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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

उग्रगीता

( ४१ )

हम तो प्रेम प्रीति के भूखे । साधु संत कबही नहीं दूखे ॥ हमरी आज्ञा साधु जो धावै । महा पदार्थ मोक्ष सो पावै ॥ जो तुम सो कछु भक्ति न होई । मानहु मोर कहा निजु सोई ॥ क्षत्री धर्म न छोडिय भाई । एहिंते तुम पुनि पहुँचो जाई ॥ धनुष बाण तुम लेहु उठाई । युद्ध करहु तुम अर्जुन जाई ॥ मनमें मोह कछु नहिं कीजै । कारण करतामें चित दीजै ॥ जो तुम युद्ध जीतिकै आवौ । पदवी अटल परम पद पावौ ॥ द्वादश अध्याय भक्ति जो भाई । कृष्ण बखाना यह अध्याई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर धर्मनि हितकारी । भक्ति कहेउ जो कृष्ण सुरारी ॥ निर्गुण भक्ति सत्य है आदी । सगुण भक्तिहु जन्म न वादी ॥ पै हम अगम बखानी ऐसी । करै विवेक विचारै तैसी ॥ निर्गुण सगुण दोउ उर झेला । बूझेगा कोइ संत सुहेला ॥ क्षर अक्षर माया है भाई । निरअक्षर सद्गुरु समुझाई ॥ ताकर भेद न काहू पाया । मूरख धरि २ जन्म गवाया ॥ सद्गुरु शरण जीव जो आवै । काल फांसते जिव मुक्तावै ॥

छन्द-निर्गुण सगुण दोउ छांडौ संधि सद्गुरु चित धरो ।

सार शब्द अपार अविगति क्षर अक्षर निर अक्षरो ॥

भेद बूझो अगम गमि करि कछु न संशौ घट रहो ।

सोई हंसा अमी पीवै पुरुष को दर्शन लहो ।

सोरठा-सोइ भक्ति निज सार, जेहिंते पुरुषहि परशिहो ॥

बहु विधि कहौं पुकारि, भक्ति हीन दरशै नहीं ।

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे भक्ति-

योगन्याख्यानो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

( ४२ )

बोधसागर

अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन सों बोले गोपाला । निर्मल ज्ञान सुनौ यहि काला॥ माया ब्रह्म सदा संयोगा । माया संग जीव पुनि भोगा ॥ तीनिउ गुण मायाते भयङ्ग । रजगुण तमगुण सतगुण भयङ्ग॥ रजगुण ब्रह्मा सृष्टि पसारा । सतगुणपोषण विष्णु विचारा॥ तमोगुण रुद्र सँघारै सोई । तीनिउ पुत्र माया के होई ॥ पृथ्वी तेज वायु आकाशा । जलमिली पांचउ तत्त्व प्रकाशा॥ दश इंद्री कीन्हो बंधाना । कर्म पांच २ है ज्ञाना ॥ मनबुद्धि चित अहंकार जो कीन्हा । इच्छा दोइ यक धीरज चीन्हा दुख सुख क्षेत्र जो कीन्हा माया । क्षेत्रज्ञ पुरुष अविगति समाया॥ क्षेत्र देह क्षेत्रज्ञ जिव होई । चेतन जीव अचेत समोई ॥ देह धरेते जिव दुख पावै । माया जड़ कछु शोक न आवै॥ आदि अनादि ब्रह्म औ माया । कारण सृष्टि धरे दुह भाया ॥ जैसे वृक्ष २ की छाया । वृक्ष विना छाया नहिं माया॥ ऐसे ब्रह्म सदा यक संगा । कारण सृष्टि रच्यो अर्थज्ञा ॥ अर्जुन व्यापक जीवहि जानो । अतो न न्यारो ब्रह्म पिछानो॥ जीवात्म माया भयो अंगा । परमात्म देखहु सब संगा ॥ पारब्रह्म सो लिप्त न होई । हाथ पांव इंद्री नहिं कोई ॥ सर्वेन्द्री जाके चहुँ ओरा । जहां तहां परकट सब ठौरा ॥ नैन चहुँ दिशि देखै सोई । कानन सर्व गुण सुने है जोई॥ मुख सकलौ जो खाय खवावै । पाव पवनते अधिक जो धावै॥ हाथ ऐसे जो रच संसारा । नासा सकल वास विस्तारा ॥ जो कहिये तौ सकलौ सोई । नाक होई तौ कछु न होई ॥ जाके कोई पुण्य न पापा । अलख रूप सो आपै आपा ॥

उग्रगीता

( ४२ )

