भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

आत्मबोध

( ३७ )

एक पग बांधिके अद्द झूलत रहै, एक ठादेश्वरी कष्ट कारी । एकगर्भमरते रहे पञ्चाग्निपतारहे, एक बैठिजलसेज आसनआरी ॥ कहाँ लौं कहूँ बहु रूपकोपेखनो, आप आपनपौ सवनेपिसारी । एक अन्न भोजन तजै दूबरंगनरहै, एकदूध भोजनकरै दूधाहारी ॥ एक लूनछोड़िके भये अलूनिया, एक बैठिके गुफामैलायतारी । एकतिलकमालादियेटोपचोलालिये, एकगुदढीपहरिकरिडिम्भधारी । एक पूजिकै मूर्तीगर्भ भारिधरी, एक शंखधुनिआरतीजोति वारी । सेव कीन्ही सहीदेवचीन्हानही, आत्माछोड़िभये जड़के पुजारी ॥ पूजिपाषान अभिमान अंधाफिरै, सतचेतनसूं बीच यारी । योगी पण्डित बडे सर्वगीता पढे, भर्मकी भीति नहिं टरतटारी ॥ कहै कबीर कोइ सन्त जन जौहरी, मेटि यमफन्द उठे संभारी । इतने विटम्ब सो वस्तु न्यारी रही, ज्ञानकीसुरतिसोल्योविचारी ॥ अगमकोगमकरोध्यानहृदयधरो, चढशून्यकीशिखरकरजिकिरभाई । फिक्रकोत्यागिनिजनामसो लागिकरि, सुषुप्ता ताँत तूतू बजाई ॥ गगनअरुधरनिबिचरुयाल अद्वुतरचा, गैवकीकलासतगुरुलखाई । कहै कबीर अब भोग पूरन भाया, ज्ञानके मौज वैराग पाई ॥ दौडदौडरेबालकाखबरिकरदर्बारमें, अलमस्तअवधूतफकीरआया । जाकेछाप अरुतिलकगलमालमस्तकवना, सत्तकी एकआवाज आया । खोलिपटदेखले जगमगीजोतिहै, नादअरु बिन्दुगठजीतकाया । कहै कबीर सर्वांग अविगत मिला, भर्मको छाड़िगुरुज्ञानपाया ॥ उलटि यंत्र धरो शिखरआसनकरो, देखसो देव दर्गाह माहीं । जहाँ तेल बाती बिनाअधरदीपकबलै, युक्तिकी जोतसो घटैनाहीं ॥ जहाँ तालतांतीबिना रागरमतासुना, पावैबिन निरत झंकारखाहीं । हाथबिनपांवबिनशीसमस्तकबिना, हुकुमहथियारबिन फौजधाई ॥ जहाँ जत्रतेजी नहीं गैद छाजे नहीं, युद्धमंडा तहाँ घाव नाहीं ।

( ३८ )

बोधसागर

पातबिन पेड बिन वागडम्बररहे, पालिबिनसर्वहिलोलखाहीं ॥ नीरबिनकमलतहैफूलिनर्मलरहै, पोखबिनभैवरगुंजार खाही । नैवबिनमहलकेदशोछाजाबना, रूपबिन देव जहाँ मौज पाई ॥ कहैं कबीर कोइनिरतिलोनिरखियो, पपिलके पंथमें गयंदजाई । दरसबिनदीदपरतीति आवै नहीं, पार की कहैं नब झूठ झाई ॥ हकार सकार झनकार लागि रहै, बैठमनतख्त जहाँ तत्त पाई । रूपबिन रेख जहाँ राग रमतासुना, तालमृदंगपर टेर खाई ॥ अजरअरुअमरका अगम बासाबसे, नादअरुबिन्दकीखबरपाई । सोधि अस्थूलरहमान जबभैटिया, नामकी छापजबजायखाई ॥ जहाँ फूहिरि परबोकै अमीझरबोकै, प्रेमकी पुरीसो घटैनाई । आपकी तापधरि काललागै नहीं, कालकौमारि जंजालखाई ॥ शून्यकी ध्वजा जहाँ फरकखाबोकै, सेतही गगन गुंजारखाई । अगम अरु निगमका खूबछाजा बना, रूपबिनदेवजहाँगमपाई ॥ अखंड अपार जहाँ तारलागारहै, तारमें मिलै सो पार होई । भर्मको छेकि परब्रह्मको भैटिकरि, सुरतिको कोटिब्रह्मांड मोई ॥ कोटके कंगुरे ज्योति झलमलकरै, माझरी शून्यमें फरकखाई । दासकबीर निर्वानपद परसिया, मिटिगया झूठ झकझोर आई ॥ सतकबीरका सेतही घर रहै, श्वेतही शून्यमें रमै भाई । जहाँ यती औ सतीतो निरतकरबोकै, प्रेमरस पीवे सोघटै नाई ॥ ताल मृदंग अनहद लागा रहे, सुषुम्नासाधि संतोष पाई । विहंगमशब्दजहाँ फरक खावो करै, शब्दकीखोजकोइसंतलाई ॥ जहानकी टेक अस्मान लागी रहै, सहजमें भैवरगुंजार खाई । उलटिकरिपवनतहाँ गगनलागीरहै, लूमझरलाल आकाशलाई ॥ देखिधरिध्यान जहाँ इंद्र गवनीकरै, अमीका कुंड हिलोलखाई । शब्दका चांदना अगम लागारहै, उठै झनकार ब्रह्माण्डमाई ॥

