कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
३५
जीवधर्मबोध
( १९४३ )
जो कोई पहुंचे तेहि खूटा । ध्रुव तारा सम भ्रमनते छूटा ॥
ज्ञानी पहुंचे कुतुबके किले । अटल होहि सो बहुरिन हिले ॥
सतगुरु किला जो ऐसे पैहै । बहुरि न सो भवमें भरमैहै ॥
यह दृष्टांत जो कोई बूझे । निश्चय परम पंथ तेहि सूझे ॥
सकल धर्मको एकै साई । सब पाले निज पुत्रकि नाई ॥
एक सोनार गढै सब गहना । जैसो कर्मरूप तस लहना ॥
सोन रूपको तार बनावै । गढ़िगुढ़ि ठोकि ठांकि सुधरावै ॥
ठोंकि ठांकि जब सीधा करई । यंत्रमें तबहि तारसों धरई ॥
खैंच तार धरि यंत्रके माही । इंग बिंग तब सब मिट जाही ॥
ऐसहि सर्व धर्म जग करो । टेढ बिंग व्यौहार जो हेरो ॥
धर्म कबीर धरहि जेहि बारी । खोट कर्म तब दूर पवारी ॥
तार समान सकल मत मंत्री । धर्मकबीर सोनारको यंत्री ॥
दोय प्रकार वासना अहई । भली बुरी जाको सब कहई ॥
दोनों भवसागरमें डारा । कहा करे यह जीव बेचारा ॥
अर्थ अरु धर्मकाम अरु मोखा । चारों त्यागे साधु सो चोखा ॥
चारते पार और जो होई । सतगुरु भेद बतावै सोई ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-तीरथ गयेते एक फल, संत मिले फल चार ।
सतगुरु मिले अनेकफल, कहै कबीर विचार ॥
चौपाई
कर्मको फल नर पावै कैसे । भोजन रस तन व्यापै जैसे ॥
जैसे भोजन जो को खाई । ताहीको गुन तामें आई ॥
आकशमात कर्म फल पावत । दुःखसुखसबजिवकोप्रकटावत ॥
जस बासना कर्म कर तैसा । तेहि अनुसार धर्म गह ऐसा ॥
सब निज निज वासना गहाई । ता तोषनकी करे उपाई ॥
( १९४४ )
बोधसागर
३६
नवी मलेशस्थानको यक रह । प्रभुप्रति विनतीकरि ऐसे कह ॥
हे प्रभु मोहि तियरति बलथोरा । यह बरदेव होय सो जोरा ॥
तेहि नम वानी कीन पुकारा । रति कारन कर मांसु अहारा ॥
मांसु खान लागा तब सोई । जान्यो प्रभुकी आज्ञा होई ॥
जस मनोरथ तैसी प्रभु आज्ञा । सत्य कहो करिके परितिज्ञा ॥
जस वासना जीव उर खोले । ताको यतन अकाशते बोले ॥
तथा फिरिशते स्वपना सुथरे । तस कलाम अछाको उतरे ॥
मिश्रसे जबहि यहूदी चाले । जब उजाड़में आय निराले ॥
मांसु खान कह प्रभु प्रतिटेरी । दियौ लगाय बटेरकी ढेरी ॥
खातहि खात मृत्यु तेहि डाला । कर्मको फल पायौ ततकाला ॥
जिन जिन मांसु खानको रोये । बचन एक प्रान सब खोये ॥
बीस वर्षके ऊपर जोई । सब मरि गयौ बचा नहिं कोई ॥
ज्ञान बिनाको प्रभु पहिचाना । ताको धर्म न कोई जाना ॥
जैसो धर्म धरे जो कोई । तैसी गति निश्चय लह सोई ॥
कोई स्वर्ग नर्कको भोगा । कोई अधर मृत्यु पुर लोगा ॥
जीव वासना प्रेरि लेआवै । ताही गतिमति स्थित करावै ॥
तीनों पुर पसरा यमजाला । कोइ बचै जेहि राख दयाला ॥
सत्यकबीर बचन
तीनों लोकमें लागी आग । कहैं कबीर कहैं जैहो भाग ॥
चौपाई
उभयवासनां ते जिव अटका । छूटै न आवा गौन को खटका ॥
कालहि रचै कालही पोषे । कालहि सब रचनाको सोषे ॥
कालको कृत कालही खैहै । कोई विरला गुरुगमबचजैहै ॥
कुंडलिया
निर्वाकार आतम सदा, वंधाकर्मकी डोर ।
मरकट नटके हाथ जिमि, फिरताखोरिन खोर ॥
३७
जीवधर्मयोग
( १९४५ )
फिरता खोरिन खोरि, कंठमें कर्म जझीरा ।
दर दर नाचत जाय, पाय तन मन बहु पीरा ॥
पीरा लह मतिमंद, होय नहीं बन्द खलासी ।
बंद दयाल जेहि काल, कालकी काटे फांसी ॥
कबीर खड़े बाजारमें, गल कट्टोंके पास ।
जो कोई करे सो भरेंगे, तुम क्यों भये उदास ॥
तुम क्यों भये उदास, भाष कर्महिको सारा ।
कर्मको रचित जहान, खान चहुँ कर्म सँवारा ॥
कर्म सँवारा दर्ब, सर्व जहाँलों जग दरसै ।
आतम तो निरलेप, एक सम सबमें सरसै ॥
हृदमें चल सो मानुवा, वेहह चले न कोय ।
हृद वेहहके बीचमें, रहौ कबीरा सोय ॥
रहौ कबीर सोय, कोय नहीं ताको परसै ।
परसै संत सुजान, ज्ञानके नैनन निरसै ॥
निरसै ज्ञानके नैन, परख पूरन सो पावै ।