ऐसे पारब्रह्म पहिचानौ । ताकी महिमा वेद बखानौ ॥ जो कोइ साधू साधन करई । इंद्री त्यागे गुण परिहरई ॥ काम क्रोध मद लोभ न आवै । तंतु प्रकृति लै दूरि बहावै ॥ माया रहित ब्रह्म है सोई । ताको आवागमन न होई ॥ माया लिप्त रहै संसारी । लोभ मोहमें भूले भारी ॥ कैसहु नहीं ब्रह्म कहैं बूझै । अंध नयन हृदये नहिं सूझै ॥ सुख संपत्ति हित चित्तसो गहई । ता परताप नर्क सो परई ॥ सुकर श्रान जन्म सो धरई । माया लीन सदा सो करई ॥ चौरासी कर्म जेहि गुण होई । निष्कर्महि जाने नहिं कोई ॥ आतम परमात्म नहिं जाने । पारब्रह्म मन कबहिं न आने ॥ रहत समीप सदा सुख सोई । न्यारा कबहीं नाहिं विछोई ॥ जैसे सूर्य जो रहै अकासा । ऐसे क्षेत्र क्षेत्रज्ञ है वासा ॥ कर्म लिप्त जिव नाम धराया । पारब्रह्म संयोग बनाया ॥ माया विना ब्रह्म जो होई । पारब्रह्म पुनि कहिये सोई ॥ आपुन आपा खोइ भुलाना । माया संग सदा सुख माना ॥ ता कारण भ्रम चौरासी । फिरि २ भवसागरके वासी ॥ ताते निर्गुण भक्ति न होई । सगुण भाव बतायो सोई ॥ कर्म करिय करि निर्मल होई । ऐसो तारो सब नर लोई ॥ मन वच कर्म मोहि चित्त राखै । मेरो ध्यान सदा अभिलाषै ॥ यहि प्रकार नर मोकहैं गावै । सुख संपत्ति धन लक्ष्मी आवै ॥ ब्रह्म यज्ञ त्रैदश अध्याई । क्षेत्र क्षेत्रज्ञहि वरणि सुनाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । ऐसा भेद सो काल प्रकाशा ॥ कहिं २ निर्गुण सगुणे ल्यावै । पारब्रह्मते दूरि बहावै ॥ काह कहौ कहैलंगि गोहरावौ । अंधहि मारग कैसे पावौ ॥

( ४४ )

बोधसागर

दिवसहि लोक न सूझे भाई । सूर्य्यहि कैसे दूषण लाई ॥ ज्ञान अपार करउ परकाशा । जैसे सूरज जोति अकाशा ॥ चहुँदिशि जो उज्यारा आही । नैन विना अंधियारा ताही ॥ ज्ञान दृष्टि होई नहिं सूझे । सतगुरु मारग कैसे बूझे ॥

छन्द—ब्रह्म ज्ञान कहि २ सुनाव बहुरि आन कर्म सो । आपकोही स्थापि बहु विधि सब जीव राख भर्म सो॥ कर्म धर्महि भर्म त्यागै बूझि सतगुरु भेदको । अगम मारग वेदते जो बूझि वेद निषेद को ॥

सोरठा—ऐसो मतो अपार, वेद पार पावे नहीं । पुरुष शब्द नीनार, पुष्प बास जैसे रहे ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञनाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

बोले कृष्ण भक्त-हितकारी । अर्जुन सो अस वचन उचारी ॥ आगे बहुत ज्ञान समझाया । पै अब अगम करो तुम दाय्या ॥ जौन ज्ञान सुर नहिं पहिचानै । महिमा चारो वेद बखानै ॥ अब तुम हृदया धरउ छिपाई । ऐसों ज्ञान नहिं प्रकटै भाई ॥ प्रथम तत्त्व महि पुरुष सवारा । प्रकृति तत्त्व तेहिमें अनुसार ॥ कर्म बंध महि तत्त्वहि रहई । कर्म विधी बंधन सो कहई ॥ सब उत्पति महि तत्त्वते होई । प्रलय काल सब ताहि समोई ॥ आदि आनादिते महि चलिआई । काहू जाकी अन्त न पाई ॥ महि तत्त्व रूप ब्रह्मकी इच्छा । माया ब्रह्म समीप समीक्षा ॥ ताते तीनिउ गुण जो भयऊ । सतरज तमगुण उत्पन कियऊ ॥ ताके लक्षण करौ बखाना । तीनिउ व्यापक सकल जहाना ॥

उग्रगीता

( ४५ )

प्रथमै सतगुण सत्तै जानौ । शील लाज सन्तन हित मानौ ॥ प्रभुके सुमिरण रहै समाई । भक्ति भाव सन्तन सुख दाई ॥ शुचि संयम स्नान जो करई । जप तप दान पुण्य मन धरई ॥ निशिदिन चित रहै स्थिर भाई । सत्य संतोष जो सदा रहाई ॥ यह लक्षण सत्त्वगुण जो जाना । ताकी गति संक्षेप बखाना ॥ ऐसी भांति कांच जो होई । स्वर्ग लोक सुख मुक्तै सोई ॥ बहुत भाँति सो सदा अनन्दा । सत्त्वगुण विष्णुभाव गोविंदा ॥ रजोगुण ब्रह्मा भय उत्पानी । भूषण भोग सदा रुचि मानी ॥ बहुत भांति कै वस्तर भावै । घोडा हाथी रीझ बढ़ावै ॥ बहुत दामकै चाहै गाठी । बुद्धि फिरै भक्तन सो नाठी ॥ जहां तहां मैं मेरी बोले । सुख संपति कह धावा डोले ॥ सुखसंपति कछु काम न आवैं । हरिविन मूरख जन्म गवावैं ॥ यह लक्षण रजगुणके भाई । अन्तकाल मध्यम गति पाई ॥ तमोगुण रुद्र धरो जो देही । काम क्रोधके सदा सनेही ॥ निशिवासर रहै अहंलपटाना । आपन सम काहू नहि जाना ॥ क्रोधहि लिये करै सब कर्मा । भीतर रोख उपर तकै प्रेमा ॥ देवि देवता बहुत मनावैं । अन्त समय कोइ काम न आवैं ॥ आलस निद्रा वसै शरीरा । काहूकी नहि व्यापै पीरा ॥ तमोगुण लक्षण यह व्यवहारा । अन्त समय बहु करे पुकारा ॥ यमके दूत त्रास बड़ि देही । गति निकुष्टमें बासा लेही ॥ नर्क बासमें बासा लेई । योनि अघोर सदा भरमेई ॥ तीनों गुण बरतै सब अंगा । पलपल छिन छिन तीनों रंगा ॥ तीनों गुण रहै देह समाई । ता कारण भरमें सब भाई ॥ जिन साधुन गुण व्यापै नाहीं । सो तौ आवैं हमरे पाहीं ॥ तीनउ गुणते न्यारा खेले । ज्ञानेन्द्री लै मनहि सकेले ॥ ऐसा साधु मुक्ति गति पावै । आवागमनकी पीर मिटावै ॥