आत्मबोध

( ३९ )

दासकबीर लौलीन लंका चढे, पलककी दरसमें झलक पाई ॥ शून्यकी शिखरपर जिकर ऐसी, घटा चंघोर संजोर बाजे । शब्दकी आवाज जहांगाजबानीकहै, भँवर गुँजारनिशिदिनगाजे ॥ हीरा अरु लाल अवेध मोती पड़े, श्वेतही शून्यजहाँ सन्तजूझै । कहैं कबीर ये पन्थहै अगमका, सोहंगमें सुरति सतलोक सूझै ॥ वाहवाहसिदकेजाऊँमैमुर्शिदकेकदमोंपर, एकहीस्वात्ममेंनिहालमनकिया है । पीरमेराखासामैं सुरीदहुंताका, करिकेमिहरदस्तपंजाशिरदिया है ॥ ज्ञानकेकमानबानमारतेहैंतानि२सोइजनजानैजाकीसुरतिकरिवारवारहुआहै । अकिलकीगिलोलकरनिजमनठहरायदेस, वैतोरहमानयारमुवाहैनजियाहै । साईसर्वज्ञहराओर वेकैववेऐब, कहैंकबीर वैतोसाहिबमहबूबमियाहै ॥ बदन विकशत खुशालआनंदमें, अधरमेंमधुरसुस्कात बानी । सतडोलैनहीं झूठबोलैनहीं, सुरति औ सुमतिसोसत्यज्ञानी ॥ कहतहुँ मैं ज्ञान उपदेश सबनसुँ, देत उपदेश दिलदई जानी । ज्ञानकेपूर है रहनिके सूर है, दयाकी भक्तिदिलमाहिं ठानी ॥ और सो तोडिलैएकसोरत रहै, ऐसे जन जगतमें बिरलाप्रानी । ठगवटपार संसार भरपूर है, संत इसकी चाल कहाकागजानी ॥ चञ्चल चपल चित्त रङ्ग हैं चीकने, बातमें दूरस दिलकपटजानी । पेटमें कतरनी दया जिनके नहीं, कहतमें सुध मन बगध्यानी ॥ जीवकी दुर्मती भर्म छूटे नहीं, जन्म जन्मात्र पड़े नर्कखानी । कौवा कुबुधि सुबुधि पावै नहीं, कठिन कठोरविकरालबानी ॥ अग्निके पुञ्ज है शील शीतल नहीं, विष अमृत लिये एकसानी । कहा भयोसाखीकटो दृष्टि उभरी नहीं, सत्कीचालविनुधूरधानी ॥ सत सुकृतकी साँची रहनी सही, कागबुग अधमकीकौनबानी । कहैं कबीरकोइबिरलाजनसुघइहै, सदाशब्दध्यानसुनैनिशानी ॥ छाडिघोखादियाआपनिश्रयकिया, आदिअरुअंतसाहबएकजानी ।

( ४० )

