कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
उग्रगीता
( २१ )
रोवै बहुत भांति तेहि कारण । सुये न जीवै बहुत पुकारण ॥ प्रभु हिरदय नहिं सूरख जाने । मृतक आशा लागि भुलाने ॥ मृतक रोवैं भला न मानै । फिर यमराजा संकट ठानै ॥ लोगन घरतै बाहर कीन्हा । की जारै की माटी दीन्हा ॥ मृतक रूप बनी यह देही । करि ले प्रीतम प्रेम सनेही ॥ जगके बन्धन जगमें छूटै । बहुत त्रास तेहि यम धरि लूटै ॥ इन मों कहा मोह चितलाया । प्रभु इच्छा नहिं सूरख पाया ॥ काकर पिता पुत्रको होई । नारी सुत हित लागे सोई ॥ ता कारण यह दुख सुख मानै । अज्ञानी नहिं प्रभुको जाने ॥ कबहु न सुमिरण प्रभुका करई । निशिदिन ज्ञान ध्यान परिहरई ॥ ताते बहुत भांति दुख पावै । प्रभुकी शरण न कैसेहु आवै ॥ यह तौ लक्षण जग व्यवहारा । ताते बूड़े मूढ गवौरा ॥ अर्जुन कर्म योग है नीका । संशय मेटो सकलौ जीका ॥ कर्म करै शिर अपने लेई । कारण करतामें चित देई ॥ आपन कर्म धर्म नहिं छोडै । दुख सुख प्रभु इच्छा शिर वोडै ॥ सदा अनन्द रहै सुख बासा । अन्तकाल वैकुंठ निवासा ॥ क्षत्रिय धर्म तोहार जौ होई । करौ संहार शत्रु पुनि सोई ॥ तुम्हारे लरे सबै कोइ लगि हैं । ना तो निंदा तुम्हरी करि हैं ॥ धर्म छांड़ि जनि पातक लेहू । युद्ध करनको मन चित देहू ॥ कर्म संन्यास पञ्च अध्यायी । अर्जुन सुनि मन दुविधा आयी ॥ युद्ध करो की ज्ञान विचारौ । केहि विधि अपनो जीव उबारौ ॥
कबीर उवाच
धर्मदास यह काल तमासा । तासो चाहै मुक्ति निवासा ॥ ज्ञानी अज्ञानी भरमावै । धर्म अधर्म दोष ठहरावै ॥ धर्म अधर्म काल की पाशा । ताते न्यारा शब्द प्रकाशा ॥ कर्म अकर्म मध्य है सोई । तुम जाने जाने सब कोई ॥
( २२ )
बोधसागर
सद्गुरु संधि लखै को पारा । निराधार है अधर अधारा ॥
छन्द-गमि अगमि सद्गुरु लखायो निअक्षर सो पास है ।
कली फूलैं बास धावै ऐसो शब्द निवास है ॥
फूल तिल जब संग कीन्हों सुवस बासा तब भई ।
हंस बासा शब्द लीन्हो शब्द रूपी सो सही ॥
सोरठा-शब्द मता है सार, सुर नर सुनि जानैं नहीं ।
अंधा अध अचेत, अंधेरे न सुरति आने नहीं ॥
इति श्रीमदुभगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
कर्मसंन्यासग्याख्यानो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
श्रीकृष्ण उवाच
छठे अध्याय ध्याय है योगा । सुनु अर्जुन मैं कहौ संयोगा ॥
जब लगि ध्यान योग नहिं करई । तब लगि निर्मल चित नहिं करई ॥
ध्यान योग योग निजु साधै । मन वच कर्म नाम अवराधै ॥
मन संकल्प विकल्प न जाके । दीन वचन कठोर न ताके ॥
निस्तरंग कछु उठै न इच्छा । सबमें पारब्रह्म उत पेच्छा ॥
पांच पचीश न कबहूँ धावै । निशिबासर प्रभु संग रहावै ॥
पांचौ इंद्रिय लिप्त न होई । ऐसे साधु विरले कोई ॥
गृहस्त जीवन में बासा लेई । उत्तम ठौर कुटी कर देई ॥
मानुष तहां दृष्टि नहिं आवै । आसन उत्तम तहां बिछावै ॥
प्रथम धरणी पर धरे मृगछाला । तापर कुश साथरी रसाला ॥
तेहि पर बैठे हठ करि आसन । कैसो भांति न होइ उदासन ॥
खंभा सम आसब हठ आसन । सुरतिनिरति ले नाम संभारन ॥
जो यतने में आतम दरसइ । सो ज्ञानी प्रभु पूर्ण परसइ ॥
ऐसे जो कोई ध्यान लगावे । बहुरि योनि संकट ना आवे ॥
उग्रगीता
( २३ )
साधै निद्रा हार व्यवहारा । बहुत न मूदे नैन उघारा ॥ संयम कै सो साधन करई । सो साधू आपहि निस्तरई ॥ मन कह ज्ञान ध्यान में राखै । सुरति निरति सो अमृत चाखै ॥ जो मन अन्त न धावा चाहे । घेरि घेरि अभ्यन्तर बाहे ॥ तब अर्जुन अस पूछन लागे । यह मन चञ्चल पल पल भागे ॥ यह तौ काहू जाइ न पकरा । कौन उपाय जाइ मन जकरा ॥ गगन वाइ जो गर्जत आवै । कैसे गगरी माहि समावे ॥ यहि विधि मन चञ्चल यह भाई । तौ कैसे यह पकरन पाई ॥
श्रीभगवानुवाच