जहाँ तहाँ दशै आप, ताप तिहुँ दूर बहावै ॥
हृदमें चलै सो मानुवा, बेहह चलै सो साध ।
हृद बेहह जो दोनों त्यागे, ताको मता अगाध ॥
ताको मता अगाध, आध अरु व्याध न लागे ।
कर्म जनित सब रोग, भोग भवमें नहीं पागे ॥
नहीं पागे भवभोग योग, जग नाता तोरे ।
टूटे न भजनको तार, प्रीति नामहिते जोरे ॥
हिंदू कही तो हौ नहीं, मुसलमान भी नाहिं ।
पांच तत्त्वको पूतला, खेलै गैबी माहिं ॥
खेलै गैबी माह गैबको गैबी जाने ।
( १९४६ )
बोधसागर
३८
कहन सुनन कछु नाहिं, विचार हृदय निजआने ॥
आने हृदय विचार, चारु चिर चोर चपेरे ।
मूसे जो घर मोर भोर, निश ताको हेरे ॥
चौपाई
काल कराल आपही जानी । ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी ॥
षट्दरशन सोई प्रभु थापा । सब पंथनमें आपै आपा ॥
मूसा ईशा महम्मद आदिक । सोई सब मतके मरजादिक ॥
सब धर्मनको सोइ अचारज । सबहीको कीने प्रभु कारज ॥
सब ही धर्म ताहिको जानी । प्रणवों सबहि मनोक्रम बानी ॥
सोई प्रभु सबही ये देखा । बपुरा जीव करे कह लेखा ॥
छन्द—आप खास है आप दार है आप खेल खेलायऊ ।
मलसोध जीव प्रबोध कीनो बौध होकर आयऊ ॥
जग जगन्नाथको माथ नावैं रूप और बनायऊ ।
थापे महात्म बौधको खुद बौधीदास कहायऊ ॥
चौपाई
दोय पुत्र ब्रह्माके भयऊ । यकसुरदुतियअसुर जो कहेउ ॥
सत्तोगुनी सुर कह सब कोई । विषय विकारी असुर सो होई ॥
तीन लोकमें विषय विकारा । चौथा लोक विषयते न्यारा ॥
सत्यकबीर वचन—चौपाई
विषय विकार मान मद जेते । सो सब प्रभु असुरनको देते ॥
जाने थोर बहुत जो कहई । तीनों काल मूर्ख सो रहई ॥
जेते जाने तेते जो भनिये । मध्यम गतिमें ताको गनिये ॥
जाने बहुत कहे जो थोरा । सोई ज्ञानी सब शिरमौरा ॥
सब धर्मनको भेद जो पावै । ताकी बुद्धि शुद्ध है जावै ॥
जाके धर्म ताहिंते जांचो । तब लखिपरे झूठ कह सांचो ॥
३९
जीवधर्मबोध
( १९४७ )
जौन धर्मगति चह चित सुनिया। ढोढों ताको पंडित गुनिया ॥
पक्षरहित जो बात बतावै। तामें कछू कसर जौ आवै ॥
तौ पूछो औरन बुध लोई। निजबल बुद्ध बतावे सोई ॥
एक कि भूल दूसरा कहई। यहिविधिचतुरशंकनिजदहई ॥
औरको धर्म औरते बूझै। ताको दिनदोपहर नहि सूझै ॥
वायस मिल वायसहि प्रशंसा। हम सम नहि ब्रह्माको वंशा ॥
हमसम और न बोल सुधारा। जाने कह कोकिला गँवारा ॥
सो सुनि भूलि जाहि जिवसंठा। जानन कागहि जो कटुकंठा ॥
जिमि उलूक निजपरको ठानू। कानते सुने न देखे भानू ॥
तामें सब कोइ मिथ्या करई। जगमें कतहु न सूरज अहई ॥
ताकी शास्त्र भरनको साचा। चमगुदरी उठि बोली वाचा ॥
सुनि लीजै उलूक मम आता। जो कछु कहो सत्य तुम बाता ॥
मैं कबहुँ दिनकर नहि देखा। कहै जक्त सब झूठा लेखा ॥
भरे बहुरिके ताकी साखी। आय छछन्दर ऐसे भाषी ॥
सत्य वचन तुम दोहुकी आही। दिनकर तीनकाल कहुनाही ॥
ऐसहि अंधहि अन्ध सराहत। जो दिनपतिहि दूरकरचाहत ॥
तिनके वचनमें जो जिव बंधे। तिनसमान सो सबही अन्धे ॥
जाधर पकै हरामको दाना। तिनको धर्म कर्म बिन माना ॥
जो कोई करे हराम कमाई। आप खाय अरु और खिलाई ॥
जो हरामको दाना देहे। ताको दंड आप शिर लैहे ॥
खाय हराम हरामही करि है। करि हराम भवसागर परि है ॥
जो कोई अन्न हरामको खाई। ताकी बुद्धि अन्ध हो जाई ॥
बुद्धि विभंग होय जब जाको। धर्मकथा भावै नहि ताको ॥
अन्धकार जब हृदयें घरे। शुद्धपन्थ सो कबहु न हेरे ॥
खाय हराम हरामी जायौ। मातु पिताकुलकानि गवायौ ॥
( १९४८ )
बोधसागर
४०
करि श्रम शुद्ध अन्नभक्ष जोई । ताकी कृपा शुद्ध सब होई ॥
भक्ष सुअन निजधर्म जो पाला । ज्ञान दृष्टि पावै ततकाला ॥
विषकी बेल है यह संसारा । चहुँदिश आवै विषकी झारा ॥
जलथलमें विष रहा समार्ई । विष नहिं तजै भजै चितलाई ॥
विषहीमें निज भौन बनाई । विषय भोगि विषको तनपाई ॥
सबही सन्त श्रुति कहे बखानी । नरस्वरूप नारायण जानी ॥
