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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १९८२ )

बोधसागर

७४

गुरुजनकी कछु कानि न माने । वेद शास्त्रकी निन्दा ठाने ॥
गुरु सतगुरुको आदर नाही । ईश्वर देव कौन कह आहीं ॥
वामपंथ इच्छा आचरई । बाद अन्यथा सबसे करई ॥
जो कोइ ताको ज्ञान सुनावै । ताते उठिके झगरन धावै ॥
रस शृङ्गार गीत भल गावै । विषय सराह स्वाद मन लावै ॥
निंदै ज्ञान भक्ति सतसंगा । सदाकाल विषयन रतिरंगा ॥
मृगनैनी तजि भे बैरागी । इन समान नहिं कोउ दुर्भागि ॥
साधु संग करि नर बौराना । ताते विषय स्वाद नहिं जाना ॥
कर्महीन दारिद्री येहा । हम ज्ञानी सब गुनको गेहा ॥
जो कछु है सो है यह देही । इन्द्री भोग देह भल हेही ॥
मुये पिछार मुक्ति सब पाई । और सबहि जग भ्रम उपजाई ॥
जैसे वृक्षते पत्ता टुटता । फेर न सो तरुवरमें जुटता ॥
जैसे मुये मुक्त सब होई । और मुक्ति कतहुँ नहिं कोई ॥
यह बिसे अपरोक्ष अज्ञाना । विषयी जीवनके मनमाना ॥
अब दुतियेको वरनन कीजै । तेहि परोक्ष अज्ञान कहीजै ॥
सो परोक्ष अज्ञान है जोई । समान अधिकरन कहावे सोई ॥
जो समान अधिकरन कहावै । कर ताको दूजा बतलावै ॥
यंत्र मंत्र अरु देवी देवा । विविधि प्रकार करे सो सेवा ॥
तीरथ व्रत अस मूरत पूजा । कर्म करहि ईश्वर लखि दूजा ॥
वेदकि विधि सब करे अचारा । क्रम उपात्ताको व्यौहारा ॥
कर्मोमाह दोय विधि जाना । यक विशेष कह एक समाना ॥
मुन धन धान्यलाभ जग हेता । पूजा सेवामें चित देता ॥
निज मनोर्थहिन जो मन लावै । सो विशेष अधिकरण कहावै ॥
कर्ता हेत कर्म जो करिये । मुक्ति वासना चितमें धरिये ॥
शम दमादि अरु योग समाधू । तन मन बहुविधि साधे साधू ॥

७५

जीवधर्मबोध

( १९८३ )

यही कर्म भक्तन मन भावै । कोइ बड़भागी तेहि मन लावै ॥
नाम समान तासुको धरते । सुक्तिवासना जिवमें बरते ॥
दोय प्रकार कहे अज्ञाना । अकरम करम करै विधिनाना ॥
अकरम सकल अकरमी केरा । करमिष्टी कर कर्म घनेरा ॥
परइच्छा निज इच्छा होई । समान विशेष कहावै सोई ॥
याहीको त्वंपद कर जानी । तामें बैँधे सकल अज्ञानी ॥
द्वै प्रकार अज्ञान उचारी । तामें फँसे सकल संसारी ॥

इति त्वंपद अज्ञान

अथ ततपद द्वैविधिको ज्ञानवर्णन-चौपाई

ततपद द्वै विधि कह सविवेका । एक विशेष समान है एका ॥
सहित उपाधि विशेष बखाना । निरउपाधि है मुक्त समाना ॥
ज्ञान विशेष ते ईश बखानी । ज्ञान समान कहावै ज्ञानी ॥
निज जनकी उपाधि सब जाना । पर उपाधि सबही पहिचाना ॥
तीन अवस्था दुःख सुखसारा । इन्द्री अरु इन्द्रिन व्यौहारा ॥
सब मिथ्यामृगजलवत जाना । सब असत्य मैं सत्य सुजाना ॥
तीन देह माया भ्रम माना । बारम्बार फुरै अज्ञाना ॥
सोई ज्ञान परोक्ष प्रमाना । ताहूमें द्वै भेद बखाना ॥
सर्व समर्थ गहे सब सत्ता । ऋद्धि सिद्धि युत जगमें वर्त्ता ॥
जो षट्गुन ईश्वर जग होई । सोई सिद्धि ईश कह सोई ॥
होनी अनहोनी करि डारा । अब समान करिये निरधारा ॥
निरउपाधि कहियत है ताही । ऋद्धि सिद्धि कछु मानत नाहीं ॥
सकल उपाधि नास्ति करिभाषी । मैं आस्तीक सर्वको साखी ॥
त्रिगुणातीत मोर व्यौहारा । विधि हरिहर नहि पावत पारा ॥
ऐसो ज्ञान जाहिके तीरा । सोई ज्ञानी ज्ञान गंभीरा ॥
यह परोक्ष द्वैविधि चितधरिये । अब अपरोक्षकि निर्णय करिये ॥

( १९८४ )

बोधसागर

७६

तीन काल कोई नहिं भासा । त्रिपुटी सकलको होय बिनासा॥
ज्ञानाज्ञान गेय नहिं कोई । ध्याता ध्यान ध्येय ना होई ॥
आपन भाव रहै तिहुँ काला । द्वैत उपाधि नास्ति जंजाला ॥
यही ज्ञान अपरोक्ष कहावा । सो ज्ञानी शिवरूप बतावा ॥
योग समाधिसे जो मन मारे । मध्यम पक्ष सो वेद उचारे ॥
तामे कसर वेद निर्धारा । परो अविद्याको अंधियारा ॥