( ४६ )

बोधसागर

अर्जुन उवाच

कहै अर्जुन तुम सुनहु भुवारा । गुण तीनों कस होइ निनारा ॥ करनी रहनिते साधु सो रहई । कैसे इनते न्यारा कहई ॥ इन बिन कर्म कछु नहिं होई । कैसे कै निष्कर्मो सोई ॥

श्रीकृष्ण उवाच

कहैं कृष्ण पूछेउ तुम नीका । मेटौ संशय सकलौ जीका ॥ तीनों गुण हैं नर्ककी खानी । पै सत्त्व गुणते नर उत्पानी ॥ ताते सत्त्वगुण अधिक महातम । करै भक्ति चीन्है परमातम ॥ जो सत्त्व गुणमें बास करई । इच्छा फल मनमें नहिं धरई ॥ दुख सुख दोऊ एक समाना । भला बुरा कछु मनहिं न आना ॥ मित्र शत्रु कोइ दृष्टि न आवै । सुत औ अरि दोउ एक सुभावै ॥ पाप पुण्य की करै न आसा । निशिवासर हरिचरण निवासा ॥ रहै उदास सदा जग माहीं । शीत उष्ण व्यापै नहिं ताहीं ॥ आनंद रूप सरूप है जाहीं । जगके सुख दुख व्यापै नाहीं ॥ देहीको आपन नहिं जानै । ब्रह्म रूप न्यारा पहिचानै ॥ सुत दाराकी कौन चलावैं । जगके बन्धन सब मुक्तावै ॥ ऐसी रहनि जो साधू होई । व्यापक गतिको पावै सोई ॥ यह तौ ज्ञान अगम मैं कहिया । अर्जुन राखो मन चितगहिया ॥ चतुर्दशाध्याय कहेउ जो कृष्णा । त्रिगुण विभाग कहेउ संपूर्णा ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ मम पासा । सत्य पुरुष चीन्हौ धर्मदासा ॥ जाते पुरुष प्रकृति जो भयऊ । माया ब्रह्म भाव दोउ ठयऊ ॥ महि तत्त्व कारण जग निर्माया । तीनिउ गुण पग तेहि भाया ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा । इनते जगत रच्यो सब सामा ॥ इनते पुनि अवतार अनेका । जन्म धरै युग युग फिरवैगा ॥

उग्रगीता

( ४७ )

ज्ञान सत्य यह कृष्ण सुनाया । पै फिरिकै आपा ठहराया ॥ आदि पुरुषते परे जो दूरी । कैसे पहुँचै लोक हजूरी ॥ यह तौ आपा कह ठहरावै । ब्रह्मज्ञान कहि कहि समुझावै ॥ जो नहिं थापे आपा भाई । कैसे चले तिहुँलोक बड़ाई ॥ राजनीति सब आप मिलावै । जाते देश न उजरन पावै ॥ पुरुष भेद जो पावइ लोई । तौ तीनिउ पुर ऊजर होई ॥ तेहि कारण तीनिउ गुण फंदा । जीव जंतु सब इनकू बंधा ॥ विष्णुरूप सत्त्वगुण जो कहिया । सत्त्वगुणसोकारजनहिलहिया ॥ अपने मुख जो कृष्ण सुनाया । तबहुँ न मूरख मोहि पतियाया ॥ अंकूरी जीव मोहि पतिआई । हंस होइ सत्य लोक सिधाई ॥

छंद-पुरुषते प्रकटो निरञ्जन बीज माया सँगदई ।

सेवा बसि तिहुँलोक पायउ करण कारण सो भई ॥

करै करावै मन जो भावै थापि आया आपको ।

पुरुष सो जिव रहे न्यारै लागि इनके आपको ॥

सोरठा-सुतु धर्मदास मुजान, सतगुरु विना न दर्शई ।

गहो शब्द निर्वाण, जेहिते पुरुष परसि हो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे त्रिगुण-

विभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

अथ पञ्चदशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन सो बोले अस बानी । कृष्ण सरूपी चतुर विज्ञानी ॥

त्रिगुणविभागयोग कहो ज्ञाना । अब पुरुषोत्तम योग बखाना ॥

वृक्ष भाव है यह संसारा । ऊर्ध्व मूल अध है तेहि डारा ॥

उलटा वृक्ष नीचे हैं शाखा । यह संसार वृक्ष सम भाषा ॥

पातहि पात तरु डारहि डारा । फल लगा विनु फूल रसाना ॥

( ४८ )

