं। असंख्य सत्य को जानने वाले अथवा परमार्थ-पथ पर चलने वाले तथा दानी सज्जन हैं। असंख्य शूरवीर रणभूमि में शत्रु का सामना करते हुए शस्त्रों की मार सहते हैं। असंख्य मानव जीव मौन धारण करके एकाग्रचित होकर उस अकाल-पुरुष में लिवलीन रहते हैं। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्था का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं॥१७ ॥ असंख मूरख अंध घोर ॥ असंख चोर हरामखोर ॥ असंख अमर कर जाहे जोर ॥ असंख गलवढ हत्या कमाहे ॥ असंख पापी पाप कर जाहे ॥ असंख कूड़िआर कूड़े फिराहे ॥ असंख मलेछ मल भख खाहे ॥ असंख निंदक सिर करह भार ॥ 22 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM नानक नीच कहै वीचार ॥ वारिआ न जावा एक वार ॥ जो तुध भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामत निरंकार ॥१८॥ इस सृष्टि में असंख्य मनुष्य विमूढ़ तथा गहन अज्ञानी हैं। असंख्य चोर तथा अभक्ष्य खाने वाले हैं, जो दूसरों का माल चुरा कर खाते हैं। असंख्य ही ऐसे हैं जो अन्य लोगों पर जब्र-जुल्म से अत्याचार का शासन करके इस संसार को त्याग जाते हैं। असंख्य अधर्मी मनुष्य जो दूसरों का गला काट कर हत्या का पाप कमा रहे हैं। असंख्य ही पापी इस संसार से पाप करते हुए चले जाते हैं। असंख्य ही झूठा स्वभाव रखने वाले मिथ्या वचन बोलते फिरते हैं। असंख्य मानव ऐसे हैं जो मलिन बुद्धि होने के कारण विष्टा का भोजन खाते हैं। असंख्य लोग दूसरों की निन्दा करके अपने सिर पर पाप का बोझ रखते हैं। श्री गुरु नानक देव जी स्वयं को निम्न कहते हुए फरमाते हैं कि हमने तो कुकर्मी जीवों अर्थात् तामसी व आसुरी सम्पदा वाली सृष्टि का कथन किया है। हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं॥ १८॥ 23 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM असंख नाव असंख थाव ॥ अगम अगम असंख लोअ ॥ असंख कहह सिर भार होए ॥ अखरी नाम अखरी सालाह ॥ अखरी ज्ञान गीत गुण गाह ॥ अखरी लिखण बोलण बाण ॥ अखरा सिर संजोग वखाण ॥ जिन एहे लिखे तिस सिर नाहे ॥ जिव फुरमाए तेव तेव पाहे ॥ जेता कीता तेता नाओ ॥ विण नावै नाही को थाओ ॥ कुदरत कवण कहा वीचार ॥ वारिआ न जावा एक वार ॥ जो तुध भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामत निरंकार ॥१९॥ उस सृजनहार की सृष्टि में असंख्य ही नाम तथा असंख्य ही स्थान वाले जीव विचरन कर रहे हैं; अथवा इस सृष्टि में अकाल-पुरुष के अनेकानेक नाम हैं तथा अनेकानेक ही स्थान हैं, जहाँ पर परमात्मा का वास रहता है। असंख्य ही अकल्पनीय लोक हैं। 24 | Page sikhizm.com

किन्तु जो मनुष्य उसकी रचना का गणित करते हुए 'असंख्य' शब्द का प्रयोग करते हैं उनके सिर पर भी भार पड़ता है। शब्दों द्वारा ही उस निरंकार के नाम को जपा जा सकता है, शब्दों से ही उसका गुणगान किया जा सकता है। परमात्मा के गुणों का ज्ञान भी शब्दों द्वारा हो सकता है तथा उसकी प्रशंसा भी शब्दों द्वारा ही कही जा सकती है। शब्दों द्वारा ही उसकी वाणी को लिखा व बोला जा सकता है। शब्दों द्वारा मस्तिष्क पर लिखे गए कर्मों को बताया जा सकता है। किन्तु जिस निरंकार ने यह कर्म लेख लिखे हैं उसके मस्तिष्क पर कोई कर्म-लेख नहीं है; अर्थात्-उसके कर्मों को न तो कोई कह सकता है और न उनका हिसाब रख सकता है। अकाल-पुरुष जिस प्रकार मनुष्य के कर्मों के अनुसार आदेश करता है, वैसे ही वह अपने कर्मों को भोगता है। सृजनहार ने इस सृष्टि का जितना प्रसार किया है, वह समस्त नाम-रूप ही है। कोई भी स्थान उसके नाम से रिक्त नहीं है। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्था का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं।। १९ ।।