लिखो वेद वेदान्त पुराना । तौरे तो इअील कुराना ॥
सब ही मिल करते निरधारा । नर ईश्वर निज रूप संवारा ॥
निश्चय नर नारायण देही । पै जब ईश्वर गुनगह येही ॥
जबलों ईश्वर गुन नहिं गहई । संज्ञा जीव तासुको रहई ॥
ताते जीव शीव शिव कहिये । विषयबिकारनतनमन गहिये ॥
जब सबही शुभगुनगहि लीना । ब्रह्मस्वरूप ताहि कहि दीना ॥
ब्रह्मस्वरूप आप जब मंडा । तब रचि सके कोटि ब्रह्मण्डा ॥
सिरजै पोष प्रलय करिडारी । पुण्यपाप नहिं ताहि विचारी ॥
जिमि शिशुमाटीधूल खेलोना । नाना भांति रचै मनभौना ॥
खेलि खेलि पुनि मिट्टी मेल। ऐसहि ब्रह्म सृष्टि को खेला ॥
सकल सृष्टिको करता होई । ताको नाम जपै सब कोई ॥
जो जिव विषयनमें लपटावै । दिन दिन तुच्छ देह सो पावै ॥
जब जब तुच्छ अन्त है जाई । नरकनमें निज भोन बनाई ॥
ताते विषई जीव सबनकी । विषयविहिन देह ईश्वरकी ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-कबीर कबीर तु क्या करो, साधो अपना शरीर ।
पांचो इन्द्री वश करो, तुमही दास कबीर ॥
बुलेशाह वचन
काम क्रोध लोभ मोह हंकार । पञ्चो कटुवां जू दो मार ॥
इन्हा करवी है बदवो । बुछा आपै अल्लह हो ॥
४१
जीवधर्मबोध
(१९४९)
यह संसार दुसह दुःख दागा । बिरत विचारी सन्तसो त्यागा॥
कौन राम कौनी विधिजपना । कौन ठौर तेहि प्रभुको थपना॥
सत्यकबीर-बचन
सारखी-रामजपत है नामको, नाम जपता है थीर ।
ताहुते कछु अपर है, ताको जपै कबीर ॥
चौपाई
उत्तम धर्म जो कोइ लखि पैंये । आप गहो अरु और गहैंये ॥
ताते सत्यपुरुष हिय हवैं । कृपा वारि तब तोपर वषैं ॥
सत्यकबीर केर परमाना । यहि विधि तैंसो करे बखाना॥
जो कोउ जीवहि राह बतावैं । परमपुरुषकी भक्तिमें लावैं ॥
ऐसो पुण्य तासुको बरना । एक मनुष्य प्रभु सन्मुख करना॥
कोटि गाय जिमि गहे कसाई । ताके करते लेत छोड़ाई ॥
परम पुरुषते जब जिव जूटै । काल कसाई करते छूटै ॥
भक्ति कठिन अतिशय कठिनाई । बिना भक्ति कोइ पार न पाई॥
भक्ति भवन अति उत्तम ऊंचा । इनसीठी बिरला कोइ पहुँचा॥
लागे तहां त्रिविधि सोपाना । एकते एक विचित्र बखाना ॥
रजगुन तमगुन सतगुन वरतो । द्वै तजिके तृतिये पग धरतो ॥
जब सतगुन सीठीपर चढ़िये । तब तहैं ज्ञान अगोचर पढ़िये॥
पढ़िके ज्ञान भयौ जब पक्का । तब सो भक्ति भवनको तक्का ॥
भक्तिभौत जब चाहत चलिये । तब सतगुरु प्रतिहारते मिलिये ॥
ताहि पौरि यहि भेट चढ़ावो । भक्तिभौन तब पैठन पावो ॥
तन मन धन सब अर्पन कीजै । शिर उतारि तेहि चरणधरीजै॥
जो दयाल हो सो प्रतिहारा । भक्तिभौन तब हो पैठारा ॥
भक्तिभौनको भेद जो पाया । त्रिगुन पौरि सो बहुरिन आया॥
आदि अन्त सतगुरु गुनगावो । जिन तोहि भक्तिभौन बैठावो॥
( १९५० )
बोधसागर
४२
भक्तिहि भक्ति भेद बहुतेरा । गहसो भक्ति भेट भवफेरा ॥
विमल भक्ति गहिये मन लाई । जाते त्रिगुनातीत कहाई ॥
आप आप जिव आप फँसाई । आपै बँधा आप दुख पाई ॥
जस क्रमयक जेहि कह खुसियारी । ताकी ऐसी कथा उचारी ॥
सो ऐसो निज भौन बनावै । आपको तामें आप फँसावै ॥
आप चरित ग्रह बंधै आपू । काहूको कछु दोष न पापू ॥
ताहीमें सो फँसि मरिजाई । विविध भांतिसे सो दुखपाई ॥
बंधा तौ पै खुलै न कोई । जब लगि सतगुरु कृपा न होई ॥
हाथ पांव पटकै औ रोवै । तब गुरुकृपा केर भ्रम खोवै ॥
जाति पांति कुल कानि गवावै । भली बुरी कछु चित्त नहिं ल्यावै ॥
सकल नेहको नाता तोरे । प्रीति सदा सतगुरुसे जोरे ॥
वेद कितोब शरा अरु सुन्नत । सो नहिं कछु निज मनमें उन्नत ॥
यह सबही दुनियांकी फांसी । ताते नहिं भेटे अविनाशी ॥
कवित्त-शरीअतकी सलाई जिव आँखन चलाई भय अंध
यमबन्ध धोरवधन्धमें परत है । कोई कह हम हिंदू ही जो ऊंचे
कुलबिंदू कोई कह हौ ईसाई ईशा आसराध रत है ॥ कोइ वह
मुसलमान हौही साबित ईमान मारो काफिरन सारा जंग