इति तत्पद

अथ अस्तिपद विज्ञान द्वैविधि वर्णन चौपाई

जानि बूझि जड़ वृती जो धारा । जस उनमत्त महा मतवारा ॥
यहिविधि सहजदसा जब गहई । एक अनेकन भ्रम कछु रहई ॥
महदानन्द मगन मन होई । याहूमें प्रकार है दोई ॥
जहँ विज्ञान दशा रह आई । सो विज्ञान हंस कहलाई ॥
कहवे मात्र बानीको ज्ञाना । सो मिथ्या विज्ञान बखाना ॥
दुतिये सो विज्ञान कहाई । जहां तहां आपै रह छाई ॥
द्वैतभाग कहुँ नहिं रहई । कारन कारज आपै रहई ॥
आपै बोले आप बोलावै । आपै डोलो आप डोलावै ॥
करे करावै आपै आपू । द्वैतभाव कतहुँ नहिं थापू ॥

इति

अथ स्वसंवेदमते चतुर्थपारखपदवर्णन-चौपाई

यहि विधि तीन भूमिका भाषी । चौथि भूमि पारखपद राखी ॥
तीन भूमिका है भ्रम भासा । चौथे परख काटे जिव फांसा ॥
तत्त्वमसीको ज्ञान जो गहता । तावमसीसे न्यारा रहता ॥
जैसे गुँगेने गुड़ खाया । बाक बिना कह स्वाद बताया ॥
तत्त्वमसाको ज्ञान जो धारी । जानि बूझि सो भयो सुखारी ॥
गुंगा गुड़को स्वाद जो गहई । सो तो गुड़से न्यारा रहई ॥

७७

जीवधर्मबोध

( १९८५ )

स्वादी स्वादसे भिन्न सदाई । क्या गूँगा गुड़ही है जाई ॥
नयन समस्त जत्तको देखे । अपनो रूप न सो पै पेखे ॥
मुखको भास परे दरपनमें । पै मुख नहीं विचारो मनमें ॥
तत्त्वमसीगह ज्ञान जो कोई । अपनो भास आपना होई ॥
झाँई निरखी भूलि सो जाई । ताहीको आपा बतलाई ॥
जाते आवा गौनमें रहई । पारख बिना न सो पद लहई ॥
सब ऊपर गुरु पारख पद है । यह जीवके ज्ञानको हद है ॥
घट प्रकारकी भूमि कहावै । पारख गुरु सकल परखावै ॥
छिप्रा प्रथम गतागत दोई । तृतीये सो लेष्टा कह सोई ॥
चौथी भूमि शूलनी गाई । पंचम भूमि आप भौराई ॥
छठई सत्य भूमि कहि दीजै । सप्तम पारख भूमि भनीजै ॥
पारख पा कोइ पद नहीं जाना । ताकी कृपाते भय भ्रम भाना ॥
पारख बिन जीव यह भूला । ताते सहे त्रिविध तन शूला ॥

सत्यकबीर बचन—शब्द

यह जग पारख बिना भूलाना ।
निर्गुण सर्गुण द्वै कर थापै अजपा धरि धरि ध्याना ॥
द्वैतहि ब्रह्म सकल घट व्यापै निर्गुणमें लपटाना ।
आवै जाय उपै फिर बिनशै जरि मरि कहा समाना ॥
सहस पाखुरी कमल विराजै मन मधुकर लपटाना ।
जलके सूखे कमल कुमिलाना तब कहु कहा ठेकाना ॥
छवो चक्र व्रत चार चतुर्दश वेद मते अरुज्ञाना ।
बंक नालकी डोरी खैंचे योगिन युक्ति बखाना ॥
घटमें करता लोग बोलत है पाँचों तत्त्व बीलाना ।
सर्गुन विनशी निर्गुन गुन रहि तमगुन बिन कहाँ समाना ॥

( १९८६ )

बोधसागर

७८

करहु विचार सकल मिलि ऐसो भेष विविधि बिधि बाना ।
कहै कबीर कोइ गुरुगम पावै पहुँचे ठौर ठिकाना ॥

इति पारखभूमि

सोरठा-ज्ञानको मूल विचार, बिन विचारको ज्ञान गह ।

हृदय घोर अँधियार, सार असार न परखकर ॥

ताते बारहि बार, मनमें भूले विचारकर ।

कोहें को संसार, कौनि भाँति कहते भया ॥

करता कारण कौन, यह समूह जो दृश्य है ।

परखी लीजिये तौन, निज विचार द्वारे सकल ॥

देह सदा जडरूप, चित्त फुरित चैतन्य है ।

कर्मकिया भ्रमकूप, जड़ चैतनते मैं अलग ॥

चौपाई

अस विचार आवै हिय जनही । तब गह सार भर्म भय भनही ॥

जहैं लगि जगमें कथा कहानी । सकल जीवकी बात बखानी ॥

सर्वज्ञौ अलपज्ञ समाजा । जीवहि रंक जीव ही राजा ॥

जीवहि गिरही जीव भिखारी । जीवहि पुरुष जीवही नारी ॥

जीव ब्रह्म माया जगदीशा । जीवहि स्मर लक्ष्म रजनीशा ॥

जीवहि क्रूर सुगम सुरबाना । जीवहि जल थलमें बिहराना ॥

जीवहि काल युवा अरु बूढ़ा । जीवहि ज्ञानी जीवहि मूढ़ा ॥

जीव समष्टि व्यष्टि कहलावै । जीवहि पोषै सोष उपावै ॥

जीवते इतर कतहुँ कछु नाहीं । उर्थ मध्य अथ जीवहि आहीं ॥

जीवको सबहीं खेल विहारी । ताकी दशा अवस्था न्यारी ॥

ब्रह्म कहूँ बिन जीव न होई । जीव बिना जिव जिये न कोइ ॥

जौपै ब्रह्म जीव बिन होता । कैसे जीव बीज सो बोता ॥

जीवकर्म निर्जीव न करई । जीव बिना जिवकाज न सरई ॥

७९

जीवधर्मबोध

(१९८७)