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM भरीऐ हथ पैर तन देह ॥ पाणी धोतै उतरस खेह ॥ मूत पलीती कपड़ होए ॥ दे साबूण लईऐ ओहो धोए ॥ भरीऐ मत पापा कै संग ॥ ओहो धोपै नावै कै रंग ॥ पुंनी पापी आखण नाहे ॥ कर कर करणा लिख लै जाहो ॥ आपे बीज आपे ही खाहो ॥ नानक हुकमी आवहो जाहो ॥२०॥ यदि यह शरीर, हाथ-पैर अथवा कोई अन्य अंग मलिन हो जाए तो पानी से धो लेने से उसकी गन्दगी व मिट्टी साफ हो जाती है। यदि कोई वस्त्र पेशाब आदि से अपवित्र हो जाए तो उसे साबुन के साथ धो लिया जाता है। यदि मनुष्य की बुद्धि दुष्कर्मों के करने से मलिन हो जाए तो वह वाहिगुरु के नाम का सिमरन करने से ही पवित्र हो सकती है। पुण्य और पाप मात्र कहने को ही नहीं हैं। अपितु इस संसार में रहकर जैसे-जैसे कर्म किए जाएँगे वही धर्मराज द्वारा भेजे गए चित्र-गुप्त लिख कर ले जाएँगे ; अर्थात् मानव जीव द्वारा इस धरती पर किए जाने वाले प्रत्येक अच्छे व 26 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM बुरे कर्मो का हिसाब उसके साथ ही जाएगा, जिसके फलानुसार उसे स्वर्ग अथवा नरक की प्राप्ति होगी। सो मनुष्य स्वयं ही कर्म बीज बीजता है और स्वयं ही उसका फल प्राप्त करता है। गुरु नानक का कथन है की जीव इस संसार में अपने कर्मो का फल भोगने हेतु अकाल-पुरुष के आदेश से आता जाता रहेगा ; अर्थात् जीव के कर्म उसे आवागमन के चक्र में ही रखेंगे, निरंकार जीव के कर्मों के अनुसार ही उसके फल की आज्ञा करेगा ॥ २०॥ तीरथ तप दया दत दान ॥ जे को पावै तेल का मान ॥ सुणेआ मंनिआ मन कीता भाओ ॥ अंतरगत तीरथ मल नाओ ॥ सभ गुण तेरे मै नाही कोए ॥ विण गुण कीते भगत न होए ॥ सुअसत आथ बाणी बरमाओ ॥ सत सुहाण सदा मन चाओ ॥ कवण सु वेला वखत कवण कवण थित कवण वार ॥ कवण सि रुती माहो कवण जित होआ आकार ॥ वेल न पाईआ पंडती जे होवै लेख पुराण ॥ वखत न पाइओ कादीआ जे लिखन लेख कुराण ॥ 27 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM थित वार ना जोगी जाणै रुत माहो ना कोई ॥ जा करता सिरठी कओ साजे आपे जाणै सोई ॥ किव कर आखा किव सालाही किओ वरनी किव जाणा ॥ नानक आखण सभ को आखै इक दू इक सिआणा ॥ वडा साहिब वडी नाई कीता जा का होवै ॥ नानक जे को आपौ जाणै अगै गया न सोहै ॥२१॥ तीर्थ-यात्रा, तप-साधना, जीवों पर दया-भाव करके तथा निःस्वार्थ दान देने से ; यदि कोई मनुष्य सम्मान प्राप्त करता है तो वह अति लघु होता है। किन्तु जिन्होंने परमेश्वर के नाम को मन में प्रीत करके सुना व उसका निरन्तर चिन्तन किया है। उन्होंने अपने अंतर के तीर्थ का मानो स्नान कर लिया और अपनी मलिनता को दूर कर लिया। (अर्थात् उस जीव ने अपने हृदय में बसे हुए निरंकार में लीन होकर अपनी अन्तरात्मा की मैल को साफ कर लिया है।) हे सर्गुण स्वरूप ! समस्त गुण आप में हैं, मुझ में शुभ-गुण कोई भी नहीं है। सदाचार के गुणों को धारण किए बिना परमेश्वर की भक्ति भी नहीं हो सकती। हे निरंकार ! तुम्हारी सदा जय हो, तुम कल्याण स्वरूप हो, ब्रह्म रूप हो। तुम सत्य हो, चेतन्य हो और सदैव आनन्द स्वरूप हो। परमात्मा ने यह सृष्टि जब पैदा की थी तब कौन-सा समय, कौन-सा वक्त, कौन-सी तारीख, तथा कौन- 28 | Page sikhizm.com