बोधसागर

अर्जुन उवाच

अर्जुन पूछहि सुनु भगवाना । वृक्षके वर्णन करौ बखाना ॥ कहैं कृष्ण सुनु कुंतिकुमारा । वृक्ष शरीर रच्यो व्यवहारा ॥ ऊपर मूल तर डार बताऊँ । शाख पत्र सब तोहि सुनाऊँ ॥ मूल वृक्ष है पुरुष अगोचर । शाखा ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ॥ संसारी यहि गुणते आवैं । बृन्दबृन्द फिरि २ उपजावैं ॥ साधु सन्तको आतम ज्ञानी । प्रभु पूरणकी गति पहिचानी ॥ आवागमन तिन्हैं जो नाही । रहै समीप पुरुषके पाहीं ॥ कहैं अर्जुन तुम वृक्ष बखाना । सो तौ आवागमन समाना ॥ साधुको आवागमन न होई । कैसे वृक्ष न जायैं सोई ॥ अब तुम सुनौ हौ चतुर सुजाना । निर्मल तोहि सुनावौ ज्ञाना ॥ निष्कामी इच्छा नहीं जाहीं । असंग अस्त्र ले काटै ताहीं ॥ असंग अस्त्र सब वृक्षहि काटा । जरा मरणको छूटौ घाटा ॥ सोइ साधू मन चलन न पावैं । बाहेर जाते भीतर ल्यावैं ॥ जैसे पुहूष बास है भाई । पवन सरूपी लेइ समाई ॥ ऐसे इन्द्री जिव है बासा । मन दौरे इंद्रिन के पास ॥ इन्द्री साथ महा सुख मानै । अंतकाल रहु तेहि पछितानै ॥ इन्द्रिय वश जो मन नहि होई । पूरण ब्रह्ममें रहै समोई ॥ मन इन्द्री सो रहै निनारा । सोई पावैं मुक्ति के द्वारा ॥ ऐसा साधू कोई माई । कोटिन मध्ये एक रहाई ॥ अर्जुन कहैं परमपद कैसा । कहै कृष्ण सुनु अर्जुन ऐसा ॥ कोटिन सूर्य एक सम होई । कोटिन चन्द्र पूरण है सोई ॥ तबौ न बूजौ ब्रह्म उजियारा । परब्रह्म है अपरं पारा ॥ अर्जुन कहैं सुनो प्रभु मेरे । मैं आधीना दास हौं तेरे ॥

उग्रगीता

( ४९ )

जब नर नींद करै सुख सोवे । सुषुप्ति लिये मगन सो होवे॥ और जब प्रलय होइ संसारा । रहै लीन सब ब्रह्म मझारा ॥ ए गतिभक्ति ते मुक्ति कहावे । पै काहेते आवै जावे ॥ सुनु अर्जुन मैं कहौं बखानी । भेद न जा नर अज्ञानी ॥ संशय लीन मगन होइ सोवै । ताते फिर २ संशय होवै ॥ प्रलय घात जिव ब्रह्म समाई । मनोकामनाते फिरि आई ॥ जैसे कामना होवै लीना । तैसे कामना होवै बीना ॥ ताते आवागमन न छूटै । फिरि २ जन्म योनि धरि लूटै॥ जो चीन्है अभ्यन्तर आतम । चेतन रूप चिन्है परमातम ॥ सबके अंतर मैं ही व्यापौ । करण करावन मैं ही आपौ ॥ जैसे तिलमें तेल रहाई । जैसे काष्ठमें अग्नि रहाई ॥ अग्नि रूप हो अन्न पचावौ । सब जीवनके मध्य रहावौ । ऐसे व्यापक मैं अभ्यन्तर । चारिउ भोजन करौं निरन्तर ॥ चारिउ भोजन सुनो सुजाना । जो मुखमें सब आनि समाना॥ भक्षणमें एक भोजन भाई । डाढते चाभि २ सो खाई ॥ दूसर भोजन कहावै सोई । पहित भात जो भोजन होई ॥ तीसर भोजन जो नाम कहावै । डाढ दांत ताहि नहिं पावै ॥ सीरा सिरखन कठी कहावै । बिना दांतन रसना लै जावे ॥ चौथा भोजन नाम जो कहिया । दांत लगाय रस चूसे जहिया॥ यह सब भोजन मैं ही करऊँ । उदर सकलबिधि मैं ही भरऊँ॥ ब्रह्मरूप अविनाशी मोरा । पूर्ण अंश आहि यहि थोरा ॥ क्षर अक्षर दोउ ब्रह्म स्वरूपा । क्षर बिन रहै अक्षर अनूपा ॥ अक्षर पारब्रह्म सो आही । दुख सुख कछु व्यापै नहिं ताही॥ ब्रह्मो निशि दिन खोजत रहई । ताकर वार पार नहिं लहई ॥ जैन यती संन्यासी ढूँढै । बहुत मुडावै बहुते चूढै ॥

( ५० )

बोधसागर

ताकर वार पार नहीं पावै । खोजत २ जन्म गँवावै ॥ योगी जंगम और दरबेशा । बहु विधि रूप बनावै वेशा ॥ अक्षर गति कोइ पार न पावै । प्रभु पूरण सब माहँ रहावै ॥ जो सुमिरै प्रभु प्रेम लगावै । ताकह काल कबहुँ नहीं पावै ॥ ताको अवागमन नशाई । ना कहुँ आवे ना कहुँ जाई ॥ अर्जुन यह पुरुषोत्तम योगा । अध्याय पंचदश नाम संयोगा ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर धर्मदास सुजाना । ब्रह्मज्ञान यह कृष्ण बखाना ॥ ब्रह्मज्ञान ऐसा है सोई । उग्र ज्ञान जाने नहीं कोई ॥ जिन जाना तिन ही पहिचाना । जैसे गूँगे सपना जाना ॥ गूंगा शैन जो गूंगा जानी । अभिअन्तर सो ले पहिचानी ॥ मैं तोहि प्रगटै कहौ बखानी । गुप्त शैन कोइ गूंगे जानी ॥ अगम अपार शब्द निर्धारा । बूझै आदि अन्त सुख सारा ॥ नहीं बोली भाषा महाँ आवै । नहीं रूप कछु वरणि सुनावै ॥ हाथ न पांव सुतिं नहीं जाके । कहौ कैसे कोउ पावै ताके ॥ दृष्टि अदृष्टि न देखन आवै । सतगुरु अवर न वरण लखावै ॥