बोधसागर

सुरतिके थाकते निरतभी थाकिया, निरतके थाकते शेषकंपा ॥ शेषके कंपते धरनिभी धसमसी, धरनिके धसमसे मेरुडोला । मेरुके डोलता शब्दसायर मिला, उर्द्धमें शब्द घनघोर गाजा ॥ बखत बखतीमिली कर्मयारी जुरी, बांधिपाताल आकाशफेरा । सत कबीर तहां ब्रह्म चौरी रचा, सत साहब तहां लिया फेरा ॥ अथर दरियाव दरगाहकुछअजबहै, निर्मली ज्योतिजहांखूबसाई । ज्योतिके ओट यम चोट लागे नहीं, तत झँकार ब्रह्माण्डमाहीं॥ ज्ञानका बाग जहांगैवका चांदना, वेद कितेबकी गम्म नाहीं । खुल गयेचश्मजवहश्मसब पशमहै, दीनअरुदुनीका कामनाहीं ॥ कहैं कबीर यह भेद बिरलालहै, झलमलैज्योतिजहांझूलेझाई ।

इति आत्मबोध रेखता प्रथम भाग समाप्त

जैनधर्मबोध ग्रन्थ

जैनधर्मबोधप्रारंभः

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास बम्बई प्रकाशन

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

A faint, light-colored illustration of a seated figure, possibly a deity or a person in traditional attire, centered on the page. The figure is depicted in a meditative or formal pose, wearing a long robe and a headpiece. The background is plain and light-colored.

सत्यमुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग संतायन, धनी धर्मदास चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कु- लपति नाम, प्रमोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया वंश- व्यालीसकी दया ।

अथ श्रीबोधसागरे

अष्टाविंशतिस्तरंगः ।

अथ जैनधर्मबोधप्रारम्भ ।

दोहा-तीर्थकर जहँ देवकह, गुरुजतिहैं जो जैन । जैनेश्वर मुख भाख जो, ग्रन्थ है केवल बैन ॥

उत्पत्ति कथावर्णन

भागकट षट जैन मत, तामैं द्वे विधि कीन । तीनकाल औ सर्पिणी, उपसर्पिणी है तीन ॥

( ४६ )

बोधसागर

आदि काल तिहुँ प्रथमके, तामें उत्पति होय । नामजुगलिया नारि नर, प्रकटहोय द्वै दोय ॥ जगत अनादि निधन कहै, तासु न कबहुँ नाश । बीजते रचना सकल हो, यह जगत स्वयमप्रकाश ॥ याको कर्तानाहिं कोई, यह जग आपे आप । कर्म प्रेरि करवाव सब, कर्महि रचना थाप ॥ ईश बसे वैकुंठमें, अलग कर्मते सोय । निर्विकार निलैप सो, नाम निरञ्जन होय ॥

चौपाई

सो प्रभु करे करावे नाहीं । जिवस्वच्छन्दनिजवशमें आही ॥ जीव जनतु जग नाना जाती । जेते जड चैतन ते पांती ॥ कर्म जनित फल भोगें सारे । आतम सबके न्यारे न्यारे ॥ जस कछु कर्म करै जो कोई । उग्र छुद्रता के वश होई ॥ विश्वमाहिं जड़ चेतन केते । जेते जीव आतमा तेते ॥ निर्विकार जो ईश्वर होई । जग विकार ताते नहिं कोई ॥ सो नहिं कर्मके बंधन पड़ता । राग द्वेष ता हृदय न बर्ता ॥ नहिं उपजाव न पालै कोई । नहिं संहार सृष्टि कर सोई ॥ सकल विकारते सो प्रभु न्यारा । जीव कर्म निजु भोग निहारा ॥ यहि षट्कालमेंदुख सुखठाटा । तीनमें वृद्धि तीनमें घाटा ॥ तीन काल सुख स्वर्ग समाना । उगै धरनि कल्पद्वुम नाना ॥ पाम रहित मानुष तब सारे । नर सुर दूनों संग विहारे ॥ द्वै द्वै प्रकट होय तब सोई । नाम जुगलिया तिनको होई ॥ आयू परम दीर्घ रह जाको । सब सुख छाय रहा महिताको ॥ कर्म कृपा कछु सो नहिं जाना । राव रंक सब एक समाना ॥ सदा काल यक सम उजियारा । कल्पद्वुमकी ज्योति अपारा ॥

जनधर्मबोध

( ४७ )

दिन औ राति कोइ जाने । रवि शशि उड्डुगण सकल डुराने॥ चन्द सूर नूर प्रचण्डा । पारिजात आमा नौ खंडा ॥ दरदर पर सुरतरु वर लागे । सकल नारि नर सुखमें पागे ॥