कृष्ण अर्जुन सो कहेउ बुझाई । ऐसे चञ्चल अस्थिर भाई ॥ जो यह मनको साधन करई । अभ्यन्तर लै फिरि २ धरई ॥ चारों दिशा चलन नहि पावै । जबै चलै तब माह समावे ॥ पारब्रह्म देखै तब नेता । दोई अनन्द परम सुख चैता ॥ दीन दुखित कह दाया करई । अपनासा दुख चितमें धरई ॥ दया भावसो हितकर बोले । तूस करै साधुन कह सो ले ॥ परका दुःख नेवारै सोई । ऐसी भक्ति परम गति होई ॥
अर्जुन उवाच
अर्जुन कहै सुनु कृष्ण सुरारी । तारण तरण भक्त हितकारी ॥ ऐसा साधु कोइ ना देखा । आपनसा दुख सब कहपेखा ॥ आपन सुख चाहे सब कोई । औरन दुःख होय सो होई ॥
श्रीभगवानुवाच
अर्जुन जो है परम सनेही । आप निकरि नहि जानहिदेही ॥ पर सुख कारण आपु निरासा । दुख सुख देखै सकल तमाशा ॥ भक्ति करै जो मन चित लाई । ताते परम पदहि में जाई ॥ निर्गुण साधु जो पूर्ण ज्ञानी । ताकी महिमा वेद बखानी ॥ वेद पुराण ते अधिक है सोई । ताकी पटतर वेद न होई ॥
( २४ )
बोधसागर
वेद भाव संसार पसारा । परमभक्ति है अगम अपारा ॥ तुम हू भक्ति करौ मन लाई । छांड़ौ माया मोहहि भाई ॥ छठौ अध्याय इहां लगु कहिया । आतम संयम योग जो रहिया ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर यह आतम जानी । इतने अधिक बखानों ज्ञानी ॥ धर्मदास तुम ज्ञान उजागर । तुम तौ बसि हौ सुखके सागर ॥ यह करनी जो कृष्ण बखानी । यह विधि धरै आतम ज्ञानी ॥ मैं तो ज्ञान अगम तोहि दीन्हा । काल कर्मको पापउ चीन्हा ॥ ताते हंसा हट करि लेऊ । अगम अगोचर दीन्हेट भेऊ ॥ यह मन चञ्चल थिर नहि होई । कैसिहु विधि जो चाहे कोई ॥ ताकी विधि मैं प्रगट सुनाऊँ । मनुवां इस्थिर करि दिखलाऊँ ॥ यह मन पानी रूप सरूपा । बुद्धि धाम पृथ्वी कर रूप ॥ चित जो वाइ सरूपी होई । अहं अज्ञानी रहै समोई ॥ पानी मही बराबरि भाई । चित्त पवन लै आहु उठाई ॥ ज्यों २ पवन चले झक झोलै । त्यों२ मनुवाँ चहुँ दिशि डोलै ॥ ताते यह उपचार सुनाऊँ । मनुवाँ कह अंतर ठहराऊँ ॥ मनु पावना लै त्रिकुटी लेखै । अक्षर सुरति अमीरस चारै ॥ जौ लौ पवन रहित नहि होई । तबलगिमनअस्थिर नहि सोई ॥ गगने पवन रहै पुनि भाई । त्रिकुटी गागरि लेइ समाई ॥ पानी पवन संच जब होई । ब्रह्म अग्नि उपजावै सोई ॥ मन औ पवन होइ जब मेल । परम पुरुष ते होइहि मेल ॥ ना कहुँ आवै ना कहुँ जाई । तब यह मनुवां सहज समाई ॥ छन्द—चलत मनुवाँ अचल कीन्हो पवन अस्थिर जब भई । मन पवन जब मला भया अमृत धारा बर्षही ॥
उग्रगीता
( २६ )
जिन्है सतगुरु शब्द मिलिया अमी सो हंसा पिया । अजर अमर शरीर पायो बास सुख सागर लिया ॥ सोरठा-संत करो विवेक, शब्द सार गहु बूझिकै । सुरति निरति सो देख, सतगुरु शब्द अपार जो ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण उवाच
कृष्ण कहैं अर्जुन सुनि लीजै । भक्ति हमारी मन चित दीजै ॥ सतये अध्याय जो तुमसों कहउँ । भक्तनमें हितकारी रहउँ ॥ मैं ही करौं करावौं भाई । तीनि लोक जहँ लगि निर्माई ॥ मैं संधारौं मैं प्रतिपारौं । चौदह भुवन पलकमें टारौं ॥ जहँ लगि पशु पक्षी जिव होई । मैं सबही मैं रहौं समोई ॥ दानपुण्य आदिक सब माहीं । बनज व्यापार करै सब पाहीं ॥ देवी देव सकलौं मैं सब ही । भवसागर सकलौं जग हम ही ॥ तीनि लोकमें विजय मैं सारौं । जब चाहौं तब बेर संधारौं ॥ करौं संधार सृष्टि पुनि सोई । रहौं अलेप निरंजन होई ॥ सगुणते निर्गुण मैं होइ जाऊं । फिर चाहौं सगुण होइ जाऊं ॥ सगुण औ निर्गुण रूप हमारा । जहिंते सृष्टि रच्यो व्यवहारा ॥ अर्जुन सबमें मोही जानो । कहा हमारा निजकै मानो ॥ चारि प्रकार भक्ति जो होई । तामें ज्ञानी अधिक सो होई ॥ रोग दुःखमें भक्ति जो करई । दुख कारण जो मोहि सुमिरई ॥ दीन दुखी निशिदिन लव लावै । कब प्रभु मोकहैं भोग भोगावै ॥ द्रव्य चहै जो द्रव्यहि स्वारथ । ज्ञानी चाहै मुक्ति पदारथ ॥
( २६ )
बोधसागर