छन्द-वरण अवरण भाव बूझौ क्षर अक्षरको भेद जो ।

क्षर विनशित अक्षर सुस्थित अथ कहे यह भेद जो ॥

अक्षर माहिं नि दरशाय गुरु भेद लखाइया ।

कोटि वेद पुराण वांचे सतगुरु भेद लखाइया ॥

सोरठा-अक्षर भेद है सार बहु विधि कहौ पुकारिकै ।

बूझै बूझनिहार, आदि पुरुष सुख शब्द है ॥

इति श्रीमदुग्रगीतब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे पुरुषो-

त्तमयोग व्याख्यानो नामपंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

उपगीता

( ५१ )

अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

सुनौ संत तुम कुंतिकुमारा । पुरुषोत्तम मैं कहेउं विचारा ॥ अब दुइ योग मैं कहेउँ बखानी । दैव आसुरी ताको मानी ॥ दैव योग जो साथै प्राणी । दैवकी शरण लेइ पहिचानी ॥ ताको लक्षण कहि समुझावौ । भिन्न भाव करि बरणि सुनावौ ॥ दैव योग संपदा को वर्णक । ताको पूजि होइ जो शर्णक ॥ प्रथम अभय निर्भय होइ रहई । काहूकी कछु शंक न करइ ॥ सत राखै अभ्यंतर अपने । झूठ न व्यापै कबहीं सपने ॥ ज्ञान योगते मन थिर राखै । दम शाम कै काया में राखै ॥ दान पुण्य मैं चित अभिलाषै । योग युक्ति मैं बहु विधि भाषै ॥ नित्त नेम पठै गुरु मंत्रा । ताते काया होइ पवित्रा ॥ अरि औ मित्र एक सम जानै । इच्छा काहूकी मनन्हि आनै ॥ होइ अकोध जो त्यागे हठको । शीतल रूप जो साथे घटको ॥ जुगली चाली दूरि बहावै । दया भाव चित माहि समावै ॥ लव लिप्सन होई जिय जाके । कोमल वचन रहै सुख ताके ॥ लोक लाज तजि साधु सुभावै । चपल बुद्धि कह दूरि बहावै ॥ तेज तजै सत्क्रियाकी आसा । क्षमावंत होइ रहेउ उदासा ॥ धीरज मनमें सदा समाई । शुचि संयम करि युक्ति रहाई ॥ होइ अद्रोह द्रोहन्हि आवै । सदा देव संपद मन भावै ॥ मन इच्छा पूजै सब कामा । देव कर्म ताकर है नामा ॥

आसुरी संपदाको वर्णन

अब आसुरी को करौ बखाना । हृदयमें नहीं ज्ञान समाना ॥ दंभ करी करि लोक देखावै । अंतर्गतन्हि ब्रह्म समावै ॥ द्रव्य देखि फूलै अधिकारी । निशिदिन लवलिप्साचितधारी ॥

( ५२ )

बोधसागर

करि अभिमान आपको जानै । और न दूसर चितमें आनै ॥ क्रोध सदा अभि अन्तर राखै । बहु कठोर कोमल नहिं भाखै॥ रहै अज्ञान ज्ञान नहिं भावै । जहां ज्ञान तहैं रोष उठावै ॥ प्रवृत्ति निवृत्ति पुण्य औ पापा । कर्म धर्म करि थापैं आपा ॥ शौच किया मानै नहिं आवै । निराचारमें मन चित लावै ॥ जत्नके अस्त सदा सुख मानै । जग कर्ताको कबहि न मानै ॥ यह व्यवहार आसुरी आही । कबहु न सुमिरे प्रभु जो ताही॥ ऐसे जीव सदा दुख पावै । नरक वास में जाइ समावै ॥ नर्क द्वार तीन हैं भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥

तीन द्वार नर्कको वर्णन

प्रथम द्वार जो काम बनावा । काम द्वारलै चित्त लगावा ॥ कामविषय निशिदिन लपटाना । नर्क वासमें जाइ समाना ॥ दूसर द्वार क्रोध कहावै । जाके क्रोध सदा चित भावै ॥ ताते नर्कवास में जाई । उपजत विनशत बहु दुख पाई॥ तीसर द्वार लोभ है भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥ लोभ लागि जो जन्म गवाई । वासा नर्क सदा सो पावै ॥ नर्क द्वार यह तीन बखाना । मूरख इनमें रहै समाना ॥ दैव आसुरी संपद नामा । अध्याय षोडशो कहेउँ बखाना॥

कवीर उवाच

कहै कवीर सुनु संत विवेकी । दोउ संपदा कहेउँ विशेषी ॥ पाप पुण्य हैं दोऊ बेरी । एक लोहे एक कंचन केरी ॥ बेरी पाय एक दुख होई । कंचन ते सुख अधिक न सोई॥ यह संसार फंद यम केरा । कैसे छूटै यम उर झेरा ॥ कर्म करै कर्ता न कहावे । पाप पुण्य शिर भार लेयावे ॥ सत संतोष हियेमें धरई । सहज सरूपी भवजल तरई ॥

उग्रगीता

( ५३ )

साधु संत सेवा चित राखै । सदगुरु शब्द अमीरस चाखै॥ चाखत अमी अमर सो होई । अजर अमर सत्यलोक समोई॥

छन्द-धर्मदास तुम सुनो चित दै कर्म न लागे दासको । पाप पुण्य बंधा रहै जो छुटन चाहै फंद सो ॥ सुवा नलिनी पकरि अरझो आपनी मति मंद सो ।