जीवभूमिका पर सब ठाढ़े । कहूँ तुच्छ कहूं गुणगण बाढ़े ॥
कर्म किये सर्वज्ञ हो सोईं । जैसे मूरख पंडित होईं ॥
सम्पति विपतियें जिव एक सारा । भिन्न भिन्न पदवी सो धारा ॥

दोहा-अल्पज्ञता जो जीवकी, सर्वज्ञता जो ईश ।

दूर दोहूको कीजिये, जीवहि विश्वा वीश ॥

चौपाई

चारों खानि जीव यक रासी । सबको लगी कर्मकी फांसी ॥
नरतन यही ज्ञान अधिकारी । ताते जीव भ्रम तिभिर बिड़ारी ॥
कञ्चनको भूषण बहु करही । न्यारो न्यारो नाम सो धरही ॥
भूषणदशा स्वर्ण जब लहिये । तब क्या कंचन नाम न कहिये ॥
धातु रूपहू कहिये कंचन । भूषणहू पुनि सोईं विरंचन ॥
कंचन आहि सत्य यक ताते । जो कछु चाहे रचिये बातें ॥
ऐसे जीव धातुसे सब है । माया ब्रह्मादिक बहु ढब है ॥
सांचो जीव जमा यक अहई । और खर्च बहु बानी बहई ॥
सूक्ष्म थूल जीवकी करनी । अज्ञ तज्ञ कछु भिन्न न वरनी ॥
पारख गुरु कोइ दूँदन जावै । जीवते इतर ताहि नहिं पावै ॥
पारख सदा जीवके पाहीं । प्रकट होत भ्रम तम बिनसाहीं ॥
भल विचार करिहैं जे प्रानी । सारासार सोईं पहिचानी ॥
जेते हंस पारख पदधारा । पारख पाय न पुनि संसारा ॥
अलख कि गति कहूँ लखी न जाई । पारख कृपाते सो दरसाई ॥

सत्यकबीर बचन-शब्द

साधो सतगुरु अलख लखाया, जाते आप आप दरसाया ॥
बीज मध्य ज्यों तरुवर दरसै, वृक्ष मध्य ज्यों छाया ।
आतममें परमातम दरसे, परमातममें माया ॥

(१९८८)

बोधसागर

८०

ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्य अण्ड आकारा ।
निहअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥
ज्योंग्विमध्ये किरन देखिये, किरनि ज्योति परकाशा ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीवब्रह्मसे श्वासा ॥
श्वासामध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यारा है वह साईं ॥
आपै बीज वृक्ष अंकुरी, आप पुहप फल छाया ।
सूर्य किरन परकाश आप है, आप ब्रह्म जिवमाया ॥
आतममें परमातम दरसै, परमातममें झाँई ।
झाँईमें यक झाँई दरसै, लखो कबीरा साईं ॥
छन्द-यह ज्ञान अगम अगाध कोई साधके मन भाय है ।
सो परख पारख परम गुरुकह परख पद परखाय है ॥
परखाय है सो परखपद जब दयानिधि हर्षाय है ।
सत्यनामके परताप पर्वल ताप त्रिविध नसाय है ॥

इति

अथ पंचकोष मिथ्यावर्णन—चौपाई

आप भूलि निजु फांसा लीना । पंचकोषमें बासा लीना ॥
पंचकोष यहि विधि पहिचानी । प्रथम अन्नमय कोष बखानी ॥
दुतिय प्राणमय कोष प्रमानो । तृतीय मनोमयकोषको जानो ॥
पुनि विज्ञान मय कोष अहई । फिरि अनंदमय पंचम कहई ॥
प्रथम अन्नमय कोष बखानो । अन्न भोगते ताथित मानो ॥
पंचतत्त्व परकृत पचीसा । तीनों गुन करि जिवतन दीसा ॥
जैसे घटको भाजन ठाटी । उपादान कारन है माटी ॥
तासु निमित्त कारन कोम्हारा । समवाय कारन चक्र विचारा ॥

८१

जीवधर्मबोध

( १९८९ )