ज्ञानी सदा मोहि पहिचानै । मेरी भक्ति सदा सुख मानै ॥ ज्ञानी अधिक ताहिते होई । भक्ति हि हेतु अधिक है सोई ॥ अज्ञानी मोहि नर ही जानै । अलख रूप मोहि नहिं पहिचानै ॥ पूर्ण ज्ञान होइ जब भाई । तब ही निर्गुण अलख लखाई ॥ देवी देवा सब नर पूजै । तिनहींको करता करि बूझै ॥ उनकी प्रीति देव होइ जाऊं । उनकी मनकामना पुराऊं ॥ कोइ न बूझै ख्याल हमारा । रहउँ सृष्टि पुनि करें संघारा ॥ ज्ञान विज्ञान योग जो होई । सतवांध्याय सुनायो सोई ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर जगकरता आही । धर्मदास तुम चीन्हौ ताही ॥ पुरुष तीन लोक यह दीन्हा । तीनिहुँ लोक राज इन कीन्हा ॥ सब जग माँहि कर यह राजू । मन इच्छा कर सबका काजू ॥ इनते मुक्ति कहौ कस होई । देखहु आतमज्ञान कैसोई ॥ इनते मुक्ति होइ जो साजा । देह धरावै कवने काजा ॥ धर्म अधर्म जीव अरुझाया । आवागमन महा दुख पाया ॥ आवागमन न छूटै भाई । तीनिलोक राखै लपटाई ॥ धरि अवतार जबै जग आवै । सकल सभा ऐसी हि भरमावै ॥ सृष्टि जहां लगि है संसारा । ऐसी भांति सब अवतारा ॥ काहू मुक्ति होइ नहिं भाई । राम कृष्णते को बड आही ॥ उनहू आवागमन न छूटै । धर्मराज फिरि २ जग लूटै ॥ धर्मराज यह खेल पसारा । औघट घाट मूँदि सब द्वारा ॥ तीन लोक ते जाने न पावै । स्वर्ग मृत्यु पाताल रहावै ॥ धर्म कर्म ते स्वर्ग हि जाई । धर्म घटे मृत्यु मंडल आई ॥ जैसे घरिया रहट सुभाऊ । ऊँचे नीचे फिरि २ आऊ ॥ बन्धनते छूटै नहिं पावै । ऐसे जीव सदा भरमावै ॥
उग्रगीता
( २७ )
सद्गुरु चौथे लोक निवासा । मिलै अँकुरी जो निजदासा ॥ सार शब्द है तेहि पहुँचाऊँ । तीनि लोक बन्धन मुक्ताऊँ ॥ पावै सार शब्द निज बीरा । पहुँचै लोक जब छुटै शरीरा ॥ यमराजा तेहि निकट न आवै । चौरासी ते जीव छोडावै ॥ सार शब्द गहै निज डोरी । उतरे हंसा घाट करोरी ॥
छन्द-धर्म सेवा बहुत कीन्हो पुरुष दीन्हो राज हो ।
लोक तीनों राज पायो गर्वते अति गाज हो ॥
घाट अवघट सबै भूँदो कतहुँ नाहिं निकास हो ।
पुरुषते दुइ ठानिकै सब जीव राखो पास हो ॥
सोरठा-ऐसी युक्ति बनाई, पाप पुण्य फंदा रच्यो ।
चले लोक सो जाइ, सद्गुरु शब्द प्रताप जेहि ॥
इति श्रीमदुग्रगीताज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथ अष्टमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
अर्जुन कहै सुनौ प्रभु मेरे । मैं तो अधीन सदा हौं तेरे ॥
कहौ बखानि ब्रह्मको आही । सो निज भेद कहौ मोहि पाही ॥
अध्यातम तुम कहौ बुझाई । कर्म नाम काहैको रहाई ॥
अदभुत रूप बखानौ सोई । कछु मोसों जनि राखौ गोई ॥
अर्धनाम कहावै सोई । अर्धनाम जग काकर होई ॥
श्रीकृष्ण उवाच
कहैं कृष्ण सुनु अर्जुन भेदा । तुमसों कहौ मैं वेद निषेदा ॥
ब्रह्म सदा जो रहै अविनाशी । और स्मृष्टि सकलौ पुनि नाशी ॥
रहित नाम अविनाशी होई । पूरण ब्रह्म व्यापक है सोई ॥
( २८ )
बोधसागर
ना कहुँ आवै ना कहुँ जाई । सब घट माही रह्यो समाई ॥ नहीं टण्टि देखन महाँ आवै । सकल सृष्टिके माहिँ रहावै ॥ रूप वरण कछु वरणि न जाई । कोटि सूर्य तेहि तेज समाई ॥ तिनका नाम सदा अविनाशी । रहै निरंतर अंतरबासी ॥ अक्षय है सब जक्त पसारा । व्यापक रूप रहा भरभारा ॥ तिनकी भक्ति करे जो कोई । आवागमन कबहुँ नहिँ होई ॥ अध्यात्म आत्म सो ज्ञानी । सबमें ऐकै ब्रह्म समानी ॥ कर्म नाम करता है सोई । दुख सुख कारण करता होई ॥ अद्भुत रूप सरूप है भाई । तेहि समान रूप नहिँ भाई ॥ कोटि सूर्यको तेज समाही । अर्द्धदेव सब देवन माही ॥ रहो समाइ जो सकलौ छाई । अर्द्धनाम सकलौ जग लेई ॥ व्यापक सदा सकलमें सोई । महा प्रलय जब आवै भाई ॥ लै सौ वर्ष अवधी रहई । रेनि दिवस छै मास जो होई ॥ दिवस एक देवन कर सोई । छः मास अवर जब जाई ॥ राति एक ताकर होइ भाई । ऐसे वर्ष दिवस नर होई ॥ दिवस एक देवनकर सोई । तासे मास वर्ष गनि लेई ॥ ऐसे वर्ष देवकर कहिया । अहनिशि एक ब्रह्म पुनि तहिया ॥ दिवस एक ब्रह्माकर होई । चारि पहर चारिउ युग सोई ॥ रातिउ ऐसे जान सुभाऊ । बरतै चारिउ युग पर भाऊ ॥ दिवस औ राति जब ऐसो जाई । पक्षमास पुनि वर्ष कहाई ॥ सात वर्ष ब्रह्मा पर वानी । काल आइ सो करै तब हानी ॥ ब्रह्म प्रलय जब आवइ भाई । रोमस रोम परै खहराई ॥ जब २ प्रलय काल जब आई । एक रोम रोमस गिरिजाई ॥ बहुत प्रलय ऐसे चलि गयऊ । आदि अंत काहुँ नहिँ पयऊ ॥ अष्ट अध्याय जो कहा बखानी । अक्षर ब्रह्म योग है ज्ञानी ॥
उग्रगोत्रा
( २२ )
कहै कबीर सुनु धर्मनि धीरा । ब्रह्म भेद तुम गहिर गभीरा ॥ जो यह कछु प्रभाव बखाना । पै निर अक्षर भेद न जाना ॥ जो निर अक्षर भेद न जानै । कैसे सार शब्द पहिचानै ॥ जो निर अक्षर भेद हि पावै । सो त्रिलोक बंधन मुक्तवै ॥ अक्षर सार अपार जो होई । बिनु सत गुरु पावै नहि सोई ॥ सतगुरु मिलै शिष्यको जबही । सार शब्द पावै पुनि तबही ॥ हंस रूप ताकर पुनि होई । सो तौ हंस निनारा सोई ॥ यह जाने नहि ताकर भेदा । कितनौ पढ़ै नर चारिउ वेदा ॥ सार शब्दका मर्म न पावै । सो कैसे सत्यलोक सिधवै ॥ जो मानै तेहि लोक पठाऊ । सार निरक्षर अलख लखाऊ ॥ खान प्रवान शब्द टकसारा । यमको चीन्है उत्तरे पारा ॥ घटवारा जब पावै चीन्हा । तब हंसन कह आवै दीन्हा ॥
छन्द--सुरतिमंत जो हंस होवै ताहि दीजै पान हो । नत दशौ दिशा घाट रोकै मागि शब्द निशानि हो । देखि हैं जब शब्द सांचा चीन्ह पावै लोकको । अपने कंधे तेहि उतारैं मेटि संशय शोकको ॥
सोरठा--धर्म हमहि सो कौल, कीन्हो अति आधीन हो । हंस शब्द सत बोल, निमिष माहि पहुँचाइया ॥
इति श्रीभदुग्रगीताम्बराज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादस्य-
रयोगव्याख्यानोनामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
अर्जुन शास्त्र मतो है नीका । कर्म धर्म सब कारज जीका ॥ शास्त्र वेद पुरान जो आही । मन वच कर्म अर्जुन गहु ताही॥
( ३० )
बोधसागर
बहुत लोग मानुष मोहि जानै । दुख सुख व्यापक माही सानै ॥ बड़े भाग सो प्रानी होई । अन्तर पवन रहौं मैं सोई ॥ पवन सकल में बतै भाई । बाहर भीतर फिरै सदाई ॥ लित होइ पुनि रहै निनारा । ऐसा अदभुत खेल हमारा ॥ बहुत साधु एक करि पूजे । सर्व मध्य आत्म कहबूझै ॥ बहुतक प्रीति भाव जो जानै । साहेब सेवा हित कै मानै ॥ बहुतक तीनो देवन मानै । अवर सकल मिथ्या करि जानै ॥ मोकहयहि बिधि जो कोइ ध्यावै । तेहि विधि माह परम सुख पावै ॥ सर्व व्यापक मैं हौं भाई । मोहि विन दूजा और न कोई ॥ मेरे मित्र दुष्ट नहिं कोई । जो ध्यावै पावै पुनि सोई ॥ एक भाव मैं सबसो रहेऊ । जैसे अग्नि भाव सो कहेऊ ॥ जबै काल जड़ आवै भाई । बैठे लोग तापन कह आई ॥ चहुँदिशि लोग अग्नि बिच होई । सब तापै काया नर लोई ॥ अग्नि काहु कै मित्र न जानै । और न काहु दुष्ट हि मानै ॥ सब कह लागै एक सम भाई । ऐसे रहौं मैं सहज समाई ॥ जो कोइ पूजा देवन लावै । सो नर देव के लोक सिधावै ॥ जो ऐसा होइ भक्त हमारा । ता कह पठवउँ स्वर्ग दुवारा ॥ जो कोइ मोसे चित्त लगावै । सुख संपति बहु शोभा पावै ॥ ऋद्धि सिद्धि बहुतैं कै देऊं । आपन कै मैं ताकह लेऊं ॥ सदा सर्वदा बात न हेरूं । दुख संताप ताहि कर फेरूं ॥ अर्जुन परम भक्ति मोहि भावै । जो कोइ मोसों मन चितलावै ॥ नौ अध्याय इहां लगु होई । राज योग गून है सोई ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । बहुविधिकृणजो करै तमासा ॥ कर्म धर्म कहि जग समुझावै । अलक पुरुष कैसे लखि आवै ॥
उग्रगीता
( ३१ )