सोरठा-सदा अहेरी काल, पाप पुण्य फंदा रचो । सदगुरु दीन दयाल, कर्म काटि मुक्ता करो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंभादे देवा- सुरसंप्रदायाख्यानां नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहेउ सुनौ यदुराई । कछु मोरे जिय संशय आई ॥ सो अब प्रगट कहौ भगवाना । आगे सूक्ष्म सुना मैं काना ॥ शास्त्र धर्म छाड़ि जिन दीन्हा । तिनकी गति तुम कैसे कीन्हा॥ रूप सरूप कौन है ताही । सत रज तमगुण ये को आही॥

श्रीभगवानुवाच

कहैं कृष्ण सुतु कुंतिकुमारा । भली बात कर कीन्ह विचार॥ जग रचना शास्त्र मत आही । तेहि मारग सब लागे जाही ॥ शास्त्र न वेद पुराण न छोडे । सो तौ नर्कवास में बोडे ॥ जब लगि ब्रह्मज्ञान नहि आवे । तब लगि शास्त्र धर्म मन लावे॥ जब आवे याको ब्रह्मज्ञाना । शास्तर वेद कितेव हेराना ॥ ता कह कर्म न लागे भाई । निशि दिन रहै नाम लौलाई ॥ जब आतम परमातम जानै । कर्म धर्मते भे निरवानै ॥

( ६४ )

बोधसागर

मोक्ष सरूपी आपे होई । ना फिर जन्मे मरै न सोई ॥ ऐसी भांति जो साधु रहाई । ना कहँ आवै ना कहँ जाई ॥ अब तीनों गुण वर्नि सुनावौं । सकल कामना तोर मिटावौं ॥

त्रिगुणको वर्णन

सत रज तमगुण तीनि बखाना । तीनते तीनि २ औ जाना ॥ पूजा तीनि अब कहौं बखानी । पूजहिं सुर नर सुनि औ ज्ञानी ॥ सात्त्विकी देवा पूजैं भाई । राजस पूजैं यक्ष बनाई ॥ तामस भूत प्रेत पूजावहिं । नर्कवास लै सो मुक्तावहिं ॥

त्रिगुण अहारको वर्णन

अहार तीन अब सुनले भाई । सबमें सत रज तम जो आई॥ खीर खांड घृत करै अहारा । यह लक्षण सतगुण व्यवहारा॥ साधु सरूपी सदा सु चाला । सन्तनको बहुविधि प्रतिपाला॥ करुवा खट्टा लोनु तीक्षण । ये अहार राजस लक्षण ॥ दुख सुख ताहि जो व्यापे भाई । नाना व्यञ्जन करै बनाई ॥ तमगुणके आहार बखाना । भई रसोई पहर सेराना ॥ भोजन करि २ लोक सिधवै । स्वाद अनेक रहै ना पावै ॥ होइ उछिष्ट अन्न अब भाई । तामसि तामस करि २ खाई॥

त्रिगुण यज्ञ वर्णन

द्रव्य यज्ञ प्रथम है भाई । बिन फल इच्छा यज्ञ कराई ॥ प्रभुके सुमिरन रहै समाई । ताकी बुद्धि सात्त्विकी भाई ॥ राजस यज्ञ करै फल चाहे । दंभ करै यश कृत्रिम समाहै ॥ यज्ञ विधि निह तामसी होई । अन चूने बिनु करै रसोई ॥ जैसे तैसे यज्ञ करै पूरा । दक्षिना देत बहुत कै घूरा ॥ खरच करै औ कल्पे भाई । ताते नर्क बास चलि जाई ॥

उग्रगीता

(५५)

त्रिगुण तपस्या वर्णन

तनसो देवता पूजा लावै । गुरु और ज्ञानी पूज पुजावै ॥ शुचि संयम जो कोमल रहई । ताकर काल पला नहिं गहई ॥ ब्रह्मचर्य पुत्रि आनि जेवावै । रहै अनिच्छा सत्य न खोवै ॥ यह तन पूजा करै सुजाना । गुरु गोविन्द को धारे ध्याना ॥ सत्त्विक मन तप कहौं बुझाई । इन्द्री सबै हाथ जेहि आई ॥ प्रथमै प्रसन्न जो राखै । मौन रहै अमृत रस चाखै ॥ आतम निग्रह करै सुजाना । अन्तर्भाव सुधा निर्वाना ॥ तपस्या मनकी कही सुनाया । सुधा सरूपी सतगुण भाया ॥

सात्त्विकी वचन तपस्या वर्णन

वचन तपस्या करो बखाना । यह तप मुखते भया प्रवीना ॥ अभय वाक्य ताकूं भइ नाहीं । सत्ति सरोत्तर जस मुख माहीं ॥ प्रिय हित साधु वचन सो कहहीं । पाठ करी करि जन्म सुधरही ॥ एते वचन तपस्या होई । मुखते करे करावै सोई ॥ तीनि तपस्या सतगुण भावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥ रजस तपस्या त्रे प्रकारा । ताकूं अब मैं करो प्रचारा ॥ तीनि तपस्या राजस भाई । तनसों तपकरि लोक देखाई ॥ मनसों कपट कबहुँ नहिं छूटै । वचन सदा मुख बोले झूटै ॥ तीनि तपस्या राजस होई । ऐसी भांति करे जो लोई ॥ तामस तप है तीन प्रकारा । शुभ अशुभ कछु नाहिं विचारा ॥ हठ करि तपसो तनको गारै । मनमें कोध सदा जो धोरै ॥ वचन कठोर बहुत सो बोले । तामस ताप अहं लिये डोलै ॥ तीन तपस्या त्रिगुण सुभावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥

त्रिगुण दानका वर्णन

तीनि प्रकार दान अब वनौं । उत्तम सेवा ब्रह्महि चीन्हौं ॥

( ५६ )

बोधसागर

अन आश्रित को देइ जो दाना । तीरथ उत्तम ठौर ठेकाना ॥ दान देइ फल चाहै नाहीं । सात्त्विक दान सो कहिये ताहीं ॥

राजस दानका वर्णन

जत अश्रेको दान जो देई । लाहा कारण संशय लेई ॥ यह तौ राजसको व्यवहारा । दान देइ चित कल्पै भारा ॥

तामस दानका वर्णन

तामस अशुचिको देइ जो दाना । नटुवा वेश्या हित करि जाना ॥ ब्राह्मण देत क्रोध मन करई । इच्छा बहुतै फलको धरई ॥ यह लक्षण तामस कर होई । तीनि प्रकार दान है सोई ॥

तीनि नाम त्रिगुणको वर्णन

तीनि नाम वर्णौ मैं त्रिगुणा । जाते सृष्टि होत है सगुना ॥ वह अंतुतु है मति सोई । तीनिउ नाम एक सम होई ॥ निज मंत्रहि मैं भाषि सुनाया । ताको मर्म न काहू पाया ॥ पाक रसोइ छूति जो होई । वो अंततू सति है सोई ॥ पातक छूति रहैं नहिं कोई । यह तौ मंत्र पवित्र कराई ॥ पावै प्रसाद जो सकल जहाना । सुमिरे पावै पद निर्वाना ॥ सब कारज सुमिरे त्रे नामा । पूर्ण होइ सकल विधि कामा ॥ योग सिद्धि सत्रह अध्याई । सो तौ पूर्ण वर्णि सुनाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनु धर्मनिराया । तीनिउ गुण वरतै संसारा ॥ साधू कहैं कोइ कर्म न लगै । तन मनते इच्छा कह त्यागै ॥ कर्म करै कर्ता न कहावै । मन सो कुमारग जान न पावै ॥ मारग अगम साधुकर होई । कृष्ण अपने मुख भाषा सोई ॥ वेद पुराण पार नहिं पावै । जहँवा साधू ध्यान लगावै ॥ वेद कितेब दोउ है फन्दा । यहि ते लागि रहै जग धन्या ॥

उग्रगीता

( ९७ )

ज्ञानहि कहि २ कर्म हटावै । यज्ञ दान फिरि जन्म धरावै ॥ हम तौ कहौ अगोचर ज्ञाना । जाते होइ हंस निर्वाना ॥

छन्द—अगम अगोचर भेद सदगुरु साधु रहै समाइ कै । हंस होइ सत्यलोक आवै दरस सद्वरु पाइ कै ॥ पूरा गुरु जो पावई तौ मिटै यम फंद को । हंसको मुक्ताइ यमसो मिलै अच्युतानंदको ॥

सोरठा—ऐसा शब्द अपार, वार पार बिच भेद को । सत्य शब्द निर्धार, सद्वरु सोइ बताइया ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे योग-

सिद्धव्याख्यानो नाम सप्तश्लोऽध्यायः ॥ १७ ॥

अथ अष्टादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहैं सुनो यदुनाथा । जो पूछौं सो कगै सनाथा ॥ सन्यास कर्म काहे सो कहिये । त्याग रूप सब वर्णन चहिये ॥

संन्यासको वर्णन

सुनु महाबाहु मैं कहौं बखाना । कर्म नाश संन्यास समाना ॥ कर्म धर्मको मारग छोंडै । ब्रह्म ध्यान अभ्यन्तर मांडै ॥ सब परपंचते न्यारा होई । कर्म संन्यास कहावै सोई ॥

त्यागरूप दर्शन

त्याग रूप है अगम अलेखा । कर्म करै नहिं आपु विशेषा ॥ निशि दिन कर्म धर्म जो होई । रहै अलिस लिस नहिं होई ॥ अपनेको कर्ता नहिं जानै । फल औ फल मनहिं नहिं आनै ॥ ताकहैं त्याग कहीये भाई । निशि दिन रहै नाम लौलाई ॥

( ५८ )

बोधसागर

संन्यास त्रिप्रार वर्णन

संन्यास त्याग तीनि गति होई । अनिष्ट इष्ट मिश्र गति सोई ॥ अनिष्ट नर्ककी योनी भुक्ते । देव योनिको इष्ट संयुक्ते ॥ मिश्र मानुषकी देह जो पावै । तीनों गति गीता बतलावै ॥

त्रिप्रकार क्रिया वर्णन

कहौ क्रिया तीनिहु समुझाई । ज्ञान कर्म कर्ता जो आई ॥

ज्ञान क्रिया त्रिप्रकार

प्रथमैं ज्ञान सुनौ चितलाई । ताकर लक्षण तीनि बताई ॥ जबही ज्ञान हृदयमें आवै । सर्व त्यागि प्रभुको लवलवै ॥ सर्व व्यापि जो ब्रह्महि जानै । सात्त्विक लक्षण ज्ञान बखानै ॥ राजस लक्षण जानै प्रभु न्यारा । न्यारा २ ब्रह्म विचारा ॥ तामस लक्षण एक ठौरहि जानै । मूरति प्रतिमा पूजा ठानै ॥ ताहि एहै ठाकुर है येही । परम पुरुषते नाहिं सनेही ॥ जेहि देवा कौ जो कोई ध्यावै । तेहि देवहि ठाकुर ठहरावै ॥ यह लक्षण तम गुण व्यवहारा । तामैं वास है नरक दुबारा ॥