तिमि तम उपादान कारनतन । राजसतामसनमित्तको कारन ॥
सातकसो समवाय बखानी । तीनों गुन करि देह उपानी ॥
सो तन कहे अन्नमय कोषा । बंधन ताहि चार है चोखा ॥
बसियौ रसियौ असियौ कसियौ । ये चारों बंधन तन लसियौ ॥
प्रथमें बसियो कहो बखानी । देहोहं यह तन मम मानी ॥
देहको सो आपा करि जानी । बंधन माह परा अज्ञानी ॥
दुनियौ रसियौ भेद उचारी । जेहि वर्णाश्रम जिव तनधारी ॥
सोइ वर्णाश्रम कर्म जो करिये । तेहि ते रसियौ बंधन परिये ॥
तृतिये असियौ कहिये ताही । निजु वर्णाश्रम जीव सराही ॥
तुच्छ इतर वर्णाश्रम देखे । बंधन असियौ गहे विशेषे ॥
चांथे कसियौ करे अकाजा । कुलकी लाज लोककी लाजा ॥
वेद अरु देव लाजामें फँसा । ताते परा जीवको संसा ॥
इन चारों बंधनको काटो । तब जिवकी अम संशय फाटो ॥
कुल अरु लोक वेद सुर लाजा । अस जब भाषे कुटुम समाजा ॥
हमरे कुलको यहि पथ डगरा । कुलकरनी तजि तू जस बिगरा ॥
तब जिव दुरि कुलधर्म सभारी । भित्रपंथ नहि सो पगधारी ॥
जो कोई यह लजा काटे । लोकलाज पुनि ताको डाटे ॥
लोग जो ऐसी बचन सुनायौ । बिगन्यौ श्रेष्ठ पुरुषको जायौ ॥
लोकलाज तब जिव नहि छोड़े । अपने कर्म ते सो मुख मोड़े ॥
लोक लाज जौ तोरके जाई । वेद लाज तेहि लेत फँसाई ॥
वेद लाज सो बंधन अहई । जब संसारी अस मिलि कहई ॥
काहू वेद शास्त्र परमाना । जो तू कर्म करे मनमाना ॥
वेदहु लाज लंघि जब जावै । देव लाज पुनि तोहि दबावै ॥
देव लाज कह कौन उलंघा । करे देव करनीमें भंगा ॥
इन्दी द्वारे देवन थाना । विषय भोग तिनके तन माना ॥

( १९९० )

बोधसागर

८२

आवत देख जो विषयबयारी । इन्द्री पटल सो देहि उघारी ॥
विषयानन्द जीव जब होई । तब शुभ करनी करे न कोई ॥
जब चहुलाज लंघि जिव जावै । बड़भागी कोइ प्रभु पद पावै ॥
अन्नमय यह कोष बखाना । जामैं जक्त जीव गल ताना ॥
प्राणमयी कोष याके आगे । विविधिप्रकार पौन संग लागे ॥
प्राण अपान समान उदाना । व्यानो नाग कूर्म कहि गाना ॥
किर्कल देवोदत्त धनंजय । ये सब पौन हैं कोष प्राणमय ॥
जेहि औसर जिव ऐसो कहई । प्राण हमारो तीक्ष्ण बहई ॥
प्राण पौनको स्वतह सुभाऊ । आपासो आरोप कराऊ ॥
गुदा अपान प्रवेश कराया । पवन सुभावन जीव सुभाया ॥
हृदय समान उदान सिरोई । व्यान अन्नपाचक है सोई ॥
नाग डकार कूर्म हग खोले । किर्कल छीक स्वतह सो बोले ॥
देवदत्त जसुहाई पूजै । मृतक शरीर धनंजय सूजै ॥
इतने इतर पौन बहुवादी । अंगफर्कन अफरन हिचक्यादी ॥
पौन कर्म सब मानै आपा । कोष प्रानमय बंधन थापा ॥
कोष मनोमय तासु अवांतर । पुनि हंकार कहे ताते पर ॥
शुभ और अशुभकर्म जो कछु कर । पुन्य पाप व्यौहारादिक नर ॥
सो सब मन इन्द्रीके करतब । कोष विज्ञानमयी कहिये अब ॥
पंच ज्ञान इंद्री छठये बुधि । तासु अवांतरचित्त सहित सुधि ॥
परमारथ सब उत्तम करनी । सो सुभाव सब इनको बरनी ॥
जिवसो कर्म आपनो धरई । कोष विज्ञानमय बंधन करई ॥
पुनि अनंदमय कोष पर तेही । बुद्धिको ऐसो ज्ञान भयो जेही ॥
हौमैं करि जिव करे बखाना । आपको बड़ अनंद हम जाना ॥
सो अनंद बंधन जिव केरा । कोष अनंदमयी यह टेरा ॥
पांचो कोष अवस्था पांचो । जागृतरूप अनन्तमय बांचो ॥

८३

जीवधर्मबोध

( १९९१ )

प्राण मनो विज्ञान जो तीनी । स्वप्न स्वरूप तिन्है कहि दीनी ॥
पुनि अनंदमय कोष जो आही । रूप सुषुप्ती कहिये ताही ॥
जाग्रत रजगुन रूप कहीजै । सतगुन रूप स्वप्न कहिदीजै ॥
तमगुन रूप सुषुप्ति कहावै । देहमन्त्री गुन सुभाव बतावै ॥
पुण्यदया वांछा रजगुनकह । पुन्य पिछार विषाद तमो यह ॥
वांछा रहित सतोगुन जानी । त्रिगुन कर्म नानाविधि मानी ॥
जिव अज्ञानते आपको कहई । पुण्यपाप सब मेरो अहई ॥
ज्ञानी गुनन सुभाव सो जाने । अज्ञानी अपनो करि माने ॥
यहि बिधि जेते तनके कर्मा । सो सब मन इंद्रिके धर्मा ॥
पाँचो तत्त्व त्रिगुनते भयऊ । गुन आज्ञा शक्तिसे कहेऊ ॥
चित्तसे अज्ञान शक्ती होई । मन अरु चित्त भेद नहिं कोई ॥
सर्वे कर्म जो जगके माहीं । मनहीं केर पसारा आहीं ॥
मन माया तिरगुन न्यौहारा । जक्तमाह भ्रम जाल पसारा ॥

अथ योग और भोग दोनों मिथ्या वर्णन

दोहा—षट्दल चक्रको भेदके, योगी पौन चढ़ाय ।
दल सहस्रके कमलमें, निर्विकल्प हो जाय ॥
हो विदेह पद अमर लह, विद्यामें ठहराय ।
भे निरद्वन्द्व न कल्पना, आपमें आप समाय ॥