पूरबी बोल-छन्द बरवै

दमक देव डुम बमकै महि शशि सूर । गममि रहल चहुँ ओरवा चमकै नूर ॥ पूरन धरनि अकसवा जोति अपार । यक समान दिन रतिया नहिँ अँधियार ॥ छपे सुरतरुकी जोतिया लगनमें मन्द । एक न दीख नखतिया नहिँ रवि चन्द ॥ नर तिय सकल जुगलिया सब निस पाप । पुण्य पाप कछु नाहीं कर्म न थाप ॥ तब नहिँ बोध बिचरवा नहिँ गुरु शिष्य । कतहुँ न वरणाश्रम वासव सम दिष्य ॥ कतहुँ उग्र न सदवों रंक न राव । नर सुर विचर धरनिया कछु न बराव ॥ हिल मिल दोउ दल रहते जनु सँग भाय । भोग भूरि कल्पडुम काम पुराय ॥ महि सुख छाय स्वरगवा छबि सरसाय । हीरा लाल कि स्वनियां कविको गाय ॥ नहिँ कछु वेदन बानी नहिँ श्रुति छंद । धर्म न कछु अधरमवा सहजानन्द ॥

इति

अथ चौथा कालवर्णन

सोरठा-लागत चौथा काल, सुरतरुजबही लोप हो । नर गह न्यारी चाल, कृत चली कृतकाल तिहि ॥

नं. ९ कबीरसागर - ३

( ४८ )

बोधसागर

चौपाई

चौथा काल लगे जब आई । तबसे रात्रि द्यौस बिलगाई ॥ कल्पवृक्ष तब जाहि लुपाई । चन्द्र सूर तारे दरशाई ॥ जिहि औसर निशदिन बिलगाना । भिन्नभाव तब जगको जाना ॥ तब मानुष ऊपरको देखे । चकिंत होय सब कहैं विशेषे ॥ यह क्या हमरी नजरमें आयो । जो हम काहू देखि न पायो ॥ तब कुलकर ब्यौरा कहि देही । चन्द्र सूर तारे हैं येही ॥ कुलकर सोई नाम धरावै । जो मानुष कुलको बिलगावै ॥ जाति वर्ण कुल न्यारा करही । तिहि अनुसार धर्म आचरही ॥ राजनीति सब भाषै ओई । खेती कर्म सिखावै सोई ॥ जब मानुष सुरतरु नहि राखै । कुलकर तबहि कूसानी भाषै ॥ तबते कृतक रही सब लोगू । अन्न उपायके भोजन भोगू ॥ जबहि देव दुम गयो दुगई । ईश्व उगी मानुष सुखदाई ॥ भांति भांतिके ऊख गन्ना । जिवको दुख दरिद्र सबभन्ना ॥ कल्पवृक्षके बदले ईखा । प्रथमहि जाको मानुष चीखा ॥ ताकी खेती प्रथमहि चाला । कुलकरकी आज्ञा सबपाली ॥ कुलकर अनुभव ज्ञान गहाई । सब जीवनको राह बताई ॥ कुलकर आदि भूप इक्ष्वाका । प्रथम चली जग जाकीशाका ॥ इक्ष्वाकू कुलकर कहलाये । प्रथम जो नरको ईश्व चुसाये ॥ अर्थ सहित यह नाम कहाया । इक्ष्वाकू जिन ईश्व चुसाया ॥ तिहि अवसर गुणदोष विभागा । पुण्यपाप मानुषको लागा ॥ कर्म दोष गुण तबते पागे । प्रकट करे कुल करके आगे ॥ कछु औगुन जब नरमें पावै । निहि कुलकर धिक वचन सुनावै ॥ सो धिक वचन सुने नर नारी । निजुमनमें अति होहि दुखारी ॥ यतनमें अस लज्जा माना । तजे तुरंत आपनो प्राना ॥

जनधर्मबोध

( ४९ )

अस कहि नर छोडे निजचोला । आज हमें कुलकर धिकबोला ॥ कछु दिस बीते मनुष दिठाई । धिक बोलीसे सो मल जाई ॥ जब धिक वचनसे राह न धरही । बहुरिधिकाधिककुलकर करही ॥ यतनेहु पर जब शर्म न माने । अधिक दंड तब कुलकर ठाने ॥ कमही क्रम औगुन अधिकाई । बेडी बांसके दे ठहराई ॥ झूली फासो दण्ड प्रचंडा । लगा होन पृथ्वी नौ खंडा ॥