जेहाद करत है । नहिं चीन्है कोइ देव करे भरम कि सेव गुरु
सैन बिन येव लड़ि लड़िके मरत है ॥
सत्यकबीर वचन
मुसलमानकी काटी चमड़ी हिंदूकी बेधे कान ।
कहे कबीर इस बोलतेको पहिचान हिंदूकी है मुसलमान ॥
चौपाई
जीवधर्म पुरुषार्थ गोगू । ताते सुख पावै सब लोगू ॥
४३
जीवधर्मबोध
( १९५१ )
कछुक कहो पुरुष पुरुषारथ । जो हित स्वारथ अरु परमारथ॥
शिव दधीच हरिचंद समाजा । बलि विक्रम करणादिक राजा ॥
सूरशाह सिकन्दर हातम । हनुमत भीष्म द्रोण भाषेतिम ॥
ब्रह्मा हरि शिव मनु सतरूपा । गोरखदत्त कि कथा अनूपा ॥
कौशिक व्यास वशिष्ठो नारद । शृंगी शुक् विज्ञान विशारद ॥
केते ऋषि मुनि करनी करहीं । कीरति जासु जक्त उच्चरहीं ॥
जीअत ही साधू जो मरेऊ । सूरसती शुभ करनी करेऊ ॥
साकजके हरि कानन कहई । स्वान शृंगाल पेट तेहि भरई ॥
सूर सन्त इमि करनी करही । जक्त जीव ले पार उतरही ॥
तप बल शेष धरे महि भारा । तपबल ब्रह्मा सिरजन हारा ॥
तप बल विष्णु जक्तको पोषै । तप बल शंभु ताहि पुनि सोषै ॥
तप आधार जक्त जगदीशा । तप बल जीव बने हैं ईशा ॥
जैसे जगमें सूर सयाना । निजभुजबल अरिदलदलनाना ॥
करि श्रम सुखी भये सब सोई । तन धन मोह स्यार सब रोई ॥
जहँ लगि जब विद्या चतुराई । पुरुषारथसे सब कछु पाई ॥
आलसी जीवको विद्या नाहीं । धन नहि होय अविद्या पाहीं ॥
निरधनको कोइ मित्र न होई । बिना मित्र निरबल नर सोई ॥
निरबलको सबही दुख घरे । दुखिया दीन तुच्छ जग हेरे ॥
पुरुषनको पुरुषारथ चाही । नारि पतिव्रत धर्म निबाही ॥
मृदु सजापर सोवनहारे । भय सो कीट पतंग बेचारे ॥
विविध प्रकार विषय जिन भोगा । अंतकाल सहसो सब शोगा ॥
मचे जबै घमसान लड़ाई । कोई धीर वीर ठहराई ॥
कैसहु महा महिष किन होई । जो रन तजिके भागे सोई ॥
कतल कैद हो राज विभंगा । कायर नहि देखे रनरंगा ॥
ऋषि मुनि शूर वीरकी करनी । कहलो कहो जाय नहि वरनी ॥
( १९५२ )
बोधसागर
४४
जहाँ लगि तन पोषक नर नारी । सो नहिं करनीके अधिकारी ॥
सिन्धुमें जो कोई गोता मारा । सो नहिं राखै भय घरियारा ॥
जबलोंं सिंधु न डुबकी मारे । तबलोंं रत्न हाथ नहिं धारे ॥
शर शय्यापर भीष्म विराजे । करि षट्मास शयनगति साजे ॥
तन मन कसहि मुनीश्वर ज्ञानी । लहै भक्ति सब सुखकी खानी ॥
सत्यकबीर वचन-रेखता
हमनसे मतमिलो यारो हमन खफकी दिवाने हैं ।
खुशीकी राह छोड़ी हैं कठिनमें जा सामने हैं ।
हमन दिन रैन रोते हैं वो रामसे जान खोते हैं ।
सुली की सेज सोते हैं विरहके ये रकाने हैं ॥
हम न हथियार हैं जानी पिया हरिनामको पानी ।
आखिर सब होवैगे फानी बलीमें जा समाने हैं ॥
तजी खिदमत वजीरीकी लही लज्जत फकीरीकी ।
चढ़े किस्ती सबूरीकी फुकुरके रकाने हैं ।
चौपाई
पुरुषारथकी ऐसी बातें । कर अवश्य पुरुषारथ ताते ॥
यथा कृषान कृषानी करई । उपजैं अन्न पेट निज भरई ॥
हलवाही अवश्य तेहि करना । भली भांति निजखेत सँवरना ॥
बीज बोय रखवाली कीजै । पशु पंछी करिसो मति कीजै ॥
करि निज श्रम बिनवै प्रभुपाही । भरे खेत वर्षाकरि ताही ॥
जो ईश्वर वर्षा नहिं करई । वृथा कृषानी ताकी परई ॥
जो बरपैं बरवारी सुकाला । तो कृषान सो होय निहाला ॥
जो आलस करिके नर कोई । संशय पै हल जोतै नहिं सोई ॥
बीज न बोय न कर रखवारी । बपैं घन अरु भरे कियारी ॥
ताहि अन्न फल हाथ न आये । मूरख मिथ्या आस लगाये ॥
४५
जीवधर्मबोध
( १९५३ )
बिन बोये कहु किनकिन लुनिया । सो जड़ जो यह ज्ञान न गुनिया ॥
ताते पुरुषारथको कीजै । दोऊ लोकमें सुयश लहीजै ॥
सर्वशास्त्र सदग्रंथ विलोका । जान्यौ सर्व धर्मको थोका ॥
तजि असार सार जो आही । सो पंडित मराल मति आही ॥
उत्तम धर्म धरे जो कोई । उत्तम करनी करिहैं सोई ॥
नीच धर्म जो कोई गहई । उत्तम करनी सो किमि लहई ॥
साधु पुत्र नहिं करे कुकर्मा । पुत्र असाधु कुकर्महि धर्मा ॥