चौपाई

जिमि योगी तिमि भोगी देखे । कमल भेद दोनों यक लेखे ॥
द्वन्द्वदीब दोनोंको खेला । इत नरनारी उत गुर चेला ॥
योगी उरध पौन चढ़ावै । भोगी अधषानी ले आवै ॥
नादके बल योगी अविनाशी । विंदके चल भोगी सुखराशी ॥
नारिपुरुष जब भा संयोगा । दोनों मिले भोग सुख भोगा ॥
माथेसे जब माथ जुरेऊ । सिरवर कमलते बिंद उतरेऊ ॥

( १९९२ )

बोधसागर

८४

नेत्रसे नेत्र जुटे जिहि बारा । द्वैदल कमल भेदि चलु पारा ॥
मुखसे मुख जेहि औसर चूमा । तबही बिंद अधो दिस घूमा ॥
तब घोडश दल कमल बधाना । द्वादशदलपर पुनि ठहराना ॥
अनहद चक्रते बिंद उतारा । मणिपूरकपर आसन धारा ॥
मणिपूरकते हेटको हेरा । स्वाधिष्ठान चक्र कर डेरा ॥
नारिपुरुष मिलि द्वन्द मचाया । स्वाधिष्ठान उतरि जल आया ॥
टिका अधारचक्र जब पानी । सह विकल्प भोगी तब जाना ॥
ज्ञान पुत्र योगा जब पायौ । अमर भयौ फिर गर्भ न आयौ ॥
योगी हृदये जबलों ज्ञाना । तबलों ताको अमर बखाना ॥
ज्ञान लोप होवे जेहि काला । तब योगीको हो जंजाला ॥
ज्ञानदृष्टि करि योगी जाना । मेंहंमि जगमें पसराना ॥
अज्ञ पुत्र तिमि योगी जाया । वंशवृद्धि जगमें फैलाया ॥
भोगी अमर भयौ तेहि बारा । तासु वंश जगमाह पसारा ॥
जबलों वंश जक्तमें ताका । भोगा अमर भयौ परिपाका ॥
तासु वंश जब हो संसारा । भोगी मृतक होय तेहि बारा ॥
आपै आप सकल जगमाही । अज्ञदृष्टि करि जा तन नाहीं ॥
योगी विद्या द्वारे जाना । भोगी अविद्याते अज्ञाना ॥
योग भोग दोनों हैं झूठे । संत सुजान दोहूते हूठे ॥
योगअरु भोग ब्रह्म जिव माया । नादर्शिद जो कछु उपजाया ॥
सो सब भर्म एक नहिं सांचा । सांचे सतगुरुको यह वाचा ॥
भर्मै नाद अरु भर्मै बिंदू । भर्महि तुर्क अरु भर्मै हिंदू ॥
भर्म निमाज भर्मही रोजा । भर्महि ते सब ईश्वर खोजा ॥
भर्महि देऊल भर्महि देवा । भर्महि पूजा भर्महि सेवा ॥
भर्महि धरती भर्म अकाशा । भर्महिको यह सकल प्रकाशा ॥
भर्मको रचित सकल संसारा । टूटै भर्म होय भव पारा ॥

इति योग और भोग मिथ्या

८५

जीवधमबाध

( १९९२ )

अथ स्वसंवेदमते अष्टांगयोगवर्णन सत्यकबीरवचन अष्टांगयोगकी रमैनी
अविगति लीला अगम अपारा । धरती धरचौ सत्य औतारा ॥
अविगति लीला अगम अलेखा । अवरन बरन रूप नहिरेखा ॥
जाकी गति सुर मुनि नहीं पाई । अविगतिकीगतिवरनि न जाई ॥
शेष सहस्रमुख निशिदिन गावे । अस्तुति करति पार नहीं पावे ॥
वेद जो कोट सहस्र पुन गावे । अविगति गतिवरनी नहीं जावे ॥

साखी-अविगतिकी बेगति है, मन बुध चितते दूर ।

आपमेटि सतगुरु मिलै, पावै दरस हजूर ॥

रमैनी

योगी बहुत योग जो करई । कृपा योगते नहीं निस्तरई ॥
फिर फिर आवै फिर-फिर जाई । कर्महि कर्म बहुत अरु झाई ॥
है निष्कर्म नाम जो ध्यावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥
कमही कम बंधावहु भारा । कमही कम अटका संसारा ॥
देह कर्म जो लीन उठाई । मनको कर्म छुटै नहीं भाई ॥
जब लगिमनकी कर्म न खोवै । तबलगि मननिर्मल नहीं होवै ॥
जब मनकी किरिया मिटि जाई । तब हरि मिलै सहजमे आई ॥

साखी-तन किरियाको छोड़िके, मन किरिया रुचिराख ॥

कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निजु भाष ॥

रमैनी

तनकी करनी देहु बहाई । मनकी करनी सत्य मिलाई ॥
मनकी किरिया सत्य जो कोई । ताहि समान और नहीं कोई ॥
सांख्य योग करनी है सारा । जेहिते उतरे भव जल पारा ॥
सत्य क्रियाते ज्ञानी भैऊ । सत्यक्रिया साहिब मिलगैऊ ॥
सत्य क्रिया सतपुरुष हि ध्यावै । सत्कक्रिया सतनाम मिलावै ॥

साखी-सत्यक्रिया निर्वान है, तन मन ते सो भिन्न ।

मन पौना टढकै गहै, सत्यनाम निजु चिन्ह ॥

नं. ११ बोधसागर - ८

( १९९४ )