इति

अथ वर्णविभाग वर्णन—चौपाई

चौथा काल आनि जब लागा । तबते मानुष जाति विभागा ॥ तीन वर्ण प्रथमहि तब कीने । छत्री वैश्य शूद्र कहि दीने ॥ दोय प्रकार शूद्र पुनि कीना । एक लीन भौ दुतिय मलीना ॥ तबते जाति बरन ठहराई । कुलकर भिन्न २ बिलगाई ॥ दोय प्रकारके लोग कहाये । यक नर यक विद्याधर गाये ॥ मानुष भू गोचरी बखानो । विद्याधर खगोचरी मानो ॥ भूगोचरी भूमि पग डाले । उडि अकाश विद्याधर चाले ॥ जाति वर्ण दोनोमें कीना । नर विद्याधर धर्म धुरीना ॥ नर विद्याधर जैनी सारे । तिरथंकर सेवा चित थारे ॥ पंचम काल लगे जब आई । तब मिथ्यात्र फैल अधिकाई ॥ जबते मिथ्या मत सरसाने । तबते विद्याधर बिलगाने ॥ चौथे काल माहँ परिपाका । प्रकटे तिरसठ पुरुष शलाका ॥ एक सौ उनहत्तर जिव सारा । चौथे काल माहँ औतारा ॥ मुक्तिपात्र कहिये नर जोई । चौथे काल प्रकटे सब सोई ॥ प्रकटे तबहि तिरथंकर देवा । सुर नर मुनि कर जाकी सेवा ॥ सुर सुरपति पृथ्वीपर आवे । तिरथंकरकी अस्तुति गावै ॥

बो० सा० ९

( ५० )

बोधसागर

ऋषभनाथ है आदि तिर्यंकर । तिनके पुत्रभे भरथ भूपवर ॥ चक्रवर्ति थे भरथ भुवाला । चौथा वर्ण कीन तिहि काला ॥ सब मानुषकी पारख लीन्हें । दायावंत अधिंक जिहि चीन्हे ॥ ब्रह्म चीन्हि जिन दाया धारा । तिनको भिन्न कियो तिहि बारा ॥ ब्रह्मन तिनको नाम पुकारी । जिनके हृदये दाया भारी ॥ चौथा वर्ण भरथ नृप थापा । तबते चार बरणकी छापा ॥ ऋषभनाथकी केवल बानी । तिहि औसर असकहैं बखानी ॥ भरथ विप्र थापे हैं जाको । चलै जगतमें तिनकी साको ॥ पञ्चम काल जाहि दिन ऐहै । ब्रह्मन जैन विरोधी ह्वैहै ॥ जैन विरुद्ध कर्म सब करिहैं । द्रोह सदा जैनीसे धरिहैं ॥ कछुदिन यहिविधि गयोसिराई । मन मत ब्रह्म न वेद बनाई ॥ जैन विरुद्ध कर्म सब ठाना । हिंसा कर्म करहिं विधि नाना ॥ अश्वमेध गोमेध रचाई । अजामेध नरमेध बनाई ॥ ब्राह्मणजातिकी अधिक प्रशंसा । लिख्यो ताहि ब्रह्माको वंसा ॥ अपने मन सब शास्त्र बनाये । सबते आपको श्रेष्ठ बताये ॥ करि प्रपंच सब थाप अचारा । जैन विरुद्ध पाखंड पसारा ॥ चौथा काल बहुरि जब ऐहै । फेर न ब्राह्मण वर्ण थपैहै ॥ बहुरि प्रतिष्ठा देय न ओही । थपै न जैन धर्मको द्रोही ॥ जाति वर्णकी बात बखानी । अब पुरुषनकी कहो कहानी ॥

छंद त्रिभंगी

चौबिस तीर्थकर जैनी शंकर बस कम कंकर धूल कियौ । गुण ज्ञान गहंत मुक्ति लहंत अरि हंतअतिचूल कियौ ॥ दाया उपदेशं रहित कलेशं मोह न लेशं धर्मधनी । कुल पद बत्तीशं बानी दीशं जैन मुनीशं भर्म भनी ॥

जनधर्मबोध

( ५१ )