कर्मयोनिजनिज मातुपिताका । जिव तेहि भली दृष्टिकरि ताका ॥
ऐसहि सब धर्मनके लोगा । करहि कर्म निज गुरु संयोगा ॥
शुद्ध अशुद्ध विचार न हारा । सो हंसा बिरला संसारा ॥
कहूं कहूं विपरीति देखावै । साधु सुअन असाधु कहावै ॥
कहूं भक्तभा सदन कसाई । पै यह कथा अनोख बताई ॥
धर्म तुच्छ गहि बड़ पद पावै । ऐसेहु कहूं कहूं देखलावै ॥
है परंतु यह अति अज युतरी । रसिकस्वाद कहैं दे कठपुतरी ॥
कोई चंडाल करे द्विज करनी । सो सतसङ्ग केर फल बरनी ॥
उत्तम कुलमें जो जिव होई । मध्यम करनी जाय बिगोई ॥
त्यागहि पक्ष साधु जो ज्ञानी । हो अपक्ष यह मुक्ति निशानी ॥
निजनिज गुरुपद गह सब आछे । यथा भेड़गण पालि न पाछे ॥
निज निज धर्म सत्य सब कहई । ताते परमपन्थ नहिं लहई ॥
जब काहू सच शंका आवै । निज पद पौर गुरु बैठावै ॥
रामचन्द्र मन संशय आई । देह विदेह मुक्ति अर्थाई ॥
मुनि वशिष्ठ निज ज्ञान सुनाये । अपनी ठौर फेर बैठाये ॥
( १९५४ )
बोधसागर
४६
योगवाशिष्ठ द्वितिय मुमुक्षुप्रकरण चतुर्थसर्गः
वशिष्ठ वचन
दोहा—जीवन मुक्ति विदेहको, तू नहीं जाने हेत ।
सहित असम्यकज्ञानके, जान न रघुकुलकेत ॥
स्वसंवेदमें भेद जो, भाषत ज्ञान बिहीन ।
ज्ञानवन्तको भेव नहीं, सम्यकहृदय जेहि पीन ॥
चौपाई
सदाकाल ऐसहि चलि आई । निज निजमता मुनीश मिलाई ॥
कोई कह भिन्न जो मारग लेई । गुरु निज पक्षन विचलन देई ॥
उत्तम करनी जौँ नहीं करिये । तो नहीं उत्तम गुरुपद धरिये ॥
शम दमादि करि इन्द्री जीते । आवागौन दुसह दुःख बीते ॥
चारि खानि जिव जो तन धारी । मालुष प्रभु निज रूप सँवारी ॥
भक्ति हेत यह उत्तम देही । प्रभुहि बिसार जो धरि तनयेही ॥
सोई अधर्म आत्महत्यारा । नर तन पाय न काज सुधारा ॥
इति
अथ मनुष्यको नित्यकर्म वर्णन
चौपाई
भोरहि उठि नित कर्म करीजै । करि तन शुद्ध भजन चित दीजै ॥
प्रभु प्रति बिनय बचनते मांगे । महा दीन हूँ ताके आगे ॥
मोर मनोरथ कर प्रभु पूरा । दीनबन्धु कीजै दुख दूरा ॥
सर्व समय तुहि जग करता । तेरो हुकुम सर्वपर बर्ता ॥
मोर उधार करो प्रभु सोई । विघ्न बिहाय कृपा तौ होई ॥
गुरु अचारजको निज टेरे । सदा सहायक अपनो हरे ॥
बार बार कर प्रभु प्रति बिनती । यद्यपि सो न करे कछु गिनती ॥
कबहुके दाय़ा प्रभुकी होई । दुःखदरिद्र सब डारे खोई ॥
लामालाभ एक सम गनिये । सदाकाल प्रभु गुनगन भनिये ॥
४७
जीवधर्मबोध
( १९५५ )
जपतप वेद पाठ शुभ कर्मा । गुरु जासु वश भाषे मर्मा ॥
गृही होयके साधू होई । निजु निजु धर्म धरे सब कोई ॥
इति
अथ नरशरीर गुरु अधीन वर्णन—चौपाई
प्रथमै जिव जब गर्भमें आवै । तीन तापते सो अकुलावै ॥
जठरानलकी तीक्ष्ण तापा । महादुःख तहैं जीवहि व्यापा ॥
जठर अग्निसे अस दुख पावा । जैसे तस लाल हो तावा ॥
तेहि तावापर जिव जो धरई । तलफि तलफि गरमीते भरई ॥
ऐसे जठर अग्नि तेहि दागे । तहैं जिव बिनय करे प्रभु आगे ॥
अबकि बार प्रभु मोहि वचावो । बाहरनकिस भजन मन लावो ॥
दुतिये मल अरु सूत्र मलीना । तामैं दूवा दुखिया दीना ।
भोगे दुःख महा दुरगंधा । तृतीये उलटा टांगा बंधा ॥
यहि विधि जीव नर्क तहैं भोगा । तीन ताप व्यापे सौ शोगा ॥
बार बार तहैं करे करारा । त्राहि नाथ कर मोर उबारा ॥
भजन छोड़ि न करो कछु आना । प्रभुकी भावभक्तिमें ध्याना ॥
तहैं जिवके सन्मुख प्रभु ठाढ़ा । दया करे सो दुख लखिगाढ़ा ॥
सो करार सुनि हरि हर्षाना । बन्धन काठके बाहर आना ॥
जबहि गर्भसे बाहर काढ़ा । भूला कौन मोहमद बाढा ॥
गर्भमें पोषे पालै आपै । प्रभुकी दया दुःख नहीं व्यापै ॥
पालि पोषि पुनि बाहर धरई । मातु पिताको आश्रित करई ॥
मातु पितहि सौपे शिशुसेवा । गुप्त हो तबहि परम गुरुदेवा ॥
मातु पिता तबलो तेहि पाला । जबलों नहीं बीते पन बाला ॥
बालापन जबही बितजाई । विद्या पाठ गुरु ढिग जाई ॥