बोधसागर

८६

चौपाई

अब मैं सांख्ययोग जो कहऊँ । योग अष्टांगको लक्षण लहऊ ॥
एकएकके चार चार लक्षण । जो जानै सो होय विचक्षण ॥
येतो कहिये लक्षण बतीसा । योग अष्टांगमें एकै दीसा ॥
अष्टांग योग सांख्य जो जाने । अरु लक्षण बत्तिस पहिचाने ॥

समौ-तेई भवसागर तरे, याकरनी निजु सार ।

सत्यकिया सतसे गहै, सत्यनाम आधार ॥

रमैनी

प्रथमै योग ज्ञान है भाई । ताहिते सुखव परमपद पाई ॥
निरालंब आलंब न कोई । सतगुरु इच्छा होय सो होई ॥
कर्म भरम तजि साहेब जाने । भली बुरी कछु चित्त नहि आने ॥
निरवासनिक वास नहि कोई । जंगल वस्ती एक सो होई ॥
है निरवैर रहै ततसारा । बाहर भीतर अलख अपारा ॥

समौ-एकनामको जानिके, दूजा देय बहाय ।

तीरथ व्रत जप तप नहिं, आतम ताव समाय ॥

रमैनी

दूजा योग विचार विचारे । निरमोही है आप विचारे ॥
है निवैँ रहै जगमाहीं । जगके सुखमें लगै नाहीं ॥
मातु पिता सुत नारि न भावै । काम क्रोध मद लोभ भुलावै ॥
है निष्कंट शब्दसे लागे । अनहद सुने आतमा जागे ॥
देही छोड़ि विदेह समाना । हंसा पावै पद निर्बाना ॥

समौ-जो कछु करे विचारके, रह पुन्यपापते न्यार ।

कहै कबीर नामहि जाने, जाय पुरुष दरवार ॥

रमैनी

तीजे योग विवेक कहावै । बिन विवेक कोइ पार न पावै ॥

८७

जीवधर्मबोध

(१९९५)

जाको समाधान मन होई। भली बुरी कहि जावै कोई ॥
समदरशी समज्ञान विचारे। सबघट भीतर ब्रह्म निहारे ॥
प्रीति गहे सो नाम समाना। और सकल जग मिथ्या जाना ॥
जाके शांति होइ घट नाही। कोइ कछु कहै कोध मन नाही ॥

रमैनी

चौथा योग शील कहि दीना। विना शील साहेब नहिं चीन्हा ॥
निर्मल सोचे सोचि विचारे। शुचि रुचि दया धर्म उर धारे ॥
मनको संयम करै जो ज्ञानी। पांचों पकरि एक घर आनी ॥
सत्य शब्द भावै संसारा। सत्यहिसे उतरे भवपारा ॥
होय औतारा सत्य बखाने। भावै बुरा भला कोइ माने ॥

समौ-शीलक्षमा जब ऊपजै, अलख दृष्टि जब होय।

विना शील पहुँचे नहीं, लाखो कथै जो कोय ॥

रमैनी

पच्वां योग सन्तोष बखानी। बिन संतोष बुझे अज्ञानी ॥
मानै नहीं रंक औ राजा। है अमान नहिं काहुते काजा ॥
नर्क स्वर्ग बाँछै नहिं कोई। होय अबच्छक साहेब सोई ॥
मन अस्थिर करि प्रेम उपजावै। अनहद शब्द सुने चितलावै ॥

समौ-निरमल शब्द प्रकाशकर, रह सुखसेज समय।

सत्य नाम सन्तोष बिन, सत्यलोक नहिं जाय ॥

रमैनी

छठै योग रहै निरवैरा। जाते जगते होय न वैरा ॥
सब घट भीतर एक करि जानी। होय सुदृष्टि परम परमानी ॥
सुख दाई सबहिनको भावै। जलस्वरूप है अग्नि बुझावै ॥
शीतल है सबहीको भावै। समता हो रमताको पावै ॥

समौ-कंचन काँचि है एकसम, दुष्ट मित्र सम एक।

दूजा भाव न जानहीं, एक नामकी टेक ॥

( १९९६ )

बोधसागर

८८

रमैनी

सतवां योग सहज है मीता । सहज भावसे यम से जीता ॥
एक विचार प्रेम उपजावै । पांचों इन्द्री सहज समावै ॥
निरलोभी है लोभ भुलावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
निस्संशीक होय जो कोई । संशय काल रहै नहिं कोई ॥
है निलैप कतहु नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागे ॥

समौ-सब जग जूठा जानिके, सत्य नाम है सार ॥
सहजे सहज प्रकट भया, सतगुरु शब्द सँभार ॥

रमैनी

अठयौ योग शून्य है नीका । एकनाम आगे जग लागे फीका ॥
श्रुत्रहीते सब जग उपराजा । श्रुत्रहीते शब्द जो बाजा ॥
सहज श्रुत्र जो लावै कोई । अलखको लखै आपही सोई ॥
सहज शून्य जो ध्यान लगावै । भवजल तरत वार नहिं लावै ॥
सुरति शब्द ले सहज समावै । सहज समाधि परमपद पावै ॥

समौ-ज्ञानविचार विवेकते, शील संतोष समाय ।
नाम गहों निर्भय रहो, सत्यलोक सहजे जाय ॥

इति अष्टांग योगकी रमैनी

अथ ज्ञानपरीक्षा चार

निरालंब । निर्भर्म । निर्वासनिक । निरस्वादी ॥ १ ॥

विचारपरीक्षा चार

निरमोही । निरबंध । निःशंक । निर्वान ॥ २ ॥

विवेकपरीक्षा चार

सर्वगी । सावधान । सुचेत । सारग्राही ॥ ३ ॥

शीलपरीक्षा चार

शुची । संयमी । श्रोता । वक्ता ॥ ४ ॥

८९

जीवधर्मबोध

( १९९७ )