अथ चौबीस तीर्थकरके नाम वर्णन

दोहा-ऋषभ नाथ प्रथमै कहो, अजित नाथ कह फेर । शंभो अभिनंदन कहो, सुमतिनाथजी टेर ॥ पदम प्रभू क्षुपारसो, चंद्र प्रभू बखान । पुष्पदंत शीतल श्रेयस, वासपुञ्ज पुनि जान ॥ बिमल अनन्तो धर्मनाथ, शांतिकुन्थ नाथोय । अर्हनाथ अरु मल्लजी, मुनि सुवृत्त कह जोय ॥ निमनाथो नेमनाथ कह, पारसनाथ कहोय । महावीर नाथो कहो, अन्त तिर्थकर सोय ॥

इति

अथ बारह चक्रवर्तियोंके नाम

दोहा-भरथ सगर मघवा कहो, सनतकुमार गनाय । सांतिनगधकुंथनाथजी, अर्हनाथ कहवाय ॥ पुनि सुभूमि पञ्चो विजय, हरिखेनो ब्रह्मदत्त । सारी पृथ्वी बश करे, कर निज्ज चक्र गहत्त ॥

अथ नौ बलिभद्रके नाम

दोहा-विजय अचलजी धर्मधर, बहुरि सुप्रभुजी होइ । फेर सुदर्शन जानिये अरु सुनन्द कहै जोइ ॥ नन्दमित्र पुनि लेखिये, रामचंद्र पुनि जान । पञ्च फेर कहि मानिये, नौ बलिभद्र प्रमान ॥

अथ नौ नारायणके नाम

दोहा-प्रथम दुपिष्ट तृपिष्टजी, बहुरि स्वयंभू गाय । पुरुषोत्तम नरसिंहजी, पुण्डरीक बतलाय ॥ केवल दत्त बखानिये, फेर लक्ष्मण मान । कृष्णचन्द्र नौमैं कहो, यदुकुल दीपक जान ॥

( ५२ )

बोधसागर

अथ नौ प्रतिनारायणके नाम

दोहा-अश्वग्रीव तारक मेरक, मधु निशुम्भ प्रहलाद । बलि रावण जरासंध नव, प्रतिनारायण बाद ॥

इति

अथ तिरसठ शलाकापुरुषके नाम-चौपाई

तिरसठ पुरुष शलाका येही । जन जान अति उत्तम तेही ॥ मात पिता तिरथंकर करो । अरतालीस जीव सो हेरो ॥ चौबिस कामदेव नौ नारद । चौदह कुलकर बुद्धिविशारद ॥ ग्यारह रुद्र यक सौ उनहतर । मुक्तिपात्र अवश्य येते नर ॥ इतने इतर और अधिकाई । केवल ज्ञान गहि मुक्त कहाई ॥

अथ जैनशास्त्र संख्या प्रमाण-चौपाई

जैन शास्त्र संख्या परमाना । ऐसे ताको सुनो बखाना ॥ बत्तिस पद सब शास्त्र कहावै । ऐसे ताको लेख लगावै ॥ प्रतिपद ढाई सौ मन स्याही । यक पद पूरन लिखिये ताही ॥ यक चावल कजल जौं लीजै । यकश्लोक पूरण तिहि कीजै ॥ बत्तिस पद यह लेख लगाई । सर्व शास्त्र ताते लिखि पाई ॥ कजल आठ सहस मन लागे । केवल वैन जैनपति जागे ॥ केवल वानी जैनको जोई । अंथ प्रमाणिक इनमें सोई ॥

अथ अष्टकर्म विधान वर्णन

दोहा-अष्टकर्म जो जैन कह, ताके बंधन जीव । भवसागर भोगे सदा, पावे नहिं निजु पीव ॥ ज्ञानी बरनी प्रथम कह, दर्शना बरनी फेर । बहुरि बेदनी जानिये, महा मोह पुनि टेर ॥

जैनधर्मबोध

( ५३ )

आयू कर्म बहुरि कहो, नाम कर्म पुनि भाष । गोत कर्म अंतराय कर्म, बरनौ तिनकी शास्त्र ॥ कर्म एकही जानिये, आठभांति सो दीस । प्रकृत जैन बानी कहै, एक सौ अरतालीस ॥