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सा दिन था। तब कौन-सी ऋतु, कौन-सा महीना था, जब यह प्रसार हुआ था, यह सब कौन जानता है। सृष्टि के प्रसार का निश्चित समय महा विद्वान, ऋषि-मुनि आदि भी नहीं जान पाए, यदि वे जान पाते तो निश्चय ही उन्होंने वेदों अथवा धर्म-ग्रन्थों में इसका उल्लेख किया होता। इस समय का ज्ञान तो काजियों को भी नहीं हो पाया, यदि उन्हें पता होता तो वे कुरान आदि में इसका उल्लेख अवश्य करते। इस सृष्टि की रचना का दिन, वार, ऋतु व महीना आदि कोई योगी भी नहीं जान पाया है। इसके बारे में तो जो इस जगत् का रचयिता है वह स्वयं ही जान सकता है कि इस सृष्टि का प्रसार कब किया गया। मैं किस प्रकार उस अकाल पुरुष के कौतुक को कहूँ, कैसे उसकी प्रशंसा करूँ, किस प्रकार वर्णन करूँ और कैसे उसके भेद को जान सकता हूँ ? सतगुरु जी कहते हैं कि कहने को तो हर कोई एक दूसरे से अधिक बुद्धिमान बनकर उस परमात्मा की श्लाघा को कहता है। किंतु परमेश्वर महान् है, उसका नाम उससे भी महान् है, सृष्टि में जो भी हो रहा है वह सब उसके किए से ही हो रहा है। हे नानक ! यदि कोई उसके गुणों को जानने की बात कहता है तो वह परलोक में जाकर शोभा प्राप्त नहीं करता। अर्थात यदि कोई जीव उस अभेद निरंकार के गुणात्मक रहस्य को जानने का अभिमान करता है तो उसे इस लोक में तो क्या परलोक में भी सम्मान नहीं मिलता ॥ २१ ॥

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JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM पाताला पाताल लख आगासा आगास ॥ ओड़क ओड़क भाल थके वेद कहन इक वात ॥ सहस अठारह कहन कतेबा असुलू इक धात ॥ लेखा होए त लिखीऐ लेखै होए विणास ॥ नानक वडा आखीऐ आपे जाणै आप ॥२२॥ सतगुरु जी जन-साधारण के मन में सात आकाश व सात पाताल होने के संशय की निवृति करते हुए कहते हैं कि सृष्टि की रचना में पाताल-दर-पाताल लाखों ही हैं तथा आकाश-दर-आकाश भी लाखों ही हैं। वेद-ग्रंथों में भी यही एक बात कही गई है कि ढूंढने वाले इसको अंतरिम छोर तक ढूंढ कर थक गए हैं किंतु इनका अंत किसी ने नहीं पाया है। सभी धर्म ग्रन्थों में अठारह हजार जगत् होने की बात कही गई है परंतु वास्तव में इनका मूल एक ही परमेश्वर है जो कि इनका स्रष्टा है। यदि उसकी सृष्टि का लेखा हो सके तो कोई लिखे, किंतु यह लेखा करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है। हे नानक ! जिस सृजनहार को इस सम्पूर्ण जगत् में महान कहा जा रहा है वह स्वयं को स्वयं ही जानता है अथवा जान सकता है॥ २२ ॥ 30 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM सालाही सालाहे एती सुरत न पाईआ ॥ नदीआ अतै वाह पवह समुंद न जाणीअहे ॥ समुंद साह सुलतान गिरहा सेती माल धन ॥ कीड़ी तुल न होवनी जे तिस मनहो न वीसरहे ॥२३॥ स्तुति करने वाले साधकों ने भी उस परमात्मा की स्तुति करके उसकी सीमा को नहीं पाया। जैसे नदियां-नाले समुद्र में मिलकर उसका अथाह अंत नहीं पा सकते, बल्कि अपना अस्तित्व भी खो लेते हैं, वैसे ही स्तुति करने वाले स्तुति करते-करते उसमें ही लीन हो जाते हैं। समुद्रों की शाह, शहंशाह होकर, पर्वत समान धन-सम्पत्ति के मालिक होकर भी, उस चींटी के समान नहीं हो सकते, यदि उनके मन से परमेश्वर विस्मृत नहीं हुआ होता ॥ २३॥ अंत न सिफती कहण न अंत ॥ अंत न करणै देण न अंत ॥ अंत न वेखण सुणण न अंत ॥ अंत न जापै किआ मन मंत ॥ अंत न जापै कीता आकार ॥ अंत न जापै पारावार ॥ अंत कारण केते बिललाहे ॥ 31 | P a g e sikhizm.com