ज्ञानवंत तुम धर्म निआगर । सत सुकृत गहु परम उजागर ॥ करौ विचार संतकी रीती । मन वच करु सतगुरु परतीती ॥ इन्ह तौ शास्त्र ज्ञान विचारा । कम फंद जीवनह सब डारा ॥ कोइ भक्ति जो इनकी करई । ऋद्धि सिद्धि सुख संपति लहई ॥ बहुत भांति तेहि देइ बड़ाई । राज पाट इन्द्रासन लाई ॥ आवागवन न मेटा जाई । बहुविधि चीन्हो मन चितलाई ॥ दाता भुक्ता होवे आपै । पै कोऊ नहि छूटा पापै ॥ आवै जाइ सकल जग लोई । कबहुँ न छूटै बंधन सोई ॥ बहुविधि चीन्हो मन चितलाई । आवागवन न मेटा जाई ॥ बंधन सतगुरु तुम्हरो तोरा । तुम कह नहि व्यापै यमचोरा ॥ सतगुरुका है पंथ अपारा । जो बूझैं सो उतरे पारा ॥
छन्द-धर्मदास तुम बूझि देखो भेद सतगुरु अगम है ।
तीनि लोक अरुझाइ कारण वेद शास्तर सो कहै ॥
बूझि देखो अंग सब मैं आयों तोरन फंदको ।
हंसको मुक्ताय यमसो मेटिहौ दूख द्वंदको ॥
सोरठा--सतगुरु शब्द अपार; वार पार कोइ ना लहै ।
हंस शब्द आधार, ताहि मुक्ति पाछे फिरै ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
राजदिवाराजगुणयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण उवाच
महाबाहु अर्जुन सुतु भाई । दस अध्याय कहेउँ अर्थार्ई ॥ विभूति योग मैं तोहि सुनाऊं । सकलरूप तोहि वरनि सुनाऊं ॥ जल थल पूरण मैं ही व्यापो । कीट पतंग सर्वमें आपो ॥
( ३२ )
बोधसागर
मेरी गति मति कोइ न जाने । सबै सृष्टि नारायण मानै ॥ ऋषि मुनि देव देवता भाई । उनहू मेरी गति नहिं पाई ॥ मैं तो गति मति सबकी जानौं । व्यापि रह्यो मैं सकल जहानौं ॥ देवि देवता आदि जो मैं ही । ऋषि मुनि सृष्टि अवतार जु लेही ॥ मोहिते आदि और नहिं कोई । सबके आदि करा रचि सोई ॥ पिताकी खबरि पुत्र नहिं जाने । कैसे पितुकी आदि बखानै ॥ आदि अन्तको मेरी पावै । जग रचना सब पुत्र कहावै ॥ विभूति रूप संक्षेप जो कहिया । अर्जुन पूछ कृष्ण पुनि कहिया ॥ सब व्यवहार विभूति सुनावौ । रंचक मोसे कछु न दुरावौ ॥ कृष्ण कहै सुनु कुंतिकुमारा । तोसों कहौं सकल विस्तारा ॥ पहिले सकल जोति जग जो है । शाशि सूर्यकी कीरनि मोहै ॥ सूर्य रूप मेरो है भाई । दूजा भाव जनावौ जाई ॥ शीतल पूरण निर्मल चंदा । है मेरो यह रूप अनंदा ॥ बलीदान यज्ञ जो ठानो । बावन रूप मेरो पहिचानो ॥ सिरजा पवन सबै सुखदाई । मैं ही पवन रूप हौं भाई ॥ चारि वेदमें साम जो वेदा । मेरो रूप सुनो तुम भेदा ॥ व्यास रूप मेरो है भाई । नारद भाव धरउं मैं आई ॥ देवन माहिं इन्द्र पुनि मैं हौं । दानी बलिराजा सो मैं हौं ॥ विषधर माहिं वासुकी हम ही । ईश्वर माहिं महेश्वर हम ही ॥ इन्द्रिय भुक्तौ मनसो मैं ही । राजन माहिं राज करौं मैं ही ॥ मिरगन्ह मध्य सिंह गति मेरी । वृक्षनमें पिप्पल मोहिं हेरी ॥ नदी माहिं हम ही हैं गंगा । समुद्र रूपमें लहरि उतंगा ॥ मुनिवर कपिल हमी हैं भाई । परशुराम योधा हौं भाई ॥ नरसिंह रूप जो मेरो होई । रामचन्द्र तन रूप जो सोई ॥ दत्तात्रय आनंदित रहऊं । ऋषिन मध्य पाराशर अहऊं ॥
उग्रगीता
( ३३ )
जल जीवन जलसाइ कहाई । मेरो रूप सुभाव रहाई ॥ ज्वारिन महाँ मैं जुवा कहावा । जुवा रूप मेरो रूप सुभावा ॥ जहाँ लगि जगमें होइ लराई । मेरो रूप लराई भाई ॥ जग परपंच जहां लग होई । परपंच रूपमें रहौं समोई ॥ वाद विवाद करै जो ज्ञानी । वाद रूप मोकहैं पहिचानी ॥ शंकर रूप मोर है भाई । मृत्युकालमें रहौं समाई ॥ पाप पुण्य धारौं दुइ देही । कर्म धर्म रचना है एही ॥ जग रचना विभूति मेरी होई । जल थलमें मैं रहौं समोई ॥ कहैं लगि वणौं वरणि बखानौं । सब वसुधामें मोहीं जानौं ॥ मोहिं छोड़ि कोइ और न दूजा । तीन लोकमें मेरी पूजा ॥ देवी देवता पूजा लावैं । सो सब पूजा मैं कहलावैं ॥ विभूति रूप अध्याय है दशवां । इह लगि भाव बतायउँ दशवां ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनौ चितलाई । धर्मदास तुम लेहु अथाईं ॥ तीनि लोक नायक भगवाना । तिन कह पुरुष दीन्ह रजधाना ॥ ताते क्रीडा करै अनंदा । खेल अनेक खेल गोविंदा ॥ तीनि लोक बाजी दइ राखा । परपंची अपने मुख भाखा ॥ सत्य कहइ सत्य भाव लखावै । करि प्रपंच जीवन भरमावै ॥ जीव जो मूल बीजके आही । इन पाया सब पुरुषके पाही ॥ बीज आदि तिहुलोक जो फूला । आपुहि जानै पुरुषहि तूला ॥ करि अभिमान पुरुष विसरावा । आपुहि पूरण पुरुष कहावा ॥ सर्वमें व्यापक आपुहि रहई । पुरुष भेद नहिं काहु सो कहई ॥ भेद कहैं उजरे पुर तीनो । आपन थापन ताते कीनो ॥ चारिहु वेद नेति जो गावैं । सदगुरु रहित पुरुष बतलावैं ॥