इति

अथ ज्ञानावर्नी कर्मकी पंच प्रकृति वर्णन--चौपाई

मति ज्ञानावर्नी जो कर्मा । सो आवरि राख्यो मतिधर्मा ॥ श्रुति ज्ञानी वरनी जब होई । शुभश्रुति ज्ञान फुरे नहिं कोई ॥ औध ज्ञान आवर्नी जबही । औध ज्ञान हिय होय न तबही ॥ मन पर्जय अबरन उगि आवै । सो मन पर्जय ज्ञान छपावै ॥ प्रकटे केवल ज्ञाना वरनी । केवल ज्ञान गोप तिह करनी ॥ मतिश्रुति औधअरुमनपरजाई । केवल ज्ञान पंच विधि गाई ॥ मति ज्ञान सो नाम बताई । मति बुधिते जेती चतुराई ॥ कारीगरी अरु गुन गन जेते । मति ज्ञान करि ल्हिये तेते ॥ द्वितिये श्रुति ज्ञानजिहि कहई । सर्व शास्त्र मुख पाठ जो रहई ॥ तीन काल देखे श्रुति द्वारा । जाने सकल अचार विचारा ॥ श्रुति केवल ज्ञानी कह सोई । पूरन जो श्रुति ज्ञान ते होई ॥ श्रुतिके बली जो पंडित पूरा । श्रुति द्वारे संशय कर दूरा ॥ तृतिये औध ज्ञान जब होई । मनकी बात जाने सब सोई ॥ जाके मनमें जो कछु भासा । सब औधते होय प्रकाशा ॥ चौथे कह मन परजय ज्ञाना । जो मनकी परजायको जाना ॥ जहाँ जहाँ मन छन २ करदौरा । जो कछु फुरै जाय जिहि ठौरा ॥ मन परजय सो सबही जानो । सूक्ष्म गति मन कछु नदुरानो ॥ पंचम केवल ज्ञान कहावै । ताकी उदय मुक्ति जिव पावै ॥ केवल ज्ञान जो हृदय प्रकाशा । सकल भर्म भयकेर विनाशा ॥

( ५४ )

बोधसागर

केवल ज्ञानी साधू जोई । गुप्त बस्तु तिनते नहीं कोई ॥ पंच पौरि जो ज्ञानको कहिया । ताको ऐसो लेखा लहिया ॥ मति ज्ञान जिहि पूरन होई । श्रुतिज्ञान अधिकारी सोई ॥ श्रुति ज्ञानते औध गहावै । औधते मन पर्जय जगिश्नावै ॥ मन परजयते केवल ज्ञाना । मतिश्रुतिऔधजोप्रथमबखाना । तीन पौरि लो भ्रम नहीं दूटै । चौथ पौरिते पंचम जूटै ॥ तीन ज्ञान लो हो अरु जाई । मन पर्जय नहीं फिर बिनशाई ॥ मन परजय अरु केवल ज्ञाना । होके बहुरि न कबहुँ लुपाना ॥ याहुमें विधि बहुत बखाना । पौरिहुको नहीं कछु बंधाना ॥ अकसमात कबहुँ अस होई । बिना औध केवल लह लोई ॥ बिन मन पर जयकेवल ज्ञाना । निर्णय जैन धर्मपर माना ॥ ज्ञानावर्ण ते ज्ञान न होई । अवरन भंजि लाभ हो सोई ॥ ज्ञानावरनी पंच बताओ । बहुरि दर्शना वरनी गावो ॥

इति

अथ दर्शना वरनी कर्मकोना प्रकृति वर्णन--चौपाई

द्वितिय दर्शना वरनी पहारा । जाके ओट अलख कर तारा ॥ चक्षु दर्शना वरनी जो बंध । जोजिव करै होयसो अंधा ॥ अक्षर दर्शना वरनी जाही । शब्द परसरस व्यौरा नाही ॥ औध दर्शना वरनी उदोता । विमल औध दर्शन नहीं होता ॥ केवल दर्शना वरनी जाहा । केवल दर्शन होय न ताहा ॥ ध्यान अरुझि निद्रामें परई । सो प्रानी विशेष बल करई ॥ उठि उठि चले करे कछु बाता । करे प्रचंड कर्म उत्तपाता ॥ निद्रा निद्रा उदय पुकारी । सके न सो जिव पलकउघारी ॥ प्रचला प्रचला जबलो गहई । चंचल अंग लार मुख बहई ॥ निद्रा उदय जीव दुःख भरता । उठै चले बैठै गिर परता ॥

जनधर्मबोध

( ५५ )

रहै आँखि प्रचलाते बांधी । आधी बंद खुली रह आधी ॥ सोवत माहँ सुरति कछु रहई । बार बार लछु निद्रा गहई ॥