ता के अंत न पाए जाहे ॥ एहो अंत न जाणै कोए ॥ बहुता कहीऐ बहुता होए ॥ वडा साहिब ऊचा थाओ ॥ ऊचे उपर ऊचा नाओ ॥ एवड ऊचा होवै कोए ॥ तिस ऊचे कओ जाणै सोए ॥ जेवड आप जाणै आप आप ॥ नानक नदरी करमी दात ॥२४॥ उस निरंकार की स्तुति करने की कोई सीमा नहीं तथा कहने से भी उसकी प्रशंसा का अन्त नहीं हो सकता । सृजनहार द्वारा रची गई सृष्टि का भी कोई अन्त नहीं परंतु जब वह देता है तब भी उसका कोई अन्त नहीं है । उसके देखने व सुनने का भी अन्त नहीं है, अर्थात्-वह निरंकार सर्वद्रष्टा व सर्वश्रोता है । ईश्वर के हृदय का रहस्य क्या है, उसका बोध भी नहीं हो सकता । इस सृष्टि का प्रसार जो उसने किया उसकी अवधि अथवा सीमा को भी नहीं जाना जा सकता । उसके आदि व अन्त को भी नहीं जाना जा सकता । अनेकानेक जीव उसका अन्त पाने के लिए बिलखते फिर रहे हैं । किन्तु उस अथाह, अनन्त अकाल पुरुष का अंत नहीं

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM पाया जा सकता। उसके गुणों का अन्त कहाँ होता है यह कोई नहीं जान सकता। उस पारब्रह्म की प्रशंसा, स्तुति, आकार अथवा गुणों को जितना कहा जाता है वह उतने ही अधिक होते जाते हैं। निरंकार सर्वश्रेष्ठ है, उसका स्थान सर्वोच्च है। किन्तु उस सर्वश्रेष्ठ निरंकार का नाम महानतम है। यदि कोई शक्ति उससे बड़ी अथवा ऊँची है, तो वह ही उस सर्वोच्च मालिक को जान सकती है। निरंकार अपना सर्वस्व स्वयं ही जानता है अथवा जान सकता है, अन्य कोई नहीं। सतिगुरु नानक देव जी का कथन है कि वह कृपासागर जीवों पर करुणा करके उनके कर्मों के अनुसार उन्हें समस्त पदार्थ प्रदान करता है॥ २४॥ बहुता करम लिखिआ ना जाए ॥ वडा दाता तेल न तमाए ॥ केते मंगहे जोध अपार ॥ केतेआ गणत नही वीचार ॥ केते खप तुटहे वेकार ॥ केते लै लै मुकर पाहे ॥ केते मूरख खाही खाहे ॥ केतेआ दूख भूख सद मार ॥ एहे भि दात तेरी दातार ॥ 33 | Page sikhizm.com

४. पौड़ी २१-३०: तीरथ, तप व आदि अनहद नाद

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM बंद खलासी भाणै होए ॥ होर आख न सकै कोए ॥ जे को खाएक आखण पाए ॥ ओहो जाणै जेतीआ मुहे खाए ॥ आपे जाणै आपे देए ॥ आखह सि भि केई केए ॥ जिस नो बखसे सिफत सालाह ॥ नानक पातसाही पातसाहो ॥२५॥ उसके उपकार इतने अधिक हैं कि उनको लिखने की समर्था किसी में भी नहीं। वह अनेक बख्शिशें करने वाला होने के कारण बड़ा है किंतु उसे लोभ तिनका मात्र भी नहीं है। कई अनगिनत शूरवीर उसकी कृपा-दृष्टि की चाहना रखते हैं। उनकी संख्या की तो बात ही नहीं हो सकती। कई मानव निरंकार द्वारा प्रदत पदार्थों को विकारों हेतु भोगने के लिए जूझ-जूझ कर मर जाते हैं। कई अकाल पुरुष द्वारा दिए जाने वाले पदार्थों को लेकर मुकर जाते हैं । कई मूढ़ व्यक्ति परमात्मा से पदार्थ ले लेकर खाते रहते हैं, कभी उसे स्मरण नहीं करते। कईयों को दुख व भूख की मार सदैव पड़ती रहती है, क्योंकि यह उनके कर्मों में ही लिखा होता है। किन्तु ऐसे सज्जन ऐसी मार को उस परमात्मा की बख्शिश ही 34 | P a g e sikhizm.com