नं. ८ कबीरसागर - २
( ३४ )
बोधसागर
जीव जन्तु राखैँ अरुझाईं । बीज पुरुष जो दीन्हो भाई ॥ जब नहिं बीज पुरुषपहँ जाईं । तबै पुरुष हम कहँ उपजाईं ॥ बीज अंकुरी लोक ले आवौ । धर्मराजते हंस छुडावौ ॥ सेवा वसि वहि दीन्हा राजू । अब मेटी तौ सुकृतहि लाजू ॥ सुत हमार भया वरियारा । जेहि दीन्हों तिहुँलोकके भारा ॥ तुम अंकुरी सेवहु जाईं । बार २ मैं कहौं बुझाईं ॥ ताते मैं संसारहि आवा । पुरुष शब्द टारो नहिं जावा ॥ नाहिं तौ तीनौ लोकहि तारौं । धर्मराज ते सबै उबारौं ॥ जो जन अंश पुरुषके आही । सो सब आवै हमरे पाही ॥ अवर सकलजग काल बसेरा । नित २ प्रलय होत झकझेरा ॥ यहि कर काल पुरुष दियो नामा । तीन लोकते न्यारा धामा ॥ अध्याय एकादश आगे होई । काल सरूप बखानो सोई ॥ धर्मदास मन माहिं विचारो । काल रूप सब भाव निहारो ॥ जो तुम कहौ पुरुषकी आशा । सद्गुरु शब्द करौ विश्वासा ॥ छंद-हंस कारण पुरुष पठयो तबै बिनती मैं कहौं । धर्म है अति बली तिहुँपुर सोई दुतिया करि रहौं ॥ जाऊं भवसागरहि जो बहु भांति मोसों युधि करै । यह सुनि पुरुषसत्य शब्द दीन्हों धर्मराज जेहि ना डरै ॥ सोरठा-सुनतै शब्द संदेश, सुरति निरति हंसा गहो । पूरण पुरुष संदेश, बहुरि धरौ जग देह नहिं ॥
इति श्रीमदुग्रगोतात्रब्रह्मज्ञानयोगमते कवीरधर्मदाससंवादे
विभूतियोगव्याख्यानो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
उग्रमाता
( ३६ )
अथ एकादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
अर्जुन कृष्ण सो बिनती ठानी । हे स्वामी तुम अन्तर्यामी ॥ दश अध्याय तुम वरणि सुनायो। ज्ञान विज्ञान जो मोहि बतायो॥ सन्यासकर्म और वाक्य सुनायो। आतम संयम योग बातायो ॥ प्रवृत्ति निवृत्ति जो मारग भाषा । कर्म योग मन हट करि राखा ॥ यह सब सुनिनिर्मल भयो अंगा । अब मोहि दर्शन भयो उमंगा ॥ होउ दयाल विराट देखावौ । मति मोकहैं तुम दूरि बहावौ ॥ जो मोहिं शक्ति न देखत होई । तौ अब शक्ति दीजिये सोई ॥ तुम ठाकुर हौ अंतर्यामी । अब दर्शन बिन रहौं न स्वामी॥ अहो दयाल कृपा-निधि-सारग । दीनबंधु तुम पतित-उजागर ॥ तब हरि बोले चतुर सुजाना । इन नैनन्ह नहीं दर्शन जाना ॥ तुम तौ हौ निज भक्त हमारे । दर्शन तुम कह देउ पियारे ॥ यह सरूप काहू नहीं देखा । इंद्रादिक सुर नर सुनि शेषा ॥ सो दर्शन तुम देखा चैहौ । तीनि लोक हलकंप बढैहौ ॥ देखौ कालरूप जब मोरा । अर्जुन तुम तब रहौं न ठौरा ॥ डरपो बहुत होइ डर भारी । डरपै लोग सकल संसारी ॥ कहैं अर्जुन सुनु कृष्ण सुरारी । प्रथम देहु हटता मोहि भारी ॥ जो मैं डरौं दरसको करई । विनु मारेही मृतक होइ रहई ॥ सोई दृष्टि मोहि देव गुसाईं । जेहि दरशे परसौं तुम पाईं ॥ दिव्य दृष्टि अर्जुन कहैं दीन्हा । अर्जुन है मम दरश अधीना ॥ धारो रूप अकाश पताला । महा स्वरूप भयंकर काला ॥ माथ अनेक अनेकन्ह नयना । कर्ण अनेक बहुत मुख बयना ॥ नाक अनेक रू दंत अनेका । चितवत दृष्टि मारि है वेगा ॥ निकसि दाढ़ बाहे मुख भारी । तिन देखत जिव नाहिं सँभारी॥
( ३६ )
बोधसागर