मातुपिता गुरु आदि अवस्था । ताबिन जीव न पावै रस्ता ॥
पुनि गुरु कुटुम्ब जातिगण जोई । कुल मरजाद सिखावै सोई ॥
(१९५६)
बोधसागर
४८
विद्या पाठक पहुँ जब जावै । विद्या सकल ताहिते पावै ॥
विद्यापढ़ि जब भयौ परवीना । धर्म अधर्म मर्म सब चीन्हा ॥
वेद शास्त्रको सबही छाना । तऊ न भक्तिभेद कछु जाना ॥
तब जिव संतकी संगति गहई । ताते ज्ञान लाभ सो लहई ॥
ज्ञानपाथ जब सतगुरु चीन्हा । ताके चरणमें चित दीन्हा ॥
आठ गुरुके नाम बखानो । जिनते जग जिव लाभ लहानो ॥
पहिले गुरु मातु पितु जानी । रज वीरजते देह उपानी ॥
दूजा गुरु है मनको दाई । गर्भमाह जिन युक्ति बनाई ॥
तीजा गुरु नाम जिन धारा । ताहि नाम ले लोग पुकारा ॥
चौथा गुरु जिन विद्या दीना । कुल मर्याद रीति सब चीन्हा ॥
पंचम गुरु जिन दीक्षा दीनो । रामकृष्णको सुमिरन कीनो ॥
छठये गुरु जिनभ्रम गढ़ तोड़ा । सबसे तोड़ एकसे जोड़ा ॥
सतवाँ गुरु जिन सत्य लखाया । जहाँको था तहँवा बैठाया ॥
एते गुरु हैं जक्त मझारा । जीवहि राह बतावनहारा ॥
अठये गुरु पारख पद बंदा । जाते कटे सकल यमफंदा ॥
भक्तिहि भक्ति भेद अधिकाई । तासु कथा कछु देहु सुनाई ॥
अक्षर तीन भक्तिमें धारी । ताको ऐसो अर्थ उचारी ॥
प्रथम भकारसो भव बतलावो । आवागमन जो दूर करावो ॥
दुतिये ककार करे कल्याना । तृतिये तो जिवको दे ज्ञाना ॥
भक्ती दोय प्रकार बखानो । विहित अविहित जाको जानो ॥
ऐसे प्रथम विहित निरतावो । वेद शास्त्र विधि भक्ति कमावो ॥
ताहि विहितमें चार प्रकारा । प्रथम कामना सहित उचारा ॥
जिमिहरिपदध्यायौवृजवनिता । निजमनोरथयुतभक्तिसोभनिता ॥
दुतिये बैरभाव करि ध्यावन । जिमि हरिनाकुस आदिकरावन ॥
तृतिये भयकरि भक्ति गहाई । जस मारीच भक्त रघुराई ॥
४९
जीवधर्मबोध
( १९५७ )
चौथ प्रथम भाव मर्यादिक । जैसे नारद अरु सनकादिक ॥
तिनमें द्वैको त्याग बखाना । भय अरु वैर न भक्ति प्रमाना ॥
पुनि दुतिये अविहित कहावै । प्रेम उमंग हृदयमें आवै ॥
आपसे आप प्रेम उमडाना । वेदशास्त्र विधि कहु नहिं जाना ॥
उठै उमंग प्रेमकी धारा । आपै भक्ति गहै हरि प्यारा ॥
सबसे श्रेष्ठ भक्ति है येही । मिले धाय निज परम सनेही ॥
याहूमें कहिये द्वै ढंगा । प्रथम प्रमान कीन ज्ञान अंगा ॥
ताके अंगा भक्ती कह सोई । ज्ञान उपाय मुक्तिकर जोई ॥
दुतिये सो मंत्र भाषिये ताही । याके आप ज्ञानमय आही ॥
भक्तिको भाग ज्ञान कहलावे । भक्तिमें सकल ज्ञानगुन पावै ॥
विहित अविहित कीन उचारा । बहुरि भक्ति कह तीन प्रकारा ॥
उत्तम मध्यम प्राकृत ताना । तिनको ऐसे अर्थ बखाना ॥
उत्तम भक्तीको यह लेखा । सर्व मई ईश्वरको देखा ॥
जल तरंग जस भेद न कोई । भक्ती श्रेष्ठ कहावै सोई ॥
शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । आपै आप रमै प्रभु सोई ॥
दुतिये मध्यम भक्ति बन्दता । भगवत भक्त और भगवन्ता ॥
दोनों ते सो प्रीति लगावै । दुरजन देखि न ताको भावै ॥
तृतिये प्रतिमा पूजा ठाना । मूरत को भगवत करिजाना ॥
भगवत भक्तनसे नहिं प्रीति । प्राकृत भक्त केर यह रीति ॥
बहुरि भक्ति कह तीन बिधाना । सात्त्विकराजसतामस जाना ॥
सात्त्विक भक्ति कहे निष्कामा । राजस होय कामना जामा ॥
तामस बैरी विजयके कारन । त्रिविधभक्ति पुनि कीन उचारन ॥
मानस बाचक कायक होई । बहुरि चार बिधि कहिये सोई ॥
प्रथम जोद्रोपदि आरतनिजहित । दुतिये जिह्वासू नृप प्रीछित ॥
तृतिये अर्था अर्था सोई । दुनिया चाहे ध्रुव जस होई ॥
( १९५८ )
बोधसागर
५०
चौथो ज्ञानीको मरजादा । जैसे सनकादिक प्रहलादा ॥
बहुरि तीन विधि भक्ती धरिये । प्रथमहिभक्ति आप जो करिये ॥
दुतिये औरनसे करवावै । पुनि लखिभक्ति करत हरषावै ॥
नौथा भक्ती बहुरि बखानो । श्रीनो कीर्तन सुमिरन जानो ॥
सेवा अरु अर्चा पुनि वंदन । दाससख्यपुनि आत्मनिवेदन ॥