कर्म क्रिया त्रिप्रकार वर्णन

दोसर कर्म लक्षण है तीनि । जानै कोउ साधू परबीनी ॥ कर्म करै फल चहैन ताको । पुत्र कलत्र असंग सदाको ॥ राग द्वेष जाके नहिं आवै । एतौ सत्त्वगुण कर्म सुभावे ॥ राजस कर्म सुनावौं मीता । करि २ कर्म कामना प्रीता ॥ कर्म अधिकार आपु ना होई । फल वांछै मन राजस सोई ॥ तामस कर्म सुनौ तुम भाई । तप स्नान औ जप लर जाई ॥ हठ करि कर्म करै बहु भाई । दुख सुख अह निशि लहै सदाई ॥ ता प्रकार क्रोधहु बहु होई । तामस नर्क वास है सोई ॥

कर्ता लक्षण त्रै प्रकार

तीसर कर्ता रूप बखानौं । कारण करण करै सोइ जानौं ॥

उग्रगीता

( ५९ )

सात्त्विक कर्ता जो कछु करई । आपु मेटि प्रभुको चित धरई ॥ आपुको कर्ता नहिं जानै । कर्ता पूरण पुरुष बखानै ॥ ऐसी रहनि रहै जो दासा । नर्क स्वर्गकी ताहि न आसा ॥ सो सत्त्व गुण लक्षण है भाई । जाते कहिये साधु सुभाई ॥ राजस कर्ता आपुको जानै । दाराहित सुत आपको मानै ॥ बहुतै हर्ष शोक तेहि भावै । थोर करै बहुतै फल धावै ॥ तामस कर्ता लक्षण भाई । आलस निद्रा बहुत रहाई ॥ आपु अयोग चाहै पुरुषारथ । ह्वै अधीन नहिं चाहै स्वारथ ॥ कारज होइ गये अब जाको । दिन औ राति बतावै ताको ॥ भोर होइ सो दिवस बतावै । तामसकर यह सदा सुभावै ॥

त्रिप्रकार बुद्धिको वर्णन

तीनि प्रकार बुद्धि है भाई । प्रथमैं सुमिरन मैं ठहराई ॥ निवृत्ति प्रवृत्ति जो मारग जानै । करै विचार धर्म पहिचानै ॥ काज अकाज न बंध न मोक्षण । सो साध्वी है सात्त्विक लक्षण ॥ दुसरी बुद्धि तो धर्म अधर्मा । काज अकाज जाने सब पर्मा ॥ राजस बुद्धि लक्षण यह भाई । मनमें सहा विचार कराई ॥ तामसबुद्धि अब सुनहु सुजाना । क्रोध लिये मन विषय सुजाना ॥ धर्महि सो अधरम करि जानै । करै अधर्म धर्म पहिचानै ॥ ता अधरम कह धर्म जो कहई । सदा तामसी बहु दुख सहई ॥

त्रिप्रकार धीरज

सात्त्विक धीरज वरणि सुनाऊ । संशय तोर जो सकल मिटाऊं ॥ पांच तत्त्व मन संयम साधै । सकल कामना यह अवराधै ॥ इंद्री सकल एक सम कराई । सात्त्विक ऐसो धीर धराई ॥ राजस धीरज है परसंगा । पारस लागे धर्म उमंगा ॥ कर्म करै संगति ते सोई । औ फल चाहै राजस होई ॥

( ६० )

बोधसागर

धीरज तामस सपना देखै । भय अभय सकलौ में पेखै ॥ शोक विषाद बसै मन माहीं । तामस धीरज लक्षण आहीं ॥

त्रिप्रकार सुख वर्णन

अब सुख लक्षण कहौ जो सोई। तीनि भांति सुख व्यापक होई॥ प्रथमहि सात्त्विक सुख सुनु भाई। सुख कहैं विषके जानै सोई ॥ सुखसो कबही हेत न जानै । विष समान ताकह पहिचानै ॥ अंत समय विषसो सुख होई । सात्त्विक लक्षण बरनौ सोई ॥ दूसर इन्द्री सुख संयोगा । परनारी सो करै जो भोगा ॥ यही प्रकार महा सुख करई । सो सुखी अंत जो विषसो होई॥ राजस सुख लक्षण यह भाई । दुख बहुतक व्यापै जाई ॥ तीसर तामस सुखहि बखानो । विवेक विचार हृदय नहि अनो॥ आलस निद्रा बहु सुख मानै । सपने कबहीं राम न जानै ॥ तामस सुख यह कहिये भाई । जाते नर्क सदा भर्माई ॥

वर्णका वर्णन

चारि वर्ण अब वर्णौ भाई । तिनके ये गुण प्रगट सुनाई ॥ ब्राह्मण सत्त्वगुण रूप विराजै । कर्म स्वभाव ताहि तन छाजै ॥ शम दम तव शून्या सो करई । ज्ञान विज्ञान सत्य मन धरई ॥ स्थिर मनमें कठोर तन होई । ब्राह्मण कर्म स्वभाव जो सोई॥ क्षत्रिय सत्वरज दुइ गुण धारी। शूरबीर दाता अधिकारी ॥ तीक्ष्ण धीरज बुद्धि हे जागी । युद्ध करत कबहूँ नहि भागी ॥ वैश्य राजसी कहौ बुझाई । कृषी गऊ रक्षक है भाई ॥ वणिज व्योहार बहुत संसारा । यह तौ लक्षण वणिज व्यवहारा॥ शूद्र वर्ण सेवकाई करई । सेवक होइ भवसागर तरई ॥ सेवा फल है अगम अपारा । आवागमनते होई निनारा ॥ जो अभिमान तौ जन्म गवाँवै । सेवा विना नहीं बनि आवै ॥