संतोषपरीक्षा चार

अयाची । अवांछी । अमानी । अस्थिर ॥ ५ ॥

निर्वैरपरीक्षा चार

सुहृद । समता । शीतल । सुखदाई ॥ ६ ॥

सहजपरीक्षा चार

निष्प्रपंच । निस्तुरंग । निर्द्रढ़ । निलैष ॥ ७ ॥

शून्यपरीक्षा चार

लौलक्ष । धीरज । ध्यान । समाधि ॥ ८ ॥

समौ-कबीर बतीसो जब उगवै, तैतीसो छपि जाय ।

कहै कबीर सुन गोरख, आवागमन नसाय ॥

इति अष्टांगयोग स्वसंवेदमतै

अथ सातज्ञानभूमिकावर्णन

दोहा-सीषता विचार समानता, सिसरातो सुखपंत ।

बहुरि पदार्थ अभावनी, तुरिया ज्ञान गहंत ॥

चौपाई

प्रथम सीषता भूमि जो कहिये । शुभइच्छाते शुभ गति लहिये ॥
ज्ञानचाह सच्छास्त्र उचारन । सत्संगत अपकर्म निवारन ॥
द्वितीय विचार भूमिका सोई । दूँढ सुसंग सुविद्या जोई ॥
तृतीय समाता है वैरागा । तन मनते विषयनको त्यागा ॥
चौथे भूमि सिस्तांत कहावै । गेह नेह तजि अलग रहावै ॥
हो निवृत्त सब विषय बिहाई । हरिपद प्रीति न और सोहाई ॥
पंचई भूमि सुषुप्ति कहीजै । ईश्वरलीन भर्म भय छीजै ॥
छठे पदारथ अभावनी भाषा । प्रभुपद लीन न सुचितन राखा ॥
ऐसो ध्यान नाह अनुरागा । बिना जमाये सो नहि जागा ॥
सतई भूमि कहावै तुरिया । जहां पहुंचपुनिचितनहिफुरिया ॥

( १९९८ )

बोधसागर

९०

ऐसो ईश्वरमें लौं लागे । कोऊ जगावै तऊ न जागे ॥

इति ज्ञानभूमिका

अथ सात अज्ञानभूमिकावर्णन

दोहा-अशुची है जागृतो, महा जागृती गत ।

जागृत स्वप्ना स्वप्न, जागृत पुनि स्वप्ना सुषुप्त ॥

चौपाई

प्रथम अशुचि जागत अज्ञाना । तन सुख चाह सदा अलसाना ॥
दुतिये जागृत जाहि बखाना । अहं कुलीन श्रेष्ठ गुनज्ञाना ॥
तृतिये महाजागत यौं भाषे । दोहू लोक पौरुष हम राखे ॥
ऐसो मैं गुणज्ञान निधाना । मेरे वशमें अहै फलाना ॥
चौथे जागृत स्वप्ना यांचा । जो मैं कहों सुनो सब सांचा ॥
पंचम स्वप्ना जागत भाषा । देखे स्वप्न सुरति सब राखा ॥
छठयें स्वप्न भूमिका कहई । देखे स्वप्न सुरति नहिं रहई ॥
सप्तम भूमि सुषोपति होई । सुधिवुधिरहित जीव जब सोई ॥
सातो भूमि ज्ञान उर धारो । पुनि सातो अज्ञान विचारो ॥
यक पौरीपर दूजी पौरी । होय सघनता अगिली ठौरी ॥
प्रभुमें शुभ इच्छा जब होई । सच्छास्त्रन अवलोकै सोई ॥
सच्छास्त्रनको रस भल चीखी । ताकी बुद्धि भई तब तीखी ॥
सच्छास्त्रन पठि भयौ जो पक्का । तब तो दुतिय मूगिका तक्का ॥
दुतिय भूमिका आहि विचारा । तब सत्संगतको पग धारा ॥
सत्संगत जब जीव टटोले । तब ग्रन्थनकी ग्रन्थी खोले ॥
जबलों नहिं सत्संगत जूटे । ग्रन्थनकी ग्रन्थी नहिं छूटे ॥
दुतिय भूमिमें जब जिव पागा । तब तृतियेमें हो वैरागा ॥
हठ बैराग होय जिहि काला । चौथ भूमिकामें पग डाला ॥
जब चौथीमें हठ जिव भैऊ । तब पंचम हरिपद गहिलैऊ ॥

९१

जीवधमबाध

( १९९९ )

जब हरिपद तजि और न भावै । तब छटवों भूमिकामें जावै ॥
भयौ लीन जब छटवों भूमी । तब तेहि माह रह्यो सो रूमी ॥
जबलों लागि प्रीति अति गाढ़े । सतई भूमिमें भे तब ठाढ़े ॥
सतई भूमिमें जब जिव होई । तब नहिं तनहिंमें नहिं कोई ॥
छूटि गयौ तब देहको नाता । तब नहिं जक्त न जगतकी बाता ॥
विद्या और अविद्या दोई । भर्मरूप जानो सब सोई ॥
दोनों ब्रह्मा केर कल्पना । सो ब्रह्मा आवै भ्रम स्वप्ना ॥
ब्रह्मा आप जो भो भ्रमरूपा । ताकी कृत सकल भ्रमकृपा ॥