पुनि बारह प्रकारकी भक्ती । प्रथमै संतन संगत युक्ती ॥
पुनि हो भक्तन कृपाके लायक । ऐसे करिये कर्म सुभायक ॥
तृतिये भक्तन चरित जो आही । श्रद्धा अरु निश्चय तेहि माही ॥
चौथे हरिचरित्र सुन काना । पंचम सुनत प्रेम अधिकाणा ॥
षष्ठम हरि निजरूप निरताये । जस अद्वैत बाद बतलाये ॥
सप्तम प्रीति माह नित गाढ़े । अष्टम प्रभु प्रकाश उर बाढ़े ॥
नौमै सकल विकारहि त्यागा । हरिगुन आपमें आवन लागा ॥
सर्वज्ञता होय पुनि दशमै । ग्यारहे सब हरि गुनहो इसमें ॥
बारहे निजु तम हरिकी प्रीति । सकल भर्मभय जीवकी बीति ॥
तीन प्रकार भक्तिको भेवा । प्रथम कीजिये गुरुकी सेवा ॥
तन मन धनसे प्रीति लगावै । गुरुकी सेवा सब सुख पावै ॥
दुतिये साधुन सेवा अहई । ताते जीव परमपद लहई ॥
तृतिये जप तप कीन प्रमाना । निर्गुणसर्गुण भक्ति त्रिधाना ॥
अगुण सगुण जो भक्ति उचारा । स्वसंवेद थापे दोहु बारा ॥
दोहुते पार भक्ति जो गहई । परम पुरुषकी भक्ति सो अहई ॥
ब्रह्मा भक्ती शिवकी भक्ती । रामकृष्ण विष्णु अरु शक्ती ॥
निर्गुण भक्ति योगेश्वर धारी । पुरुष भक्ति इनतेहैं न्यारी ॥
जैते भक्ति जकत में कीना । सबही जानिये गुरु आधीना ॥
प्रथमै निश्चय गुरु की करई । निश्चयबिन कछु काज न सरई ॥
सबही धर्मकेरि समताई । गुरु निश्चय बिनमुक्ति न पाई ॥
५१
जीवधर्मबोध
( १९५९ )
धर्म महम्मदमें बतलाये । निश्चय तरुपर गुरु बैठाये ॥
निश्चय माह गुरुका बासा । बिन गुरु निर्गुण नर्कनिवासा ॥
निश्चयमें जब सदगुरु बैठे । जिवके हृदय ज्ञान तब पैठे ॥
जिनके हृदये निश्चय नाहीं । तो सबही निगरे नर आही ॥
द्रन्द्वते भया सकल संसारा । द्रन्द्वहि तासु छोड़ावन हारा ॥
पुरुष नारिको भया जो मेला । ताते जगको पसरा सेला ॥
तैसे जब गुरु शिष्य मिलजाई । सकल भर्म भय जाय नसाई ॥
बिन गुरु जीव राह नहीं पावै । जप तप दान बुथा सब जावै ॥
गुरुके बचन चरन चित दीजै । कबहू ताहि उलंघ न कीजै ॥
करिये गुरुकी सदा बड़ाई । गुरुअस्तुति सब अघ बिनसाई ॥
निशदिन ताहि सेवामें रहिये । ताते अधिक न तप कोह कहिये ॥
तन मग धन गुरु अर्पन करना । गोखुरसो भवसागर तरना ॥
गुरु निरुद्ध करिये जो कर्मा । होय शुद्धपै तजे अधर्मा ॥
सत्यकबीर बचन
साखी-कबीर गुरुबिन माला फेरत, गुरुबिन देते दान ।
गुरु बिन दाम हराम है, पूछो वेद पुरान ॥
गर्भयोगेश्वर गुरु बिना, लागा हरिकी सेव ।
कहै कबीर बैकुण्ठते, फेरि दियो शुक्रदेव ॥
कबीर गुरुबिन भर्मा, यौ फिरे ज्यों रामकोरोझ ।
सतगुरुसे परचै भई, पाया हरिको खोज ॥
कबीर जो निगुरा सुमिरन करे, दिनमें सौ सौ बार ।
नगर नायक सत करे, तौ जरे कौनके लार ॥
गुरु आज्ञा निरखत रहै, जैसे मणिहि भुअंग ।
कहै कबीर संसारमें, यह गुरु मुखको अंग ॥
गुरुकी आज्ञा आवई, गुरुकी आज्ञा जाय ।
( १९६० )
बोधसागर
५२
कह कबीर सो सन्त है, आवागौ न नशाय ॥
कबीरगुरु मानुषकरि जानते, चरणामृतको पान ।
ते नर नरकहि जायँगे, जन्म जन्म हो श्वान ॥
कबीरते नर अन्ध हैं, गुरुको कहते और ।
हरि रूठे तो ठौर हैं, गुरु रूठे नहिं ठौर ॥
कबीर गुरु है बड़े गोविन्दते, मनमें देख बिचार ।
हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥
कबीर गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीश दीजिये दान ।
केतिक भाँड़ पचिसुये, राखि जीव अभिमान ॥
कबीर तीन लोक नौरखंडमें, गुरुते बड़ा न कोय ।
करता करे न करि सकै, गुरु करे सो होय ॥
चौपाई
गुरुके लक्षण चार बखाना । प्रथमहि वेद शास्त्रको ज्ञाना ॥
पुनि हरि भक्त मनो क्रम बानी । तृतीये समदृष्टी कहि गानी ॥
चौथे वेदकी विधि सब कर्मा । यह चौ गुरुगुन जानो मर्मा ॥
मुख्य एक गुन गुरु कहि दीजै । चेलेको हरि सन्मुख कीजै ॥
गुरुको अर्थ अज्ञ तिमिराना । रू जाते प्रकटे हिय ज्ञाना ॥