इति

अथ वेदिनी कर्म द्विविधिवर्णन--चोपाई

कर्म वेदिनी द्वे विधि हुवा । साता एक असाता दूवा ॥ साता कर्म उदय जब होई । जीव विषय सुखवेदक होई ॥ कर्म असाता उदय जो होई । जिव वेदै दुख खेदत होई ॥

इति

अथ मोहनी कर्म द्विविधि वर्णन--चोपाई

दो विधि मोहनी कर्म बखानी । यक दर्शन यक चारित हानी ॥ दर्शन मोह दुविध उच्चार । चारित मोह पचीस प्रकारा ॥ प्रथम मोह मिथ्या ती होई । जिव जब और कि और गहोई ॥ दूजे मोह मिश्रकी चाला । सत् असत् गहै समकाला ॥ तृतीय मोह समकित कहीदीनी । जिन मलीन सम कितकह कीनी ॥ दर्शन मोह त्रिविध यह भाषा । सुन पचीस अबचारितशाखा ॥ प्रथमै सोलह कहो कषाई । फिर नौविधिको लेखलखाई ॥ प्रथम कषाय क्रोध कहि दीजै । जाकी उदय क्षमा गुन छीजै ॥ द्वितीय कषाय मान परचण्डा । बिनय बिनाश करे सतखण्डा ॥ द्वितीय कषाय है माया रूपी । जाकी उदय सरलता गूपी ॥ चौथे लोभ कषाय प्रकाशा । जासु उदय संतोष बिनाशा ॥ येही चार कषाय कहीजै । अनुक्रम सूक्ष्म थूल गहीजै ॥ सो चारो चौगुना करीजै । ताते सोलह भेद भनीजै ॥ अनन्ता अनबाँधिया कषाई । तासु उदै नहिं समकित थाई ॥ जाको कहिये प्रत्याख्यान । तहां सर्व संयमकी हानी ॥ उदय अप्रत्याख्यान होई । सो पञ्चम गुन थान करखोई ॥ जोत ज्वलन नाम कहलावै । यथा ख्यात चारित विनशावै ॥

( ५६ )

बोधसागर

क्रोध मान माया अरु लोभा । चारो चार चार विधि शोभा ॥ यह कषाय षोडश विधि बाना । नौकषाय अबनिज चितधरना ॥ राग द्वेषकै हासी होई । हास्य कषाय कहावै सोई ॥ मगन होय जबजिव सुखमाही । रति कषाय रस बरनौ ताही ॥ कछु न सोहाय जीवको जहवाँ । अरति कषाय बोलिये तहवाँ ॥ थर हर जहाँ जीव कँपाई । भय कषाय सो नाम धराई ॥ रुदन विलाप वियोग दुखारी । जहाँ होय सो सोग विचारी ॥ जहँ गलानि उपजै मनमाही । सो दुग्धा रोग कहाही ॥ त्रिविधि वेद स्थिति वर्णों सोई । नर अरु नारि नपुंसक जोई ॥ प्रथमैं सोई करिये वर्णन । जीव पुरुष वेदीको लक्षण ॥ यथा अग्नि तृण मूला केरी । शिखा उत्तंग तासुकी हेरी ॥ अल्पकाल अति आतप ताई । अल्पै काल माह विनसाई ॥ पुरुष वेद धारी जिव ऐसे । धर्म कर्ममें रह नित जैसे ॥ महा मगन तप संयम माहीं । तन तावै तनको दुःख नाहीं ॥ चित औदार उद्भूत परमाना । पुरुष वेद धर आतमरामा ॥ बनिता वेदी बहुरि कहींजै । जिमि कोइलाकी अग्नि गहीजै ॥ जिमि कोइलाकी अग्निहोतीखी । परकट धुवाँ न तामैं दीखी ॥ सिलिगिसिलिगि उरअंतरदाहा । रहै निरन्तर अति अवगाहा ॥ तिमि बनिता वदी नर होई । मीठी बोल बोलता सोई ॥ बाहर ताकी मधुरी बानी । भीतर कपट छिद्रछल सानी ॥ कपटलपट करिके अधिकारी । निजगलकुगतिको बंधन डारी ॥ पापकर्म औरनको सिखई । सबको अंध करे सो विषई ॥ आपा हनि औरनको हनता । निज कुमंत्र बहुतनते भणता ॥ बनिमा वेदी ऐसो गुनिये । तृतीय नपुंसक वेदी सुनिये ॥ नगनदाह सम प्रकट न दीसा । गुप्त पजावा अग्नि सरीसा ॥