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मानते हैं। इन्हीं कष्टों के कारण ही मानव जीव को वाहिगुरु का स्मरण होता है। मनुष्य को माया-मोह के बंधन से छुटकारा भी ईश्वर की आज्ञा में रहने से ही मिलता है। इसके लिए कोई अन्य विधि हो, कोई भी नहीं कह सकता; अर्थात्-ईश्वर की आज्ञा में रहने के अतिरिक्त माया के मोह-बंधन से छुटकारा पाने की कोई अन्य विधि कोई नहीं बता सकता। यदि अज्ञानता वश कोई व्यक्ति इसके बारे में कथन करने की चेष्टा करे तो फिर उसे ही मालूम पड़ेगा कि उसे अपने मुँह पर यमों आदि की कितनी चोटें खानी पड़ी हैं। परमात्मा संसार के समस्त प्राणियों की जरूरतों को जानता है और उन्हें स्वयं ही प्रदान भी करता है। संसार में सभी जीव कृतघ्न ही नहीं हैं, कई व्यक्ति ऐसे भी हैं जो इस बात को मानते हैं परमात्मा प्रसन्न होकर जिस व्यक्ति को अपनी स्तुति को गाने की शक्ति प्रदान करता है। हे नानक ! वह बादशाहों का भी बादशाह हो जाता है ; अर्थात्- उसे ऊँचा व उत्तम पद प्राप्त हो जाता है॥ २५ ॥ अमुल गुण अमुल वापार ॥ अमुल वापारीए अमुल भंडार ॥ अमुल आवह अमुल लै जाहे ॥ अमुल भाए अमुला समाहे ॥

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अमुल धरम अमुल दीबाण ॥ अमुल तुल अमुल परवाण ॥ अमुल बखसीस अमुल नीसाण ॥ अमुल करम अमुल फुरमाण ॥ अमुलो अमुल आखिआ न जाए ॥ आख आख रहे लिव लाए ॥ आखहे वेद पाठ पुराण ॥ आखहे पड़े करह वखिआण ॥ आखहे बरमे आखहे इंद ॥ आखहे गोपी तै गोविंद ॥ आखहे ईसर आखहे सिध ॥ आखहे केते कीते बुध ॥ आखहे दानव आखहे देव ॥ आखहे सुर नर मुन जन सेव ॥ केते आखहे आखण पाहे ॥ केते कह कह उठ उठ जाहे ॥ एते कीते होर करेहे ॥ ता आख न सकह केई केए ॥ जेवड भावै तेवड होए ॥ नानक जाणै साचा सोए ॥

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM जे को आखै बोलुविगाड़ ॥ ता लिखीऐ सिर गावारा गावार ॥२६॥ निरंकार के जिन गुणों को कथन नहीं किया जा सकता वे अमूल्य हैं, और इस निरंकार का सुमिरन अमूल्य व्यापार है । यह सुमिरन रूपी व्यापार का मार्गदर्शन करने वाले संत भी अमूल्य व्यापारी हैं और उन संतों के पास जो सद्गुणों का भण्डार है वह भी अमूल्य है । जो व्यक्ति इन संतों के पास प्रभु-मिलाप हेतु आते हैं वे भी अमूल्य हैं और इनसे जो गुण ले जाते हैं वे भी अमूल्य हैं । परस्पर गुरु-सिख का प्रेम अमूल्य है, गुरु के प्रेम से आत्मा को प्राप्त होने वाला आनंद भी अमूल्य है । अकाल-पुरुष का न्याय भी अमूल्य है, उसका न्यायालय भी अमूल्य है । अकाल पुरुष की न्याय करने वाली तुला अमूल्य है, और जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों को तोलने हेतु परिमाण (तौल) भी अमूल्य है । अकाल पुरुष द्वारा प्रदान किए जाने वाले पदार्थ भी अमूल्य हैं और उन पदार्थों का चिन्ह भी अमूल्य है । निरंकार की जीव पर होने वाली कृपा भी अमूल्य है तथा उसका आदेश भी अमूल्य है । वह परमात्मा अति अमूल्य है उसका कथन घनिष्ठता से कर पाना असम्भव है । परंतु फिर भी अनेक भक्त जन उसके गुणों का व्याख्यान करके अर्थात् उसकी स्तुति कर-करके भूत, भविष्य व वर्तमान काल में उसमें लिवलीन 37 | Page sikhizm.com