दूर करे जो अज्ञ अघेरा । गुरु नाम ताही को टेरा ॥
ऐसहि शिष्य धर्म चौ भनते । गुरुकी सेवा तन मन धनते ॥
दुतिये सेव मैं विषयको त्यागे । तृतीये मन हंकार न जागे ॥
चौथे गुरुके वचन प्रतीती । जो कोइ गहै चलै यम जीती ॥
शिष्यको दोय धर्म सर्वोपर । गुरु सेवा वाती निश्चयकर ॥
जामें दोय धर्म ये बसि हैं । गुरु असीबते सब गुन लसिहैं ॥
आठ गुरु जो कीन प्रमाना । सबहि श्रेष्ठ अति उत्तम जाना ॥
सर्वोपरि दीक्षा गुरु भाषी । जाते भक्ति मुक्ति पद राखी ॥
५३
जीवधर्मबोध
( १९६१ )
गुरु गोविंद दोउ एक स्वरूपा । बिलु गुरु परा जीव भ्रमरूपा ॥
बिन गुरु कोई विद्या नहिं आवै । अलख अभेद सो कैसे पावै ॥
बिना निशाने तीर चलावै । अंध समान ठौर नहिं पावै ॥
अच्छे गुरुके दूँढन मांही । निगुरा रहन भलो कछु नाहीं॥
जो कोई कर्म धर्म बतलाये । सो गुरु करि लीजे मन भाये ॥
बहुरि जहां उत्तम गुरु पिये । ताके चरननमें चित लैये ॥
जो दृढ हो सांचा गुरु दूँढा । निश्चय लहै गहै पद गूँढा ॥
गुरु बिन अज्ञ रहै नर कैसे । मानुष ज्यों पशु देखी जैसे ॥
जो मानुष हो गुरु बीहीना । सो जड़ पशु पंछी ते दीना ॥
पशु पंछी जेते जगमांही । बिन गुरु सबही ज्ञान गहाही ॥
निज पितु मातु ढंग सब धरही । बिना सिपाये सब कछु करही ॥
बिनगुरु करहि कर्म विधि नाना । नरके कबहुँ आव न ध्याना ॥
नर सब जिवते अबला बहूता । गुरुद्वारे पावै बल बूता ॥
शिष येते पशुहू सिपि जाहीं । मनुष सो ज्ञान होय तेहि नाहीं॥
गुरु द्वारे नर सो गुन पावै । नरते सो ईश्वर है जावै ॥
यहि विधि नर है गुर आधीना । करिये कर्म कर्म हो छीना ॥
कर्म कीजिये सतगुरुसङ्ग । तब उर उपजै ज्ञान अभंगा ॥
दोहा-गुरुव्रानी रविकर निकर, कर उर शिष्य प्रकाश ।
ज्ञानदीपके जगमगे, भयौ धर्मको नाश ॥
चौपाई
सर्वोपरि गुरुकेर महातम । बिनगुरुकोलखि पावै आतम॥
गुरुकी सेवा गुरुकी पूजा । गुरुसमान कोइ देव न दूजा ॥
गुरुके चरनन जिन चित दीन्हा । आतमपरमातम तिन चीन्हा॥
गुरुकी कृपा हनै सब शोका । सोई सुखदायक दोहु लोका ॥
रामकृष्ण गुरुके गुन गायौ । ताके चरननमें चित लायौ ॥
नं. ११ बोधसागर - ७
( १९६२ )
बोधसागर
५४
संत कबीर गद्गौ गुरु चरना । बारबार ताको जस वरना ॥
गुरु करिके जो दांष लगावै । सूकर श्वान केर तन पावै ॥
नारद गुरुको दोष लगायौ । चौरासी ताको भरमायौ ॥
पूरव कथा यह कागभसुंडर । उठिकेन्हिप्रनाम गुरुकोकर ॥
नाथ करत शिवमंदिर मांही । गुरु तासुचलिआयौ ताही ॥
गुरुको देखि न सो सनमाना । निरखि अर्नात शंभुरिसियाना ॥
भै अकाशबानी तेहि काला । रे खल तैं गुरुधर्म न पाला ॥
धरु जड़ माहस सर्प शरीरा । गुरु अपमान पाव बहुपीरा ॥
एक बार पथकी यह बाता । बद्रिकाश्रममहिमें चलिजाता ॥
जाता दीख महि पंथ दुहेला । एक गुरु ताको एक चेला ॥
परम प्राति निजु गुरुसे धरई । चरनामृत बिन भोग न करई ॥
लागे तहां पहारको पानी । खेदते दुःखित गुरु कह जानी ॥
गुरुकी सेव शिष्य सो त्यागा । गारी देना ताहिको लागा ॥
गुरुहि दुखी तजिके चलि गेऊ । बद्रिपतिकी मारग लियऊ ॥
तहैंते पलटिके सो जब आई । कुष्ठवरन ताके तन छाई ॥
बाटहि माह कुष्ठ भरि मारा । यह चरित्र निज नैन निहारा ॥
गुरु निरादरको जिमि पापा । तिमि सेवाफल अगिनित थापा ॥
कॉटिन जप तप करे जो कोई । गुरुविहीन सब निरफल होई ॥
मुनि सुकदेवसे को बड़ि ज्ञानी । गर्भते योगमुक्ति जिन ठानी ॥
तपबल सो वैकुण्ठ सिधाया । बिन गुरु तहां रहन नहि पाया ॥
गुरुकी निंदा करे जो प्रानी । घोर नरकमें वासा ठानी ॥
गुरुते ईर्षा जो जड़ करिहै । सो यमदंड भांति बहु भरि है ॥
गुरुकह बड़ गोविंदते कीन्हा । जाकी कृपा गोविंदहि चीन्हा ॥
गुरुसम और न दूजा दाता । सबको मन वेदन विरुथाता ॥
रिद्धि सिद्धि गति मुक्ति अमाया । बिन गुरु दया न कहुँ कछु पाया ॥