वदन अनेक भरे औ रीते । ऋषिसुनिवर तहाँ भये विपरीते॥ भुजधारी बहु बाहु विराजें । ऐसे कैसो दरशन राजें ॥ पाव पताल रहा जब जाई । शीश अकाश सातये भाई ॥ भूषण भांति २ के छाजें । मुकुट अनेक शीश पर राजें ॥ सूर्य चंद्रमा तहां रहाई । ऋषिसुनिवर तहाँ विनती लाई ॥ जहाँ लगि देवी देवता आहीं । सब देखो तिनके मुख माहीं ॥ अर्जुन देखि अचंभौ कीन्हा । अति डरि भये बहुत अधीना ॥ देवता ठाढ़े अस्तुति करहीं । भौ व्यापैं विलु मारे मरहीं ॥ किन्नर यक्ष गुणी सब ठाढ़े । कैंपैं सबैं देखिके गाढे ॥ राक्षस देखत भागे जाहीं । कोइ नेरे कोइ दूरि पराहीं ॥ कोइ जन अस्तुति करै मनुहारी । अब रक्षा प्रभु करौ हमारी ॥ कोइ एक जन दुरि परिहरहीं । कोइ जन निहुरी दंडवत करहीं॥ ऐसे स्फुट सकल जग देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥ औ मुख देखा बहुत भयावन । जानौ अब चाहत है खावन ॥ मुखमें तीन लोक जो देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥ जहाँ लगि साधु असाधु कहावै । सो सब ताके मुखमहँ आवै ॥ दुर्योधन देखा मुख माहीं । भीष्म द्रोणाचार्य जो आहीं ॥ योधा चले सबैं मुख माहीं । कौरौ पाण्डव उदर समाहीं ॥ कोस अड़तालिसकटक जोरहिया । सो सब मुखमें देखो तहिया॥ संसारी त्रैलोक पसारा । सो सब मुखके मध्य निहारा ॥ नदी आवै जस एकै धारा । सागर माहिं धसे सब खारा ॥ ऐसे जग सब उदर समावै । मुख माहीं सबही चलि आवै॥ जैसे जोत चांदना होई । जीव जन्तु सब लेइ समोई ॥ केतक डाढ़न माहीं अटके । केतक भागे फिरत जो भटके ॥ कोइ कतहुँ जाने नहीं पावै । बढ़ुरि २ मुख माहिं समावै ॥
उग्रगीता
( ३७ )
देखत अर्जुन बहुत डराये । मनमें धीरज नेक न आये ॥ विनय दंडवत करि बहु भाई । क्षमा करौ अब मोहिं यदुराई ॥ मोकहुँ सँभरन दे यदुराई । चित मेरो विभ्रम होइ आई ॥ तुम तौ पूरण पुरुष हो साई । रूप समेटो चित डेराई ॥ काल रूपते बहुत डेराऊँ । कृपा करो जिय मोर जुड़ाऊँ ॥
श्रीभगवानुवाच
कहैं कृष्ण अर्जुन सुनु वयना । डरपै जनि मूदो दोउ नयना ॥ तुम कारण यह भेष बनावा । और काहु देखो नहिं पावा ॥ तुम तौ क्षत्रिय बहुत पियारे । तुम कारण यह रूप सवॉरे ॥ अस्त्र लेहु तुम हाथ उठाई । इन कह मारौ बहु विधि भाई ॥ जो कोइ युद्ध करन कहैं आवै । राज धर्म तेहि मारि गिरावै ॥ इन सबको हम मारिजो राखो । सो सब देख्यो अपनी आंखों ॥ ए सब हमरे मुखके माहीं । तुम कहैं दूषण एकौ नाहीं ॥ तुम्हरे यश कह कारज कीन्हा । अब लगि राखा तुम्हरे लीन्हा ॥ आगे यही मृतक जो आहीं । तुम जग यश लेते कस नाहीं ॥ जगमें महा बाहु तुम होहु । अब तुम इन कहैं मारि विगोहु ॥ देखै युद्ध सकल संसारा । यश कीरति तब होइ उदारा ॥ अरजुन डरपत बिनती कीन्हा । तुम कर्ता मैं सदा अधीना ॥ अब लगि तुम कहैं मैं नहिं जाना । अब जो कहौ सोइ परमाना ॥ विनय करौ तुम सुनहु गोसाई । बहु अपराध भये मोहिं साई ॥ तुम संग सखा रूप हम डोलै । ऊँच नीच बोल जो बहु बोलै ॥ तुम तौ पिता सकल के होऊ । पालै मात पिता सुत सोऊ ॥ बालक लाख दोष जो करई । मनमें पिता रोष नहिं धरई ॥ तुम सो वैन कठिन मैं भाषा । सारथिकै अपने रथ राखा ॥ कछू चूक हमसे जो होई । सो अपराध क्षमा कर सोई ॥
( ३८ )
बोधसागर
रूप देखावहु श्याम सरूपा । वेगि छिपावहु काल सरूपा ॥ मेरो जीव न धीरज धरई । अबहीं जानौ भक्षण करई ॥ दया रूप अपनो दिखलावो । चित वित मेरो ठौर मिलावो ॥ ना तौ चित वित मेरो जाई । कैसहु धीरज मोहि न आई ॥ कालरूप तब लीन्ह सकेली । कृष्ण रूप धरि तब ही खेली ॥ शंख चक्र गदाधर जानी । मोर मुकुट पीताम्बर तानी ॥ विश्वरूप सम्पूर्ण भयञ्ज । अध्यायएकादश लगि कहञ्ज ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । कर कैसे यह काल तमाशा ॥ यह जग अन्धा उलटी रीती । अंधा मोल न फूटि मसीती ॥ अंधरे पंडित पढ़े पुराना । पढ़ि पढ़ि काहूँ भेद न जाना ॥ कृष्णजो निजमुख गीताभाषा । काल स्वरूप देखायउ आखा ॥ तबहुँ न मूरख कालहि चीन्हे । ज्ञान हीन है मतिके हीने ॥ ज्ञान अगम मैं बहुत पुकारा । सब झूठे मिलि कहै लबारा ॥ मूरख सांच झूठ नहि जाना । कैसे गुरु भेद पहिचाना ॥ भेद विना सो जन्म गवांवा । बार बार भग द्वारे आवा ॥ आवत जात महा दुख होई । जन्म बहुत धरि जाइ विगोई ॥ सतगुरु शब्द चीन्ह जो पावै । अजर अमर घर हंसा पावै ॥ धर्मदास सम हंस सुजाना । झूठो सत्य लेहु पहिचाना ॥ सांच झूठ में रहा छिपाई । चीन्हो ताहि गहौ चित लाई ॥ झूठे त्यागि सांच कह लागो । सत्य सुकृतमें तन मन पागो ॥ सत्यहिते जिव उत्तै पारा । सत्य शब्द जियको कड़हारा ॥ सत्य गहै सत्ये मुख भाखै । अभ्यन्तर सत्यहि गहि राखै ॥ सत्ये कर्म धर्म तुम करहु । कर्म भर्म दोऊ परिहरहु ॥ सत्य व्यवहार सत्य मुख बैना । सत्य है लेन सत्य है देना ॥
उग्रगीता
( ३९ )
सत्य सत्य तुम वर्तहु भाई । यह उपदेश हमारो आई ॥ यह संसार सत्य नहीं सूझे । सत्यहि बूझे झूट अरूझे ॥ जैसे नलिनी सुबना गहई । ऐसे वह जग फंदा रहई ॥ सत संगति ते उठिकै भागे । नाच पवारे मन अनुरागे ॥ विषय वासमें तन मन खोवै । उत्तम देही जानि विगोवै ॥ यह संसार कालकर फन्द। विन सतगुरु नहीं छूटे बंदा ॥ जब अक्षर निरअक्षर जाने । सतगुरु शब्द करै परवानै ॥ सार शब्द मैं आनि पुकारा । जो बूझे सो उतरे पारा ॥
छंद—वहो बहुविधि बूझि देखों धर्म दारुण काल हो ।
वेद पुराणमें सार गीता जस कहौ विकराल हो ॥
विश्व सब भोजन करै यह सर्व वसुधा पाल हो ।
दया जाके ताहि आवै सब जीव राखै हाल हो ॥
सोरठा—ज्योति सरूपी काल, सदा अखंडित लव वरै ।
कबहुँ न होय दयाल, जीवजंतु सब लै जरै ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कच्चीरधर्मदाससंवादे
विरहरूपन्यास्यानो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
कहैं अर्जुन सुनु अन्तर्यामी । पूर्ण पुरुष अगम तुम स्वामी ॥ ज्ञान सृष्टि भक्ति अधिकाई । निर्गुण सगुणमें को अधिकाई ॥ यह संशय उपजे जिव मोरा । कृपा करो तुम करौ निहोरा ॥ अर्जुन जो पूछेउ परभाऊ । सो अब प्रकट बखानौ दोऊ ॥ ज्ञानी अधिक करे जो ज्ञाना । निशि वासर रहै ज्ञान समाना ॥ भक्ति करे जो मन चित लाई । निस दिन सुमिरे हम कहैं भाई ॥ बहुत भांति कै सेवा लावै । प्रेम मम मेरो यश गावै ॥
( ४० )
बोधसागर
सुख संपत्ति सुत भवन न भावै । काम क्रोध मद लोभ बहावै ॥ ऐसा भक्त मेरा मन भावै । मोक्ष मुक्ति परम पद पावै ॥ ज्ञानते अधिक भक्ति है भाई । निसदिन मोमें रहा समाई ॥ निर्गुण सगुण है रूप हमारा । वह निरूप यह खेल पसारा ॥ निर्गुण ब्रह्म सकल घट माहीं । सगुन रूप हमारो आहीं ॥ बहुत साधु निर्गुण कह धावै । कर्म धर्म लै दूरि बहावै ॥ निर्गुण भक्ति बहुत अति भारी । कोइ कोइ विरले हैं व्रतधारी ॥ छौंठै इंद्री तन मनकर्मा । मनसा कबही जाइ न भर्मा ॥ पंच पचीसो को परमोघै । अभ्यन्तर आत्मको शोघै ॥ संकल्प विकल्प जब मनसे छूटै । काल कलेश नाता कहैं लूटै ॥ सदा नाम जो रहै लवलीना । सो साधू पुनि ब्रह्महि चीन्हा ॥ पारब्रह्म है अलख अपारा । हाथ पाउं नहि देह सँवारा ॥ क्षर अक्षर कबही नहि होई । पूरण ब्रह्म व्यापक है सोई ॥ अलख रूप सदा अविनाशी । रहित चित अचित उदासी ॥ ऐसा ब्रह्म जो रहित अकेला । सो साधू है अविगति मेला ॥ ऐसे निर्गुण भक्त पियारे । तिन अपना निज कारज सारे ॥ ताते कठिन भक्ति यह भारी । सगुण भक्ति है मोहि पियारी ॥ शुचि संयम एकादशि करई । मन बच कर्म मोहि चित धरई ॥ अर्पणकै सब प्रभुके नामा । सुफल होइ सब पूरण कामा ॥ सदा सर्वदा मो कहैं ध्यावै । मोक्ष मुक्तिमाहीं फल पावै ॥ और सेवा सुमिरण जो करई । निशि दिन मोकहैं चर्चत रहई ॥ ध्यान धरै जो श्याम सरूपा । मोर मुकुट शिर बनो अनूपा ॥ पीत वसन बेजंती माला । कानन कुंडल नैन रसाला ॥ ऐसी भांति ध्यान जो करई । सो साधू भवसागर तरई ॥ ए अर्जुन मोहि सब विधि भावै । भक्ति करै मेरो यश गावै ॥