इति

अथ जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति मिथ्यावर्णन--चौपाई
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर टेरे । जीवनमुक्त न माह बडेरे ॥
सो तिहु भवसागरके कारन । बारबार तिनको बसुधारन ॥
व्यास वशिष्ठ पराशर बादा । दशरथ जनको ध्रुव प्रहलादा ॥
सो सब जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनितनधरि जगमें आवै ॥
सत्यकवीर वचन परमाना । ध्रुव प्रहलाद श्रेष्ठ करि जाना ॥
साठि हजार वर्ष ध्रुव भोगकर । प्रहलाद भोग चौकरी बह्तर ॥
इतने बड़ा भक्त नहिं कोऊ । आवागौन युक्त रह सोऊ ॥
जेते जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनि तनधरि जगमें आवै ॥
प्रलय विदेहमुक्त सब होई । उत्पतिमें तनधर सब सोई ॥
आवै जाय सो मुक्त न मानो । दोनों मुक्ति भर्म करि जानो ॥

सत्यकवीर वचन-शब्द

भर्मसेवा भर्मपूजा, भर्म जपतप ध्यान ।
भर्मकरिकरि भर्मबंधा, नहीं सब पहिचान ॥
भर्म इंद्री करी निग्रह, भर्म गुफा में वास ।

( २००० )

बोधसागर

९२

भर्म तो तहाँ लोकहो जहाँ, जीवनमुक्तको वास ॥
कहो जी तुम आये कहते, जाहुगे किस ठाँव ।
औरको उपदेश देतहो, आप समुझत नाह ॥
जानबेको कहा कहिये, कहेको पतियाय ।
कहै कबीर अनंतरधुनि उपजै, सहज शून्य समाय ॥

चौपाई

लोमस ऋषि आदिक मुनि नाना । जिनको हंस कबीर बखाना ॥
कोटिन उत्पति प्रलय जो होई । कबहुँ गर्भ नहिं आवै सोई ॥
मुक्तस्वरूप संत कह तिनको । आवागौनसूत्र नहिं जिनको ॥
सारशब्द सतगुरुको लहेऊ । जन्ममरणको संशय दहेऊ ॥
जक्तमाह जेते हैं कर्मा । सो सब मिथ्या जिवको भर्मा ॥
झूठ सत्य दोउ एकसम आहीं । यहि संसार सार कछु नाहीं ॥
उत्तम करनी जिवको करना । यद्यपि नहीं सार कछु बरना ॥
गर्भते शिशु बाहर हो जबसे । कर्मकरन लागे सो तबसे ॥
कर्मक्रिया सब तबते जागे । हाथपांव शिशु फेकन लागे ॥
हाथपांव मारन ते जाहीं । नफा होय कछु शिशुको नाहीं ॥
शिशुहि भलो कर पगमारनहै । बिन कर पग फेके दुखतन है ॥
हो बाल जब अधिक सयाना । माटी धूल खेल अरु काना ॥
ताहु कर्म नफा नहिं पावै । तऊ खेलमें घौस बितावै ॥
कर्म करत पहुंचै तरुणार्ई । लाभ कर्मते तब कछु पाई ॥
सोऊ लाभ नफा कछु नाहीं । सर्व कर्म मिथ्या है ताहीं ॥
आदि अवस्था यथा निहारी । कर्म करत बीते बयसारी ॥
कर्म करनकी बानि न होई । तौ निश्चय जिव जाय बिगोई ॥
भलो कर्म करिये तेहि काजा । जाते शुभगतिको सज साजा ॥

९३

जीवधर्मबोध

(२००१)

वेद कि बिधिते जो कोइ ध्यावै । जीवन्मुक्तकी पदवी पावै ॥
स्वसंवेद विधि कर्म जो करिये । पाय अमरपद बहुरी न मरिये ॥

सत्यकबीर वचन-शब्दहेली

हेली तीरथ जाय बलाय । हरदम परवी नहाय ॥
तीरथ कोट अनंत है रे गंग यमुन जहैं दोय ।
मध्य सरस्वती वहत है नहाये निरमल होय ॥
ब्रह्म नयके घाटमें हो आगे शिवको लिंग ।
ताहुँपै दक्षिना दीजिये रे बहे सहसमुख गंग ॥
आगे कलाली कि हाट है रे चोखा फूल चुबंत ॥
बिन सतगुरु पावै नहीं कोई साधूजन पीवंत ॥
शीश उतारि धरनि धरैरे ऊपर धरि ले पाय ।
ब्रह्म नयके घाट मेरे याविधि परवी नहाय ॥
ऋग यजुर साम अथर्वना रे चार वेदको ज्ञान ।
उनकी कहो उहो कौनगति बांधे गांठि पखान ॥
चारवेदको पिता है रे स्वसंवेद संगीत ।
साहिब कबीर जूके मोकदिमे रे अविगति ब्रह्म अतीत ॥

इति जीवनमुक्तमिथ्या

अथ वर्णाश्रममिथ्यावर्णन-चौपाई

वर्णाश्रम सब मिथ्या जाना । नरकृत सो अज्ञानते माना ॥
पूर्व कर्म बिन यहि तनमाहीं । केते विप्र शुद्ध हैं जाहीं ॥
केते शुद्ध विप्र सो भैऊ । मातु पिता नहीं ब्राह्मण रहेऊ ॥
जो कोई वर्णाश्रमते अटका । निश्चय सो सत्पन्थसे भटका ॥
मल अरु मूत्र कि देही जोई । ताको ब्राह्मण कहे न कोई ॥
ज्ञान द्वार जो ब्राह्मण भैऊ । वर्णाश्रम ताके नहीं रहेऊ ॥